कितनी कामयाब हो पाएगी, वन नेशन, वन राशन कार्ड योजना, क्या प्रवासी मज़दूरों को मिल पाएगा सस्ता राशन?

नई दिल्ली: सरकार, जून 2020 में ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ कार्यक्रम शुरु करने जा रही है। इस योजना का मकसद उन 45 करोड़ अस्थाई मज़दूरों को रियायती भोजन उपलब्ध कराना है, जिनका कोई एक ठिकाना नहीं होता है। विशेषज्ञों की राय है कि इसे लागू करने के लिए जरूरी है कि कुछ बुनियादी शर्तों को पूरा किया जाए। मसलन, राज्यों के पास प्रवासियों की सही संख्या होनी चाहिए, जो फ़िलहाल नहीं है। हज़ारों राशन की दुकानों पर राशन लेने वालों की बायोमेट्रिक पहचान के लिए इलेक्ट्रॉनिक पॉइंट ऑफ सेल (PoS) मशीनों की जरुरत होगी।

बाकी आबादी की तुलना में ग़रीब शहरी प्रवासी ज्यादा कुपोषित होते हैं, लेकिन इसके बावजूद उनके पलायन करने की वजह से उन्हें रियायती दर पर अनाज आदि नहीं मिल पाता है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से हर जगह उन्हें रियायती दर पर राशन उपलब्ध कराना है।

2011 की जनगणना के अनुसार, अपने ही राज्यों के अंदर या फिर दूसरे राज्यों में पलायन करने वाले लोगों की आबादी, देश की कुल आबादी का लगभग 37% है। लेकिन सरकार के पास इन प्रवासियों की सही-सही राज्य-वार संख्या नहीं है। लोकसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार एक चौथाई से अधिक उचित मूल्य की दुकानों (28%) में PoS मशीनें नहीं हैं।

वर्तमान में, केंद्र सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत, 500,000 ’राशन की दुकानों के ज़रिये 80 करोड़ से अधिक लोगों को, 1 से 3 रुपये प्रति किलो की दर पर सब्सिडी वाला अनाज उपलब्ध कराती है। प्रत्येक परिवार का राशन, उसके सदस्यों की संख्या पर निर्भर करता है और राज्य सरकार की तरफ़ से परिवार के मुखिया को जारी किए गए राशन कार्ड में इसे दर्ज किया जाता है। यह कार्ड आधार (नागरिकों की पहचान के लिए 12 अंकों की विशिष्ट पहचान संख्या) से डिजिटल रूप से जुड़ा हुआ है।

मौजूदा व्यवस्था के मुताबिक़ अगर कोई राशन कार्ड होल्डर किसी दूसरी जगह पलायन करता है तो उसे पुराना राशन कार्ड रद्द कराकर, नई जगह पर नया राशन कार्ड बनवाना पड़ता है।

लेकिन ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ (इसे भी आधार से जोड़ा गया है) के बाद नए कार्ड की ज़रूरत नहीं होगी। इस तरह, इसका उद्देश्य आधार के वादे को पूरा करना है यानी पहचान के किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता के बिना सरकारी लाभों का मिलते रहना।

इंडियास्पेंड ने 11 अगस्त, 2018 की रिपोर्ट मेें बताया था कि कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों के लिए राशन कार्ड को आधार कार्ड से जोड़ना अनिवार्य करने के बाद कई लोगों को बॉयोमेट्रिक सिस्टम में ख़राबी के कारण कथित तौर पर राशन नहीं दिया गया था।  

विशेषज्ञों का कहना है कि ये समस्या नई योजना के साथ भी हो सकती है।

राइट टू फूड कैंपेन (आरटीएफ), ओडिशा के राज्य संयोजक, समीर पांडा कहते हैं, "आधार प्रमाणीकरण में लाभार्थी जिन परेशानियों का सामना करते हैं, वही समस्याएं 'वन नेशन, वन राशन कार्ड' योजना में भी आएंगी। अगर किसी का राशन कार्ड, आधार से जुड़ा नहीं है या किसी भी वजह से बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण नहीं हो पाता है, तो उन्हें राशन नहीं मिलेगा, भले वो कहीं भी रह रहे हों।"

पायलट  प्रोजेक्ट्स में चुनौतियों का पता चलता है

ओडिशा सरकार ने राज्य के ही अंदर पलायन करने वालों के लिए 1 सितंबर, 2019 को ‘वन नेशन, वन राशन ’प्रणाली की एक पायलट परियोजना शुरु की। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की 17 सितंबर, 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, 3.2 करोड़ लाभार्थियों में से, 18 लाख (6%) लाभार्थी15 सितंबर, 2019 से पहले अपने आधार को  राशन कार्ड के साथ लिंक नहीं कर पाए, जो समय सीमा ओडिशा सरकार ने तय की थी।

अक्टूबर 2019 में ओडिशा के नबरंगपुर, नुआपाड़ा और मलकानगिरी जिलों में 348 घरों में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, 35% परिवारों के राशन कार्ड, आधार से नहीं जुड़े थे। इनमें से, 31% परिवारों में 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चे थे। 12.42% व्यक्तियों के पास आधार नहीं था। खाद्य अधिकार अभियान (आरटीएफ की ओडिशा शाखा) के मुताबिक 19% ने इसके लिए आवेदनकिया था मगर फिर भी उनके राशन कार्ड, आधार से लिंक नहीं किये जा सके।

इससे पहले, अगस्त 2019 में, केंद्र सरकार ने राशन कार्ड की पोर्टेबिलिटी के पायलेट प्रोजेक्ट का ट्रायल, दो राज्य समूहों में किया। आंध्र प्रदेश-तेलंगाना और गुजरात-महाराष्ट्र। इस योजना की वजह से दूसरे राज्य में पलायन करने वालों को अपने राज्य के ही राशन कार्ड पर अनाज मिल सकेगा। 

गुजरात में खाद्य सुरक्षा पर काम करने वाले, अन्नसुक्षा अधिकार अभियान की राज्य संयोजक, सेजल दांड ने बताया कि,  "गुजरात में राज्य के अंदर ही पूर्वी आदिवासी बेल्ट और महाराष्ट्र से आए प्रवासी, दोनों हैं, जो हीरा उद्योग में काम करते हैं।” उन्होंने आगे कहा, "हमने एक भी लाभार्थी को नहीं देखा है जो पलायन कर गुजरात में हो और उसे राशन मिला हो।"

दांड ने आगे बताया कि, गुजरात के जनजातीय समुदाय अपने गांवों में खराब इंटरनेट कनेक्टिविटी के कारण राशन नहीं ले पाते हैं। उन्होंने कहा, "सरकार को आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए कि कितने लोगों को राशन मिल पाया है।"

मौसमी प्रवासी श्रमिकों का पता नहीं लगाया गया

भारत के भीतर प्रवासी श्रमिकों की सही गिनती आसान नहीं है, खासकर राज्य स्तर पर, जैसा कि हमने पहले बताया है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ताज़ा आंकड़े 2011 की जनगणना के हैं।

राइट टू फूड कैंपन के पांडा कहते हैं, "देश भर में पलायन के पैटर्न अध्ययन करना होगा क्योंकि उचित मूल्य की दुकानों को प्रवासियों के उनके क्षेत्र में आने या वहां से जाने की सूचना देनी होगी (गृह राज्य के साथ-साथ जिस राज्य में वे गए हैं, दोनों की)। प्रवासियों की संख्या के आधार पर ही राज्यों के लिए राशन का आवंटन करना होगा।" राशन कार्ड धारकों की संख्या और पिछले वर्ष के आवंटन के आधार पर, केंद्र सरकार राज्य को खाद्यान्न आवंटित करती है।

भारतीय खाद्य निगम में बिक्री और खरीद के साउथ ज़ोन के महाप्रबंधक ए एस रामाराव कहते हैं, “हमारी समझ के अनुसार, मौसमी प्रवासियों को रियायती राशन प्रदान करने की लागत राज्यों को वहन करनी चाहिए। हमें इस बारे में कोई स्पष्टता नहीं है कि किसी अन्य राज्य में किसी विशेष राज्य की सब्सिडी कैसे लागू की जाएगी।"

इलेक्ट्रॉनिक PoS मशीनें

‘वन नेशन, वन राशन कार्ड ’कार्यक्रम के लिए, सभी उचित मूल्य की दुकानों को इलेक्ट्रॉनिक PoS मशीनें लगानी होंगी और सभी राशन कार्डों को लाभार्थी के आधार नंबर के साथ जोड़ना होगा, जैसा कि हमने पहले बताया है।

Source: Lok Sabha

लोकसभा के आंकड़ों से पता चलता है कि, फरवरी 2019 तक, देश भर में 72% उचित मूल्य की दुकानों (533,165 में से 388,012) ने इलेक्ट्रॉनिक PoS मशीनें लगाई हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार, बिहार में, जहां इलेक्ट्रॉनिक PoS मशीनों की संख्या सबसे कम थी, वहां उत्तर प्रदेश के बाद देश में आप्रवासियों की दूसरी सबसे बड़ी संख्या थी।

रामाराव आगे कहते हैं, “इलेक्ट्रॉनिक PoS मशीनों पर आधारित लेनदेन फायदेमंद हैं क्योंकि उचित मूल्य की दुकानों के डीलरों को अब हर लाभार्थी के रिकॉर्ड को मैन्युअल रूप से रखने की आवश्यकता नहीं है। डिवाइस के इस्तेमाल से एक ही नाम पर एक से ज़्यादा राशन कार्ड के मामलों की भी जाँच करता है।”

(सना, इंडियास्पेंड के साथ रिपोर्टिंग फेलो हैं।)

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 06 नवंबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है। 

नई दिल्ली: सरकार, जून 2020 में ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ कार्यक्रम शुरु करने जा रही है। इस योजना का मकसद उन 45 करोड़ अस्थाई मज़दूरों को रियायती भोजन उपलब्ध कराना है, जिनका कोई एक ठिकाना नहीं होता है। विशेषज्ञों की राय है कि इसे लागू करने के लिए जरूरी है कि कुछ बुनियादी शर्तों को पूरा किया जाए। मसलन, राज्यों के पास प्रवासियों की सही संख्या होनी चाहिए, जो फ़िलहाल नहीं है। हज़ारों राशन की दुकानों पर राशन लेने वालों की बायोमेट्रिक पहचान के लिए इलेक्ट्रॉनिक पॉइंट ऑफ सेल (PoS) मशीनों की जरुरत होगी।

बाकी आबादी की तुलना में ग़रीब शहरी प्रवासी ज्यादा कुपोषित होते हैं, लेकिन इसके बावजूद उनके पलायन करने की वजह से उन्हें रियायती दर पर अनाज आदि नहीं मिल पाता है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से हर जगह उन्हें रियायती दर पर राशन उपलब्ध कराना है।

2011 की जनगणना के अनुसार, अपने ही राज्यों के अंदर या फिर दूसरे राज्यों में पलायन करने वाले लोगों की आबादी, देश की कुल आबादी का लगभग 37% है। लेकिन सरकार के पास इन प्रवासियों की सही-सही राज्य-वार संख्या नहीं है। लोकसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार एक चौथाई से अधिक उचित मूल्य की दुकानों (28%) में PoS मशीनें नहीं हैं।

वर्तमान में, केंद्र सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत, 500,000 ’राशन की दुकानों के ज़रिये 80 करोड़ से अधिक लोगों को, 1 से 3 रुपये प्रति किलो की दर पर सब्सिडी वाला अनाज उपलब्ध कराती है। प्रत्येक परिवार का राशन, उसके सदस्यों की संख्या पर निर्भर करता है और राज्य सरकार की तरफ़ से परिवार के मुखिया को जारी किए गए राशन कार्ड में इसे दर्ज किया जाता है। यह कार्ड आधार (नागरिकों की पहचान के लिए 12 अंकों की विशिष्ट पहचान संख्या) से डिजिटल रूप से जुड़ा हुआ है।

मौजूदा व्यवस्था के मुताबिक़ अगर कोई राशन कार्ड होल्डर किसी दूसरी जगह पलायन करता है तो उसे पुराना राशन कार्ड रद्द कराकर, नई जगह पर नया राशन कार्ड बनवाना पड़ता है।

लेकिन ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ (इसे भी आधार से जोड़ा गया है) के बाद नए कार्ड की ज़रूरत नहीं होगी। इस तरह, इसका उद्देश्य आधार के वादे को पूरा करना है यानी पहचान के किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता के बिना सरकारी लाभों का मिलते रहना।

इंडियास्पेंड ने 11 अगस्त, 2018 की रिपोर्ट मेें बताया था कि कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों के लिए राशन कार्ड को आधार कार्ड से जोड़ना अनिवार्य करने के बाद कई लोगों को बॉयोमेट्रिक सिस्टम में ख़राबी के कारण कथित तौर पर राशन नहीं दिया गया था।  

विशेषज्ञों का कहना है कि ये समस्या नई योजना के साथ भी हो सकती है।

राइट टू फूड कैंपेन (आरटीएफ), ओडिशा के राज्य संयोजक, समीर पांडा कहते हैं, "आधार प्रमाणीकरण में लाभार्थी जिन परेशानियों का सामना करते हैं, वही समस्याएं 'वन नेशन, वन राशन कार्ड' योजना में भी आएंगी। अगर किसी का राशन कार्ड, आधार से जुड़ा नहीं है या किसी भी वजह से बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण नहीं हो पाता है, तो उन्हें राशन नहीं मिलेगा, भले वो कहीं भी रह रहे हों।"

पायलट  प्रोजेक्ट्स में चुनौतियों का पता चलता है

ओडिशा सरकार ने राज्य के ही अंदर पलायन करने वालों के लिए 1 सितंबर, 2019 को ‘वन नेशन, वन राशन ’प्रणाली की एक पायलट परियोजना शुरु की। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की 17 सितंबर, 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, 3.2 करोड़ लाभार्थियों में से, 18 लाख (6%) लाभार्थी15 सितंबर, 2019 से पहले अपने आधार को  राशन कार्ड के साथ लिंक नहीं कर पाए, जो समय सीमा ओडिशा सरकार ने तय की थी।

अक्टूबर 2019 में ओडिशा के नबरंगपुर, नुआपाड़ा और मलकानगिरी जिलों में 348 घरों में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, 35% परिवारों के राशन कार्ड, आधार से नहीं जुड़े थे। इनमें से, 31% परिवारों में 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चे थे। 12.42% व्यक्तियों के पास आधार नहीं था। खाद्य अधिकार अभियान (आरटीएफ की ओडिशा शाखा) के मुताबिक 19% ने इसके लिए आवेदनकिया था मगर फिर भी उनके राशन कार्ड, आधार से लिंक नहीं किये जा सके।

इससे पहले, अगस्त 2019 में, केंद्र सरकार ने राशन कार्ड की पोर्टेबिलिटी के पायलेट प्रोजेक्ट का ट्रायल, दो राज्य समूहों में किया। आंध्र प्रदेश-तेलंगाना और गुजरात-महाराष्ट्र। इस योजना की वजह से दूसरे राज्य में पलायन करने वालों को अपने राज्य के ही राशन कार्ड पर अनाज मिल सकेगा। 

गुजरात में खाद्य सुरक्षा पर काम करने वाले, अन्नसुक्षा अधिकार अभियान की राज्य संयोजक, सेजल दांड ने बताया कि,  "गुजरात में राज्य के अंदर ही पूर्वी आदिवासी बेल्ट और महाराष्ट्र से आए प्रवासी, दोनों हैं, जो हीरा उद्योग में काम करते हैं।” उन्होंने आगे कहा, "हमने एक भी लाभार्थी को नहीं देखा है जो पलायन कर गुजरात में हो और उसे राशन मिला हो।"

दांड ने आगे बताया कि, गुजरात के जनजातीय समुदाय अपने गांवों में खराब इंटरनेट कनेक्टिविटी के कारण राशन नहीं ले पाते हैं। उन्होंने कहा, "सरकार को आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए कि कितने लोगों को राशन मिल पाया है।"

मौसमी प्रवासी श्रमिकों का पता नहीं लगाया गया

भारत के भीतर प्रवासी श्रमिकों की सही गिनती आसान नहीं है, खासकर राज्य स्तर पर, जैसा कि हमने पहले बताया है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ताज़ा आंकड़े 2011 की जनगणना के हैं।

राइट टू फूड कैंपन के पांडा कहते हैं, "देश भर में पलायन के पैटर्न अध्ययन करना होगा क्योंकि उचित मूल्य की दुकानों को प्रवासियों के उनके क्षेत्र में आने या वहां से जाने की सूचना देनी होगी (गृह राज्य के साथ-साथ जिस राज्य में वे गए हैं, दोनों की)। प्रवासियों की संख्या के आधार पर ही राज्यों के लिए राशन का आवंटन करना होगा।" राशन कार्ड धारकों की संख्या और पिछले वर्ष के आवंटन के आधार पर, केंद्र सरकार राज्य को खाद्यान्न आवंटित करती है।

भारतीय खाद्य निगम में बिक्री और खरीद के साउथ ज़ोन के महाप्रबंधक ए एस रामाराव कहते हैं, “हमारी समझ के अनुसार, मौसमी प्रवासियों को रियायती राशन प्रदान करने की लागत राज्यों को वहन करनी चाहिए। हमें इस बारे में कोई स्पष्टता नहीं है कि किसी अन्य राज्य में किसी विशेष राज्य की सब्सिडी कैसे लागू की जाएगी।"

इलेक्ट्रॉनिक PoS मशीनें

‘वन नेशन, वन राशन कार्ड ’कार्यक्रम के लिए, सभी उचित मूल्य की दुकानों को इलेक्ट्रॉनिक PoS मशीनें लगानी होंगी और सभी राशन कार्डों को लाभार्थी के आधार नंबर के साथ जोड़ना होगा, जैसा कि हमने पहले बताया है।

Source: Lok Sabha

लोकसभा के आंकड़ों से पता चलता है कि, फरवरी 2019 तक, देश भर में 72% उचित मूल्य की दुकानों (533,165 में से 388,012) ने इलेक्ट्रॉनिक PoS मशीनें लगाई हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार, बिहार में, जहां इलेक्ट्रॉनिक PoS मशीनों की संख्या सबसे कम थी, वहां उत्तर प्रदेश के बाद देश में आप्रवासियों की दूसरी सबसे बड़ी संख्या थी।

रामाराव आगे कहते हैं, “इलेक्ट्रॉनिक PoS मशीनों पर आधारित लेनदेन फायदेमंद हैं क्योंकि उचित मूल्य की दुकानों के डीलरों को अब हर लाभार्थी के रिकॉर्ड को मैन्युअल रूप से रखने की आवश्यकता नहीं है। डिवाइस के इस्तेमाल से एक ही नाम पर एक से ज़्यादा राशन कार्ड के मामलों की भी जाँच करता है।”

(सना, इंडियास्पेंड के साथ रिपोर्टिंग फेलो हैं।)

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 06 नवंबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।