कुपोषण की समस्या बरकरार, पोषण-संबंधी योजनाओं के लिए 19% फ़ंड घटा

नई दिल्लीः वित्त वर्ष 2020-21 के बजट में देश में पोषण में सुधार की योजनाओं पर ध्यान नहीं दिया गया है, बजट के विश्लेषण से यह सामने आया है। देश में कुपोषण के उच्च स्तर के मद्देनज़र पोषण के लिए सरकारी सहायता महत्वपूर्ण है।

विश्लेषण में पता चला कि महत्वपूर्ण पोषण योजनाओं के लिए बजट में मामूली बढ़ोत्तरी हुई है। आंकड़ों से पता चलता है कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (एमडब्ल्यूसीडी) की ओर से लंबी अवधि से हो रही कम फ़ंडिंग के कारण इन आवंटनों से असली ज़रूरतों का पता नहीं चलता। इसके अलावा, आवंटन उन कर्मियों को मानदेय देने के लिए भी पर्याप्त नहीं हैं जो फ़ील्ड में पोषण से जुड़ी बड़ी कोशिशों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

बजट में एमडब्ल्यूसीडी के तहत आने वाली इंटीग्रेटेड चाइल्ड डवेलेपमेंट सर्विसेज़ (आईसीडीएस) की पोषण से संबंधित पांच बड़ी योजनाओं के लिए 27,057 करोड़ रुपए (3.8 बिलियन डॉलर) आवंटित किए गए हैं। इनमें आंगनबाड़ी सर्विसेज़ स्कीम, पोषण अभियान, राजीव गांधी नेशनल क्रेच स्कीम, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना और स्कीम फ़ॉर एडोलसेंट गर्ल्स शामिल हैं। इन योजनाओं ज़रिए किशोरियों, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं और 0 से 6 साल तक की उम्र के बच्चों को सीधे पोषण के लाभ पहुंचाना सुनिश्चित किया जाता है।

इस साल आवंटन पिछले साल के बजट अनुमान से 3.7% ज़्यादा है। पिछली फ़ंडिंग और इन योजनाओं के लिए कर्मियों की ज़रूरत के मद्देनज़र यह वृद्धि पर्याप्त नहीं है।

कुपोषण को सामान्य तौर पर कई तरह की समस्याओं से जुड़ा समझा जाता है, इसमें भोजन, स्वास्थ्य और देखभाल जैसे कारण होते हैं, और ये सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारकों से जुड़े हैं। इस कारण से खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, स्वच्छता और रोज़गार जैसे संबंधित क्षेत्रों के लिए भी पर्याप्त फ़ंड आवंटित किया जाना चाहिए।

इस बजट में कईं ऐसी महत्वपूर्ण योजनाओं के लिए -जिन्हें ‘पोषण के लिए महत्वपूर्ण’ माना जा सकता है- कुल 276,885 करोड़ रुपए (38.8 बिलियन डॉलर) प्रस्तावित हैं। इन योजनाओं में मिड-डे मील स्कीम, नेशनल हेल्थ मिशन, फ़ूड सब्सिडी स्कीम, महात्मा गांधी नेशनल रूरल एंप्लॉयमेंट गारंटी स्कीम, नेशनल रूरल ड्रिंकिंग वाटर मिशन और अन्य योजनाएं शामिल हैं। यह पिछले वर्ष के बजट आवंटन से 19% कम है।

नेशनल फ़ूड सिक्योरिटी एक्ट के तहत महत्वपूर्ण फ़ूड सब्सिडी स्कीम बहुत अधिक सब्सिडी पर देश की 67% जनसंख्या (ग्रामीण क्षेत्रों में 75% और शहरी क्षेत्रों में 50%) को अनाज वितरित करती है। इस योजना के लिए आवंटन में 2019-20 के बजट अनुमान की तुलना में इस बार 68,650 करोड़ रुपए (9.6 बिलियन डॉलर) यानी 37% की कमी हुई है।

बहुत से अध्ययनों में सुझाव दिया गया है कि इन योजनाओं को लाभार्थियों तक पहुंचाने को सुनिश्चित करने के लिए मज़बूत नीतियों और पूरी प्रणाली में क्षमता बढ़ाने की ज़रूरत है। इसका मतलब है कि सभी क्षेत्रों में पोषण पर केंद्रित कार्यक्रमों को पर्याप्त फ़ंड मिलना चाहिए।

कम फ़ंडिंग से संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं होता

सरकार की सबसे बड़ी पोषण योजना, आंगनबाड़ी सर्विसेज़ में 6 महीने से 6 साल की उम्र के बच्चों, अधिक कुपोषित बच्चों और गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए सप्लीमेंटरी न्यूट्रीशन प्रोग्राम; प्री-स्कूल शिक्षा; और स्वास्थ्य और पोषण शिक्षा जैसी महत्वपूर्ण कोशिशें शामिल हैं। इसमें नेशनल हेल्थ मिशन के तहत स्वास्थ्य जांच, टीकाकरण और रेफ़रल सेवाएं भी आती हैं क्योंकि इनका कुपोषण पर असर होता है। इनमें एनीमिया मुक्त भारत, आयरन एंड फ़ोलिक एसिड (आईएफ़ए) सप्लीमेंटेशन, और विटामिन-ए सप्लीमेंटेशन जैसे विशेष अभियान शामिल हैं।

दो योजनाओं को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कर्मी आईसीडीएस के तहत आंगनबाड़ी वर्कर्स और आंगनबाड़ी सहायक, और एनएचएम के तहत अधिकृत आशा कार्यकर्ता हैं।

इन कर्मियों के लिए मासिक मानदेय अक्टूबर 2018 में संशोधित किया गया था। इसमें केंद्र सरकार का योगदान इस प्रकार हैः आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के लिए 4,500 रुपए प्रति माह और आंगनबाड़ी सहायकों के लिए 2,250 रुपए प्रति माह और इसके साथ अक्टूबर 2018 से 250 रुपए प्रति माह की एक प्रोत्साहन राशि भी है जो उनके कामकाज पर निर्भर है। आशा कार्यकर्ता को विशेष कार्यों को पूरा करने के लिए और ज़्यादा प्रोत्साहन मिलते हैं। मसलन, किसी अस्पताल में डिलीवरी सुनिश्चित कराने के लिए 400 रुपए और एक बच्चे के टीकाकरण के लिए 1,200 रुपए। ये कर्मी नियमित कर्मचारियों के दर्जे, और न्यूनतम वेतन के समान मानदेय की मांग कर रहे हैं, जो एक कुशल कर्मी के लिए 18,000 रुपए प्रति माह है।

इस साल के बजट में आंगनबाड़ी सर्विसेज़ के लिए 20,532 करोड़ रुपए (2.9 बिलियन डॉलर) का प्रस्ताव रखा गया है-- 2019-20 के बजट से 3.5% अधिक -- जो देशभर के आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को अधिक मानदेय देने के लिए पर्याप्त नहीं है, ख़ासतौर पर महंगाई को देखते हुए।

2015-16 से 2018-19 तक, आंगनबाड़ी सर्विसेज़ पर वास्तविक ख़र्च साल की शुरुआत में आवंटित राशि के निकट या उससे अधिक रहा है। मानव संसाधन विकास पर संसद की स्थाई समिति ने मार्च 2018 में कहा था कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की मांगों और उसे वास्तव में आवंटित फ़ंड के बीच अंतर है।

स्थाई समिति की रिपोर्ट से पता चलता है कि 2018-19 में मंत्रालय को कुल आवंटन उसकी मांग से लगभग 20% कम था। आंगनबाड़ी सर्विसेज़ के लिए, मंत्रालय को उस साल 16,335 करोड़ रुपए (2.3 बिलियन डॉलर) का आवंटन किया गया था, जो उसकी 21,101 करोड़ रुपए (2.9 बिलियन डॉलर) की मांग से लगभग 23% कम था।

वर्षों से कम फ़ंडिंग के साथ ही पोषण सेवाओं से जुड़े कर्मियों के ख़ाली पदों को भरने में केंद्र सरकार की असफ़लता से फ़ंड के इस्तेमाल में समस्या हो सकती है।

2020-21 के बजट डॉक्यूमेंट से पता चलता है कि जब सरकार ने 2019-20 के लिए आवश्यकता का अग्रिम अनुमान लगाया था, तो उसने आंगनबाड़ी सर्विसेज़ के लिए आवंटन को पिछले वित्त वर्ष में हुए वास्तविक ख़र्च से 18% बढ़ाया था। हालांकि, जब सरकार ने वित्त वर्ष के 6 महीने पूरे होने के बाद अपने अनुमान को संशोधित किया तो इस आवंटन को लगभग 11% (17,705 करोड़ रुपए यानी 2.5 बिलियन डॉलर) घटा दिया। इससे पता चलता है कि बढ़ाए गए फ़ंड का इस्तेमाल नहीं हो सका था।

फ़ंड की कमी के साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण है कि फ़ंड को कैसे ख़र्च किया जाता है। बहुत से अध्ययनों में बताया गया है कि वित्त वर्ष के अंतिम तीन महीनों में बहुत अधिक ख़़र्च करने से बचा जाना चाहिए। वित्त मंत्रालय के समय पर ख़र्च करने के जनवरी 2020 के दिशा निर्देशों में कहा गया है, “ख़र्च करने में जल्दबाज़ी को, ख़ासतौर पर वित्त वर्ष के अंतिम महीनों में वित्तीय अनुशासन का उल्लंघन माना जाएगा।”

आईसीडीएस में ख़ाली पद

पोषण से जुड़ी कोशिशों को सफ़ल बनाने के लिए आवश्यक कर्मियों की कमी है। लोकसभा में नवंबर 2019 में पूछे गए एक सवाल के जवाब से पता चलता है कि आंगनबाड़ी कर्मियों के लिए देश भर में स्वीकृत पदों में से 5.67% और आंगनबाड़ी सहायकों के 7.85% पद ख़ाली हैं।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के अधिकतम ख़ाली पद बिहार (14.3%) और दिल्ली (13.8%) में हैं, इसके बाद पश्चिम बंगाल (10%), उत्तर प्रदेश (9.6%) और तमिलनाडु (8.8%) हैं। आंगनबाड़ी सहायकों के मामले में स्थिति बहुत ख़राब है -- सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाले बिहार (17.5%), पश्चिम बंगाल (15.7%), उत्तर प्रदेश (13.4%), तमिलनाडु (11%) और पंजाब (8.8%) जैसे राज्य हैं। केरल और हिमाचल प्रदेश उन राज्यों में से हैं जहां कम पद ख़ाली हैं।

चाइल्ड डवेलेपमेंट प्रोजेक्ट ऑफ़िसर (सीडीपीओ) और लेडी सुपरवाइजर (एलएस) के लिए स्वीकृत पदों में ख़ाली पदों की संख्या का अनुपात बहुत ज़्यादा है। सीडीपीओ एक ब्लॉक या 125 से 150 आंगनबाड़ी केंद्रों का प्रभारी होता है, जबकि एलएस के पास 25 केंद्रों का प्रभार रहता है। कार्यक्रम को उचित तरीक़े से लागू करने और निगरानी के लिए इनका होना ज़रूरी है।

जून 2019 में लोकसभा में रखे गए आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2019 तक, देशभर में सीडीपीओ के 30% और एलएस के 28% पद ख़ाली थे। राजस्थान (64.5%) में सीडीपीओ के ख़ाली पद सबसे अधिक थे, इसके बाद महाराष्ट्र (55.2%), पश्चिम बंगाल (51.9%), कर्नाटक और उत्तर प्रदेश (दोनों 49.5%)  हैं। एलएस के ख़ाली पदों के अधिक अनुपात वाले राज्य पश्चिम बंगाल (67%), बिहार (48.2%), उत्तर प्रदेश (43%) और त्रिपुरा (42.4%) हैं।

राज्यों पर वेतन और मानदेय का अधिक बोझ

दिसंबर 2017 में, आईसीडीएस के तहत सीडीपीओ और एलएस सहित वेतन पाने वाले चुनिंदा कर्मचारियों के लिए केंद्र सरकार और राज्यों के बीच लागत में साझेदारी का अनुपात 60:40 से बदलकर 25:75 किया गया था। अब ऐसे में आईसीडीएस के तहत वेतन में केंद्र सरकार के योगदान में परिवर्तन से कर्मियों की कमी की समस्या से कैसे निपटा जाएगा। 

भुगतान की नई दरें भी कम मानी जाने के कारण, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और आंगनबाड़ी सहायकों को राज्य अतिरिक्त मानदेय उपलब्ध करा रहे हैं: हरियाणा (7,286 से 8,429 रुपए), मध्य प्रदेश (7,000 रुपए), तमिलनाडु (6,750 रुपए), दिल्ली (6,678 रुपए), तेलंगाना (6,000 रुपए) और कर्नाटक (5,000 रुपए) आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को सबसे अधिक अतिरिक्त मानदेय देते हैं।

आंगनबाड़ी सहायकों के लिए, सबसे अधिक अतिरिक्त मानदेय देने वाले राज्यों में तमिलनाडु (4,275 रुपए), हरियाणा (4,215 रुपए), गोवा (3,000 से 6,000 रुपए), तेलंगाना (3,750 रुपए) और मध्य प्रदेश (3,500 रुपए) हैं। 

आंगनबाड़ी कर्मियों का ना केवल मानदेय कम है बल्कि उन पर काम का बोझ भी ज़्यादा है। क्षमता कमज़ोर होने के कारण उनके कामकाज पर असर पड़ता है। इससे साफ़ है कि राज्यों को वित्तीय सहायता में बड़ी वृद्धि की आवश्यकता है।

(हैप्पी और श्रुति, सेंटर फ़ॉर बजट एंड गवर्नेंस अकाउंटेबिलिटी (सीबीजीए), नई दिल्ली के साथ न्यूट्रीशन फ़ाइनेंसिंग पर काम करते हैं। इनसे happy@cbgaindia.org and shruti@cbgaindia.org पर संपर्क किया जा सकता है)

यह रिपोर्ट अंग्रेज़ी में 13 फ़रवरी 2020 को IndiaSpend पर प्रकाशित हुई है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

नई दिल्लीः वित्त वर्ष 2020-21 के बजट में देश में पोषण में सुधार की योजनाओं पर ध्यान नहीं दिया गया है, बजट के विश्लेषण से यह सामने आया है। देश में कुपोषण के उच्च स्तर के मद्देनज़र पोषण के लिए सरकारी सहायता महत्वपूर्ण है।

विश्लेषण में पता चला कि महत्वपूर्ण पोषण योजनाओं के लिए बजट में मामूली बढ़ोत्तरी हुई है। आंकड़ों से पता चलता है कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (एमडब्ल्यूसीडी) की ओर से लंबी अवधि से हो रही कम फ़ंडिंग के कारण इन आवंटनों से असली ज़रूरतों का पता नहीं चलता। इसके अलावा, आवंटन उन कर्मियों को मानदेय देने के लिए भी पर्याप्त नहीं हैं जो फ़ील्ड में पोषण से जुड़ी बड़ी कोशिशों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

बजट में एमडब्ल्यूसीडी के तहत आने वाली इंटीग्रेटेड चाइल्ड डवेलेपमेंट सर्विसेज़ (आईसीडीएस) की पोषण से संबंधित पांच बड़ी योजनाओं के लिए 27,057 करोड़ रुपए (3.8 बिलियन डॉलर) आवंटित किए गए हैं। इनमें आंगनबाड़ी सर्विसेज़ स्कीम, पोषण अभियान, राजीव गांधी नेशनल क्रेच स्कीम, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना और स्कीम फ़ॉर एडोलसेंट गर्ल्स शामिल हैं। इन योजनाओं ज़रिए किशोरियों, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं और 0 से 6 साल तक की उम्र के बच्चों को सीधे पोषण के लाभ पहुंचाना सुनिश्चित किया जाता है।

इस साल आवंटन पिछले साल के बजट अनुमान से 3.7% ज़्यादा है। पिछली फ़ंडिंग और इन योजनाओं के लिए कर्मियों की ज़रूरत के मद्देनज़र यह वृद्धि पर्याप्त नहीं है।

कुपोषण को सामान्य तौर पर कई तरह की समस्याओं से जुड़ा समझा जाता है, इसमें भोजन, स्वास्थ्य और देखभाल जैसे कारण होते हैं, और ये सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारकों से जुड़े हैं। इस कारण से खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, स्वच्छता और रोज़गार जैसे संबंधित क्षेत्रों के लिए भी पर्याप्त फ़ंड आवंटित किया जाना चाहिए।

इस बजट में कईं ऐसी महत्वपूर्ण योजनाओं के लिए -जिन्हें ‘पोषण के लिए महत्वपूर्ण’ माना जा सकता है- कुल 276,885 करोड़ रुपए (38.8 बिलियन डॉलर) प्रस्तावित हैं। इन योजनाओं में मिड-डे मील स्कीम, नेशनल हेल्थ मिशन, फ़ूड सब्सिडी स्कीम, महात्मा गांधी नेशनल रूरल एंप्लॉयमेंट गारंटी स्कीम, नेशनल रूरल ड्रिंकिंग वाटर मिशन और अन्य योजनाएं शामिल हैं। यह पिछले वर्ष के बजट आवंटन से 19% कम है।

नेशनल फ़ूड सिक्योरिटी एक्ट के तहत महत्वपूर्ण फ़ूड सब्सिडी स्कीम बहुत अधिक सब्सिडी पर देश की 67% जनसंख्या (ग्रामीण क्षेत्रों में 75% और शहरी क्षेत्रों में 50%) को अनाज वितरित करती है। इस योजना के लिए आवंटन में 2019-20 के बजट अनुमान की तुलना में इस बार 68,650 करोड़ रुपए (9.6 बिलियन डॉलर) यानी 37% की कमी हुई है।

बहुत से अध्ययनों में सुझाव दिया गया है कि इन योजनाओं को लाभार्थियों तक पहुंचाने को सुनिश्चित करने के लिए मज़बूत नीतियों और पूरी प्रणाली में क्षमता बढ़ाने की ज़रूरत है। इसका मतलब है कि सभी क्षेत्रों में पोषण पर केंद्रित कार्यक्रमों को पर्याप्त फ़ंड मिलना चाहिए।

कम फ़ंडिंग से संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं होता

सरकार की सबसे बड़ी पोषण योजना, आंगनबाड़ी सर्विसेज़ में 6 महीने से 6 साल की उम्र के बच्चों, अधिक कुपोषित बच्चों और गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए सप्लीमेंटरी न्यूट्रीशन प्रोग्राम; प्री-स्कूल शिक्षा; और स्वास्थ्य और पोषण शिक्षा जैसी महत्वपूर्ण कोशिशें शामिल हैं। इसमें नेशनल हेल्थ मिशन के तहत स्वास्थ्य जांच, टीकाकरण और रेफ़रल सेवाएं भी आती हैं क्योंकि इनका कुपोषण पर असर होता है। इनमें एनीमिया मुक्त भारत, आयरन एंड फ़ोलिक एसिड (आईएफ़ए) सप्लीमेंटेशन, और विटामिन-ए सप्लीमेंटेशन जैसे विशेष अभियान शामिल हैं।

दो योजनाओं को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कर्मी आईसीडीएस के तहत आंगनबाड़ी वर्कर्स और आंगनबाड़ी सहायक, और एनएचएम के तहत अधिकृत आशा कार्यकर्ता हैं।

इन कर्मियों के लिए मासिक मानदेय अक्टूबर 2018 में संशोधित किया गया था। इसमें केंद्र सरकार का योगदान इस प्रकार हैः आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के लिए 4,500 रुपए प्रति माह और आंगनबाड़ी सहायकों के लिए 2,250 रुपए प्रति माह और इसके साथ अक्टूबर 2018 से 250 रुपए प्रति माह की एक प्रोत्साहन राशि भी है जो उनके कामकाज पर निर्भर है। आशा कार्यकर्ता को विशेष कार्यों को पूरा करने के लिए और ज़्यादा प्रोत्साहन मिलते हैं। मसलन, किसी अस्पताल में डिलीवरी सुनिश्चित कराने के लिए 400 रुपए और एक बच्चे के टीकाकरण के लिए 1,200 रुपए। ये कर्मी नियमित कर्मचारियों के दर्जे, और न्यूनतम वेतन के समान मानदेय की मांग कर रहे हैं, जो एक कुशल कर्मी के लिए 18,000 रुपए प्रति माह है।

इस साल के बजट में आंगनबाड़ी सर्विसेज़ के लिए 20,532 करोड़ रुपए (2.9 बिलियन डॉलर) का प्रस्ताव रखा गया है-- 2019-20 के बजट से 3.5% अधिक -- जो देशभर के आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को अधिक मानदेय देने के लिए पर्याप्त नहीं है, ख़ासतौर पर महंगाई को देखते हुए।

2015-16 से 2018-19 तक, आंगनबाड़ी सर्विसेज़ पर वास्तविक ख़र्च साल की शुरुआत में आवंटित राशि के निकट या उससे अधिक रहा है। मानव संसाधन विकास पर संसद की स्थाई समिति ने मार्च 2018 में कहा था कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की मांगों और उसे वास्तव में आवंटित फ़ंड के बीच अंतर है।

स्थाई समिति की रिपोर्ट से पता चलता है कि 2018-19 में मंत्रालय को कुल आवंटन उसकी मांग से लगभग 20% कम था। आंगनबाड़ी सर्विसेज़ के लिए, मंत्रालय को उस साल 16,335 करोड़ रुपए (2.3 बिलियन डॉलर) का आवंटन किया गया था, जो उसकी 21,101 करोड़ रुपए (2.9 बिलियन डॉलर) की मांग से लगभग 23% कम था।

वर्षों से कम फ़ंडिंग के साथ ही पोषण सेवाओं से जुड़े कर्मियों के ख़ाली पदों को भरने में केंद्र सरकार की असफ़लता से फ़ंड के इस्तेमाल में समस्या हो सकती है।

2020-21 के बजट डॉक्यूमेंट से पता चलता है कि जब सरकार ने 2019-20 के लिए आवश्यकता का अग्रिम अनुमान लगाया था, तो उसने आंगनबाड़ी सर्विसेज़ के लिए आवंटन को पिछले वित्त वर्ष में हुए वास्तविक ख़र्च से 18% बढ़ाया था। हालांकि, जब सरकार ने वित्त वर्ष के 6 महीने पूरे होने के बाद अपने अनुमान को संशोधित किया तो इस आवंटन को लगभग 11% (17,705 करोड़ रुपए यानी 2.5 बिलियन डॉलर) घटा दिया। इससे पता चलता है कि बढ़ाए गए फ़ंड का इस्तेमाल नहीं हो सका था।

फ़ंड की कमी के साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण है कि फ़ंड को कैसे ख़र्च किया जाता है। बहुत से अध्ययनों में बताया गया है कि वित्त वर्ष के अंतिम तीन महीनों में बहुत अधिक ख़़र्च करने से बचा जाना चाहिए। वित्त मंत्रालय के समय पर ख़र्च करने के जनवरी 2020 के दिशा निर्देशों में कहा गया है, “ख़र्च करने में जल्दबाज़ी को, ख़ासतौर पर वित्त वर्ष के अंतिम महीनों में वित्तीय अनुशासन का उल्लंघन माना जाएगा।”

आईसीडीएस में ख़ाली पद

पोषण से जुड़ी कोशिशों को सफ़ल बनाने के लिए आवश्यक कर्मियों की कमी है। लोकसभा में नवंबर 2019 में पूछे गए एक सवाल के जवाब से पता चलता है कि आंगनबाड़ी कर्मियों के लिए देश भर में स्वीकृत पदों में से 5.67% और आंगनबाड़ी सहायकों के 7.85% पद ख़ाली हैं।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के अधिकतम ख़ाली पद बिहार (14.3%) और दिल्ली (13.8%) में हैं, इसके बाद पश्चिम बंगाल (10%), उत्तर प्रदेश (9.6%) और तमिलनाडु (8.8%) हैं। आंगनबाड़ी सहायकों के मामले में स्थिति बहुत ख़राब है -- सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाले बिहार (17.5%), पश्चिम बंगाल (15.7%), उत्तर प्रदेश (13.4%), तमिलनाडु (11%) और पंजाब (8.8%) जैसे राज्य हैं। केरल और हिमाचल प्रदेश उन राज्यों में से हैं जहां कम पद ख़ाली हैं।

चाइल्ड डवेलेपमेंट प्रोजेक्ट ऑफ़िसर (सीडीपीओ) और लेडी सुपरवाइजर (एलएस) के लिए स्वीकृत पदों में ख़ाली पदों की संख्या का अनुपात बहुत ज़्यादा है। सीडीपीओ एक ब्लॉक या 125 से 150 आंगनबाड़ी केंद्रों का प्रभारी होता है, जबकि एलएस के पास 25 केंद्रों का प्रभार रहता है। कार्यक्रम को उचित तरीक़े से लागू करने और निगरानी के लिए इनका होना ज़रूरी है।

जून 2019 में लोकसभा में रखे गए आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2019 तक, देशभर में सीडीपीओ के 30% और एलएस के 28% पद ख़ाली थे। राजस्थान (64.5%) में सीडीपीओ के ख़ाली पद सबसे अधिक थे, इसके बाद महाराष्ट्र (55.2%), पश्चिम बंगाल (51.9%), कर्नाटक और उत्तर प्रदेश (दोनों 49.5%)  हैं। एलएस के ख़ाली पदों के अधिक अनुपात वाले राज्य पश्चिम बंगाल (67%), बिहार (48.2%), उत्तर प्रदेश (43%) और त्रिपुरा (42.4%) हैं।

राज्यों पर वेतन और मानदेय का अधिक बोझ

दिसंबर 2017 में, आईसीडीएस के तहत सीडीपीओ और एलएस सहित वेतन पाने वाले चुनिंदा कर्मचारियों के लिए केंद्र सरकार और राज्यों के बीच लागत में साझेदारी का अनुपात 60:40 से बदलकर 25:75 किया गया था। अब ऐसे में आईसीडीएस के तहत वेतन में केंद्र सरकार के योगदान में परिवर्तन से कर्मियों की कमी की समस्या से कैसे निपटा जाएगा। 

भुगतान की नई दरें भी कम मानी जाने के कारण, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और आंगनबाड़ी सहायकों को राज्य अतिरिक्त मानदेय उपलब्ध करा रहे हैं: हरियाणा (7,286 से 8,429 रुपए), मध्य प्रदेश (7,000 रुपए), तमिलनाडु (6,750 रुपए), दिल्ली (6,678 रुपए), तेलंगाना (6,000 रुपए) और कर्नाटक (5,000 रुपए) आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को सबसे अधिक अतिरिक्त मानदेय देते हैं।

आंगनबाड़ी सहायकों के लिए, सबसे अधिक अतिरिक्त मानदेय देने वाले राज्यों में तमिलनाडु (4,275 रुपए), हरियाणा (4,215 रुपए), गोवा (3,000 से 6,000 रुपए), तेलंगाना (3,750 रुपए) और मध्य प्रदेश (3,500 रुपए) हैं। 

आंगनबाड़ी कर्मियों का ना केवल मानदेय कम है बल्कि उन पर काम का बोझ भी ज़्यादा है। क्षमता कमज़ोर होने के कारण उनके कामकाज पर असर पड़ता है। इससे साफ़ है कि राज्यों को वित्तीय सहायता में बड़ी वृद्धि की आवश्यकता है।

(हैप्पी और श्रुति, सेंटर फ़ॉर बजट एंड गवर्नेंस अकाउंटेबिलिटी (सीबीजीए), नई दिल्ली के साथ न्यूट्रीशन फ़ाइनेंसिंग पर काम करते हैं। इनसे happy@cbgaindia.org and shruti@cbgaindia.org पर संपर्क किया जा सकता है)

यह रिपोर्ट अंग्रेज़ी में 13 फ़रवरी 2020 को IndiaSpend पर प्रकाशित हुई है।

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