डिजिटल भुगतान विकल्पों की मांग कम, नकद लेन-देन अब भी जारी

बेंगलुरू: 1,000 से अधिक व्यापारियों के एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि भारत में डिजिटल भुगतान का कम उपयोग अपर्याप्त विकल्पों की उपलब्धता के कारण नहीं है, बल्कि इसका कारण हैं-डिजिटली भुगतान करने के इच्छुक ग्राहकों की ‘कथित कमी’ और एक चिंता यह भी कि मोबाइल भुगतान का रिकॉर्ड टैक्स देयता को बढ़ा सकता है।

डिजिटल भुगतान, जैसे कि इंडियन स्टैक का निर्माण, जो लेन-देन को सस्ता और कुशल बनाने के लिए आधार का उपयोग करता है, और सरकार द्वारा समर्थित यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई), को अपनाने के प्रयासों के बावजूद, ‘मई 2018 तक कैश-टू-जीडीपी अनुपात पूर्व-नोटबंदी स्तर तक पहुंच चुका था,’ जैसा कि मार्च 2019 के एक अध्ययन में बताया गया है।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित, अध्ययन को राजस्थान के जयपुर में छोटे पैमाने पर फिक्स्ड स्टोर व्यापारियों द्वारा डिजिटल मोड स्वीकार करने के मुद्दे पर केंद्रित किया गया है। इसने अगस्त- सितंबर, 2017 में जयपुर में 6,011 घरों और उद्यमों की पहचान करने वाली जनगणना सूची को देखते हुए 1,003 फिक्स्ड स्टोर व्यापारियों (घर के बाहर लेकिन स्थायी संरचनाओं के भीतर उद्यम गतिविधियों का संचालन करने वाले व्यवसाय) का सर्वेक्षण किया है। इसमें स्ट्रीट वेंडर, घर-आधारित व्यवसाय और सेवा प्रदाता शामिल नहीं थे।

भारत में डिजिटल भुगतान को बढ़ाने के लिए ‘एमएसटीएआर’ या मोबाइल सॉल्यूशंस टेक्निकल असिस्टन्स एंड रिसर्च कार्यक्रम के तहत अंतर्राष्ट्रीय विकास के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका की एजेंसी द्वारा वित्त पोषित एक पहल, कैटालिस्ट ने डेटा एकत्र किया।

डिजिटल भुगतान के पक्षधरों का कहना है कि यह नकदी की तुलना में अधिक सुरक्षित है। लेन-देन को सुगम बनाकर पारदर्शिता सुनिश्चित करता है, इसलिए टैक्स योग्य है। विशेष रूप से महिलाओं के बीच बचत खातों सहित वित्तीय सेवाओं तक पहुंच फैलाकर वित्तीय समावेशन में सुधार किया जा सकता है। ऐसा नवंबर 2016 के नोटबंदी के प्रमुख उद्देश्य के रूप में दावा किया गया था। इस पर नीचे विस्तार से बात करेंगे।

हालांकि आलोचकों का कहना है कि डिजिटलाइजेशन की दिशा में जल्दबाजी से, पहले ही वंचित लोगों का पीछे छूट जाने का खतरा हो सकता है, जो डिजिटल रूप से साक्षर नहीं हैं। नीति-निर्माता आर्थिक विकास के लिए डिजिटल भुगतान को बढ़ाना चाहते हैं,और आरबीआई का लक्ष्य मार्च 2021 तक प्रति व्यक्ति वार्षिक डिजिटल लेन-देन को 10 गुना बढ़ाकर 220 करने का है।

2017-18 और 2018-19 के बीच डिजिटल लेनदेन की कुल मात्रा 58.8 फीसदी बढ़कर 2340 करोड़ हुआ है, जैसा कि 11 जून, 2019 को आरबीआई की रिपोर्ट में बताया गया है। भुगतान और निपटान प्रणाली ‘एक आधुनिक अर्थव्यवस्था के केंद्र’ में हैं और पूरी अर्थव्यवस्था के लिए बचत और निवेश को चैनलाइज करने के लिए बुनियादी ढांचा प्रदान करते हैं।

व्यापारी क्यों हैं अनिच्छुक ?

1,003 उत्तरदाताओं में से, 582 ने डिजिटल भुगतान को नहीं अपनाने के लिए शीर्ष तीन कारण बताए हैं - ग्राहक की मांग में कमी (54.7 फीसदी), जागरूकता की कमी (41.7 फीसदी) और धोखा होने का डर (41.7 फीसदी) है। 421 उत्तरदाताओं के अनुसार इसे अपनाने के कारण, नोटबंदी (73.8 फीसदी), ग्राहक की मांग (62.9 फीसदी), और उपयोग में आसानी (37.2 फीसदी) थे।

अपनाने वाले और इसे न-अपनाने वाले दोनों ने ग्राहक की मांग को एक शीर्ष कारण के रूप में बताया। अध्ययन में कहा गया है, "इससे पता चलता है कि अपनाने वालों के पास कम से कम विश्वास तो है कि उनके पास अधिक ग्राहक हैं, जो गैर-अपनाने वालों की तुलना में डिजिटल भुगतान करते हैं।"

‘आपूर्ति पक्ष की बाधाएं’ जैसे डिजिटल भुगतान प्रणाली की लागत और संबंधित बुनियादी ढांचे को कम स्वीकार करने के कारणों के रूप में सूचीबद्ध नहीं किया गया था। लगभग 98.6 फीसदी उत्तरदाताओं को ‘संभावित भावी डिजिटल भुगतान उपयोगकर्ता’ पाया गया, जिसमें उनके पास आवश्यक दस्तावेज, व्यवसाय आय और साक्षरता है, ताकि वे डिजिटल भुगतान अपनाने के लिए सभी आवश्यक शर्तों को पूरा कर सकें, जैसा कि अध्ययन में उल्लेख किया गया है।

नमूने में शामिल लगभग 54.2 फीसदी व्यापारियों ने सभी आवश्यकताओं को पूरा किया: 97 फीसदी व्यापारियों के पास एक बैंक खाता था, 79 फीसदी के पास इंटरनेट एक्सेस करने वाला उपकरण था, 55 फीसदी के पास इंटरनेट का उपयोग था, बस 100 फीसदी से कम संबंधित उपयोग शुल्क वहन कर सकते है,और 96 फीसदी तकनीकी रूप से साक्षर थे। फिर भी केवल 42 फीसदी ने डिजिटल भुगतान को अपनाया था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान डिजिटल भुगतान उपयोगकर्ताओं के बीच, ‘कम है, ग्राहकों के साथ उनके 80 फीसदी लेन-देन अभी भी नकद में हो रहे हैं।’

अध्ययन में उल्लेख किया गया है कि डिजिटल भुगतान का कम स्वीकार ग्रहण "मुख्य रूप से अन्य मांग-पक्ष कारकों पर निर्भर हो सकता है," जैसे कि अपनाने की कीमत (लागू होने वाले शुल्क)। अध्ययन में कहा गया है कि डिजिटल भुगतान से जुड़े ग्राहकों की मांग और टैक्स देनदारियों में वृद्धि की मांग के बारे में विश्वास भी व्यापारियों के फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर और अध्ययन के सह-लेखक एथन लिगॉन ने इंडियास्पेंड को बताया, "देशों भर में इसे अपनाने को लेकर भारी अंतर हैं।यूएस और यूरोप में प्रमुख भुगतान प्रणाली क्रेडिट या डेबिट कार्ड है, जो पहले से ही, अधिकांश खुदरा लेन-देन बचत के लिए नकदी को निचोड़ चुका है।” यह अमेरिका में देखा जा सकता है, जहां मूल्य के हिसाब से 10 फीसदी से कम नकद लेन-देन होता है, और बड़े शहरों में खुदरा विक्रेताओं के लिए अब नकद स्वीकार नहीं करना आम बात है।

भारत में, क्रेडिट या डेबिट कार्ड की पहुंच काफी कम है, लेकिन नकदी ले जाने के खतरे कुछ अन्य कम आय वाले देशों की तुलना में बहुत कम हैं। इसका मतलब है कि अमेरिका या यूरोप की तरह मोबाइल मनी, क्रेडिट या डेबिट कार्ड के मुकाबले प्रतिस्पर्धा में नहीं है। यह नकदी के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा है।

2013 से 2019 के बीच, भारत में डिजिटल लेनदेन में करीब दस गुना बढ़ कर प्रति व्यक्ति वार्षिक 22 लेन-देन तक पहुंचा है। लेकिन अन्य ब्रिक्स देशों की तुलना में कम ही है। मई 2019 भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की रिपोर्ट के अनुसार, ये आंकड़े चीन (97), ब्राजील (149), रूस (179), दक्षिण अफ्रीका (79) के लिए ज्यादा हैं।

सही उपायों के साथ, प्रति व्यक्ति लेन-देन तीन वर्षों में 10 के कारक से बढ़ सकता है और मार्च 2021 तक 220 तक पहुंच सकता है, जैसा कि आरबीआई की रिपोर्ट में बताया गया है, जिसे डिजिटल पेमेंट के डीपनिंग पर इसकी कमेटी द्वारा लिखा गया था, जिसका नेतृत्व भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (आधार) के वास्तुकार, नंदन नीलेकणी ने किया था।

डिजिटल भुगतान उप-सहारा अफ्रीका में अधिक व्यापक हैं। 2017 में, केन्या में 97 फीसदी वयस्कों और दक्षिण अफ्रीका में 60 फीसदी लोगों ने डिजिटल भुगतान किया था, जबकि, भारत में यह आंकड़े 29 फीसदी थे। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 17 मई 2018 की रिपोर्ट में बताया है। हमने रिपोर्ट में बताया है कि, 80 फीसदी भारतीयों के पास बैंक खाता था, इसी अनुपात के लोगों के पास एक मोबाइल फोन था, लेकिन वित्तीय समावेशन का स्तर अभी भी दुनिया के बीच सबसे खराब था।

प्रति भौगोलिक क्षेत्र, भारत के एटीएम का घनत्व ( प्रति 1,000 वर्ग किमी 69 एटीएम) प्रमुख उभरते बाजारों में चीन (100 एटीएम) के बाद दूसरे स्थान पर है, लेकिन भारत का उच्च जनसंख्या घनत्व में यह अब भी पर्याप्त नहीं है, जैसा कि 23 अक्टूबर 2018 को लाइवमिंट की रिपोर्ट में बताया गया है।

नोटबंदी से पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं

नवंबर 2016 में, सरकार ने नोटबंदी (उच्च मूल्य वाले मुद्रा नोट अमान्य, मूल्य द्वारा 86 फीसदी मुद्रा की राशि) की घोषणा की थी। यह अपने उद्देश्य में "काफी हद तक" सफल रहा, जैसा कि आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग को 29 अगस्त, 2018 को इकोनॉमिक टाइम्स के रिपोर्ट में कोट किया गया था।

उल्लिखित उद्देश्य, जो अगले दिनों में बदल गए, उनमें डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देना, और काले धन की जांच, वित्तीय वित्तपोषण और नकली नोटों का प्रचलन शामिल है। हटाए गए 500 रुपये और 1,000 रुपये के करेंसी नोटों के 99 फीसदी से अधिक वापस कर दिए गए, जबकि 11,000 करोड़ रुपये वापस नहीं आए थे।

जयपुर में व्यापारियों ने नोटबंदी के बाद डिजिटल रूप से भुगतान करने की मांग करने वाले ग्राहकों के प्रतिशत में वृद्धि की सूचना दी, इसके बाद इसी अवधि के दौरान ‘मांग में कमी’ की बात भी कही (हालांकि पूर्व-नोटबंदी स्तरों के लिए नहीं)," जैसा कि एक अध्ययन में कहा गया है।

अध्ययन के सह-लेखक एथन लिगॉन ने इंडियास्पेंड को बताया, "नकदी का उपयोग करने की उपभोक्ताओं की क्षमता अस्थायी रूप से कम हो गई है, और भारत में पुनर्मुद्रीकरण नहीं होता, (कुछ हिचकी के साथ) तो मुझे विश्वास है कि डिजिटल भुगतान लेन-देन को एक बड़ा बढ़ावा मिलता। बात यह है कि पुनर्मुद्रीकरण के बिना सरकार की अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर झटका है।"

डिजिटल लेनदेन अपनाने वालों और न-अपनाने वालों के बीच तुलना से पता चलता है कि “नोटबंदी से पहले, अपनाने वालों के 6.65 फीसदी और न अपनाने वाले ग्राहकों के 2.88 फीसदी ने डिजिटल रूप से भुगतान करने की मांग की थी। नोटबंदी के ठीक बाद, ये प्रतिशत 26.09 फीसदी और 12.36 फीसदी थे, और सर्वेक्षण के समय 15.10 फीसदी और 5.22 फीसदी थे।”

विकास अर्थशास्त्री, रीतिका खेरा ने इंडियास्पेंड को बताया, "यह संभव है कि नोटबंदी के बाद नकदी की कमी के कारण डिजिटल भुगतान के उपयोग में वृद्धि हुई थी, और यह कि नकदी की आपूर्ति बहाल हो जाने के बाद, लोग केवल डिजिटल भुगतान का उपयोग एक कमबैक विकल्प के रूप में करते हैं। बयानबाजी के विपरीत, इस बारे में बहस चल रही है कि किस सीमा तक डिजिटल भुगतान के इक्स्टेन्ट का स्वागत किया जाना चाहिए।"

उन्होंने कहा कि डिजिटल भुगतान प्रणाली द्वारा सक्षम भुगतान धोखाधड़ी को भारत में सूचित किया गया है, और डिजिटल भुगतान से परहेज के लिए ‘लोगों के अधूरे ज्ञान’ को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

लिगोन कहते हैं, “बैंक खाते केवल उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं, जो लेन-देन में नकदी का उपयोग करना पसंद करते हैं, और जो भौतिक संपत्ति जैसे कि भूमि, अनाज, या सोने में धन संग्रह करते हैं। नकद और भौतिक संपत्ति के लिए एक प्राथमिकता समझ में आती है। अगर कोई वित्तीय क्षेत्र या सरकार पर भरोसा नहीं करता है, जो इसे विनियमित करने में इतनी बड़ी भूमिका निभाता है, जैसा कि भारत में है।”

बुनियादी साक्षरता, और आधुनिक बैंकिंग प्रणाली का उपयोग करने में आसानी का संबंध इस बात से है कि क्यों डिजिटल भुगतान कम है, और भारत की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करने की होनी चाहिए कि लोगों के पास एक मजबूत, विश्वसनीय और अनुकूल बैंकिंग प्रणाली तक आसान पहुंच हो।

क्या गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) एक प्रोत्साहन है?

अध्ययन में कहा गया है कि डिजिटल भुगतान "व्यावसायिक पारदर्शिता को बढ़ावा देते हैं, क्योंकि वे उद्यमों के लिए एक आधिकारिक लेन-देन रिकॉर्ड बनाने में सहायता करते हैं"। डिजिटल भुगतान के तरीकों को अपनाने वालों में से लगभग 74 फीसदी ने कहा कि उन्होंने माल और सेवा कर (जीएसटी) के लिए पंजीकरण किया था, जबकि नहीं अपनाने वाले केवल 48 फीसदी ने कहा कि उन्होंने पंजीकरण कराया था।

व्यवसायों के सबसेट में से जो रिपोर्ट करते हैं कि उन्हें जीएसटी के लिए पंजीकरण करना अनिवार्य है।

78.4 फीसदी अपनाने वाले और 60.63 फीसदी नहीं अपनाने वाले थे। अध्ययन में कहा गया है कि "डिजिटल भुगतान उपयोगकर्ताओं की ओर से रिपोर्ट करने की संभावना है कि वे पहले से ही जीएसटी का भुगतान करने के लिए पंजीकृत हैं"।

लिगॉन नकद से डिजिटल भुगतान विधियों की ओर बढ़ने में लोगों की अनिच्छा में परंपरा के प्रभाव के बारे में उलझन में है। लिगॉन ने कहा कि "अंतर यह है कि नकदी से जुड़े लेन-देन गुमनाम हैं, और इसलिए कम पारदर्शी हैं। जो लोग इस गुमनामी और पारदर्शिता की कमी को महत्व देते हैं, उनके पास हमेशा नकदी को प्राथमिकता देने का एक कारण होता है।"

हालांकि, शोध से निष्कर्ष यह है कि डिजिटल भुगतान को अपनाना टैक्स प्रणाली द्वारा प्रदान किए गए प्रोत्साहनों पर निर्भर करता है, न कि डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म की विशेषताओं या लागतों के आधार पर, जैसा कि लिगॉन स्पष्ट करते हैं।

‘अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय’ के नारायणन कहते हैं, “जब नई तकनीकें पेश की जाती हैं, तो मौजूदा लोगों को एक सावधानीपूर्वक, स्वतंत्र मूल्यांकन के आधार पर धीरे-धीरे चरणबद्ध किया जाना चाहिए कि क्या नए तकनीकी हस्तक्षेप वांछित उद्देश्य प्राप्त कर रहे हैं? जबकि इस बारे में, ऐसा नहीं हुआ है।लोगों को उनकी सहमति के बिना नए प्लेटफार्मों पर पलायन करने के लिए मजबूर किया गया है। उदाहरण के लिए, आधार पेमेंट ब्रिज सिस्टम के साथ ग्रामीण बैंक खातों की मैपिंग संबंधित पेंशनरों या मनरेगा के श्रमिकों की सहमति के बिना की गई थी। कथित तौर पर एयरटेल वॉलेट्स और आईसीआईसीआई बैंक खातों में श्रमिकों का पैसा डायवर्ट किया गया था।” उन्होंने आगे कहा,"इस तरह के अनुभव केवल लोगों की गलतफहमी को बढ़ाने का काम करते हैं।"

(पलियथ विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 18 जून 2019 को IndiaSpend.com प्रकाशित हुआ है।

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बेंगलुरू: 1,000 से अधिक व्यापारियों के एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि भारत में डिजिटल भुगतान का कम उपयोग अपर्याप्त विकल्पों की उपलब्धता के कारण नहीं है, बल्कि इसका कारण हैं-डिजिटली भुगतान करने के इच्छुक ग्राहकों की ‘कथित कमी’ और एक चिंता यह भी कि मोबाइल भुगतान का रिकॉर्ड टैक्स देयता को बढ़ा सकता है।

डिजिटल भुगतान, जैसे कि इंडियन स्टैक का निर्माण, जो लेन-देन को सस्ता और कुशल बनाने के लिए आधार का उपयोग करता है, और सरकार द्वारा समर्थित यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई), को अपनाने के प्रयासों के बावजूद, ‘मई 2018 तक कैश-टू-जीडीपी अनुपात पूर्व-नोटबंदी स्तर तक पहुंच चुका था,’ जैसा कि मार्च 2019 के एक अध्ययन में बताया गया है।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित, अध्ययन को राजस्थान के जयपुर में छोटे पैमाने पर फिक्स्ड स्टोर व्यापारियों द्वारा डिजिटल मोड स्वीकार करने के मुद्दे पर केंद्रित किया गया है। इसने अगस्त- सितंबर, 2017 में जयपुर में 6,011 घरों और उद्यमों की पहचान करने वाली जनगणना सूची को देखते हुए 1,003 फिक्स्ड स्टोर व्यापारियों (घर के बाहर लेकिन स्थायी संरचनाओं के भीतर उद्यम गतिविधियों का संचालन करने वाले व्यवसाय) का सर्वेक्षण किया है। इसमें स्ट्रीट वेंडर, घर-आधारित व्यवसाय और सेवा प्रदाता शामिल नहीं थे।

भारत में डिजिटल भुगतान को बढ़ाने के लिए ‘एमएसटीएआर’ या मोबाइल सॉल्यूशंस टेक्निकल असिस्टन्स एंड रिसर्च कार्यक्रम के तहत अंतर्राष्ट्रीय विकास के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका की एजेंसी द्वारा वित्त पोषित एक पहल, कैटालिस्ट ने डेटा एकत्र किया।

डिजिटल भुगतान के पक्षधरों का कहना है कि यह नकदी की तुलना में अधिक सुरक्षित है। लेन-देन को सुगम बनाकर पारदर्शिता सुनिश्चित करता है, इसलिए टैक्स योग्य है। विशेष रूप से महिलाओं के बीच बचत खातों सहित वित्तीय सेवाओं तक पहुंच फैलाकर वित्तीय समावेशन में सुधार किया जा सकता है। ऐसा नवंबर 2016 के नोटबंदी के प्रमुख उद्देश्य के रूप में दावा किया गया था। इस पर नीचे विस्तार से बात करेंगे।

हालांकि आलोचकों का कहना है कि डिजिटलाइजेशन की दिशा में जल्दबाजी से, पहले ही वंचित लोगों का पीछे छूट जाने का खतरा हो सकता है, जो डिजिटल रूप से साक्षर नहीं हैं। नीति-निर्माता आर्थिक विकास के लिए डिजिटल भुगतान को बढ़ाना चाहते हैं,और आरबीआई का लक्ष्य मार्च 2021 तक प्रति व्यक्ति वार्षिक डिजिटल लेन-देन को 10 गुना बढ़ाकर 220 करने का है।

2017-18 और 2018-19 के बीच डिजिटल लेनदेन की कुल मात्रा 58.8 फीसदी बढ़कर 2340 करोड़ हुआ है, जैसा कि 11 जून, 2019 को आरबीआई की रिपोर्ट में बताया गया है। भुगतान और निपटान प्रणाली ‘एक आधुनिक अर्थव्यवस्था के केंद्र’ में हैं और पूरी अर्थव्यवस्था के लिए बचत और निवेश को चैनलाइज करने के लिए बुनियादी ढांचा प्रदान करते हैं।

व्यापारी क्यों हैं अनिच्छुक ?

1,003 उत्तरदाताओं में से, 582 ने डिजिटल भुगतान को नहीं अपनाने के लिए शीर्ष तीन कारण बताए हैं - ग्राहक की मांग में कमी (54.7 फीसदी), जागरूकता की कमी (41.7 फीसदी) और धोखा होने का डर (41.7 फीसदी) है। 421 उत्तरदाताओं के अनुसार इसे अपनाने के कारण, नोटबंदी (73.8 फीसदी), ग्राहक की मांग (62.9 फीसदी), और उपयोग में आसानी (37.2 फीसदी) थे।

अपनाने वाले और इसे न-अपनाने वाले दोनों ने ग्राहक की मांग को एक शीर्ष कारण के रूप में बताया। अध्ययन में कहा गया है, "इससे पता चलता है कि अपनाने वालों के पास कम से कम विश्वास तो है कि उनके पास अधिक ग्राहक हैं, जो गैर-अपनाने वालों की तुलना में डिजिटल भुगतान करते हैं।"

‘आपूर्ति पक्ष की बाधाएं’ जैसे डिजिटल भुगतान प्रणाली की लागत और संबंधित बुनियादी ढांचे को कम स्वीकार करने के कारणों के रूप में सूचीबद्ध नहीं किया गया था। लगभग 98.6 फीसदी उत्तरदाताओं को ‘संभावित भावी डिजिटल भुगतान उपयोगकर्ता’ पाया गया, जिसमें उनके पास आवश्यक दस्तावेज, व्यवसाय आय और साक्षरता है, ताकि वे डिजिटल भुगतान अपनाने के लिए सभी आवश्यक शर्तों को पूरा कर सकें, जैसा कि अध्ययन में उल्लेख किया गया है।

नमूने में शामिल लगभग 54.2 फीसदी व्यापारियों ने सभी आवश्यकताओं को पूरा किया: 97 फीसदी व्यापारियों के पास एक बैंक खाता था, 79 फीसदी के पास इंटरनेट एक्सेस करने वाला उपकरण था, 55 फीसदी के पास इंटरनेट का उपयोग था, बस 100 फीसदी से कम संबंधित उपयोग शुल्क वहन कर सकते है,और 96 फीसदी तकनीकी रूप से साक्षर थे। फिर भी केवल 42 फीसदी ने डिजिटल भुगतान को अपनाया था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान डिजिटल भुगतान उपयोगकर्ताओं के बीच, ‘कम है, ग्राहकों के साथ उनके 80 फीसदी लेन-देन अभी भी नकद में हो रहे हैं।’

अध्ययन में उल्लेख किया गया है कि डिजिटल भुगतान का कम स्वीकार ग्रहण "मुख्य रूप से अन्य मांग-पक्ष कारकों पर निर्भर हो सकता है," जैसे कि अपनाने की कीमत (लागू होने वाले शुल्क)। अध्ययन में कहा गया है कि डिजिटल भुगतान से जुड़े ग्राहकों की मांग और टैक्स देनदारियों में वृद्धि की मांग के बारे में विश्वास भी व्यापारियों के फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर और अध्ययन के सह-लेखक एथन लिगॉन ने इंडियास्पेंड को बताया, "देशों भर में इसे अपनाने को लेकर भारी अंतर हैं।यूएस और यूरोप में प्रमुख भुगतान प्रणाली क्रेडिट या डेबिट कार्ड है, जो पहले से ही, अधिकांश खुदरा लेन-देन बचत के लिए नकदी को निचोड़ चुका है।” यह अमेरिका में देखा जा सकता है, जहां मूल्य के हिसाब से 10 फीसदी से कम नकद लेन-देन होता है, और बड़े शहरों में खुदरा विक्रेताओं के लिए अब नकद स्वीकार नहीं करना आम बात है।

भारत में, क्रेडिट या डेबिट कार्ड की पहुंच काफी कम है, लेकिन नकदी ले जाने के खतरे कुछ अन्य कम आय वाले देशों की तुलना में बहुत कम हैं। इसका मतलब है कि अमेरिका या यूरोप की तरह मोबाइल मनी, क्रेडिट या डेबिट कार्ड के मुकाबले प्रतिस्पर्धा में नहीं है। यह नकदी के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा है।

2013 से 2019 के बीच, भारत में डिजिटल लेनदेन में करीब दस गुना बढ़ कर प्रति व्यक्ति वार्षिक 22 लेन-देन तक पहुंचा है। लेकिन अन्य ब्रिक्स देशों की तुलना में कम ही है। मई 2019 भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की रिपोर्ट के अनुसार, ये आंकड़े चीन (97), ब्राजील (149), रूस (179), दक्षिण अफ्रीका (79) के लिए ज्यादा हैं।

सही उपायों के साथ, प्रति व्यक्ति लेन-देन तीन वर्षों में 10 के कारक से बढ़ सकता है और मार्च 2021 तक 220 तक पहुंच सकता है, जैसा कि आरबीआई की रिपोर्ट में बताया गया है, जिसे डिजिटल पेमेंट के डीपनिंग पर इसकी कमेटी द्वारा लिखा गया था, जिसका नेतृत्व भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (आधार) के वास्तुकार, नंदन नीलेकणी ने किया था।

डिजिटल भुगतान उप-सहारा अफ्रीका में अधिक व्यापक हैं। 2017 में, केन्या में 97 फीसदी वयस्कों और दक्षिण अफ्रीका में 60 फीसदी लोगों ने डिजिटल भुगतान किया था, जबकि, भारत में यह आंकड़े 29 फीसदी थे। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 17 मई 2018 की रिपोर्ट में बताया है। हमने रिपोर्ट में बताया है कि, 80 फीसदी भारतीयों के पास बैंक खाता था, इसी अनुपात के लोगों के पास एक मोबाइल फोन था, लेकिन वित्तीय समावेशन का स्तर अभी भी दुनिया के बीच सबसे खराब था।

प्रति भौगोलिक क्षेत्र, भारत के एटीएम का घनत्व ( प्रति 1,000 वर्ग किमी 69 एटीएम) प्रमुख उभरते बाजारों में चीन (100 एटीएम) के बाद दूसरे स्थान पर है, लेकिन भारत का उच्च जनसंख्या घनत्व में यह अब भी पर्याप्त नहीं है, जैसा कि 23 अक्टूबर 2018 को लाइवमिंट की रिपोर्ट में बताया गया है।

नोटबंदी से पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं

नवंबर 2016 में, सरकार ने नोटबंदी (उच्च मूल्य वाले मुद्रा नोट अमान्य, मूल्य द्वारा 86 फीसदी मुद्रा की राशि) की घोषणा की थी। यह अपने उद्देश्य में "काफी हद तक" सफल रहा, जैसा कि आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग को 29 अगस्त, 2018 को इकोनॉमिक टाइम्स के रिपोर्ट में कोट किया गया था।

उल्लिखित उद्देश्य, जो अगले दिनों में बदल गए, उनमें डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देना, और काले धन की जांच, वित्तीय वित्तपोषण और नकली नोटों का प्रचलन शामिल है। हटाए गए 500 रुपये और 1,000 रुपये के करेंसी नोटों के 99 फीसदी से अधिक वापस कर दिए गए, जबकि 11,000 करोड़ रुपये वापस नहीं आए थे।

जयपुर में व्यापारियों ने नोटबंदी के बाद डिजिटल रूप से भुगतान करने की मांग करने वाले ग्राहकों के प्रतिशत में वृद्धि की सूचना दी, इसके बाद इसी अवधि के दौरान ‘मांग में कमी’ की बात भी कही (हालांकि पूर्व-नोटबंदी स्तरों के लिए नहीं)," जैसा कि एक अध्ययन में कहा गया है।

अध्ययन के सह-लेखक एथन लिगॉन ने इंडियास्पेंड को बताया, "नकदी का उपयोग करने की उपभोक्ताओं की क्षमता अस्थायी रूप से कम हो गई है, और भारत में पुनर्मुद्रीकरण नहीं होता, (कुछ हिचकी के साथ) तो मुझे विश्वास है कि डिजिटल भुगतान लेन-देन को एक बड़ा बढ़ावा मिलता। बात यह है कि पुनर्मुद्रीकरण के बिना सरकार की अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर झटका है।"

डिजिटल लेनदेन अपनाने वालों और न-अपनाने वालों के बीच तुलना से पता चलता है कि “नोटबंदी से पहले, अपनाने वालों के 6.65 फीसदी और न अपनाने वाले ग्राहकों के 2.88 फीसदी ने डिजिटल रूप से भुगतान करने की मांग की थी। नोटबंदी के ठीक बाद, ये प्रतिशत 26.09 फीसदी और 12.36 फीसदी थे, और सर्वेक्षण के समय 15.10 फीसदी और 5.22 फीसदी थे।”

विकास अर्थशास्त्री, रीतिका खेरा ने इंडियास्पेंड को बताया, "यह संभव है कि नोटबंदी के बाद नकदी की कमी के कारण डिजिटल भुगतान के उपयोग में वृद्धि हुई थी, और यह कि नकदी की आपूर्ति बहाल हो जाने के बाद, लोग केवल डिजिटल भुगतान का उपयोग एक कमबैक विकल्प के रूप में करते हैं। बयानबाजी के विपरीत, इस बारे में बहस चल रही है कि किस सीमा तक डिजिटल भुगतान के इक्स्टेन्ट का स्वागत किया जाना चाहिए।"

उन्होंने कहा कि डिजिटल भुगतान प्रणाली द्वारा सक्षम भुगतान धोखाधड़ी को भारत में सूचित किया गया है, और डिजिटल भुगतान से परहेज के लिए ‘लोगों के अधूरे ज्ञान’ को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

लिगोन कहते हैं, “बैंक खाते केवल उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं, जो लेन-देन में नकदी का उपयोग करना पसंद करते हैं, और जो भौतिक संपत्ति जैसे कि भूमि, अनाज, या सोने में धन संग्रह करते हैं। नकद और भौतिक संपत्ति के लिए एक प्राथमिकता समझ में आती है। अगर कोई वित्तीय क्षेत्र या सरकार पर भरोसा नहीं करता है, जो इसे विनियमित करने में इतनी बड़ी भूमिका निभाता है, जैसा कि भारत में है।”

बुनियादी साक्षरता, और आधुनिक बैंकिंग प्रणाली का उपयोग करने में आसानी का संबंध इस बात से है कि क्यों डिजिटल भुगतान कम है, और भारत की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करने की होनी चाहिए कि लोगों के पास एक मजबूत, विश्वसनीय और अनुकूल बैंकिंग प्रणाली तक आसान पहुंच हो।

क्या गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) एक प्रोत्साहन है?

अध्ययन में कहा गया है कि डिजिटल भुगतान "व्यावसायिक पारदर्शिता को बढ़ावा देते हैं, क्योंकि वे उद्यमों के लिए एक आधिकारिक लेन-देन रिकॉर्ड बनाने में सहायता करते हैं"। डिजिटल भुगतान के तरीकों को अपनाने वालों में से लगभग 74 फीसदी ने कहा कि उन्होंने माल और सेवा कर (जीएसटी) के लिए पंजीकरण किया था, जबकि नहीं अपनाने वाले केवल 48 फीसदी ने कहा कि उन्होंने पंजीकरण कराया था।

व्यवसायों के सबसेट में से जो रिपोर्ट करते हैं कि उन्हें जीएसटी के लिए पंजीकरण करना अनिवार्य है।

78.4 फीसदी अपनाने वाले और 60.63 फीसदी नहीं अपनाने वाले थे। अध्ययन में कहा गया है कि "डिजिटल भुगतान उपयोगकर्ताओं की ओर से रिपोर्ट करने की संभावना है कि वे पहले से ही जीएसटी का भुगतान करने के लिए पंजीकृत हैं"।

लिगॉन नकद से डिजिटल भुगतान विधियों की ओर बढ़ने में लोगों की अनिच्छा में परंपरा के प्रभाव के बारे में उलझन में है। लिगॉन ने कहा कि "अंतर यह है कि नकदी से जुड़े लेन-देन गुमनाम हैं, और इसलिए कम पारदर्शी हैं। जो लोग इस गुमनामी और पारदर्शिता की कमी को महत्व देते हैं, उनके पास हमेशा नकदी को प्राथमिकता देने का एक कारण होता है।"

हालांकि, शोध से निष्कर्ष यह है कि डिजिटल भुगतान को अपनाना टैक्स प्रणाली द्वारा प्रदान किए गए प्रोत्साहनों पर निर्भर करता है, न कि डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म की विशेषताओं या लागतों के आधार पर, जैसा कि लिगॉन स्पष्ट करते हैं।

‘अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय’ के नारायणन कहते हैं, “जब नई तकनीकें पेश की जाती हैं, तो मौजूदा लोगों को एक सावधानीपूर्वक, स्वतंत्र मूल्यांकन के आधार पर धीरे-धीरे चरणबद्ध किया जाना चाहिए कि क्या नए तकनीकी हस्तक्षेप वांछित उद्देश्य प्राप्त कर रहे हैं? जबकि इस बारे में, ऐसा नहीं हुआ है।लोगों को उनकी सहमति के बिना नए प्लेटफार्मों पर पलायन करने के लिए मजबूर किया गया है। उदाहरण के लिए, आधार पेमेंट ब्रिज सिस्टम के साथ ग्रामीण बैंक खातों की मैपिंग संबंधित पेंशनरों या मनरेगा के श्रमिकों की सहमति के बिना की गई थी। कथित तौर पर एयरटेल वॉलेट्स और आईसीआईसीआई बैंक खातों में श्रमिकों का पैसा डायवर्ट किया गया था।” उन्होंने आगे कहा,"इस तरह के अनुभव केवल लोगों की गलतफहमी को बढ़ाने का काम करते हैं।"

(पलियथ विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 18 जून 2019 को IndiaSpend.com प्रकाशित हुआ है।

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