ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी की दवाईयों के मामले में डोनेशन पर निर्भर है भारत

नई दिल्ली: हालांकि भारत में तपेदिक यानी टीबी के मामलों में गिरावट आई है। साल 2017 से 2018 के बीच टीबी के मामलों में 1.8% की गिरावट दर्ज की गई। 2017 में देशभर में 27.4 लाख टीबी के मामले सामने आए थे, जबकि 2018 में 26.9 लाख मामले देखे गए। लेकिन डब्लूएचओ की 2019 ग्लोबल टीबी रिपोर्ट के अनुसार, गिरावट की यह दर इतनी नहीं है कि भारत, 2025 तक टीबी को खत्म करने के अपने लक्ष्य को पूरा कर सके। यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि 2018 में इस बीमारी की वजह छह में से एक शख्स की मौत हो गई थी।

भारत में टीबी के मामलों में आई गिरावट की दर 1.8% सालाना है। यह वैश्विक गिरावट की दर (2%) के नज़दीक है। लेकिन देश में टीबी के मामलों की एक बड़ी संख्या को देखते हुए, अपने टीबी उन्मूलन के लक्ष्य को पूरा करने के लिए भारत को गिरावट की दर को हर साल 10% करने की जरुरत है।

विश्व स्तर पर 1 करोड़ टीबी के मामलों में से 27% अकेले भारत से हैं। यह आंकड़ा दुनिया में सबसे ज्यादा है और चीन में टीबी के मामलों से तीन गुना ज़्यादा। चीन, टीबी के मरीज़ों की संख्या के मामले में दुनिया में दूसरे नम्बर पर है।

एक अनुमान के अनुसार, देश में 550,000 टीबी के ऐसे मामले थे जो रजिस्टर्ड नहीं थे। इन मामलों में या तो बीमारी की पहचान नहीं हुई या फिर इनका इलाज नहीं हुआ। जिसकी वजह से ये मामले दर्ज नहीं हो पाए। लगभग 56% टीबी के दवा प्रतिरोधक (ड्रग रेसिसटेंट) मामलों में बीमारी की पहचान नहीं हो सकी। ऐसे मामलों में रोग ज़्यादा संक्रामक और उसका इलाज मुश्किल हो जाता है क्योंकि टीबी की कुछ दवाएं मरीज़ पर असर करना बंद कर देती हैं। इलाज ना हो पाने की वजह से टीबी के मरीज़ दूसरे लोगों में ये बीमारी फैलाते हैं और यही वजह है कि भारत में टीबी के ख़िलाफ़ लड़ाई मुश्किल हो जाती हे।

सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज ना होने वाले मामले

दुनियाभर में अनुमानित 1 करोड़ टीबी के नये मामलों में से सिर्फ़ 70 लाख नये मामले ही सामने आए हैं। इसका मतलब है कि सरकारी रिकॉर्ड में 30 लाख मामले दर्ज नहीं हुए। इस अंतर का कारण पहचाने गए मामलों का कम दर्ज होना और रोग की सही पहचान ना होना है । इसका मतलब है कि टीबी के मरीज़ों की या तो स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच नहीं है या फिर उनकी बीमारी की पहचान नहीं हो पाती।

भारत सरकार ने 2012 के बाद से स्वास्थ्य में निजि क्षेत्र के लिए टीबी के मरीज़ों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया है। मार्च 2018 में इंडियास्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में, सरकार ने कहा कि यदि -केमिस्ट, लैब्रटोरी और डॉक्टरों ने अगर सरकार को टीबी के मरीज़ों के बारे में जानाकारी नहीं दी तो उन्हें जेल भी हो सकती है।

ग्लोबल टीबी रिपोर्ट में पाया गया है कि, वर्ष 2013 से 2018 के बीच, भारत में नए मामलों की अधिसूचना 12 लाख से बढ़कर 21.5 लाख हुई है, यानी 60% की वृद्धि । सरकार की 2019 की टीबी रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में, लगभग 537,836 मामलों की जानकारी (सभी टीबी मामलों का 26.8%) निजि क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं से आई थी। 2017 की तुलना में इसमें 35% की वृद्धि थी।

जैसा कि हमने कहा, लगभग 550,000 मामले (अनुमानित मामलों का 25%), सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं थे। सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हो पाए इन मामलों की संख्या अनुमान से अधिक हो सकती है। विभिन्न

अध्ययनों के अनुसार करीब 60% रोगी निजी क्षेत्र में इलाज की कोशिश करते हैं।  2018 में निजि क्षेत्र ने केवल 25% मामलों की सूचना दी थी। या तो इन मामलों को रिपोर्ट नहीं किया गया या इनकी पहचान नहीं हो सकी या फिर इनका इलाज नहीं हो सका।  टीबी एक संक्रामक बीमारी है और अगर इसका इलाज ना किया जाए तो यह दूसरों में फैलती है।

Source: Global Tuberculosis Report, 2019, India TB report 2014, 2015, 2016, 2017, 2018, 2019

अनुमानित और दर्ज किए गए मामलों के बीच जो 80% का अंतर दिखता है, वो ख़ासतौर पर 10 देशों में हैं। सबसे अधिक मामले भारत में थे,लगभग 25%। उसके बाद नाइजीरिया में 12%, इंडोनेशिया में 10% और फिलीपींस में 8%। ग्लोबल टीबी रिपोर्ट में कहा गया है, "इन देशों में, टीबी के मामलों को दर्ज कराने की प्रक्रिया में सुधार और टीबी की पहचान और उसके इलाज के लिए और ज़्यादा कड़ी कोशिशों की ज़रूरत है।"

इलाज की गुणवत्ता

सर्वाइवर्स अगेंस्ट टीबी नाम की संस्था के संयोजक चपल मेहरा कहते हैं, “टीबी के मामलों की अधिसूचना का ज्यादा मतलब नहीं है। टीबी सेवाओं की पहुंच और संख्या में तो विस्तार हुआ है, लेकिन यह देखा जा सकता है कि टीबी के इलाज की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं हुआ है।”

उन्होंने आगे कहा, "रोग का पता लगाना और रोगी का इलाज शुरु करना एक बात है, लेकिन ये सुनिश्चित करना कि इलाज सही हो रहा है या नहीं, ये दूसरी बात है।” उन्होंने यह भी कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि मरीज़ को इलाज से कोई फ़ायदा हो रहा है या नहीं। 

इंडिया टीबी रिपोर्ट3019 के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र में, रोगियों के इलाज की सफलता की दर 79% थी, जबकि निजी क्षेत्र में यह 35% थी। सरकार की परिभाषा में इलाज की सफलता दर का मतलब है इलाज पूरा करना। जबकि टीबी इलाज के लिए तय मानकों के मुताबिक एक मरीज़ का इलाज पूरा होने के छह महीने और फिर 12 महीने बाद जांच की जानी चाहिए और फिर उसे वर्गीकृत किया जाना चाहिए। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने विस्तार से नवंबर, 2016 की रिपोर्ट में बताया है।

इलाज अधूरा छोड़ देने वाले टीबी के मरीज़ दूसरों में टीबी फैला सकते हैं या यह रोग, दवा प्रतिरोधक टीबी मेें बदल सकता है, जो टीबी को खत्म करने के भारत के प्रयासों को कम से कम आंशिक रूप से निर्थक बना रहा है।इंडियास्पेंड ने 18 अक्टूबर, 2019 को सेंट्रल टीबी डिवीज़न के अतिरिक्त महानिदेशक के. एस. सचदेवा से इस पर प्रतिक्रिया मांगी है। अगर हमें प्रतिक्रिया मिलती है तो हम इस रिपोर्ट को अपडेट करेंगे।

ड्रग-रेसिसटेंड टीबी के मामले

भारत में दुनिया के 27% या अनुमानित 130,000 दवा प्रतिरोधी टीबी के मामले हैं। यह संख्या टीबी के दूसरे सबसे अधिक मामलों वाले देश, चीन से दोगुनी है। 

2018 में, भारत ने 44% (58,347-मल्टीरड्रग-रेसिसटेंट  मामलों (एमडीआर-टीबी) की पहचान की। एमडीआर-टीबी में टीबी बैक्टीरिया, कम से कम मुख्य एंटी-टीबी दवाओं के लिए प्रतिरोधी है।ग्लोबल टीबी रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें से 46,569 (अनुमानित मामलों का 35.8%) का इलाज किया गया। यानी करीब 56% एमडीआर-टीबी के रोगियों की पहचान नहीं हो पाई और 64% का इलाज नहीं हो पाया।

एमडीआर-टीबी के मरीज़ों की अनुमानित संख्या और उनके इलाज के मामलोें में अंतर के लिए 43% हिस्सेदारी भारत और चीन की है।

ग्लोबल टीबी रिपोर्ट में कहा गया है कि, "ड्रग रेसिसटेंट टीबी के इलाज में आने वाली दिक्कतों में से एक टीबी के प्रबंधन का केंद्रीकृत होना और अस्पतालों पर ज्यादा निर्भर होना है। इसके लिए सेवाओं के व्यापक विकेंद्रीकरण और मोबाइल क्लीनिक जैसी सेवाओं के विस्तार की आवश्यकता है।"

2018 में, अधिक रोगियों (नए टीबी रोगियों के 46%) का, रिफैम्पिसिन नाम की टीबी की दवाई के प्रतिरोध के लिए परीक्षण किया गया। 2017 में 32% रोगियों का परीक्षण किया गया था। करीब 3% नए टीबी रोगी और 14% पहले इलाज करा चुके रोगियों में एमडीआर-टीबी की पहचान की गई थी।

एमडीआर-टीबी के इलाज में भारत को कम सफलता मिली है। दुनियाभर में 56% की तुलना में भारत में एमडीआर-टीबी के इलाज में सफलता की दर 48% थी।

ग्लोबल टीबी रिपोर्ट में कहा गया है कि सफलता की दर बेहद कम  है। देखभाल का रोगी-केंद्रित मॉडल से ही इन आंकड़ों में सुधार होगा।

इलाज के पुराने दिशा-निर्देश

दिसंबर 2018 में, डब्ल्यूएचओ ने दवा प्रतिरोधी टीबी के इलाज पर अपडेटड दिशानिर्देश जारी किए थे, जिसमें कहा गया था कि एमडीआर-टीबी रोगियों का इलाज, निर्धारित अंतराल में खाने वाली दवाई से ही किया जा सकता है, जिसमें बेडाकुलाइन और डेलामनिड शामिल हैं, जो 40 साल के अंतराल के बाद मिली पहली नई टीबी ड्रग्स है।

भारत टीबी रिपोर्ट 2019 के अनुसार, फिर भी, जरूरतमंद ड्रग-रेसिसटेंट टीबी रोगियों में से 5% से कम को बेडाकुलाइन दवाई मिलती है। 2018 में इस दवा के साथ 2,827 रोगियों का इलाज किया गया। केवल 41 मरीजों ने डेलमनिड मिल पाई।

भारत ने केवल प्री-एक्सटेंसिव ड्रग रेसिसटेंट (प्री-एक्सडीआर) टीबी मामलों के लिए बेडाकुलाइन दवाई को मंजूरी दी है- ऐसे मामले, जिसमें टीबी, मुख्य रूप से दो मुख्य एंटी-टीबी ड्रग्स- रिफ़ाम्पिसिन और आइसोनाइयाज़िड और टीबी ड्रग्स फ्लोरोक्विनोलोन, और इंजेक्शन की प्रतिरोधी हो जाती है।

2016 के बाद से, भारत में बेडाकुलाइन पाने के लिए एक सशर्त तरीका था। यह दवा चुनिंदा सरकारी केंद्रों से ही मिलती थी। सितंबर 2019 में इसे पूरे देश में लागू किया गया। डेलामनिड दवाई सात राज्यों में कंडीशनल एक्सेस प्रोग्राम के तहत उपलब्ध है।

दूसरी टीबी दवाओं के प्रतिरोध के लिए 60,000 एमडीआर-टीबी रोगियों के किए गए टेस्ट में से 30% फ्लोरोक्विनोलोन (प्री-एक्सडीआर) के लिए प्रतिरोधी थे, जैसा कि 2019 भारत टीबी रिपोर्ट से पता चलता है। नॉन-प्रॉफिट, डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के एक्सेस कैंपेन की दक्षिण एशिया प्रमुख, लीना मेघन कहती हैं, "इसके बावजूद, केवल एक हिस्से को ही बेडाकुलाइन या डेलामनिड मिल पाई है।"

"भारत जैसे देशों में उच्च फ्लोरोक्विनोलोन प्रतिरोधी टीबी रोगियों को एक प्रभावी इलाज के लिए बेडाकुलाइन और डेलमनिड को एक साथ देने ज़रूरत है।"

भारत को डब्ल्यूएचओ की नई सिफारिशों के अनुकूल अपने दिशानिर्देशों को अपडेट करने की ज़रूरत है, जो एमडीए-टीबी रोगियों को बेडाकुलाइन देने की अनुमति देती हैं। 2019 की सरकारी टीबी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत अगर अपने राष्ट्रीय टीबी विरोधी कार्यक्रम ( जिसे संशोधित राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम के रूप में जाना जाता है) ड्रग रेसिसटेंट टीबी के इलाज पर अपनी नीति को अपडेट करता है तो ये दवाइयां लेने वाले रोगियों की संख्या भी बढ़नी चाहिए।”

बेडाकुलाइन और डेलामनिड के लिए भारत अभी भी डोनेशन पर निर्भर है। अमेरिकी सहायता एजेंसी,

यूएसएआईडी बेडाकुलाइन के 20,000 कोर्स डोनेट किए गए थे और एक जापानी दवा कंपनी ओत्सुका ने डेलामनिड के 400 कोर्स डोनेट किए थे।

जनवरी 2019 में, इंडियास्पेंड ने बताया  था कि एक एक्सडीआर-टीबी रोगी वैशाली शाह को बेडाकुलाइन दवा लेने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क करना पड़ा था।

( यदवार विशेष संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। )

यह आलेख सबसे पहले हेल्थचेक पर यहां प्रकाशित हुआ है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

नई दिल्ली: हालांकि भारत में तपेदिक यानी टीबी के मामलों में गिरावट आई है। साल 2017 से 2018 के बीच टीबी के मामलों में 1.8% की गिरावट दर्ज की गई। 2017 में देशभर में 27.4 लाख टीबी के मामले सामने आए थे, जबकि 2018 में 26.9 लाख मामले देखे गए। लेकिन डब्लूएचओ की 2019 ग्लोबल टीबी रिपोर्ट के अनुसार, गिरावट की यह दर इतनी नहीं है कि भारत, 2025 तक टीबी को खत्म करने के अपने लक्ष्य को पूरा कर सके। यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि 2018 में इस बीमारी की वजह छह में से एक शख्स की मौत हो गई थी।

भारत में टीबी के मामलों में आई गिरावट की दर 1.8% सालाना है। यह वैश्विक गिरावट की दर (2%) के नज़दीक है। लेकिन देश में टीबी के मामलों की एक बड़ी संख्या को देखते हुए, अपने टीबी उन्मूलन के लक्ष्य को पूरा करने के लिए भारत को गिरावट की दर को हर साल 10% करने की जरुरत है।

विश्व स्तर पर 1 करोड़ टीबी के मामलों में से 27% अकेले भारत से हैं। यह आंकड़ा दुनिया में सबसे ज्यादा है और चीन में टीबी के मामलों से तीन गुना ज़्यादा। चीन, टीबी के मरीज़ों की संख्या के मामले में दुनिया में दूसरे नम्बर पर है।

एक अनुमान के अनुसार, देश में 550,000 टीबी के ऐसे मामले थे जो रजिस्टर्ड नहीं थे। इन मामलों में या तो बीमारी की पहचान नहीं हुई या फिर इनका इलाज नहीं हुआ। जिसकी वजह से ये मामले दर्ज नहीं हो पाए। लगभग 56% टीबी के दवा प्रतिरोधक (ड्रग रेसिसटेंट) मामलों में बीमारी की पहचान नहीं हो सकी। ऐसे मामलों में रोग ज़्यादा संक्रामक और उसका इलाज मुश्किल हो जाता है क्योंकि टीबी की कुछ दवाएं मरीज़ पर असर करना बंद कर देती हैं। इलाज ना हो पाने की वजह से टीबी के मरीज़ दूसरे लोगों में ये बीमारी फैलाते हैं और यही वजह है कि भारत में टीबी के ख़िलाफ़ लड़ाई मुश्किल हो जाती हे।

सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज ना होने वाले मामले

दुनियाभर में अनुमानित 1 करोड़ टीबी के नये मामलों में से सिर्फ़ 70 लाख नये मामले ही सामने आए हैं। इसका मतलब है कि सरकारी रिकॉर्ड में 30 लाख मामले दर्ज नहीं हुए। इस अंतर का कारण पहचाने गए मामलों का कम दर्ज होना और रोग की सही पहचान ना होना है । इसका मतलब है कि टीबी के मरीज़ों की या तो स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच नहीं है या फिर उनकी बीमारी की पहचान नहीं हो पाती।

भारत सरकार ने 2012 के बाद से स्वास्थ्य में निजि क्षेत्र के लिए टीबी के मरीज़ों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया है। मार्च 2018 में इंडियास्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में, सरकार ने कहा कि यदि -केमिस्ट, लैब्रटोरी और डॉक्टरों ने अगर सरकार को टीबी के मरीज़ों के बारे में जानाकारी नहीं दी तो उन्हें जेल भी हो सकती है।

ग्लोबल टीबी रिपोर्ट में पाया गया है कि, वर्ष 2013 से 2018 के बीच, भारत में नए मामलों की अधिसूचना 12 लाख से बढ़कर 21.5 लाख हुई है, यानी 60% की वृद्धि । सरकार की 2019 की टीबी रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में, लगभग 537,836 मामलों की जानकारी (सभी टीबी मामलों का 26.8%) निजि क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं से आई थी। 2017 की तुलना में इसमें 35% की वृद्धि थी।

जैसा कि हमने कहा, लगभग 550,000 मामले (अनुमानित मामलों का 25%), सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं थे। सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हो पाए इन मामलों की संख्या अनुमान से अधिक हो सकती है। विभिन्न

अध्ययनों के अनुसार करीब 60% रोगी निजी क्षेत्र में इलाज की कोशिश करते हैं।  2018 में निजि क्षेत्र ने केवल 25% मामलों की सूचना दी थी। या तो इन मामलों को रिपोर्ट नहीं किया गया या इनकी पहचान नहीं हो सकी या फिर इनका इलाज नहीं हो सका।  टीबी एक संक्रामक बीमारी है और अगर इसका इलाज ना किया जाए तो यह दूसरों में फैलती है।

Source: Global Tuberculosis Report, 2019, India TB report 2014, 2015, 2016, 2017, 2018, 2019

अनुमानित और दर्ज किए गए मामलों के बीच जो 80% का अंतर दिखता है, वो ख़ासतौर पर 10 देशों में हैं। सबसे अधिक मामले भारत में थे,लगभग 25%। उसके बाद नाइजीरिया में 12%, इंडोनेशिया में 10% और फिलीपींस में 8%। ग्लोबल टीबी रिपोर्ट में कहा गया है, "इन देशों में, टीबी के मामलों को दर्ज कराने की प्रक्रिया में सुधार और टीबी की पहचान और उसके इलाज के लिए और ज़्यादा कड़ी कोशिशों की ज़रूरत है।"

इलाज की गुणवत्ता

सर्वाइवर्स अगेंस्ट टीबी नाम की संस्था के संयोजक चपल मेहरा कहते हैं, “टीबी के मामलों की अधिसूचना का ज्यादा मतलब नहीं है। टीबी सेवाओं की पहुंच और संख्या में तो विस्तार हुआ है, लेकिन यह देखा जा सकता है कि टीबी के इलाज की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं हुआ है।”

उन्होंने आगे कहा, "रोग का पता लगाना और रोगी का इलाज शुरु करना एक बात है, लेकिन ये सुनिश्चित करना कि इलाज सही हो रहा है या नहीं, ये दूसरी बात है।” उन्होंने यह भी कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि मरीज़ को इलाज से कोई फ़ायदा हो रहा है या नहीं। 

इंडिया टीबी रिपोर्ट3019 के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र में, रोगियों के इलाज की सफलता की दर 79% थी, जबकि निजी क्षेत्र में यह 35% थी। सरकार की परिभाषा में इलाज की सफलता दर का मतलब है इलाज पूरा करना। जबकि टीबी इलाज के लिए तय मानकों के मुताबिक एक मरीज़ का इलाज पूरा होने के छह महीने और फिर 12 महीने बाद जांच की जानी चाहिए और फिर उसे वर्गीकृत किया जाना चाहिए। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने विस्तार से नवंबर, 2016 की रिपोर्ट में बताया है।

इलाज अधूरा छोड़ देने वाले टीबी के मरीज़ दूसरों में टीबी फैला सकते हैं या यह रोग, दवा प्रतिरोधक टीबी मेें बदल सकता है, जो टीबी को खत्म करने के भारत के प्रयासों को कम से कम आंशिक रूप से निर्थक बना रहा है।इंडियास्पेंड ने 18 अक्टूबर, 2019 को सेंट्रल टीबी डिवीज़न के अतिरिक्त महानिदेशक के. एस. सचदेवा से इस पर प्रतिक्रिया मांगी है। अगर हमें प्रतिक्रिया मिलती है तो हम इस रिपोर्ट को अपडेट करेंगे।

ड्रग-रेसिसटेंड टीबी के मामले

भारत में दुनिया के 27% या अनुमानित 130,000 दवा प्रतिरोधी टीबी के मामले हैं। यह संख्या टीबी के दूसरे सबसे अधिक मामलों वाले देश, चीन से दोगुनी है। 

2018 में, भारत ने 44% (58,347-मल्टीरड्रग-रेसिसटेंट  मामलों (एमडीआर-टीबी) की पहचान की। एमडीआर-टीबी में टीबी बैक्टीरिया, कम से कम मुख्य एंटी-टीबी दवाओं के लिए प्रतिरोधी है।ग्लोबल टीबी रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें से 46,569 (अनुमानित मामलों का 35.8%) का इलाज किया गया। यानी करीब 56% एमडीआर-टीबी के रोगियों की पहचान नहीं हो पाई और 64% का इलाज नहीं हो पाया।

एमडीआर-टीबी के मरीज़ों की अनुमानित संख्या और उनके इलाज के मामलोें में अंतर के लिए 43% हिस्सेदारी भारत और चीन की है।

ग्लोबल टीबी रिपोर्ट में कहा गया है कि, "ड्रग रेसिसटेंट टीबी के इलाज में आने वाली दिक्कतों में से एक टीबी के प्रबंधन का केंद्रीकृत होना और अस्पतालों पर ज्यादा निर्भर होना है। इसके लिए सेवाओं के व्यापक विकेंद्रीकरण और मोबाइल क्लीनिक जैसी सेवाओं के विस्तार की आवश्यकता है।"

2018 में, अधिक रोगियों (नए टीबी रोगियों के 46%) का, रिफैम्पिसिन नाम की टीबी की दवाई के प्रतिरोध के लिए परीक्षण किया गया। 2017 में 32% रोगियों का परीक्षण किया गया था। करीब 3% नए टीबी रोगी और 14% पहले इलाज करा चुके रोगियों में एमडीआर-टीबी की पहचान की गई थी।

एमडीआर-टीबी के इलाज में भारत को कम सफलता मिली है। दुनियाभर में 56% की तुलना में भारत में एमडीआर-टीबी के इलाज में सफलता की दर 48% थी।

ग्लोबल टीबी रिपोर्ट में कहा गया है कि सफलता की दर बेहद कम  है। देखभाल का रोगी-केंद्रित मॉडल से ही इन आंकड़ों में सुधार होगा।

इलाज के पुराने दिशा-निर्देश

दिसंबर 2018 में, डब्ल्यूएचओ ने दवा प्रतिरोधी टीबी के इलाज पर अपडेटड दिशानिर्देश जारी किए थे, जिसमें कहा गया था कि एमडीआर-टीबी रोगियों का इलाज, निर्धारित अंतराल में खाने वाली दवाई से ही किया जा सकता है, जिसमें बेडाकुलाइन और डेलामनिड शामिल हैं, जो 40 साल के अंतराल के बाद मिली पहली नई टीबी ड्रग्स है।

भारत टीबी रिपोर्ट 2019 के अनुसार, फिर भी, जरूरतमंद ड्रग-रेसिसटेंट टीबी रोगियों में से 5% से कम को बेडाकुलाइन दवाई मिलती है। 2018 में इस दवा के साथ 2,827 रोगियों का इलाज किया गया। केवल 41 मरीजों ने डेलमनिड मिल पाई।

भारत ने केवल प्री-एक्सटेंसिव ड्रग रेसिसटेंट (प्री-एक्सडीआर) टीबी मामलों के लिए बेडाकुलाइन दवाई को मंजूरी दी है- ऐसे मामले, जिसमें टीबी, मुख्य रूप से दो मुख्य एंटी-टीबी ड्रग्स- रिफ़ाम्पिसिन और आइसोनाइयाज़िड और टीबी ड्रग्स फ्लोरोक्विनोलोन, और इंजेक्शन की प्रतिरोधी हो जाती है।

2016 के बाद से, भारत में बेडाकुलाइन पाने के लिए एक सशर्त तरीका था। यह दवा चुनिंदा सरकारी केंद्रों से ही मिलती थी। सितंबर 2019 में इसे पूरे देश में लागू किया गया। डेलामनिड दवाई सात राज्यों में कंडीशनल एक्सेस प्रोग्राम के तहत उपलब्ध है।

दूसरी टीबी दवाओं के प्रतिरोध के लिए 60,000 एमडीआर-टीबी रोगियों के किए गए टेस्ट में से 30% फ्लोरोक्विनोलोन (प्री-एक्सडीआर) के लिए प्रतिरोधी थे, जैसा कि 2019 भारत टीबी रिपोर्ट से पता चलता है। नॉन-प्रॉफिट, डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के एक्सेस कैंपेन की दक्षिण एशिया प्रमुख, लीना मेघन कहती हैं, "इसके बावजूद, केवल एक हिस्से को ही बेडाकुलाइन या डेलामनिड मिल पाई है।"

"भारत जैसे देशों में उच्च फ्लोरोक्विनोलोन प्रतिरोधी टीबी रोगियों को एक प्रभावी इलाज के लिए बेडाकुलाइन और डेलमनिड को एक साथ देने ज़रूरत है।"

भारत को डब्ल्यूएचओ की नई सिफारिशों के अनुकूल अपने दिशानिर्देशों को अपडेट करने की ज़रूरत है, जो एमडीए-टीबी रोगियों को बेडाकुलाइन देने की अनुमति देती हैं। 2019 की सरकारी टीबी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत अगर अपने राष्ट्रीय टीबी विरोधी कार्यक्रम ( जिसे संशोधित राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम के रूप में जाना जाता है) ड्रग रेसिसटेंट टीबी के इलाज पर अपनी नीति को अपडेट करता है तो ये दवाइयां लेने वाले रोगियों की संख्या भी बढ़नी चाहिए।”

बेडाकुलाइन और डेलामनिड के लिए भारत अभी भी डोनेशन पर निर्भर है। अमेरिकी सहायता एजेंसी,

यूएसएआईडी बेडाकुलाइन के 20,000 कोर्स डोनेट किए गए थे और एक जापानी दवा कंपनी ओत्सुका ने डेलामनिड के 400 कोर्स डोनेट किए थे।

जनवरी 2019 में, इंडियास्पेंड ने बताया  था कि एक एक्सडीआर-टीबी रोगी वैशाली शाह को बेडाकुलाइन दवा लेने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क करना पड़ा था।

( यदवार विशेष संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। )

यह आलेख सबसे पहले हेल्थचेक पर यहां प्रकाशित हुआ है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।


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