तकनीकि ख़ामियां, वन नेशन-वन राशन कार्ड योजना की सबसे बड़ी रुकावट

नई दिल्ली: केंद्र सरकार की वन नेशन-वन राशन कार्ड (ओएनओआरसी) योजना की तीन बड़ी ख़ामियों में अगर सुधार नहीं किया जाता है तो यह योजना मुश्किल में पड़ सकती है। यह योजना 1 जनवरी, 2020 से आंशिक तौर पर लागू हो चुकी है। जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) की वर्तमान समस्याओं के विश्लेषण और शोधकर्ताओं के अनुसार, यह समस्याएं भंडारण और वितरण की सुविधाओं, डेटा सिस्टम को अपडेट करने और राज्यों के बीच समन्वय से जुड़ी हैं।

इस योजना की घोषणा जून 2019 में की गई थी। यह योजना 12 राज्यों -- हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, झारखंड, त्रिपुरा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, कर्नाटक और केरल -- में चल रही है। इसे अन्य सभी राज्यों में 30 जून, 2020 तक लागू किया जाना है, जैसा कि उपभोक्ता मामलों, खाद्य और जन वितरण मंत्री राम विलास पासवान ने बताया

देशभर में अनाज के भंडारण, आवंटन और वितरण का प्रबंधन पीडीएस करता है। इसके लिए फ़ूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफ़सीआई) के वेयरहाउसों, सरकार के वेयरहाउसों, प्राइवेट गोदामों और लगभग 533,000 राशन की दुकानों (एफ़पीएस) के नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2017-18 में पीडीएस ने राज्यों को 5.52 करोड़ टन अनाज का आवंटन किया था; राज्यों ने इस अवधि में 5.40 करोड़ टन अनाज उठाया था। वर्तमान लक्षित जन वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) के तहत, निर्धन परिवारों को सब्सिडी पर अनाज मिलता है। इसके लिए उन्हें एफ़पीएस पर अपने निवास स्थान से जुड़ा एक राशन कार्ड दिखाना होता है।

इस प्रक्रिया में लाभार्थियों को किसी अन्य दुकान से सब्सिडी पर अनाज लेने की अनुमति नहीं है, इस वजह से अपने ज़िले और राज्य से बाहर जाने पर वह इस सुविधा से वंचित रह जाते हैं। इस प्रक्रिया की वजह से कम से कम राज्यों के बीच पलायन करने वाले कम से कम 5.42 करोड़ प्रवासी सब्सिडी पर अनाज नहीं ले पाते हैं, 2011 की जनगणना के प्रवासी डेटा के अनुसार।

मौजूदा प्रणाली के तहत, प्रवासी अंतिम चरण में लाभार्थी नहीं बन सकते क्योंकि उनके पलायन से वह राशन की दुकानों से अनाज लेने के पात्र नहीं रहते। (स्रोत पीआरएस)

इससे प्रवासियों के लिए अनाज हासिल करना मुश्किल हुआ है, रिसर्च और कंसलटेंसी एजेंसी इंडिया माइग्रेशन नाउ के इंटरस्टेट माइग्रेंट पॉलिसी इंडेक्स (आईएमपीईएक्स) से यह पता चला।  2018 में सात राज्यों के मूल्यांकन में एजेंसी ने पाया कि केवल महाराष्ट्र में प्रवासियों के लिए एक अस्थायी राशन कार्ड का प्रावधान था, यह विशेषतौर पर बीड़ी कर्मियों और छोड़ दी गई महिलाओं के लिए है।

ओएनओआरसी का लक्ष्य राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के तहत इस समस्या का समाधान करने के लिए राशन कार्डों को पोर्टेबल बनाना है, इससे देश भर में किसी भी राशन की दुकान पर उनका इस्तेमाल हो सके। “इससे प्रवासी कर्मियों, श्रमिकों और दिहाड़ी मज़दूरों को लाभ होगा, जो रोज़गार की तलाश में पलायन करते हैं,” फ़ूड सेक्रेटरी रवि कांत ने बताया। “ऐसे राशन कार्डधारक बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन के ज़रिए अपने परिवारों को मिलने वाला अनाज किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में किसी भी राशन की दुकान से ख़रीद सकेंगे।”

भंडारण और वितरण

पीडीएस को भंडारण और वितरण में ख़ामियों से नुक़सान होता है। पीडीएस में अनाज की चोरी और उसका सड़ना सामान्य है। 2009-10 में 4.76 करोड़ टन अनाज के कुल आवंटन (तब उपलब्ध नए नेशनल सैम्पल सर्वे डेटा के अनुसार), में से राज्यों ने 4.24 करोड़ टन अनाज उठाया था और 2.53 करोड़ टन की वास्तव में खपत हुई थी। इससे पीडीएस नेटवर्क के तहत सभी अनाज के 40.4% के चोरी होने का पता चलता है, एक ग़ैर-लाभकारी, स्वतंत्र शोध संस्थान, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के 2013 में किए गए एक विश्लेषण में यह जानकारी सामने आई।

केंद्र सरकार की ओर से एफ़सीआई की भूमिका के मूल्यांकन के लिए अगस्त 2014 में नियुक्त की गई शांता कुमार कमेटी ने भी कुछ राज्यों में 70% तक चोरी की जानकारी दी थी और वितरण को बेहतर बनाने के लिए प्रणाली को पूरी तरह कंप्यूटराइज़्ड करने का सुझाव दिया था। हाइडलबर्ग यूनिवर्सिटी के साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के 2016 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया था कि भंडारण और वितरण के दौरान भ्रष्टाचार की सबसे ज़्यादा संभावनाएं होती हैं। ग़लत तरीकों में अनाज के स्टॉक को जानबूझ कर अलग स्थान पर भेजना, भ्रष्ट बिचौलियों का इसकी खुले बाज़ार में बिक्री करना और ग़रीबी की रेखा से ऊपर के लोगों के लिए अनाज के कोटे में गड़बड़ी करना शामिल हैं।

इसके अलावा पीडीएस को ख़राब नेटवर्क प्रबंधन से नुकसान होता है और इसकी “मुख्य कमज़ोरी यानी ग़रीबों तक पूरी तरह नहीं पहुंचने का कारण पीडीएस का बड़ा दायरा है”, खाद्य एवं कृषि संगठन के एक विश्लेषण में यह सामने आया।

डिजिटाइज़ेशन और आधार से जोड़ना

ओएनओआरसी को सफ़ल बनाने के लिए, इसे लाभार्थियों को जोड़ने या हटाने में ख़ामियों को दूर करना होगा, जो अभी प्रणाली में बड़े स्तर पर हो रही हैं,  नीति आयोग की ओर से 2016 में पीडीएस के मूल्यांकन में इसकी तरफ़ इशारा किया गया था। बाहर करने को लेकर ख़ामियां कमज़ोर तबकों के साथ सबसे अधिक थी, जिससे संकेत मिलता है कि निर्धन परिवारों को इस प्रणाली के लाभों से बाहर करने की आशंका है। इस समस्या से निपटने के लिए डुप्लिकेट राशन कार्डों को समाप्त करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि राशन की दुकानों के प्रबंधक सटीक रिकॉर्ड रखें।

ओएनओआरसी सुविधा “इलेक्ट्रॉनिक प्वाइंट ऑफ़ सेल (ईपीओएस) डिवाइस पर बायोमेट्रिक/आधार ऑथेंटिकेशन के बाद उपलब्ध होगी,” पासवान ने कहा। इससे पता चलता है कि दो सुधारों की ज़रूरत है: राशन कार्डों को आधार से जोड़ना और देशभर में राशन की दुकानों पर ईपीओएस डिवाइस की उपलब्धता।

लाभार्थियों के लिए, ओएनओआरसी देश भर में 533,000 राशन की दुकानों के ऑटोमेशन और वहां ईपीओएस डिवाइस की उपलब्धता पर निर्भर है। तत्कालीन उपभोक्ता मामलों, खाद्य और जन वितरण राज्यमंत्री सी आर चौधरी ने लोकसभा में बताया था कि फ़रवरी 2019 तक, 533,000 में से 388,000 राशन की दुकानों पर ईपीओएस डिवाइस थे। कुछ राज्यों -- गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश -- में राशन की सभी दुकानें ऑटोमेटेड हो गई हैं, लेकिन पूर्वोत्तर के राज्यों में जून 2020 तक यह लक्ष्य पूरा होना मुश्किल है। मेघालय में 4,736 राशन की दुकानों में से 10 पर ईपीओएस थे। असम में, 38,000 से अधिक दुकानों में से 109 पर यह सुविधा थी। मिज़ोरम, नागालैंड और मणिपुर में 5,625 राशन की दुकानों में से किसी पर भी ईपीओएस डिवाइस नहीं था।

राजधानी दिल्ली में भी ऐसी ही स्थिति है, जहां 2,254 राशन की दुकानों में से एक के पास भी ईपीओएस डिवाइस नहीं था। लोकसभा में चौधरी की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, पश्चिम बंगाल में 20,806 दुकानों में से केवल 309 ऑटोमेटेड थीं।

आंकड़ों से पता चलता है कि देशभर में ईपीओएस का वितरण समान नहीं है, कुछ राज्य बाकी से काफी पीछे हैं। इससे दूरदराज़ के स्थानों पर ऑटोमेशन लाने में मुश्किल का संकेत मिलता है। पूर्वोत्तर राज्यों में ऑटोमेशन की कमी से क्षेत्र में ओएनओआरसी को ख़राब तरीके से लागू करने का पता चलता है।

इस प्रणाली को आधुनिक बनाने में दूसरी बड़ी रुकावट लाभार्थी के आधार को उसके राशन कार्ड से जोड़ने की है। उपभोक्ता मामलों, खाद्य और जन वितरण राज्यमंत्री डी आर दादाराव ने फरवरी 2019 में लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन के लिए राशन कार्डों के 85% से कुछ अधिक आधार (परिवार के कम से कम एक सदस्य के लिए) से लिंक्ड हैं। राशन कार्डों के साथ आधार की लिंकिंग से 2013 से 2018 के बीच 2.98 करोड़ ऐसे राशन कार्डों को हटाया गया है जो इस योजना के लिए पात्र नहीं थे। इसके पीछे डुप्लीकेशन, योजना के दायरे से बाहर के परिवारों की पहचान, स्थानांतरण या प्रवासन जैसे कई कारण थे।

ऑथेंटिकेशन के लिए राशन कार्ड से आधार को लिंक करने से लाभार्थियों को राशन मिलना मुश्किल भी हुआ है। छत्तीसगढ़ और ओडिशा में यह समस्या अधिक है। आंध्र प्रदेश में आधार से ऑथेंटिकेट होने वाली पीडीएस ट्रांजैक्शंस के असफ़ल होने की दर 2.5% थी, इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नेस के डिजिटल आइडेंटिटी रिसर्च इनिशिएटिव की ओर से 2017 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार।  इसका बड़ा कारण 'बायोमेट्रिक मिलान' ना होना था।

ओएनओआरसी योजना के लिए ईपीओएस की उपलब्धता और आधार लिंकेज ज़रूरी होने के मद्देनज़र, आंकड़ों से पता चलता है कि इस योजना को लागू करने में अभी ख़ामियां हैं जिन्हें 30 जून, 2020 की समयसीमा से पहले ठीक करना होगा।

राज्यों के बीच समन्वय

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के तहत, केंद्र से राज्यों को अनाज का आवंटन किया जाता है और ख़रीद की ज़रूरतों को तय करने के लिए राज्य, लाभार्थियों की पहचान करते हैं। राज्य इसके लिए अलग-अलग तरीक़े अपनाते हैं: तमिलनाडु में अपनी एक सर्वव्यापक जन वितरण प्रणाली है, जबकि हरियाणा की लक्षित जन वितरण प्रणाली केंद्र के दिशानिर्देशों के तहत काम करती है। इसमें लाभार्थियों को अंत्योदय अन्न योजना (एएवाई, या सबसे निर्धन) और प्राथमिकता वाले परिवारों के बीच विभाजित किया जाता है।

ओएनओआरसी को प्रभावी तरीके से लागू कर प्रवासियों को इसका लाभ सुनिश्चित करने के लिए इन प्रणालियों को एक समान बनाना महत्वपूर्ण है। राज्यों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वितरण और परिवहन की प्रणालियां भी मज़बूत हों।

एक समस्या वितरण और आवंटन को लचीला बनाने की ज़रूरत है। बेहतर शिक्षा या रोज़गार की संभावनाओं के लिए लोगों के एक राज्य से अन्य में जाने पर भोजन की आवश्यक्ताएं भी बदलेंगी। राज्यों में लाभार्थियों की संख्या में अचानक होने वाले बदलावों से निपटने के लिए खाद्य वितरण प्रणाली में लचीलापन होना ज़रूरी है। राज्यों की वितरण प्रणालियों पर प्रवासन के अन्य प्रकार के दबाव भी होंगे। उदाहरण के लिए, ओडिशा से परेशानी में स्थानांतरित होने वाले लोग जिन राज्यों में जाएंगे उन राज्यों पर इन लोगों को सब्सिडी वाला अनाज उपलब्ध कराने की ज़िम्मेदारी होगी।

अभी इस प्रणाली में एकमुश्त आवंटन होता है जिससे जलवायु परिवर्तन या प्राकृतिक आपदाओं के कारण बड़ी संख्या में लोगों के पलायन करने से अनाज की ज़रूरतों को पूरा करना मुश्किल है। 2018 में भारत में आपदाओं और मौसम के बहुत अधिक ख़राब होने से 26.8 लाख लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर गए थे, यह संख्या दुनिया में सबसे अधिक थी। ऐसी स्थितियों में, प्रवासी व्यक्ति जिन राज्यों में जाएंगे वहां उन्हें सब्सिडी पर अनाज की ज़रूरत होगी। इससे इन राज्यों को अपने आवंटन और वितरण को लेकर लचीला रहना होगा।

अन्य रुकावटें

भारत में पीडीएस तक पहुंच को लेकर समस्याएं हैं। इसमें लिंग, जाति और वर्ग एक भूमिका निभाते हैं, कॉरनेल यूनिवर्सिटी की ममता प्रधान और इंटरनेशनल फ़ूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के देवेश रॉय ने लिखा है। ओएनओआरसी योजना वितरण नेटवर्क को प्रभावी तरीके से लोकतांत्रिक बनाती है लेकिन पहुंच तक समान रुकावटों को जारी नहीं रहने दिया जा सकता, स्कॉलर्स के अनुसार। 

प्रधान और रॉय का यह भी मानना है कि ओएनओआरसी को वास्तव में बदलाव लाने के लिए राशन के ‘विभाजन’ की सुविधा का प्रावधान करना होगा। इससे समान राशन कार्ड के तहत आने वाले एक परिवार के सदस्य अलग-अलग स्थानों पर राशन ले सकेंगे। प्रणाली में वितरण की इस सुविधा को शामिल करना होगा।

“जब तक सरकार राशन कार्ड में ‘विभाजन की सुविधा’ नहीं देती, तब तक प्रवासन के प्रकार की निगरानी करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है,” रॉय और प्रधान लिखते हैं। “अनुभवों से पता चलता है कि लागू करना एक मुश्किल प्रक्रिया है और वर्तमान कार्यशैली के मद्देनज़र समयसीमा को पूरा करना बहुत मुश्किल है। इसके बावजूद, महत्वाकांक्षी लक्ष्यों का अपना महत्व होता है। अगर इसे लागू किया जाता है और यह अच्छी तरह चलती है तो भी इससे सीखने को मिलेगा और प्रणाली कुछ समय बाद बेहतर बन जाएगी।”

(आदित्य, इंडिया माइग्रेशन नाउ के साथ एक रिसर्चर हैं; मरीशा करवा ने इस रिपोर्ट का संपादन किया है।)

यह रिपोर्ट अंग्रेज़ी में 22 जनवरी 2020 को IndiaSpend पर प्रकाशित हुई है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

नई दिल्ली: केंद्र सरकार की वन नेशन-वन राशन कार्ड (ओएनओआरसी) योजना की तीन बड़ी ख़ामियों में अगर सुधार नहीं किया जाता है तो यह योजना मुश्किल में पड़ सकती है। यह योजना 1 जनवरी, 2020 से आंशिक तौर पर लागू हो चुकी है। जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) की वर्तमान समस्याओं के विश्लेषण और शोधकर्ताओं के अनुसार, यह समस्याएं भंडारण और वितरण की सुविधाओं, डेटा सिस्टम को अपडेट करने और राज्यों के बीच समन्वय से जुड़ी हैं।

इस योजना की घोषणा जून 2019 में की गई थी। यह योजना 12 राज्यों -- हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, झारखंड, त्रिपुरा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, कर्नाटक और केरल -- में चल रही है। इसे अन्य सभी राज्यों में 30 जून, 2020 तक लागू किया जाना है, जैसा कि उपभोक्ता मामलों, खाद्य और जन वितरण मंत्री राम विलास पासवान ने बताया

देशभर में अनाज के भंडारण, आवंटन और वितरण का प्रबंधन पीडीएस करता है। इसके लिए फ़ूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफ़सीआई) के वेयरहाउसों, सरकार के वेयरहाउसों, प्राइवेट गोदामों और लगभग 533,000 राशन की दुकानों (एफ़पीएस) के नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2017-18 में पीडीएस ने राज्यों को 5.52 करोड़ टन अनाज का आवंटन किया था; राज्यों ने इस अवधि में 5.40 करोड़ टन अनाज उठाया था। वर्तमान लक्षित जन वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) के तहत, निर्धन परिवारों को सब्सिडी पर अनाज मिलता है। इसके लिए उन्हें एफ़पीएस पर अपने निवास स्थान से जुड़ा एक राशन कार्ड दिखाना होता है।

इस प्रक्रिया में लाभार्थियों को किसी अन्य दुकान से सब्सिडी पर अनाज लेने की अनुमति नहीं है, इस वजह से अपने ज़िले और राज्य से बाहर जाने पर वह इस सुविधा से वंचित रह जाते हैं। इस प्रक्रिया की वजह से कम से कम राज्यों के बीच पलायन करने वाले कम से कम 5.42 करोड़ प्रवासी सब्सिडी पर अनाज नहीं ले पाते हैं, 2011 की जनगणना के प्रवासी डेटा के अनुसार।

मौजूदा प्रणाली के तहत, प्रवासी अंतिम चरण में लाभार्थी नहीं बन सकते क्योंकि उनके पलायन से वह राशन की दुकानों से अनाज लेने के पात्र नहीं रहते। (स्रोत पीआरएस)

इससे प्रवासियों के लिए अनाज हासिल करना मुश्किल हुआ है, रिसर्च और कंसलटेंसी एजेंसी इंडिया माइग्रेशन नाउ के इंटरस्टेट माइग्रेंट पॉलिसी इंडेक्स (आईएमपीईएक्स) से यह पता चला।  2018 में सात राज्यों के मूल्यांकन में एजेंसी ने पाया कि केवल महाराष्ट्र में प्रवासियों के लिए एक अस्थायी राशन कार्ड का प्रावधान था, यह विशेषतौर पर बीड़ी कर्मियों और छोड़ दी गई महिलाओं के लिए है।

ओएनओआरसी का लक्ष्य राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के तहत इस समस्या का समाधान करने के लिए राशन कार्डों को पोर्टेबल बनाना है, इससे देश भर में किसी भी राशन की दुकान पर उनका इस्तेमाल हो सके। “इससे प्रवासी कर्मियों, श्रमिकों और दिहाड़ी मज़दूरों को लाभ होगा, जो रोज़गार की तलाश में पलायन करते हैं,” फ़ूड सेक्रेटरी रवि कांत ने बताया। “ऐसे राशन कार्डधारक बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन के ज़रिए अपने परिवारों को मिलने वाला अनाज किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में किसी भी राशन की दुकान से ख़रीद सकेंगे।”

भंडारण और वितरण

पीडीएस को भंडारण और वितरण में ख़ामियों से नुक़सान होता है। पीडीएस में अनाज की चोरी और उसका सड़ना सामान्य है। 2009-10 में 4.76 करोड़ टन अनाज के कुल आवंटन (तब उपलब्ध नए नेशनल सैम्पल सर्वे डेटा के अनुसार), में से राज्यों ने 4.24 करोड़ टन अनाज उठाया था और 2.53 करोड़ टन की वास्तव में खपत हुई थी। इससे पीडीएस नेटवर्क के तहत सभी अनाज के 40.4% के चोरी होने का पता चलता है, एक ग़ैर-लाभकारी, स्वतंत्र शोध संस्थान, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के 2013 में किए गए एक विश्लेषण में यह जानकारी सामने आई।

केंद्र सरकार की ओर से एफ़सीआई की भूमिका के मूल्यांकन के लिए अगस्त 2014 में नियुक्त की गई शांता कुमार कमेटी ने भी कुछ राज्यों में 70% तक चोरी की जानकारी दी थी और वितरण को बेहतर बनाने के लिए प्रणाली को पूरी तरह कंप्यूटराइज़्ड करने का सुझाव दिया था। हाइडलबर्ग यूनिवर्सिटी के साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के 2016 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया था कि भंडारण और वितरण के दौरान भ्रष्टाचार की सबसे ज़्यादा संभावनाएं होती हैं। ग़लत तरीकों में अनाज के स्टॉक को जानबूझ कर अलग स्थान पर भेजना, भ्रष्ट बिचौलियों का इसकी खुले बाज़ार में बिक्री करना और ग़रीबी की रेखा से ऊपर के लोगों के लिए अनाज के कोटे में गड़बड़ी करना शामिल हैं।

इसके अलावा पीडीएस को ख़राब नेटवर्क प्रबंधन से नुकसान होता है और इसकी “मुख्य कमज़ोरी यानी ग़रीबों तक पूरी तरह नहीं पहुंचने का कारण पीडीएस का बड़ा दायरा है”, खाद्य एवं कृषि संगठन के एक विश्लेषण में यह सामने आया।

डिजिटाइज़ेशन और आधार से जोड़ना

ओएनओआरसी को सफ़ल बनाने के लिए, इसे लाभार्थियों को जोड़ने या हटाने में ख़ामियों को दूर करना होगा, जो अभी प्रणाली में बड़े स्तर पर हो रही हैं,  नीति आयोग की ओर से 2016 में पीडीएस के मूल्यांकन में इसकी तरफ़ इशारा किया गया था। बाहर करने को लेकर ख़ामियां कमज़ोर तबकों के साथ सबसे अधिक थी, जिससे संकेत मिलता है कि निर्धन परिवारों को इस प्रणाली के लाभों से बाहर करने की आशंका है। इस समस्या से निपटने के लिए डुप्लिकेट राशन कार्डों को समाप्त करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि राशन की दुकानों के प्रबंधक सटीक रिकॉर्ड रखें।

ओएनओआरसी सुविधा “इलेक्ट्रॉनिक प्वाइंट ऑफ़ सेल (ईपीओएस) डिवाइस पर बायोमेट्रिक/आधार ऑथेंटिकेशन के बाद उपलब्ध होगी,” पासवान ने कहा। इससे पता चलता है कि दो सुधारों की ज़रूरत है: राशन कार्डों को आधार से जोड़ना और देशभर में राशन की दुकानों पर ईपीओएस डिवाइस की उपलब्धता।

लाभार्थियों के लिए, ओएनओआरसी देश भर में 533,000 राशन की दुकानों के ऑटोमेशन और वहां ईपीओएस डिवाइस की उपलब्धता पर निर्भर है। तत्कालीन उपभोक्ता मामलों, खाद्य और जन वितरण राज्यमंत्री सी आर चौधरी ने लोकसभा में बताया था कि फ़रवरी 2019 तक, 533,000 में से 388,000 राशन की दुकानों पर ईपीओएस डिवाइस थे। कुछ राज्यों -- गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश -- में राशन की सभी दुकानें ऑटोमेटेड हो गई हैं, लेकिन पूर्वोत्तर के राज्यों में जून 2020 तक यह लक्ष्य पूरा होना मुश्किल है। मेघालय में 4,736 राशन की दुकानों में से 10 पर ईपीओएस थे। असम में, 38,000 से अधिक दुकानों में से 109 पर यह सुविधा थी। मिज़ोरम, नागालैंड और मणिपुर में 5,625 राशन की दुकानों में से किसी पर भी ईपीओएस डिवाइस नहीं था।

राजधानी दिल्ली में भी ऐसी ही स्थिति है, जहां 2,254 राशन की दुकानों में से एक के पास भी ईपीओएस डिवाइस नहीं था। लोकसभा में चौधरी की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, पश्चिम बंगाल में 20,806 दुकानों में से केवल 309 ऑटोमेटेड थीं।

आंकड़ों से पता चलता है कि देशभर में ईपीओएस का वितरण समान नहीं है, कुछ राज्य बाकी से काफी पीछे हैं। इससे दूरदराज़ के स्थानों पर ऑटोमेशन लाने में मुश्किल का संकेत मिलता है। पूर्वोत्तर राज्यों में ऑटोमेशन की कमी से क्षेत्र में ओएनओआरसी को ख़राब तरीके से लागू करने का पता चलता है।

इस प्रणाली को आधुनिक बनाने में दूसरी बड़ी रुकावट लाभार्थी के आधार को उसके राशन कार्ड से जोड़ने की है। उपभोक्ता मामलों, खाद्य और जन वितरण राज्यमंत्री डी आर दादाराव ने फरवरी 2019 में लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन के लिए राशन कार्डों के 85% से कुछ अधिक आधार (परिवार के कम से कम एक सदस्य के लिए) से लिंक्ड हैं। राशन कार्डों के साथ आधार की लिंकिंग से 2013 से 2018 के बीच 2.98 करोड़ ऐसे राशन कार्डों को हटाया गया है जो इस योजना के लिए पात्र नहीं थे। इसके पीछे डुप्लीकेशन, योजना के दायरे से बाहर के परिवारों की पहचान, स्थानांतरण या प्रवासन जैसे कई कारण थे।

ऑथेंटिकेशन के लिए राशन कार्ड से आधार को लिंक करने से लाभार्थियों को राशन मिलना मुश्किल भी हुआ है। छत्तीसगढ़ और ओडिशा में यह समस्या अधिक है। आंध्र प्रदेश में आधार से ऑथेंटिकेट होने वाली पीडीएस ट्रांजैक्शंस के असफ़ल होने की दर 2.5% थी, इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नेस के डिजिटल आइडेंटिटी रिसर्च इनिशिएटिव की ओर से 2017 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार।  इसका बड़ा कारण 'बायोमेट्रिक मिलान' ना होना था।

ओएनओआरसी योजना के लिए ईपीओएस की उपलब्धता और आधार लिंकेज ज़रूरी होने के मद्देनज़र, आंकड़ों से पता चलता है कि इस योजना को लागू करने में अभी ख़ामियां हैं जिन्हें 30 जून, 2020 की समयसीमा से पहले ठीक करना होगा।

राज्यों के बीच समन्वय

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के तहत, केंद्र से राज्यों को अनाज का आवंटन किया जाता है और ख़रीद की ज़रूरतों को तय करने के लिए राज्य, लाभार्थियों की पहचान करते हैं। राज्य इसके लिए अलग-अलग तरीक़े अपनाते हैं: तमिलनाडु में अपनी एक सर्वव्यापक जन वितरण प्रणाली है, जबकि हरियाणा की लक्षित जन वितरण प्रणाली केंद्र के दिशानिर्देशों के तहत काम करती है। इसमें लाभार्थियों को अंत्योदय अन्न योजना (एएवाई, या सबसे निर्धन) और प्राथमिकता वाले परिवारों के बीच विभाजित किया जाता है।

ओएनओआरसी को प्रभावी तरीके से लागू कर प्रवासियों को इसका लाभ सुनिश्चित करने के लिए इन प्रणालियों को एक समान बनाना महत्वपूर्ण है। राज्यों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वितरण और परिवहन की प्रणालियां भी मज़बूत हों।

एक समस्या वितरण और आवंटन को लचीला बनाने की ज़रूरत है। बेहतर शिक्षा या रोज़गार की संभावनाओं के लिए लोगों के एक राज्य से अन्य में जाने पर भोजन की आवश्यक्ताएं भी बदलेंगी। राज्यों में लाभार्थियों की संख्या में अचानक होने वाले बदलावों से निपटने के लिए खाद्य वितरण प्रणाली में लचीलापन होना ज़रूरी है। राज्यों की वितरण प्रणालियों पर प्रवासन के अन्य प्रकार के दबाव भी होंगे। उदाहरण के लिए, ओडिशा से परेशानी में स्थानांतरित होने वाले लोग जिन राज्यों में जाएंगे उन राज्यों पर इन लोगों को सब्सिडी वाला अनाज उपलब्ध कराने की ज़िम्मेदारी होगी।

अभी इस प्रणाली में एकमुश्त आवंटन होता है जिससे जलवायु परिवर्तन या प्राकृतिक आपदाओं के कारण बड़ी संख्या में लोगों के पलायन करने से अनाज की ज़रूरतों को पूरा करना मुश्किल है। 2018 में भारत में आपदाओं और मौसम के बहुत अधिक ख़राब होने से 26.8 लाख लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर गए थे, यह संख्या दुनिया में सबसे अधिक थी। ऐसी स्थितियों में, प्रवासी व्यक्ति जिन राज्यों में जाएंगे वहां उन्हें सब्सिडी पर अनाज की ज़रूरत होगी। इससे इन राज्यों को अपने आवंटन और वितरण को लेकर लचीला रहना होगा।

अन्य रुकावटें

भारत में पीडीएस तक पहुंच को लेकर समस्याएं हैं। इसमें लिंग, जाति और वर्ग एक भूमिका निभाते हैं, कॉरनेल यूनिवर्सिटी की ममता प्रधान और इंटरनेशनल फ़ूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के देवेश रॉय ने लिखा है। ओएनओआरसी योजना वितरण नेटवर्क को प्रभावी तरीके से लोकतांत्रिक बनाती है लेकिन पहुंच तक समान रुकावटों को जारी नहीं रहने दिया जा सकता, स्कॉलर्स के अनुसार। 

प्रधान और रॉय का यह भी मानना है कि ओएनओआरसी को वास्तव में बदलाव लाने के लिए राशन के ‘विभाजन’ की सुविधा का प्रावधान करना होगा। इससे समान राशन कार्ड के तहत आने वाले एक परिवार के सदस्य अलग-अलग स्थानों पर राशन ले सकेंगे। प्रणाली में वितरण की इस सुविधा को शामिल करना होगा।

“जब तक सरकार राशन कार्ड में ‘विभाजन की सुविधा’ नहीं देती, तब तक प्रवासन के प्रकार की निगरानी करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है,” रॉय और प्रधान लिखते हैं। “अनुभवों से पता चलता है कि लागू करना एक मुश्किल प्रक्रिया है और वर्तमान कार्यशैली के मद्देनज़र समयसीमा को पूरा करना बहुत मुश्किल है। इसके बावजूद, महत्वाकांक्षी लक्ष्यों का अपना महत्व होता है। अगर इसे लागू किया जाता है और यह अच्छी तरह चलती है तो भी इससे सीखने को मिलेगा और प्रणाली कुछ समय बाद बेहतर बन जाएगी।”

(आदित्य, इंडिया माइग्रेशन नाउ के साथ एक रिसर्चर हैं; मरीशा करवा ने इस रिपोर्ट का संपादन किया है।)

यह रिपोर्ट अंग्रेज़ी में 22 जनवरी 2020 को IndiaSpend पर प्रकाशित हुई है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।