दिल्ली की महिलाओं को मुफ्त पब्लिक ट्रांसपोर्ट देने के कई मतलब हैं !

नई दिल्ली: 2018 की शुरुआत की सर्दियों में एक दिन, 23 वर्षीय डेटा एंट्री एग्जीक्यूटिव शीला* को अचानक एक साहस भरा फैसला लेना पड़ा। जब शेयर्ड मिनी वैन के ड्राइवर ने गाड़ी धीमी करने और उन्हें नीचे उतारने के अनुरोध को नजरअंदाज करते हुए गाड़ी को चलाना जारी रखा तो उनके पास दो ही रास्ते थे- या तो वह गाड़ी में अकेली बैठी रहे ( गाड़ी में वह अकेली सवारी थी ) और किसी अनजान सी आशंका में घुलती रहे या चलती गाड़ी से कूद जाए, जिसमें उन्हें काफी चोट का खतरा था।

वह ‘ग्रामीण सेवा’ वैन के ड्राइवर से खुद को बचाने के लिए चलती गाड़ी से कूद पड़ी। इससे उसके दाहिनी बांह और टखने में काफी चोट आई। ‘ग्रामीण सेवा’ भारत की राजधानी के निम्न-आय वाले उपनगरों में लोगों के लिए परिवहन का एक पसंदीदा विकल्प है। दक्षिणी दिल्ली में ओखला फेज-1 के एक कार्यालय से दक्षिणपुरी में अपने घर तक पहुंचने के लिए शीला को 7 किमी से अधिक की यात्रा करनी पड़ती है। 3,900 बसों और 8-लाइन, 373-किमी मेट्रो रेल नेटवर्क वाले शहर में यह यात्रा तय करने के लिए शेयर्ड वैन-ऑटो के लिए न्यूनतम 10 रुपये प्रति किमी बनाम प्रति सवारी 5 रु- एकमात्र विश्वसनीय और किफायती परिवहन विकल्प है।

शीला उन कई महिलाओं में से एक हैं, जो अपनी दैनिक गतिविधियों को पूरा करने के दौरान दिल्ली की सड़कों पर जोखिम उठाती हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा हाल ही में शहर में महिलाओं के लिए मेट्रो और बस की मुफ्त सवारी की घोषणा में महिलाओं की गतिशीलता के लिए महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं, जो बदले में, शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच के फैसलों से जुड़ी है।

इस उम्मीद के विपरीत कि शहरी क्षेत्रों में महिलाओं को रोजगार के अधिक अवसर मिलते हैं, आंकड़ों से पता चलता है कि शहरों में भारत की महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में कम है। दिल्ली महानगर में ( जो 1.9 करोड़ से अधिक लोगों का निवास है और मॉल, कैफे और टॉवर कार्यालय ब्लॉकों से भरा हुआ है ) 15 साल से अधिक उम्र की 11.7 फीसदी से अधिक महिलाएं रोजगार में नहीं हैं। इस संबंध में राष्ट्रीय औसत 27 फीसदी है।

बच्चे के साथ महिला पैदल चलती हैं...

दिल्ली में महिलाओं और श्रम शक्ति पर मेरे शोध में, काम करने की चाहत रखने वाली युवा महिलाओं ने सार्वजनिक परिवहन पर सुरक्षा, पहुंच और सामर्थ्य पर चिंता जताई। कार चालक 29 वर्षीय सुषमा* का ही मामला लें।

शादी करने के बाद, राजस्थान के एक गांव से दिल्ली आई, सुषमा आगे की पढ़ाई करना और रोज़गार पाना चाहती थी। उन्होंने महिलाओं के लिए ड्राइवर-ट्रेनिंग कक्षाओं के बारे में सुना था। उसने अपने पति से कहा कि वह यह ट्रेनिंग करना चाहती है। हालांकि, उसके ससुरालवालों ने उसे हतोत्साहित करते हुए कड़े शब्दों में कहा था कि उसकी जगह घर ही है।

सुषमा ने मुझे बताया कि उनका रवैया ‘एक बड़ी समस्या’ थी। उन्होंने उसे बस किराए के लिए पैसे नहीं दिए। उसके पति, सारा वेतन अपनी मां को सौंप देते थे।

शादी के बाद 12वीं कक्षा पूरी करने वाली सुषमा ने कहा, "मुझे हमेशा उससे पैसे मांगने पड़ते थे। मैं संगम विहार से कालकाजी -लगभग 6 किमी-तक पैदल जाती थी। इस तरह से मैं इस लाइन में आई... यदि मैंने कठिन काम नहीं किया होता, तो आज हम यहां नहीं होते।"

सुषमा ने रोज ड्राइविंग कक्षाओं में आने के लिए एक घंटे से अधिक पैदल चलने की तीव्र इच्छा के पीछे अपनी उस जिद्द को याद किया, जब उसने जीवन में कुछ करने का प्रण किया था।अब ड्राइवर के रूप में काम करने वाली सुषमा अपने परिवार के लिए कमाऊ सदस्य बन गई है।

इसी तरह, 24 साल की रमा* ने मुझसे कहा कि वह हमेशा अपने जीवन में ‘कुछ ज्यादा’ करना चाहती थी। एक गैर-सरकारी संगठन से जुड़ी एक सामुदायिक कार्यकर्ता, रमा सप्ताह में पांच दिन ऑफिस जाती हैं और ऑफिस तक पहुंचने के लिए, एक तरफ 90 मीनट (12 किमी ) की यात्रा करती है। उसका सफर आंशिक रुप से पैदल और आंशिक रुप से बसों के जरिए पूरा होता है- फरीदाबाद सीमा के पास बदरपुर से दक्षिण दिल्ली में खिरकी एक्सटेंशन तक।

हालांकि, शहर का मेट्रो नेटवर्क अब बदरपुर तक भी फैला हुआ है। रमा का कहना है कि वह मेट्रो से यात्रा या ऑटो से यात्रा वहन नहीं कर सकती है। इसलिए, वह बस स्टॉप तक पैदल जाती है और एक दिन के ऑटो किराया 40 रु बचत के लिए दो बसें लेती है। वह कहती हैं,"मैं ओटो नहीं ले सकती। तो, मैं ऑफिस से जल्दी निकल जाती हूं। एक बच्चे के साथ चलने में 20-25 मिनट लगते हैं – अगर मैं अकेली चलूं तो समय कम लग सकता है।”

ओखला में एक कारखाने में काम करने वाली रमा के पति, मोटरबाइक से यात्रा करते हैं। रमा और उनके पति ने लोन पर यह बाइक खरीदी है और अब वे दोनों अपनी तनख्वाह में से किश्तों के जरिए भुगतान कर रहे हैं।

परिवहन एक लैंगिक मुद्दा

शीला, सुषमा और रमा जैसी महिलाओं के अनुभव, उभरते रोजगार के अवसरों को सुरक्षित करने का प्रयास पर जोर डालते हैं और बताते हैं कि सार्वजनिक परिवहन का मुद्दा विशेष रूप से लैंगिक मुद्दा है।

जहां कुछ लोगों ने पुरुषों (मजदूर वर्ग) के खिलाफ भेदभाव के रूप में महिलाओं के लिए मुफ्त सार्वजनिक परिवहन की पेशकश की आलोचना की है, वहीं केजरीवाल ने खुद महिलाओं की सुरक्षा की समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया है।

शीला ने चलती हुई ग्रामीण सेवा वैन से छलांग लगा दी, क्योंकि वह अकेली महिला यात्री के रूप में असुरक्षित महसूस कर रही थी। सार्वजनिक परिवहन पर महिलाओं की बढ़ती उपस्थिति इसे महिलाओं के लिए मित्रतापूर्ण बनाने में योगदान देगी।

हालांकि, महिलाओं के लिए विश्वसनीय सार्वजनिक परिवहन की सख्त जरूरत, बात सिर्फ सुरक्षा के मुद्दे तक सीमित नहीं है।

महिलाओं की गतिशीलता वित्तीय नियंत्रण के माध्यम से परिवारों द्वारा भी प्रतिबंधित है, जैसा कि सुषमा के मामले हुआ। इसके अलावा, यहां तक ​​कि जब महिलाएं अपनी गतिशीलता के लिए बहस करने में सक्षम होती हैं, तो सबसे ज्यादा संभावना यह होती है कि वे सस्ते सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर रहेंगे। दूसरी ओर, रमा के पति जैसे पुरुष मोटरबाइकों का उपयोग करने में सक्षम हो सकते हैं, यदि उनके परिवार इसे वहन कर सकते हैं।

यह भी असामान्य नहीं है कि महिला श्रमिकों को काम करने के लिए बच्चों को अपने साथ ले जाना पड़ता है। घरेलू और देखभाल की जिम्मेदारियां महिलाओं के लिए संभावनाओं को खत्म करती हैं।

अंतिम गंत्व्य तक पहुंच

लागत बाधाओं को हटाने का कदम महिलाओं के लिए परिवहन को आसान बनाएगा और इस प्रकार रोजगार, शिक्षा और सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच में सुधार होगा। हालांकि, मेट्रो और बस यात्रा को मुफ्त बनाने के साथ मेट्रो स्टेशनों से ‘लास्ट माइल कनेक्टिविटी’ पर ध्यान देने की आवश्यकता है, विशेष रूप से फीडर सेवाओं की पहुंच और विश्वसनीयता, जैसे दिल्ली में कम आय वाले इलाकों में ग्रामीण सेवा।

अपने शोध के दौरान दक्षिणपुरी और खानपुर (दक्षिणी दिल्ली) में रहने वाली युवा महिलाओं के साथ बातचीत में मैंने पाया कि ग्रामीण सेवा परिवहन का सबसे आम तरीका था। इसे 2010 में दिल्ली के शहरी गांवों तक पहुंचने के लिए पेश किया गया था, जहां दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) की बस सेवाएं सीमित हैं। हालांकि, ग्रामीण सेवा परिवहन का सबसे विश्वसनीय और कुशल माध्यम नहीं है, लेकिन महिलाएं इसका उपयोग करती हैं, क्योंकि यह ऑटो की तुलना में सस्ता है और उन्हें घर के करीब तक पहुंचाता है।

दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) ने मेट्रो स्टेशनों पर पार्किंग स्थान प्रदान करके अधिक परिवहन विकल्प ( ई-रिक्शा, ऑटो या टैक्सी ) उपलब्ध कराने के लिए 61 मेट्रो स्टेशनों पर "मल्टी-मोडल एकीकरण" की घोषणा की है।

हालांकि यह मेट्रो नेटवर्क तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करेगा, लेकिन ऐसी फीडर सेवाओं की लागत, पहुंच और विश्वसनीयता अभी भी सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं की पहुंच में बाधा बन सकती है।

बारहवीं कक्षा खत्म करने के बाद प्रांजलि* ने एक छोटे से कार्यालय में एक वित्तीय सहायक के रूप में काम शुरु किया है। उन्होंने मुझे बताया कि कैसे उन्हें ‘हर दिन, भारी भीड़ में’ आना-जाना पड़ता था।

सुरक्षित और सस्ती परिवहन सेवा प्रदान करके और हर दिन इस तरह के ‘अप-डाउन’ ‘की लागत को कम करके महिलाओं की समस्याओं को बहुत हद तक कम किया जा सकता है। उनके लिए रोजगार की तलाश, रोदगार की प्राप्ति और उसे बनाए रखने में आसानी हो सकती है और यदि यह सफल हो, तो अन्य भारतीय शहरों के लिए एक मॉडल बन सकता है।

* पहचान छुपाने के उद्देश्य से सभी नाम बदल दिए गए हैं।

(असिया इस्लाम ‘कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय’ में पीएचडी की शोधकर्ता हैं।)

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 11 जून, 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

नई दिल्ली: 2018 की शुरुआत की सर्दियों में एक दिन, 23 वर्षीय डेटा एंट्री एग्जीक्यूटिव शीला* को अचानक एक साहस भरा फैसला लेना पड़ा। जब शेयर्ड मिनी वैन के ड्राइवर ने गाड़ी धीमी करने और उन्हें नीचे उतारने के अनुरोध को नजरअंदाज करते हुए गाड़ी को चलाना जारी रखा तो उनके पास दो ही रास्ते थे- या तो वह गाड़ी में अकेली बैठी रहे ( गाड़ी में वह अकेली सवारी थी ) और किसी अनजान सी आशंका में घुलती रहे या चलती गाड़ी से कूद जाए, जिसमें उन्हें काफी चोट का खतरा था।

वह ‘ग्रामीण सेवा’ वैन के ड्राइवर से खुद को बचाने के लिए चलती गाड़ी से कूद पड़ी। इससे उसके दाहिनी बांह और टखने में काफी चोट आई। ‘ग्रामीण सेवा’ भारत की राजधानी के निम्न-आय वाले उपनगरों में लोगों के लिए परिवहन का एक पसंदीदा विकल्प है। दक्षिणी दिल्ली में ओखला फेज-1 के एक कार्यालय से दक्षिणपुरी में अपने घर तक पहुंचने के लिए शीला को 7 किमी से अधिक की यात्रा करनी पड़ती है। 3,900 बसों और 8-लाइन, 373-किमी मेट्रो रेल नेटवर्क वाले शहर में यह यात्रा तय करने के लिए शेयर्ड वैन-ऑटो के लिए न्यूनतम 10 रुपये प्रति किमी बनाम प्रति सवारी 5 रु- एकमात्र विश्वसनीय और किफायती परिवहन विकल्प है।

शीला उन कई महिलाओं में से एक हैं, जो अपनी दैनिक गतिविधियों को पूरा करने के दौरान दिल्ली की सड़कों पर जोखिम उठाती हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा हाल ही में शहर में महिलाओं के लिए मेट्रो और बस की मुफ्त सवारी की घोषणा में महिलाओं की गतिशीलता के लिए महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं, जो बदले में, शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच के फैसलों से जुड़ी है।

इस उम्मीद के विपरीत कि शहरी क्षेत्रों में महिलाओं को रोजगार के अधिक अवसर मिलते हैं, आंकड़ों से पता चलता है कि शहरों में भारत की महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में कम है। दिल्ली महानगर में ( जो 1.9 करोड़ से अधिक लोगों का निवास है और मॉल, कैफे और टॉवर कार्यालय ब्लॉकों से भरा हुआ है ) 15 साल से अधिक उम्र की 11.7 फीसदी से अधिक महिलाएं रोजगार में नहीं हैं। इस संबंध में राष्ट्रीय औसत 27 फीसदी है।

बच्चे के साथ महिला पैदल चलती हैं...

दिल्ली में महिलाओं और श्रम शक्ति पर मेरे शोध में, काम करने की चाहत रखने वाली युवा महिलाओं ने सार्वजनिक परिवहन पर सुरक्षा, पहुंच और सामर्थ्य पर चिंता जताई। कार चालक 29 वर्षीय सुषमा* का ही मामला लें।

शादी करने के बाद, राजस्थान के एक गांव से दिल्ली आई, सुषमा आगे की पढ़ाई करना और रोज़गार पाना चाहती थी। उन्होंने महिलाओं के लिए ड्राइवर-ट्रेनिंग कक्षाओं के बारे में सुना था। उसने अपने पति से कहा कि वह यह ट्रेनिंग करना चाहती है। हालांकि, उसके ससुरालवालों ने उसे हतोत्साहित करते हुए कड़े शब्दों में कहा था कि उसकी जगह घर ही है।

सुषमा ने मुझे बताया कि उनका रवैया ‘एक बड़ी समस्या’ थी। उन्होंने उसे बस किराए के लिए पैसे नहीं दिए। उसके पति, सारा वेतन अपनी मां को सौंप देते थे।

शादी के बाद 12वीं कक्षा पूरी करने वाली सुषमा ने कहा, "मुझे हमेशा उससे पैसे मांगने पड़ते थे। मैं संगम विहार से कालकाजी -लगभग 6 किमी-तक पैदल जाती थी। इस तरह से मैं इस लाइन में आई... यदि मैंने कठिन काम नहीं किया होता, तो आज हम यहां नहीं होते।"

सुषमा ने रोज ड्राइविंग कक्षाओं में आने के लिए एक घंटे से अधिक पैदल चलने की तीव्र इच्छा के पीछे अपनी उस जिद्द को याद किया, जब उसने जीवन में कुछ करने का प्रण किया था।अब ड्राइवर के रूप में काम करने वाली सुषमा अपने परिवार के लिए कमाऊ सदस्य बन गई है।

इसी तरह, 24 साल की रमा* ने मुझसे कहा कि वह हमेशा अपने जीवन में ‘कुछ ज्यादा’ करना चाहती थी। एक गैर-सरकारी संगठन से जुड़ी एक सामुदायिक कार्यकर्ता, रमा सप्ताह में पांच दिन ऑफिस जाती हैं और ऑफिस तक पहुंचने के लिए, एक तरफ 90 मीनट (12 किमी ) की यात्रा करती है। उसका सफर आंशिक रुप से पैदल और आंशिक रुप से बसों के जरिए पूरा होता है- फरीदाबाद सीमा के पास बदरपुर से दक्षिण दिल्ली में खिरकी एक्सटेंशन तक।

हालांकि, शहर का मेट्रो नेटवर्क अब बदरपुर तक भी फैला हुआ है। रमा का कहना है कि वह मेट्रो से यात्रा या ऑटो से यात्रा वहन नहीं कर सकती है। इसलिए, वह बस स्टॉप तक पैदल जाती है और एक दिन के ऑटो किराया 40 रु बचत के लिए दो बसें लेती है। वह कहती हैं,"मैं ओटो नहीं ले सकती। तो, मैं ऑफिस से जल्दी निकल जाती हूं। एक बच्चे के साथ चलने में 20-25 मिनट लगते हैं – अगर मैं अकेली चलूं तो समय कम लग सकता है।”

ओखला में एक कारखाने में काम करने वाली रमा के पति, मोटरबाइक से यात्रा करते हैं। रमा और उनके पति ने लोन पर यह बाइक खरीदी है और अब वे दोनों अपनी तनख्वाह में से किश्तों के जरिए भुगतान कर रहे हैं।

परिवहन एक लैंगिक मुद्दा

शीला, सुषमा और रमा जैसी महिलाओं के अनुभव, उभरते रोजगार के अवसरों को सुरक्षित करने का प्रयास पर जोर डालते हैं और बताते हैं कि सार्वजनिक परिवहन का मुद्दा विशेष रूप से लैंगिक मुद्दा है।

जहां कुछ लोगों ने पुरुषों (मजदूर वर्ग) के खिलाफ भेदभाव के रूप में महिलाओं के लिए मुफ्त सार्वजनिक परिवहन की पेशकश की आलोचना की है, वहीं केजरीवाल ने खुद महिलाओं की सुरक्षा की समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया है।

शीला ने चलती हुई ग्रामीण सेवा वैन से छलांग लगा दी, क्योंकि वह अकेली महिला यात्री के रूप में असुरक्षित महसूस कर रही थी। सार्वजनिक परिवहन पर महिलाओं की बढ़ती उपस्थिति इसे महिलाओं के लिए मित्रतापूर्ण बनाने में योगदान देगी।

हालांकि, महिलाओं के लिए विश्वसनीय सार्वजनिक परिवहन की सख्त जरूरत, बात सिर्फ सुरक्षा के मुद्दे तक सीमित नहीं है।

महिलाओं की गतिशीलता वित्तीय नियंत्रण के माध्यम से परिवारों द्वारा भी प्रतिबंधित है, जैसा कि सुषमा के मामले हुआ। इसके अलावा, यहां तक ​​कि जब महिलाएं अपनी गतिशीलता के लिए बहस करने में सक्षम होती हैं, तो सबसे ज्यादा संभावना यह होती है कि वे सस्ते सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर रहेंगे। दूसरी ओर, रमा के पति जैसे पुरुष मोटरबाइकों का उपयोग करने में सक्षम हो सकते हैं, यदि उनके परिवार इसे वहन कर सकते हैं।

यह भी असामान्य नहीं है कि महिला श्रमिकों को काम करने के लिए बच्चों को अपने साथ ले जाना पड़ता है। घरेलू और देखभाल की जिम्मेदारियां महिलाओं के लिए संभावनाओं को खत्म करती हैं।

अंतिम गंत्व्य तक पहुंच

लागत बाधाओं को हटाने का कदम महिलाओं के लिए परिवहन को आसान बनाएगा और इस प्रकार रोजगार, शिक्षा और सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच में सुधार होगा। हालांकि, मेट्रो और बस यात्रा को मुफ्त बनाने के साथ मेट्रो स्टेशनों से ‘लास्ट माइल कनेक्टिविटी’ पर ध्यान देने की आवश्यकता है, विशेष रूप से फीडर सेवाओं की पहुंच और विश्वसनीयता, जैसे दिल्ली में कम आय वाले इलाकों में ग्रामीण सेवा।

अपने शोध के दौरान दक्षिणपुरी और खानपुर (दक्षिणी दिल्ली) में रहने वाली युवा महिलाओं के साथ बातचीत में मैंने पाया कि ग्रामीण सेवा परिवहन का सबसे आम तरीका था। इसे 2010 में दिल्ली के शहरी गांवों तक पहुंचने के लिए पेश किया गया था, जहां दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) की बस सेवाएं सीमित हैं। हालांकि, ग्रामीण सेवा परिवहन का सबसे विश्वसनीय और कुशल माध्यम नहीं है, लेकिन महिलाएं इसका उपयोग करती हैं, क्योंकि यह ऑटो की तुलना में सस्ता है और उन्हें घर के करीब तक पहुंचाता है।

दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) ने मेट्रो स्टेशनों पर पार्किंग स्थान प्रदान करके अधिक परिवहन विकल्प ( ई-रिक्शा, ऑटो या टैक्सी ) उपलब्ध कराने के लिए 61 मेट्रो स्टेशनों पर "मल्टी-मोडल एकीकरण" की घोषणा की है।

हालांकि यह मेट्रो नेटवर्क तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करेगा, लेकिन ऐसी फीडर सेवाओं की लागत, पहुंच और विश्वसनीयता अभी भी सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं की पहुंच में बाधा बन सकती है।

बारहवीं कक्षा खत्म करने के बाद प्रांजलि* ने एक छोटे से कार्यालय में एक वित्तीय सहायक के रूप में काम शुरु किया है। उन्होंने मुझे बताया कि कैसे उन्हें ‘हर दिन, भारी भीड़ में’ आना-जाना पड़ता था।

सुरक्षित और सस्ती परिवहन सेवा प्रदान करके और हर दिन इस तरह के ‘अप-डाउन’ ‘की लागत को कम करके महिलाओं की समस्याओं को बहुत हद तक कम किया जा सकता है। उनके लिए रोजगार की तलाश, रोदगार की प्राप्ति और उसे बनाए रखने में आसानी हो सकती है और यदि यह सफल हो, तो अन्य भारतीय शहरों के लिए एक मॉडल बन सकता है।

* पहचान छुपाने के उद्देश्य से सभी नाम बदल दिए गए हैं।

(असिया इस्लाम ‘कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय’ में पीएचडी की शोधकर्ता हैं।)

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 11 जून, 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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