बिहार की नल-जल योजना: नौ दिन चले अढ़ाई कोस

हर घर नल का जल स्कीम के तहत मुज़फ़्फ़रपुर के एक गांव में ये पाइप एक साल पहले लग गया था, लेकिन अब तक पानी की सप्लाई नहीं हुई है। फ़ोटो: उमेश कुमार राय

पटना: बिहार में पहले चरण के मतदान के ख़त्म होने के दो दिन बाद, 30 अक्टूबर को इनकम टैक्स विभाग ने सरकारी विभागों की योजनाओं में काम कर रहे कुछ ठेकेदारों के यहां छापे मारे और बड़ी संख्या में कैश और बेनामी संपत्ति बरामद की। ये ठेकेदार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘हर घर नल का जल’ से जुड़े थे। यह पहली बार नहीं जब इस योजना को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों। इसके बारे में हम आपको विस्तार से आगे बताएंगे।

हर घर तक नल का जल पहुंचाने की बिहार सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना का मुख्य लक्ष्य वित्त वर्ष 2019-20 के अंत तक बिहार के 1.95 करोड़ घरों तक पीने का साफ़ पानी पहुंचाना था ताकि लोगों को हैंडपंप और अन्य जल स्रोतों पर निर्भर न रहना पड़े। योजना में आर्सेनिक, आयरन और फ़्लोराइड से प्रभावित आबादी पर ज़्यादा जोर दिया गया था।

 

आर्सेनिक, आयरन और फ़्लोराइड प्रभावित क्षेत्रों में प्यूरीफ़ाइड पानी सप्लाई की जानी थी, लेकिन कई इलाकों में अब तक ये योजना पहुंची नहीं है। जिन इलाकों में नल पहुचा है वहां पानी नहीं पहुंचा, जहां पानी पहुंच गया वहां ज़मीन के नीचे से पानी बिना ट्रीट किये सीधे पाइप के ज़रिए लोगों के घरों तक पहुंचाया जा रहा है। इससे प्रभावित लोगों को कोई फायदा नहीं हो रहा है। इस योजना का काम धीमी गति से चल रहा है और अब तक 60% से भी कम काम हुआ है।

 

सुस्त रफ़्तार से चल रही है हर घर नल का जल योजना

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सात निश्चय के तहत हर घर नल का योजना के तहत हर घर तक नल से पानी पहुंचाने का काम 27 सितंबर 2016 से शुरू किया था। इस योजना को पूरा करने का लक्ष्य 31 मार्च 2020 तय किया गया था। इसमें तीन योजनाओं को शामिल किया गया था, जिनके ज़रिए ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के 97,280 वार्डों तक नल से पीने का साफ़ पानी पहुंचाना था। 

नाली-गली और नल जल योजना के लिए राज्य सरकार ने 37,070 करोड़ रुपए का बजट रखा था। इस योजना की रफ़्तार इतनी सुस्त है कि सरकार को बार-बार इसका लक्ष्य आगे बढ़ाना पड़ रहा है।

“बिहार में लोगों को शुद्ध पेयजल की सुविधा वर्ष 2020 के अंत तक मिल जाएगी,” 28 अगस्त 2020 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि अभी तक लक्ष्य का 56.28% काम ही पूरा हो पाया है।

बिहार के कुल 19,570,949 घरों में से 5 नवंबर 2020 तक 11,014,544 घरों तक ही नल से जल पहुंचा है, जलशक्ति मंत्रालय की वेबसाइट पर 5 नवंबर को मौजूद आंकड़ों के अनुसार।

इस योजना का हाल ये है कि या तो ज़्यादातर घरों तक नल ही नहीं पहुंचा और नल पहुंचा है तो उसमें जल नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने इस योजना को लेकर एक वीडियो 31 अक्टूबर को अपने ट्विटर हैंडल पर साझा किया।

13 ज़िलों में 50% से भी कम काम हुआ

बिहार में कुल 38 ज़िले हैं, लेकिन 5 नवंबर तक 13 ज़िलों में 50% से भी कम काम हुआ है, जैसा कि जल शक्ति मंत्रालय की वेबसाइट बताती है। सबसे कम काम अररिया ज़िले में हुआ जहां 627,766 घरों में से 216,077 घरों तक ही नल का जल पहुंच सका है, जो कि लक्ष्य का 34.42% है। इसी तरह जमुई ज़िले में 397,089 घरों तक नल जल योजना पहुंचाने का लक्ष्य था, लेकिन अभी तक 37.90% घरों तक नल का जल पहुंचा है। 

राज्य के 23 ज़िलों में 50% से ज़्यादा लेकिन 75% से कम काम हुआ है। सारण में 620,575 घरों में से 74.54% घरों तक नल का जल पहुंचा है, जल शक्ति मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार। राज्य के केवल दो ज़िलों पश्चिम चम्पारण और अरवल में 75% से ज़्यादा काम हुआ है। पश्चिम चम्पारण में 77.91%, अरवल में 80.62% घरों तक नल का जल पहुंचाया गया है। 

‘नहीं मिल रहा साफ़ पानी’  

नल-जल योजना में बिहार के आर्सेनिक और फ़्लोराइड प्रभावित 2,120 बसाहटों को शामिल किया गया था। “5 नवंबर तक आर्सेनिक से प्रभावित 1,009 बसाहटों और फ़्लोराइड से प्रभावित 985 बसाहटों तक नल से शुद्ध पेयजल पहुंचाया जा सका है और 126 बसाहटों में काम चल रहा है”, जल शक्ति मंत्रालय की वेबसाइट कहती है।

बच्चों के दांतों में दिख रहे कत्थई दाग़ शरीर में फ़्लोराइड की मौजूदगी के लक्षण हैं। फ़ोटो: उमेश कुमार राय

भोजपुर ज़िले में 50 बसाहटों की पहचान की गई थी, जहां भूगर्भ जल में आर्सेनिक की मात्रा सामान्य से ज़्यादा थी। मंत्रालय के मुताबिक़, भोजपुर की सभी बसाहटों तक पाइप के जरिए साफ पानी पहुंचाया जा चुका है। 

लेकिन, इस ज़िले के आर्सेनिक प्रभावित गांव सिमरिया ओझा पट्टी के कई घरों में नल जल योजना नहीं पहुंची है। “मेरे वार्ड में 400 वोटर हैं, लेकिन किसी भी घर तक नल का जल नहीं पहुंचा है,” सिमरिया ओझापट्टी के भैंसाटोली के वार्ड मेंबर अशोक राम ने कहा।

  

“कुछ घरों तक नल का जल पहुंचा है, लेकिन नल से जो पानी आ रहा है, उसे सीधे ज़मीन से निकाला जा रहा है और लोगों को सप्लाई की जा रही है। पानी को फ़िल्टर नहीं किया जा रहा है। नल से जल पहुंचाने से भी लोगों को फायदा नहीं हो रहा है,” गांव की मुखिया कंचन देवी ने इंडियास्पेंड को बताया।

इसी तरह गया में 111 बसाहटों की शिनाख़्त की गई थी, जहां आर्सेनिक और फ़्लोराइड की मौजूदगी ज़्यादा थी। मंत्रालय के अनुसार, गया की 108 बसाहटों तक नल से शुद्ध पानी की सप्लाई की जा रही है, मगर इस ज़िले में फ़्लोराइड से बुरी तरह प्रभावित चुड़ामननगर के लोग कुछ और ही कहते हैं।

 

“डेढ़ साल पहले मेरे घर में नल लगा था, लेकिन दो-तीन महीने में ही ख़राब हो गया, तो मैंने अपने खर्च से दोबारा नल लगाया। ज़मीन के नीचे से पानी टंकी में जाता है और वहां से नल तक आता है। पानी को फिल्टर करने की कोई व्यवस्था सरकार की तरफ से नहीं हुई है”, अपने खर्च पर लगाए नल की तरफ से इशारा करते हुए रीना देवी ने इंडियास्पेंड से कहा।

चुड़ामननगर में फ़्लोराइड का असर ज़्यादा है। यहां के बच्चों और नौजवानों में फ़्लोराइड के कारण दांतों और पैर व हाथ की हड्डियों में फ्लोरोसिस साफ़ नज़र आता है।

इस गांव में 10 साल पहले सरकार की तरफ से फ़िल्टर लगाया गया था, लेकिन अब वो बंद पड़ा हुआ है। “गांव में 130 घर हैं। इस फ़िल्टर से कुछ महीने तक पानी की सप्लाई हुई और फिर बंद हो गई। तब से अब तक ये बंद ही पड़ा हुआ है,” स्थानीय निवासी नरेश मंडल ने कहा।

समस्तीपुर में 186 बसाहटों पहचान की गई थी। इनमें से 183 बसाहटें आर्सेनिक और 3 बसाहटें फ़्लोराइड प्रभावित हैं। जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, समस्तीपुर की सभी आर्सेनिक प्रभावित बसाहटों में साफ़ पानी पहुंच गया है। लेकिन ज़िले के आर्सेनिक प्रभावित गांव चापर के लोगों ने बताया कि उन्हें नल से जल अब भी नहीं मिल रहा है।  इसी गांव में रहने वाले 16 साल के गोलू कुमार के हाथ में आर्सेनिकयुक्त पानी पीने से दाग पड़ गये हैं। 

“पिछले 3-4 साल से ये दाग है। घर में नल तो 6 महीने पहले ही लग गया है, लेकिन उससे पानी नहीं आ रहा है, इसलिए चापाकल (हैंडपम्प) से ही पानी पी रहे हैं”, गोलू कुमार ने इंडियास्पेंड से कहा।

मधुबनी में पानी पर काम करने वाले स्वयंसेवी संगठन घोघरडिहा प्रखंड स्वराज्य विकास संघ के अध्यक्ष रमेश कुमार के मुताबिक़, नल जल योजना में खामियां हैं, जिस कारण ये सफ़ल नहीं हो पा रही हैं।

"एक तो नल-जल का काम करने वाले कॉन्ट्रेक्टर और वार्ड सदस्यों के बीच आपसी तालमेल की कमी है और दूसरी बात ये है कि नल-जल का काम जहां भी हो रहा है, उसका बाद में फ़ॉलोअप नहीं किया जा रहा है”, रमेश कुमार ने बताया।

“घोघरडिहा के जहलीपट्टी में पानी में आयरन अधिक है। इस समस्या के समाधान के लिए हमने 6 साल पहले फिल्टर लगाया, जो अब भी चल रहा है। 250 परिवार यहां से पानी पी रहे हैं। ऐसा इसलिए संभव हो पाया कि हम लोग इस पर नियमित निगरानी रखते हैं,” उन्होंने बताया।

बिहार के समस्तीपुर ज़िले के चापर गांव में आर्सेनिक वाला पानी पीने से पैरों में आए जख्म को दिखाता एक व्यक्ति। फ़ोटो: उमेश कुमार राय

हर घर नल का जल योजना में बिहार सरकार के साथ काम करने वाले एक एनजीओ के पदाधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि इस योजना के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि इसमें बिना किसी पूर्व तैयारी के एक लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया है।

“गुणवत्ता प्रभावित 80% इलाकों में काम पूरा हो गया है और बाकी हिस्से में भी जल्द ही पूरा हो जाएगा,” राज्य के लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग के इंजीनियर इन चीफ़ डीएस मिश्रा ने इंडियास्पेंड को बताया।

 

ये पूछे जाने पर कि वेबसाइट में कई इलाकों में काम पूरा बताया जा रहा है, लेकिन लोगों का कहना है कि उन्हें साफ पानी नहीं मिल रहा, उन्होंने कहा, "हो सकता है कि बिजली की सप्लाई नहीं हुई होगी या कोई और वजह होगी।"

नल-जल योजना में गड़बड़ी के आरोप 

जैसा कि हमने आपको ऊपर बताया कि बिहार में चल रही नल-जल योजना में गड़बड़ी की शिकायत अक्सर आती रहती है।

 

नवादा ज़िले के नारदीगंज ब्लॉक की हड़िया पंचायत के दलेलपुर गांव के लोगों ने इसी साल अगस्त में डीएम व बीडीओ को आवेदन देकर नल-जल योजना में घोटाले का आरोप लगाते हुए जांच की मांग की थी, दैनिक जागरण में 28 अगस्त, 2020, को छपी इस ख़बर में बताया गया।

इसी तरह, न्यूज़18 की इस ख़बर में बताया गया है कि साल 2018 में पटना ज़िले के बाढ़ इलाके में नल-जल योजना में कथित तौर पर गड़बड़ी को लेकर थाने में एक शिकायत दर्ज की गई थी।

ज़ी न्यूज़ की एक ख़बर बताती है कि पिछले साल नवंबर में दरभंगा ज़िले के सिंहवाड़ा ब्लाक के बीडीओ ने नल-जल योजना के 12.69 लाख रुपए गबन करने के आरोप लगाते हुए वार्ड सदस्य और सचिव के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।

पिछले हफ़्ते आयकर विभाग ने नल-जल योजना का काम करने वाले पटना, भागलपुर, कटिहार और गया के एक दर्जन ठेकेदारों की जांच की थी। इनमें से दो कंस्ट्रक्शन कंपनियों के तीन पदाधिकारियों के पास से लगभग 3 करोड़ रुपए बरामद किए गए थे, दैनिक भास्कर की इस ख़बर में बताया गया है।

गया ज़िले के चुड़ामननगर में रहने वाली रीना देवी का कहना है कि डेढ़ साल उनके घर में सरकारी नल लगा था, लेकिन दो-तीन महीने में ही ख़राब हो गया। उन्होंने अपने खर्च से दोबारा नल लगाया। फ़ोटो: उमेश कुमार राय

बिहार में क्यों ज़रूरी है नल का जल

बिहार की अधिकांश जनता पीने के पानी के लिए ग्राउंडवाटर पर निर्भर है। राज्य के तमाम ज़िलों के ग्राउंडवाटर में आर्सेनिक, फ़्लोराइड, आयरन और नाइट्रेट की मात्रा तय सीमा से काफ़ी अधिक है जिससे राज्य के कई इलाक़ों में इससे बीमारियां फैली हुई हैं। राज्य के 22 ज़िलों के ग्राउंडवाटर में आर्सेनिक, 19 ज़िलों के ग्राउंडवाटर में आयरन, 13 ज़िलों के ग्राउंडवाटर में फ़्लोराइड और 10 ज़िलों के ग्राउंडवाटर में नाइट्रेट की मात्रा तय मानक से काफ़ी ज़्यादा पाई गई है, 22 सितंबर 2020 को लोकसभा में एक सवाल के जवाब में पेश आंकड़ों के अनुसार।

“आर्सेनिक और फ़्लोराइड भूगर्भ के एक्विफर में मौजूद है। जब भूगर्भ जल स्तर नीचे चला जाता है और काफी गहराई से पानी निकाला जाता है, तो ये रसायन पानी के साथ बाहर निकलने लगते हैं,” पटना यूनिवर्सिटी के जूलॉजी विभाग की प्रोफ़ेसर शहला यासमीन ने बताया।

बिहार के ग्राउंडवाटर में आर्सेनिक, फ़्लोराइड, आयरन और नाइट्रेट की मात्रा सीमा से ज़्यादा तो है ही, लेकिन अब एक और नई समस्या आ गई है। 

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ एनवायरमेंटल रिसर्च एंड पब्लिक हेल्थ के इसी साल अप्रैल में छपे एक शोध में बिहार के 10 ज़िलों के भूगर्भ जल में यूरेनियम पाया गया है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पानी में यूरेनियम की स्वीकार्य मात्रा 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर माना है। लेकिन उत्तरी बिहार के सुपौल ज़िले के भूगर्भ जल में 80 माइक्रोग्राम/लीटर यूरेनियम पाया गया है, इस शोध के अनुसार।

“गंगा के दक्षिणी तरफ़ भागलपुर, गोपालगंज, कटिहार, सारण और पटना समेत 10 ज़िलों में यूरेनियम की मौजूदगी मिली है। ये चिंता की बात है,” शोधकर्ताओं में शामिल पटना के महावीर कैंसर संस्थान के डॉ. अरुण कुमार ने बताया। "यूरेनियम सेहत के लिए हानिकारक है और इससे कैंसर हो सकता है," उन्होंने आगे कहा।

 

पानी में आर्सेनिक और आयरन की अधिकता के कारण एक चापाकल (हैंडपम्प) के पास लगा लाल धब्बा। फ़ोटो: उमेश कुमार राय 

“हम लोगों ने शोध के दौरान गांवों की शिनाख्त कर सैंपल नहीं लिया था, इसलिए कहा नहीं जा सकता है कि किन गांवों में यूरेनियम मिला है। मौजूदा शोध को आगे बढ़ाते हुए हम लोग गांवों की शिनाख्त करेंगे और ये भी पता लगाएंगे कि इस पानी का इस्तेमाल करने वाले लोगों में बीमारियां तो नहीं फैल रही हैं,” डॉ अरुण कुमार ने बताया।

बिहार के भूगर्भ जल में यूरेनियम मिलने की वजह के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा, “अभी इसका पता नहीं चल सका है। लेकिन,1965 में रिमोट सेंसिंग डिवाइस लगाने के लिए नंदा देवी पर्वत श्रृंखला पर प्लूटोनियम ले जाया गया था, जिसे मौसम खराब होने के कारण बीच रास्ते में छोड़ दिया था। बाद में जब टीम वहां पहुंची, तो प्लूटोनियम वहां नहीं था। आशंका है ये प्लूटोनियम रिस कर गंगा नदी में मिल गया है और नदी के रास्ते बिहार पहुंच गया है।”

लेकिन पानी और पर्यावरण के मुद्दों पर काम करने वाले रणजीव बिहार के दूषित ग्राउंडवाटर से निपटने के लिए बनी इस पूरी नल-जल योजना पर ही सवाल खड़े करते हैं और इसके समाधान के लिए पुराने पानी के स्रोतों पर वापस जाने का सुझाव देते हैं।

"इसी तरह की एक स्कीम सत्तर के दशक में सहरसा में शुरू हुई थी, जिसका उद्देश्य आयरन फ्री पानी की सप्लाई करना था। ये स्कीम बुरी तरह फ़्लॉप हो गई थी," रणजीव ने बताया।

"आर्सेनिक और फ़्लोराइड युक्त पानी को फ़िल्टर करना खर्चीला और अव्यावहारिक है क्योंकि हमारे यहां नल से पानी लेने की परंपरा नहीं रही है। हम सदियों से तालाब और कुओं का इस्तेमाल करते रहे थे। इसलिए सरकार को नल-जल जैसी योजना लागू करने की जगह पुराने तालाब और कुओं का जीर्णोद्धार और नए कुएं और तालाब तैयार करने चाहिए, क्योंकि उसका पानी प्राकृतिक तौर पर आर्सेनिक और फ़्लोराइड फ्री होता है," रणजीव ने कहा।

(उमेश, पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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पटना: बिहार में पहले चरण के मतदान के ख़त्म होने के दो दिन बाद, 30 अक्टूबर को इनकम टैक्स विभाग ने सरकारी विभागों की योजनाओं में काम कर रहे कुछ ठेकेदारों के यहां छापे मारे और बड़ी संख्या में कैश और बेनामी संपत्ति बरामद की। ये ठेकेदार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘हर घर नल का जल’ से जुड़े थे। यह पहली बार नहीं जब इस योजना को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों। इसके बारे में हम आपको विस्तार से आगे बताएंगे।

हर घर तक नल का जल पहुंचाने की बिहार सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना का मुख्य लक्ष्य वित्त वर्ष 2019-20 के अंत तक बिहार के 1.95 करोड़ घरों तक पीने का साफ़ पानी पहुंचाना था ताकि लोगों को हैंडपंप और अन्य जल स्रोतों पर निर्भर न रहना पड़े। योजना में आर्सेनिक, आयरन और फ़्लोराइड से प्रभावित आबादी पर ज़्यादा जोर दिया गया था।

 

आर्सेनिक, आयरन और फ़्लोराइड प्रभावित क्षेत्रों में प्यूरीफ़ाइड पानी सप्लाई की जानी थी, लेकिन कई इलाकों में अब तक ये योजना पहुंची नहीं है। जिन इलाकों में नल पहुचा है वहां पानी नहीं पहुंचा, जहां पानी पहुंच गया वहां ज़मीन के नीचे से पानी बिना ट्रीट किये सीधे पाइप के ज़रिए लोगों के घरों तक पहुंचाया जा रहा है। इससे प्रभावित लोगों को कोई फायदा नहीं हो रहा है। इस योजना का काम धीमी गति से चल रहा है और अब तक 60% से भी कम काम हुआ है।

 

सुस्त रफ़्तार से चल रही है हर घर नल का जल योजना

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सात निश्चय के तहत हर घर नल का योजना के तहत हर घर तक नल से पानी पहुंचाने का काम 27 सितंबर 2016 से शुरू किया था। इस योजना को पूरा करने का लक्ष्य 31 मार्च 2020 तय किया गया था। इसमें तीन योजनाओं को शामिल किया गया था, जिनके ज़रिए ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के 97,280 वार्डों तक नल से पीने का साफ़ पानी पहुंचाना था। 

नाली-गली और नल जल योजना के लिए राज्य सरकार ने 37,070 करोड़ रुपए का बजट रखा था। इस योजना की रफ़्तार इतनी सुस्त है कि सरकार को बार-बार इसका लक्ष्य आगे बढ़ाना पड़ रहा है।

“बिहार में लोगों को शुद्ध पेयजल की सुविधा वर्ष 2020 के अंत तक मिल जाएगी,” 28 अगस्त 2020 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि अभी तक लक्ष्य का 56.28% काम ही पूरा हो पाया है।

बिहार के कुल 19,570,949 घरों में से 5 नवंबर 2020 तक 11,014,544 घरों तक ही नल से जल पहुंचा है, जलशक्ति मंत्रालय की वेबसाइट पर 5 नवंबर को मौजूद आंकड़ों के अनुसार।

इस योजना का हाल ये है कि या तो ज़्यादातर घरों तक नल ही नहीं पहुंचा और नल पहुंचा है तो उसमें जल नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने इस योजना को लेकर एक वीडियो 31 अक्टूबर को अपने ट्विटर हैंडल पर साझा किया।

13 ज़िलों में 50% से भी कम काम हुआ

बिहार में कुल 38 ज़िले हैं, लेकिन 5 नवंबर तक 13 ज़िलों में 50% से भी कम काम हुआ है, जैसा कि जल शक्ति मंत्रालय की वेबसाइट बताती है। सबसे कम काम अररिया ज़िले में हुआ जहां 627,766 घरों में से 216,077 घरों तक ही नल का जल पहुंच सका है, जो कि लक्ष्य का 34.42% है। इसी तरह जमुई ज़िले में 397,089 घरों तक नल जल योजना पहुंचाने का लक्ष्य था, लेकिन अभी तक 37.90% घरों तक नल का जल पहुंचा है। 

राज्य के 23 ज़िलों में 50% से ज़्यादा लेकिन 75% से कम काम हुआ है। सारण में 620,575 घरों में से 74.54% घरों तक नल का जल पहुंचा है, जल शक्ति मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार। राज्य के केवल दो ज़िलों पश्चिम चम्पारण और अरवल में 75% से ज़्यादा काम हुआ है। पश्चिम चम्पारण में 77.91%, अरवल में 80.62% घरों तक नल का जल पहुंचाया गया है। 

‘नहीं मिल रहा साफ़ पानी’  

नल-जल योजना में बिहार के आर्सेनिक और फ़्लोराइड प्रभावित 2,120 बसाहटों को शामिल किया गया था। “5 नवंबर तक आर्सेनिक से प्रभावित 1,009 बसाहटों और फ़्लोराइड से प्रभावित 985 बसाहटों तक नल से शुद्ध पेयजल पहुंचाया जा सका है और 126 बसाहटों में काम चल रहा है”, जल शक्ति मंत्रालय की वेबसाइट कहती है।

बच्चों के दांतों में दिख रहे कत्थई दाग़ शरीर में फ़्लोराइड की मौजूदगी के लक्षण हैं। फ़ोटो: उमेश कुमार राय

भोजपुर ज़िले में 50 बसाहटों की पहचान की गई थी, जहां भूगर्भ जल में आर्सेनिक की मात्रा सामान्य से ज़्यादा थी। मंत्रालय के मुताबिक़, भोजपुर की सभी बसाहटों तक पाइप के जरिए साफ पानी पहुंचाया जा चुका है। 

लेकिन, इस ज़िले के आर्सेनिक प्रभावित गांव सिमरिया ओझा पट्टी के कई घरों में नल जल योजना नहीं पहुंची है। “मेरे वार्ड में 400 वोटर हैं, लेकिन किसी भी घर तक नल का जल नहीं पहुंचा है,” सिमरिया ओझापट्टी के भैंसाटोली के वार्ड मेंबर अशोक राम ने कहा।

  

“कुछ घरों तक नल का जल पहुंचा है, लेकिन नल से जो पानी आ रहा है, उसे सीधे ज़मीन से निकाला जा रहा है और लोगों को सप्लाई की जा रही है। पानी को फ़िल्टर नहीं किया जा रहा है। नल से जल पहुंचाने से भी लोगों को फायदा नहीं हो रहा है,” गांव की मुखिया कंचन देवी ने इंडियास्पेंड को बताया।

इसी तरह गया में 111 बसाहटों की शिनाख़्त की गई थी, जहां आर्सेनिक और फ़्लोराइड की मौजूदगी ज़्यादा थी। मंत्रालय के अनुसार, गया की 108 बसाहटों तक नल से शुद्ध पानी की सप्लाई की जा रही है, मगर इस ज़िले में फ़्लोराइड से बुरी तरह प्रभावित चुड़ामननगर के लोग कुछ और ही कहते हैं।

 

“डेढ़ साल पहले मेरे घर में नल लगा था, लेकिन दो-तीन महीने में ही ख़राब हो गया, तो मैंने अपने खर्च से दोबारा नल लगाया। ज़मीन के नीचे से पानी टंकी में जाता है और वहां से नल तक आता है। पानी को फिल्टर करने की कोई व्यवस्था सरकार की तरफ से नहीं हुई है”, अपने खर्च पर लगाए नल की तरफ से इशारा करते हुए रीना देवी ने इंडियास्पेंड से कहा।

चुड़ामननगर में फ़्लोराइड का असर ज़्यादा है। यहां के बच्चों और नौजवानों में फ़्लोराइड के कारण दांतों और पैर व हाथ की हड्डियों में फ्लोरोसिस साफ़ नज़र आता है।

इस गांव में 10 साल पहले सरकार की तरफ से फ़िल्टर लगाया गया था, लेकिन अब वो बंद पड़ा हुआ है। “गांव में 130 घर हैं। इस फ़िल्टर से कुछ महीने तक पानी की सप्लाई हुई और फिर बंद हो गई। तब से अब तक ये बंद ही पड़ा हुआ है,” स्थानीय निवासी नरेश मंडल ने कहा।

समस्तीपुर में 186 बसाहटों पहचान की गई थी। इनमें से 183 बसाहटें आर्सेनिक और 3 बसाहटें फ़्लोराइड प्रभावित हैं। जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, समस्तीपुर की सभी आर्सेनिक प्रभावित बसाहटों में साफ़ पानी पहुंच गया है। लेकिन ज़िले के आर्सेनिक प्रभावित गांव चापर के लोगों ने बताया कि उन्हें नल से जल अब भी नहीं मिल रहा है।  इसी गांव में रहने वाले 16 साल के गोलू कुमार के हाथ में आर्सेनिकयुक्त पानी पीने से दाग पड़ गये हैं। 

“पिछले 3-4 साल से ये दाग है। घर में नल तो 6 महीने पहले ही लग गया है, लेकिन उससे पानी नहीं आ रहा है, इसलिए चापाकल (हैंडपम्प) से ही पानी पी रहे हैं”, गोलू कुमार ने इंडियास्पेंड से कहा।

मधुबनी में पानी पर काम करने वाले स्वयंसेवी संगठन घोघरडिहा प्रखंड स्वराज्य विकास संघ के अध्यक्ष रमेश कुमार के मुताबिक़, नल जल योजना में खामियां हैं, जिस कारण ये सफ़ल नहीं हो पा रही हैं।

"एक तो नल-जल का काम करने वाले कॉन्ट्रेक्टर और वार्ड सदस्यों के बीच आपसी तालमेल की कमी है और दूसरी बात ये है कि नल-जल का काम जहां भी हो रहा है, उसका बाद में फ़ॉलोअप नहीं किया जा रहा है”, रमेश कुमार ने बताया।

“घोघरडिहा के जहलीपट्टी में पानी में आयरन अधिक है। इस समस्या के समाधान के लिए हमने 6 साल पहले फिल्टर लगाया, जो अब भी चल रहा है। 250 परिवार यहां से पानी पी रहे हैं। ऐसा इसलिए संभव हो पाया कि हम लोग इस पर नियमित निगरानी रखते हैं,” उन्होंने बताया।

बिहार के समस्तीपुर ज़िले के चापर गांव में आर्सेनिक वाला पानी पीने से पैरों में आए जख्म को दिखाता एक व्यक्ति। फ़ोटो: उमेश कुमार राय

हर घर नल का जल योजना में बिहार सरकार के साथ काम करने वाले एक एनजीओ के पदाधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि इस योजना के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि इसमें बिना किसी पूर्व तैयारी के एक लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया है।

“गुणवत्ता प्रभावित 80% इलाकों में काम पूरा हो गया है और बाकी हिस्से में भी जल्द ही पूरा हो जाएगा,” राज्य के लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग के इंजीनियर इन चीफ़ डीएस मिश्रा ने इंडियास्पेंड को बताया।

 

ये पूछे जाने पर कि वेबसाइट में कई इलाकों में काम पूरा बताया जा रहा है, लेकिन लोगों का कहना है कि उन्हें साफ पानी नहीं मिल रहा, उन्होंने कहा, "हो सकता है कि बिजली की सप्लाई नहीं हुई होगी या कोई और वजह होगी।"

नल-जल योजना में गड़बड़ी के आरोप 

जैसा कि हमने आपको ऊपर बताया कि बिहार में चल रही नल-जल योजना में गड़बड़ी की शिकायत अक्सर आती रहती है।

 

नवादा ज़िले के नारदीगंज ब्लॉक की हड़िया पंचायत के दलेलपुर गांव के लोगों ने इसी साल अगस्त में डीएम व बीडीओ को आवेदन देकर नल-जल योजना में घोटाले का आरोप लगाते हुए जांच की मांग की थी, दैनिक जागरण में 28 अगस्त, 2020, को छपी इस ख़बर में बताया गया।

इसी तरह, न्यूज़18 की इस ख़बर में बताया गया है कि साल 2018 में पटना ज़िले के बाढ़ इलाके में नल-जल योजना में कथित तौर पर गड़बड़ी को लेकर थाने में एक शिकायत दर्ज की गई थी।

ज़ी न्यूज़ की एक ख़बर बताती है कि पिछले साल नवंबर में दरभंगा ज़िले के सिंहवाड़ा ब्लाक के बीडीओ ने नल-जल योजना के 12.69 लाख रुपए गबन करने के आरोप लगाते हुए वार्ड सदस्य और सचिव के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।

पिछले हफ़्ते आयकर विभाग ने नल-जल योजना का काम करने वाले पटना, भागलपुर, कटिहार और गया के एक दर्जन ठेकेदारों की जांच की थी। इनमें से दो कंस्ट्रक्शन कंपनियों के तीन पदाधिकारियों के पास से लगभग 3 करोड़ रुपए बरामद किए गए थे, दैनिक भास्कर की इस ख़बर में बताया गया है।

गया ज़िले के चुड़ामननगर में रहने वाली रीना देवी का कहना है कि डेढ़ साल उनके घर में सरकारी नल लगा था, लेकिन दो-तीन महीने में ही ख़राब हो गया। उन्होंने अपने खर्च से दोबारा नल लगाया। फ़ोटो: उमेश कुमार राय

बिहार में क्यों ज़रूरी है नल का जल

बिहार की अधिकांश जनता पीने के पानी के लिए ग्राउंडवाटर पर निर्भर है। राज्य के तमाम ज़िलों के ग्राउंडवाटर में आर्सेनिक, फ़्लोराइड, आयरन और नाइट्रेट की मात्रा तय सीमा से काफ़ी अधिक है जिससे राज्य के कई इलाक़ों में इससे बीमारियां फैली हुई हैं। राज्य के 22 ज़िलों के ग्राउंडवाटर में आर्सेनिक, 19 ज़िलों के ग्राउंडवाटर में आयरन, 13 ज़िलों के ग्राउंडवाटर में फ़्लोराइड और 10 ज़िलों के ग्राउंडवाटर में नाइट्रेट की मात्रा तय मानक से काफ़ी ज़्यादा पाई गई है, 22 सितंबर 2020 को लोकसभा में एक सवाल के जवाब में पेश आंकड़ों के अनुसार।

“आर्सेनिक और फ़्लोराइड भूगर्भ के एक्विफर में मौजूद है। जब भूगर्भ जल स्तर नीचे चला जाता है और काफी गहराई से पानी निकाला जाता है, तो ये रसायन पानी के साथ बाहर निकलने लगते हैं,” पटना यूनिवर्सिटी के जूलॉजी विभाग की प्रोफ़ेसर शहला यासमीन ने बताया।

बिहार के ग्राउंडवाटर में आर्सेनिक, फ़्लोराइड, आयरन और नाइट्रेट की मात्रा सीमा से ज़्यादा तो है ही, लेकिन अब एक और नई समस्या आ गई है। 

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ एनवायरमेंटल रिसर्च एंड पब्लिक हेल्थ के इसी साल अप्रैल में छपे एक शोध में बिहार के 10 ज़िलों के भूगर्भ जल में यूरेनियम पाया गया है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पानी में यूरेनियम की स्वीकार्य मात्रा 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर माना है। लेकिन उत्तरी बिहार के सुपौल ज़िले के भूगर्भ जल में 80 माइक्रोग्राम/लीटर यूरेनियम पाया गया है, इस शोध के अनुसार।

“गंगा के दक्षिणी तरफ़ भागलपुर, गोपालगंज, कटिहार, सारण और पटना समेत 10 ज़िलों में यूरेनियम की मौजूदगी मिली है। ये चिंता की बात है,” शोधकर्ताओं में शामिल पटना के महावीर कैंसर संस्थान के डॉ. अरुण कुमार ने बताया। "यूरेनियम सेहत के लिए हानिकारक है और इससे कैंसर हो सकता है," उन्होंने आगे कहा।

 

पानी में आर्सेनिक और आयरन की अधिकता के कारण एक चापाकल (हैंडपम्प) के पास लगा लाल धब्बा। फ़ोटो: उमेश कुमार राय 

“हम लोगों ने शोध के दौरान गांवों की शिनाख्त कर सैंपल नहीं लिया था, इसलिए कहा नहीं जा सकता है कि किन गांवों में यूरेनियम मिला है। मौजूदा शोध को आगे बढ़ाते हुए हम लोग गांवों की शिनाख्त करेंगे और ये भी पता लगाएंगे कि इस पानी का इस्तेमाल करने वाले लोगों में बीमारियां तो नहीं फैल रही हैं,” डॉ अरुण कुमार ने बताया।

बिहार के भूगर्भ जल में यूरेनियम मिलने की वजह के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा, “अभी इसका पता नहीं चल सका है। लेकिन,1965 में रिमोट सेंसिंग डिवाइस लगाने के लिए नंदा देवी पर्वत श्रृंखला पर प्लूटोनियम ले जाया गया था, जिसे मौसम खराब होने के कारण बीच रास्ते में छोड़ दिया था। बाद में जब टीम वहां पहुंची, तो प्लूटोनियम वहां नहीं था। आशंका है ये प्लूटोनियम रिस कर गंगा नदी में मिल गया है और नदी के रास्ते बिहार पहुंच गया है।”

लेकिन पानी और पर्यावरण के मुद्दों पर काम करने वाले रणजीव बिहार के दूषित ग्राउंडवाटर से निपटने के लिए बनी इस पूरी नल-जल योजना पर ही सवाल खड़े करते हैं और इसके समाधान के लिए पुराने पानी के स्रोतों पर वापस जाने का सुझाव देते हैं।

"इसी तरह की एक स्कीम सत्तर के दशक में सहरसा में शुरू हुई थी, जिसका उद्देश्य आयरन फ्री पानी की सप्लाई करना था। ये स्कीम बुरी तरह फ़्लॉप हो गई थी," रणजीव ने बताया।

"आर्सेनिक और फ़्लोराइड युक्त पानी को फ़िल्टर करना खर्चीला और अव्यावहारिक है क्योंकि हमारे यहां नल से पानी लेने की परंपरा नहीं रही है। हम सदियों से तालाब और कुओं का इस्तेमाल करते रहे थे। इसलिए सरकार को नल-जल जैसी योजना लागू करने की जगह पुराने तालाब और कुओं का जीर्णोद्धार और नए कुएं और तालाब तैयार करने चाहिए, क्योंकि उसका पानी प्राकृतिक तौर पर आर्सेनिक और फ़्लोराइड फ्री होता है," रणजीव ने कहा।

(उमेश, पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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