भारत में परिवार नियोजन में पुरुषों की भागीदारी बढ़ाने की ज़रूरत

नई दिल्ली, लखनऊ: “शरीर हमारा है सारे कष्ट भी हमें ही झेलने पड़ते हैं। इसलिए हम ही ध्यान रखते हैं, गोली (गर्भनिरोधक) खाते रहते हैं। ज़रा सी लापरवाही हुई और बच्चा रह गया तो और झंझट होगा। आदमियों को कहां इस सबसे इतना मतलब रहता है,” परिवार नियोजन के बारे में बात करते हुए बारांबकी ज़िले के बरौली गांव की सीमा देवी (36 साल) ने कहा।

सीमा के पहले से दो बच्चे हैं और अब वो तीसरा बच्चा नहीं चाहती है। लेकिन इस बात का ध्यान रखने की ज़िम्मेदारी भी सिर्फ़ उसकी ही है। सीमा के पति को इससे कोई मतलब नहीं है।

  

सीमा का मामला उदाहरण है इस बात का कि देश में आज भी परिवार नियोजन की ज़िम्मेदारी आमतौर पर महिलाओं के ऊपर है।

भारत के ज़्यादातर परिवार नियोजन कार्यक्रम महिलाओं पर ही केंद्रित हैं, ऐसा इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऑन वीमेन (आईसीआरडबल्यू) के हालिया अध्ययन में सामने आया है। ये अध्ययन उत्तर प्रदेश और बिहार के 6 इलाक़ों में किय गया। इस अध्ययन का मक़सद परिवार नियोजन में पुरुषों की भागीदारी को कम करने वाली बाधाओं को समझना था।

    

किसी भी परिवार में परिवार नियोजन को लेकर किए जाने वाले फ़ैसले का अधिकार परिवारों में उम्र, लिंग और मालिकाना हक़ रखने वालाें के पास ही होता है जो ज़्यादातर घरों में पुरुषों का है। “आदमी ही ये फ़ैसला लेता है कि उसे कितने बच्चे चाहिए और कब चाहिए। यानि परिवार नियोजन जैसा मुद्दा जिसमें पति-पत्नी दोनों को बराबर शामिल होना चाहिए वो समाजिक और लैंगिक मानदंडों के बीच कहीं फंस कर रह गया है,” ग़ैर सरकारी संस्था आईसीआरडब्ल्यू की तकनीक सलाहकार. कुहलिका सेठ ने बताया। 

आईसीआरडब्ल्यू के हालिया अध्ययन के मुताबिक़ अभी जितने भी स्वास्थ्य से जुड़े और सामाजिक कार्यक्रम होते हैं उसमें महिलाओं को ही ज़्यादा से ज़्यादा गर्भनिरोधक तरीकों की जानकारी दी जाती है, इसमें पुरुष पीछे छूट जाते हैं जबकि ये उनकी भी ज़िम्मेदारी होती है। 

पुरुषों में परिवार नियोजन की विधियों का इस्तेमाल भारत में बहुत कम होता है। देश के हर आठ में से तीन पुरुषों को लगता है कि परिवार नियोजन महिलाओं की ज़िम्मेदारी है उन्हें इसके बारे में चिंता नहीं करनी चाहिए। लगभग 20% पुरुष मानते हैं कि जो महिलाएं गर्भनिरोधक को इस्तेमाल करने का फ़ैसला ख़ुद से करती हैं, उनका चाल चलन ठीक नहीं है या उनके अनेक पुरुषों के साथ संबंध हैं, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के चौथे दौरे (2015-16) के आंकड़ों के अनुसार। 

इसलिए जब भी पुरुष परिवार नियोजन को अपनाने का फ़ैसला करता है तो उससे जुड़े तरीकों का इस्तेमाल महिलाओं को ही करना पड़ता है। 15 से 49 साल के बीच के भारतीय दंपतियों के बीच महिला नसबंदी कराना ही सबसे आम तरीका रह गया है, 36% जोड़ों ने इस तरीके को अपनाया जबकि 0.3% जोड़ों ने पुरुष नसबंदी को चुना, एनएफ़एचएस-4 के अनुसार। साल 2005-06 के बीच पुरुष नसबंदी में की दर में 1.0 से 0.3 फ़ीसदी की गिरावट भी दर्ज हुई। 

परिवार नियोजन में पुरुषों की भागीदारी बढ़ने के लिए ज़रूरी है कि पति-पत्नी आपस में बात करें और ऐसे सामुदायिक स्थान बनाए जाए जहां लोग मिलकर परिवार नियोजन से जुड़ी भ्रांतियों के बारे में बात कर सकें, अध्ययन ने ऐसा सुझाव दिया है। 

परिवार नियोजन में पुरुषों की कम भागीदारी

ज़्यादातर परिवार नियोजन अभियान महिला और परिवार पर केंद्रित होते हैं लेकिन उनमें युवाओं को छोड़ दिया जाता है, जैसा कि हमने बताया। ”अभी भी ऐसे परिवार नियोजन अभियान कम हैं जो पुरुष केंद्रित हों। पुरुषों के द्वारा इस्तेमाल होने वाले परिवार नियोजन के विकल्पों की भी कमी है, ये दोनों ही कारण उनके परिवार नियोजन कार्यक्रमों का हिस्सा नहीं बन पाने में सबसे बड़ी रुकावट हैं,” फ़ाउंडेशन ऑफ़ रिप्रोडक्टिव हेल्थ सर्विसेज़ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी वी एस चंद्रशेखर ने कहा। 

बिहार में 2017 में में हुए इंडियास्पेंड के एक सर्वे में सामने आया था कि 90% से ज़्यादा महिलाओं ने अपने पतियों से परिवार नियोजन के बारे में बात की लेकिन उनमें से महज़ 18% महिलाएं ही अंतिम फैसला लेने की स्थिति तक पहुंच पाईं। बिहार देश में सबसे ज़्यादा प्रजनन दर वाले राज्यों में एक है। 

ग़ैर सरकारी संस्था इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऑन वीमेन और यूनाइटेड नेशन्स पॉपुलेशन फ़ंड के एक संयुक्त अध्ययन के दौरान 54% से ज़्यादा पुरुषों ने कहा था कि उनकी पत्नियां उनकी इजाज़त के बिना परिवार नियाेजन के तरीकों का इस्तेमाल नहीं करती हैं। इनमें से ⅕ का मानना था कि ये महिलाओं की ज़िम्मेदारी है कि उन्हें अनचाहे गर्भ के लिए क्या करना है। इस बात की तस्दीक 31% महिलाओं ने भी की।  इस अध्ययन में 18-49 साल के 9,205 पुरुषों व 3,158 महिलाओं को शामिल किया गया था। ये अध्ययन देश के सात राज्यों – उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, ओडिशा, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र – में कराया गया था।  

 

ज़्यादातर गर्भनिरोधन के नए तरीके भी महिलाओं के लिए ही हैं जैसे कि इंट्रा-यूटेराइन गर्भनिरोधक उपकरण (जैसे कॉपर-टी) महिलाओं के लिए ही है जबकि पुरुषों के पास सिर्फ दो ही साधन हैं नसबंदी और कंडोम। इन्हें भी कम ही प्रोत्साहित किया जाता है, चंद्रशेखर ने बताया।

  

“60 और 70 के दशक में पुरुष नसंबदी गर्भनिरोधन का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला तरीका था। लेकिन दो वजहों से इसमें बदलाव आया। इमरजेंसी के दौरान इसकी अधिकता (1975 में आपातकाल के दौरान जबरन नसबंदी ने नागरिक स्वतंत्रता अधिकारों को खत्म कर दिया था। सरकार बिना उनकी मर्ज़ी जाने पुरुषों की जबरन नसबंदी करा रही थी) और महिलाओं के लिए नसबंदी का लैप्रोस्कोपिक तरीका। इन दोनों ही कारणों का नतीजा था कि परिवार नियोजन की ज़िम्मेदारी बाद में महिलाओं के कंधों पर आ गई और दोबारा इसे बदलने के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाया गया,” चंद्रशेखर ने इंडियास्पेंड को विस्तार से बताते हुए कहा। 

आईसीआरडबल्यू के अध्ययन के अनुसार किसी भी रिश्ते में ज़्यादा प्रभाव किसका है और ज़्यादा जानकारी किसके पास है ये दो पहलू तय करते हैं कि गर्भनिरोधक का इस्तेमाल किया जाएगा या नहीं।

पुरुषों से बात करने में संकोच

“हम परिवार नियोजन के बारे में घर की महिलाओं से ही बात करते हैं आदमियों से क्या कहें। हमें संकोच भी होता है,” लखनऊ ज़िले के गोसाईंगंज ब्लॉक की आशा बहू शिवदेवी (53) ने कहा। शिवदेवी 15 साल से दो गांवों की ज़िम्मेदारी निभा रही हैं, और इतने समय में इनके सामने एक भी पुरुष ने नसबंदी नहीं करवाई है। 

देश में परिवार नियोजन के प्रचार-प्रसार की ज़िम्मेदारी ज्यादातर महिला हेल्थ वर्कर्स जैसे आशा बहू, एएनएम और आंगनबाड़ी पर है। वो महिलाओं से ही बात करने में ख़ुद को सहज महसूस करती हैं। पुरुषों को ये जानकारी दूसरे किसी अनौपचारिक स्रोत से ही पता चलती है।  

“पुरुषों में परिवार नियोजन के तरीकों को बढ़ावा देने के लिए संसाधन अपर्याप्त हैं।  पितृसत्ता की वजह से पुरुषों में ये बदलाव लाना और भी मुश्किल हो जाता है जिसके लिए सामान्य से ज़्यादा संसाधनों की ज़रूरत पड़ती है, पर ये संसाधन उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं,” चंद्रशेखर ने कहा। 

 

राष्ट्रीय परिवार सर्वेक्षण-4 के दौरान लगभग 61% पुरुषों ने ये माना था कि कंडोम का इस्तेमाल गर्भनिरोध का एक सुरक्षित तरीका है। एक चौथाई पुरुषों ने बताया था कि इसकी वजह से कई बार अनचाही प्रेग्नेंसी नहीं हुई है। 

“हम अपने ही गांव के पुरुषों से कंडोम और नसबंदी के बारे में कैसे बात करें आखिर हम भी औरत हैं। हमें उनसे दूरी बनाकर ही बात करनी पड़ती है,” शिवदेवी ने कहा। हम जब महिलाओं से गर्भनिरोधन के तरीकों को इस्तेमाल करने के बारे में बात करते हैं तो उनके पतियों को लगता है कि हम उन्हें कोई गलत पट्टी पढ़ा (बहका) रहे हैं, उन्होंने आगे कहा।

  

“कोई भी पुरुषों से सीधे जाकर परिवार नियोजन जैसे मुद्दे पर बात नहीं करता या उन्हें ये नहीं समझाता कि नसबंदी के बाद कोई भी परेशानी नहीं आती। अगर स्वास्थ्यकर्मी पुरुषों तक भी पहुंचते तो इन योजनाओं का सकारात्मक प्रभाव ज़रूर देखने को मिलता,” चंद्रशेखर ने कहा। 

 

ज्यादातर संसाधन महिलाओं पर केंद्रित

पापुलेशन फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया के 2019 के एक अध्ययन के अनुसार, महिला नसबंदी की दर ज़्यादा इसलिए भी है क्योंकि परिवार नियोजन के लिए आने वाला 80 फीसदी फ़ंड  गर्भनिराेधन के टर्मिनल या सर्जिकल तरीकों पर खर्च होता है जो कि महिला नसबंदी है। 

परिवार में सिर्फ पति ही नहीं बल्कि कई बार घर के बुज़ुर्ग भी अपने बेटे-बहू के लिए संतान का फैसला करते हैं। परिवार में सास के होने पर  बहुएं स्वास्थ्य सेवाओं और परिवार नियोजन के तरीकों का इस्तेमाल नहीं कर पाती हैं, इंडियास्पेंड की दिसबंर 2019 की इस रिपोर्ट के अनुसार। 

“हमारे पास जब भी कोई महिला आती है और ये कहती है कि अब कुछ दिन बच्चा नहीं चाहिए कौन सी गोली लें तो इसमें अक्सर पुरुष की भूमिका ग़ायब दिखती है, वो अकेली ही आती है,” लखनऊ ज़िले के गोसाईंगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. शालिनी ने बताया। 

“अगर कोई औरत बच्चा नहीं चाहती तो ये ज़िम्मेदारी अकेले उसकी बन जाती है, पुरुष को इस बात से कोई लेना-देना नहीं है। कई ऐसे केस हैं जिनमें पति बिना पत्नी के सहमति के जबरन संबंध बनाते हैं। ऐसे में वो गर्भनिरोध पर क्या ध्यान देते होंगे अनुमान लगाया जा सकता है,” उन्होंने आगे कहा। 

पुरुषों को मर्दानगी पर प्रहार  लगते हैं गर्भनिरोधक 

हेल्थ मैनेजमेंट इंफ़ॉर्मेशन सिस्टम के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2008 से 2016 तक, आठ साल में भारत में कंडोम के इस्तेमाल में 52% की गिरावट देखी गई। पुरुष नसबंदी में ये गिरावट 73% थी। इसी दरमियान महिलाओं में गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल 100% से भी ज़्यादा बढ़ गया। ये आंकड़े परिवार नियोजन में पुरुषों की घटती भागीदारी की तरफ संकेत देता है। 

“नसबंदी को लेकर तरह-तरह के प्रोग्राम चलाए गए, सरकार की तरफ़ से प्रोत्साहन राशि भी दी गई (पुरूष नसबंदी के लिए महिला नसबंदी से भी ज़्यादा प्रोत्साहन राशि है) लेकिन इसके बावजूद पुरुषों में इसे लेकर अभी तक ग़लत धारणाएं हैं। उन्हें लगता है कि अगर उनके रिश्तेदार और दोस्तों को पता चला तो सब उन पर हंसेंगे। नसबंदी के बाद शायद वो शारीरिक श्रम न कर पाएं। लेकिन ये सब ग़लत है। जानकारी की कमी परिवार नियोजन के कार्यक्रमों में पुरुषों की भागीदारी को कम करती है,” लखनऊ में परिवार नियोजन पर काम कर रही एक ग़ैर सरकारी संस्था गाेविंद वल्लभ पंत ग्राम्य विकास अध्ययन संस्थान के संयोजक, अभिनव पांडे ने बताया। 

“इसे बदलने के लिए बहुत ही कम क़दम उठाए गए, इमरजेंसी के बाद से पुरुषों के बीच परिवार नियोजन की जागरूकता फैलाने की राजनैतिक इच्छा खत्म हो गई है, नेता इसके बारे में बात नहीं करते क्योंकि इन बातों से वोट नहीं मिलते,” चंद्रशेखर ने कहा।

 

भारत में 75.4% विवाहित पुरुष किसी भी गर्भनिरोधक का इस्तेमाल नहीं करते, 73.3% पुरुष पत्नी के साथ और 69.4% अपने पार्टनर के साथ संबंध के दौरान गर्भनिरोधक इस्तेमाल नहीं करते। अविवाहित पुरुषों में ये आंकड़ा 53% है। गर्भनिरोधक का इस्तेमाल सबसे कम ईसाई पुरुषों में है (77%), 75% हिंदू पुरुष ओर 72% मुस्लिम पुरुष किसी भी गर्भनिरोधक का इस्तेमाल नहीं करते, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के आंकड़ों के अनुसार।

“मेरे महीनों तक लगातार समझाने के बाद गांव का एक आदमी नसबंदी के लिए बड़ी मुश्किल से तैयार हुआ था, लेकिन जब तक हम आगे बढ़ते गांव के दूसरे लोगों ने उसे भड़का दिया कि नसबंदी के बाद वो मेहनत वाला कोई काम नहीं कर पाएगा,” आशा बहू सरिता वर्मा ने बताया। सरिता लखनऊ ज़िले के समनापुर गांव की आशा बहू हैं।

 

पितृ सतात्मक समाज की मर्दानगी की परिभाषा पर चल रहे पुरुषों को गर्भनिरोधक का इस्तेमाल, ख़ासकर नसबंदी अपनी मर्दानगी पर एक प्रहार लगता है। उन्हें लगता है कि इससे उनका सेक्स का अनुभव कम हो सकता है। पुरुषों को ये भी लगता है कि नसबंदी उनकी शारीरिक क्षमता कम कर सकती है जिसकी वजह से उनकी आर्थिक उत्पादकता भी कम हो सकती है, इसी वजह से वो इसके बारे में बात करने से भी हिचकिचाते हैं, अध्ययन में कहा गया। 

कॉन्डम के इस्तेमाल के बारे में भी इसी तरह की कई भ्रांतियां जुड़ी हुई हैं जिसमें सम्भोग का कम आनंद महसूस होना सबसे प्रमुख है, अध्ययन ने बताया।

पुरुषों को परिवार नियोजन कार्यक्रम में शामिल करने की जरूरत-

“युवाओं को ये समझाने की ज़रूरत है कि पुरुषों के गर्भ निरोधक, महिलाओं से काफ़ी ज़्यादा आसान और सुरक्षित हैं। पुरुषों से बात करने के लिए ज़्यादा पुरुष स्वास्थकर्मियों की ज़रूरत है,” चंद्रशेखर ने बताया। उन्होंने ये भी कहा कि किशोरों को स्कूल में यौन शिक्षा पढ़ाई जानी चाहिए और इसमें गर्भनिरोधक से जुड़ी जानकारी भी दी जानी चाहिए। इसके साथ ही पुरुषों पर केंद्रित परिवार नियोजन कैम्पेन बनाए जाने चाहिए जिनमें मशहूर हस्तियां भी शामिल हों।

 

“पुरुषों के लिए गर्भनिरोधक के तरीक़े बढ़ाने की ज़रूरत है, ताकि उनके पास चुनने के लिए ज़्यादा विकल्प हों। गर्भनिरोधक जैल (gel) जैसे नए तरीक़े कुछ समय से रिसर्च में हैं लेकिन इन्हें लम्बे समय से मंज़ूरी नहीं मिल पा रही है, इन पर भी तेज़ी से काम होना ज़रूरी है।” चंद्रशेखर ने कहा।

अध्ययन का सुझाव है कि सरकारी नीतियों को सुनिश्चित करना चाहिए कि पति-पत्नी तक ना सिर्फ़ ये जानकारी पहुंचे बल्कि इन नीतियों को इस तरह लागू किया जाए कि ज़मीनी स्तर पर पति-पत्नी इसके बारे में बात करना शुरू कर दें। तभी ये नीतियां गर्भनिरोधक का लम्बे समय तक जागरूक और निरंतर इस्तेमाल सुनिश्चित कर पाएंगी।

(साधिका, इंडियास्पेंड में प्रिंसिपल कॉरोसपॉंडेंट हैं, श्रृंखला, स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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