12 वर्षों में बाघों की आबादी दोगुनी… लेकिन यह अच्छी खबर नहीं!

मुंबई: 29 जुलाई, 2019 को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जारी नए आंकड़ों के अनुसार, पिछले 12 वर्षों से 2018 तक, भारत की बाघों की आबादी 2,967 हो गई है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि असली सफलता बाघ की भौगोलिक सीमा और गैर-संरक्षित जंगलों के प्रबंधन में है, जिसमें भारत का प्रदर्शन ठीक नहीं है।

सरकार के अनुसार, नए आंकड़े, 20 राज्यों में वनवासियों के लिए 381,400 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में किए गए एक सरकारी सर्वेक्षण का हिस्सा है, जो भारत में बाघों की आबादी के लिए घर है।

हिम तेंदुओं और बाघों का अध्ययन करने वाले संरक्षण जीवविज्ञानी रघु चुंडावत ने इंडियास्पेंड को बताया, "जहां तक ​​संख्या का सवाल है, मुझे नहीं लगता कि हमने बड़ी सफलता हासिल की है।" 

उन्होंने कहा, असली सफलता बाघ की भौगोलिक सीमा को प्रबंधित करने में सक्षम होने में होगी। वह आगे कहते हैं, "यदि आप किसी भी संरक्षण-संबंधी रिपोर्ट को पढ़ते हैं, तो गिरावट या विलुप्त होने के पहले लक्षणों में से एक सीमा प्रतिबंध है, जो सीमा वितरण का भौगोलिक नुकसान है।"

उन्होंने कहा कि सफलता तब होगी जब बाघ पूरे भारत में जंगलों पर बाघों का कब्जा होगा, जैसा पहले था।

जब सरकार के निर्णय लेने वालों को वन्यजीवों के विचार और बुनियादी ढांचे, खनन या अन्य औद्योगिक परियोजनाओं के बीच चयन करना होता है, तो टाइगर और अन्य वन्यजीवों के आवास में हमेशा कमी आती है।

मई 2019 में, मोदी सरकार ने 13 रेलवे परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी से मुक्त कर दिया, हालांकि चार परियोजनाएं उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में या तो राष्ट्रीय उद्यान या बाघ अभयारण्य, बाघ गलियारा या वन्यजीव अभयारण्य को बाधित करेंगी। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 27 जुलाई 2019 की रिपोर्ट में बताया है।

चार साल से मई 2018 तक, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार ने 519 बुनियादी ढांचे और औद्योगिक परियोजनाओं को ( कई भारत के पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन करते हुए ) संरक्षित क्षेत्रों में और "पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्र" में मंजूरी दी है और यह पिछली सरकार की तुलना में लगभग दोगुनी दर पर की गई है, जैसा कि हमने अगस्त 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

रॉयल बंगाल टाइगर या पैंथेरा टाइगरिस, जिसे भारतीय उप-प्रजाति कहा जाता है, एक तेज शिकारी होते हैं और इसकी संख्या आमतौर पर भारत के संरक्षित क्षेत्रों के स्वास्थ्य को दर्शाती है। लेकिन 2015 में भारत के लगभग एक चौथाई बाघ संरक्षित क्षेत्रों के बाहर रहते थे। यह एक ऐसी स्थिति है, जो बदतर हो सकती है क्योंकि संरक्षित क्षेत्रों को बुनियादी ढांचे और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए आगे खोला गया था।

यही कारण है कि विशेषज्ञ नए नंबरों से प्रभावित नहीं हैं।

जब प्रोजेक्ट टाइगर को 1973 में लॉन्च किया गया था, तब नौ टाइगर रिजर्व (~ 18,278 वर्ग किमी) थे जो अब बढ़कर 50 टाइगर रिजर्व (~ 72,749 वर्ग किमी) हो गए हैं, जो भारत के भौगोलिक क्षेत्र का 2.2 फीसदी है, जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है।

देश भर में ‘संरक्षित क्षेत्रों’ और ‘कम्यूनिटी रिजर्व ’ की संख्या में वृद्धि हुई है, मोदी ने 29 जुलाई, 2019 को रिपोर्ट के लॉन्च पर कहा था। उन्होंने कहा कि संरक्षित क्षेत्रों की संख्या 2014 में 692 से बढ़कर 2019 में 860 हो गई, और कम्यूनिटी रिजर्व की संख्या भी 2014 में 43 थी, जो अब 100 से अधिक हो गई है।

चूंकि, संरक्षित क्षेत्रों में घुसपैठ किया जाता है, बाघ ने तेजी से मानव संपर्क बनाया है। 27 जुलाई, 2019 को कर्नाटक में एक बाघ को कुचल दिया गया था। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में 24 जुलाई, 2019 को बाघ में पीट-पीट कर मार डाला गया था। और एक अन्य बाघ को महाराष्ट्र में एक राजमार्ग अवरोध पर कूदते हुए देखा गया था - चार-लेन राजमार्ग ने पेंच टाइगर कॉरिडोर के माध्यम से एक सड़क का विस्तार किया था

यह ऐसे समय में है जब संरक्षणवादियों ने चेतावनी दी है कि संरक्षण सिर्फ रिजर्व क्षेत्र तक सीमित नहीं हो सकते हैं।

चुंडावत ने कहा, "गैर-संरक्षित वनों का प्रबंधन करना महत्वपूर्ण है।" “यदि आप बाघ संरक्षण को ऊपरी सीमा तक ले जाना चाहते हैं तो आपको बाहर (संरक्षित क्षेत्रों) देखना होगा।

वर्तमान में, हमारे पास विशेष संरक्षण मॉडल हैं, जो संरक्षित क्षेत्र पर आधारित हैं। जिस क्षण बाघ बाहर जाता है, उसके बारे में कुछ भी करने का कोई जुरिस्डिक्शन नहीं है। यही कारण है कि लिंचिंग के मामले होते हैं, क्योंकि हमने संरक्षित क्षेत्रों के बाहर काम नहीं किया है।”

चुंडावत ने कहा, विलुप्त होने की प्रवृत्ति को उलटने के लिए, नए संरक्षण मॉडल, जो संरक्षित क्षेत्रों के बाहर काम करते हैं, उनकी जरूरत है।वर्तमान मॉडल केवल स्वैच्छिक आधार पर संरक्षित क्षेत्रों के बाहर स्थानीय समुदायों की भागीदारी को देखता है। कोई प्रोत्साहन नहीं है। इसलिए बाघ के प्रति सद्भाव पैदा करने के लिए प्रोत्साहन की आवश्यकता है।

मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा बाघ हैं, 2014 के बाद से 71 फीसदी ज्यादा

नए सर्वेक्षण के अनुसार, मध्यप्रदेश में बाघों की संख्या 526 या देश में अनुमानित संख्या का 18 फीसदी है। इसके बाद कर्नाटक (524) और उत्तराखंड (442) है। इस सर्वेक्षण में बाघों की जनसंख्या का 83 फीसदी शमिल करते हुए व्यक्तिगत बाघों की 2,461 तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया है।

सर्वेक्षण में कहा गया कि बाकी का अनुमान ‘मजबूत स्थानिक रूप से स्पष्ट कैप्चर-रिकैपचर सांख्यिकीय मॉडल’ का उपयोग करते हुए किया गया था। 

13 देशों में बाघ रहते हैं - बंगलादेश, भूटान, कंबोडिया, चीन, भारत, इंडोनेशिया, लाओ पीडीआर, मलेशिया, म्यांमार, नेपाल, रूस, थाईलैंड और वियतनाम। 2010 में, इन देशों ने 2022 तक बाघों की संख्या को दोगुना करने का संकल्प लिया, जो कि चीन का ‘बाघ वर्ष ' है।

भारतीय बाघ की आबादी 2006-18 के बीच प्रति वर्ष 6 फीसदी वृद्धि

2006 से, भारत ने हर चार साल में देशव्यापी बाघ गणना की है। यह बाघ और उसके निवास स्थान का चौथा ऐसा आकलन है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 2006 से 2018 तक लगातार क्षेत्रों की तुलना में भारत की बाघों की आबादी 6 फीसदी प्रति वर्ष की दर से बढ़ी है। हाल की अवधि में, भारत की बाघों की आबादी 33 फीसदी बढ़ी है, 2014 में 2,226 से बढ़कर 2018 में 2,967 हो गई है।

मध्य प्रदेश में 71 फीसदी वृद्धि की सूचना मिली है। 2014 में 308 बाघों से 2018 में 526 तक, जो देश में सबसे ज्यादा है। इसके विपरीत, छत्तीसगढ़ ने 59 फीसदी गिरावट की सूचना दी है। 2014 में 46 से 2018 में 19 तक। ओडिशा में, बाघों की संख्या, 28, चार वर्षों से 2018 तक निरंतर बनी हुई है।

भारतीय वन्यजीव संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक कमर कुरैशी से जब इंडियास्पेंड ने मध्यप्रदेश जैसे राज्यों के प्रदर्शन के संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा कि ‘संरक्षण और विकास के लिए उपलब्ध क्षेत्र’ दो चीजें हैं। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में सरकारें गांवों को हटाने के लिए निवेश कर रही हैं [कोर और बफर क्षेत्रों से], जिससे इन राज्यों को मदद मिली है।

Source: Status of Tigers in India 2018 Note:*Estimated through scat DNA; #For comparison with previous estimates of Andhra Pradesh, combine Andhra Pradesh and Telangana population estimate of current year. Figures for West Bengal include the tiger population of North West Bengal and Sunderbans

रिपोर्ट में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ और ओडिशा राज्यों में बाघों की स्थिति में लगातार गिरावट चिंता का विषय है। “मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य में बाघों की संख्या में वृद्धि हुई है। उत्तर-पूर्व में नुकसान खराब सैम्प्लिंग के कारण है। ”

कुरैशी ने कहा, “छत्तीसगढ़ में संरक्षण की स्थिति खराब है और जिन क्षेत्रों में हमने सोचा था कि वे सुधार करेंगे, उन्होंने नहीं किया।”

भारत में भारत के बाघों के आवास को पांच परिदृश्यों- शिवालिक पहाड़ियों और गंगा के मैदानों, मध्य और पूर्वी घाटों, पश्चिमी घाटों, उत्तर-पूर्वी पहाड़ियों और ब्रह्मपुत्र और सुंदरवन में वर्गीकृत किया गया है।

मध्य और पूर्वी घाट का परिदृश्य, जिसमें आठ राज्य शामिल हैं ( आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान ), भारत की 35 फीसदी बाघ आबादी के साथ, 50 फीसदी की उच्चतम वृद्धि की सूचना दी है, 2014 में 688 से 2019 में 1,033 तक।

उत्तर-पूर्व की पहाड़ियों और ब्रह्मपुत्र में 9 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। 2014 में 201 से 2018 में 219 तक। सुंदरबन ने इसी अवधि में 16 फीसदी की वृद्धि दर्ज की है, 76 से 88 ।

रिपोर्ट में कहा गया है कि “पश्चिम बंगाल के बक्सा, मिजोरम में डम्पा और झारखंड में पलामू टाइगर रिजर्व में कोई बाघ नहीं देखा गया। पूर्व के आकलन में भी इन रिजर्व क्षेत्रों में बाघों की संख्या निराशाजनक रही है।"

अवैध शिकार के कारण 7 साल से 2018 तक 657 बाघों की मौत

2012 और 2018 के बीच, भारत में 657 बाघों की मौत हुई, उनमें से ज्यादातर प्राकृतिक कारणों से (48 फीसदी या 313) और अवैध शिकार के कारण 21 फीसदी या 138 मौतें हुई है, जैसा कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है।

138 अवैध मौतों में से, मध्य प्रदेश ने सबसे अधिक (22 फीसदी या 30) मौत के मामलों की सूचना दी है, उसके बाद कर्नाटक (24) और महाराष्ट्र (18) का स्थान रहा है।

कुरैशी ने कहा, "अवैध शिकार का बाजार खत्म नहीं हुआ है और बहुत अधिक सक्रिय है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सुरक्षा स्तर बनाए रखा जाए या उसमें सुधार किया जाए। अब जब डब्ल्यूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) ने चीन में पारंपरिक चिकित्सा को मान्यता दे दी है, तो यह उन कई प्रजातियों के लिए एक बड़ा खतरा है, जिनकी मांग बढ़ रही है।"

बंगाल टाइगर अगले 50 वर्षों के भीतर बांग्लादेश सुंदरवन से गायब हो सकता है - 2070 तक, जैसा कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ते समुद्र के स्तर के संयोजन के रूप में उनकी पिछली शेष बस्तियों को खतरा है। यह जानकारी ‘जर्नल ऑफ द टोटल एनवायरनमेंट ’ में प्रकाशित एक अध्ययन में दी गई है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 12 मार्च, 2019 की रिपोर्ट में विस्तार से बताया है। जलवायु परिवर्तन से भारतीय सुंदरवन भी इसी तरह प्रभावित हो सकती है।

विश्व वन्यजीव कोष के अनुसार, अप्रैल 2016 तक दुनिया भर में लगभग 3,900 बाघ थे। दुनिया में 20 वीं सदी की शुरुआत के बाद से बाघों की आबादी में से 95 फीसदी हिस्सा खत्म हो गया।

बाघों की संख्या में कमी का जिम्मेदार बाघों के अवैध व्यापार, शिकार और आवास नुकसान को ठहराया जाता है। आठ टाइगर उप-प्रजातियों में से तीन पहले ही विलुप्त हो चुके हैं, शेष पांच या तो 'लुप्तप्राय' हैं या 'गंभीर रूप से लुप्तप्राय' हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने मार्च 2019 में बताया है।

(मल्लापुर वरिष्ठ नीति विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 30 जुलाई 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

मुंबई: 29 जुलाई, 2019 को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जारी नए आंकड़ों के अनुसार, पिछले 12 वर्षों से 2018 तक, भारत की बाघों की आबादी 2,967 हो गई है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि असली सफलता बाघ की भौगोलिक सीमा और गैर-संरक्षित जंगलों के प्रबंधन में है, जिसमें भारत का प्रदर्शन ठीक नहीं है।

सरकार के अनुसार, नए आंकड़े, 20 राज्यों में वनवासियों के लिए 381,400 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में किए गए एक सरकारी सर्वेक्षण का हिस्सा है, जो भारत में बाघों की आबादी के लिए घर है।

हिम तेंदुओं और बाघों का अध्ययन करने वाले संरक्षण जीवविज्ञानी रघु चुंडावत ने इंडियास्पेंड को बताया, "जहां तक ​​संख्या का सवाल है, मुझे नहीं लगता कि हमने बड़ी सफलता हासिल की है।" 

उन्होंने कहा, असली सफलता बाघ की भौगोलिक सीमा को प्रबंधित करने में सक्षम होने में होगी। वह आगे कहते हैं, "यदि आप किसी भी संरक्षण-संबंधी रिपोर्ट को पढ़ते हैं, तो गिरावट या विलुप्त होने के पहले लक्षणों में से एक सीमा प्रतिबंध है, जो सीमा वितरण का भौगोलिक नुकसान है।"

उन्होंने कहा कि सफलता तब होगी जब बाघ पूरे भारत में जंगलों पर बाघों का कब्जा होगा, जैसा पहले था।

जब सरकार के निर्णय लेने वालों को वन्यजीवों के विचार और बुनियादी ढांचे, खनन या अन्य औद्योगिक परियोजनाओं के बीच चयन करना होता है, तो टाइगर और अन्य वन्यजीवों के आवास में हमेशा कमी आती है।

मई 2019 में, मोदी सरकार ने 13 रेलवे परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी से मुक्त कर दिया, हालांकि चार परियोजनाएं उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में या तो राष्ट्रीय उद्यान या बाघ अभयारण्य, बाघ गलियारा या वन्यजीव अभयारण्य को बाधित करेंगी। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 27 जुलाई 2019 की रिपोर्ट में बताया है।

चार साल से मई 2018 तक, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार ने 519 बुनियादी ढांचे और औद्योगिक परियोजनाओं को ( कई भारत के पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन करते हुए ) संरक्षित क्षेत्रों में और "पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्र" में मंजूरी दी है और यह पिछली सरकार की तुलना में लगभग दोगुनी दर पर की गई है, जैसा कि हमने अगस्त 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

रॉयल बंगाल टाइगर या पैंथेरा टाइगरिस, जिसे भारतीय उप-प्रजाति कहा जाता है, एक तेज शिकारी होते हैं और इसकी संख्या आमतौर पर भारत के संरक्षित क्षेत्रों के स्वास्थ्य को दर्शाती है। लेकिन 2015 में भारत के लगभग एक चौथाई बाघ संरक्षित क्षेत्रों के बाहर रहते थे। यह एक ऐसी स्थिति है, जो बदतर हो सकती है क्योंकि संरक्षित क्षेत्रों को बुनियादी ढांचे और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए आगे खोला गया था।

यही कारण है कि विशेषज्ञ नए नंबरों से प्रभावित नहीं हैं।

जब प्रोजेक्ट टाइगर को 1973 में लॉन्च किया गया था, तब नौ टाइगर रिजर्व (~ 18,278 वर्ग किमी) थे जो अब बढ़कर 50 टाइगर रिजर्व (~ 72,749 वर्ग किमी) हो गए हैं, जो भारत के भौगोलिक क्षेत्र का 2.2 फीसदी है, जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है।

देश भर में ‘संरक्षित क्षेत्रों’ और ‘कम्यूनिटी रिजर्व ’ की संख्या में वृद्धि हुई है, मोदी ने 29 जुलाई, 2019 को रिपोर्ट के लॉन्च पर कहा था। उन्होंने कहा कि संरक्षित क्षेत्रों की संख्या 2014 में 692 से बढ़कर 2019 में 860 हो गई, और कम्यूनिटी रिजर्व की संख्या भी 2014 में 43 थी, जो अब 100 से अधिक हो गई है।

चूंकि, संरक्षित क्षेत्रों में घुसपैठ किया जाता है, बाघ ने तेजी से मानव संपर्क बनाया है। 27 जुलाई, 2019 को कर्नाटक में एक बाघ को कुचल दिया गया था। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में 24 जुलाई, 2019 को बाघ में पीट-पीट कर मार डाला गया था। और एक अन्य बाघ को महाराष्ट्र में एक राजमार्ग अवरोध पर कूदते हुए देखा गया था - चार-लेन राजमार्ग ने पेंच टाइगर कॉरिडोर के माध्यम से एक सड़क का विस्तार किया था

यह ऐसे समय में है जब संरक्षणवादियों ने चेतावनी दी है कि संरक्षण सिर्फ रिजर्व क्षेत्र तक सीमित नहीं हो सकते हैं।

चुंडावत ने कहा, "गैर-संरक्षित वनों का प्रबंधन करना महत्वपूर्ण है।" “यदि आप बाघ संरक्षण को ऊपरी सीमा तक ले जाना चाहते हैं तो आपको बाहर (संरक्षित क्षेत्रों) देखना होगा।

वर्तमान में, हमारे पास विशेष संरक्षण मॉडल हैं, जो संरक्षित क्षेत्र पर आधारित हैं। जिस क्षण बाघ बाहर जाता है, उसके बारे में कुछ भी करने का कोई जुरिस्डिक्शन नहीं है। यही कारण है कि लिंचिंग के मामले होते हैं, क्योंकि हमने संरक्षित क्षेत्रों के बाहर काम नहीं किया है।”

चुंडावत ने कहा, विलुप्त होने की प्रवृत्ति को उलटने के लिए, नए संरक्षण मॉडल, जो संरक्षित क्षेत्रों के बाहर काम करते हैं, उनकी जरूरत है।वर्तमान मॉडल केवल स्वैच्छिक आधार पर संरक्षित क्षेत्रों के बाहर स्थानीय समुदायों की भागीदारी को देखता है। कोई प्रोत्साहन नहीं है। इसलिए बाघ के प्रति सद्भाव पैदा करने के लिए प्रोत्साहन की आवश्यकता है।

मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा बाघ हैं, 2014 के बाद से 71 फीसदी ज्यादा

नए सर्वेक्षण के अनुसार, मध्यप्रदेश में बाघों की संख्या 526 या देश में अनुमानित संख्या का 18 फीसदी है। इसके बाद कर्नाटक (524) और उत्तराखंड (442) है। इस सर्वेक्षण में बाघों की जनसंख्या का 83 फीसदी शमिल करते हुए व्यक्तिगत बाघों की 2,461 तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया है।

सर्वेक्षण में कहा गया कि बाकी का अनुमान ‘मजबूत स्थानिक रूप से स्पष्ट कैप्चर-रिकैपचर सांख्यिकीय मॉडल’ का उपयोग करते हुए किया गया था। 

13 देशों में बाघ रहते हैं - बंगलादेश, भूटान, कंबोडिया, चीन, भारत, इंडोनेशिया, लाओ पीडीआर, मलेशिया, म्यांमार, नेपाल, रूस, थाईलैंड और वियतनाम। 2010 में, इन देशों ने 2022 तक बाघों की संख्या को दोगुना करने का संकल्प लिया, जो कि चीन का ‘बाघ वर्ष ' है।

भारतीय बाघ की आबादी 2006-18 के बीच प्रति वर्ष 6 फीसदी वृद्धि

2006 से, भारत ने हर चार साल में देशव्यापी बाघ गणना की है। यह बाघ और उसके निवास स्थान का चौथा ऐसा आकलन है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 2006 से 2018 तक लगातार क्षेत्रों की तुलना में भारत की बाघों की आबादी 6 फीसदी प्रति वर्ष की दर से बढ़ी है। हाल की अवधि में, भारत की बाघों की आबादी 33 फीसदी बढ़ी है, 2014 में 2,226 से बढ़कर 2018 में 2,967 हो गई है।

मध्य प्रदेश में 71 फीसदी वृद्धि की सूचना मिली है। 2014 में 308 बाघों से 2018 में 526 तक, जो देश में सबसे ज्यादा है। इसके विपरीत, छत्तीसगढ़ ने 59 फीसदी गिरावट की सूचना दी है। 2014 में 46 से 2018 में 19 तक। ओडिशा में, बाघों की संख्या, 28, चार वर्षों से 2018 तक निरंतर बनी हुई है।

भारतीय वन्यजीव संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक कमर कुरैशी से जब इंडियास्पेंड ने मध्यप्रदेश जैसे राज्यों के प्रदर्शन के संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा कि ‘संरक्षण और विकास के लिए उपलब्ध क्षेत्र’ दो चीजें हैं। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में सरकारें गांवों को हटाने के लिए निवेश कर रही हैं [कोर और बफर क्षेत्रों से], जिससे इन राज्यों को मदद मिली है।

Source: Status of Tigers in India 2018 Note:*Estimated through scat DNA; #For comparison with previous estimates of Andhra Pradesh, combine Andhra Pradesh and Telangana population estimate of current year. Figures for West Bengal include the tiger population of North West Bengal and Sunderbans

रिपोर्ट में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ और ओडिशा राज्यों में बाघों की स्थिति में लगातार गिरावट चिंता का विषय है। “मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य में बाघों की संख्या में वृद्धि हुई है। उत्तर-पूर्व में नुकसान खराब सैम्प्लिंग के कारण है। ”

कुरैशी ने कहा, “छत्तीसगढ़ में संरक्षण की स्थिति खराब है और जिन क्षेत्रों में हमने सोचा था कि वे सुधार करेंगे, उन्होंने नहीं किया।”

भारत में भारत के बाघों के आवास को पांच परिदृश्यों- शिवालिक पहाड़ियों और गंगा के मैदानों, मध्य और पूर्वी घाटों, पश्चिमी घाटों, उत्तर-पूर्वी पहाड़ियों और ब्रह्मपुत्र और सुंदरवन में वर्गीकृत किया गया है।

मध्य और पूर्वी घाट का परिदृश्य, जिसमें आठ राज्य शामिल हैं ( आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान ), भारत की 35 फीसदी बाघ आबादी के साथ, 50 फीसदी की उच्चतम वृद्धि की सूचना दी है, 2014 में 688 से 2019 में 1,033 तक।

उत्तर-पूर्व की पहाड़ियों और ब्रह्मपुत्र में 9 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। 2014 में 201 से 2018 में 219 तक। सुंदरबन ने इसी अवधि में 16 फीसदी की वृद्धि दर्ज की है, 76 से 88 ।

रिपोर्ट में कहा गया है कि “पश्चिम बंगाल के बक्सा, मिजोरम में डम्पा और झारखंड में पलामू टाइगर रिजर्व में कोई बाघ नहीं देखा गया। पूर्व के आकलन में भी इन रिजर्व क्षेत्रों में बाघों की संख्या निराशाजनक रही है।"

अवैध शिकार के कारण 7 साल से 2018 तक 657 बाघों की मौत

2012 और 2018 के बीच, भारत में 657 बाघों की मौत हुई, उनमें से ज्यादातर प्राकृतिक कारणों से (48 फीसदी या 313) और अवैध शिकार के कारण 21 फीसदी या 138 मौतें हुई है, जैसा कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है।

138 अवैध मौतों में से, मध्य प्रदेश ने सबसे अधिक (22 फीसदी या 30) मौत के मामलों की सूचना दी है, उसके बाद कर्नाटक (24) और महाराष्ट्र (18) का स्थान रहा है।

कुरैशी ने कहा, "अवैध शिकार का बाजार खत्म नहीं हुआ है और बहुत अधिक सक्रिय है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सुरक्षा स्तर बनाए रखा जाए या उसमें सुधार किया जाए। अब जब डब्ल्यूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) ने चीन में पारंपरिक चिकित्सा को मान्यता दे दी है, तो यह उन कई प्रजातियों के लिए एक बड़ा खतरा है, जिनकी मांग बढ़ रही है।"

बंगाल टाइगर अगले 50 वर्षों के भीतर बांग्लादेश सुंदरवन से गायब हो सकता है - 2070 तक, जैसा कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ते समुद्र के स्तर के संयोजन के रूप में उनकी पिछली शेष बस्तियों को खतरा है। यह जानकारी ‘जर्नल ऑफ द टोटल एनवायरनमेंट ’ में प्रकाशित एक अध्ययन में दी गई है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 12 मार्च, 2019 की रिपोर्ट में विस्तार से बताया है। जलवायु परिवर्तन से भारतीय सुंदरवन भी इसी तरह प्रभावित हो सकती है।

विश्व वन्यजीव कोष के अनुसार, अप्रैल 2016 तक दुनिया भर में लगभग 3,900 बाघ थे। दुनिया में 20 वीं सदी की शुरुआत के बाद से बाघों की आबादी में से 95 फीसदी हिस्सा खत्म हो गया।

बाघों की संख्या में कमी का जिम्मेदार बाघों के अवैध व्यापार, शिकार और आवास नुकसान को ठहराया जाता है। आठ टाइगर उप-प्रजातियों में से तीन पहले ही विलुप्त हो चुके हैं, शेष पांच या तो 'लुप्तप्राय' हैं या 'गंभीर रूप से लुप्तप्राय' हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने मार्च 2019 में बताया है।

(मल्लापुर वरिष्ठ नीति विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 30 जुलाई 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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