94 फीसदी बिहारी महिलाओं को गर्भनिरोधक के बारे में पता, लेकिन 5 में से 1 करती हैं इसका इस्तेमाल: हमारा अध्ययन

गया (बिहार): प्रेमलता देवी की शादी कम उम्र में हुई थी। 24 साल की होते-होते, वह चार बच्चों की मां बन गई, तीन लड़कियां और एक लड़का। दक्षिणी बिहार के गया जिले के टिकारी ब्लॉक की एक गृहिणी प्रेमलता ने दूसरे बच्चे के जन्म के बाद गर्भनिरोधक के लिए एक कॉपर इंट्रायूटरिन डिवाइस (आईयूडी, सबसे आम ब्रांड का नाम कॉपर-टी ) लिया था।

छह साल बाद, पेट में दर्द और गर्भाशय के रक्तस्राव में वृद्धि के कारण उन्होंने इसे हटा दिया। यह दोनों ही डिवाइस के आम साइड-इफेक्ट्स हैं। उन्होंने कहा, "मैं अब कॉपर-टी का उपयोग नहीं करना चाहती हूं।"

आईयूडी को हटाने के बाद, प्रेमलता देवी के दो और बच्चे हुए, जिनके बारे में उन्होंने सोचा नहीं था। गर्भनिरोधक के वैकल्पिक तरीकों के बारे में न तो उसे पता है और न ही उसके पति को। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत आने वाले स्वास्थ्य कर्मचारी, जिन्हें उन जैसी महिलाओं को परामर्श देना चाहिए, वे कभी उनके पास आए ही नहीं।

2015-16 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत के पांचवे सबसे गरीब और तीसरे सबसे अधिक आबादी वाले राज्य बिहार में ऐसी कहानियां आम हैं। राज्य में भारत की उच्चतम कुल प्रजनन दर (टीएफआर) - प्रति महिला 3.4 बच्चे भी है। यह टीएफआर भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्यों: उत्तर प्रदेश (2.74) और महाराष्ट्र (1.87) से अधिक है। राष्ट्रीय औसत 2.18 है। (सिक्किम और केरल में 2015-16 के लिए सबसे कम टीएफआर: 1.17 था।)

2017 के संयुक्त राष्ट्र (यूएन) प्रजेक्शन के अनुसार, लगभग पांच वर्षों में, या 2024 तक, भारत की जनसंख्या चीन से आगे निकल जाने की उम्मीद है। 2029 में चीन की आबादी 144 करोड़ हो जाएगी और फिर गिरावट शुरू हो जाएगी।

वर्तमान अनुमान के अनुसार, जनसंख्या गति के कारण ( प्रजनन आयु वर्ग में लोगों का उच्च अनुपात ) उच्च जीवन प्रत्याशा के साथ, गिरने से पहले भारत की आबादी केवल 2060 के दशक में चरम पर पहुंच जाएगी।

हालांकि, भारतीय प्रजनन दर घट रही है और इनमें से कुछ अनुमानों को लगातार संशोधित किया जाता है। उदाहरण के लिए, संयुक्त राष्ट्र के पहले के अनुमानों के अनुसार, भारत को 2022 में चीन से आगे निकलना था। दस साल पहले, भारत में 2.68 का टीएफआर था। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 4 (एनएफएचएस 2015-16) के अनुसार, आज 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) में से केवल चार ( उत्तर प्रदेश (यूपी), बिहार, मेघालय और नागालैंड ) में एक टीएफआर 2.68 के बराबर या उससे अधिक है।

फिर भी, कम से कम 12 राज्यों में 2.1 से ऊपर टीएफआर है, जिसे प्रतिस्थापन-स्तर दर कहा है, जिस पर आबादी स्थिर है। 2011 में, बिहार की जनसंख्या फिलीपींस के करीब थी-जो आज दुनिया का 13 वां सबसे अधिक आबादी वाला देश है। बिहार के 38 जिलों में से 36 में उच्च प्रजनन दर है, जिसमें गया भी शामिल है।

ह समझने के लिए कि, भारत में 1952 में शुरु किया गया परिवार नियोजन कार्यक्रम ( कई राष्ट्रों से आगे ) राज्य में क्यों विफल रहा है, इंडियास्पेंड ने दिसंबर 2017 और अप्रैल 2018 के बीच गया और पटना जिलों में 900 महिलाओं के बीच एक सर्वेक्षण किया।

दो आलेखों की श्रृंखला के इस पहले भाग में, हम बिहार में महिलाओं के बीच गर्भनिरोधक उपयोग और जागरूकता के पैटर्न को देखेंगे। दूसरे भाग में, हम उन सामाजिक कारकों की जांच करेंगे, जो राज्य के परिवार नियोजन के प्रयासों को पंगु बनाते हैं। श्रृंखला अविवाहित महिलाओं और किशोरों पर भी ध्यान केंद्रित करेगी, जिन्हें आमतौर पर उन अध्ययनों में नहीं लिया जाता है जो गर्भनिरोधक की आवश्यकता के साथ समझौता करते हैं।

हमने पाया कि 15-49 वर्ष की यौन सक्रिय महिलाओं में से 94 फीसदी को उपयोग होने वाले कम से कम आठ गर्भनिरोधक विधियों में से, एक के बारे में पता था। वर्तमान में पांच में से केवल एक(20.1 फीसदी) ही किसी का उपयोग कर रही थीं।

शादीशुदा (27 फीसदी) की तुलना में अधिक अविवाहित, यौन रूप से सक्रिय महिलाएं गर्भ निरोधकों (42 फीसदी) का उपयोग करती हैं, और शिक्षा से महिलाओं में गर्भनिरोधक के प्रति जागरूकता बढ़ी है।

साइड-इफेक्ट्स का डर

बिहार में गर्भनिरोधक के बारे में व्यापक जागरूकता को देखते हुए भी गर्भनिरोधक का उपयोग इतना कम क्यों है?

हमारे सर्वेक्षण ने बताया कि सबसे बड़ा कारण साइड-इफेक्ट्स (15 फीसदी) का डर था। इसके बाद गर्भ धारण करने की इच्छा (11.7 फीसदी), गर्भ निरोधकों (8 फीसदी) का उपयोग करने के लिए सामान्य विघटन और भागीदारों (7.8 फीसदी) का विरोध है। अन्य कारणों में पहुंच की कमी, ज्ञान की कमी और धार्मिक आक्षेप शामिल हैं।

गर्भनिरोधक का बोझ भी लगभग पूरी तरह से महिलाओं पर पड़ता है।

गर्भनिरोधक का उपयोग क्यों नहीं

Source: IndiaSpend survey.

गर्भनिरोधक उपयोग में गिरावट

एनएचएफएस-4 के अनुसार, 10 साल से 2015-16 तक, बिहार में विवाहित महिलाओं के बीच गर्भनिरोधक की किसी भी पद्धति का उपयोग 10 प्रतिशत अंक गिरकर 24 फीसदी रह गया, जो सभी भारतीय राज्यों में सबसे कम है। राष्ट्रीय औसत 54 फीसदी है। पंजाब का प्रदर्शन सबसे अच्छा है -76 फीसदी, इसके बाद पश्चिम बंगाल -71 फीसदी और चंडीगढ़ -74 फीसदी, का स्थान है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार,महिलाओं में उच्च प्रजनन क्षमता गर्भावस्था से संबंधित मृत्यु (मातृ मृत्यु) और बीमारी (रुग्णता) के जोखिम को बढ़ा सकती है। जनसंख्या में वृद्धि के अलावा, कई बच्चों वाली महिलाओं को अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार करने के लिए कम अवसर मिलते हैं, जिससे उनके लिए गरीबी से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। औसतन, उच्च प्रजनन क्षमता वाला समाज अपनी सरकारों से अधिक सेवाओं की मांग करता है।

हमारे द्वारा साक्षात्कार की गई महिलाओं द्वारा सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली विधि कॉपर आईयूडी थी, जिसका उपयोग 4 फीसदी यौन सक्रिय महिलाएं करती थीं। 2017 में बिहार में आयोजित सभी नसबंदी प्रक्रियाओं में से 98.9 फीसदी महिलाओं पर थीं, जैसा कि स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली से 2017-18 के आंकड़ों से पता चलता है।

लैंसेट अध्ययन के अनुसार, महिला नसबंदी भारत में गर्भनिरोधक का सबसे आम तरीका था। अध्ययन में कहा गया है कि देश में हर तीन में से एक महिला तक गर्भनिरोधक विधियों के पहुंच की कमी है।

अविवाहित और यौन सक्रिय महिलाओं के बीच अधिक गर्भनिरोधक का उपयोग

बिहार का टीएफआर हमेशा भारत की तुलना में अधिक रहा है और वर्षों में लगातार गिरावट आई है, 2005-06 में 4 से गिरकर 2011 में 3.7 और 2015-16 में 3.4 हुआ है।

जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया था, केंद्र के मिशन ‘परिवार विकास कार्यक्रम’ के अनुसार बिहार के 38 जिलों में, 36 को उच्च-प्रजनन जिलों का दर्जा दिया गया है।

नवंबर 2016 में लॉन्च किए गए इस कार्यक्रम का लक्ष्य 2025 तक 135 जिलों में टीएफआर को 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर तक कम करना है, जैसा कि नवंबर 2017 में हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट में बताया गया है।प्रतिस्थापन-स्तर की उर्वरता बच्चों की औसत संख्या को दर्शाती है जो एक महिला को जनसंख्या को स्थिर रखना होगा।

एनएफएचएस के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में गर्भनिरोधक की किसी भी पद्धति का उपयोग करने वालों का तीसरी सबसे बड़ा प्रतिशत, प्रेमलता देवी के जिले गया में है - 2015-16 में 36 फीसदी। हमने पाया कि उच्च जागरुकता के बावजूद गर्भनिरोधक का कम उपयोग है।

हमारे सर्वेक्षण से पता चलता है कि सर्वेक्षण में शामिल सभी महिलाओं में से लगभग 94 फीसदी महिलाओं (और 97.8 फीसदी विवाहित महिलाओं) को गर्भनिरोधक के कम से कम आठ तरीकों में से एक के बारे में पता था। इसमें पारंपरिक और आधुनिक तरीके शामिल थे।

हमने पाया कि गर्भनिरोधक का उपयोग विवाहित (27 फीसदी) महिलाओं की तुलना में अविवाहित और यौन रूप से सक्रिय (42 फीसदी) महिलाओं में ज्यादा था। पसंद किए गए गर्भ निरोधकों के संदर्भ में, अविवाहित महिलाओं ने गर्भनिरोधक गोली (11.2 फीसदी) को वरीयता दी, जबकि विवाहित महिलाओं ने कॉपर आईयूडी (8.6 फीसदी) को प्राथमिकता दी।

अधिक शिक्षा = गर्भ निरोधकों के बारे में अधिक जागरूकता

सर्वेक्षण समूह को दो में विभाजित किया गया था। किसी भी यौन संबंध में 15-49 की उम्र के बीच की महिलाएं और वे महिलाएं जो आमतौर पर यौन रूप से सक्रिय थीं।

हमने पाया, आधुनिक तरीकों के बारे में जागरूकता ज्यादा थी। सर्वेक्षण में शामिल 94.2 फीसदी महिलाओं को आधुनिक तरीकों (कंडोम, आईयूडी, आदि) के बारे में पता था, और केवल 46.2 फीसदी को पारंपरिक तरीकों के बारे में जानकारी थी।

गया में सर्वेक्षण की गई महिलाओं में से, 20 फीसदी गर्भनिरोधक के किसी न किसी रूप का उपयोग कर रही थीं; उनमें से 15 फीसदी आधुनिक तरीकों का उपयोग कर रही थीं। कम उपयोग के कारणों में साइड-इफ़ेक्ट का डर और गर्भवती होने की इच्छा शामिल थी।

Methods Of Contraception
Traditional Methods of Contraception Include breastfeeding, withdrawal by men
Modern Methods of Contraception Include female and male sterilisation, the contraceptive pill, intrauterine device (IUD), post-partum IUD (PPIUD, injectables, male and female condoms, and emergency contraception

Source: IndiaSpend primary research

सर्वेक्षण के दौरान एकत्र किए गए आंकड़ों से पता चला है कि सामान्य तौर पर, शहरों में रहने वाली महिलाओं ने सेकेंड्री स्कूल शिक्षा प्राप्त की है और पति या साथी के साथ यौन रुप से सक्रिय हैं और कम से कम आठ गर्भनिरोधक विधियों में से एक के संबंध में उन्हें जानकारी थीं।

विवाहित महिलाओं में, सर्वेक्षण अवधि के दौरान 27.1 फीसदी गर्भनिरोधक का उपयोग कर रही थीं। 2015-16 के एनएफएचएस आंकड़ों की तुलना में, यह दो वर्षों में आठ प्रतिशत अंक की गिरावट है।

शिक्षा का मतलब परिवार नियोजन उपकरणों का अधिक उपयोग

जैसा कि हमने पहले कहा, विवाहित महिलाओं ने अविवाहित यौन सक्रिय महिलाओं की तुलना में गर्भनिरोधक का कम उपयोग दिखाया। इसके अलावा, उन महिलाओं के बीच गर्भनिरोधक का अधिक उपयोग हुआ, जिन्होंने अपनी प्राइमरी शिक्षा पूरी की और सेकेंड्री स्कूल तक गए। वे आधुनिक तरीके पसंद करते थे।

भारतीयों में गर्भनिरोधक का उपयोग(विशेष रूप से आधुनिक तरीके का) 2005-06 और 2015-16 के बीच घटा है। इसका मुख्य कारण पसंदीदा तरीकों की अनुपलब्धता और पुरुषों की अनिच्छा रही है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने अगस्त 2016 की रिपोर्ट में बताया है।

एक बाद के अध्ययन से पता चला है कि आठ साल से 2016 तक, भारत में गर्भनिरोधक का उपयोग 35 फीसदी गिरा था, जैसा कि इंडियास्पेंड ने फरवरी 2017 में रिपोर्ट किया था। पिछले 10 वर्षों से 2015-16 तक, पुरुष नसबंदी की दर भी 1 फीसदी से 0.3 फीसदी तक गिर गई थी।

बिहार में पुरुषों के बीच, कंडोम का उपयोग 2.3 फीसदी से 1 फीसदी तक प्रतिशत से अधिक गिर गया। पुरुष नसबंदी को अपनाने वाले पुरुषों का प्रतिशत 2005-06 में 0.6 फीसदी से शून्य हो गया, जैसा कि एनएफएचएस 4 डेटा से पता चलता है।

कुछ पुरुषों का मानना ​​है कि कंडोम यौन सुख को कम करता है और पुरुष नसबंदी से उनका पौरुष समाप्त हो जाता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने फरवरी 2017 की रिपोर्ट में बताया है। हालांकि पुरुष नसबंदी एक तेज, सुरक्षित और स्वस्थ विकल्प है, लेकिन वे दुनिया भर में एक अलोकप्रिय पद्धति बने हुए हैं। यूनाइटेड किंगडम के राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के अनुसार, महिला नसबंदी के साथ, आंतरिक रक्तस्राव, संक्रमण या यहां तक ​​कि एक अस्थानिक गर्भावस्था (गर्भ के बाहर निषेचित अंडाणु) का एक छोटा जोखिम होता है।

कॉपर-टी सबसे लोकप्रिय तरीका

मेडिकल पेशेवरों ने कंडोम, पुरुष नसबंदी और महिलाओं के लिए, खाने वाली गोलियां और आईयूडी की सलाह दी है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने फरवरी 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

गया में गर्भनिरोधक का उपयोग करने वाली 20 फीसदी महिलाओं में से, आठ तरीकों की लोकप्रियता ने काम किया (टेबल देखें)।

गया में सभी महिलाओं द्वारा पसंद की गई गर्भनिरोधक विधि कॉपर-टी थी, जिसमें से 4 फीसदी वर्तमान में उस पद्धति का उपयोग कर रही थीं। दूसरा सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला पुरुषों का पारंपरिक तरीका था-जो 2.8 फीसदी था। 

विवाहित महिलाओं में, पसंदीदा विधि कॉपर-टी थी। 8.6 फीसदी ने उस पद्धति को चुना, इसके बाद गर्भनिरोधक गोली 4.8 फीसदी पसंदीदा विकल्प थी।

हमने अध्ययन के दौरान नमूना जिलों में पाया कि अविवाहित महिलाओं की पसंदीदा विधि गोली (11.2 फीसदी) थी, इसके बाद आईयूडी (9.4 फीसदी) थी। उनकी शिक्षा और निवास का स्तर अन्य निर्धारित कारक थे-शहरों में रहने वाली महिलाएं और जो प्राइमरी शिक्षा पूरी कर चुकी थीं और सेकेंड्री स्कूल तक गई थीं, उनमें गर्भनिरोधक उपयोग की प्रतिशतता अधिक थी।

धन और गर्भनिरोधक उपयोग के बीच संबंध स्पष्ट नहीं थे, लेकिन अधिक संपत्ति की श्रेणियों में महिलाओं ने गर्भनिरोधक उपयोग के उच्च प्रतिशत को दिखाया है।

दो आलेखों वाली श्रृंखला का यह पहला आलेख है।

( दास ‘इंटरनेशनल ग्रोथ सेंटर-इंडिया’ में प्रोग्राम पॉलिसी मैनेजर हैं। उनके पास ‘लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स’ से सामाजिक नीति में ‘मास्टर ऑफ रिसर्च’ की डिग्री और और ‘ससेक्स विश्वविद्यालय’ के ‘इंस्टूट ऑफ डेवलप्मेंट स्टडीज’ से डेवलप्मेंट स्टडीज में एमए की डिग्री है। )

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 23 जुलाई 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

गया (बिहार): प्रेमलता देवी की शादी कम उम्र में हुई थी। 24 साल की होते-होते, वह चार बच्चों की मां बन गई, तीन लड़कियां और एक लड़का। दक्षिणी बिहार के गया जिले के टिकारी ब्लॉक की एक गृहिणी प्रेमलता ने दूसरे बच्चे के जन्म के बाद गर्भनिरोधक के लिए एक कॉपर इंट्रायूटरिन डिवाइस (आईयूडी, सबसे आम ब्रांड का नाम कॉपर-टी ) लिया था।

छह साल बाद, पेट में दर्द और गर्भाशय के रक्तस्राव में वृद्धि के कारण उन्होंने इसे हटा दिया। यह दोनों ही डिवाइस के आम साइड-इफेक्ट्स हैं। उन्होंने कहा, "मैं अब कॉपर-टी का उपयोग नहीं करना चाहती हूं।"

आईयूडी को हटाने के बाद, प्रेमलता देवी के दो और बच्चे हुए, जिनके बारे में उन्होंने सोचा नहीं था। गर्भनिरोधक के वैकल्पिक तरीकों के बारे में न तो उसे पता है और न ही उसके पति को। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत आने वाले स्वास्थ्य कर्मचारी, जिन्हें उन जैसी महिलाओं को परामर्श देना चाहिए, वे कभी उनके पास आए ही नहीं।

2015-16 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत के पांचवे सबसे गरीब और तीसरे सबसे अधिक आबादी वाले राज्य बिहार में ऐसी कहानियां आम हैं। राज्य में भारत की उच्चतम कुल प्रजनन दर (टीएफआर) - प्रति महिला 3.4 बच्चे भी है। यह टीएफआर भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्यों: उत्तर प्रदेश (2.74) और महाराष्ट्र (1.87) से अधिक है। राष्ट्रीय औसत 2.18 है। (सिक्किम और केरल में 2015-16 के लिए सबसे कम टीएफआर: 1.17 था।)

2017 के संयुक्त राष्ट्र (यूएन) प्रजेक्शन के अनुसार, लगभग पांच वर्षों में, या 2024 तक, भारत की जनसंख्या चीन से आगे निकल जाने की उम्मीद है। 2029 में चीन की आबादी 144 करोड़ हो जाएगी और फिर गिरावट शुरू हो जाएगी।

वर्तमान अनुमान के अनुसार, जनसंख्या गति के कारण ( प्रजनन आयु वर्ग में लोगों का उच्च अनुपात ) उच्च जीवन प्रत्याशा के साथ, गिरने से पहले भारत की आबादी केवल 2060 के दशक में चरम पर पहुंच जाएगी।

हालांकि, भारतीय प्रजनन दर घट रही है और इनमें से कुछ अनुमानों को लगातार संशोधित किया जाता है। उदाहरण के लिए, संयुक्त राष्ट्र के पहले के अनुमानों के अनुसार, भारत को 2022 में चीन से आगे निकलना था। दस साल पहले, भारत में 2.68 का टीएफआर था। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 4 (एनएफएचएस 2015-16) के अनुसार, आज 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) में से केवल चार ( उत्तर प्रदेश (यूपी), बिहार, मेघालय और नागालैंड ) में एक टीएफआर 2.68 के बराबर या उससे अधिक है।

फिर भी, कम से कम 12 राज्यों में 2.1 से ऊपर टीएफआर है, जिसे प्रतिस्थापन-स्तर दर कहा है, जिस पर आबादी स्थिर है। 2011 में, बिहार की जनसंख्या फिलीपींस के करीब थी-जो आज दुनिया का 13 वां सबसे अधिक आबादी वाला देश है। बिहार के 38 जिलों में से 36 में उच्च प्रजनन दर है, जिसमें गया भी शामिल है।

ह समझने के लिए कि, भारत में 1952 में शुरु किया गया परिवार नियोजन कार्यक्रम ( कई राष्ट्रों से आगे ) राज्य में क्यों विफल रहा है, इंडियास्पेंड ने दिसंबर 2017 और अप्रैल 2018 के बीच गया और पटना जिलों में 900 महिलाओं के बीच एक सर्वेक्षण किया।

दो आलेखों की श्रृंखला के इस पहले भाग में, हम बिहार में महिलाओं के बीच गर्भनिरोधक उपयोग और जागरूकता के पैटर्न को देखेंगे। दूसरे भाग में, हम उन सामाजिक कारकों की जांच करेंगे, जो राज्य के परिवार नियोजन के प्रयासों को पंगु बनाते हैं। श्रृंखला अविवाहित महिलाओं और किशोरों पर भी ध्यान केंद्रित करेगी, जिन्हें आमतौर पर उन अध्ययनों में नहीं लिया जाता है जो गर्भनिरोधक की आवश्यकता के साथ समझौता करते हैं।

हमने पाया कि 15-49 वर्ष की यौन सक्रिय महिलाओं में से 94 फीसदी को उपयोग होने वाले कम से कम आठ गर्भनिरोधक विधियों में से, एक के बारे में पता था। वर्तमान में पांच में से केवल एक(20.1 फीसदी) ही किसी का उपयोग कर रही थीं।

शादीशुदा (27 फीसदी) की तुलना में अधिक अविवाहित, यौन रूप से सक्रिय महिलाएं गर्भ निरोधकों (42 फीसदी) का उपयोग करती हैं, और शिक्षा से महिलाओं में गर्भनिरोधक के प्रति जागरूकता बढ़ी है।

साइड-इफेक्ट्स का डर

बिहार में गर्भनिरोधक के बारे में व्यापक जागरूकता को देखते हुए भी गर्भनिरोधक का उपयोग इतना कम क्यों है?

हमारे सर्वेक्षण ने बताया कि सबसे बड़ा कारण साइड-इफेक्ट्स (15 फीसदी) का डर था। इसके बाद गर्भ धारण करने की इच्छा (11.7 फीसदी), गर्भ निरोधकों (8 फीसदी) का उपयोग करने के लिए सामान्य विघटन और भागीदारों (7.8 फीसदी) का विरोध है। अन्य कारणों में पहुंच की कमी, ज्ञान की कमी और धार्मिक आक्षेप शामिल हैं।

गर्भनिरोधक का बोझ भी लगभग पूरी तरह से महिलाओं पर पड़ता है।

गर्भनिरोधक का उपयोग क्यों नहीं

Source: IndiaSpend survey.

गर्भनिरोधक उपयोग में गिरावट

एनएचएफएस-4 के अनुसार, 10 साल से 2015-16 तक, बिहार में विवाहित महिलाओं के बीच गर्भनिरोधक की किसी भी पद्धति का उपयोग 10 प्रतिशत अंक गिरकर 24 फीसदी रह गया, जो सभी भारतीय राज्यों में सबसे कम है। राष्ट्रीय औसत 54 फीसदी है। पंजाब का प्रदर्शन सबसे अच्छा है -76 फीसदी, इसके बाद पश्चिम बंगाल -71 फीसदी और चंडीगढ़ -74 फीसदी, का स्थान है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार,महिलाओं में उच्च प्रजनन क्षमता गर्भावस्था से संबंधित मृत्यु (मातृ मृत्यु) और बीमारी (रुग्णता) के जोखिम को बढ़ा सकती है। जनसंख्या में वृद्धि के अलावा, कई बच्चों वाली महिलाओं को अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार करने के लिए कम अवसर मिलते हैं, जिससे उनके लिए गरीबी से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। औसतन, उच्च प्रजनन क्षमता वाला समाज अपनी सरकारों से अधिक सेवाओं की मांग करता है।

हमारे द्वारा साक्षात्कार की गई महिलाओं द्वारा सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली विधि कॉपर आईयूडी थी, जिसका उपयोग 4 फीसदी यौन सक्रिय महिलाएं करती थीं। 2017 में बिहार में आयोजित सभी नसबंदी प्रक्रियाओं में से 98.9 फीसदी महिलाओं पर थीं, जैसा कि स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली से 2017-18 के आंकड़ों से पता चलता है।

लैंसेट अध्ययन के अनुसार, महिला नसबंदी भारत में गर्भनिरोधक का सबसे आम तरीका था। अध्ययन में कहा गया है कि देश में हर तीन में से एक महिला तक गर्भनिरोधक विधियों के पहुंच की कमी है।

अविवाहित और यौन सक्रिय महिलाओं के बीच अधिक गर्भनिरोधक का उपयोग

बिहार का टीएफआर हमेशा भारत की तुलना में अधिक रहा है और वर्षों में लगातार गिरावट आई है, 2005-06 में 4 से गिरकर 2011 में 3.7 और 2015-16 में 3.4 हुआ है।

जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया था, केंद्र के मिशन ‘परिवार विकास कार्यक्रम’ के अनुसार बिहार के 38 जिलों में, 36 को उच्च-प्रजनन जिलों का दर्जा दिया गया है।

नवंबर 2016 में लॉन्च किए गए इस कार्यक्रम का लक्ष्य 2025 तक 135 जिलों में टीएफआर को 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर तक कम करना है, जैसा कि नवंबर 2017 में हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट में बताया गया है।प्रतिस्थापन-स्तर की उर्वरता बच्चों की औसत संख्या को दर्शाती है जो एक महिला को जनसंख्या को स्थिर रखना होगा।

एनएफएचएस के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में गर्भनिरोधक की किसी भी पद्धति का उपयोग करने वालों का तीसरी सबसे बड़ा प्रतिशत, प्रेमलता देवी के जिले गया में है - 2015-16 में 36 फीसदी। हमने पाया कि उच्च जागरुकता के बावजूद गर्भनिरोधक का कम उपयोग है।

हमारे सर्वेक्षण से पता चलता है कि सर्वेक्षण में शामिल सभी महिलाओं में से लगभग 94 फीसदी महिलाओं (और 97.8 फीसदी विवाहित महिलाओं) को गर्भनिरोधक के कम से कम आठ तरीकों में से एक के बारे में पता था। इसमें पारंपरिक और आधुनिक तरीके शामिल थे।

हमने पाया कि गर्भनिरोधक का उपयोग विवाहित (27 फीसदी) महिलाओं की तुलना में अविवाहित और यौन रूप से सक्रिय (42 फीसदी) महिलाओं में ज्यादा था। पसंद किए गए गर्भ निरोधकों के संदर्भ में, अविवाहित महिलाओं ने गर्भनिरोधक गोली (11.2 फीसदी) को वरीयता दी, जबकि विवाहित महिलाओं ने कॉपर आईयूडी (8.6 फीसदी) को प्राथमिकता दी।

अधिक शिक्षा = गर्भ निरोधकों के बारे में अधिक जागरूकता

सर्वेक्षण समूह को दो में विभाजित किया गया था। किसी भी यौन संबंध में 15-49 की उम्र के बीच की महिलाएं और वे महिलाएं जो आमतौर पर यौन रूप से सक्रिय थीं।

हमने पाया, आधुनिक तरीकों के बारे में जागरूकता ज्यादा थी। सर्वेक्षण में शामिल 94.2 फीसदी महिलाओं को आधुनिक तरीकों (कंडोम, आईयूडी, आदि) के बारे में पता था, और केवल 46.2 फीसदी को पारंपरिक तरीकों के बारे में जानकारी थी।

गया में सर्वेक्षण की गई महिलाओं में से, 20 फीसदी गर्भनिरोधक के किसी न किसी रूप का उपयोग कर रही थीं; उनमें से 15 फीसदी आधुनिक तरीकों का उपयोग कर रही थीं। कम उपयोग के कारणों में साइड-इफ़ेक्ट का डर और गर्भवती होने की इच्छा शामिल थी।

Methods Of Contraception
Traditional Methods of Contraception Include breastfeeding, withdrawal by men
Modern Methods of Contraception Include female and male sterilisation, the contraceptive pill, intrauterine device (IUD), post-partum IUD (PPIUD, injectables, male and female condoms, and emergency contraception

Source: IndiaSpend primary research

सर्वेक्षण के दौरान एकत्र किए गए आंकड़ों से पता चला है कि सामान्य तौर पर, शहरों में रहने वाली महिलाओं ने सेकेंड्री स्कूल शिक्षा प्राप्त की है और पति या साथी के साथ यौन रुप से सक्रिय हैं और कम से कम आठ गर्भनिरोधक विधियों में से एक के संबंध में उन्हें जानकारी थीं।

विवाहित महिलाओं में, सर्वेक्षण अवधि के दौरान 27.1 फीसदी गर्भनिरोधक का उपयोग कर रही थीं। 2015-16 के एनएफएचएस आंकड़ों की तुलना में, यह दो वर्षों में आठ प्रतिशत अंक की गिरावट है।

शिक्षा का मतलब परिवार नियोजन उपकरणों का अधिक उपयोग

जैसा कि हमने पहले कहा, विवाहित महिलाओं ने अविवाहित यौन सक्रिय महिलाओं की तुलना में गर्भनिरोधक का कम उपयोग दिखाया। इसके अलावा, उन महिलाओं के बीच गर्भनिरोधक का अधिक उपयोग हुआ, जिन्होंने अपनी प्राइमरी शिक्षा पूरी की और सेकेंड्री स्कूल तक गए। वे आधुनिक तरीके पसंद करते थे।

भारतीयों में गर्भनिरोधक का उपयोग(विशेष रूप से आधुनिक तरीके का) 2005-06 और 2015-16 के बीच घटा है। इसका मुख्य कारण पसंदीदा तरीकों की अनुपलब्धता और पुरुषों की अनिच्छा रही है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने अगस्त 2016 की रिपोर्ट में बताया है।

एक बाद के अध्ययन से पता चला है कि आठ साल से 2016 तक, भारत में गर्भनिरोधक का उपयोग 35 फीसदी गिरा था, जैसा कि इंडियास्पेंड ने फरवरी 2017 में रिपोर्ट किया था। पिछले 10 वर्षों से 2015-16 तक, पुरुष नसबंदी की दर भी 1 फीसदी से 0.3 फीसदी तक गिर गई थी।

बिहार में पुरुषों के बीच, कंडोम का उपयोग 2.3 फीसदी से 1 फीसदी तक प्रतिशत से अधिक गिर गया। पुरुष नसबंदी को अपनाने वाले पुरुषों का प्रतिशत 2005-06 में 0.6 फीसदी से शून्य हो गया, जैसा कि एनएफएचएस 4 डेटा से पता चलता है।

कुछ पुरुषों का मानना ​​है कि कंडोम यौन सुख को कम करता है और पुरुष नसबंदी से उनका पौरुष समाप्त हो जाता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने फरवरी 2017 की रिपोर्ट में बताया है। हालांकि पुरुष नसबंदी एक तेज, सुरक्षित और स्वस्थ विकल्प है, लेकिन वे दुनिया भर में एक अलोकप्रिय पद्धति बने हुए हैं। यूनाइटेड किंगडम के राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के अनुसार, महिला नसबंदी के साथ, आंतरिक रक्तस्राव, संक्रमण या यहां तक ​​कि एक अस्थानिक गर्भावस्था (गर्भ के बाहर निषेचित अंडाणु) का एक छोटा जोखिम होता है।

कॉपर-टी सबसे लोकप्रिय तरीका

मेडिकल पेशेवरों ने कंडोम, पुरुष नसबंदी और महिलाओं के लिए, खाने वाली गोलियां और आईयूडी की सलाह दी है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने फरवरी 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

गया में गर्भनिरोधक का उपयोग करने वाली 20 फीसदी महिलाओं में से, आठ तरीकों की लोकप्रियता ने काम किया (टेबल देखें)।

गया में सभी महिलाओं द्वारा पसंद की गई गर्भनिरोधक विधि कॉपर-टी थी, जिसमें से 4 फीसदी वर्तमान में उस पद्धति का उपयोग कर रही थीं। दूसरा सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला पुरुषों का पारंपरिक तरीका था-जो 2.8 फीसदी था। 

विवाहित महिलाओं में, पसंदीदा विधि कॉपर-टी थी। 8.6 फीसदी ने उस पद्धति को चुना, इसके बाद गर्भनिरोधक गोली 4.8 फीसदी पसंदीदा विकल्प थी।

हमने अध्ययन के दौरान नमूना जिलों में पाया कि अविवाहित महिलाओं की पसंदीदा विधि गोली (11.2 फीसदी) थी, इसके बाद आईयूडी (9.4 फीसदी) थी। उनकी शिक्षा और निवास का स्तर अन्य निर्धारित कारक थे-शहरों में रहने वाली महिलाएं और जो प्राइमरी शिक्षा पूरी कर चुकी थीं और सेकेंड्री स्कूल तक गई थीं, उनमें गर्भनिरोधक उपयोग की प्रतिशतता अधिक थी।

धन और गर्भनिरोधक उपयोग के बीच संबंध स्पष्ट नहीं थे, लेकिन अधिक संपत्ति की श्रेणियों में महिलाओं ने गर्भनिरोधक उपयोग के उच्च प्रतिशत को दिखाया है।

दो आलेखों वाली श्रृंखला का यह पहला आलेख है।

( दास ‘इंटरनेशनल ग्रोथ सेंटर-इंडिया’ में प्रोग्राम पॉलिसी मैनेजर हैं। उनके पास ‘लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स’ से सामाजिक नीति में ‘मास्टर ऑफ रिसर्च’ की डिग्री और और ‘ससेक्स विश्वविद्यालय’ के ‘इंस्टूट ऑफ डेवलप्मेंट स्टडीज’ से डेवलप्मेंट स्टडीज में एमए की डिग्री है। )

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 23 जुलाई 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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