<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?>
<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" version="2.0">
<channel>
<title><![CDATA[इंडियास्पेंड: डेटा पत्रकारिता, भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्लेषण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कृषि, राजनीति]]></title>
<description><![CDATA[इंडियास्पेंड: डेटा पत्रकारिता, भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्लेषण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कृषि, राजनीति]]></description>
<link>https://www.indiaspendhindi.com</link>
<image>
<url>https://www.indiaspendhindi.com/images/logo.png</url>
<title>इंडियास्पेंड: डेटा पत्रकारिता, भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्लेषण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कृषि, राजनीति</title>
<link>https://www.indiaspendhindi.com</link>
</image>
<generator>Hocalwire</generator>
<lastBuildDate>Sat, 01 May 2021 03:38:19 GMT</lastBuildDate>
<atom:link href="https://www.indiaspendhindi.com/category/top-stories/feeds.xml" rel="self" type="application/rss+xml"/>
<pubDate>Sat, 01 May 2021 03:38:19 GMT</pubDate>
<copyright><![CDATA[Indiaspend Hindi]]></copyright>
<language><![CDATA[hi]]></language>
<managingEditor><![CDATA[editor@indiaspendhindi.com (IndiaSpend Hindi)]]></managingEditor>
<ttl>1</ttl>
<item>
<title><![CDATA[ग्राउंड रिपोर्ट: यूपी के 'सुपरस्प्रेडर' पंचायत चुनाव, 700 शिक्षकों की कोरोना से मौत]]></title>
<description><![CDATA[उत्तर प्रदेश शिक्षक संघ का दावा है कि पंचायत चुनाव में लगी ड्यूटी की वजह से 706 श‍िक्षकों की कोरोना से मृत्यु हुई है।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>लखनऊ। </b>उत्‍तर प्रदेश के आगरा जिले के रहने वाले 43 साल के बीपी कुशवाह की पंचायत चुनाव में ड्यूटी लगी थी। 15 अप्रैल को मतदान कराने के बाद कुशवाह घर लौट आए। परिजनों के मुताबिक, चुनाव ड्यूटी से लौटने के कुछ दिन बाद से उनकी तबीयत खराब होने लगी। मेड‍िकल स्‍टोर से दवाइयां लेते हुए कुछ द‍िन गुजरे थे कि 27 अप्रैल को तबीयत ज्‍यादा बिगड़ गई। घर वाले उन्‍हें लेकर अस्‍पताल भागे लेकिन अस्‍पताल पहुंचने से पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">पंचायत चुनाव में ड्यूटी लगने के बाद कोरोना से मौत का यह इकलौता मामला नहीं है। 'उत्‍तर प्रदेश प्राथमिक श‍िक्षक संघ' ने 29 अप्रैल को एक सूची जारी की जिसके मुताबिक, पंचायत चुनाव में शामिल 706 शिक्षक और कर्मचारियों की कोरोना से मौत हुई है। इसमें लखनऊ में 20, लखीमपुर खीरी में 19, रायबरेली में 26, सीतापुर में 17 और इसी तरह अलग-अलग जिलों के शिक्षक/कर्मचारियों के नाम शामिल हैं। शिक्षक संघ ने यह मांग भी रखी है कि 2 मई को होने वाली मतगणना को टाल दिया जाए।</p><p dir="ltr">"मेरे भाई की हत्‍या हुई है!" बेहद गुस्‍से में कुशवाह के बड़े भाई जितेंद्र कुशवाह (55) कहते हैं। "सबको पता था कि कोरोना है, लेकिन चुनाव में ड्यूटी लगा दी और भेज दिया मरने को। इंसान का हाल भेड़-बकरी सा बना दिया है। न जांच हो पाई, न हम अस्‍पताल में एडमिट करा पाए, रास्‍ते में ही दम तोड़ दिया। बाद में पोस्‍टमॉर्टम के लिए कहा कि कोविड में पोस्‍टमॉर्टम नहीं होता। हम कुछ नहीं कर पाए," उन्होंने बताया। </p><p dir="ltr">कुशवाह अपने पीछे 14 साल की बेटी, 12 साल के बेटे और पत्‍नी को छोड़ गए हैं। परिवार की च‍िंता है कि इनका गुजर बसर कैसे होगा। परिवार सरकार से मुआवजे और सरकारी नौकरी की मांग भी कर रहा है। यह जोड़ते हुए कि, "सरकार हमारा आदमी नहीं लौटा सकती।"</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/30/466421-panchayat1.webp" style="width: 100%;" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="44219MbHv5Dg6CvNGIxeMnxJV8KZZbPSmZQn0310737" data-watermark="false" info-selector="#info_item_1619780309498" title="सोनभद्र में पंचायत चुनाव के लिए श‍िक्षकों को प्रश‍िक्षण देने के दौरान कोरोना प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया था। ऐसी तस्‍वीरें यूपी के अलग-अलग ज‍िलों से आई थीं।&nbsp;" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1619780309498"><p>सोनभद्र में पंचायत चुनाव के लिए श‍िक्षकों को प्रश‍िक्षण देने के दौरान कोरोना प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया था। ऐसी तस्‍वीरें यूपी के अलग-अलग ज‍िलों से आई थीं।&nbsp;</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">उत्‍तर प्रदेश प्राथमिक श‍िक्षक संघ के अध्‍यक्ष द‍िनेश शर्मा <b>इंड‍ियास्‍पेंड </b>से कहते हैं, "पंचायत चुनाव की घोषणा के बाद जब प्रश‍िक्षण शुरू हुए तभी साफ हो गया था कि कोरोना के नियमों का पालन नहीं हो पायेगा। इसे देखते हुए मैंने 12 अप्रैल को निर्वाचन आयोग को खत लिखा कि चुनाव न कराए जाएं, लेकिन उसका संज्ञान नहीं लिया गया। इस बीच यह देखने को मिला कि जहां-जहां चुनाव हुए वहां शिक्षकों में संक्रमण ज्यादा फैल गया। इस बात से भी मैंने निर्वाचन आयोग को अवगत कराया और अब हमारी मांग है कि मतगणना टाल दी जाए।"<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">द‍िनेश शर्मा शिक्षकों की मौत के आंकड़ों पर कहते हैं, "एक अखबार में श‍िक्षकों की मौत से जुड़े आंकड़े छपे थे, करीब 135 शिक्षकों की मौत बताई गई। इसे देखते हुए हमने जिलों से शिक्षकों की मौत के आंकड़े मंगाए, जो अब तक (29 अप्रैल) 706 मिले हैं। इन आंकड़ों को हम मुख्‍यमंत्री और निर्वाचन आयोग को भेज रहे हैं। इसमें गौर करने वाली बात यह है कि 706 तो केवल शिक्षक हैं, जबकि उनके परिवार में भी मौत हो रही है, जिसकी कोई गिनती नहीं है। इन हालातों में अब मतगणना में जहर बांटने की तैयारी है, इसलिए मेरा अनुरोध है कि मतगणना अभी ना कराई जाए।"<br></p><p dir="ltr"><b>यूपी में तेजी से बढ़ रहा संक्रमण</b><br></p><p dir="ltr">उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों की शुरुआत 26 मार्च को इसकी <a href="https://navbharattimes.indiatimes.com/metro/lucknow/politics/up-panchayat-chunav-voting-schedule-of-all-75-districts/articleshow/81717572.cms"><u>घोषणा </u></a>के साथ हुई। मतदान चार चरणों (15,19,26 और 29 अप्रैल) के पंचायत चुनाव 15 अप्रैल से शुरू होकर 29 अप्रैल को सम्पन्न हुए जिसकी मतगणना 2 मई को होनी है। </p><p dir="ltr">अगर सरकार द्वारा जारी आंकड़ों पर गौर करें तो अप्रैल के महीने में कोरोना के मामले तेजी से बढ़े हैं। इंडियास्‍पेंड की <a href="https://indiaspendhindi.com/covid-19/corona-affects-up-badly-people-cant-find-bed-oxygen-test-744562"><u>रिपोर्ट</u></a> के मुताबिक, यूपी में 23 मार्च को रिपोर्ट किये गए सक्रिय मामले 3,844 थे, जो कि 23 अप्रैल को 2.7 लाख से ज्‍यादा हो गए। यानी एक महीने में रिपोर्ट किये गए सक्रिय मामलों की संख्‍या में 7018% की बढ़त हुई।</p><p dir="ltr">वहीं, 29 अप्रैल को राज्‍य में <a href="https://twitter.com/UPGovt/status/1387813808089952263"><u>35,156</u></a> नए मामले रिपोर्ट किए गए, जबकि इस दिन रिपोर्ट किये गए सक्रिय मामलों की संख्‍या 3 लाख से ज्‍यादा थी। उत्तर प्रदेश में कोरोना की शुरुआत (मार्च 2020) से लेकर 29 अप्रैल 2021 तक 12,238 लोगों की मौत कोरोना से रिपोर्ट की गई है।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/30/466422-6h0a5511-01.webp" style="width: 100%;" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421iYnXTs4VoNGlKCAYB1Ldac4e4l0ut5890533142" data-watermark="false" info-selector="#info_item_1619780536701" title="लखनऊ के राम मनोहर लोहिया अस्‍पताल में एक मरीज की जांच करता जूनियर डॉक्‍टर। फोटो: सुम‍ित कुमार" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1619780536701"><p>लखनऊ के राम मनोहर लोहिया अस्‍पताल में एक मरीज की जांच करता जूनियर डॉक्‍टर। फोटो: सुम‍ित कुमार<br></p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b>श‍िक्षकों में संक्रमण का डर</b><br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">यह आंकड़े उत्तर प्रदेश में कोरोना के संक्रमण की तेज गति को बताने के लिए काफी हैं। ऐसे में शिक्षकों को ड्यूटी के दौरान संक्रमित होने का डर है और साथ ही अपने साथ‍ियों की मौत की खबर सुनकर यह डर और भी बढ़ जाता है। </p><p dir="ltr">आगरा के रहने वाले एक शिक्षक नाम न लिखने की शर्त पर बताते हैं, "लोगों से कहा जा रहा है कि बाहर कम से कम निकलें और उसी वक्‍त हमारी ड्यूटी मतगणना में लगाई जा रही है। मुझे खुद से ज्‍यादा अपने परिवार का डर है। प‍िताजी की उम्र ज्‍यादा है और उन्हें कई बीमारियां भी हैं, अगर मुझसे होते हुए संक्रमण उन तक गया और मुझे या उन्‍हें कुछ हो गया तो इसका जिम्‍मेदार कौन होगा?"</p><p dir="ltr">वहीं, अमेठी ज‍िले के रहने वाले एक प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक नाम न लिखने की शर्त पर बताते हैं, "मेरी पत्‍नी कोरोना पॉजिट‍िव है, लेकिन मेरी ड्यूटी मतगणना में लगी है। मैंने अध‍िकारियों को यह बात बताई, लेकिन अभी तक ड्यूटी कटी नहीं है। हालांकि मैंने तय कर लिया है कि इस हाल में चुनाव ड्यूटी पर नहीं जाऊंगा। मेरी छोटी बच्‍ची है, मुझे उसका भी ख्‍याल रखना है, जो भी एक्‍शन लिया जाएगा सह लेंगे।" अमेठी के यह श‍िक्षक बताते हैं कि उनके जानने वाले तीन श‍िक्षकों की कोरोना से असमय मौत हो चुकी है। उनकी चुनाव में ड्यूटी लगी थी।<br></p><p dir="ltr">अमेठी के बेस‍िक श‍िक्षा अध‍िकारी की ओर से 28 अप्रैल को जारी एक पत्र में भी यह साफ होता है कि जिले में पंचायत चुनाव की ड्यूटी में लगे 10 कर्मचारियों की मौत हुई है। इस संदर्भ में जिले के प्रभारी बेस‍िक श‍िक्षा अध‍िकारी श‍िव बहादुर मौर्य <b>इंड‍ियास्‍पेंड </b>से कहते हैं, "कोरोना की वजह से मौत हो रही है और श‍िक्षकों की ड्यूटी लगी है तो उससे इन मौतों को जोड़ दिया जा रहा है। चुनाव ड्यूटी में लगे किसी भी कर्मचारी की कोरोना रिपोर्ट अगर पॉजिट‍िव आती है तो उसकी ड्यूटी काट दी जा रही है।"<br></p><p dir="ltr">हालांकि, टेस्ट रिपोर्ट पॉजिटिव आने पर ड्यूटी कटने की बात पर शिक्षकों का कहना है कि कोरोना जांच की व्यवस्था प्रशासन को करनी चाहिए थी। आगरा के एक शिक्षक ने नाम न लिखने की शर्त पर बताया, "प्रशिक्षण से लेकर मतदान तक किसी की जांच नहीं हुई। प्रशिक्षण के दिन तो ब्लॉक पर जमकर भीड़ जुटी थी और कोई व्यवस्था नहीं थी। अगर किसी एक को भी कोरोना रहा होगा तो उसने कई लोगों को बांट दिया होगा। अब मतगणना से पहले भी जिनकी ड्यूटी लगी है उनकी कोरोना जांच कराने की कोई व्यवस्था नहीं है, न ही कोई नियम है कि इन्हें जांच कराना है।"<br></p><p dir="ltr"><b>हाईकोर्ट में मामला</b><br></p><p dir="ltr">वहीं, श‍िक्षकों की मौत से जुड़ी खबरों के बाद <a href="http://www.allahabadhighcourt.in/"><u>इलाहाबाद हाईकोर्ट </u></a>ने सख्‍त रुख अपनाया है। कोर्ट ने <a href="http://sec.up.nic.in/site/"><u>राज्‍य निर्वाचन आयोग </u></a>को नोटिस जारी करते हुए पूछा कि पंचायत चुनाव के दौरान कोविड प्रोटोकॉल्स का पालना क्यों नहीं किया गया। कोर्ट ने आयोग से जवाब मांगा है कि अध‍िकारियों के खिलाफ आपराध‍िक मुकदमा क्‍यों न चलाया जाए। साथ ही कोर्ट ने चुनाव में कोरोना गाइडलाइंस का पालन सुनिश्चित करने का <a href="https://www.livelaw.in/pdf_upload/allahabad-hc-covid-19-392522.pdf"><u>आदेश</u></a> भी दिया है। हालांकि आयोग को जवाब 3 मई को देना है और मतगणना 2 मई को खत्‍म हो जाएगी।</p><p dir="ltr">इस मामले का एक पहलू यह भी है कि हाईकोर्ट 27 अप्रैल को कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करने को कहता है और इसके अगले द‍िन प्रदेश के अलग-अलग सामुदायिक स्‍वास्‍थ्‍य केंद्रों पर कोरोना जांच के ल‍िए खूब भीड़ जुटती है। ऐसा इसलिए क्‍योंकि मतगणना के द‍िन प्रत्याशियों और मतगणना एजेंटों के पास कोरोना नेगेट‍िव रिपोर्ट होना अनिवार्य है। आरटीपीसीआर या रैपिड एंटीजन निगेटिव रिपोर्ट के बिना किसी को मतगणना स्थल में जाने नहीं दिया जाएगा।</p><p dir="ltr">वहीं, हाईकोर्ट की फटकार के बाद राज्य निर्वाचन आयोग ने मतगणना के दिन कोविड प्रोटोकॉल का पालन करने संबंधित आदेश भी जारी किया है। इसमें मास्क लगाना, सामाजिक दूरी बनाना, मतगणना केंद्र पर भीड़ न इकट्ठा करने जैसी बातें कही गई हैं। साथ ही प्रत्याशियों और एजेंटों को 48 घण्टे पहले की कोरोना नेगेटिव रिपोर्ट या वैक्सिनेशन कोर्स पूर्ण होने संबंधी रिपोर्ट दिखाना अनिवार्य है। अगर इनकी रिपोर्ट नेगेटिव नहीं होगी तो मतगणना स्थल पर प्रवेश नहीं दिया जाएगा।<br></p><p dir="ltr">इसके विपरीत जिन शिक्षकों की ड्यूटी मतगणना में लगी है उनका कोरोना जांच कराने जैसा कोई नियम नहीं है। देवरिया जिले के एक शिक्षक ने नाम न लिखने की शर्त पर कहा, "प्रत्याशी और एजेंट कोरोना जांच करा रहे हैं, लेकिन हमारी कोई जांच नहीं हो रही। मतगणना में ड्यूटी लगा दी है और अपने हाल पर छोड़ दिया है। कोई सुनवाई नहीं है।"<br></p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i><br></p><div><br></div></div><p><br></p>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/covid-19/ups-super-spreader-panchayat-polls-700-teachers-die-of-corona-745539</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/covid-19/ups-super-spreader-panchayat-polls-700-teachers-die-of-corona-745539</guid>
<category><![CDATA[Covid-19,उत्तर प्रदेश,कवर स्टोरी,सेहत,सेहतकीपड़ताल,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[रणविजय सिंह]]></dc:creator>
<pubDate>Fri, 30 Apr 2021 11:03:14 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/30/500x300_466420-whatsapp-image-2021-04-30-at-123204-pm.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यूपी में कोरोना का भीषण प्रकोप; जांच, बेड और ऑक्‍सीजन के ल‍िए भटकते लोग]]></title>
<description><![CDATA[यूपी में 23 मार्च को 3,844 सक्रिय मामले थे, जो कि 23 अप्रैल को 2.7 लाख से ज्‍यादा हो गए। यानी एक महीने में सक्रिय मामलों की संख्‍या में करीब 7018% की बढ़त हुई।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>लखनऊ: </b>"रात के करीब 12 बज रहे थे और मेरी मां की तबीयत खराब होने लगी। उनका ऑक्‍सीजन लेवल 70 था और लगातार गिर रहा था। हम आनन फानन में उन्‍हें लेकर अस्‍पताल भागे, लेकिन कहीं बेड नहीं मिला। अस्‍पतालों के चक्‍कर लगाते रात के ढाई बज गए और उनकी सांस टूटने लगी। मैंने तमाम मिन्‍नतें की, सारे सोर्स लगा दिए, लेकिन मां को बचा नहीं पाया," यह कहते हुए कानपुर के रहने वाले अनुराग वर्मा (35) का गला भर आता है।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">अनुराग की 65 साल की मां प्रेमलता वर्मा को कोविड था, हालांकि इसकी पुष्टि भी उनकी मौत के बाद हो पाई। अनुराग कहते हैं, "मैं पहले जांच के ल‍िए इधर-उधर भटकता रहा। जैसे-तैसे जांच हुई थी और अभी रिपोर्ट आती उससे पहले मां गुजर गई। जांच से लेकर बेड तलाशने में 3 द‍िन निकल गए। अगर यह सब जल्‍दी होता तो शायद मां जिंदा होती। मेरा इस सिस्‍टम से भरोसा उठ गया है।"</p><p dir="ltr">इन दिनों उत्तर प्रदेश में रोजाना इस तरह की मामले देखने को मिल रहे हैं। राज्‍य में कोरोना की दूसरी लहर पिछली बार के मुकाबले ज्यादा घातक नजर आ रही है। लोग जांच, इलाज, अस्पताल और श्मशान में अंतिम संस्कार के लिए भटकते नजर आते हैं।</p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><iframe src="https://www.facebook.com/plugins/video.php?height=308&amp;href=https%3A%2F%2Fwww.facebook.com%2FIndiaSpendHindi%2Fvideos%2F453780462563183%2F&amp;show_text=false&amp;width=560" width="560" height="308" style="border:none;overflow:hidden" scrolling="no" frameborder="0" allowfullscreen="true" allow="autoplay; clipboard-write; encrypted-media; picture-in-picture; web-share"></iframe></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">इंडियास्पेंड ने उत्तर प्रदेश के पिछले एक महीने के कोरोना के रिपोर्ट किये गए आंकड़ों का अवलोकन किया और पाया कि 23 मार्च को उत्तर प्रदेश में कोरोना के <a href="https://twitter.com/UPGovt/status/1374380471061155841?s=19"><u>638</u></a> नए मामले दर्ज किए गए। वहीं, एक महीने बाद 23 अप्रैल को हर दिन आने वाले नए मामलों की संख्‍या <a href="https://twitter.com/UPGovt/status/1385603464793780225?s=19"><u>37,238</u></a> से ज्‍यादा हो गई। यानी कोरोना के नए मामले करीब 5736% बढ़ गए।<br></p><p dir="ltr">वहीं, बात करें सक्रिय मामलों की तो 23 मार्च को 3,844 रिपोर्ट किये गए मामले थे, जो कि 23 अप्रैल को <a href="https://twitter.com/UPGovt/status/1385603464793780225?s=19"><u>2.7 लाख</u></a> से ज्‍यादा हो गए। यानी एक महीने में रिपोर्ट किये गए सक्रिय मामलों की संख्‍या में करीब 7018% की बढ़त हुई। यह आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में कोरोना कितनी तेजी फैल रहा है। 17 अप्रैल को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दी गयी जानकारी के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में रिपोर्ट की गयी पॉजिटिविटी दर 2.2, रिकवरी दर 78.1 और मृत्यु दर 1.2 है।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/26/464045-16194323068386h0a5511-01.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421WRVnOTICy49IPA56PL2vXqiBNdRwAsDj5301593" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1619445307667" title="लखनऊ के राम मनोहर लोहिया अस्‍पताल में एक मरीज की जांच करता जूनियर डॉक्‍टर। फोटो: सुम‍ित कुमार" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1619445307667"><p>लखनऊ के राम मनोहर लोहिया अस्‍पताल में एक मरीज की जांच करता जूनियर डॉक्‍टर। फोटो: सुम‍ित कुमार</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">उत्तर प्रदेश में जहां 37 हजार से ज्यादा मामले रिपोर्ट किए गए तो वहीं देश में 23 अप्रैल को कोरोना के रिपोर्ट किए गए नए मामलों की संख्या <a href="https://www.google.com/amp/s/m.jagran.com/lite/news/national-344949-new-cases-of-corona-found-and-2415-deaths-in-country-record-deaths-in-maharashtra-and-delhi-21586145.html"><u>3,44,949</u></a> थी, जिसमें महाराष्ट्र में 66,836, उत्तर प्रदेश में 37,238 और केरल में 28,447 मामले शामिल थे। आंकड़ों से साफ है कि देश में रिपोर्ट किए गए मामलों में से करीब 10.7% नए मामले यूपी में रिपोर्ट किए गए। भारत में 23 अप्रैल को रिपोर्ट की गई कुल रिकवरी दर 83.49% थी जो कि उत्तर प्रदेश के रिपोर्ट की गई रिकवरी दर से 5.3% ज़्यादा थी। वहीं बात करें रिपोर्ट की गयी मृत्यु दर कि तो भारत की मृत्यु दर उस दिन 1.14% थी जो कि उत्तर प्रदेश की दर से .06% कम थी।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b>लखनऊ का बुरा हाल</b><br></p><p dir="ltr">उत्तर प्रदेश में सबसे बुरे हालात लखनऊ में देखने को मिल रहे हैं, जहां लोग जांच, इलाज और श्मशान में अंतिम संस्कार के लिए भी परेशानी का सामना कर रहे हैं। हालात कितने खराब हैं इसका अंदाजा ऐसे लगा सकते हैं कि वरिष्‍ठ पत्रकार विनय श्रीवास्‍तव (65) बलरामपुर जिला अस्‍पताल के दरवाजे पर खड़े होकर ट्विटर पर मदद मांगते रहे, लेकिन मदद नहीं मिली और उनकी मौत हो गई।<br></p><p dir="ltr">विनय श्रीवास्‍तव ने 16 अप्रैल की शाम ट्वीट किया कि उनकी उम्र 65 साल है और उनका ऑक्‍सीजन लेवल 52 हो गया है। कोई भी डॉक्‍टर फोन नहीं उठा रहा। जब रात में कोई मदद नहीं मिली तो 17 अप्रैल को द‍िन में विनय श्रीवास्‍तव अपने बेटे के साथ जिला अस्‍पताल पहुंच गए। यहां गार्ड ने उन्‍हें अस्‍पताल में नहीं जाने दिया। चंद कदमों की दूरी पर मुख्यमंत्री कार्यालय भी था, जहां वो अंदर नहीं जा सके।</p><blockquote class="twitter-tweet"><p lang="hi" dir="ltr"><a href="https://twitter.com/hashtag/CMYogiAdityanath?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw">#CMYogiAdityanath</a> आपके राज्ये में डॉक्टर अस्पताल और पाठलाभः सब निरंकुश हो गए है मैं 65 की आयु का हु इसके साथ मुझे स्पोंतलिटेस्ट भी है जिसकी वजह से मेरे ऑक्सीजन घाट के 52 हो गया है और कोई भी हॉस्पिटल लैब एवं डॉ फ़ोन नही उठा रहे</p>— Vinay Srivastava (@VinaySr18286715) <a href="https://twitter.com/VinaySr18286715/status/1383063134957498368?ref_src=twsrc%5Etfw">April 16, 2021</a></blockquote><p dir="ltr">कई लोगों ने जब विनय श्रीवास्‍तव के ट्वीट को आगे बढ़ाया तो उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आद‍ित्‍यनाथ के सूचना सलाहकार शलभ मण‍ि त्र‍िपाठी ने ट्वीट में रिप्‍लाई कर उनकी जानकारी मांगी। जानकारी देने के काफी देर बाद भी जब मदद नहीं मिली तो विनय श्रीवास्‍तव ने लिखा मेरा ऑक्‍सीजन लेवल 50 हो गया है और बलरामपुर जिला अस्‍पताल का गार्ड मुझे अस्‍पताल में घुसने नहीं दे रहा।<br></p><p dir="ltr">इसके बाद शलभ मण‍ि त्र‍िपाठी ने फिर से रिप्‍लाई किया कि 'पूरी जानकारी भेजिए।' इसपर विनय श्रीवास्‍तव ने ट्वीट के माध्यम से फिर से जानकारी भेजी। हालांकि जानकारी भेजने के बाद भी मदद नहीं मिल सकी। व‍िनय श्रीवास्‍तव ने आख‍िर में ट्वीट किया 'मेरा ऑक्‍सीजन लेवल 31 हो गया है, मेरी मदद कब की जाएगी।' इस ट्वीट के बाद विनय का कोई ट्वीट नहीं आया, इलाज न मिलने के कारण उनकी मौत हो गई।<br></p><p dir="ltr">विनय श्रीवास्‍तव के बेटे हर्ष‍ित इंड‍ियास्‍पेंड से कहते हैं, "हमारी वक्‍त पर मदद हो जाती तो शायद पापा को बचाया जा सकता था। हम सीएमओ कार्यलय के पास खड़े थे, ट्वीट पर मुख्‍यमंत्री के सूचना सलाहकार जवाब दे रहे थे, लेकिन मदद नहीं मिल पाई। इससे बड़ा सिस्‍टम फेलियर क्‍या होगा? मैं इतना ही कहूंगा कि नेता चुनाव में वोट मांगने आते हैं, उसके बाद आपसे कोई मतलब नहीं होता।"<br></p><p dir="ltr">ऐसा नहीं कि यह एकलौता मामला है, लखनऊ में हर द‍िन ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। बेड की तलाश में अस्‍पतालों के चक्‍कर काटते हुए लोगों की मौत हो जा रही है। आलम यह है कि कोविड मरीज की तबीयत ज्‍यादा खराब हुई तो मुख्यमंत्री कार्यलय द्वारा जारी एलॉटमेंट लेटर या आम बोलचाल की भाषा में 'भर्ती स्‍लिप' के बिना कोविड अस्‍पताल में एडमिट नहीं किया जाता है।<br></p><p dir="ltr">हालांकि, भर्ती स्‍लिप की प्रकिया का बहुत ज्‍यादा विरोध होने पर 22 अप्रैल को सरकार ने इसमें कुछ <a href="https://www.amarujala.com/amp/lucknow/compulsion-over-of-cmo-referral-letter-for-admit-corona-infected-patients-in-lucknow"><u>बदलाव</u></a> किए। अब प्राइवेट कोविड हॉस्‍प‍िटल बिना भर्ती स्लिप के भी मरीजों को एडमिट कर सकते हैं। हालांकि सरकारी अस्पताल और प्राइवेट और सरकारी मेडिकल कॉलेज के 70% बेड भर्ती स्‍लिप के तहत ही दिए जाएंगे। केवल 30% बेड पर अस्पताल प्रशासन इमरजेंसी के आधार पर तय कर सकता है।<br></p><p dir="ltr">लखनऊ में कोरोना के मामले कितनी तेजी से बढ़े हैं इसका अंदाजा ऐसे लगा सकते हैं कि 23 मार्च को लखनऊ में सक्रिय मामलों की संख्‍या 954 थी। वहीं, एक महीने बाद 23 अप्रैल को सक्रिय मामलों की संख्‍या 53,475 हो गई, करीब 5505% की बढ़त। लखनऊ में फिलहाल हर द‍िन 5 हजार से ज्‍यादा नए मामले आ रहे हैं।<br></p><p dir="ltr"><b>जांच की दुश्‍वारियां</b><br></p><p dir="ltr">लखनऊ के अलावा प्रदेश के अन्‍य बड़े जिलों जैसे वाराणसी, प्रयागराज, कानपुर, मेरठ और गौतमबुद्ध नगर में भी हालात खराब हैं। लोग जांच के लिए भटक रहे हैं, इलाज तो दूर की बात है। </p><p dir="ltr">वाराणसी के भरुइहां गांव की रहने वाली मन्‍नी देवी (70) की तबीयत अचानक खराब हुई तो परिवार के लोग उन्‍हें लेकर वाराणसी भागे। मन्‍नी देवी को कोरोना के लक्षण थे, लेकिन जांच न हो पाने की वजह से यह तय नहीं था। दो दिन तक करीब 10 अस्‍पतालों के चक्‍कर काटने के बाद एक प्राइवेट अस्‍पताल में उनका दाख‍िला हो सका।<br></p><p dir="ltr">मन्‍नी देवी के र‍िश्‍तेदार पीयूष प्रताप सिंह (40) बताते हैं, "मन्‍नी देवी मेरी बहन की सास हैं। उनको कुछ दिनों से बुखार आ रहा था, लेकिन परिवार को लगा यह मौसम बदलने की वजह से होगा, लेकिन हालात बिगड़ते गए। अभी घर में सभी लोगों की तबीयत खराब हैं, लेकिन जांच नहीं हो पा रही। ज्‍यादातर प्राइवेट लैब जांच से इनकार कर रहे हैं और सरकारी अस्‍पताल में जांच के लिए भीड़ लगी हुई है।"</p><blockquote class="twitter-tweet"><p lang="hi" dir="ltr">लखनऊ में कोरोना जांच के लिए लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. प्राइवेट लैब जांच करने से मना कर रहे हैं, कुछ लैब जांच को तैयार होते हैं तो वहां दाम काफी ज्यादा है. ऐसे में लोगों को भटकना पड़ रहा है. <a href="https://twitter.com/ranvijaylive?ref_src=twsrc%5Etfw">@ranvijaylive</a> की रिपोर्ट.<br>पूरी रिपोर्ट: <a href="https://t.co/WZAZqBfLZK">https://t.co/WZAZqBfLZK</a> <a href="https://t.co/r8qOX7OA2j">pic.twitter.com/r8qOX7OA2j</a></p>— इंडियास्पेंड (@IndiaSpendHindi) <a href="https://twitter.com/IndiaSpendHindi/status/1382369527598510087?ref_src=twsrc%5Etfw">April 14, 2021</a></blockquote><p dir="ltr">वाराणसी की तरह लखनऊ और गौतमबुद्ध नगर में भी जांच के लिए लोगों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। प्राइवेट लैब जांच से साफ इनकार कर दे रहे हैं या फिर जांच के ल‍िए मोटी रकम वसूल रहे हैं। जांच में आने वाली इन दिक्‍कतों के मद्देनजर लखनऊ प्रशासन ने <a href="https://hindi.news18.com/amp/news/uttar-pradesh/lucknow-now-corona-test-in-lucknow-24-private-hospitals-pathology-labs-get-test-siiting-at-home-in-rs-900-see-complete-list-upas-3568018.html"><u>24 अस्‍पतालों और प्राइवेट लैब</u></a> के नाम भी सामने रखे हैं, जहां लोग जांच करा सकते हैं। जांच के ल‍िए दाम भी तय किए गए हैं। अगर कोई व्‍यक्‍ति लैब जाकर सैंपल देता है तो उसे रुपए 700 देने होंगे, वहीं अगर घर से सैंपल कलेक्‍ट किया जाता हैं तो इसके रुपए 900 देने होंगे।<br></p><p dir="ltr">हालांकि इससे पहले भी जांच के दाम करीब-करीब यही थे, लेकिन प्राइवेट लैब दाम कम होने का हवाला देकर जांच नहीं कर रहे थे। वहीं कई लैब महंगे दाम पर जांच कर रहे थे। इसके अलावा प्राइवेट लैब में सीमित संख्‍या में सैंपल ल‍िए जाते हैं, ऐसे में इसका फायदा बड़ी संख्‍या में लोग नहीं ले पाते।<br></p><p dir="ltr">उत्तर प्रदेश में 23 अप्रैल तक करीब <a href="https://twitter.com/UPGovt/status/1385603080335478788?s=19"><u>3.9 करोड़</u></a> सैंपल की जांच की गई है। अकेले 23 अप्रैल को <a href="https://twitter.com/UPGovt/status/1385603080335478788?s=19"><u>2.25 लाख</u></a> सैंपल की जांच की गई, जिसमें से 1 लाख से अध‍िक जांच आरटी-पीसीआर के माध्‍यम से की गई। यह जानकारी अपर मुख्य सचिव सूचना नवनीत सहगल ने एक प्रेस कॉनफ्रेंस में दी।<br></p><p dir="ltr"><b>ऑक्‍सीजन की किल्‍लत</b><br></p><p dir="ltr">इलाज और जांच की दिक्‍कत के अलावा उत्तर प्रदेश में लोग ऑक्‍सीजन की किल्‍लत से भी जूझ रहे हैं। क्‍योंकि अस्‍पताल में बेड असानी से नहीं मिल रहे, ऐसे में लोग होम आइसोलेशन में रहते हुए ऑक्‍सीजन का प्रयोग कर रहे हैं। वाराणसी के रहने वाले विद्या सागर सिंह (53) भी कोरोना पॉजिट‍िव हैं। ऑक्‍सीजन लेवल 87 के आस-पास होने पर वाराणसी के तमाम अस्‍पतालों के चक्‍कर काट द‍िए, लेकिन कहीं बेड नहीं मिला। आख‍िर में घर में ही ऑक्‍सीजन सिलेंडर के सहारे इलाज चल रहा है।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/26/464052-dsc6567-01.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="44218KAgtweU1V45g3ycWT61uLqLuHHgFJt65714977" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1619445720584" title="लखनऊ के नादरगंज रिफल‍िंग सेंटर के बाहर लगी ऑक्‍सीजन सिलेंडर की लाइन। फोटो: सुम‍ित कुमार&nbsp;" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1619445720584"><p>लखनऊ के नादरगंज रिफल‍िंग सेंटर के बाहर लगी ऑक्‍सीजन सिलेंडर की लाइन। फोटो: सुम‍ित कुमार&nbsp;</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">विद्या सागर सिंह के बेटे चंदन बताते हैं, "वाराणसी के दर्जनभर अस्‍पतालों के चक्‍कर काट द‍िए, कहीं बेड नहीं है तो कहीं ऑक्‍सीजन न होने का हवाला दे रहे हैं। मैंने सोचा कि ऑक्‍सीजन स‍िलेंडर खरीद लेता हूं, लेकिन उसका दाम रुपए  45 हजार बताया गया। सिलेंडर और ऑक्‍सीजन में जमकर कालाबाजारी हो रही है। एक रिश्‍तेदार ने अपना सिलेंडर दिया है, फिलहाल उसी से काम चला रहे हैं।"<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">ऑक्‍सीजन की बढ़ती मांग और किल्‍लत के बीच मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने <a href="https://twitter.com/myogioffice/status/1384799110302081027?s=19"><u>आदेश</u></a> दिया कि अति गंभीर परिस्थिति को छोड़कर किसी को व्यक्तिगत रूप से ऑक्सीजन की आपूर्ति न की जाए। केवल संस्थागत आपूर्ति ही होगी।</p><blockquote class="twitter-tweet"><p lang="hi" dir="ltr">ऑक्सीजन की मांग और आपूर्ति में संतुलन बना रहे इस हेतु सभी अस्पतालों में मेडिकल ऑक्सीजन का ऑडिट कराया जाना चाहिए। ऑक्सीजन की कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ त्वरित और कठोरतम कार्रवाई की जाए: मुख्यमंत्री श्री <a href="https://twitter.com/myogiadityanath?ref_src=twsrc%5Etfw">@myogiadityanath</a> जी महाराज</p>— Yogi Adityanath Office (@myogioffice) <a href="https://twitter.com/myogioffice/status/1384799108636966915?ref_src=twsrc%5Etfw">April 21, 2021</a></blockquote><p dir="ltr">इस आदेश के बाद से होम आइसोलेशन में रह रहे मरीजों की दिक्‍कतें बढ़ गई हैं। परिजन सुबह से शाम तक सिलेंडर रिफिल कराने के लिए भटक रहे हैं, लेकिन सिलेंडर नहीं भरा पा रहे। वहीं, कुछ सप्‍लायर दोगुने-तीगुने दाम पर चोरी-छ‍िपे ऑक्‍सीजन भर रहे हैं।<br></p><p dir="ltr">लखनऊ के रहने वाले बिलाल जाफरी बताते हैं, "ऑक्‍सीजन के ल‍िए बहुत भटकना पड़ रहा है। अब तो केवल अस्‍पतालों को ऑक्‍सीजन देने का आदेश है। मेरी मां कोरोना पॉजिट‍िव हैं, उनका ऑक्‍सीजन लेवल कम रहता है, इसलिए मुझे जरूरत पड़ रही है। सरकार को सोचना चाहिए कि हर मरीज अस्‍पताल में भर्ती नहीं है, बहुत से लोग होम आइसोलेशन में हैं, उनके ल‍िए ऑक्‍सीजन ही सहारा है।"<br></p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i><br></p><div><br></div></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/covid-19/corona-affects-up-badly-people-cant-find-bed-oxygen-test-744562</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/covid-19/corona-affects-up-badly-people-cant-find-bed-oxygen-test-744562</guid>
<category><![CDATA[Covid-19,उत्तर प्रदेश,कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,सेहत,सेहतकीपड़ताल,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[रणविजय सिंह]]></dc:creator>
<pubDate>Mon, 26 Apr 2021 14:03:56 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/26/500x300_464072-picsart04-26-052220.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कुम्भ के दौरान हरिद्वार में 400% तक बढ़ें कोरोना के एक्टिव मामले]]></title>
<description><![CDATA[1 अप्रैल को हरिद्वार में कोरोना के 149 मामले सामने आये थे। 15 अप्रैल तक पॉजिटिव मामलों में लगातार वृद्धि हुई और इस दिन के मामलों की संख्या 623 थी यानि लगभग चार गुना वृद्धि।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>लखनऊ:</b> देश में बढ़ते कोरोना संक्रमण के बीच उत्तराखंड के हरिद्वार में आयोजित किये जा रहे महाकुम्भ पर कई सवाल उठाये जा रहे हैं। जहाँ उत्तराखंड सरकार का कहना है कि कुम्भ में आने वाले श्रद्धालुओं की कोविड स्क्रीनिंग और टेस्टिंग के लिए पुख्ता इंतेज़ाम किये गए हैं और इस आयोजन से कोरोना संक्रमण बढ़ने का कोई खतरा नहीं है, वहीं राज्य के आंकड़े और ख़बरें कुछ और कहानी बयां करते हैं।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">इंडियास्पेंड ने हरिद्वार के 1 अप्रैल से 15 अप्रैल के बीच के कोरोना आंकड़ों का परिक्षण किया और पाया कि हरिद्वार में पिछले 15 दिनों में कोरोना के एक्टिव मामलों की संख्या में करीब 474% की वृद्धि हुई है।</p><p dir="ltr">अगर बात महाकुम्भ की शुरुआत से करें तो हरिद्वार में 1 अप्रैल को कोरोना के <a href="https://health.uk.gov.in/files/2021.04.01_Health_Bulletin_2.pdf"><u>15226 पॉजिटिव </u></a>मामले थे जिसमें से 626 एक्टिव मामले थे। वहीं 15 अप्रैल को हरिद्वार में <a href="https://health.uk.gov.in/files/2021.04.15_Health_Bulletin_2.pdf"><u>पॉजिटिव मामले 19575 </u></a>थे जिसमें से 3612 एक्टिव मामले थे।</p><p dir="ltr">अगर जिले में मिलने वाले पॉजिटिव मामलों की बात करें तो इस संख्या में भी अच्छा खासा इज़ाफ़ा हुआ है। 1 अप्रैल को यहां 149 मामले सामने आये थे। 15 अप्रैल तक पॉजिटिव मामलों में लगातार वृद्धि हुई और इस दिन के मामलों की संख्या 623 थी यानि लगभग चार गुना वृद्धि।</p><p dir="ltr">अगर एक्टिव मामलों की देश के अन्य क्षेत्रों से तुलना की जाये तो हरिद्वार की संख्या भारत के कई दुसरे जिलों से अधिक है जहां स्थानीय प्रशासनों ने लॉकडाउन लगाए हैं।</p><p dir="ltr">कोरोना वायरस से होने वाली मौतों की बात करें तो कुम्भ की शुरुआत होने से 15 अप्रैल तक हरिद्वार में 15 मौतें हो चुकी हैं। निर्वाणी अखाड़े के <a href="https://www.aajtak.in/india/uttarakhand/story/mahamandleshwar-of-nirwani-akhada-kapil-dev-died-with-covid-19-haridwar-kumbh-1239362-2021-04-15"><u>महामंडलेश्वर कपिल देव</u></a> दास की भी कोरोना के कारण गुरुवार को हरिद्वार के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में मृत्यु हो गयी। निर्वाणी अखाड़ा कुम्भ के 13 अखाड़ों में एक प्रमुख अखाड़ा माना जाता है।</p><p dir="ltr"><b>कुम्भ समाप्त करने की बढ़ने लगी गुहार</b></p><p dir="ltr">महाण्डलेश्वर कपिल की मृत्यु के बाद निरंजनी अखाड़े ने कुम्भ को 17 अप्रैल को समाप्त करने का एलान कर दिया। निरंजनी अखाड़े के रविंद्र पूरी ने कुम्भ मेला समाप्ति का ऐलान कर दिया। पूरी ने एक <a href="https://www.indiatvnews.com/news/india/haridwar-kumbh-mela-to-end-april-17-niranjani-akhada-698150"><u>न्यूज़ चैनल</u></a> से बात करते हुए कहा कि शाही स्नान के बाद बहुत सारे भक्तों और साधु सन्यासियों में कोरोना के लक्षण दिखे हैं। उन्होंने दूसरे अखाड़ों को भी इस राह पर चलने को कहा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि मेला ख़त्म करने निर्देश राज्य सरकार का होगा ना कि निरंजनी अखाड़े का।</p><p dir="ltr">कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुंभ को प्रतीकात्मक रखने के लिए संतो से प्रथर्ना की। </p><p dir="ltr">शनिवार सुबह उन्होंने <a href="https://twitter.com/narendramodi/status/1383259123777609731?s=19"><u>ट्वीट</u></a> कर कहा, "आचार्य महामंडलेश्वर पूज्य स्वामी अवधेशानंद गिरि जी से आज फोन पर बात की। सभी संतों के स्वास्थ्य का हाल जाना। सभी संतगण प्रशासन को हर प्रकार का सहयोग कर रहे हैं। मैंने इसके लिए संत जगत का आभार व्यक्त किया। मैंने प्रार्थना की है कि दो शाही स्नान हो चुके हैं और अब कुंभ को कोरोना के संकट के चलते प्रतीकात्मक ही रखा जाए। इससे इस संकट से लड़ाई को एक ताकत मिलेगी।"</p><p dir="ltr"><b>शाही स्नान के बाद बढ़ते मामले</b></p><p dir="ltr">12 अप्रैल को इस कुंभ का पहला शाही स्नान आयोजित किया गया, जिसमें <a href="https://timesofindia.indiatimes.com/city/dehradun/amid-covid-spurt-35l-take-dip-at-har-ki-pauri-on-somvati-amavasya-shahi-snan-many-without-masks-or-social-distancing/articleshow/82037235.cms"><u>35 लाख</u></a> से अधिक लोगों ने भाग लिया जबकि 14 अप्रैल के दुसरे शाही स्नान में <a href="https://indianexpress.com/article/india/kumbh-mela-13-5-lakh-take-shahi-snan-it-is-a-matter-of-faith-7274050/"><u>13.5 लाख</u></a> से अधिक लोगों ने गंगा में डुबकी लगाई। </p><p dir="ltr">हरिद्वार में पहले शाही स्नान के बाद मामलो में और बढ़ोतरी हुई और यह अभी भी जारी है। 12 अप्रैल से 15 अप्रैल के बीच हरिद्वार जिले में कोरोना के 2140 मामले सामने आए हैं। <a href="https://health.uk.gov.in/pages/view/142-covid19-health-bulletin-for-uttarakhand-page-8"><u>उत्तराखंड सरकार के आंकड़ों के अनुसार</u></a>, जिले में 12 अप्रैल को 408, 13 अप्रैल को 594, 14 अप्रैल को 525 और 15 अप्रैल को 623 मामले सामने आए। वर्तमान में इस उत्तर भारतीय राज्य में एक्टिव कोरोना मरीजों की संख्या 1,16,244 है, जबकि राज्य में अब तक 1802 लोगों की मौत हो चुकी है।</p><p dir="ltr"><b>सरकार द्वारा की गई व्यवस्था और गाइडलाइंस</b></p><p dir="ltr">कोरोना के प्रसार से बचने के लिए उत्तराखंड सरकार ने कुंभ शुरू होने से एक दिन पहले इसकी गाइडलाइन और एसओपी में परिवर्तन किया और कहा कि कुंभ में वे ही लोग प्रवेश कर सकते हैं जिनके पास 72 घंटे से कम की कोरोना की नेगेटिव आरटीपीसीआर रिपोर्ट हो।</p><p dir="ltr">हालाँकि कुंभ में भाग लेने आ रहे उन श्रद्धालुओं को भी अनुमति दी जा रही है, जिनके पास नेगेटिव आरटीपीसीआर रिपोर्ट नहीं है।<a href="https://indianexpress.com/article/india/at-kumbh-mela-covid-guard-slips-no-thermal-screening-few-masks-102-test-positive-7270853/"><u> इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट</u></a> के अनुसार, लोग कोविड वैक्सीन प्रमाण पत्र के साथ भी मेला स्थल में प्रवेश कर रहे हैं, वहीं थर्मल स्क्रीनिंग और रैपिड एंटीजन टेस्ट भी राज्य की सीमाओं पर हो रहा है ना कि कुंभ मेला क्षेत्र में।</p><p dir="ltr">प्रशासन ने गाइडलाइन्स का पालन ना हो पाने के पीछे ज़्यादा लोगों की मौजूदगी और भारी भीड़ का होना बताया है।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/17/459010-haridwar1.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421X6CB40kNtm4DiK6zfKn4WHZzazBQoAxx1964748" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1618671963989" title="हरिद्वार में कुम्भ के दौरान श्रद्धालुओं के मास्क ना पहनने पर चालान काटे गए हैं। फोटो: वर्षा सिंह" alt="हरिद्वार में कुम्भ के दौरान श्रद्धालुओं के मास्क ना पहनने पर चालान काटे गए हैं। फोटो: वर्षा सिंह" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1618671963989"><p>हरिद्वार में कुम्भ के दौरान श्रद्धालुओं के मास्क ना पहनने पर चालान काटे गए हैं। फोटो: वर्षा सिंह</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">हरिद्वार रेंज के पुलिस महानिरीक्षक संजय गुंज्याल ने कहा, "हमारे लिए सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करवाना बहुत मुश्किल हो रहा है। हम लोगों का चालान (मास्क ना पहनने के लिए) भी नहीं काट रहे हैं क्योंकि इससे भगदड़ मच सकती है। जबकि सामान्य दिनों में हम भीड़ लगाने वालों और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं करने वालों पर जुर्माना लगा रहे थे।"<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b>महामारी विशेषज्ञों का क्या है कहना</b></p><p dir="ltr">दिल्ली के एक वरिष्ठ महामारी विशेषज्ञ ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया, "भारत सरकार को कभी भी इतने बड़े स्नान पर्व को आयोजित करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए थी क्योंकि बहुत संभावना है कि यह कोरोना महामारी का सुपर स्प्रेडर बन सकता है।" </p><p dir="ltr">वह कहती हैं, "जैसे-जैसे मामले बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे ही ऐसे सामाजिक, धार्मिक कार्यक्रमों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए, जिसमें अधिक लोग एकत्रित होते हैं। यह एक बेहद ही महत्वपूर्ण कदम है।"</p><p dir="ltr">"कोरोना का नया म्यूटेंट पहले वाले से अधिक प्रसार करता है। इसलिए जरूरी है कि ऐसे सामाजिक जुटाव कम से कम हो, वरना सुपर स्प्रेडर बनने के साथ-साथ कोरोना का नया म्यूटेंट बनने का भी खतरा होगा।"</p><p dir="ltr"><a href="https://www.jhsph.edu/"><u>'दी जॉन्स हॉपकिंस ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ' </u></a>के इंटरनेशनल हेल्थ डिपार्टमेंट के महामारी विशेषज्ञ ब्रायन वाहल कहते हैं, "जैसे-जैसे मामले बढ़ रहे हैं, सामाजिक आयोजनों पर प्रतिबंध एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है। बड़े सामाजिक समारोह, जहां पर भीड़ इकट्ठा होती है, वे सुपर स्प्रेडर बन सकते हैं और यह नया म्यूटेंट तो और तेजी से फैलने वाला वायरस है। इसलिए हमें अतिरिक्त सावधान रहना चाहिए।"</p><p dir="ltr">यह पूछे जाने पर कि क्या वायरस आगे भी और मजबूत हो सकता है, इस पर ब्रायन कहते हैं, "जितना कोई वायरस फैलेगा, उतने उसके नए वेरिएंट उभर सकते हैं। लेकिन हम अभी निश्चित रूप से ऐसा नहीं कह सकते कि ऐसा हो रहा है।"</p><p dir="ltr">"कोविड के मामलों में वर्तमान वृद्धि के साथ एक संभावना यह भी है कि अस्पताल और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं से गैर-कोविड मरीज वंचित हो सकते हैं और इससे मृत्यु दर में भी वृद्धि हो सकती है," वह आगे कहते हैं।</p><p dir="ltr">कुंभ मेले में भाग लेने के लिए उत्तराखंड सरकार की<a href="https://www.haridwarkumbhmela2021.com/"> <u>कुंभ वेबसाइट</u></a> पर रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य है। 65 वर्ष से अधिक, 10 वर्ष से कम और गंभीर बीमारी वाले लोगों को कुंभ में ना सम्मिलित होने की सलाह दी गई है। </p><p dir="ltr">उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कुम्भ शुरू होने से पहले राज्य सरकार से <a href="https://www.hindustantimes.com/cities/dehradun-news/mahakumbh-begins-hc-tells-state-to-increase-testing-101617235221685.html"><u>कहा </u></a>था की वो सुनिश्चित कराये की हरिद्वार में रोज़ाना 50000 आरटीपीसीआर टेस्ट कराये जाए हालाँकि <a href="https://timesofindia.indiatimes.com/city/dehradun/how-will-ukhand-govt-comply-with-hc-order-of-testing-50k-per-day-in-haridwar-only-10-govt-12-pvt-labs-in-state-which-can-test-maximum-35k-rt-pcr-samples/articleshow/81876054.cms"><u>टाइम्स ऑफ़ इंडिया</u></a> की खबर के मुताबिक उत्तराखंड में इतनी संख्या में आरटीपीसीआर टेस्ट हो पाना एक बहुत कठिन कार्य है। उच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी हरिद्वार में करीब 20,000 कोविड टेस्ट ही किये जा रहे हैं। 1 अप्रैल को 10,706 टेस्ट किये गए थे और 14 अप्रैल को जिले में सबसे अधिक 32,257 टेस्ट किये गए।</p><p dir="ltr">उत्तराखंड में 10 सरकारी व 12 निजी संस्थानों में आरटीपीसीआर टेस्ट हो सकते हैं।</p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i></p></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/covid-19/400-increase-in-haridwars-active-corona-cases-during-the-kumbh-742594</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/covid-19/400-increase-in-haridwars-active-corona-cases-during-the-kumbh-742594</guid>
<category><![CDATA[Covid-19,कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,सेहत,सेहतकीपड़ताल,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[सौरभ शर्मा]]></dc:creator>
<pubDate>Sat, 17 Apr 2021 15:08:42 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/17/500x300_459009-covid-haridwar-kumbh.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पश्चिम बंगाल के चाय बागानों में अपने बच्चों को खोती माएं]]></title>
<description><![CDATA[पश्चिम बंगाल के चाय बागानों में काम करने वाले कुल कर्मचारियों में से लगभग 50% महिलाएँ हैं। चाय बागान में काम कर रही महिलाओं के पास मातृत्व सुविधाएँ, शिशु गृह की सुविधा, अवकाश, उचित दिहाड़ी, सुलभ शौचालय, पीने का पानी, नज़दीकी अस्पताल और अन्य कई मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>जलपाईगुड़ी, दार्जीलिंग (पश्चिम बंगाल): </b>रंजीता डे, 45, पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग के फांसीदेवा ब्लॉक के एक चाय बागान में काम करती हैं। रंजीता की शादी करीब दो दशक पहले हुई थी और तब से ही वह यहां काम कर रही हैं। लेकिन इस दौरान वह कई आकस्मिक गर्भपात, एक ऑपरेशन, और पैदा होने के बाद अपने 6 बच्चों की मौत देख चुकी हैं।</p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">रंजीता की कहानी सिर्फ़ उनकी ही नहीं है। उनके साथ बागान में पत्तियां तोड़ने वाली कई महिलाएं भी ऐसी ही कहानियां बताती हैं। गर्भावस्था के दौरान काम करते करते बच्चा गिरना इनके जीवन का आम हिस्सा हो गया है। "साड़ी उठाकर देखते हैं, खून दिखता है तो पता चलता है कि बच्चा गिर गया, अक्सर दर्द भी नहीं होता। उस दिन घर जल्दी वापस चले जाते हैं, अगले दिन सुबह फिर आते हैं," यहां काम करने वाली एक महिला ने बताया।</p><p dir="ltr">इसका कारण हैं चाय बागानों की विषम परिस्थितियां जिनसे जूझते हुए ये महिलाएं यहां काम करते हुए अपना जीवनयापन करती हैं।</p><p dir="ltr">भारत दुनिया का <a href="http://www.iuf.org/w/sites/default/files/FFMFINALReport_160616_web.pdf"><u>दूसरा सबसे बड़ा</u></a> चाय उत्पादक देश है, और भारत की सबसे ज़्यादा चाय, असम के बाद पश्चिम बंगाल के बागानों से आती है। चाय भारत का <a href="http://www.iuf.org/w/sites/default/files/FFMFINALReport_160616_web.pdf"><u>दूसरा सबसे बड़ा रोज़गार</u></a> देने वाला उद्योग है, जिसमें ज्यादातर महिलाएं शामिल हैं। चाय बागानों में काम करने वाले कुल कर्मचारियों में से लगभग <a href="https://www.cwds.ac.in/wp-content/uploads/2020/06/Working-Paper-15.pdf"><u>50% महिलाएँ</u></a> हैं। पश्चिम बंगाल के चाय बागानों में <a href="https://wblc.gov.in/download/Synopsis-of-Tea-Garden-Survey-Final-Report.pdf"><u>2.06 लाख</u></a> से ज़्यादा महिलाएं काम करती हैं।</p><p dir="ltr">ये महिलाएँ और इनके परिवार, जिनमे से ज़्यादातर दार्जीलिंग और जलपाईगुड़ी में रहते हैं, 17 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के 8 चरण में हो रहे विधानसभा चुनाव में मतदान करेंगे।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/16/458353-mother-child.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421qHo4ZlAjU62gN3LsnlwgdMpOuRiWj3Ds3962223" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1618583980300" title="दार्जिलिंग के फांसीदेवा के चाय बागान में अपने बच्चे को पीठ पर बांध कर काम कर रही एक महिला। फोटो: साधिका तिवारी" alt="दार्जिलिंग के फांसीदेवा के चाय बागान में अपने बच्चे को पीठ पर बांध कर काम कर रही एक महिला। फोटो: साधिका तिवारी" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1618583980300"><p>दार्जिलिंग के फांसीदेवा के चाय बागान में अपने बच्चे को पीठ पर बांध कर काम कर रही एक महिला। फोटो: साधिका तिवारी</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">रंजीता के गाँव में, घर के पास और चाय बागान के रास्ते में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के सैकड़ों रंगीन झंडे और पोस्टर दिखाई देते हैं, पर रंजीता जैसे वोटर और उनकी समस्याएँ चुनाव-दर-चुनाव नजरअंदाज की जाती हैं।<br></p><p dir="ltr"><b>'कई आकस्मिक गर्भपात, एक ऑपरेशन और 6 बच्चों की मौत'</b><br></p><p dir="ltr">"शनिवार का दिन था, शनिवार को मेरी छुट्टी 4 बजे ही हो जाती थी। उस दिन बारिश हो रही थी। गाँव से थोड़ी दूर मेला लगा था तो मैंने सोचा मैं जल्दी-जल्दी पाती तोड़ कर चली जाऊंगी। उस दिन मैं साइकिल भी नहीं लायी थी, तो पैदल चल कर ही जाना था," रंजीता लगभग 20 साल पहले की घटना बताती है, जब वो 5 या 6 महीने के गर्भ से थीं।<br></p><p dir="ltr">"मैंने जल्दी-जल्दी काम निपटाया, इसके बाद करीब 20-25 किलो पत्तियाँ मैंने उठायी और उनको जमा करने गयी। चाय बागान में पानी के बहाव के लिए नालियाँ होती हैं जिन्हें कूद कूद कर जाना होता है, मेरे पेट में बच्चा था और सर पर पत्तियाँ। उस दिन मैंने रोज़ की तरह नाली कूदी और फिसल कर नाली में गिर गयी, मैंने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया, पत्तियां जमा करके घर चली गयी," रंजीता ने बताया।<br></p><p dir="ltr">"उस दिन मेरा बच्चा पेट में मर गया और मुझे पता भी नहीं चला, उस समय ज़्यादा कुछ पता भी नहीं था, इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। कुछ 10-12 दिन बाद मुझे गंध आने लगी, कुछ कमजोरी भी महसूस हुई। तब चाय बाग़ान की और औरतों ने बताया कि शायद नाली कूदने से मेरा बच्चा मर गया, सड़ गया और मुझे पता भी नहीं चला," रंजीता बताती हैं।<br></p><p dir="ltr">"एक दीदी ने कहा डॉक्टर के पास जाना ज़रूरी है, पर मैंने कहा कि अभी तो काम है, काम ख़त्म करके पति को पूछूँगी। मैंने पती को बोला की जाना पड़ेगा, खुड़बाड़ी (पास का एक गाँव) अस्पताल भी यहाँ से बहुत दूर है, तो साइकल से वो मुझे डॉक्टर के पास ले कर गया। वहाँ डॉक्टर ने कहा कि गर्भपात हो गया है और अब अस्पताल में भर्ती होना पड़ेगा, इसके उसने 35,000 रुपए माँगे। पति वापस आया और पूरी बस्ती वालों से पैसे उधार लिया, पता नहीं कितने पैसे जमा हुए, कितने दिए गए," रंजीता ने बताया।<br></p><p dir="ltr">रंजीता ने गर्भावस्था के दौरान कभी भी जाँचें नहीं करवाई। सरकार के अनुसार गर्भावस्था के दौरान <a href="https://nhm.gov.in/images/pdf/programmes/maternal-health/guidelines/my_safe_motherhood_booklet_english.pdf"><u>चार जाँचें ज़रूरी</u></a> होती हैं, ये जाँच हर सरकारी अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्र या आंगनबाड़ी केंद्र में मुफ़्त की जाती। इनके किसी भी बच्चे का कोई भी टीकाकरण नहीं हुआ, बीते 5-6 सालों में पैदा हुए बच्चों को सिर्फ़ पोलियो की दावा दी गयी। रंजीता के सारे बच्चे घर पर ही पैदा हुए, प्रसव के समय उनके साथ कोई दाई भी नहीं थी।<br></p><p dir="ltr">"दर्द होते ही बच्चा आ जाता था बस, अस्पताल जाना ही मुश्किल था," रंजीता ने बताया।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/16/458354-long-shot-tea-pluckers.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421eMUYNmhgR9t5dMS7EoX5OBJwHqJOWCwx4086042" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1618584090485" title="चाय बागान में काम कर रहीं महिलाएँ, जो 8 से 12 घंटे काम करती हैं&nbsp;" alt="चाय बागान में काम कर रहीं महिलाएँ, जो 8 से 12 घंटे काम करती हैं " data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1618584090485"><p>चाय बागान में काम कर रहीं महिलाएँ, जो 8 से 12 घंटे काम करती हैं&nbsp;</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">इन सालों में चाय बागान के कर्मचारियों ने कई बार बेहतर दिहाड़ी की मांग की जिसके बाद आज रंजीता 15 दिन के रुपए 2,130 कमाती हैं। बागान की अन्य सभी महिलाओं की तरह वो सुबह 3 बजे उठती हैं, दिन में 12 घंटे चाय बागान में काम करती है जिसके उन्हें रोज़ाना रुपए 142 मिलते हैं। इसके सिवा ये घर का सारा काम, खाना बनाना, बच्चों की देखरेख भी करती है।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">इन सालों में रंजीता ने अपने 6 बच्चे खोए हैं। उन्हें उनकी मृत्यु का कारण नहीं पता, उनके अनुसार कुछ बच्चे पैदा होने के कुछ घंटों में ही मर गए और कुछ थोड़े दिन या महीने के बाद।<br></p><p dir="ltr">हर बच्चे की मौत रंजीता को उतनी ही स्पष्टता से याद है। सालों बाद भी उनकी बात करते हुए रंजीता की आंखों में आंसू आ जाते हैं। </p><p dir="ltr">"याद करने से क्या होगा, कोई बच्चा वापस थोड़ी आएगा। मेरी आख़री बच्ची जो मरी, उसका नाम दशमी था, वो दुर्गा पूजा में पैदा हुई थी। उसके इलाज में डेढ़ दो लाख रुपए ख़र्च हुआ, पूरी बस्ती से उधार लिया, उसका उधार रुपए 500 दे देकर अभी तक चुका रहे हैं," रंजीता ने बताया। </p><p dir="ltr">अभी रंजीता की दो बेटियां हैं, एक 14 और एक 12 साल की। इतना सब कुछ होने के बावजूद भी रंजीता इन चाय बागानों में काम करने को मजबूर हैं।<br></p><p dir="ltr">"हम लोग तो बागान के आदमी हैं, चाय बागान हमारा सब कुछ खा गया, फिर भी मजबूरी में यहाँ काम करते हैं।"<br></p><p dir="ltr"><b>चाय बागान में काम करने वाली महिलाओं की समस्याएं</b><br></p><p dir="ltr">"चाय बागान में काम करने में बहुत तकलीफ़ है, पैसा भी कम है, धूप, बरसात, ठंड, हम हर समय काम करते है। कोई छुट्टी नहीं होती, बागान में शौचालय भी नहीं होता है," 45 वर्ष की मिलाईका ने बताया जो 15 साल की उम्र से ही इन बागानों में काम कर रही हैं।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/16/458355-women-working.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421Cnw8JrBud4nNkHkbmPhs98AtzH8rruc94189853" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1618584193411" title="&nbsp;चाय बागान में छतरी और दस्ताने पहनकर काम कर रही महिलाएं। ये सुविधाएँ सिर्फ़ कुछ कर्मचारियों को ही नियमित रूप से मिल पाती हैं" alt=" चाय बागान में छतरी और दस्ताने पहनकर काम कर रही महिलाएं। ये सुविधाएँ सिर्फ़ कुछ कर्मचारियों को ही नियमित रूप से मिल पाती हैं" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1618584193411"><p>&nbsp;चाय बागान में छतरी और दस्ताने पहनकर काम कर रही महिलाएं। ये सुविधाएँ सिर्फ़ कुछ कर्मचारियों को ही नियमित रूप से मिल पाती हैं</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"गर्भवती महिला को काम करने में बहुत असुविधा होती है, भारी भारी 25-30-50 किलो पत्तियां सिर पर उठानी पड़ती है। सिर पर पत्तियां रख कर, नाली कूद कर चाय बागान से ऑफिस तक इन्हें जमा करने जाना पड़ता है," मिलाईका ने बताया।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">गर्भावस्था के दौरान कोई छुट्टी नहीं मिलती, जितने दिन काम नहीं होता उतने दिन के पैसे नहीं मिलते, मजबूरी में महिलाएं काम करती रहती हैं।<br></p><p dir="ltr">"खाने के लिए पैसा चाहिए, तो आख़िरी महीनो में पूरे दिन काम कर के जब रात को सोते हैं तो अक्सर समय से पहले ही दर्द होता है और घर में ही बच्चा हो जाता है," दो बेटों की माँ और चाय बाग़ान में 20 साल से काम रही, 35 वर्ष की अरुणा किसपोट्टा ने बताया।<br></p><p dir="ltr">बच्चा पैदा होने के बाद भी ये दिक़्क़तें जारी रहती हैं, बागानों में कोई शिशु गृह नहीं होता, "बच्चे को दूध पिलाने का भी समय नहीं होता, हम बागान में छुप छुप कर दूध पिलाते हैं," अरुणा ने बताया। बागान में काम के बीच कोई ब्रेक भी नहीं मिलता, "जब गर्भ से होती है, या गर्भपात या प्रसव के बाद जब कमजोरी लगती है तो छुप के सोना पड़ता है, बाक़ी दीदी लोग ध्यान रखती हैं," अरुणा ने बताया।<br></p><p dir="ltr">"पीठ में बच्चा बांध कर, सिर भी पट्टी रख कर पूरे दिन काम करना पड़ता है, इतना चलना पड़ता है, रास्ता भी ठीक नहीं है, बड़ा बड़ा नाला होता है। ये सब करो तब पैसा मिलेगा," दो बच्चों की माँ, मिलाईका ने बताया।<br></p><p dir="ltr"><b>नियमों के बावजूद कोई सुविधा नहीं</b><b><br></b></p><p dir="ltr">"बाग में काम करने वाले लोगों का हर महीने में ब्लड टेस्ट होना चाहिए, वो कभी नहीं होता, सबको मास्क देना चाहिए, दस्ताने देने चाहिए, जो किसी-किसी को ही मिलते हैं। चप्पल साल में दो बार मिलती है, छतरी दो-तीन साल में एक बार, इतने में कैसे चलेगा। पूरी मेडिकल व्यवस्था होनी चाहिए पर ऐसा कुछ नहीं होता है। कभी कभी सबको एंटीबायोटिक की गोली दे देते हैं," रोमा रश्मि एक्का, 30, ने बताया जो चाय बागान के खाडुभंगा गाँव में रहती है, और चाय बागान में काम कर रही आदिवासी महिलाओं के साथ काम करने वाली एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।<br></p><p dir="ltr">"फ़र्स्ट एड भी आधा अधूरा होता है, कितने लोगों को बाग में सांप काटता है, पर इसके ज़हर के लिए फर्स्ट एड में कुछ नहीं होता, ऐम्ब्युलन्स टाइम पर आ नहीं पाती और कितने लोग इसकी वजह से ही मार जाते हैं," रोमा ने बताया।<br></p><p dir="ltr"><b>चाय बग़ानो में मूलभूत सुविधाओं की कमी</b><br></p><p dir="ltr">चाय बागानों में काम करने वाले लोग आस-पास के गांवों में रहते हैं। इन गाँवों में ज़्यादातर घर कच्चे हैं, घर के शौचालयों में पानी की व्यवस्था ठीक नहीं है, पीने का पानी अक्सर पास के हैंडपंप से आता है, गांव से बाहर जाने के लिए उचित जन परिवहन उपलब्ध नहीं है क्योंकि बागान शहर से कटे हुए हैं, लोग ज़्यादातर साइकिल का इस्तेमाल करते हैं, खाना बनाने के लिए लोग चूल्हों का इस्तेमाल करते हैं क्योंकि यहाँ तक गैस सिलेंडर लाना और भी महँगा है, बरसात में बाग से ख़तरनाक सांप निकलते हैं और रात को कभी कभी तेंदुआ आ जाता है।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/16/458356-tea-garden.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="44210mu5HtpcM7P3ThB0teX1R0ha6fEvMmpX4293753" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1618584296004" title="दार्जिलिंग के चाय बागान जो दुनिया भर में अपनी पत्तियों की गुणवत्ता के लिए मशहूर है" alt="दार्जिलिंग के चाय बागान जो दुनिया भर में अपनी पत्तियों की गुणवत्ता के लिए मशहूर है" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1618584296004"><p>दार्जिलिंग के चाय बागान जो दुनिया भर में अपनी पत्तियों की गुणवत्ता के लिए मशहूर है</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">यहाँ काम करने वाले लोग अभी भी मूलभूत सुविधाओं के लिए परेशान हैं जबकि भारत की अर्थव्यवस्था को इनकी मेहनत से काफ़ी लाभ होता है। दुनिया के दूसरे सबसे बड़ा चाय उत्पादक, भारत ने साल <a href="https://www.ibef.org/exports/indian-tea-industry.aspx#:~:text=As%20of%202019%2C%20India%20was,stood%20at%2030.54%20million%20kgs."><u>2019 में 1,340 kg</u></a> चाय का उत्पादन किया और 831 मिलियन अमरीकी डॉलर का निर्यात किया। कुल उत्पादन का <a href="https://wblc.gov.in/download/Synopsis-of-Tea-Garden-Survey-Final-Report.pdf"><u>81%</u></a> असम और पश्चिम बंगाल से आता है।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">पश्चिम बंगाल में <a href="https://wblc.gov.in/download/Synopsis-of-Tea-Garden-Survey-Final-Report.pdf"><u>276 पंजीक्रत</u></a> चाय बागान हैं, उनमें से <a href="https://wblc.gov.in/download/Synopsis-of-Tea-Garden-Survey-Final-Report.pdf"><u>ज़्यादातर जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग में हैं, सिर्फ़ एक</u></a> बाग़ान कूच बिहार ज़िले में है। बंगाल में साल 2019 में<a href="https://www.statista.com/statistics/868978/india-tea-production-volume-by-state/"><u> 39.4 करोड़ kg</u></a> चाय का उत्पादन किया।<br></p><p dir="ltr">दार्जिलिंग के चाय बागान <a href="https://www.cwds.ac.in/wp-content/uploads/2020/06/Working-Paper-15.pdf"><u>1859</u></a> में और जलपाईगुड़ी के <a href="https://www.cwds.ac.in/wp-content/uploads/2020/06/Working-Paper-15.pdf"><u>1879</u></a> में शुरू गए थे और यहां काम करने वाले लोग ज़्यादातर <a href="https://www.cwds.ac.in/wp-content/uploads/2020/06/Working-Paper-15.pdf"><u>आदिवासी</u></a> या अनुसूचित जनजातियों से थे या नेपाली समुदाय की <a href="https://www.cwds.ac.in/wp-content/uploads/2020/06/Working-Paper-15.pdf"><u>अनुसूचित जातियों</u></a> से थे। <a href="https://www.cwds.ac.in/wp-content/uploads/2020/06/Working-Paper-15.pdf"><u>ऐतिहासिक</u></a> तौर पर इन कर्मचारियों में ज्यादातर महिलाएं शामिल रही हैं। <a href="https://www.cwds.ac.in/wp-content/uploads/2020/06/Working-Paper-15.pdf"><u>लेबर ब्यूरो के 2012 के आंकड़ों</u></a> के अनुसार देशभर के सभी चाय बागानों के कुल कर्मचारियों में 55.9% महिलाएं थी।<br></p><p dir="ltr">उत्तर बंगाल के चाय बागानों में उपलब्ध सुविधाओं और काम की परिस्थितियों का मुआयना करने के लिए स्थानीय श्रमिक कार्यालयों ने संयुक्त श्रम आयुक्त के अंतर्गत, साल 2013 में, बंगाल के 276 चाय बागानों में से 273 का एक <a href="https://wblc.gov.in/download/Synopsis-of-Tea-Garden-Survey-Final-Report.pdf"><u>सर्वे</u></a> किया। इस सर्वे के नतीजे हालात को और स्पष्ट करते हैं। </p><p dir="ltr">सर्वे किए चाय बागानों में से सिर्फ़ 166 में अस्पताल हैं, जिसमें से सिर्फ़ 56 में पूर्णकालिक आवासीय डॉक्टर मौजूद है, अन्य 110 अस्पताल विस्टिंग डॉक्टर पर निर्भर हैं और सिर्फ़ 74 अस्पतालों में एमबीबीएस डॉक्टर मौजूद है, 116 अस्पतालों में कोई नर्स नहीं है और 107 अस्पतालों में कोई डॉक्टर ही उपलब्ध नहीं है। </p><p dir="ltr">सिर्फ़ 160 बग़ानो में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है, जबकि 85 बागानों में डिस्पेंसरी तक नहीं है, सिर्फ़ 160 बागानों में ऐम्ब्युलन्स की सुविधा उपलब्ध है, जिनमें से ज्यादातर ऐम्ब्युलन्स की स्थिति ज़रूरी मानकों के अनुसार ख़राब है।<br></p><p dir="ltr"><b>चाय बागान की परिस्थिति कर्मचारियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन</b><br></p><p dir="ltr">चाय बागानों के कर्मचारी काफ़ी सारी मूलभूत सुविधाओं के लिए प्लैंटेशन स्टेटस पर निर्भर होते हैं, क़ानूनी तौर पर इन्हें ऐसा करना का अधिकार 1951 के <a href="https://equityhealthj.biomedcentral.com/articles/10.1186/s12939-020-1147-3"><u>प्लांटेशन मज़दूर कानून</u></a> के तहत अधिकार दिया गया है और इन कर्मचारियों के मानवाधिकारों का अक्सर उल्लंघन होता है। </p><p dir="ltr"><a href="https://www.righttofoodandnutrition.org/"><u>ग्लोबल नेटवर्क फॉर द राइट टू फूड एंड न्यूट्रिशन</u></a> की एक साल 2016 की <a href="http://pre2020.iuf.org/w/sites/default/files/FFMFINALReport_160616_web.pdf"><u>तथ्यान्वेषी मिशन रिपोर्ट </u></a>के अनुसार लगभग सभी चाय बागानों में अंतरराष्ट्रीय और भारतीय कानूनों के तहत महिलाओं के अधिकारों का हनन और लिंग आधारित भेद-भाव पाया गया। </p><p dir="ltr">सरकार का दायित्व है कि महिलाएं भी काम करने के अधिकार का पूरा लाभ पा सके पर चाय बागान में ऐसा होता नहीं है, मर्द ज्यादा तनख्वाह की बेहतर नौकरियां करते हैं और औरतें सिर्फ़ पत्तियां तोड़ने का काम जहाँ पदोन्नति की संभावना नहीं होती, रिपोर्ट में पाया गया।<br></p><p dir="ltr">ज़्यादातर बागानों में महिलाओं के मातृत्व सुरक्षा अधिकारों का हनन होता है, ख़ासकर गर्भावस्था के दौरान महिला के स्वास्थ्य की सही देखभाल और सुरक्षा, मातृत्व अवकाश, स्तनपान के लिए ब्रेक, और प्रसव-पूर्व एवं प्रसव के बाद जांच। महिलाओं से गर्भावस्था के दौरान भी वही काम करवाए जाते हैं, अक्सर गर्भ के आठ मास तक, अन्य महिलाओं के इसके बदले ज़्यादा कार्यभार माँगने के बावजूद।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/16/458357-close-shot-tea-pluckers.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421J0VqTOTVwTqDw2DcKsNXmewYiHYlbgrz4381566" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1618584383762" title="बिना किसी मास्क, दस्ताने या छतरी के साथ चाय बागान में काम कर रही महिला, ये सुविधाएं हर कर्मचारी को मिलना अनिवार्य है" alt="बिना किसी मास्क, दस्ताने या छतरी के साथ चाय बागान में काम कर रही महिला, ये सुविधाएं हर कर्मचारी को मिलना अनिवार्य है" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1618584383762"><p>बिना किसी मास्क, दस्ताने या छतरी के साथ चाय बागान में काम कर रही महिला, ये सुविधाएं हर कर्मचारी को मिलना अनिवार्य है</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">गर्भावस्था अवकाश ज़्यादातर दिहाड़ी मज़दूरों के लिए होता ही नहीं है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय, दोनों कानूनों का उल्लंघन करते हुए इन महिलाओं को काम पर वापस जाने के बाद स्तनपान कराने का ब्रेक नहीं दिया जाता, और रिपोर्ट के अनुसार स्तनपान कराती हुई माओं के साथ यौन उत्पीड़न के मामले भी सामने आए हैं।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के लिए शिशुगृह होना अनिवार्य है, पर ये ज्यादातर जगहों पर मौजूद नहीं है, जहाँ हैं वहाँ ये ज़रूरत से छोटा और अस्वच्छ है।<br></p><p dir="ltr">गर्भ के दौरान और बाद की जांच चाय बागान की महिलाओं में कम और पहुँच से बाहर पायी गयी। सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों ने बताया कि ज्यादातर गर्भवती महिलाएं एनीमिया का शिकार हैं और प्रसव के दौरान आने वाली समस्याओं से अक्सर इनकी मौत हो जाती है। इन इलाकों में किशोरी गर्भधारण के मामले भी काफ़ी ज़्यादा हैं जिसमें जच्चा-बच्चा दोनो को ज़्यादा ख़तरा होता है।<br></p><p dir="ltr">गर्भधारण में दिक्कत, प्रसव में कठिनाइयां और स्तनपान में नुक़सान का एक कारण बाग में छिड़के जाने वाले कीटनाशक का असर भी पाया गया। बागानों में पीने के पानी की दिक्कत भी महिलाओं पर ज़्यादा भारी पड़ती है क्योंकि अक्सर महिलाओं को ही पानी भरने जाना पड़ता है, रिपोर्ट ने बताया। साथ ही उपयुक्त शौचालय ना होने का असर पुरुषों के मुक़ाबले,  महिलाओं पर ज़्यादा पड़ता हैं जिन्हें शर्म और सामाजिक दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं और साथ ही इन्फेक्शन का ख़तरा भी ज़्यादा होता है।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/16/458358-hands-plucking-tea.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421SdLG5hWdR43mF2xAxVUOxGIe4uBjUmvJ4460770" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1618584462015" title="दस्ताने पहन कर चाय बागान में पत्तियां तोड़ती महिलाएं" alt="दस्ताने पहन कर चाय बागान में पत्तियां तोड़ती महिलाएं" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1618584462015"><p>दस्ताने पहन कर चाय बागान में पत्तियां तोड़ती महिलाएं</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">साल 2021-22 के बजट में सरकार ने चाय बागान कर्मचारियों के कल्याण के लिए <a href="https://www.thehindubusinessline.com/news/national/tea-board-to-soon-submit-details-of-welfare-scheme-for-women-workers-in-assam-west-bengal/article33801280.ece"><u>₹1,000</u></a> करोड़ रुपए आवंटित करने का प्रस्ताव रखा है, और कहा है कि इसके लिए एक ख़ास योजना भी बनाई जाएगी। इस चुनाव में भी ये लोग ना तो किसी पार्टी के चुनावी भाषण का हिस्सा हैं और ना ही किसी नेता की चिंता।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">रंजीता का कहना है कि उन्हें इस चुनाव से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, "सरकार तो कोई भी आए हमको क्या मिलेगा, मेरा बच्चा कोई थोड़े ही वापस लाएगा।"<br></p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i></p></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/cover-story/mothers-losing-their-children-to-the-tea-gardens-of-west-bengal-742334</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/cover-story/mothers-losing-their-children-to-the-tea-gardens-of-west-bengal-742334</guid>
<category><![CDATA[West Bengal,कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,महिलाएं,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[साधिका तिवारी]]></dc:creator>
<pubDate>Fri, 16 Apr 2021 14:50:10 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/16/500x300_458351--.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[कोरोना का बच्‍चों की श‍िक्षा पर गहरा असर, सिखाया हुआ भूले, नया सीखने में परेशानी]]></title>
<description><![CDATA[इंडियास्पेंड ने उत्तर प्रदेश के चार जिलों के बच्चों और शिक्षकों में इस सिलसिले में बात की और पाया कि उत्तर प्रदेश के शिक्षकों का मानना है कि लॉकडाउन के दौरान स्‍कूल बंद होने से बच्‍चों ने प‍िछली कक्षाओं में जो सीखा था वो उसे भूलने लगे हैं।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>लखनऊ: </b>कोरोना की वजह बंद हुए स्‍कूल अब खुलने लगे हैं। करीब 11 महीने तक स्‍कूल से दूर रहने के बाद अब बच्‍चे फिर से स्‍कूल लौट रहे हैं। हालांकि, इन 11 महीनों में उनकी श‍िक्षा पर काफी असर हुआ है और इसकी छाप गांव, कस्बों में दिख रही है।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">लॉकडाउन की वजह से बच्‍चों की शिक्षा से जुड़े नुकसान का आंकलन करने के लिए <a href="https://azimpremjiuniversity.edu.in/SitePages/index.aspx"><u>अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय </u></a>द्वारा की गयी एक <a href="https://azimpremjiuniversity.edu.in/SitePages/pdf/Field_Studies_Loss_of_Learning_during_the_Pandemic.pdf"><u>फील्ड स्टडी</u></a> में पाया गया कि कोरोना के बीच स्‍कूल बंद होने से बच्‍चों ने प‍िछली कक्षाओं में जो सीखा था वो उसे भूलने लगे हैं। इसकी वजह से वर्तमान सत्र की कक्षाओं में उन्‍हें सीखने में द‍िक्‍कत आ रही है। इसका सबसे ज्‍यादा असर दूसरी और तीसरी कक्षा के विद्यार्थियों में देखने को मिल रहा है।</p><p dir="ltr">लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन क्‍लास का ठीक से न चल पाना, इंटरनेट और मोबाइल जैसी सुविधाओं का न होना और पढ़ाई के प्रति अरूच‍ि ने बच्‍चों को शिक्षा के लिहाज से पीछे धकेल दिया है। हाल यह है कि उन्‍हें भाषा और गण‍ित में सबसे ज्‍यादा द‍िक्‍कत का सामना करना पड़ रहा है। जानकारों का कहना है कि भाषा और गणित का बुनियादी कौशल ही दूसरे विषयों को पढ़ने का आधार बनता है।</p><p dir="ltr">"स्‍कूल खुलने के साथ ही बच्‍चे आने लगे हैं। एक अहम बात जो इनमें देखने को मिल रही है कि किताबों को पढ़कर अर्थ समझने में बच्‍चों को दिक्‍कत आ रही है। पढ़ाई में गैप आने की वजह से उनमें अभी वह तेजी देखने को नहीं मिल रही। इसलिए बचे हुए सत्र में छात्र और शिक्षक दोनों को कम समय में दोगुनी मेहनत करनी होगी," अयोध्‍या के पुराबली गांव के प्राथमिक विद्यालय के सहायक श‍िक्षक शिवेंद्र सिंह कहते हैं।  </p><p dir="ltr"><b>प‍िछली कक्षाओं के विषय भूले बच्‍चे </b></p><p dir="ltr">अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय ने इस फील्ड स्टडी के लिए पांच राज्यों (छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड) को चुना। इन राज्‍यों के 44 जिलों के 1,137 सरकारी स्कूलों के कक्षा 2 से कक्षा 6 तक के 16,067 छात्रों को सर्वे में शामिल किया गया। सर्वे के मुताबिक, कोरोना के बीच स्‍कूल बंद होने से बच्‍चों ने प‍िछली कक्षाओं में जो सीखा था उसे भूलने लगे हैं। </p><p dir="ltr">इस सर्वे में पाया गया कि:</p><p dir="ltr">54% छात्रों की मौखिक अभिव्यक्ति प्रभावित हुई है। </p><p dir="ltr">42% छात्रों की पढ़ने की क्षमता प्रभावित हुई है।  </p><p dir="ltr">40% छात्रों की भाषा लेखन क्षमता प्रभावित हुई है। </p><p dir="ltr">82% छात्र पिछली कक्षाओं में सीखे गए गणित के सबक को भूल गए हैं।</p><p dir="ltr">इंडियास्पेंड ने उत्तर प्रदेश के चार जिलों (लखनऊ, बाराबंकी, अयोध्या, देवरिया) के बच्चों और शिक्षकों में इस सिलसिले में बात की और पाया कि उत्तर प्रदेश के शिक्षक भी इस फील्ड स्टडी से काफी हद तक सहमत हैं।</p><p dir="ltr">"हमें बच्‍चों पर बहुत मेहनत करनी है, क्‍योंकि अधिकतर बच्चे पिछला पढ़ाया भूल चुके हैं। जो बच्चे एक्‍ट‍िव थे, ट्युशन ले रहे थे या हमारे संपर्क में थे, वो ठीक हैं, लेकिन ज‍िन बच्‍चों के पढ़ाई में गैप हो गया है उन पर मेहनत करनी होगी," लखनऊ के गुलाम हुसैनपुरवां में स्‍थ‍ित प्राथमिक विद्यालय की सहायक श‍िक्षक रचना राय कहती हैं। </p><p dir="ltr"><b>प्रभावी नहीं ऑनलाइन क्‍लास </b></p><p dir="ltr">लॉकडाउन के बीच ऑनलाइन क्‍लास चलने के बाद भी बच्‍चों की पढ़ाई में गैप कैसे आ गया? </p><p dir="ltr">इंडियास्पेंड ने जब ये सवाल उत्तर प्रदेश के शिक्षकों और बच्चों से पूछा तो सरकारी स्‍कूल से जुड़े ज्‍यादातर श‍िक्षकों का जवाब था कि ऑनलाइन क्‍लास फोन के माध्‍यम से हो पाती थी। सरकारी स्‍कूल में पढ़ने वाले बच्‍चे गरीब तबके से आते हैं। ऐसे में परिवार में एक फोन होता था। अभ‍िभावक काम पर जाते तो फोन लेकर चले जाते, इससे बच्‍चे की पढ़ाई नहीं हो पाती थी। </p><p dir="ltr">दूसरा कारण यह है कि टीवी चैनल के माध्‍यम से पढ़ाई से संबंध‍ित कार्यक्रम आने का वक्‍त भी निर्धारित होता था, उस वक्‍त पर अगर बिजली नहीं रहती तो बच्‍चों की पढ़ाई नहीं हो पाती थी। इस तरह धीमे-धीमे बच्‍चे पढ़ाई से दूर जाते रहे थे। शिक्षकों का कहना है कि वो अभ‍िभावक से लगातार संपर्क करते, उनसे बच्‍चे की पढ़ाई से संबंध‍ित बात करते, लेकिन बच्‍चों से सीधा संवाद नहीं हो पाता था।</p>लॉकडाउन के बीच पढ़ाई न हो पाने की बात बच्‍चे भी कहते हैं। बाराबंकी जिले के महमूदपुर गांव का रहने वाला सचिन कुमार (14) अभी आठवीं का छात्र है। जब लॉकडाउन लगा तो सचिन सातवीं कक्षा में था। सचिन ने बताया, "लॉकडाउन के बाद से स्‍कूल बंद हो गए। जब स्‍कूल बंद थे तो सर जी ने कहा कि जिसके पास बड़ा मोबाइल हो अपना नंबर दे दो, लेकिन मेरे पास बड़ा मोबाइल नहीं था। इसलिए पढ़ाई नहीं हो पाई।"</div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/12/455850-img20210228174915-1.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421FS1FkM4leuRyBkID34htMAwcEF8Ycn8v0781680" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1618230793133" title="सच‍िन कुमार। फोटो: रणव‍िजय सिंह" alt="सच‍िन कुमार। फोटो: रणव‍िजय सिंह" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1618230793133"><p>सच‍िन कुमार। फोटो: रणव‍िजय सिंह</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper">सचिन चार भाई-बहनों में सबसे बड़ा है। उसके प‍िता किसानी करते हैं। घर में स्‍मार्टफोन नहीं है। कोरोना की वजह से जब बच्‍चों को अगली कक्षा में प्रमोट किया गया तो सचिन का दाखिला भी आठवीं कक्षा में हो गया। हालांकि, सचिन को प‍िछली कक्षा में पढ़ाए जाने वाले विषय ज्‍यादा याद नहीं हैं। पिछली कक्षा में पढ़ाए गए विषय में क्‍या याद है? इस सवाल पर सच‍िन कहता है, "हल्‍का-फुल्‍का कुछ याद होगा, नहीं तो सब भूल गए हैं।"</div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><iframe src="https://www.facebook.com/plugins/video.php?height=308&amp;href=https%3A%2F%2Fwww.facebook.com%2FIndiaSpendHindi%2Fvideos%2F186721329803133%2F&amp;show_text=false&amp;width=560" width="560" height="308" style="border:none;overflow:hidden" scrolling="no" frameborder="0" allowfullscreen="true" allow="autoplay; clipboard-write; encrypted-media; picture-in-picture; web-share"></iframe></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><span style="background-color: rgb(249, 249, 249);">कोरोना की वजह से लगे लॉकडाउन का बच्‍चों की श‍िक्षा पर क्‍या असर हो रहा है, इससे जुड़ा </span><a href="https://pqars.nic.in/annex/252/AU1311.pdf" style="background-color: rgb(255, 255, 255);"><u>सवाल</u></a><span style="background-color: rgb(249, 249, 249);"> राज्‍यसभा में 22 सितंबर 2020 को पूछा गया। इसके जवाब में केंद्रीय शि‍क्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ने बताया कि मंत्रालय ने&nbsp;</span><a href="https://ncert.nic.in/" style="background-color: rgb(255, 255, 255);"><u>राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद</u></a><span style="background-color: rgb(249, 249, 249);"> (National Council of Educational Research and Training) या एनसीईआरटी के माध्‍यम से जुलाई 2020 में एक सर्वे कराया है। इस सर्वे में केंद्रीय विद्यालय संगठन, नवोदय विद्यालय समिति और सीबीएसई को शामिल किया गया।</span></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><span style="background-color: rgb(249, 249, 249);">केंद्रीय शिक्षा मंत्री जिस सर्वे का जिक्र कर रहे हैं उसकी फाइंड‍िंग्‍स </span><a href="https://ncert.nic.in/pdf/announcement/Learning_%20Enhancement_Guidelines.pdf"><u>Learning enhancement guidelines</u></a><span style="background-color: rgb(249, 249, 249);"> में शामिल की गई थीं। यह सर्वे 18,188 छात्रों, 3,543 टीचर्स, 253 प्राध्यापकों और 12,614 अभ‍िभावकों पर किया गया था। इसमें कोरोना के बीच ऑनलाइन पढ़ाई में बाधा बनने वाले कारकों का जिक्र किया गया था।</span></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">जैसे- करीब 27% छात्रों ने स्‍मार्टफोन और लैपटॉप न होने की बात कही । इसी तरह पढ़ने और पढ़ाने के बीच की रुकावटें, बिजली का न होना जैसी असुविधा के बारे में 28% लोगों ने जिक्र किया। इसके अलावा खराब इंटरनेट, फोन या लैपटॉप के इस्‍तेमाल करने में द‍िक्‍कत के साथ ही अध्यापक और छात्रों के बीच होने वाले संवाद की कमी ने भी परेशानी खड़ी की।</p><p dir="ltr">ऑनलाइन शिक्षा कितनी कारगर है इसे लेकर पिछले साल नवंबर में अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय का सर्वे भी सामने आया था। <a href="https://azimpremjiuniversity.edu.in/SitePages/pdf/Myths_of_online_education.pdf"><u>'ऑनलाइन शिक्षा के भ्रम'</u></a> नाम के इस सर्वे में बताया गया कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 60% बच्‍चों के पास ऑनलाइन शिक्षा के ल‍िए साधन (मोबाइल-लैपटॉप) मौजूद नहीं थे। यह सर्वे 5 राज्यों (छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड और कर्नाटक) में किया गया। सर्वे में 26 जिलों के 1522 सरकारी स्कूल शामिल थे, जिनमें 80 हजार से ज्‍यादा बच्‍चे पढ़ते थे।</p><p dir="ltr"><b>बच्‍चों को दी जा रही उपचारात्मक श‍िक्षा </b></p><p dir="ltr">लॉकडाउन की वजह से बच्‍चों की पढ़ाई पर हुए असर को कम के लिए अलग-अलग राज्‍य अपनी तरह से काम कर रहे हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग ने भी योजना तैयार की है। उत्तर प्रदेश में करीब <a href="http://www.upmdm.org/"><u>1.14 लाख</u></a> प्राथमिक और करीब 54 हजार उच्‍च प्राथमिक विद्यालय हैं। </p><p dir="ltr">मार्च 2021 से इन स्‍कूलों की शुरुआत हुई और 50% क्षमता के साथ इन्‍हें चलाया जाने लगा। यानी एक कक्षा के बच्‍चों को हफ्ते में दो द‍िन ही स्‍कूल बुलाया जा रहा था, लेकिन मार्च के आखिर तक कोरोना के मामले प्रदेश में बढ़ने लगे, ऐसे में पहले होली की छूट्टी के नाम पर और बाद में कोरोना की वजह से एक से आठ तक के स्‍कूल 11 अप्रैल तक बंद कर द‍िए गए। </p><p dir="ltr">बच्‍चों की पढ़ाई पर हुए नाकारात्‍मक असर को देखते हुए उत्तर प्रदेश का शिक्षा विभाग क्‍या कदम उठा रहा है, इस बारे में देवरिया जिले के बेसिक श‍िक्षा अध‍िकारी संतोष राय ने इंड‍ियास्‍पेंड से बात की। </p><p dir="ltr">"शासन की ओर से जो न‍िर्देश मिला है उसके मुताबिक सुबह का पहला घंटा ऑनलाइन क्‍लास के माध्‍यम से पढ़ाई गई सामग्री को दोहराने के ल‍िए उपयोग किया जा रहा है। इसे उपचारात्‍मक शिक्षा (रिमेडियल टीच‍िंग) का नाम दिया गया है। आठ सप्‍ताह का शेड्युल बनाकर इसे पूरा किया जाएगा, जिससे कि बच्‍चों के भाषा और गण‍ित के स्‍तर पर जो भी मानक हैं उन्‍हें प्राप्‍त किए जा सके," संतोष राय कहते हैं।<br></p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/12/455852-img20210301105210.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421mBno0U5GRyu4QL6Vr1MdYHQZjzC1ZU4U1018146" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1618231037696" title="लखनऊ के एक प्राथमिक विद्यालय की सहायक श‍िक्षक रचना राय बच्‍चे को समझाते हुए। फोटो: रणव‍िजय स‍िंह" alt="लखनऊ के एक प्राथमिक विद्यालय की सहायक श‍िक्षक रचना राय बच्‍चे को समझाते हुए। फोटो: रणव‍िजय स‍िंह" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1618231037696"><p>लखनऊ के एक प्राथमिक विद्यालय की सहायक श‍िक्षक रचना राय बच्‍चे को समझाते हुए। फोटो: रणव‍िजय स‍िंह</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">संतोष राय यह भी बताते हैं कि लॉकडाउन की वजह से बच्‍चों की पढ़ाई में जो गैप हुआ है उसकी भरपाई का पूरा प्रयास किया जा रहा है। यह चुनौतीपूर्ण है, लेकिन श‍िक्षकों को प्रोत्‍साहित करते हुए काम हो रहा है। फिलहाल बच्‍चों का आंकलन करते हुए हर क्‍लास में तीन ग्रुप बनाए जाएंगे, यह ग्रुप ऐसे बनाए जाएंगे कि बच्‍चों को पता न चले। साथ ही हर सप्‍ताह आंकलन होगा तो एक ग्रुप का बच्‍चा दूसरे ग्रुप में भी जा सकता है, यह सब उसकी दक्षता पर निर्भर करेगा।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b>बच्‍चों की पढ़ाई छूटने का खतरा बढ़ा</b><br></p><p dir="ltr">हालांकि उत्तर प्रदेश के श‍िक्षा विभाग का यह प्‍लान उन बच्‍चों के ल‍िए है जो स्‍कूल जाएंगे, जबकि जानकारों का मानना है कि लॉकडाउन की वजह बहुत से ऐसे बच्‍चे होंगे जो अब स्‍कूल नहीं लौटेंगे। "लॉकडाउन का सबसे ज्‍यादा असर ग्रामीण इलाकों के बच्‍चों पर पड़ा है, उसमें भी सबसे ज्‍यादा असर बच्‍च‍ियों पर पड़ा है। बहुत सी बच्‍च‍ियां ऐसी होंगी जो अब स्‍कूल नहीं लौट पाएंगी। सरकार को इस दिशा में काम करना होगा। केवल शत प्रतिशत नामांकन का नोट‍िफ‍िकेशन न‍िकालने से काम नहीं चलेगा। अभ‍िभावकों और बच्‍चों को इसके ल‍िए मोट‍िवेट करना होगा", ऐसा  <a href="https://rteforumindia.org/"><u>'आरटीई फोरम'</u></a> के मीड‍िया समन्‍वयक मित्ररंजन कहते हैं।</p><p dir="ltr">आरटीई फोरम अभी बुंदेलखंड के सात जिलों में 'बैक टू स्‍कूल अभ‍ियान' चला रहा है। इस अभ‍ियान के तहत लॉकडाउन के बाद लड़कियों के स्कूल वापस न जाने के खतरों को कम करने का प्रयास हो रहा है। फिलहाल 10 बालिका लर्निंग सेंटर बनाकर करीब 500 लड़कियों को पढ़ाया जा रहा है ताकि उनकी श‍िक्षा नियमित बनी रहे।<br></p><p dir="ltr">शिक्षा के क्षेत्र में कुछ इसी तरह का काम प्रयागराज जिले की संस्‍था <a href="http://shuruaat.org/?fbclid=IwAR0hJqFVL8qin0lFoUJtkETHmhV6PrTsVeH8pBgEeUDpuJjjaoigaOUFiwU"><u>'शुरुआत, एक ज्योति शिक्षा की'</u></a> ओर से किया जा रहा है। इस संस्‍था की ओर से गरीब तबके और खास तौर से झुग्‍ग‍ियों में पलने वाले बच्‍चों को पढ़ाने का प्रयास किया जाता है। इसके संस्‍थापक अभ‍िषेक शुक्‍ला का भी मानना है कि लॉकडाउन की वजह से गरीब तबके से जुड़े बहुत से बच्‍चे वापस स्‍कूल नहीं लौट पाएंगे।<br></p><p dir="ltr">"हम 2016 से ही गरीब तबसे से जड़े बच्‍चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं। जिन बच्‍चों को हम पढ़ाते हैं उनमें से कई भीख मांगने का काम करते आए हैं। हमने बहुत प्रयास करके उन्‍हें इस काम से निकाला था, लेकिन लॉकडाउन के बाद उनमें से बहुत से बच्‍चे वापस उसी काम में लौट गए। वजह यह थी कि पढ़ाई से ज्‍यादा जरूरी भूख हो गई। हम अभी भी प्रयास कर रहे हैं कि बच्‍चे वापस पढ़ने आ जाएं," अभ‍िषेक शुक्‍ला ने कहा।<br></p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i><br></p><div><br></div></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/covid-19/children-forget-lessons-of-previous-classes-during-covid-lockdown-741347</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/covid-19/children-forget-lessons-of-previous-classes-during-covid-lockdown-741347</guid>
<category><![CDATA[Covid-19,कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,सेहत,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[रणविजय सिंह]]></dc:creator>
<pubDate>Mon, 12 Apr 2021 12:57:19 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/12/500x300_455856--.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बाघ और बेरोज़गारी से जूझती सुंदरबन की महिलाएँ अकेले जीवन-यापन करने को मजबूर]]></title>
<description><![CDATA[सुंदरबन के इलाक़े कई में गांव ऐसे हैं जहां के पुरुष या तो जंगल में बाघ के शिकार बन गए हैं या फिर दुसरे शहरों में मजदूरी के लिए चले गए हैं। ऐसे में परिवारों की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से महिलाओं के कन्धों पर आ गयी है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>दक्षिण 24 परगना, पश्चिम बंगाल: </b>पश्चिम बंगाल का सुंदरबन का इलाक़ा जो कि अपने बाघों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है धीरे-धीरे ऐसे गावों में तब्दील होता जा रहा है जहां अब सिर्फ महिलाएं ही मौजूद हैं।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">सुंदरबन के कई गांवों में सिर्फ महिलाएं ही रहती हैं क्योंकि इनमे से कइयों के पति आजीविका ढूंढने के लिए अन्य शहरों में मज़दूरी करने चले गए हैं या फिर <a href="http://sundarbantigerreserve.org/str/"><u>सुंदरबन टाइगर रिज़र्व </u></a>में मछली पकड़ने के दौरान बाघ का शिकार बन गए। कुल मिलाकर इन गावों में बच गयी हैं सिर्फ महिलाएं जो अपने अकेले के दम पर परिवारों का भरण पोषण करने पर मजबूर हैं।</p><p dir="ltr">पश्चिम बंगाल के दक्षिणी ज़िले, दक्षिण 24 परगना के सुंदरबन के जंगलों से सटा एक गाँव-- देऊलबाड़ी। इस गाँव को इस इलाक़े में 'विधवापाड़ा' के नाम से भी जाना जाता है, विधवापाड़ा यानी विधवाओं का गाँव। इस गाँव के हर दूसरे घर में एक विधवा रहती है जिसके पति की मौत बाघ का शिकार बनने से हुई हैं।</p><p dir="ltr">देऊलबाड़ी की रहने वाली 23 वर्षीय अंजलि बैद्य के पति इस साल फरवरी की पहली तारीख को रोज़ की तरह जंगल में काम पर गए थे लेकिन कभी नहीं लौटे।</p><p dir="ltr">अंजली की शादी सात साल पहले हुई थी जिस दौरान उनके पति 6 महीने जंगलों में जाकर मछली पकड़ने का काम करते थे और बाकी के 6 महीने कोलकाता में मजदूरी करके अपने परिवार का भरण पोषण करते थे। अंजलि अपने दो बच्चों को शहर में पढ़ाना चाहती थी लेकिन बीते महीने में वो कई दिन उनके लिए दो वक़्त का खाना भी जुटा नहीं पायी है</p><p dir="ltr">"मैं सोचती रहती हूँ कि मेरी ज़िंदगी का क्या होगा, मेरे बच्चों का क्या होगा, वो कैसे बड़े होंगे, मैं अकेले क्या करूँगी, ये ज़िंदगी बहुत बड़ी है, सब कैसे होगा? आज से मेरे घर में चूल्हा जलना शुरू हुआ है, लोगों से जो चावल माँगा है वो पका रही हूँ एक महीने से गाँव वालों से माँग कर ही बच्चों को खिला रही हूँ," अंजली ने बताया। </p><p dir="ltr">"कोई चावल देता है, कोई सब्ज़ी देता है, ऐसे ही सबसे माँग कर चलता है। ऐसे भी दिन होते हैं की कोई भी खाना नहीं देता, बच्चों को भूखा सोना पड़ता है, जब से इनके पिता की मौत हुई है, ऐसे कई दिन गुजरे हैं जब इनको भूखे पेट सुलाना पड़ा है," अंजली ने बताया। </p><p dir="ltr">अंजलि की तरह ही इस इलाक़े में कई महिलाएं हैं जिनके पति को बाघ ने मार दिया।</p><p dir="ltr"><b>पश्चिम बंगाल की बाघ विधवा</b></p><p dir="ltr">देऊलबाड़ी गांव जहाँ अंजली रहती है, इस गाँव के हर दूसरे घर में एक विधवा रहती है।</p><p dir="ltr">किसी के पति की मौत 10 दिन पहले हुई है और शोक नया है, किसी के पति की मौत 10 साल पहले, और शोक काफ़ी समय पहले ख़त्म हो चुका है। लेकिन संघर्ष दोनो का बराबर है, किसी के लिए नया है, किसी को इससे जूझने की आदत हो चुकी है। </p><p dir="ltr">इन सब के पतियों की मौत का कारण एक ही है, बाघ द्वारा मारा जाना। सुंदरबन दुनिया भर में अपने आदमखोर रॉयल बंगाल बाघ के लिए जाना जाता है, जो एक लुप्तप्राय प्रजाति है। सुंदरबन में फ़िलहाल <a href="https://www.thehindu.com/life-and-style/tiger-population-in-sunderbans-rises-to-96/article31529772.ece"><u>96 बाघ </u></a>हैं।</p><p dir="ltr">"ये समस्या समय के साथ बढ़ती जा रही है, हर दिन खबर आती है कि बाघ किसी को खा गया। ऐसा होने के बाद पूरा परिवार बिगड़ जाता है, बच्चों की पढ़ाई, खानपान सब मुश्किल हो जाता है," इस इलाके में महिलाओं के साथ काम करने वाली संस्था '<a href="http://rupantaranfoundation.org/"><u>रूपांतरण</u></a>' के साथ जुड़ी, स्मिता सेन ने बताया।</p><p dir="ltr">"बाघ का शिकार होने वाले लोगों का सरकारी आंकड़ा हकीकत से काफी दूर है। सरकार सिर्फ उन्ही को गिनती में शामिल करती है जिनके पास जंगल में जाने का परमिट होता है। पर हकीकत में 80% लोगों के पास परमिट होता  ही नहीं है," नकुल जाना, 77, <a href="http://tigerwidows.in/index.aspx"><u>सुंदरबन टाइगर विडो वेलफेयर सोसाइटी </u></a>के अध्यक्ष ने बताया।</p><p dir="ltr">"हम 2011 से बाघ विधवाओं का आंकड़ा इकट्ठा कर रहे हैं, सुंदरबन में  ये आंकड़ा लगभग 3,000 है। आखिरी मौत यहां 7 मार्च को हुई," नकुल ने बताया।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/30/448878-women-in-vidhwapada.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421R0R6GPrEv6fuUu4el97M6SS8cgxDvHhO8392446" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1617118401164" title="विधवापाड़ा गांव में महिलाएं। फोटो: साधिका तिवारी" alt="विधवापाड़ा गांव में महिलाएं। फोटो: साधिका तिवारी" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1617118401164"><p>विधवापाड़ा गांव में महिलाएं। फोटो: साधिका तिवारी</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b>मुआवज़े की बातें एक 'कागज़ी शेर'</b><br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">बाघ विधवाओं की मुश्किलें सिर्फ यहां पर ही खत्म नहीं होती हैं। जब मुआवज़े की बात आती हैं तो इनमे से बहुत ही कम महिलाओं को सरकार की तरफ से मुआवज़े की राशि प्राप्त हुई हैं।</p><p dir="ltr">"मेरा पति मर गया पर सरकार ने मुझे कुछ नहीं दिया, बाक़ी कई लोगों को मिला पर मुझे नहीं मिला। मैंने सबको पूछा, सबको बताया पर एक पैसा भी नहीं मिला आज तक। मेरे पति को मरे हुए एक साल से भी ज़्यादा हो गया, कितनी बार बोला पर कुछ नहीं मिला। मैं किस से शिकायत करूँ, मेरी कौन सुनेगा?" जमुना बैद्य, 60, ने बताया।</p><p>"मेरा बेटा काम नहीं करता, अपाहिज है, हमारे पास खाने को भी कुछ नहीं होता," जमुना ने कहा।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/30/448879-jamuna-baidya.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421zQvWo7e0oJ79cehw6yN1iGm8xKKSi3ub8563490" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1617118571225" title="जमुना बैद्य अपने घर के बाहर। फोटो: साधिका तिवारी" alt="जमुना बैद्य अपने घर के बाहर। फोटो: साधिका तिवारी " data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1617118571225"><p>जमुना बैद्य अपने घर के बाहर। फोटो: साधिका तिवारी<br></p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p>"मुआवजा दिलवाने में कोई भी महिला की मदद नहीं करता, न ही रिश्तेदार, न ही कोई पड़ोसी। एक फॉर्म भरना ही इतना मुश्किल होता है। ये पूरी व्यवस्था ही बहुत खराब है। परिवार अक्सर विधवा महिलाओं को पाप या अशुभ बुला कर उसकी मदद करने की बजाय उसे परिवार से निकाल देते हैं, ताकि घर की जायदाद में से उसका हिस्सा खत्म हो जाए," नकुल ने बताया।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">'मुआवजा तीन अलग अलग विभाग देते हैं, कागज पर तो आजकल ये राशि काफी बढ़ गई है पर ये असल में कितनों को मिलती है ये अलग बात है। किसी को एक लाख, दो लाख या पांच लाख तक मुआवजा मिलता हैं। पर्यावरण और वन विभाग, पांच लाख रुपए देता है, दो लाख मछली पालन विभाग देता है और बीमा की तरफ से एक लाख रुपए," नकुल ने बताया।<br></p><p dir="ltr">"मेरे घर के पास जिस महिला के पति को बाघ ने मारा उसको 4 लाख रुपए मिले सरकार से," अंजली ने बताया। पर अभी तक अंजली को कुछ नहीं मिला है, वो कई बार सरकारी दफ़्तरों के चक्कर लगा चुकी है पर अभी तक उन्हें कोई आर्थिक मदद नहीं मिली।<br></p><p dir="ltr">"मैं सरकारी दफ़्तर में गयी, नाव के मालिक से लड़ाई भी की, पुलिस को पूछा, पर कुछ नहीं हुआ," अंजली ने बताया, "मेरे पति का डेथ सर्टिफ़िकेट भी अभी तक नहीं मिला है।"<br></p><p dir="ltr">"बिना परमिट के जंगल में जाने के लिए सरकार जेल और जुर्माना लगा सकती है। लोगों में इतना डर है कि अक्सर किसी महिला का पति मर जाता है और वो किसी को नही बताती, उसकी चिता नही जलाती, शोक नही मनाती। महिलाएं झूठ बोल देती है की उनका पति शहर में काम करने गया है, 6-7 महीने में सब भूल जाते हैं," नकुल ने बताया।<br></p><p dir="ltr"><b>बाघ का डर या रोज़गार की कमी, सुंदरबन में अकेले संघर्ष कर रही महिलाएँ</b><br></p><p dir="ltr">"सुंदरबन के खेत कम होते जा रहे हैं, खेतों का बढ़ता खारापन धान की उत्पादकता कम रहा है, कुछ खेत इतने खारे हो चुके हैं की किसान इन्हें कम दाम पर बेचने पर मजबूर है, इस खेत के ख़रीददार है प्रॉन मछली का उत्पादन कर रहे किसान क्योंकि प्रॉन खारे पानी में बेहतर होता है, फ़िशरी में भी मछलियां कम है," इस इलाक़े के जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दों पर काम कर रहे, शौमित्रा दास ने बताया, "यहाँ जीवन यापन बहुत कठिन है, लोग यहाँ से पलायन करने पर मजबूर हैं।"</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/30/448880-fishery-in-sinderbans.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="44214fFVTZF4e67InitGxXH9I3Cgv0Nd9uYs8669130" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1617118671795" title="सुंदरबन में होने वाला मछली पालन। फोटो: साधिका तिवारी&nbsp;" alt="सुंदरबन में होने वाला मछली पालन। फोटो: साधिका तिवारी " data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1617118671795"><p>सुंदरबन में होने वाला मछली पालन। फोटो: साधिका तिवारी&nbsp;</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"अक्सर लोग पूरे परिवार के साथ पलायन करते हैं, पर भारी संख्या में महिलाएं और बच्चे घर पर रहते हैं," सुंदरबन में महिलाओं के साथ काम करने वाले संगठन, रूपांतरण के साथ जुड़ी स्मिता सेन ने बताया, "नतीजा ये है कि पलायन का कारण दूसरे शहरों में नौकरी हो हो या बाघ, महिलाएं यहाँ अकेले ही अपने और अपने बच्चों का ख़याल रखने को मजबूर हैं।"<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">पति को बाघ ने मार दिया हो या वो नौकरी के लिए शहर गया हो, समानता ये है कि सभी महिलाएं अकेले संघर्ष कर रही है। कुछ पति के पैसे भेजने की उम्मीद के साथ, कुछ इसके बिना।</p><p dir="ltr">जितनी महिलाओं से <b>इंडियास्पेंड </b>ने बात की वो या तो दूसरे के खेतों में दिहाड़ी करती हैं, ये काम ज्यादातर लोगों को हफ़्ते में सिर्फ़ दो दिन मिलता है, प्रतिदिन रुपए 200-250 के मेहनताने के साथ। इसके अलावा जब मौक़ा मिलता है ये फ़िशरी में काम करती हैं।<br></p><p dir="ltr">इस सब के बीच जब अम्फान या बुलबुल जैसे तूफ़ान आते हैं और जीवन फिर एक सिरे से दोबारा बसाना पड़ता है तो ये भी महिलाएं अकेले करती हैं। ज़्यादातर महिलाएं रोजमर्रा के संघर्षों से इतनी घिरी हुई हैं कि घर उजाड़ने पर मिलने वाले मुआवज़े के लिए फ़ॉर्म भरना या सरकारी दफ़्तर जाने का ना ही इनके पास समय है और ना ही संसाधन।<br></p><p dir="ltr">अम्फान के बाद राज्य सरकार ने पीड़ितों को घर बनाने और खेती में हुए नुक्सान के लिए <a href="https://thewire.in/rights/west-bengal-cyclone-amphan-victims-compensation-corruption-irregularities"><u>मुआवज़े </u></a>कि घोषणा की थी। लेकिन ये राशि अभी भी कई पीड़ितों तक नहीं पहुँच पायी हैं।।<br></p><p dir="ltr">"अम्फान के बाद से हम घर फिर से बनाने की कोशिश कर रहे थे, मेरा घर भी पूरा बना नहीं है, अभी इसमें और मिट्टी लगेगी, घर बनाने के लिए पैसे भी मेरे पति के ही पास थे, पता नहीं अब ये घर कैसे बनेगा," अंजली ने कहा।<br></p><p dir="ltr">"यही एक छोटा घर है, वो पूरी तरह टूट गया था अमफान में, पर सरकार से कोई मदद नहीं मिली, ये अभी धीरे धीरे बनाना शुरू किया है। अगर मुआवज़ा माँगने सरकारी दफ़्तर जाऊँगी तो उस दिन का पैसा कौन लाएगा, खाना कौन बनाएगा, बच्चे कौन देखेगा," अंजली ने बताया।<br></p><p dir="ltr">चंदना मंडल, 36, के पति की मौत लगभग 3 महीने पहले हुई। चंदना के तीन बच्चे हैं जिनके पालन पोषण के लिए उन्होंने काम करना शुरू किया है।<br></p><p dir="ltr">"मैं पहले काम नहीं करती थी, अब मैंने काम करना शुरू किया है, अभी मैं धान के खेत में काम करती हूँ, जो भी काम मिलेगा खेत में या फ़िशरी में, मैं करूँगी। अभी एक दिन काम करने के रुपए 200 से 250 मिलते हैं, पर काम हफ़्ते में सिर्फ़ दो बार मिलता है," चंदना ने बताया।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/30/448883-chandana-mandal.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421tYJkpbbKBYAqBEpDBi5GH8ZIgWKYQhJy8777995" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1617118785284" title="चंदना मंडल अपने घर पर। फोटो: साधिका तिवारी" alt="चंदना मंडल अपने घर पर। फोटो: साधिका तिवारी" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1617118785284"><p>चंदना मंडल अपने घर पर। फोटो: साधिका तिवारी</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"पर इतने पैसे में कुछ नहीं होता है, बच्चों के लिए खाना भी पूरा नहीं पड़ता है, जब से पति की मौत हुई है बच्चों के लिए खाना भी पूरा नहीं पड़ता है, कई दिन रोते रोते भूखे सो जाते हैं, मैं क्या करूँ। कुछ दिन गांव वालों से माँग कर कुछ खाया पर गाँव वाले भी मदद नहीं करते हैं। 15 दिन से मेरी तबियत ख़राब है पर पैसा नहीं है डॉक्टर के पास जाने का," चंदना ने बताया। चंदना को भी कई चक्कर लगाने के बाद भी सरकार से अभी तक कोई पैसा नहीं मिला है।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">ज़्यादातर महिलाएं इसी गांव में रहकर काम करना चाहती हैं, भले ही काम और आमदनी दोनों कम हो। वहीं अंजली जैसी कुछ महिलाएं अपने बच्चों को बेहतर जीवन देने के लिए पलायन कर के किसी बड़े शहर जाना चाहती हैं, भले ही संघर्ष कितना भी हो।<br></p><p dir="ltr">"अगर हो सकेगा तो किसी के घर में काम करके अपने लड़का, लड़की को हॉस्टल में पढ़ाऊँगी। मुझे आगे बढ़ना पड़ेगा, कुछ काम करना पड़ेगा, कोई थोड़ी ना खिलाएगा मुझे और मेरे बच्चों को," अंजली ने सुबकते हुए कहा, "मैं कोलकाता जाऊँगी तो बच्चों के साथ नहीं रहूँगी, वहाँ उनके रहने की जगह थोड़ी मिलेगी। मैं किसी के घर काम करूँगी तो महीने के रुपए 10 हज़ार मिलेंगे।"<br></p><p dir="ltr">"मैं चुनाव ख़त्म होने का इंतज़ार कर रही हूँ, चुनाव ख़त्म हो जाए तो मैं कोलकाता चली जाऊँगी वहाँ किसी के घर में काम करूँगी," अंजली ने कहा।<br></p><p dir="ltr"><b>ख़तरे के बावजूद क्यों जाते हैं लोग जंगलों में?</b></p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/30/448884-saline-land-sunderbans.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421ANcxJxSW7CoaOnEeqNv5Ijj7ilXn1IuU9175844" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1617119196728" title="सुंदरबन में लगातार खरे होते भूक्षेत्र। फोटो: साधिका तिवारी" alt="सुंदरबन में लगातार खरे होते भूक्षेत्र। फोटो: साधिका तिवारी" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1617119196728"><p>सुंदरबन में लगातार खरे होते भूक्षेत्र। फोटो: साधिका तिवारी</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">सुंदरबन बंगाल की खाड़ी से सटे हुए मैंग्रोव जंगल हैं जो भारत में पश्चिम बंगाल के उत्तर और दक्षिणी 24 परगना से शुरू होकर बांग्लादेश तक फैले हुए हैं, दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव जंगल। मैंग्रोव खारे पानी या अर्ध-खारे पानी में पाए जाते हैं, अक्सर जहाँ नदी किसी सागर में बह रही होती है, और मीठा पानी खारे पानी से मिलता है।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">सुंदरबन के जंगलों में कई भिन्न प्रकार और प्रजाति के पेड़-पौधे, जीव-जंतु, जानवर और मछलियाँ पायी जाती है। सुंदरबन से सटे गाँवो में ज़्यादातर लोग जीवनयापन के लिए धान की खेती, मछली पालन और वन उपज पर निर्भर होते हैं।<br></p><p dir="ltr">जलवायु परिवर्तन जैसे कई अन्य कारणों के चलते, तटों के क़रीब स्थित खेतों की ज़मीन में खारापन समय के साथ बढ़ता जा रहा है जिसकी वजह से धान की उपज कम हो रही है, इसके सिवा ज़्यादातर लोगों के पास खेती के लिए ज़मीन भी नहीं है, ज़्यादातर किसान लघु भूमिधारक हैं। साथ ही मछलीपालन में भी मुनाफ़ा कम होता जा रहा है।<br></p><p dir="ltr">हर साल बाढ़ आने के बाद, तट से सटे खेत और डूबते जाते हैं, ज़मीन कम होती जाती है, जो ज़मीन बचती है वो बाढ़ के बाद महीनो खारी रहती है जहाँ धान उगना मुश्किल होता है। समय समय पर आने वाली प्रक्रतिक आपदाएँ जैसे मई 2019 में आया तूफ़ान अम्फान या नवंबर 2019 में आया तूफ़ान बुलबुल जो खेत, तालाब, घर सब तहस-नहस कर देते हैं।<br></p><p dir="ltr">ऐसे में दो ही रास्ते बचते हैं, या तो शहर जा कर काम करना,  प्रवासी मज़दूर बनना या ख़तरे से वाक़िफ़ होते हुए भी अपनी जान जोखिम में डालकर इन जंगलों में जाना। जंगल में ज़्यादातर लोग वनोपज जैसे की लकड़ी या शहद या बेहतर मछली की तलाश में जाते हैं, जहाँ इनका सामना आदमखोर बाघ से होता है।</p><p dir="ltr">"जंगल के अंदर जाने के लिए तीन तरह की परमिट चाहिए होती है, मछुआरे का लाइसेंस, नाव का लाइसेंस और इंश्योरेंस या बीमा के कागज," नकुल ने बताया, "सरकार ठीक से लोगों का जन्म और मौत रिकॉर्ड नहीं कर पाती है यहां, बाघ ने किसको मारा ये कौन देखेगा।"</p><p dir="ltr">"हर दिन जब मेरा पति जंगल में जाता था, रोज़ लगता था की शायद आज ना आए, सबको पता है की ख़तरा है लेकिन सब उम्मीद करते हैं की शायद उनके साथ ऐसा नहीं होगा," भद्रा नया, 23, ने बताया, "और कोई कर भी क्या सकता है? आदमी पेट पालने के लिए सब करता है। या तो जंगल में जा कर खुद मरो, नहीं तो बच्चों को रोज़ भूखा देखो।"<br></p><p dir="ltr">"सुंदरबन इलाके में लगभग 30,000 परिवार रहते हैं, यानी लगभग 15 लाख लोग। इसमें से 10% पूरी तरह से वनोपज पर निर्भर हैं। कोई एक सरकार या संस्था यहां के हालात बदल नहीं पाएगी। बदलाव लाने के लिए जरूरी है की इन 30,000 परिवारों के लिए व्यवसाय के अन्य रास्ते खोले जाए," नकुल ने बताया।</p><p dir="ltr"><i style="">हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org" style=""><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i style=""> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i><br></p><div><br></div></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/women-2/women-of-sundarban-forced-to-struggle-live-alone-738924</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/women-2/women-of-sundarban-forced-to-struggle-live-alone-738924</guid>
<category><![CDATA[कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,महिलाएं,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[साधिका तिवारी]]></dc:creator>
<pubDate>Tue, 30 Mar 2021 15:52:45 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/30/500x300_448863--.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[प्रवासी पक्षियों के शिकार के लिए कुख्यात ओडिशा का मंगलाजोड़ी कैसे कर पाया उनके संरक्षण की शुरुआत]]></title>
<description><![CDATA[2002 में मंगलाजोड़ी के 12 खूंखार शिकारियों को घुटनों तक पानी में खड़ा कर स्थानीय देवी माँ कालीजाई (गांव की कुल देवी) के नाम की शपथ दिलवा कर शिकार छोड़ने का वचन लिया गया और पक्षी संरक्षण का संकल्प दिलवाया गया।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>मंगलाजोड़ी, ओडिशा: </b>पिछले साल प्रवासी पक्षियों और जंगली जानवरों की प्रजातियों के संरक्षण पर आयोजित <a href="https://www.hindustantimes.com/india-news/cms-cop13-govt-plan-for-conservation-of-migratory-birds-ready-says-pm/story-scUgacsHZ6B10SqE4pYBcM.html"><u>13वें सम्मेलन (सीओपी-13)</u></a> में रखी गयी एक रिपोर्ट में शिकार और अवैध शिकार को विश्व भर में प्रवासी पक्षियों के लिए बड़ा खतरा बताया गया। यह आह्वान किया गया कि इसे रोकने के लिए ठोस प्रयास करने होंगे। सम्मेलन में व्यक्त की गयी चिंता पर टिप्पणी करते हुए 47-वर्षीय शीबा बेहरा कहते हैं, "सौभाग्य से हमें समय रहते समझ आ गयी।"<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">बेहरा उन शिकारियों में से हैं जो पहले प्रवासी पक्षियों के शिकार से ही अपना जीवन यापन करते थे लेकिन साल 2002 में उन्होंने शिकार न करने की शपथ लेने के साथ ही प्रवासी पक्षियों का संरक्षण भी शुरू किया।</p><p dir="ltr">बेहरा 2002 के समय को याद करते हुए कहते हैं, "तब मैंने और 11 अन्य लोगों ने साइबेरिया से हर साल सर्दियों में उड़ कर ओडिशा की चिल्का झील में प्रवास के लिए आने वाले प्रवासी पक्षियों के शिकार को रोकने की कसम खाई थी। जैसे ही शिकारी रक्षक बने, चिल्का झील के उत्तरी किनारे पर स्थित दलदली बस्ती मंगलाजोड़ी की किस्मत बदलना शुरू हो गयी।आज यह प्रयास भारत में सामुदायिक भागीदारी से पक्षी संरक्षण का बड़ा उदाहरण बन रहा है।"<br></p><p dir="ltr">स्थानीय अनुमान के मुताबिक 2002 में चिल्का झील के किनारे पर बसे मंगलाजोड़ी में 5,000 प्रवासी पक्षी आते थे, अब इनकी संख्या इस गांव में दो लाख तक पहुंच गयी है। किसानों और मछुआरों के इस छोटे से गांव में इको टूरिज्म जीवन यापन का नया जरिया बन कर उभरा है। टांगी खंड के गांव मंगलाजोड़ी से शुरू हुआ यह प्रयास खंड के अन्य गांव जैसे सोरोना, जतीपटना और सुंदरपुर तक फ़ैल गया। यही नहीं, अब यह प्रयास 47 किलोमीटर दूर स्थित पुरी जिले में भी लोगों को प्रेरित कर रहा है।<br></p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 24px;">शिकारी से संरक्षक</span> </b></p><p dir="ltr">मंगलाजोड़ी ने यह सफलता अचानक नहीं पायी और न ही यह अकेले 12 लोगों का काम था।<br></p><p dir="ltr">साल 1997 का था, जब पूर्व वन्य प्राणी रक्षक नंद किशोर भूजबल ने तय किया कि मंगलाजोड़ी में पक्षियों के अंधाधुंध शिकार पर रोक लगानी है। 76-वर्षीय भूजबल याद करते हुए बताते हैं, "1960 से 70 के बीच में यहां बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी आते थे। जब उनके झुंड उडते थे तो आसमान भी काला प्रतीत होता था।"</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/24/445463-former-wildlife-warden-chilika-laka-orissa.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="44215T08P2yUjs5Vh9BjCSRFQmdf4tckCaho1408235" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1616571408886" title="पूर्व वन्यजीव वार्डन नंद किशोर भुजबल, जिन्होंने पक्षियों की रक्षा के लिए ग्रामीणों को प्रेरित किया (फोटो: तज़ीन कुरैशी)" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1616571408886"><p>पूर्व वन्यजीव वार्डन नंद किशोर भुजबल, जिन्होंने पक्षियों की रक्षा के लिए ग्रामीणों को प्रेरित किया (फोटो: तज़ीन कुरैशी)</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">परंतु यही वह समय भी था जब यहां शिकारी गतिविधियां भी चरम पर थीं। आलम ये था कि बच्चे तक पक्षियों को मार गिराते थे।"<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">शीबा याद करते हुए बताते हैं, "हम कश्ती से झील के बीच जाते, एक या दो पक्षी मारते, उसका मांस भूनते और स्थानीय शराब के साथ खाते थे। इस क्षेत्र में जंगल के अधिकारी और कुछ पुलिसकर्मी भी होते थे पर हम उन्हें धमका देते थे।"<br></p><p dir="ltr">शिकारियों का गुस्सा समझ में आता था। क्योंकि तब उन्हें एक पक्षी के रूपए 15 या इससे भी ज्यादा मिल जाते थे। इतने पैसे पूरा दिन धान के खेत में मेहनत करने के बाद भी नहीं मिलते थे। पर शिकार से होने वाली कमाई स्थायी नहीं है, शीबा ये बात समझने लगे।</p><p dir="ltr">शीबा, भुजबल और ग्रामीण बुजुर्गों की उस बैठक को याद करते हुए बताते हैं: "आदरणीय भुजबल ने बताया कि शिकार से वह कुछ सालों तक पैसा कमा सकते हैं, लेकिन यदि वह इस इलाके को संरक्षित कर दें और पक्षियों के लिए सुरक्षित व आरामदायक कर दें तो हम हर साल पैसे कमा सकते हैं|" यह बात सभी की समझ में आयी।<br></p><p dir="ltr">2002 में भुजबल ने मंगलाजोड़ी के 12 खूंखार शिकारियों को घुटनों तक पानी में खड़ा कर स्थानीय देवी माँ कालीजाई (गांव की कुल देवी) के नाम की शपथ दिलवा कर शिकार छोड़ने का वचन लिया। तब भुजबल ने उन्हें अपने एनजीओ श्री श्री महावीर पक्षी सुरक्षा समिति में शामिल करा कर पक्षी संरक्षण का संकल्प दिलवाया।<br></p><p dir="ltr">शिकार छोड़ अब टूरिस्ट गाइड का काम करने वाले जय बेहरा ने बताया, "हमने अपने बुजुर्गों से ऐसी कहानियां सुन रखी थी, जिसने मां देवी की शपथ तोड़ी उसे मां के प्रकोप का सामना करना पड़ेगा। इसलिए हम वचन में बंध गए थे। "</p><p dir="ltr">अगली चुनौती यह थी कि कैसे इन 12 पुरुषों को पक्षियों की पहचान करने और उनके नाम सीखने के लिए प्रशिक्षित किया जाए। भुजबल की संस्था और चिल्का विकास प्राधिकरण (सीडीए) ने इसके लिए उन्हें अभ्यास कराना शुरू किया। शीबा बताते हैं, "जब हम पक्षियों के नाम का अंग्रेजी में उच्चारण करते थे, तो हमारी जीभ मुड़ जाती थी। पक्षियों के नाम याद करने में छह माह लग गए थे।" दूसरी ओर, पक्षियों को शिकारियों से बचाने के लिए नियमित गश्त का काम भी वह कर रहे थे।<br></p><p dir="ltr">इस नए काम से उन्हें तुरंत ही पैसा मिलना शुरू नहीं हुआ था। जय ने बताया, "आदरणीय भुजबल उन्हें कभी कभी चावल व दाल दे देते थे।"</p><p dir="ltr">एक दशक बाद, पक्षियों ने बड़ी संख्या में आना शुरू कर दिया, और जल्दी ही, पर्यटक भी उनके पीछे पीछे आने लगे। ग्रामीणों के लिए रोजगार के नए अवसरों की भरमार हो गयी। अब वह टूरिस्ट गाइड के तौर पर काम कर सकते हैं। कश्ती बनाने और चलाने का काम भी चल निकला। यहां तक की गर्मियों में जब पर्यटन सीजन खत्म हो जाता है, तब चिल्का झील में जैव विविधता पर शोध करने के लिए आने वाले शोधकर्ताओं के सहायता के तौर पर भी काम मिल रहा है। आज 40 ग्रामीण स्थानीय पर्यटन में रोजगार पा रहे हैं। वह एक कश्ती से एक चक्कर लगाने के रुपए 1,200 लेते हैं।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/24/445464-tourist-guide-orissa.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421Um5KoLKnSSc0OYDZHfZl2bX3PP5trzpw1455588" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1616571455866" title="मंगलाजोडी में पर्यटक गाइड (फोटो: तज़ीन कुरैशी)" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1616571455866"><p>मंगलाजोडी में पर्यटक गाइड (फोटो: तज़ीन कुरैशी)</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 24px;">पक्षियों के अलावा और भी कई फायदे</span></b><br></p><p dir="ltr">बदलाव की सामूहिक सोच, जिसे आगे बढ़ाते हुए ओडिशा सरकार ने चिल्का झील में झींगे की खेती को अवैध घोषित कर दिया, इससे चिल्का के जलीय क्षेत्र में लंबे समय के लिए बदलाव आया। एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील अब रिकार्ड संख्या में प्रवासी पक्षियों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। सितंबर से प्रवासी पक्षी आने शुरू हो जाते हैं, इस साल जनवरी में पक्षियों की जो <a href="https://www.hindustantimes.com/india-news/odisha-s-chilika-lake-logs-its-highest-ever-count-with-11-42-lakh-migratory-birds/story-jNWnWvaor6CgJYTb2fQUjO.html"><u>गणना </u></a>की गयी, इसके मुताबिक 11.42 लाख प्रवासी पक्षी आए हैं।</p><p dir="ltr"><i>101रिपोर्टर्स</i>&nbsp; से बातचीत में चिल्का विकास प्राधिकरण (सीडीए) के कार्यकारी निर्देशक आईएफएस सुशांत नंदा ने बताया कि वास्तव में जब पक्षियों को देखने की बात आती है तो चिल्का झील राज्य के जिले, अंगुल और भुवनेश्वर पर भारी पड़ती है। यही स्थिति पानी के अंदर उगने वाली वनस्पति जैसे की समुद्री घास और फूलों के मामले में हैं। नंदा के अनुसार, "समुद्री घास जलवायु परिवर्तन से पड़ने वाले विपरीत प्रभाव को कम करने में बड़ी भूमिका निभाता है और विश्व में समुद्री घास का क्षेत्रफल कम हो रहा है, वहीं चिल्का झील में यह बढ़ रहा है।" सीडीए के सर्वे में पाया गया कि समुद्री घास का एरिया 2019 से 2% तक बढ़ा है।<br></p><p dir="ltr">जब पूरे राज्य में नीतियां (संरक्षण के बारे में) एक जैसी हैं, फिर चिल्का झील का केस अलग क्यों है? यहां इतनी संख्या में विभिन्न प्रजातियों के पक्षी क्यों आते हैं? नंदा ने बताया, "इसके लिए बड़े प्रयास किए गए, जिसमें स्थानीय स्तर के प्रयास भी हैं। यही वजह है, यहां जैसी जैव विविधता दूसरी जगह नहीं है।"<br></p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 24px;">नयी चुनौतियों पर काम ज़ारी है</span></b><br></p><p dir="ltr">पर्यटकों व शोधकर्ताओं के लिए अलग जोन बनाने, उनकी कड़ी चौकसी, और पक्षियों के रहने की मुख्य जगह पर तेज गति से चलने वाली कश्ती और मछली पकड़ने पर रोक के बावजूद, चुनौतियाँ बरकरार हैं। अभी भी शिकार की कुछ घटनाएं सामने आती हैं।</p><p dir="ltr">पर्यटकों की भीड़ पर्यावरण के लिए जोखिम है। हालांकि समिति इससे निपटने की योजना पर काम कर रही है। भुजबल की संस्था के सचिव भाग्यधर बेहरा के अनुसार, "हम मंगलाजोड़ी को दो खंडों में विभाजित करना चाह रहे हैं। एक भाग पर्यटकों के लिए रहे और दूसरा शोधकर्ताओं, छायाकारों और पक्षी प्रेमियों के लिए हो।"</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/24/445465-chilika-lake-orissa.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421zZJkbJgK58ofmO7ftlvlgn0ic84to7KF1492046" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1616571492152" title="लाख से अधिक प्रवासी पक्षी मंगलाजोडी में आते हैं (फोटो: तज़ीन)" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1616571492152"><p>लाख से अधिक प्रवासी पक्षी मंगलाजोडी में आते हैं (फोटो: तज़ीन)</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">जलवायु परिवर्तन की वजह से तट पारिस्थितिकी तंत्र पर भी खतरा महसूस किया जा रहा है।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">जय ने बताया, "एक दशक पहले यहां सितंबर में ही ज्यादातर पक्षी आ जाते थे। लेकिन अब नवंबर में आते हैं।" उन्हें यह चिंता थोड़ी कम है कि इससे उनके रोजगार पर क्या असर पड़ेगा? ज्यादा चिंतित वह इस बात को लेकर हैं कि यह उनके जीवन को कैसे प्रभावित करेगा, जिसे उन्होंने पक्षियों के लिए समर्पित कर दिया है।<br></p><p dir="ltr">शीबा आगे कहते हैं, "अगर हमने अवैध शिकार जारी रखा होता तो ऑस्ट्रेलियाई स्टिल्ट्स जैसे पक्षियों की दुर्लभ प्रजातियों को खो देते। हमारे बच्चे और पोते इन दुर्लभ किस्म के रंग बिरंगे प्रवासी पक्षियों की अठखेलियां देख न पाते जो मंगलाजोड़ी की पहचान है"।<br></p><p dir="ltr">जनभावनाओं की राज्य सरकार ने भी कद्र की। सामुदायिक प्रयास को मजबूती देते हुए ओडिशा पर्यटन विभाग ने 2018 में चिल्का पक्षी महोत्सव शुरू किया, जो कि अब पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।<br></p><p dir="ltr"><i>(यह लेख 101रिपोर्टर्स की ओर से सामुदायिक प्रयास से होने वाले सकारात्मक बदलाव की कड़ी का हिस्सा है। इस कड़ी में हम यह पता लगाएंगे कि कैसे समाज के लोग किस तरह से अपने स्थानीय संसाधनों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करते हुए अपने लिए रोजगार के अवसर पैदा कर रहे हैं और समाज में एक बड़ा बदलाव भी लेकर आ रहे हैं।)</i></p><p><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया <a href="mailto:respond@indiaspend.org">respond@indiaspend.org</a> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i></p></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/orissa/how-an-odisha-village-brought-back-migratory-birds-737515</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/orissa/how-an-odisha-village-brought-back-migratory-birds-737515</guid>
<category><![CDATA[Development,Orissa,नवीनतम रिपोर्ट,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[तज़ीन कुरैशी]]></dc:creator>
<pubDate>Wed, 24 Mar 2021 07:51:16 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/24/500x300_445462-migratory-birds-orissa.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बिहार स्वास्थ्य बजट: सिर्फ इमारतें बनाकर कैसे होंगी बीमारियां ठीक?]]></title>
<description><![CDATA[बिहार स्वास्थ्य बजट में इस बार रुपये 13,264 करोड़ खर्च करने का प्रस्ताव दिया गया है, इसमें से बड़ी राशि सिर्फ अस्पतालों के निर्माण पर खर्च हो रही है, उनमें से भी ज्यादातर अस्पताल पटना और आसपास के इलाके में बन रहे हैं।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>बिहार सरकार ने अपने वित्तीय <a href="https://state.bihar.gov.in/cache/12/Budget/Budget/Budget%20Highlights%202021-22%20Final%20Book.pdf"><u>बजट</u></a> 2021-2022 में स्वास्थ्य के लिए रुपये 13,264 करोड़ का प्रावधान किया है जिसमें से रुपये 6,900 करोड़ योजनाओं पर खर्च किए जाएंगे, जबकि रुपये 6,300 करोड़ स्वास्थ्य सम्बन्धी निर्माण कार्यों में उपयोग किए जाएंगे।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">इस बजट को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि बिहार में स्वास्थ्य की मौजूदा स्थिति में ये प्रस्तावित राशि काफी कम है। इसके साथ ही इस बजट में ऐसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को भी अनदेखा किया गया है, जिन्हें इस राशि की ज्यादा जरूरत है। इन क्षेत्रों में चिकित्सकों की भर्ती, दवाओं की आपूर्ति और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करना आदि आते है।</p><p dir="ltr">22 फरवरी, 2021 को पेश किए गए बजट में इस बार रुपये 13,264 करोड़ खर्च करने का प्रस्ताव दिया गया है, जिसे पिछले साल के मुकाबले 21.28% अधिक बताया जा रहा है। मगर जब हम इस बजट प्रस्ताव के प्रावधानों पर गौर करते हैं तो पता चलता है कि इनमें बड़ी राशि अस्पतालों के निर्माण पर खर्च हो रही है, उनमें से भी ज्यादातर अस्पताल पटना और आसपास के इलाके में बन रहे हैं।</p><p dir="ltr"><b>स्वास्थ्य सुविधाओं का 'पटना'-करण!</b><br></p><p dir="ltr">इस बजट में सबसे अधिक राशि पटना मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल (पीएमसीएच) को विश्वस्तरीय अस्पताल बनाने के लिए खर्च होने वाली है। इसके लिए कुल रुपये 5540.07 करोड़ की राशि आवंटित की गयी है। जो इस साल के कुल स्वास्थ्य बजट की 42% है। इसके अलावा पटना के ही एक अन्य अस्पताल एलएनजेपी अस्पताल को 400 बेड वाले अति विशिष्ट अस्पताल बनाने के लिए रुपये 215 करोड़ खर्च होंगे। पटना के ही नवाब मंजिल में 50 बेड के अस्पताल के निर्माण के लिए रुपये 9 करोड़ और आईजीआईएमएस में उपकरणों को खरीदने के लिए रुपये 74.56 करोड़ खर्च होंगे।</p><p dir="ltr">इस तरह हम देखते हैं कि भले बिहार सरकार ने इस साल अपना स्वास्थ्य बजट 21.28% बढ़ा लिया है, उसका लगभग 45% हिस्सा राजधानी पटना में ही खर्च करने की योजना है। वह भी सिर्फ निर्माण संबंधी गतिविधियों में।</p><p dir="ltr">इसके अलावा नौ जिलों में मॉडल अस्पताल के निर्माण पर रुपये 172.95 करोड़ खर्च होने की बात कही गयी है और 10 जिलों में नए मेडिकल कॉलेज खोलने की स्वीकृति दी गयी है, मगर इसका बजट में स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।</p><p dir="ltr">ये सूचनाएं दो बातों की तरफ इशारा करती हैं। पहला यह कि स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के लिए बिहार सरकार का सारा जोर अधोसंरचना विकास पर केंद्रित है। दूसरा यह कि इन अधोसंरचनाओं का विकास भी अमूमन राजधानी पटना में ही हो रहा है।</p><p dir="ltr">इस बात को दूसरे तरीके से ऐसे भी समझ सकते हैं कि स्वास्थ्य बजट में से वेतन और अन्य आवश्यक खर्च को घटा दिया जाय तो योजनाओं को लागू करने के लिए सरकार ने रुपये 6,927 करोड़ की ही राशि आवंटित की है। इनमें से लगभग रुपये 6 हजार करोड़ सिर्फ भवन और अधोसंरचनाओं के निर्माण पर खर्च होंगे। इलाज और दवाओं के मद में और मैन पावर बढ़ाने के काम के लिए सिर्फ रुपये 927 करोड़ बचते हैं। दुखद तथ्य यह भी है कि अधोसंरचना विकास के नाम पर खर्च होने वाली राशि का भी 97% धन राजधानी पटना में खर्च होगा।</p><p dir="ltr"><a href="http://biharvha.org/BVHA/"><u>बिहार वोलंटरी हेल्थ एसोसिएशन </u></a>के कार्यकारी निदेशक स्वपन मजूमदार कहते हैं, "अगर लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है तो निश्चित तौर पर इन सुविधाओं का विकास जिलों और प्रखंडों तक होना चाहिए। अभी तो सब कुछ पटना में ही है। लोग छोटी-छोटी बीमारियों के लिए पटना दौड़े चले आते हैं और यहां नम्बर लगाने के लिये परेशान रहते हैं।"</p><p dir="ltr">ऐसा नहीं है कि बिहार को स्वास्थ्य सुविधाओं के इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास की जरूरत नहीं है। मगर वह विकास ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और स्वास्थ्य उपकेंद्रों का किया जाना है। जबकि सरकार का अभी सारा जोर टर्सरी सेंटरों के विकास पर है। इन सेंटरों के विकास का मतलब है कि बिहार के दूरदराज के लोगों को छोटी-छोटी बीमारियों के इलाज के लिए पटना आने और परेशान होने की जरूरत बनी रहेगी, <a href="http://phmindia.org/"><u>जन स्वास्थ्य अभियान </u></a>के संचालक और पटना के जाने माने चिकित्सक डॉ शकील का ऐसा कहना है। </p><p dir="ltr">मगर साथ ही वे कहते हैं, "सिर्फ बिल्डिंग बनाने से भी कुछ नहीं होता। इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी एक साल से बनकर तैयार है, मगर उसे अभी तक स्वास्थ्य विभाग को हैंडओवर नहीं किया गया है। मैनपावर की कमी अभी भी वैसी ही है, सरकार जो थोड़ी बहुत कोशिश करती है वह ऊंट के मुंह में जीरा साबित होता है। आजकल सरकार भर्तियां भी ठेके पर करना चाहती है और डॉक्टर कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरी करना नहीं चाहते।"</p><p dir="ltr"><b>चिकित्सकों की कमी बिहार की बड़ी बीमारी</b></p><p dir="ltr">2019 में जब उत्तर बिहार के जिलों में चमकी बुखार का प्रकोप फैला था और <a href="https://www.bbc.com/hindi/india-52092551#:~:text=%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A4%BE%20%E0%A4%95%E0%A5%87%20%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A3%20%E0%A4%8F%E0%A4%88%E0%A4%8F%E0%A4%B8%20%E0%A4%95%E0%A5%80,%E0%A4%AC%E0%A4%9A%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A5%8B%E0%A4%82%20%E0%A4%95%E0%A5%80%20%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%A4%20%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%88%20%E0%A4%A5%E0%A5%80."><u>185 से अधिक बच्चों </u></a>की मौत हो गयी थी। तब एक जनहित याचिका के <a href="https://www.ndtv.com/india-news/bihar-encephalitis-crisis-only-43-doctors-29-nurses-in-hospitals-bihar-tells-supreme-court-2062998"><u>जवाब </u></a>में बिहार सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया था कि उनके राज्य में चिकित्सकों के 57% पद खाली हैं। नर्सों और स्वास्थ्य कर्मियों के भी <a href="https://www.ndtv.com/india-news/bihar-encephalitis-crisis-only-43-doctors-29-nurses-in-hospitals-bihar-tells-supreme-court-2062998"><u>तीन चौथाई पद </u></a>खाली हैं। </p><p dir="ltr">2020 में जब पूरी दुनिया के साथ बिहार भी कोराना महामारी की चपेट में आ गया तो 16 मई, 2020 को एक शपथ पत्र में बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने पटना उच्च न्यायालय को सूचित किया कि राज्य में चिकित्सकों के कुल 11645 स्वीकृत पदों में से 8768 पद खाली पड़े हैं।बिहार सरकार द्वारा पटना उच्च न्यायालय में चिकित्सकों के कुल पदों के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया गया शपथ पत्र ।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/16/440000-high-court-affidavait.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421GvGU3MT2XMYeLEbEkAFs27OcJtqLvuYx6967602" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1615896967262" title="बिहार सरकार द्वारा पटना उच्च न्यायालय में चिकित्सकों के कुल पदों के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया गया शपथ पत्र ।" alt=" बिहार सरकार द्वारा पटना उच्च न्यायालय में चिकित्सकों के कुल पदों के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया गया शपथ पत्र ।" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1615896967262"><p>बिहार सरकार द्वारा पटना उच्च न्यायालय में चिकित्सकों के कुल पदों के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया गया शपथ पत्र ।</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">इन 8,768 खाली पड़े पदों में से 5,600 पद ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। इस दौरान न्यायालय ने <a href="https://theprint.in/judiciary/hc-pulls-up-bihar-govt-for-neglecting-rural-areas-orders-filling-up-of-doctor-vacancies/431841/"><u>कहा </u></a>कि, "शहरी क्षेत्रों में चिकित्सकों की उपस्थिति के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।"<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">पिछले दो वर्षों में देश की सर्वोच्च न्यायालय और बिहार की सबसे बड़ी अदालत के सामने बिहार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा पेश किये गये ये तथ्य यह समझने के लिए पर्याप्त हैं कि बिहार में स्वास्थ्य सुविधाएं दरअसल किस बीमारी की चपेट में है। वह बीमारी मैनपावर की घनघोर कमी है। मगर वर्ष 2021-22 के लिए जब बिहार सरकार ने <a href="https://state.bihar.gov.in/cache/12/Budget/Budget/Budget%20Highlights%202021-22%20Final%20Book.pdf"><u>बजट </u></a>पेश किया तो स्वास्थ्य विभाग का सारा जोर अधोसंरचना विकास पर था, मैनपावर बढ़ाने का जिक्र उस बजट में हाशिये पर ही नजर आया।<br></p><p dir="ltr">बजट में मैनपावर बढ़ाने के नाम पर 1539 फार्मासिस्टों, 163 ईसीजी टेक्नीशियन और 1096 ओटी सहायक की नियुक्ति की बात जरूर कही गयी है। मगर डॉक्टरों और नर्सों के खाली पड़े पदों को भरने के बारे में कोई बात नहीं की गयी है।<br></p><p dir="ltr">जबकि बजट पेश होने से महज तीन दिन पहले बिहार सरकार द्वारा जारी किये गये <a href="https://drive.google.com/file/d/1jv59R2MUpZa5PkfU1q7SD0_E4fTjHZSD/view?usp=sharing"><u>आर्थिक सर्वेक्षण</u></a>, 2020-21 में इस बात का साफ उल्लेख है कि राज्य में चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों का भारी बोझ है। राज्य में कुल <a href="https://state.bihar.gov.in/health/Content.html?links&amp;page=facts_infrastructure"><u>11,875 सरकारी अस्पताल </u></a>हैं, इनमें से 9949 पंचायत स्तरीय स्वास्थ्य उपकेंद्र हैं, जिनका जिम्मा नर्सों पर होता है। शेष 2026 अस्पतालों की बात की जाये, तो इनमें से ज्यादातर एक डॉक्टर और एक या दो नर्सों के भरोसे संचालित होते हैं। इसी सर्वेक्षण के आंकड़ों पर गौर कर दिया जाए तो राज्य के हर अस्पताल में औसतन 308 ओपीडी मरीज पहुंचते और 55 भर्ती होते हैं।<br></p><p dir="ltr">इन आंकड़ों से समझा जा सकता है कि राज्य में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों पर काम का कितना बोझ है। बिहार वोलंटरी हेल्थ एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक स्वपन मजूमदार कहते है कि एक चिकित्सक एक दिन में 7 से 10 मरीजों की ही चिकित्सा कर सकता है। पर बिहार में एक डॉक्टर के जिम्मे रोजाना औसतन 350 मरीजों का जिम्मा होता है। यानी वे सामान्य से 50 गुना अधिक दबाव में काम करते हैं। इन सबका असर मरीजों के इलाज की गुणवत्ता पर पड़ता है।<br></p><p dir="ltr">इस व्यवस्था का जीता-जागता उदाहरण मधेपुरा जिले में 2020 में शुरू हुआ मेडिकल कॉलेज है। 800 करोड़ की लागत से तैयार हुए इस मेडिकल कॉलेज अस्पताल में फिलहाल सारा काम <a href="https://zeenews.india.com/hindi/india/bihar-jharkhand/800-crore-worth-karpoori-medical-college-and-hospital-running-on-9-doctors-and-jugad-technology-in-madhepura/844097"><u>नौ जूनियर डॉक्टरों </u></a>के भरोसे चल रहा है। ऐसे में अत्याधुनिक अस्पताल और बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्चर के बावजूद यह अस्पताल स्थानीय मरीजों के लिए किसी काम का नहीं है। लोग अभी भी वहां इलाज कराने के बदले निजी चिकित्सकों के पास जाते हैं या पटना की तरफ आते हैं।<br></p><p dir="ltr">इसलिए यह बहुत साफ है कि अगर राज्य की स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाना है तो सरकार को अपना फोकस मैनपावर को बढ़ाने और सक्षम बनाने पर देना होगा। मगर बजट के आंकड़े साफ-साफ कह रहे हैं कि राज्य का फोकस अधोसंरचना के विकास पर है।<br></p><p dir="ltr">बिहार वोलंटरी हेल्थ एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक स्वपन मजूमदार डॉक्टरों पर बोझ की बात भी कहते हैं। वे कहते हैं, "नियमानुसार डॉक्टर को एक पेशेंट को छह से आठ मिनट का समय देना चाहिये। मगर कई जगह तो पेशेंट को छूकर देखने की भी फुरसत डॉक्टरों को नहीं होती।"<br></p><p dir="ltr">स्वपन मजूमदार कहते हैं, "हर 30 हजार की आबादी पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और वहां चार डॉक्टरों के होने का नियम है। मगर आप राजधानी पटना से सटे किसी पीएचसी में भी चले जाइये आपको वहां का हाल बुरा मिलेगा।"<br></p><p dir="ltr">डॉ शकील दवाओं पर होने वाले पुष्यमित्रकम खर्च की तरफ भी इशारा करते हैं, वे कहते हैं, "हम लोगों ने तीन साल पहले सर्वे किया था। उस वक्त सरकार प्रति व्यक्ति सिर्फ रुपये 14 दवाओं पर खर्च कर रही थी। इससे तो बात बनेगी नहीं। बिहार की स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति यह है कि अभी सिर्फ 18% लोग ही सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने जाते हैं। नीति आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में बिहार सरकार की बदहाल स्वास्थ्य सुविधाओं को उजागर किया है। इसके बावजूद सरकार का फोकस सही नहीं है। यह बजट सिर्फ आंकड़ों की जादूगरी है। इससे लगता नहीं है कि बिहार में कुछ बदलेगा।"</p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i><br></p><div><br></div></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/bihar/bihar-health-budget-how-only-buildings-treat-patients-735832</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/bihar/bihar-health-budget-how-only-buildings-treat-patients-735832</guid>
<category><![CDATA[Bihar,कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,सेहत,सेहतकीपड़ताल,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[पुष्यमित्र]]></dc:creator>
<pubDate>Tue, 16 Mar 2021 12:17:04 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/16/500x300_439998--.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दुनिया भर में सांप काटने से सबसे ज़्यादा मौत भारत में, ये हाल तब है जब सारे मामले दर्ज नहीं होते]]></title>
<description><![CDATA[सार्वजनिक आंकड़ों में कमी को लेकर हमारी रिपोर्टिंग की सिरीज़ में हमने भारत में सांप काटने से होने वाली मौत के आंकड़ों का आकलन किया- क्यों कम मामले दर्ज होते हैं, कैसे दर्ज मामलों की संख्या बढ़ाकर मौत और विकलांगता की रोकथाम हो सकती है, पढ़िए ये रिपोर्ट।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>नई दिल्ली:</b> दुनिया भर में <a href="https://journals.plos.org/plosmedicine/article?id=10.1371/journal.pmed.0050218"><u>सबसे ज़्यादा सांप काटने </u></a>और उससे होने वाली मौत भारत में होती है। सांप के काटने से मौत हो सकती है या फिर विकलांगता हो सकती है। हालांकि सांप के काटने और उससे होने वाली मौतों को लेकर सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध आंकड़ों में स्पष्टता नहीं है, अलग-अलग आंकड़ें हमें इस बारे में अलग अलग जानकारी देते हैं, जिनमें काफ़ी अंतर भी है।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">सांप काटने की चपेट में सबसे ज़्यादा आने वाले लोगों का सामाजिक वर्गीकरण भी है- सबसे ज़्यादा पीड़ित ग्रामीण, वन्य और खेतिहर इलाक़ों में होते हैं क्योंकि इन्हीं जगहों पर सांप खुले में पाए जाते हैं।</p><p dir="ltr">"इससे संबंधित आंकड़े किसी एक जगह नहीं दर्ज होते हैं। यह सरकार के पास होता है, पुलिस के पास होता है और अस्पतालों से दर्ज किया जाता है। इसके चलते सांप काटने के अलग-अलग आंकड़े उपलब्ध हैं।" ये कहना है <a href="https://www.georgeinstitute.org/people/deepti-beri"><u>द जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ</u></a>, ऑस्ट्रेलिया के भारतीय ऑफ़िस की रिसर्चर दीप्ति बेरी का। बेरी भारत में सांप काटने के आंकड़ों का अध्ययन कर रही हैं और उन्होंने आंकड़े एकत्रित करने की प्रक्रिया में काफ़ी अंतर पाया है और इसके चलते ही अलग-अलग आंकड़े उपलब्ध हैं।</p><p dir="ltr">उदाहरण के लिए, सरकार की दो एजेंसियां सांप काटने से संबंधित आंकड़े मुहैया कराती हैं- द नेशनल हेल्थ प्रोफ़ाइल (एनएचपी) और द नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी)। कम से कम पिछले तीन सालों (2018, 2017, 2016) में एनएचपी ने एनसीआरबी की तुलना में सांप काटने के 18 से 22 गुना ज़्यादा मामले दर्ज किए हैं।</p><p dir="ltr">वहीं दूसरी ओर सांप काटने से होने वाली मौतों के मामले में एनएचपी ने एनसीआरबी की तुलना में महज 10 % से 13 % मामले दर्ज किए हैं। </p><p dir="ltr">इसके अलावा  एनसीआरबी के आंकड़ों में सांप काटने और उससे होने वाली मौतों की संख्या लगभग एक समान है। अगर इसे दूसरे शब्दों में कहें तो एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक बीते तीन सालों में जिन लोगों को भी सांप ने काटा उन सबकी मौत हो गई।</p><p dir="ltr">लेकिन एनएचपी के आंकड़ों के मुताबिक सांप काटने के कुल मामलों में महज 0.5% से 0.7% मामलों में मौत होती है।</p><p dir="ltr">एनसीआरबी के आंकड़ों में सांप काटने की घटनाओं और उससे होने वाली मौतों की संख्या एक समान होने की एक संभावित वजह आंकड़ों को एकत्रित करने का तरीका हो सकता है। पुलिस आंकड़े तभी जमा करती है, जब कोई पुलिस मामला दर्ज होता है और मौत की वजह जानने के लिए पुलिस जांच करती है, केवल अस्पताल ले जाने पर पुलिस मामला दर्ज करे, यह ज़रूरी नहीं होता- ऐसा जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ के मेडिकल डॉक्टर और हेल्थ पॉलिसी रिसर्चर <a href="https://www.georgeinstitute.org/people/soumyadeep-bhaumik"><u>सौम्यदीप भौमिक </u></a>का मानना है। </p><p dir="ltr">"ये मुद्दे सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में और जानकारी हासिल करने के लिए हमारे शोध से जुड़े सवाल हैं। हम किस तरह से आंकड़े एकत्रित  करते हैं, यह अहम होता है।" ऐसा कहना है सांप काटने पर डॉक्टरेल रिसर्च कर रहे भौमिक का।</p><p dir="ltr">उन्होंने कहा, "उदाहरण के लिए अगर हम आंकड़े संग्रह करने की विधि में सांप काटने के बाद अस्पताल जाने वालों का रिकॉर्ड रखें तो भी ग्रामीण और आदिवासी समुदाय के लोगों को शामिल नहीं कर पाएंगे, क्योंकि ये लोग अस्पताल नहीं जाते हैं। इसकी वजह यह है कि इनके नज़दीक में कोई अस्पताल नहीं होता। इसकी जगह वे झाड़ फूंक करने वालों के पास जाते हैं।"</p><p dir="ltr">सांप काटने से होने वाली मौत की तुलना कहीं ज़्यादा विस्तार और बड़े पैमाने पर फैली हाइपरटेंशन जैसी बीमारियों से होने वाली मौतों से नहीं हो सकती, भौमिक समझाते हैं। सांप काटने की घटनाएं उन इलाक़ों और वातावरण में होती है, जहां सांप पाए जाते हैं। ऐसी घटनाएं एक दूसरे के दायरे में अतिक्रमण, पर्यावरणीय और पेशेगत वजहों से होती है। आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया में इन अंतरों को भी शामिल करने की ज़रूरत है।</p><p dir="ltr">भौमिक ने कहा कि सांप काटने से प्रभावित लोगों का राज़नीतिक दबदबा कम है लिहाजा इस मुद्दे के समाधान की कोशिशें भी कम हैं।</p><p dir="ltr">अगर आंकड़े बेहतर और स्थानीयता के आधार पर होंगे तो इससे किस तरह के प्रावधानों की ज़रूरत है इसका पता लगाने में सरकारी अधिकारियों और रिसर्चरों को मदद मिलेगी, इस बात पर ज़ोर देते हुए दीप्ति बेरी ने कहा। "उदाहरण के लिए मान लीजिए कि किसी ख़ास इलाक़े में सांप काटने से ज़्यादा लोगों की मौत होती है और इस इलाक़े में ज़्यादातर लोग खेती करते हैं, तो खेतों में काम करने वाले लोगों को रबड़ के जूते देकर सांप काटने के ख़तरे को कम किया जा सकता है। "</p><p dir="ltr">"सांप काटने से होने वाली मौतें ही चिंता की बात नहीं है, बल्कि सांप काटने से बड़ी संख्या में लोग विकलांग हो जाते हैं, मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं से घिर जाते हैं और इन लोगों को सामाजिक लांछन का सामना भी करना होता है। अगर सांप काटने से जुड़े बेहतर आंकड़े और रिसर्च उपलब्ध होंगे तो इस समस्या से उबरने में मदद मिलेगी," ऐसा भौमिक का कहना है।</p><p dir="ltr"><b>भारत में सांप काटने से होनी वाली मौतें </b></p><p dir="ltr">द <a href="http://www.cghr.org/projects/million-death-study-project/"><u>मिलियन डेथ्स स्टडी </u></a>(एमडीएस) के तहत स्पष्ट जानकारी देने के उद्देश्य से भारत में सांप काटने की घटनाओं पर रिसर्चरों ने 2011 में एक <a href="https://journals.plos.org/plosntds/article?id=10.1371/journal.pntd.0001018"><u>शोध पत्र </u></a>प्रकाशित किया।</p><p dir="ltr">द एमडीएस प्रोजेक्ट के तहत भारत में मौत की विभिन्न वजहों का आकलन किया गया, जिसमें प्रसव के बाद मां और नवजात शिशु का स्वास्थ्य, कैंसर, मलेरिया, शराब, दुर्घटनाएं और आत्महत्या जैसी वजहें शामिल थीं। भारत के रजिस्टार जनरल की साझेदारी में हुए इस अध्ययन में 24 लाख परिवारों के करीब 1.4 करोड़ लोगों को शामिल किया गया। रिसर्चरों ने इसमें इन परिवारों में हुई प्रत्येक मौत का अध्ययन किया था।</p><p dir="ltr">द एमडीएस के हिस्से के रूप में सांप काटने से होने वाली मौतों पर एक महत्वपूर्ण पत्र 2011 में प्रकाशित हुआ। जिसका नाम था- 'भारत में सांप काटने से मृत्युदर: राष्ट्रीय प्रतिनिधि युक्त सर्वेक्षण'। इस सर्वेक्षण के चार लेखकों ने सर्वेक्षण को जारी रखते हुए <a href="https://elifesciences.org/articles/54076"><u>2020 </u></a>में एक अन्य अध्ययन प्रकाशित किया- 'राष्ट्रीय प्रतिनिधि वाले मृत्यु दर अध्ययन में 2000 से 2019 तक सांप काटने से हुई मौतों का रूझान'।</p><p dir="ltr">2011 के शोध पत्र के अनुमान के मुताबिक 2005 में भारत में 46,000 लोगों की मौत सांप काटने से हुई थी। 2020 के शोध पत्र के अनुमान के मुताबिक भारत में सालाना 58,000 लोगों की मौत सांप काटने से होती है ( 2000 से 2019 के बीच सांप काटने से 12 लाख लोगों की मौत)।</p><p dir="ltr">विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 2019 में <a href="https://www.who.int/news-room/fact-sheets/detail/snakebite-envenoming"><u>स्वीकार</u></a> किया कि 2011 के अध्ययन में सांप काटने से भारत में हुई मौतों का अनुमान उसी दौरान के भारत सरकार के आंकड़ों से 30 गुना ज़्यादा थे।</p><p dir="ltr">विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2019 में <a href="https://www.who.int/news-room/fact-sheets/detail/snakebite-envenoming"><u>कहा </u></a>कि दुनिया भर में सांप काटने से सालाना 81,000 -1,38,000 लोगों की मौत होती है। इस हिसाब से 2020 के अध्ययन को देखें तो दुनिया भर में सांप काटने से होने वाली मौतों का बड़ा हिस्सा भारत में होने वाली मौतों का है।  </p><p dir="ltr">दोनों शोध पत्रों के लेखक दल में शामिल रहे प्रभात झा भारत में सांप काटने से होने वाली मौत में 2011 से 2020 के बीच सालाना बढ़ोत्तरी की वजह जनसंख्या वृद्धि को मानते हैं. "जनसंख्या वृद्धि के चलते सांपों के काटने से मरने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है। कम उम्र में मौत के मामले कम हुए हैं, मध्य आयुवर्ग में भी ये मामले कम हुए हैं लेकिन लोग बढ़ गए हैं इसलिए सांप काटने से मरने वाले लोगों की संख्या बढ़ गई है।" <a href="https://www.dlsph.utoronto.ca/faculty-profile/jha-prabhat/"><u>टोरैंटो यूनिवर्सिटी में महामारी रोग विशेषज्ञ </u></a>झा ने कहा।</p><p dir="ltr"><b>सांप काटने के मामले कम क्यों दर्ज होते हैं</b></p><p dir="ltr">भारत में सांप काटने के मामलों के कम दर्ज होने का असर दुनिया भर के आंकड़ों पर पड़ सकता है, इस बारे में <a href="https://journals.plos.org/plosntds/article?id=10.1371/journal.pntd.0001018"><u>2011 के शोध पत्र </u></a>में रिसर्चरों ने लिखा है, "दुनिया भर के सांप काटने के मामलों का बड़ा हिस्सा भारत से आता है, लिहाजा दुनिया भर के कुल मामले की संख्या भी कमतर रिपोर्ट हो रही है।"</p><p dir="ltr">रिसर्चरों के मुताबिक सांप काटने के मामले और मौतों की संख्या कम दर्ज होने की मुख्य वजह यही है कि उन्हीं लोगों के मामले को दर्ज किया जाता है जो अस्पताल तक पहुंच पाते हैं, जबकि बहुत लोगों की मौत घरों में हो जाती है और स्वास्थ्य केंद्रों पर इसकी रिपोर्ट नहीं होती है।</p><p dir="ltr">द एमडीएस <a href="https://journals.plos.org/plosntds/article?id=10.1371/journal.pntd.0001018"><u>सर्वे </u></a>के मुताबिक सांप काटने से होनी वाली मौतों में केवल 23% मामले अस्पताल में होते हैं। इसका मतलब यह है कि अस्पतालों के आंकड़े अपने आप में अधूरे  हैं, हालांकि अभी भी भारत में सांप काटने के आंकड़ों का मुख्य स्रोत यही हैं।</p><p dir="ltr">रिसर्चरों के <a href="https://elifesciences.org/articles/54076"><u>मुताबिक </u></a>सांप काटने से होने वाली मौतों पर अगर सामुदायिक निगरानी रखी जाए तो उन अंतरों को भरा जा सकता है जो केवल अस्पतालों के आंकड़ों के चलते बना है। सामुदायिक निगरानी से घरों में सांप काटने से होने वाली मौतों को भी दर्ज किया जा सकता है।</p><p dir="ltr">इसके अलावा, निजी अस्पतालों में भी सांप काटने से लोगों की मौत होती होगी, <a href="https://elifesciences.org/articles/54076"><u>2020 के शोध </u></a>अध्ययन के मुताबिक यह सरकारी आंकड़ों में शामिल नहीं हो पाते हैं क्योंकि आंकड़े केवल सरकारी अस्पतालों से एकत्रित किए जाते हैं। इस अध्ययन के मुताबिक 13 साल के दौरान निजी एवं सरकारी अस्पतालों में 1,54,000 लोगों की सांप काटने से मौत हुई, जबकि इसी दौरान सरकारी आंकड़ों में केवल 15,500 लोगों की मौत की बात दर्ज हुई। इसका मतलब यह है कि, "आंकड़े एकत्रित करने की मौजूदा व्यवस्था अस्पतालों में होने वाली मौतों का केवल 10% हिस्सा ही दर्ज कर पाती है।"</p><p dir="ltr"><b>अंतर को कैसे भरा जा सकता है</b></p><p dir="ltr">2020 के अध्ययन में शामिल रिसर्चरों ने सिफारिश की थी कि भारत सरकार को सांप काटने को उन बीमारियों की सूची में शामिल कर देना चाहिए जिसमें चिकित्सकों को प्रत्येक मामले की जानकारी सरकार को देनी होती है। ये आकंड़े भारत के <a href="https://idsp.nic.in/"><u>एकीकृत बीमारी निगरानी कार्यक्रम </u></a>की ओर से अपडेट किए जाते हैं।</p><p dir="ltr">विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2017 में सांप काटने के चलते होने वाले बीमारी को उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारियों की अपनी सूची में पहली श्रेणी में <a href="https://www.who.int/snakebites/disease/en/"><u>सूचीबद्ध </u></a>किया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2019 में <a href="https://apps.who.int/iris/bitstream/handle/10665/312195/WHO-CDS-NTD-NZD-2019.03-eng.pdf?ua=1/"><u>प्रस्ताव </u></a>रखा कि सांप काटने से होने वाली मौत और विकलांगता के मामलों में 2030 तक 50% की कमी लाने के लिए सभी देशों को मिलकर काम करना चाहिए। </p><p dir="ltr">सांप काटने से दुनिया भर में होने वाली मौतों में सबसे ज़्यादा मौत भारत में होती है। इस वजह से भारत में सांप काटने और विकलांगता का बेहतर अनुमान देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में इसे कम करने के  लिहाज से अहम होगा।</p><p dir="ltr">(यह खबर <a href="https://www.indiaspend.com/"><u>इंडियास्पेंड </u></a>में प्रकाशित की गई <a href="https://www.indiaspend.com/data-gaps/indias-snakebite-deaths-under-counted-yet-most-in-the-world-725983"><u>खबर </u></a>का हिंदी अनुवाद है।)</p><p dir="ltr">हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</p><div><br></div></div><p><br></p>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/top-stories/indias-snakebite-deaths-under-counted-yet-most-in-the-world-734536</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/top-stories/indias-snakebite-deaths-under-counted-yet-most-in-the-world-734536</guid>
<category><![CDATA[कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[अनू भूयन]]></dc:creator>
<pubDate>Wed, 10 Mar 2021 13:58:23 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/10/500x300_436293-snake-bites-data-gap1600.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA['सरकार कहती है सबका साथ सबका विकास, मगर ये असल में नहीं हो पा रहा है']]></title>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>नई दिल्ली:</b> सरकारी आंकड़ों के अनुसार महिलाओं के खिलाफ हिंसा के आंकड़े लगातार बढ़ते जा रहे हैं, बाल-विवाह और दहेज प्रथा जैसी कुरीतियां आज भी बरकरार हैं। आँकड़ों के अनुसार महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले जुर्म देश भर में हो रहे कुल जुर्म का 10% हिस्सा हैं। हिंसा के बाद 40% से भी कम महिलाएं इंसाफ़ पाने की कोशिश करती हैं, इसकी वजह से कई महिलाएं पढ़ नहीं पाती हैं और इनकी उम्र से पहले शादी कर दी जाती है। शादी के बाद पती द्वारा हिंसा के आंकड़े भी लॉकडाउन के दौरान बढ़ गए हैं।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">महिलाओं के पास परिवार नियोजन के सही तरीक़े उपलब्ध नहीं है, जबकि इसकी पूरी ज़िम्मेदारी उन पर है। ऐसा ही कई मुद्दों पर हमने बात की पूनम मुटरेजा से, जो पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी निदेशक हैं। इसके पहले पून भारत में<a href="https://www.macfound.org/about/"><u> मैक आर्थर फ़ाउंडेशन</u></a> की राष्ट्रीय डिरेक्टर थी। ये पिछले 35 वर्षों से महिला अधिकार से जुड़े मुद्दों पर काम कर रहीं हैं और कई एनजीओ के बोर्ड की सदस्य रह चुकी हैं। ये <a href="https://dastkar.org/"><u>दस्तकार</u></a>, <a href="https://www.wishfoundationindia.org/"><u>विश फ़ाउंडेशन</u></a> और <a href="https://www.ashoka.org/en-in"><u>अशोका फ़ाउंडेशन</u></a>, नाम के संस्थानो की सह संस्थापक हैं और <a href="https://www.harvard.edu/"><u>हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय के जॉन एफ केनेडी स्कूल ओफ़ गवर्न्मेंट </u></a>से पढ़ी हुई हैं। </p><p dir="ltr">हमने इस इंटरव्यू में पूनम से कुछ अहम मुद्दों पर बात की जैसे किशोरियों के साथ हो रही हिंसा का उनके जीवन पर कितना दुष्प्रभाव पड़ता है, इंटरनेट की दुनिया में महिलाएं क्यों हिंसा का शिकार बन रही हैं, परिवार नियोजन में पुरुषों की ज़िम्मेदारी क्यों ज़रूरी है और प्रजनन इंसाफ़ क्या है। </p><p dir="ltr">पूनम का कहना है की साल 2021 के महिला दिवस पर, जो की हर साल 8 मार्च को मनाया जाता है, अगर किसी एक मुद्दे पर ध्यान देना बेहद ज़रूरी है, वो है साइबर सेक्शुअल अब्यूज यानी महिलाओं के ख़िलाफ़ इंटरनेट पर हो रही यौन हिंसा और दुर्व्यवहार।</p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><iframe src="https://www.facebook.com/plugins/video.php?href=https%3A%2F%2Fwww.facebook.com%2FIndiaSpendHindi%2Fvideos%2F147398507163954%2F&amp;show_text=0&amp;width=560" width="560" height="315" style="border:none;overflow:hidden" scrolling="no" frameborder="0" allowfullscreen="true" allow="autoplay; clipboard-write; encrypted-media; picture-in-picture; web-share"></iframe></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b>आँकड़ों के अनुसार महिलाओं के खिलाफ हिंसा बढ़ती जा रही है। स्कूलों में होने वाली हिंसा, संस्थागत हिंसा, घर के अंदर होने वाली हिंसा और अपने पति या पार्टनर द्वारा होने वाली हिंसा बढ़ती जा रहा है। तो घर के भीतर और बाहर ये हिंसा किस स्तर पर हो रही है और ये महिलाओं और किशोरियों के लिए कितनी बड़ी समस्या है?</b><br></p><p dir="ltr">कोविड महामारी के बाद से महिलाओं के लिए सबसे बड़ी समस्या है घर में और घर के बाहर होने वाली हिंसा इसमें यौन हिंसा और अन्य सभी तरह की हिंसा शामिल है। इसके बढ़ने के कुछ मुख्य कारण हैं। पहला, ऐसे बहुत से रेप के मामले मीडिया के ज़रिए सामने आए हैं, खासकर कुछ प्रांतों से, जहां सरकार आरोपियों का संरक्षण कर रही है। ये बहुत बढ़ावा देता है कि आप संरक्षण के साथ लड़कियों और महिलाओं को कुछ भी कर दें और आप के खिलाफ कोई कड़े क़दम नहीं उठाए जाएँगे। इससे जो संदेश पुरुषों को मिल रहा है ये बहुत ग़लत है और ये इस हिंसा को और बढ़ावा देगा, और आने वाले समय में हिंसा और बढ़ सकती है, मुझे ये चिंता है।<br></p><p dir="ltr">दूसरा, जब लड़कियां स्कूल जाती हैं, गाँवों में ही नहीं शहरों में भी, हमें मालूम है कि रास्ते में उन्हें लड़के छेड़ रहे होते हैं। लोग अपनी बेटियों को स्कूल भेजने से डरते हैं। बाल विवाह के आंकड़ों में भारत में कुछ सुधार आया है, पहले के मुकाबले, पर ये सुधार बहुत कम है। अभी भी क्यों लगभग एक चौथाई लड़कियों की शादी कम उम्र में कर दी जाती है? इसलिए क्योंकि अभिभावकों को भी मालूम है की उनकी बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं।<br></p><p dir="ltr">सरकार का बहुत अच्छा नारा था, 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ', ये उल्टा हो रहा है। इसलिए सरकार को पुनर्विचार करना होगा की हमें क्या करना है, कैसे हमारी लड़कियों को सुरक्षित रखना है।<br></p><p dir="ltr">जहाँ तक सजा की बात है, मैं फांसी के ख़िलाफ़ हूँ, लोगों को लगता है की फाँसी की माँग करने से ये सब ख़त्म हो जाएगा, लेकिन ये सुनिश्चित करना ज़रूरी है की इंसाफ मिलेगा और जल्दी मिलेगा। असली इंसाफ का मतलब है हिंसा की रोकथाम करना। हम हिंसा से बचाव के लिए रोकथाम पर ध्यान नहीं दे रहे हैं।<br></p><p dir="ltr">स्कूलों में भी शिक्षकों द्वारा दुर्व्यवहार के कितने मामले सामने आते हैं। लड़कियों के साथ यौन हिंसा का सबसे बड़ा कारण हैं उनके पिता और घर के अन्य पुरुष, इसके बाद दूसरा सबसे बड़ा कारण हैं अध्यापक, हम इसके लिए क्या कर रहे हैं?<br></p><p dir="ltr">हाल ही में किसी जज ने भी कहा है कि घर में अगर किसी लड़की के साथ बलात्कार या यौन हिंसा की जाती है तो उसकी शादी करवा दी जाए। ये सब हमारे देश की लड़कियों के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा को सिर्फ़ बढ़ावा देगा, उसे कम नहीं करेगा। हमें इस पर बहुत गंभीरता से सोचना है और मै फिर से कहूँगी की रोकथाम इलाज से बेहतर है।<br></p><p dir="ltr">साथ ही जन स्वास्थ्य प्रतिक्रिया पर ध्यान देना ज़रूरी है। अगर आप किसी गाँव या शहर में किसी सरकारी डॉक्टर से बात करें, तो अगर उन्हें पता भी है कि बच्ची या महिला के साथ यौन हिंसा हो रही है घर में या स्कूल में, वो कुछ नहीं करेंगे क्योंकि ये उनकी जिम्मेदारी नहीं है।<br></p><p dir="ltr">मैं बहुत सालों से ये बात दोहरा रही हूँ की जन स्वास्थ्य की एक प्रक्रिया निर्धारित होनी चाहिए क्योंकि स्वास्थ्यकर्मी जैसे आशा या आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, उन्ही से सम्पर्क होता है गाँव की महिलाओं और बच्चियों का। इन स्वस्थकर्मियों को ट्रेनिंग देना और इसे एक जन स्वास्थ्य मुद्दा बनाना ज़रूरी है। क्योंकि हर महिला जन स्वास्थ सेवाओं से जुड़ी होती है या तो प्रजनन सुविधाओं के लिए या फिर जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को लेके।<br></p><p dir="ltr">इसलिए ऐसा करना बहुत ज़रूरी है और ये बहुत ग़लत है की अब तक ऐसा नहीं हुआ है। मुझे मालूम है कि स्वास्थ्य मंत्रालय ऐसा चाहता था मगर होम मिनिस्ट्री ने अपना कोई कार्यक्रम बनाया था, अब वो कितना प्रभावी है ये देखा ही जा सकता है।<br></p><p dir="ltr">साथ ही अध्यापकों को ट्रेनिंग देनी चाहिए, उन्हें जानकारी देनी चाहिए। मै ये नहीं कहती की सभी शिक्षक यौन हिंसा करते हैं, मगर जो कर रहे हैं उनके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए और उन्हें रोकने के लिए बाक़ी शिक्षकों के पास ये जानकारी होनी ज़रूरी है ताकि वो ऐसा करने के लिए सशक्त महसूस करें। हालांकि ये सिर्फ़ अध्यापकों के बारे में नहीं है।</p><p dir="ltr">मगर घर और स्कूल के बीच बच्चियाँ सुरक्षित नहीं है। इसलिए उन्हें स्कूल नहीं भेजा जाता, उनकी शादी जल्दी करवा दी जाती है। ये एक महिला के ऊपर काफ़ी दुष्प्रभाव डालता है और उसके पूरे जीवन को प्रभावित करता है।<br></p><p dir="ltr"><b>शारीरिक हिंसा या शारीरिक हिंसा के डर के बाद सबसे बड़ा ख़तरा जो लगातार बढ़ रहा है वो है इंटरनेट पर होने वाली हिंसा। जैसे-जैसे इंटरनेट की पहुँच बढ़ती जा रही है और ज़्यादा से ज़्यादा लड़कियों के पास इंटरनेट की सुविधा है उसी के साथ इन तक पहुँचने वाले अब्यूज़र के लिए भी इंटरनेट एक और साधन बनता जा रहा है। डिजिटल दुनिया में महिलाएँ बदसलूकी और दुर्व्यवहार का निशाना बन रही हैं और इंटरनेट पर इनका अनुभव पुरुषों से काफ़ी अलग बनता जा रहा है। इसका कितना असर पड़ रहा है और ये महिलाओं के लिए कितनी बड़ी समस्या है?</b><br></p><p dir="ltr">साइबर-स्पेस या इंटरनेट पर जो दुर्व्यवहार या बदसूलूकी महिलाएँ झेल रही हैं ये उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। ये मानसिक और भावपूर्ण उत्पीड़न है, ये साइको-सेक्शुअल उत्पीड़न है जो शारीरिक हिंसा के ही समान है, इसका प्रभाव शारीरिक हिंसा से ज़्यादा या उसका जितना ही ख़राब है।<br></p><p dir="ltr">ये लड़की को हर वक़्त एक डर के साथ जीने पर मजबूर करता है कि कभी भी उसको इंटरनेट पर दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ सकता है। और ज्यादातर महिलाओं का अनुभव है ऐसा ही है, चाहे वो वरिष्ठ महिला पत्रकार हों, या स्कूल में पढ़ने वाली किशोरियाँ हों।<br></p><p dir="ltr">हमने बिहार में एक सर्वे किया जिसके नतीजे काफ़ी चिंताजनक थे, इसमें सामने आया की लड़कियां सबसे ज़्यादा हिंसा या दुर्व्यवहार का सामना अपने मोबाइल फ़ोन पर कर रही हैं। ये बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है और हमारा सामाजिक और राजनीतिक वातावरण इसको बढ़ावा दे रहा है। राजनीतिक पार्टियां इस मामले में मार्गदर्शन करती दिखाई दे रही हैं, और इसमें सभी पार्टियां शामिल हैं। कोई कुछ भी कह सकता है, किसी भी महिला को परेशान कर सकता है, इस से दुष्कर्मियों को और बढ़ावा मिलता है।<br></p><p dir="ltr">मै वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त का नाम लेना चाहूँगी, उन्होंने किस तरह के दुर्व्यवहार का सामना किया और सरकार और पुलिस ने इसके ख़िलाफ़ कोई क़दम नहीं उठाए। कोई क़दम न उठाना ही सबसे ज़्यादा बढ़ावा देता है। दुनिया भर में इंटरनेट पर दुर्व्यवहार को रोकने के लिए नीतियां हैं, भारत में भी कुछ नीतियां हैं जो इंटरनेट पर बाक़ी कई चीजों को नियंत्रित करती हैं पर दुर्व्यवहार से जुड़ी ऐसी कोई नीतियाँ नहीं है, जिनकी सख़्त ज़रूरत भी है।<br></p><p dir="ltr">बल्कि इस 8 मार्च को अगर हम एक सबसे बड़ी माँग आगे रख सकते हैं जो एक बड़ी संख्या में महिलाओं को लाभान्वित करेगी तो वो है ऐसी नीतियों। क्योंकि इसके अभाव में महिलाएँ डर में जी रही हैं। मै एक फ़िल्म निर्माता को जानती हूँ जो किसी भी मुद्दे पर बोलने से आज इंकार कर रहीं थी क्योंकि वो एक डर के साथ ज़िंदा रहती हैं की उनके साथ एक महिला, एक मुस्लिम और एक सशक्त, आत्मनिर्भर और खुल कर बोलने वाली महिला होने के लिए दुर्व्यवहार झेलना पड़ता है।<br></p><p dir="ltr">महिलाओं का सशक्त दिखना भी उनके लिए ख़तरा बन गया है। ग्रामीण या ग़रीब इलाकों में महिलाओं के सफल होने की क्षमता या इंटरनेट पर मौजूद अवसरों का इस्तेमाल करना भी एक ख़तरा हो गया है क्योंकि उनकी सफलता उन्हें इस हिंसा का निशाना बना रही है।<br></p><p dir="ltr">आने वाले समय में ये सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है और इसे पूरी तरह से खत्म करना पड़ेगा क्योंकि महिलाएं तब तक टेक्नॉलजी का इस्तेमाल नहीं कर सकती जब तक वो 24 घंटे डर में रहेगी।<br></p><p dir="ltr"><b>देश की लगभग 50% महिलाएं किसी भी परिवार नियोजन के तरीके का इस्तेमाल नहीं करती हैं। देश की 30 मिलियन शादी-शुदा महिलाएँ है जिनकी परिवार नियोजन की ज़रूरत पूरी नहीं हो पा रही है। परिवार नियोजन का सारा बोझ महिलाओं पर है, कंडोम, नसबंदी या पुरुषों के लिए मौजूद अन्य तरीकों का इस्तेमाल ना के बराबर है। काफ़ी कोशिशों कि बाद भी परिवार नियोजन से जुड़ी समस्याओं में सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है?</b></p><p dir="ltr">परिवार नियोजन से जुड़ा सरकारी डेटा होने के बावजूद इस के साथ कई मिथक और ग़लत फ़हमियाँ जुड़ी हुई हैं। हमारे पास राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के हर चार साल के आंकड़े हैं, साथ ही जनगणना रिपोर्ट के आंकड़े हैं जो सब साफ़ साफ़ बताते हैं कि क्या करने की ज़रूरत है।</p><p dir="ltr">महिलाएं चाहती हैं की कम बच्चे करें, हमें सिर्फ़ उन्हें ऐसा करने के लिए सुविधाएं उपलब्ध करवानी हैं। भारत में कोई भी महिला, किसी भी धर्म या तबके की हो, दो से ज़्यादा बच्चे नहीं चाहती।<br></p><p dir="ltr">लोग ज़्यादा बच्चे चाहते थे क्योंकि उन्हें लगता था की बच्चे उनका समर्थन करेंगे पर जब नौकरियां ही नहीं है तो मां-बाप ही बच्चे का समर्थन करते हैं, बहुत महंगाई बढ़ गयी है खाने के दाम इतने बढ़ गए हैं की लोग अपने बच्चों को ठीक से खाना भी नहीं खिला पा रहे हैं।<br></p><p dir="ltr">पुरुष अपनी कोई भी जिम्मेदारी परिवार नियोजन में नहीं निभा रहे हैं, बल्कि उनका गैर जिम्मेदाराना बर्ताव सामने आ रहा है। सिर्फ़ 0.3% पुरुष नसबंदी करवाते हैं जबकि ये बहुत सरल और साधारण तरीक़ा है जो वापस भी किया जा सकता है अगर बच्चा चाहते हैं तो। महिलाओं की नसबंदी में एनेस्थीसिया दिया जाता है, कई मुश्किलें आती है, बिलासपुर में एक नसबंदी कैंप में 17 महिलाओं की मौत हो गयी थी। फिर भी सिर्फ़ महिलें ही नसबंदी करवाती हैं।<br></p><p dir="ltr">साथ ही हमारे यहाँ स्पेसिंग यानी बच्चों में अंतर रखने के तरीक़ों को बढ़ावा देने पर हम ख़र्च ही नहीं करते, हमारा स्वास्थ्य बजट पहले से ही कम है, इसका सिर्फ़ 4% परिवार नियोजन पर ख़र्च होता है और इसमें से भी सिर्फ़ 2 से 3% स्पेसिंग के तरीक़ों पर ख़र्च होता है।<br></p><p dir="ltr">इतनी बड़ी जवान आबादी होने के बाद भी हमारे पास परिवार नियोजन के इतने कम साधान हैं। ख़ासकर जवान लोगों के पास तो और भी कम साधान हैं जिन्हें अस्थायी साधनो की ज़रूरत है, ना की नसबंदी की। साधन की कमी की वजह से महिलाएं जितने चाहती हैं उस से ज़्यादा बच्चे पैदा करती हैं और कोई भी बच्चा अनचाहा नहीं होना चाहिए।<br></p><p dir="ltr">परिवार नियोजन रोकथाम का एक सस्ता, टिकाऊ तरीक़ा है और परिवार की और देश की अर्थव्यवस्था के लिए, महिलाओं के लिए और देश के लिए अच्छा है। परिवार नियोजन में सुधार लाना और इसपर ख़र्च बढ़ाना ज़रूरी है। दुनिया भर की महिलाएँ यहाँ तक की नेपाल और बांग्लादेश की महिलाओं को भी जो भी साधन उपलब्ध हैं वो भी भारत की महिलाओं के पास नहीं है। छोटे छोटे देश जो हमसे ज़्यादा पिछड़े है वहाँ भी परिवार नियोजन के 4-5 ज़्यादा साधन उपलब्ध हैं।<br></p><p dir="ltr">हमें इस मुद्दे को राजनीतिक ना बनाते हुए इसपर काम करना है और ये मुद्दा सिर्फ़ औरतों का नहीं है, ये पुरुषों का मुद्दा है, मर्दों को ज़िम्मेदारी लेनी पड़ेगी। ये सामाजिक मुद्दा है, सिर्फ़ औरतों का नहीं।<br></p><p dir="ltr"><b>प्रजनन न्याय या रिप्रोडक्टिव जस्टिस क्या है और ये प्रजनन के अधिकार से कैसे अलग है?</b><br></p><p dir="ltr">प्रजनन न्याय हाशिए पर खड़ी महिलाओं को केंद्र में रखकर ये सुनिश्चित करता है की अगर महिला ग़रीब, दलित या मुस्लिम है तो भी उसे बराबर सुविधाएं मिलें। हम देखते हैं की बेहतर स्थिति में रह रही महिलाओं को बेहतर सुविधाएं मिलती हैं और ख़राब स्थिति में रह रही महिलाओं को ख़राब।<br></p><p dir="ltr">अगर एक महिला के पास अपने परिवार के अंदर या अपने लिए चीजें माँगने का हक़ नहीं है तो ये सिर्फ़ उसकी ज़िम्मेदारी नहीं है, एक समाज के तौर पर ये हमारी जिम्मेदारी है की हम उसके लिए न्याय सुनिश्चित करें। हम ये नहीं कह सकते की एक महिला की सास उसे कुछ करने नहीं दे रही, ये हमारे जन स्वास्थ्य और सरकार की भी बराबर ज़िम्मेदारी है की हम उस तक, उसकी सास तक पहुंचे और चीजों को सुधारें।<br></p><p dir="ltr">यहाँ न्याय का मतलब है की महिला को पास ये अधिकार हो की वो चुन सके की वो कब शादी करे, कितना पढ़े, कब बच्चे पैदा करे, कितने बच्चे पैदा करे। कोई लड़की जो पढ़ना चाहती है पर उसकी 16 साल की उम्र में शादी कर दी जाती है तो ये अन्याय है।<br></p><p dir="ltr">प्रजनन न्याय में सिर्फ़ परिवार नियोजन की सुविधाएं नहीं शामिल हैं, इसमें शिक्षा, प्रजनन स्वास्थ्य की जानकारी, बचपन में या किशोरावस्था में कुपोषण, अगर उसके साथ बलात्कार हुआ है या पति ने कंडोम इस्तेमाल नहीं किया है तो उसका गर्भपात करवाने का हक़, सब शामिल है।<br></p><p dir="ltr">एक लड़की जिसके साथ बलात्कार किया जाता है, उसे गर्भपात की इजाज़त के लिए सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट जाना पड़ता है, ये कैसे ठीक है। लड़की को नहीं पता चलेगा की वो गर्भ से है जब तक इसकी जांच नहीं होती है या ऐसा पाया नहीं जाएगा, जो कि 20 हफ़्ते के बाद भी हो सकता है। पर हमें पता है की इसके बाद भी गर्भपात सुरक्षित है और आसानी से किया जा सकता है।</p><p dir="ltr">जब एमटीपी कानून आया था तब ये जानकारी नहीं थी, पर अब डॉक्टर ये जानते हैं। ये न्याय है की क़ानून में ज़रूरत के अनुसार बदलाव लाए जाएं। महिला को इसकी इजाज़त लेने कोर्ट में जाने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। अगर वो बच्चा नहीं चाहती है तो गर्भपात हर महिला का हक़ है, भले ही गर्भ धारण कैसे भी हुआ हो । </p><p dir="ltr">साथ ही यौन शिक्षा भी बहुत ज़रूरी है, ये अन्याय है की किसी लड़का या लड़की को ये नहीं पता की असुरक्षित यौन संबंध बनाने से लड़की गर्भवती हो सकती है या इस से कई तरह के संक्रमण और बीमारियां हो सकती हैं। हर यौन रूप से सक्रिय व्यक्ति को इसके बारे में सही जानकारी हो ये उसका अधिकार है, और इस जानकारी का अभाव अन्याय है।<br></p><p dir="ltr">सरकार कहती है सबका साथ सबका विकास, मगर ये असल में नहीं हो पा रहा है, इसके बारे में सोचना होगा।<br></p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i><br></p><div><br></div></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/women-2/government-says-sabka-saath-sabka-vikas-but-thats-not-really-heppening-734061</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/women-2/government-says-sabka-saath-sabka-vikas-but-thats-not-really-heppening-734061</guid>
<category><![CDATA[कवर स्टोरी,महिलाएं,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[साधिका तिवारी]]></dc:creator>
<pubDate>Mon, 08 Mar 2021 16:26:08 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/08/500x300_435000-womens-day-is-hindi.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA['विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की बेहतर भागीदारी को पॉलिसी सपोर्ट की आवश्यकता है']]></title>
<description><![CDATA[महिलाओं के लिए परिवहन के सुरक्षित साधन, सुविधाजनक ऑफिस टाइमिंग, घर से काम करने की सुविधा और बेहतर शिकायत निवारण व्यवस्था महिलाओं की कामकाजी ज़िन्दगी के समस्याएँ कम कर सकती हैं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b><i>बेंगलुरु: </i></b><i>विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी विश्व स्तर पर काफी कम है, विश्व में 30% से कम महिलाएं वैज्ञानिक शोध में पायी गयी, यूनेस्को के इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्टेटिस्टिक्स के 2017 में जारी की गयी </i><a href="https://unesdoc.unesco.org/ark:/48223/pf0000253479_eng"><i><u>फैक्टशीट </u></i></a><i>के अनुसार। लेकिन इसके दूसरी तरह भारत में वैज्ञानिक शोध में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती हुई दिखाई देती है। केंद्रीय मानवसंसाधन विकास मंत्रायलय के द्वारा जारी किये गए ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) 2018-19 के अनुसार पीएचडी के लिए दाखिला लेने वाली महिलाओं की </i><a href="http://aishe.nic.in/aishe/viewDocument.action?documentId=262"><i><u>दर 48% </u></i></a><i>थी।</i><br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><i>"समय के साथ विज्ञान और शोध जैसे क्षेत्रों में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ रहा है लेकिन उस ही के साथ संस्थानों और कंपनीयो की भी ये ज़िम्मेदारी बनती है की वो महिलाओं को सुरक्षित और समानता का वातावरण प्रदान करें," डॉ जया नागराजा, मॉलिक्यूलर कनेक्शंस की चीफ साइंटिस्ट का कहना है।</i></p><b><i>इंडियास्पेंड </i></b><i>ने डॉ जया नागराजा से बात की, कि एक महिला रिसर्चर होने के नाते वो भारत में महिलों कि विज्ञान और शोध के क्षेत्र में भागीदारी को कैसे देखती हैं। डॉ नागराजा ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ बर्न, स्विट्ज़रलैंड, से अपनी पीएचडी पूरी करने के बाद कैंसर और अस्थमा पर रिसर्च किया और साल 2000 तक अमेरिका और फ्रांस में रिसर्च साइंटिस्ट के तौर पर कार्यरत रहीं । इसके बाद डॉ नागराजा ने भारत वापसी की और फिलहाल वे मॉलिक्यूलर कनेक्शंस में चीफ साइंटिस्ट के पद पर कार्यरत हैं।</i></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><iframe src="https://www.facebook.com/plugins/video.php?height=314&amp;href=https%3A%2F%2Fwww.facebook.com%2FIndiaSpendHindi%2Fvideos%2F513073859681353%2F&amp;show_text=false&amp;width=560" width="560" height="314" style="border:none;overflow:hidden" scrolling="no" frameborder="0" allowfullscreen="true" allow="autoplay; clipboard-write; encrypted-media; picture-in-picture; web-share"></iframe></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><i>संपादित अंश:</i></p><p dir="ltr"><b>पश्चिमी देशों में अपनी उच्च भुगतान वाली नौकरी के बाद आपने भारत वापस आने का विकल्प क्यों चुना?</b></p><p dir="ltr">यह केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि भारत में कई सारे अवसर पैदा हो रहे थे। अब और उस समय की शिक्षा के समय में बहुत अंतर था। उस समय की मुश्किलों को देखते हुए औरत के रूप में हमने बहुत कुछ हासिल किया है, जैसे कि विदेश जाने आदि। उस समय इस अकादमिक पृष्ठभूमि के होने के कारण, हममें से बहुत से लोग जो वापस आए वो सोचते थे कि अगर हम भारतीय समाज और विश्व विज्ञान में अपनी क्षमता से योगदान दे सकते है तो यह बहुत अच्छी बात है।</p><p dir="ltr">और मॉलिक्यूलर कनेक्शंस एक ऐसा माध्यम था, जिसने मेरे दरवाजे खटखटाकर मुझे वह अवसर दिया। 2000 के दशक की शुरुआत में, जब मॉलिक्यूलर कनेक्शंस की स्थापना हुई थी, मैं उन महिलाओं में से एक थी, जिन्हें इस संगठन की स्थापना करने का अवसर मिला। इसके साथ ही कॉलेज से आए  नए-नए युवाओं को एक पेशेवर सेट-अप में ढ़ालने में मदद करने का, कई परियोजनाओं के लिए दिशानिर्देश स्थापित करने में मदद करने आदि का अवसर प्राप्त हुआ।<br></p><p dir="ltr"><b>जिस समय आपने अपना काम शुरू किया उस समय विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं का होना कैसा था?</b><br></p><p dir="ltr">मैंने अपनी पीएच.डी. स्विट्जरलैंड में विदेश से की और जब तक आप अपने काम में अच्छे हैं तब तक महिला वैज्ञानिकों के साथ शैक्षणिक क्षेत्र में कभी भेदभाव नहीं किया गया। उस समय वैज्ञानिक के लिए वातावरण प्रेरणादायक था क्योंकि उस देश से नोबेल पुरस्कार विजेता और प्रमुख खोज थी। मैं बहुत उत्सुक थी। लेकिन सामान्य रूप से परिवार और समाज में, विशेषकर भारत में विवाह क्षेत्र में महिलाओं के लिए पीएचडी की योग्यता को अति-योग्यता माना जाता था। लेकिन परिवार और माता-पिता के सहयोग से हम यह सब दूर कर सकते हैं।<br></p><p dir="ltr"><b>महिलाओं की भागीदारी और स्वीकृति के मामले में इन सभी वर्षों के दौरान क्या बदलाव या सुधार हुआ है?</b><br></p><p dir="ltr">सामान्य तौर पर, हाल के समय में महिलाओं को सभी कैरियर क्षेत्रों और सभी नेतृत्व भूमिकाओं में बहुत अच्छी तरह से स्वीकार किया जाता है। यहां कई भारतीय वैज्ञानिक हैं जिन्होंने भारत के साथ-साथ प्रतिष्ठित संस्थानों से भी अपने लिए पहचान बनायी है। महिलाएं खुद को दृढ़ कर रही हैं, उनमें सहानुभूति हैं, वो नेतृत्व की भूमिकाएं निभाती हैं, उनके पास काम के घंटों में लचीलापन हैं, मातृत्व अवकाश से उनकी सफलता में कोई बाधा नहीं है। सामान्य तौर पर महिलाओं को वैज्ञानिक करियर में समान अवसर दिया जाता है।<br></p><p dir="ltr"><b>क्या आपने अपने पेशे की यात्रा में एक महिला के रूप में किसी भेदभाव का सामना किया है, यदि हाँ, तो आपने इसका सामना कैसे किया? कृपया घटना का उल्लेख करें।</b><br></p><p dir="ltr">नहीं, सौभाग्य से मैंने कभी भी अपने शैक्षणिक या पेशेवर जीवन में किसी भी लिंग भेदभाव का सामना नहीं किया है। कुछ क्षेत्रों में महिलाओं के लिए कुछ भेदभाव हो सकता है, लेकिन वैज्ञानिक स्तर पर नहीं। यदि आवश्यक हो, तो, हम इन बाधाओं के खिलाफ काम कर सकते हैं। मुझे यह भी लगता है कि अमरीका जैसे देशों की तुलना में भारत में भेदभाव कम है। </p><p dir="ltr">यदि आप मॉलिक्यूलर कनेक्शंस को देखें तो 70% से अधिक कार्यबल में महिलाएं है (नीचे से नेतृत्व की भूमिकाओं तक) इससे पता चलता है कि यह एक समान अवसर नियोजक है। (वास्तव में पूर्वाग्रह मॉलिक्यूलर कनेक्शंस में उल्टे क्रम में है)। मॉलिक्यूलर कनेक्शंस विकास में शुद्ध रूप से योग्यता संचालित और लिंग तटस्थ है।<br></p><p dir="ltr"><b>कार्यस्थलों पर लिंग अंतर को हटाने के लिए और क्या बदलने की आवश्यकता है?</b><br></p><p dir="ltr">इसके लिए काम के घंटों में लचीलापन, महिलाओं के लिए सुरक्षित परिवहन सुविधाएं व घर से काम करने की सुविधाऔं की जरूरत है। इसके अलावा बेहतर नियम और निवारण प्रणालियां जो महिलाओं द्वारा सामना किए जा रहे मुद्दों का समाधान कर सकती हैं।<br></p><p dir="ltr"><b>वेतन समता पर आपके क्या विचार हैं? और आपके अनुसार असमानता के मुद्दे पर कैसे ध्यान दिया जा सकता है?</b><br></p><p dir="ltr">महिलाओं और पुरुषों के मामले में वेतन असमानता क्यों होनी चाहिए। यह तो क्षमता और योगदान पर आधारित होनी चाहिए, लिंग पर नहीं । मुझे लगता है कि वैज्ञानिकों के स्तर पर यह भारत में एक मुद्दा नहीं है, लेकिन कुछ पश्चिमी देशों में कुछ असमानता के बारे में सुना है।<br></p><p dir="ltr"><b>क्या आपको लगता है कि ऐसी नीतियां जो महिलाओं के लिए अनुकूल हैं जैसे मातृत्व का अवकाश, मासिक धर्म के लिए अवकाश आदि महिलाओं को अधिक हासिल करने में मदद करेंगे?</b><br></p><p dir="ltr">हाँ, अब मातृत्व अवकाश और शायद पितृत्व अवकाश भी मदद करेंगे। हम हमेशा महिलाओं को अपने अवकाश को बढ़ाने के लिए मदद करते है और उन्हें डब्ल्यूएफएच के अवसर और फ्लेक्सी काम के समय भी देते हैं।<br></p><p dir="ltr"><b>'ग्लास सीलिंग' के बारे में आप क्या सोचते हैं, क्या यह वास्तव में महिलाओं के लिए मौजूद है?</b><br></p><p dir="ltr">समाज स्तर पर सब कुछ बदलने की जरूरत है। मानसिकता को बदलने की जरूरत है और पुरुषों को जीवन के सभी क्षेत्रों में महिलाओं को सम्मान और स्वीकार करने की आवश्यकता है।</p><p dir="ltr">केवल 2 चुनौतियां हैं जिनका सामना महिलाओं को कॉर्पोरेट में करना पड़ता है, और  विश्व स्तर पर - एक काम-जीवन संतुलन बनाए रखने के लिए और कैरियर की सीढ़ी पर सी-सूट पदों पर चढ़ने के लिए, यह बात कामकाजी महिलाओं के लिए सच है। महिलाएं पुरुषों के बराबर अनुपात में उद्योग में प्रवेश करती हैं, हालांकि जब तक वे टीम की लीडर और प्रबंधक बन पाती हैं, तब तक वे परिवार और बच्चों को प्राथमिकता देना शुरू कर देती हैं। अधिकांश महिलाएं अपने परिवार की देखभाल करने के लिए अपने करियर में अपने कदम पीछे ले लेती हैं और जो लोग उस कार्य संतुलन पर प्रहार करते हैं और नेतृत्व की स्थिति में पहुंच जाते हैं, उन्हें 'ग्लास सीलिंग' से टकराना मुश्किल लगता है।</p><p dir="ltr">कई संगठन विविधता और समावेश की पहल कर रहे हैं। कई भारतीय मूल संगठनों के लिए भी, रिमोट काम करना एक नया तरीका है। महिला सशक्तिकरण नेटवर्क अभी भी एक और पहल है जो कुछ बड़े संगठन महिलाओं को नेटवर्क के लिए प्रोत्साहित करने और संगठन में नेतृत्व के पदों को लेने के लिए चलाते हैं। हालांकि, उनमें से कुछ मुट्ठी भर लोग नेतृत्व स्तर पर लिंग विविधता प्राप्त करने में सफल रहे हैं।</p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i></p><br></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/women-2/how-to-increase-women-participation-in-the-field-of-science-734052</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/women-2/how-to-increase-women-participation-in-the-field-of-science-734052</guid>
<category><![CDATA[कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,महिलाएं,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[शैलेष श्रीवास्तव]]></dc:creator>
<pubDate>Mon, 08 Mar 2021 15:22:51 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/08/500x300_434993--.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यूपी: पोषाहार की बाट जोह रहे आंगनवाड़ी के बच्‍चे]]></title>
<description><![CDATA[उत्तर प्रदेश सरकार ने पोषाहार बनाने का काम स्वयं सहायता समूहों को देने का फैसला किया है और जब तक ये व्यवस्था स्थापित हो तब तक आंगनवाड़ी के लाभार्थियों को सूखा राशन देने का इंतज़ाम किया है। मगर लाभार्थियों को ना तो ये सूखा राशन ठीक से मिल रहा है और ना पोषाहार से मिलने वाला पोषण।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>लखनऊ: </b>उत्तर प्रदेश कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में पीछे जाता दिख रहा है।  जिसका कारण है, आंगनबाड़ी से जुड़े बच्चों और महिलाओं को सूखा राशन देने की नयी व्यवस्था, जो कि कई अनियमितताओं की शिकार है।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">सितम्बर 2020 में सरकार ने आंगनबाड़ी के लाभार्थियों को मिलने वाले पोषाहार का टेंडर रद्द करते हुए ये काम स्वयं सहायता समूहों को देने का निर्णय लिया और इस व्यवस्था के स्थापित होने तक लाभार्थियों को सूखा राशन बांटने का प्रावधान किया गया। लेकिन पिछले 6 महीनों से ये राशन ना तो नियमित रूप से वितरित किया जा रहा है और ना ही इसकी मात्रा कुपोषण से निपटने के लिए पर्याप्त है।</p><p dir="ltr">उत्‍तर प्रदेश में <a href="https://icds-wcd.nic.in/icds.aspx"><u>आंगनवाड़ी पोषाहार योजना </u></a>के तहत 2 साल के सोनू को आखिरी बार सितंबर 2020 में खाने को दलिया मिला था। इसके बाद से उसे दलिया या कोई अन्य पोषाहार नहीं मिला है। बीच में कुछ लाभार्थियों को अनाज जरूर बांटा गया था, लेकिन वो भी सोनू के परिवार तक नहीं पहुंचा। कोरोना और लॉकडाउन की वजह से सोनू के पिता की मजदूरी भी नहीं रही। जिसके कारण घर की आर्थिक स्थिति पहले से ज्यादा खराब हो गई है। ये कहानी है सोनू के परिवार की जो उत्‍तर प्रदेश के लखनऊ जिले के जुग्‍गौर गांव रहता है। </p><p dir="ltr">सोनू की माँ, 31 वर्षीय सरोज कुमारी का कहना है कि ऐसे मुश्किल वक्त में अगर बच्‍चे को आंगनवाड़ी से मिलने वाला अनाज मिल पाता तो शायद उनकी मुश्‍क‍िलें थोड़ी कम हो जातीं। </p><p dir="ltr">उत्‍तर प्रदेश में सरोज जैसी सैकड़ों महिलाएं इस बुरे दौर से गुजर रहीं हैं जब उनके बच्चों को आंगनवाड़ी  पोषाहार योजना से पोषाहार या कोई अनाज नहीं मिल पा रहा है। इसकी मुख्‍य वजह है उत्‍तर प्रदेश में आंगनवाड़ी  पोषाहार योजना का ट्रांजिशन पीरियड। </p><p dir="ltr"><b>क्या है ट्रांजिशन पीरियड</b> </p><p dir="ltr">उत्‍तर प्रदेश के आंगनवाड़ी केंद्रों पर पहले बच्‍चों को पुष्‍टाहार के रूप में अनाजों का मिश्रण, जिसे 'पंजीरी' कहा जाता है, दिया जाता था। इस पुष्‍टाहार के उत्पादन और वितरण में अनियमितताओं की शिकायतों के चलते प्रदेश के विकास एवं पुष्टाहार विभाग ने पंजीरी की आपूर्ति करने वाली कंपनियों का करीब 29 साल का एकाधिकार खत्‍म करते हुए सितम्बर 2020 में यह काम स्‍वयं सहायता समूह की महिलाओं को सौंपने का <a href="https://www.amarujala.com/lucknow/women-s-self-help-groups-will-create-nutritional-end-of-monopoly-of-registration-companies-for-29-years"><u>फैसला</u></a> लिया। चूंकि इस व्यवस्था को स्थापित करने में अनुमानित 2 वर्ष का लम्बा समय लगेगा, विभाग ने इस दौरान आंगनवाड़ी केंद्रों के लाभार्थियों को सूखा राशन जैसे चावल, दाल, गेहूं के साथ दूध पाउडर और घी आदि देने का फैसला किया। </p><p dir="ltr">लेकिन सितंबर 2020 में पुष्टाहार बंद होने के बाद यह सूखा राशन सिर्फ एक बार नवंबर में बांटा गया था, जो  सभी लाभार्थियों तक नहीं पहुंच पाया। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने इंडियास्पेंड को बताया कि उनकी ओर से जितने लाभार्थियों की सूची भेजी गई थी उससे कम ही अनाज आया था। घी और दूध पाउडर भी कई जिलों में नहीं बंट सका है। अब हालत ये है कि पहले से चल रही एक व्‍यवस्‍था के बंद होने और नई व्‍यवस्‍था के लिए जमीन तैयार न होने की वजह से सरोज जैसी तमाम माताएं और सोनू जैसे बच्‍चे आंगनवाड़ी के पुष्‍टाहार की बाट जोह रहे हैं।  </p><p dir="ltr"><b>यूपी में 1.89 लाख आंगनवाड़ी केंद्रों का संचालन </b></p>उत्तर प्रदेश में आंगनवाड़ी का दायरा कितना बड़ा है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि राज्‍य में <a href="http://164.100.24.220/loksabhaquestions/annex/175/AU1921.pdf"><u>1.89 लाख</u></a> से ज्‍यादा आंगनवाड़ी केंद्र हैं। 23 सितंबर 2020 को लोकसभा में पेश किए गए <a href="http://164.100.24.220/loksabhaquestions/annex/174/AU2204.pdf"><u>आंकड़ों</u></a> की मानें तो इन केंद्रों के माध्‍यम से बंटने वाले पुष्‍टाहार का लाभ 1.68 करोड़ से ज्‍यादा गर्भवती महिलाओं, धात्री महिलाओं और 6 साल तक के बच्‍चों को मिलता है। इसमें 6 साल तक के बच्‍चों की संख्‍या 1.31 करोड़ से ज्‍यादा है।</div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/05/432916-img20210212115407.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421ajEKcG6vIq94l5jj76O2IHP4amH4rKHh5898008" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1614945899476" title="बाल विकास और पुष्टाहार विभाग के अपर निदेशक अरविंद कुमार चौरसिया। फोटो : रणविजय सिंह" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1614945899476"><p>बाल विकास और पुष्टाहार विभाग के अपर निदेशक अरविंद कुमार चौरसिया। फोटो : रणविजय सिंह<br></p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><span style="background-color: rgb(249, 249, 249);">"सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि स्‍वयं सहायता समूह के माध्‍यम से आंगनवाड़ी में पुष्‍टाहार दिया जाए। यूपी में स्‍वयं सहायता समूह ही नहीं बने थे और इतने बड़े राज्‍य में एक दिन में यह सब हो नहीं सकता। ऐसे में फैसला लिया गया कि दो साल का ट्रांजिशन पीरियड रखा जाएगा। इस बीच योजना बंद न हो इसलिए लाभार्थियों को सूखा राशन देने की व्यवस्था बहाल की गई है", इंडियास्पेंड से बातचीत में बाल विकास और पुष्टाहार विभाग के अपर निदेशक अरविंद कुमार चौरसिया ने बताया।</span><br></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b>ट्रांजिशन पीरियड में लाभार्थियों को मिलने वाला राशन इस प्रकार है-</b><br></p><p dir="ltr"><b>- </b>अति कुपोषित बच्‍चों को हर महीने 2.5 किलो गेहूं, 1.5 किलो चावल, 500 ग्राम दाल। साथ में हर तीन महीने पर 900 ग्राम देशी घी और 750 ग्राम स्किम्ड मिल्क पाउडर।</p><p dir="ltr"><b>- </b>6 माह से 3 साल के बच्चों को हर महीने 1.5 किलो गेहूं, 1 किलो चावल, 750 ग्राम दाल। साथ ही हर तीन महीने पर 450 ग्राम घी और 400 ग्राम स्किम्ड मिल्क पाउडर। </p><p dir="ltr"><b>- </b>3 साल से 6 साल के बच्चों को हर महीने 1.5 किलो गेहूं, 1 किलो चावल। साथ ही हर तीन महीने पर 400 ग्राम स्किम्ड मिल्क पाउडर। इस आयु वर्ग के बच्चों को दाल और घी नहीं दिया जाता।</p><p dir="ltr"><b>- </b>गर्भवती और धात्री महिलाओं को हर महीने 2 किलो गेहूं, 1 किलो चावल, 759 ग्राम दाल। साथ ही हर तीन महीने पर 450 ग्राम घी और 750 ग्राम स्‍कि‍म्‍ड मिल्‍क पाउडर।<b> </b></p><p dir="ltr"><b>वैकल्पिक व्यवस्था के तहत राशन की मात्रा काफी कम</b></p><p dir="ltr">इंडियास्पेंड की जांच में ये पता चला कि पुष्टाहार बंद होने के बाद लाभार्थियों को दिया जाने वाला राशन अब तक सिर्फ एक बार नवंबर 2020 में बांटा गया था। इसके बाद से कोई राशन नहीं बंटा है। हालांकि एक बार जो सूखा राशन बांटा गया था, उसमें भी राशन की कम मात्रा थी। जिसे लेकर लाभार्थी और खुद आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भी सवाल उठा रह हैं। </p><p dir="ltr">पोषक तत्वों को लेकर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के INTEGRATED CHILD DEVELOPMENT SERVICES (ICDS) SCHEME के निर्धारित <a href="https://icds-wcd.nic.in/icds.aspx"><u>मानक </u></a>कुछ और ही हैं। इस स्कीम के तहत 2009 में जो मानक तय किए गए उसके मुताबिक, ऐसे बच्चों को दो भागों में बांटा गया है। प्राइमरी और अपर प्राइमरी। </p><p dir="ltr">प्राइमरी की बात करें तो इस आयु वर्ग के बच्चों को 12 ग्राम प्रोटीन के साथ 450 कैलोरी के लिए एक बच्चे को प्रतिदिन 100 ग्राम अनाज, 20 ग्राम दाल, 50 ग्राम सब्जी और 5 ग्राम तेल व घी चाहिए। इसी प्रकार से अपर प्राइमरी आयु वर्ग के बच्चों को 20 ग्राम प्रोटीन के साथ 700 कैलोरी के लिए 150 ग्राम अनाज, 30 ग्राम दाल, 75 ग्राम सब्जी और 7.5 ग्राम तेल व घी प्रतिदिन एक बच्चे को चाहिए। </p><p dir="ltr">इस हिसाब से देखा जाए तो ट्रांजिशन पीरियड में दिया जाने वाला राशन काफी कम है और वो भी हर महीने नहीं मिल रहा। </p><p dir="ltr">"पुष्टाहार के रूप में मिलने वाली पंजीरी की क्‍वालिटी खराब होती थी, उसे बंद कर दिया गया। अब जो अनाज बांटा जा रहा है वह बहुत ही कम है। क्‍या 1.5 किलो गेहूं और 1 किलो चावल पूरे महीने चल पाएगा? यह अनाज भी पांच महीने में सिर्फ एक बार मिला। ऐसे में तो बच्‍चे और कमजोर हो जाएंगे", गोरखपुर जिले के छितौनी गांव की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता गीता पांडेय ऐसा कहती हैं।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/05/432918-screenshot2021-02-16-21-02-16-214comgoogleandroidappsphotos.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421p1csIaJVo3ZuUcnLOKvqGTa0xaSNzdVy5968992" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1614945967029" title="बाराबंकी जिले के भ‍टौली कलां गांव की रहने वाली सोनम यादव। फोटो: रणविजय सिंह" alt="बाराबंकी जिले के भ‍टौली कलां गांव की रहने वाली सोनम यादव। फोटो: रणविजय सिंह" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1614945967029"><p>बाराबंकी जिले के भ‍टौली कलां गांव की रहने वाली सोनम यादव। फोटो: रणविजय सिंह</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">अनाज की कम मात्रा को लेकर बाराबंकी के भिटौली कलां गांव की रहने वाली 27 वर्षीय सोनम यादव कहती हैं, "मेरे जुड़वां बच्‍चे हैं। दो बच्चों के हिसाब से मुझे नवंबर में तीन किलो गेहूं और दो किलो चावल मिला था। इसके बाद फरवरी में 1.5 किलो दाल मिली। यह अनाज हफ्ते भर भी नहीं चला। यह बहुत ही कम है। इसे बढ़ाना चाहिए।"<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">नवंबर में सोनम को एक बार अनाज मिला था। अगर यह व्यवस्था सुचारू रूप से चलती तो सोनम को दिसंबर, जनवरी और फरवरी में भी गेहूं और चावल मिलना चाहिए था, लेकिन कुछ भी नहीं मिला।<br></p><p dir="ltr">कुछ ऐसा ही हाल लखनऊ के जुग्‍गौर गांव की रहने वाली 25 साल की रेखा का भी है। रेखा को आंगनवाड़ी से एक बार अनाज मिला जो पांच-छह दिन में खत्‍म हो गया। इसके बाद से उन्‍हें आंगनवाड़ी से अभी तक कुछ नहीं मिला है। रेखा कहती हैं, "मुझे तीन बच्‍चों का राशन मिला था। महज पांच-छह दिन ही चल पाया। मेरे दो बेटे और एक बेटी हैं, जिनकी उम्र क्रमश: एक साल, तीन साल और पांच साल है।"<br></p><p dir="ltr">रेखा ने बताया कि लॉकडाउन के बाद से उनकी मुश्‍किलें और बढ़ गई हैं। इससे पहले उन्‍हें सरकारी राशन की दुकान से अनाज मिलता था, लेकिन कुछ महीनों से उसका नाम कट गया है। ऐसे में बाहर से महंगे दाम पर अनाज खरीदकर खाना पड़ रहा है। रेखा के पति मजदूरी करते हैं और परिवार के लिए कमाने वाले अकेले व्‍यक्‍ति हैं। आंगनवाड़ी से बच्‍चों के लिए जो अनाज एक बार मिला था उसे भी परिवार के सभी सदस्‍यों ने खाया था।<br></p><p dir="ltr">बाराबंकी जिले के भिटौली कलां गांव की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता नीलम देवी की मानें तो राशन बांटने में एक समस्‍या यह देखने को मिली कि नवंबर में सभी लाभार्थ‍ियों को अनाज नहीं मिला। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने जितने लोगों की सूची बनाकर भेजी थी उससे कम ही राशन आया था।<br></p><p dir="ltr">"नवंबर में जब राशन आया तो 9 से 10 महिलाओं का राशन नहीं आया था। इसके अलावा 3 से 6 साल के 15 बच्चों और 6 माह से 3 साल के करीब 20 बच्चों का राशन नहीं आया। मैंने आला अफसरों को यह जानकारी दी तो बाद में उन्हें राशन मिल पाया," नीलम देवी कहती हैं।<br></p><p dir="ltr">इसी तरह जुग्‍गौर गांव की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ऊषा देवी कहती हैं, "85 बच्‍चों की लिस्‍ट भेजी थी, इसमें से सिर्फ 44 बच्‍चों का ही राशन मिल पाया। नवंबर में जो बच्‍चे छूट गए थे उनकी सूची तैयार करके मैंने भेजी दी है। जब राशन आएगा तो उन्‍हें दिया जाएगा।"<br></p><p dir="ltr">हालांकि गेहूं और चावल की जगह दाल अच्छी तरह से बंटी है। ऐसा इसलिए क्योंकि गेहूं और चावल विभाग की ओर से कोटे की दुकान पर भेजे गए थे, वहीं दाल की खरीद स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने खुद से की थी। ऐसे में उनके पास जितने लाभार्थियों की लिस्ट थी उस हिसाब से दाल खरीदकर बांटी गई।<br></p><p dir="ltr">सरोज बताती हैं कि उनका नौ लोगों का बड़ा परिवार है। शादी के बाद से ही वो और उनके पति परिवार से अलग चूल्हा जलाते रहे हैं। उनके तीन लोगों के परिवार का खर्च पति की कमाई से चलता है। इस कमाई का बड़ा हिस्सा सोनू की दवाई में लग रहा है, क्योंकि उसकी तबीयत अक्सर खराब रहती है। रसोई के लिए राशन भी खरीदना पड़ता है, ऐसे में जो कमाई होती है उसमें से कुछ बच नहीं पाता है। लॉकडाउन के बीच जब पति की कमाई नहीं हो पाती थी तो सास-ससुर ने काफी मदद की थी। थोड़ा बहुत उधार भी लेना पड़ा।<br></p><p dir="ltr"><b>आखिर बच्चों तक कैसे पहुंचेगा पोषाहार?</b><br></p><p dir="ltr">ट्रांजिशन पीरियड में जो सूखा राशन दिया जा रहा है वह सीधे परिवार को मिलता है, बच्चों को नहीं। पहले जो पंजीरी दी जाती थी वह सीधे बच्चों को मिलती थी। कभी मिड-डे मील के तहत बच्चों को हर महीने तीन किलो गेहूं या चावल दिए जाने की व्यवस्था थी। इस अनाज का लाभ बच्‍चों को न मिलता देख सुप्रीम कोर्ट ने <a href="http://www.fao.org/eims/secretariat/right_to_food/eims_search/details.asp?lang=en&amp;pub_id=227791"><u>आदेश</u></a> दिया था कि प्राइमरी स्कूलों में पका हुआ भोजन उपलब्ध कराया जाए। इस आदेश के बाद एक सितंबर 2004 से प्राइमरी स्कूलों में ही मिड-डे मील बनने लगा था। </p><p dir="ltr">अनाज का लाभ बच्चों को कैसे मिलेगा? इस सवाल पर बाल विकास और पुष्टाहार विभाग के अपर निदेशक अरविंद कुमार चौरसिया कहते हैं, "हम माताओं को बता रहे हैं कि यह राशन सिर्फ बच्चों के लिए ही है और उनके लिए ही उपयोग किया जाए। इसके अलावा मार्च 2021 से 3 से 6 साल तक के बच्चों के लिए सरकार हॉट कुक शुरू करने जा रही है। इसे मिड-डे मील के साथ जोड़ दिया गया है। इसके अलावा टेक होम राशन में भी कुछ बदलाव किए गए हैं। अब नेफेड की ओर से पोषक तत्वों से युक्त (फोर्ट‍िफाइड फुड) चावल, चना, दाल और सरसों या सोयाबीन तेल सप्लाई किया जाएगा। ट्रांजिशनल पीरियड तक यह सामग्री लाभार्थियों को दी जाएगी।"<br></p><p dir="ltr"><b>कुपोषण बढ़ने का खतरा: विशेषज्ञ</b><br></p><p dir="ltr">इंडियास्पेंड की 1 दिसंबर 2020 की <a href="https://indiaspendhindi.com/%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%b7%e0%a4%a3-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b9-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8c%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%aa%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/"><u>रिपोर्ट</u></a> के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में पिछले साल सितंबर के महीने में मनाए गए पोषण माह के दौरान उत्तर प्रदेश में कुपोषित बच्चों की पहचान का अभियान चलाया गया था। इस दौरान राज्य में 6 साल तक के 15 लाख से अधिक कुपोषित बच्चे पाए गए थे। इनमें से 13.4 लाख बच्चे कुपोषित और 1.88 लाख बच्चे अतिकुपोषित पाए गए थे। बावजूद इसके इन्हीं दिनों यूपी सरकार ने आंगनवाड़ी पोषाहार योजना के तहत बच्चों को दिए जाने वाले पोषणयुक्त आहार की व्यवस्था को बंद कर दिया। दो साल का ट्रांजिशन पीरियड तय कर सूखा राशन बांटने की व्यवस्था की गई वो भी बेहद लापरवाह तरीके से। इसका परिणाम बेहद भयावह हो सकता है।</p><p dir="ltr">ट्रांजिशन पीरियड की वजह से पुष्‍टाहार योजना में आई दिक्‍कतों को एक्‍सपर्ट गंभीर समस्‍या मानते हैं। "ट्रांजिशन में जाने से पहले कम से कम एक प्‍लान बनाया जा सकता था, जिससे योजना पर असर न हो। लोकल बॉडी जैसे पंचायत, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता या बच्‍चों के अभिभावकों को मिलाकर एक समूह बनाया जा सकता था, जहां बच्‍चों के लिए खाना बन सके। यह वक्‍त ऐसा है कि लोगों की आर्थ‍िक स्‍थ‍िति पहले से ज्यादा खराब है। ऐसी स्‍थ‍िति में पोषाहार योजना की दिक्‍कतों से काफी नुकसान होगा। आने वाले वक्‍त में इसका असर भीषण कुपोषण के तौर पर देखने को मिल सकता है",  <a href="http://phmindia.org/"><u>स्‍वास्‍थ्‍य अभ‍ियान</u></a> की सह संयोजक डॉ. सुलक्षणा नंदी कहती हैं।<br></p><p dir="ltr"><b>अब नेफेड से आएगा टेक होम राशन</b><br></p><p dir="ltr">टेक होम राशन में बदलाव करने का फैसला लेने के बाद बाल विकास और पुष्टाहार विभाग ने इससे संबंधित एक पत्र फरवरी की शुरुआत में नेशनल एग्रीकल्‍चरल को-ऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (<a href="http://www.nafed-india.com/Home/ContentPage/1"><u>नेफेड</u></a>) को भेजा था। यानी नवंबर में जो अनाज कोटे की दुकान के माध्‍यम से बंटा था, उसकी जगह नेफेड टेक होम राशन की सप्लाई करेगा। यह बदलाव क्‍यों किया गया? इस बारे में अरविंद कुमार चौरसिया का कहना है कि अनाज अलग-अलग मिल रहा था तो उसका उद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा था। अब एक पैकेट में सारी सामग्री होगी और उस पैकेट पर रेसिपी भी लिखी होगी।</p><p dir="ltr">हालांकि नई व्‍यवस्‍था में कितना चावल, दलिया, चना और दाल मिलेगा इसको लेकर फिलहाल कोई मानक तय नहीं है। "बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग की वीडियो कॉन्‍फ्रेंसिंग में बताया गया कि नेफेड के द्वारा अब टेक होम राशन मिलेगा। गेहूं और चावल अब नहीं बांटा जाएगा। इसमें कुछ बदलाव हुआ है। अभी जिले में इसकी आपूर्ति नहीं हुई है", कन्‍नौज जिले की प्रभारी जिला कार्यक्रम अधिकारी नीलम कटियार ने इस संबंध में इंडियास्पेंड को फोन पर बताया।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/05/432919-img20210211124742.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421LoyeFreFz94tVOO62Mi2UxzOxVDmtvR96045704" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1614946046682" title="अदील अब्‍बास (लीड आईबी एंड सीबी) फोटो: रणविजय सिंह" alt="अदील अब्‍बास (लीड आईबी एंड सीबी) फोटो: रणविजय सिंह" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1614946046682"><p>अदील अब्‍बास (लीड आईबी एंड सीबी) फोटो: रणविजय सिंह</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">यूपी में टेक होम राशन बांटने का काम 67 हजार स्‍वयं सहायता समूह के माध्‍यम से किया जा रहा है। "स्‍वयं सहायता समूह को दाल खरीदकर बांटने की जिम्‍मेदारी दी गई थी। ऐसे में समूहों ने करीब 8.20 लाख किलो दाल खरीदी है", <a href="http://upsrlm.in/hi"><u>उत्‍तर प्रदेश राज्‍य ग्रामीण आजीविका मिशन</u></a> के अदील अब्‍बास ने इंडियास्‍पेंड को इस बारे में बताया। अदील अब्‍बास राज्‍य ग्रामीण आजीविका मिशन के इंस्‍ट‍िट्यूशन बिल्‍ड‍िंग और कैपेसिटी बिल्‍ड‍िंग को लीड करते हैं।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b>नई व्यवस्था कब तक ठीक होगी? </b></p><p dir="ltr">आंगनवाड़ी पोषाहार योजना की नई व्‍यवस्‍था सुचारू रूप से कब से काम करने लगेगी? इस सवाल के जवाब में अरविंद कुमार चौरसिया कहते हैं, "फतेहपुर और उन्‍नाव के पोषाहार यूनिट अगले महीने से चलने लगेंगे। यह दोनों बड़ी यूनिट हैं। इसके अलावा छह महीने में 18 अन्य जनपदों में काम शुरू हो जाएगा। हमारा टारगेट है कि एक साल के अंदर पूरे प्रदेश में स्‍वयं सहायता समूह के माध्‍यम से पुष्‍टाहार की व्‍यवस्‍था शुरू कर दी जाए।" </p><p dir="ltr">फतेहपुर और उन्‍नाव वो जिले हैं जहां यूएन वर्ल्‍ड फूड प्रोग्राम के माध्‍यम से पुष्‍टाहार की बड़ी यूनिट लगाई जा रही है। दरअसल सितंबर 2020 में यूएन वर्ल्‍ड फूड प्रोग्राम और यूपी सरकार के बीच एक <a href="https://twitter.com/CMOfficeUP/status/1303224650206306304?ref_src=twsrc%5Etfw%7Ctwcamp%5Etweetembed%7Ctwterm%5E1303224650206306304%7Ctwgr%5E%7Ctwcon%5Es1_&amp;ref_url=https%3A%2F%2Fhindi.news18.com%2Fnews%2Futtar-pradesh%2Flucknow-mou-sign-by-yogi-government-to-give-jobs-to-women-un-world-food-program-upns-3230659.html"><u>करार</u></a> हुआ था। इसके तहत यह यूनिट स्‍थापित करनी थी। इस दौरान यूपी सरकार ने 18 जिले के 204 विकास खंड़ों में पुष्‍टाहार बनाने की यूनिट लगाने की बात कही थी। इन यूनिटों को स्‍वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा चलाया जाएगा।<br></p><p dir="ltr">पुष्‍टाहार बनाने की यूनिट जिन 18 जिलों में लगनी है उसमें कन्‍नौज भी शामिल है। कन्‍नौज के आठ विकास खंड़ों में यह यूनिट लगनी है।<br></p><p dir="ltr">"हमने यूनिट लगाने के लिए स्‍थान चिह्नित कर लिया है। इसके अलावा हमने महिलाओं का समूह भी बना दिया है। इनका बैंक खाता, पैन कार्ड भी बन चुका है। यह सारी प्रकिया करीब तीन-चार महीने पहले ही हो चुकी हैं। स्‍टेट से आगे का कोई निर्देश नहीं मिला है। जिला उद्योग में रजिस्‍ट्रेशन, एफएसएसएआई और जीएसटी का काम बाकी है। शुरुआत में काम तेज गति से हुआ था, लेकिन जब से राशन बंटने लगा है तब से इस दिशा में काम धीमा हो गया है", राज्‍य ग्रामीण आजीविका मिशन के जिला प्रबंधक राकेश मौर्य ने इस संदर्भ में इंडियास्पेंड को बताया, </p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i><br></p><p dir="ltr"><a href="https://indiaspendhindi.com/author/ranvijay"><i><u>रणविजय सिंह</u></i></a><i> लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।</i></p></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/top-stories/up-anganwadi-children-waiting-for-nutrition-733323</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/top-stories/up-anganwadi-children-waiting-for-nutrition-733323</guid>
<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश,कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,सेहत,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[रणविजय सिंह]]></dc:creator>
<pubDate>Fri, 05 Mar 2021 12:09:39 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/05/500x300_432913--.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[क्यों झिझक रहें हैं भारतीय कोविड का टीका लगवाने से?]]></title>
<description><![CDATA[अभी तक टीके के कुल लभार्थियों की संख्या, लक्षित संख्या से काफ़ी कम है। कई स्वास्थ्य कर्मी टीका लगवाने से मना कर चुके हैं, लोगों में टीकाकरण को लेकर अभी भी जानकारी का काफ़ी अभाव है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>नई दिल्ली:</b> भारत में कोरोना वायरस के खिलाफ टीकाकरण अभियान का दूसरा चरण शुरू हो चुका है। लेकिन इस अभियान के प्रथम चरण में लाभार्थियों की संख्या लक्ष्य से काफी कम रही है।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><a href="https://pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1701203"><u>सरकारी आँकड़ों</u></a> के अनुसार, 26 फ़रवरी 2021 तक यानी कोविड टीकाकरण के 42 वें दिन देश में कुल 1.37 करोड़ लोगों को वैक्सीन लग चुकी थी, जिसमें 88,41,132 स्वास्थ्य कर्मचारी और 49,15,808 फ़्रंटलाइन कर्मचारी शामिल हैं। कोविड-19 वैक्सीन की मुहिम देशभर में 16 जनवरी को शुरू हुई, जिसका लक्ष्य पहले चरण में 3 करोड़ लाभार्थियों का टीकाकरण करना था।</p><p dir="ltr">16 जनवरी के दिन देशभर में लगभग एक लाख 65 हज़ार से ज़्यादा लभार्थियों का टीकाकरण, देश भर में <a href="https://pib.gov.in/Pressreleaseshare.aspx?PRID=1689021"><u>3,006 टीकाकरण केंद्रों </u></a>में किया गया। ये 1,65,714 का आँकड़ा पहले दिन की लक्षित संख्या 3 लाख से काफ़ी कम था। </p><p dir="ltr">सिर्फ़ उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहाँ पहले दिन 31,700 लोगों को कोविड-19 का टीका लगाने का लक्ष्य था पर दिन ख़त्म होते होते सिर्फ़ 21,291 लोगों को ही टीका लगाया गया। वहीं बिहार में 30,000 के लक्ष्य के बदले सिर्फ 18,169 लोगों ने ही टीकाकरण में भाग लिया । ये पहले दिन के आँकड़े भारत में कोविड टीकाकरण की एक तस्वीर बताते हैं। </p><p dir="ltr">अभी तक टीके के कुल लभार्थियों की संख्या, लक्षित संख्या से काफ़ी कम है। कई स्वास्थ्य कर्मी टीका लगवाने से मना कर चुके हैं, लोगों में टीकाकरण को लेकर अभी भी जानकारी का काफ़ी अभाव है, साथ ही सोशल मीडिया आदि पर फैली हुई अफवाहें भी टीकाकरण करवाने में देखी जा रही झिझक के मुख्य कारणों में से एक है।</p><p dir="ltr">"लोगों को पहले काफ़ी डर था की टीका लगेगा तो हाथ में दर्द रहेगा, बुखार आएगा, काम नहीं हो पाएगा, ये सारे डर धीरे-धीरे कम हुए है, जैसे-जैसे बाक़ी लोग ज़्यादा लोगों को लगता देख रहे हैं तो उनको लग रहा है की ठीक है," लखनऊ के गोसाईंगंज की आशा कार्यकर्ता शिवदेवी ने बताया जिनको 25 जनवरी को पहला टीका और 22 फ़रवरी को दूसरा टीका लगाया गया। </p><p dir="ltr">केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री, अश्विनी कुमार चौबे ने लोकसभा में 5 जनवरी, 2021 को <a href="http://164.100.24.220/loksabhaquestions/qhindi/175/AU834.pdf"><u>माना</u></a> की टीकाकरण मुहिम की शुरुआत में लक्ष्य से काफ़ी कम लोगों का टीकाकरण हो पाया। इसके लिए उन्होंने दो कारण बताए, कोविन ऐप, जिसपर टीकाकरण से जुड़ी सारी कार्रवाई डिजिटल होनी थी, इसका ठीक से ना चलना और इसकी तकनीकी समस्याएँ। और दूसरा कारण वैक्सीन लगवाने में झिझक या वैक्सीन हेज़िटन्सी। </p><p dir="ltr">"कोवैकसिन का तीसरे चरण का ट्रायल हुआ नहीं है और इसकी प्रभावकारिता पुख़्ता नहीं है, तो लभार्थियों में इसके प्रति थोड़ी आशंका है," बिहार के ऐम्स पटना के रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष, डॉ विनय कुमार, ने बताया।</p><p dir="ltr">"अगर आप एक टीका ले चुके हैं तो इसका बाद आप दूसरा टीका ले सकते हैं या नहीं इसपर भी शंका है। अगर अभी किसी ने कोवैकसिन ले ली जिसकी प्रभावकारिता 50% से कम है, तो फिर ये वैक्सीन बार बार लेनी पड़ेगी, उस स्थिति में कोई दूसरी वैक्सीन भी नहीं ले पाएँगे और इसका भी कोई असर नहीं हुआ तो इस कारण भी काफ़ी आशंकाएँ है," डॉ कुमार ने बताया।</p><p dir="ltr">"शुरुआत में लक्षित संख्या से कम लोग इसलिए भी आए क्योंकि सूचियों में एक मोबाइल नम्बर पर एक से ज़्यादा लोग पंजीकृत किए गए थे, पुलिस कर्मियों में जिनके नाम सूची में थे उनमे से कई ड्युटी पर बाहर थे, इसी तरह के कुछ कारण थे, पर अब ऐसा नहीं है," लखनऊ के अतिरिक्त चीफ़ मेडिकल अधीक्षक और कोविड टीकाकरण के नोडल अधिकारी एमके सिंह ने बताया।</p><p dir="ltr"><b>क्या हैं वैक्सीन के प्रति झिझक के कारण?</b></p><p dir="ltr"><a href="https://www.who.int/immunization/research/forums_and_initiatives/1_RButler_VH_Threat_Child_Health_gvirf16.pdf?ua=1"><u>विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार</u></a> वैक्सीन हेज़िटन्सी का मतलब है वैक्सीन होने के बावजूद इसे लगवाने में देरी करना या लगवाने से मना कर देना। हालिया सर्वे के अनुसार जानकारी का आभाव इस झिझक का सबसे बड़ा कारण है। </p><p dir="ltr">ज़्यादातर लोगों को टीकाकरण से पहले ये जानकारी नहीं दी गयी थी की बुखार जैसे लक्षण, जो किसी भी टीके के बाद आम हैं, वो कोविड के टीके के बाद भी हो सकते हैं। इसकी वजह से कई लोगों को जब बुखार हुआ तो इसकी वजह से उनमे वैक्सीन के प्रति डर और बढ़ गया। </p><p dir="ltr">उत्तराखंड के अलमोड़ा ज़िले के महरखोला गाँव, कुमछाऊँ गाँव और नक्सीला गाँव, की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, तीनो ने साथ में कोविड का टीका 3 फ़रवरी लगवाया इसके बाद तीनो को ही तेज बुखार हो गया और उसके बाद से ये तीनों टीकाकरण को एक अलग दृष्टि से देखती हैं ।</p><p dir="ltr">"मैं एकदम स्वस्थ थी, टीका लगने के बाद मुझे 102 बुखार हो गया और तीन दिन तक रहा, मेरे साथ की दूसरे गाँव की दो और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को भी बुखार रहा। तीन दिन तक उठ भी नहीं पाए इतना बुखार था, हमारे परिवार में से तो अभी हम किसी को भी नहीं लगवाएँगे टीका। अगर गाँव वाले पूछते हैं तो उनको यही कहते हैं जिसको लगवाना हो सब अपनी ज़िम्मेदारी पर ही लगवाएँ", पुष्पा भकुनी, 38, ने बताया जो कुमछाऊँ गाँव की आंगनवाड़ी हैं।</p><p dir="ltr"><a href="https://www.localcircles.com/a/"><u>लोकल सर्कल</u></a> नाम के संस्थान ने <a href="https://www.localcircles.com/a/press/page/vaccine-hesitancy-survey-india#.YDin6hMzbOQ"><u>4 फ़रवरी को एक सर्वे</u></a> में बताया की भारत में 58% लोग अभी भी वैक्सीन लगवाने में झिझक रहे हैं, हालाँकि एक महीने में ये आँकड़ा 16% कम हुआ है। झिझकने वाले 40% लोगों का कहना है की अगर नेता, मंत्री, विधायक आदि ये वैक्सीन लगाते हैं तो उन्हें इस वैक्सीन पर ज़्यादा भरोसा होगा। इस सर्वे में देश के 289 जिलों से 25,000 लोग शामिल थे। </p><p dir="ltr">16 जनवरी को वाराणसी के एक टीकाकरण केंद्र पर ड्युटी पर तैनात एक पुलिस कर्मी ने इंडियास्पेंड को बताया था कि स्वस्थ्य्कर्मियों के बाद जब उनकी टीकाकरण की बारी आएगी तो वो टीका नहीं लगवाएँगे।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/03/431489-vaccination-centre1.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421uqXrQnK2OiZWEcpdVTIiM4ux9BY7kx3F7399790" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1614757399316" title="वाराणसी का एक कोविड टीकाकरण केंद्र। फोटो: साधिका तिवारी" alt="वाराणसी का एक कोविड टीकाकरण केंद्र। फोटो: साधिका तिवारी" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1614757399316"><p>वाराणसी का एक कोविड टीकाकरण केंद्र। फोटो: साधिका तिवारी</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"हम यहाँ आज सुबह से हैं, ना कलेक्टर ने टीका लगवाया, टीवी पर भी किसी नेता या किसी मंत्री ने टीका नहीं लगवाया तो हम इसपर कैसे भरोसा कर लें," उन्होंने बताया।<br></p><p dir="ltr"><b>आंकड़ों की पारदर्शिता</b></p><p dir="ltr">लोकल सर्कल के सर्वे के अनुसार 62% लोगों का कहना है कि अगर टीकाकरण और एईएफ़आई के आँकड़े उनके ज़िलों के लिए उपलब्ध करवाए जाते हैं तो उन्हें वैक्सीन पर ज़्यादा भरोसा होगा। अश्विनी चौबे द्वारा दिए गए जवाब के अनुसार 31 जनवरी, 2021 तक एईएफ़आई के अभी तक कुल 7,580 मामले सामने आए हैं।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/03/431490-aefi-room.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="44213JWO9lrNX8CKxHbQC1Gso8sVZNIyHRPh7477525" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1614757476764" title="वाराणसी के एक टीकाकरण केंद्र का एईएफ़आई कक्ष। फोटो: साधिका तिवारी" alt="वाराणसी के एक टीकाकरण केंद्र का एईएफ़आई कक्ष। फोटो: साधिका तिवारी" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1614757476764"><p>वाराणसी के एक टीकाकरण केंद्र का एईएफ़आई कक्ष। फोटो: साधिका तिवारी</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">एईएफ़आई यानी टीकाकरण के बाद होने वाले दुशप्रभाव। इन दुष्प्रभावों को पहचानने और इनसे निपटने के लिए हर कोविड टीकाकरण केंद्र पर एईएफ़आई कक्ष भी बनाए गए हैं। टीका लगने के तीस मिनट तक लाभार्थी को अवलोकन कक्ष में रखा जाता है जिसके बाद अगर कोई भी अनचाहे प्रभाव देखे जाते हैं तो उन्हें एईएफ़आई कक्ष में ले जाया जाता है।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">सर्वे में पूछा गया की क्या लोगों के पास अपने-अपने ज़िलों में  टीकाकरण केंद्र, रोज़ हो रहे टीकाकरण और इसके दुशप्रभाव के मामलों का डेटा उपलब्ध है, 62% लोगों ने कहा की उनके पास ये जानकारी नहीं है और वो ये जानकारी चाहेंगे। इसके ऊपर 21% ने कहा की उनके पास भी ये जानकारी नहीं है, हालाँकि उनकी इसमें कोई रुचि भी नहीं है। "इंटरनेट पर ज़िले का नाम और वैक्सीन डाल कर सर्च करने पर भी कोई ख़ास जानकारी उपलब्ध नहीं है," सर्वे ने कहा।<br></p><p dir="ltr">अश्विनी चौबे द्वारा दिए गए जवाब के अनुसार, कोविड-19 का टीका लगने के बाद कुल 12 लोगों की मौत भी हुई है, हालाँकि मंत्रालय के अनुसार फ़िलहाल मौजूद जानकारी के हिसाब से इन मे से किसी भी मौत का वैक्सीन से कोई संबंध नहीं था, यानी वैक्सीन की वजह से अभी तक कोई मौत नहीं हुई है।<br></p><p dir="ltr">लोकल सर्कल सर्वे के अनुसार देश के अलग-अलग इलाक़ों से टीकाकरण के बाद होने वाली मौतों और दुष्प्रभावों के मामलों की खबरों से भी लोगों में वैक्सीन के प्रति झिझक और इसके ख़िलाफ़ डर पैदा हुआ है।<br></p><p dir="ltr"><b>झिझक में गिरावट लेकिन बहुत कम</b><br></p><p dir="ltr">लोकल सर्कल ने 19 फ़रवरी तक किए गया अपने सारे सर्वे के जवाबों को मिलाकर <a href="https://www.localcircles.com/a/public/post/vaccine-hesitancy-declines-by-20-in-one-month/8887465cy"><u>एक ट्रेंड देखा</u></a> जिसके अनुसार अक्टूबर-नवंबर 2020 में लगभग 60% लोगों में वैक्सीन के प्रति झिझक थी। ये आँकड़ा दिसम्बर-जनवरी में बढ़कर 70% हो गया। हालाँकि 3 फ़रवरी को आँकड़ा 58% था वो 17 फ़रवरी को घटकर 50% पर आ गया।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/03/431491-local-circle.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421mUqDdgEhPAotR62mcIYPh0wR2mH9U1Vh7555142" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1614757553966"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none" id="info_item_1614757553966"><br></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">अश्विनी चौबे ने ये भी कहा कि बाक़ी देशों में कोविड-19 का अनुभव देखकर समझा जा सकता है कि ज़्यादातर देश कोविड के मामलों में होने वाली दूसरी और तीसरी तीव्र बढ़ोत्री महामारी के आख़िरी चरण में होती है। यानी की देश में घट रहे कोरोना की मामलों का मतलब ये नहीं है की महामारी धीरे धीरे कम हो रही है, इसीलिए ज़रूरी है की जिन लोगों को सबसे ज़्यादा ख़तरा है उन्हें सुरक्षित किया जाए ताकि जब तक टीकाकरण पूरा ना हो, कोविड के मरीज़ों की संख्या कम ही रहे।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"लोगों में पहले थोड़ा डर था टीके को लेकर। शुरुआत में जितने लोग आने की उम्मीद थी उतने लोग नहीं आए, प्रक्रिया थोड़ी धीमे थी पर लभार्थियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। अब लोग इसे लेकर उत्साहित हैं, कोई डर और कोई झिझक नहीं है," एमके सिंह ने बताया।<br></p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i><br></p><p dir="ltr"><i>(साधिका, </i><b><i>इंडियास्पेंड</i></b><i> के साथ प्रिन्सिपल कॉरेस्पॉंडेंट हैं।)</i><br></p></div><p><br></p>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/covid-19/why-indians-are-hesitant-towards-covid19-vaccine-732647</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/covid-19/why-indians-are-hesitant-towards-covid19-vaccine-732647</guid>
<category><![CDATA[Covid-19,कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,सेहत,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[साधिका तिवारी]]></dc:creator>
<pubDate>Wed, 03 Mar 2021 07:47:24 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/03/500x300_431492--.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उत्तर-पूर्वी राज्यों में कैंसर के तेज़ी से बढ़ते मामले दर्शाते नए आंकड़े]]></title>
<description><![CDATA[हालाँकि कैंसर, मधुमेह और हृदय रोग से होने वाली कुल मौतों के सटीक आँकड़े मौजूद नहीं हैं लेकिन अनुमानित औसत के अनुसार कैंसर से होने वाली सालाना मौतों का आँकड़ा 7 लाख से 8 लाख है।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr" id="docs-internal-guid-e7c6e802-7fff-9dee-0d71-29b31ce7caa1"><b>नई दिल्ली: </b>भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में कैंसर के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है और इन राज्यों में कैंसर के कुल मामले साल 2025 तक बढ़कर 57,131 तक जा सकते हैं। साल 2020 तक यहाँ के कुल अनुमानित केस 50,317 थे। </p><p dir="ltr">ये आँकड़े उत्तर-पूर्व के 8 राज्यों -- अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा के हैं और <a href="https://www.icmr.gov.in/"><u>भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद</u></a> (आईसीएमआर) और <a href="https://www.ncdirindia.org/"><u>नैशनल सेंटर फ़ोर डिज़ीज़ इन्फ़र्मैटिक्स एंड रीसर्च</u></a> (एनसीडीआईआर) की 2021 में जारी की गयी नयी <a href="https://ncdirindia.org/All_Reports/NorthEast2021/Default.aspx"><u>रिपोर्ट</u></a> में सामने आए हैं। यह रिपोर्ट 4 फ़रवरी यानी इस वर्ष के विश्व कैंसर दिवस के दिन जारी की गयी थी। </p><p dir="ltr">भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में कैंसर के मरीज़ों की भारी संख्या कोई नयी बात नहीं है, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले इतने वर्षों में कैंसर के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। </p><p dir="ltr">उत्तर-पूर्व के 8 राज्यों में 2012 से 2016 के बीच में रिपोर्ट किये गए कैंसर के मामले 16,840 प्रति वर्ष की औसत से 67,361 थे, जिनमे 36811 पुरुष और 30550 महिलाओं के मामले थे। </p><p dir="ltr">लेकिन अब इन्ही प्रदेशों में 2020 में कैंसर के अनुमानित मामले 50317 (27503 पुरुष और 22814 महिलाएं) माने जा रहे हैं जो कि इस बीमारी कि दृष्टि से एक बहुत बड़ी वृद्धि है. इस ही के साथ लगभग 13.5% की दर से ये अनुमानित मामले  साल 2025 तक 57131 (30985 पुरुष और 26146 महिलाएं) पहुँच जाएंगे।<br></p><p dir="ltr"><b>भारत में कैंसर<br></b>केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने राज्य सभा में 2 फ़रवरी, 2021 को पूछे गए <a href="https://pqars.nic.in/annex/253/A116.pdf"><u>एक सवाल के जवाब में </u></a>बताया की हालाँकि कैंसर, मधुमेह और हृदय रोग से होने वाली कुल मौतों के सटीक आँकड़े मौजूद नहीं हैं लेकिन अनुमानित औसत के अनुसार कैंसर से होने वाली सालाना मौतों का आँकड़ा 7 लाख से 8 लाख है। </p><p dir="ltr">भारत में हर दस में से एक व्यक्ति के जीवन में उसे कैंसर होने की सम्भावना है और हर 15 में से एक व्यक्ति की इस बीमारी से मौत हो सकती है। साल 2018 में भारत में कैंसर  के लगभग 12 लाख नए केस पाए गए और इससे होने वाली 7,84,800 मौतें, ऐसा <a href="https://www.who.int/"><u>विश्व स्वास्थ संगठन</u></a> (डबल्यूएचओ) की कैंसर पर काम करने वाली एजेंसी <a href="https://www.iarc.who.int/"><u>इंटर्नैशनल एजेन्सी फ़ोर रीसर्च</u></a> ऑन कैंसर (आईएआरसी) की इस वर्ष की <a href="https://www.iarc.who.int/cards_page/world-cancer-report/"><u>विश्व कैंसर दिवस रिपोर्ट</u></a> में सामने आया है।</p><p dir="ltr">इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में 6 प्रकार के कैंसर -- स्तन कैंसर, मुँह का कैंसर, सरवाइकल (गर्भाशय) कैंसर, फेफडों का कैंसर, पेट (आमाशय) का कैंसर और कोलोरेक्टल (बड़ी आंत) कैंसर  -- आमतौर पाए जाते हैं । भारत में स्तन कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं जबकि सरवाइकल कैंसर के मामले कम हो रहे हैं।<br></p><p dir="ltr"><b>उत्तर पूर्वी राज्यों में कैंसर के बढ़ते मामले<br></b>आईसीएमआर की <a href="https://ncdirindia.org/All_Reports/NorthEast2021/Default.aspx"><u>रिपोर्ट</u></a> के अनुसार मणिपुर और सिक्किम को छोड़ कर उत्तर-पूर्व के सभी 6 राज्यों में पुरुषों में महिलाओं से ज़्यादा कैंसर के केस देखे गए। कैंसर ग्रसित पुरुषों में सबसे ज़्यादा, 14% में इसोफेगस कैंसर और 11% में फेफडों का कैंसर देखा गया। जबकि कैंसर ग्रसित महिलाओं में सबसे ज़्यादा, 14% में स्तन कैंसर और 12% में सरवाइकल कैंसर पाया गया। </p></div><div data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" contenteditable="false"><img style="width: 100%;" src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/01/430084-icmr.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421pBHtBay167GmRTHuJiwMU3skqZqiYVns9276535" data-watermark="false" info-selector="#info_item_1614579277077"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none" id="info_item_1614579277077"><br></div></div><p dir="ltr">पुरुषों के सबसे ज़्यादा मामले मिज़ोरम के आइज़ोल ज़िले में पाए गए जहाँ हर एक लाख पुरुषों में लगभग 270 को कैंसर था। महिलाओं के सबसे ज़्यादा मामले अरुणाचल प्रदेश के पापमपारे ज़िले में देखे गए जहाँ हर एक लाख महिलाओं में से 220 को कैंसर था।</p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr" id="docs-internal-guid-49e0d67c-7fff-ea24-1a5d-8c478c1e50c8">"उत्तर पूर्वी राज्यों में कैंसर के मामले देश भर से काफ़ी ज़्यादा हैं। हालँकी ये दर सभी 8 राज्यों में सामान्य नहीं है, कुछ इलाक़ों में आँकड़े ज़्यादा, कम और स्थिर भी हैं," डॉ प्रशांत माथुर, एनसीडीआईआर के डायरेक्टर और <a href="https://ncdirindia.org/All_Reports/NorthEast2021/Default.aspx"><u>रिपोर्ट</u></a> के मुख्य शोधकर्ता, ने बताया। </p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div class="h-embed" contenteditable="false"><div class="h-embed-wrapper"><iframe src="https://www.facebook.com/plugins/video.php?height=314&amp;href=https%3A%2F%2Fwww.facebook.com%2FIndiaSpendHindi%2Fvideos%2F485367549316209%2F&amp;show_text=false&amp;width=560" style="border:none;overflow:hidden" scrolling="no" allowfullscreen="true" allow="autoplay; clipboard-write; encrypted-media; picture-in-picture; web-share" width="560" height="314" frameborder="0"></iframe></div></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper">"इस इलाक़े में कैंसर का सबसे बड़ा कारण है तम्बाकू का सेवन। तम्बाकू खाने या धूम्रपान करने वाले लोगों की संख्या उत्तर पूर्वी राज्यों में, देश भर से काफ़ी ज़्यादा है। इसके बाद कुछ और छोटे कारण है जैसे घर के अंदर का प्रदूषण, पर इनकी भूमिका तम्बाकू से काफ़ी कम है," डॉ रवि कन्नन ने बताया. <br><p dir="ltr">डॉ रवि कन्नन असम में कार्यरत सर्जिकल ओंकोलोगिसट हैं और कचर कैंसर हॉस्पिटल और रीसर्च सेंटर के डायरेक्टर भी, इन्हें साल 2020 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।</p><p dir="ltr">"<a href="https://ntcp.nhp.gov.in/assets/document/surveys-reports-publications/Global-Adult-Tobacco-Survey-Second-Round-India-2016-2017.pdf"><u>ग्लोबल अडल्ट टबैको सर्वे-2</u></a> के भारतीय आँकड़ों के अनुसार उत्तर-पूर्व में तम्बाकू के इस्तेमाल के आँकड़े राष्ट्रीय औसत से ज़्यादा हैं। तम्बाकू के सेवन के स्थानीय प्रकार जैसे खैनी और तुइबर जो की मिज़ोरम और मणिपुर में  काफ़ी प्राचिलित, साथ ही महिलाओं और पुरुषों में धूम्रपान के आँकड़े लगभग बराबर हैं, और ज़्यादातर लोगों में ये आदत किशोरावस्था से ही शुरू हो जाती है," डॉ माथुर ने बताया।</p><p dir="ltr"><b>इलाज़ के लिए दूसरे राज्यों पर ज़्यादा भरोसा<br></b>कैंसर के मरीज़ों में से राज्य से बाहर जा कर इलाज करवाने वालों की संख्या सबसे ज़्यादा सिक्किम में है जहाँ 95% मरीज़ राज्य के बाहर के अस्पतालों में इलाज करते हैं, इसके बाद है नागालैंड जहाँ के 58% मरीज़ ऐसा करते हैं।</p><p dir="ltr">"राज्य से बाहर जा कर इलाज करवाने की आदत मरीज़ों में पिछले कई दशकों से बन गयी है क्योंकि कभी सुविधाएँ उपलब्ध ही नहीं थी। अस्पताल बनने के बाद भी, लोगों के बीच उसपर भरोसा स्थापित होने में समय लगता है। सिर्फ़ अस्पताल बनाने से लोग अस्पताल जाना शुरू कर दें ऐसा ज़रूरी नहीं है, उन्हें जिस अस्पताल पर लम्बे समय से भरोसा रहा है वो वहीं जाएँगे। इलाज के लिए बम्बई, दिल्ली, चेन्नई, बैंगलोर जाना एक परंपरा जैसी बन गयी है उसे बदलने में समय लगेगा," डॉ कन्नन ने बताया। </p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"उत्तर-पूर्वी राज्यों में तृतीय स्तर की कैंसर इलाज की सुविधाएँ और ओंकोलोगिस्टस की कमी है," डॉ माथुर ने कहा।</p><p dir="ltr">दिसम्बर 2020 में <a href="https://ascopubs.org/doi/full/10.1200/GO.20.00122"><u>नेशनल कैंसर रेजिस्ट्री प्रोग्राम की एक रिपोर्ट</u></a> के शोध में देश भर के सभी राज्यों में कैंसर के केस देखे गए और पाया गया की ये सबसे ज़्यादा उत्तर-पूर्वी इलाक़ों में हैं। </p><p dir="ltr">आइज़ोल, पापमपरे, ईस्ट ख़ासी हिल और कामरूप ज़िलों में हर 4 में से एक पुरुष को पैदा होने से लेकर 74 साल की उम्र तक कैंसर होने की सम्भावना है। मिज़ोरम में हर 5 में से 1 और पापमपरे ज़िले में हर 4 में से 1 महिलाओं को 74 साल की उम्र तक कैंसर होने की सम्भावना है।</p><p dir="ltr">इसी शोध के अनुसार उत्तर पूर्व में आधारभूत सुविधाओं की कमी है जैसे की विशिष्ट इलाज की सुविधाएँ और चिकित्सा के क्षेत्र में मानव संसाधनों की कमी। इसकी वजह से देश भर के मुक़ाबले उत्तर पूर्व में ब्रेस्ट, सरवाइकल, सिर और गले के कैंसर के मरीज़ों की इलाज के पाँच साल बाद तक ज़िंदा रहने की दर देश भर से कम है। इसी वजह से इलाक़े में कैंसर के कुल मरीज़ों का एक बड़ा हिस्सा उत्तर-पूर्व से बाहर जाकर अपना इलाज करवाता है।<br></p><p dir="ltr"><b>बीमारी की जल्दी पहचान ना होना<br></b>"समय पर जाँच ताकि कैंसर शुरूआती स्तर पर ही पकड़ा जा सके बहुत ज़रूरी है। इसके लिए ज़रूरी चीजें हैं कैंसर के बारे में सामाजिक जागरूकता, घर के पास जाँच करवाने की सुविधा जहाँ तक आराम से पहुँचा जा सके और सस्ता इलाज। कैंसर के मामलों में लंबी वेटिंग लिस्ट नहीं हो सकती क्योंकि कई मज़दूर रोज़ कमा कर रोज़ खाते हैं वो बार बार अस्पताल नहीं जा सकते क्योंकि वो जिस दिन काम पर नहीं जाएँगे उस दिन उनके पास खाने के लिए काफ़ी नहीं होगा, ये सब सुनिश्चित करना ज़रूरी है," डॉ कन्नन ने बताया। </p><p dir="ltr">कैंसर के इलाज की सुविधाएँ कुछ बड़े शहरों तक सीमित है। उत्तर-पूर्वी इलाक़े के ज़्यादातर क्षेत्र पहाड़ी है, और ज़्यादातर  ग़रीब मरीज़ों को बस या ट्रेन से लंबा सफ़र तय करना पड़ता हैं जो की किसी भी ख़राब स्वास्थ्य वाले व्यक्ति के लिए ख़तरनाक हो सकता है, ऐसा हमने अपनी <a href="https://www.indiaspend.com/health/cancer-treatment-is-free-in-govt-hospitals-yet-poor-patients-drop-out-699590"><u>दिसम्बर 2020 की एक रिपोर्ट</u></a> में बताया। </p><p dir="ltr">"उत्तर पूर्व में बीहड़ इलाक़े है, पहाड़, जंगल, नदी आदि पार कर के लोग अस्पताल पहुँचते हैं। हाल ही में सरकार ने सभी राज्यों में ख़ासकर उन जिलो में जहाँ कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थी वहाँ भी अस्पताल बनाने शुरू कर दिए हैं, पर सिर्फ़ अस्पताल बनाना काफ़ी नहीं है, यहाँ डॉक्टर उपलब्ध करना भी मुश्किल है साथ, ये सुनिश्चित करना की लोग इन तक पहुँच सके भी ज़रूरी है, पर इस सब में समय लगता है," डॉ कन्नन ने बताया।</p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b>स्थिति की बेहतरी के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था बेहतर करना ज़रूरी<br></b>आईसीएमआर की रिपोर्ट में बताया गया कि स्थिति को नियंत्रण में करने के लिए और कैंसर की रोकथाम के लिए दो मुख्य बिंदु ज़रूरी हैं। दिए गए सुझाव में शामिल है -- स्वास्थ्य व्यवस्था मज़बूत करना और कैंसर की रोकथाम और नियंत्रण के लिए क़दम।</p><p dir="ltr">स्वास्थ्य व्यवस्था मज़बूत करने के लिए ज़रूरी है कि जन स्वास्थ के लिए ज़्यादा राशि आवंटित की जाए और कैंसर  के इलाज की सुविधाओं पर ख़र्च बढ़ाया जाए, और इसके लिए राजनैतिक इच्छा होना ज़रूरी है। स्वास्थ्य कर्मियों की सही ट्रेनिंग और नयी तकनीकों का इस्तेमाल जिस से बीमारियों का शुरूआती स्तर पर ही पता चल सके।</p><p dir="ltr">कैंसर की रोकथाम के लिए इससे जुड़ी जानकारी और जागरूकता फैलाना भी ज़रूरी है। साथ ही कैंसर की नियमित जाँच को बढ़ावा देना और कैंसर  के शुरूआती लक्षणों के बारे में जानकारी फैलाना ताकि स्वास्थ्यकर्मी इसकी पहचान कर सकें। कैंसर  के इलाज के लिए बेहतर बीमा योजनाएं और सस्ते इलाज की व्यवस्था और कैंसर  सर्वाइवर्ज़ के जीवन को बेहतर बनाने के लिए इलाज के बाद फ़ॉलो-उप सुविधाएँ। साथ ही केंद्रित कैंसर शोध को बढ़ावा देना जो इलाके की स्थानीय समस्यें और ज़रूरतों पर ध्यान दें।</p><p dir="ltr">इन सब कठिनाइयों की वजह से लोग अक्सर अपना इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं। "इलाज में पैसा लगता है। अस्पताल तक जाने का ख़र्च, जो अक्सर ज़्यादा होता है, फिर कैंसर का इलाज एक बार का नहीं होता ये लम्बे समय तक चलाता है। पूरा इलाज होने में लगभग एक साल लगता है इसके बाद इलाज से होने वाली थकान से उबरना होता है। इसके काफ़ी समय बाद व्यक्ति वापस नौकरी पर जाने लायक़ हो पता है। इस सब का असर पूरे परिवार के आर्थिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसी लिए लोग बीच में इलाज छोड़ देते हैं। अस्पताल में मरीज़ से कोई ठीक से बात नहीं करता, ठीक से सहायता नहीं करता," डॉ कन्नन ने बताया, "अपना नसीब मान कर इलाज छोड़ देना ज़्यादा आसान लगता है।" </p><p dir="ltr"> </p><p dir="ltr">हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं</p><br><i>(साधिका, </i><b><i>इंडियास्पेंड</i></b><i> के साथ प्रिन्सिपल कॉरेस्पॉंडेंट हैं।)</i></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div style="width:600px;">

</div></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/north-east/rapidly-increasing-cancer-cases-in-north-eastern-states-show-new-data-732107</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/north-east/rapidly-increasing-cancer-cases-in-north-eastern-states-show-new-data-732107</guid>
<category><![CDATA[NORTH EAST,नवीनतम रिपोर्ट,सेहत,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[साधिका तिवारी]]></dc:creator>
<pubDate>Mon, 01 Mar 2021 07:22:01 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/01/500x300_430082-rapidly-inc-cancer-ne1600.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बिजली उत्पादन के व्यापार में पर्यावरण की बाज़ी लगाता उत्तराखंड]]></title>
<description><![CDATA[71.05% वन क्षेत्र वाले उत्तराखंड के लिए राज्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आय के साधन जुटाना बड़ी चुनौती है। इस स्थिति में प्रदेश की आय बहुत कुछ कृषि, पर्यटन और जलविद्द्युत पर निर्भर करती है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड ने जलविद्द्युत परियोजनाओं पर बहुत ज़ोर दिया है और इसे अधिकतम क्षमता तक ले जाने का प्रयास किया है।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>देहरादून / लखनऊ: </b>उत्तराखंड के चमोली जिले में हुई त्रासदी को 15 दिन से ज्यादा हो चुके है और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक 68 शव बरामद हुए हैं और 136 से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं। इस घटना में 184 पशु भी मारे गए। एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के जवान अब भी रैणी गांव और अलकनंदा नदी के आसपास खोज और राहत कार्यों में लगे हुए हैं।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">त्रासदी के दिन ऋषिगंगा नदी का जल स्तर कई गुना बढ़ गया और नदी में भारी मात्रा में मलबा आ गया। ये पूरा इलाका <a href="https://indianculture.gov.in/hi/unesco/biospheres/nandaa-daevai-baayaosaphaiyara-raijarava"><u>नंदा देवी बायोस्फेयर रिजर्व </u></a>में आता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक ऋषिगंगा के कैचमेंट एरिया के ग्लेशियर्स के बीच भू-स्खलन और ग्लेशियर टूटने से बना रॉक और स्नो एवलॉन्च इस तबाही की वजह बना।</p><p dir="ltr">भारत के गृह मंत्री <a href="https://youtu.be/O7Qb8LEp9Js"><u>अमित शाह</u></a> ने राज्य सभा को बताया था की समुद्री सतह से 5600 मीटर की ऊंचाई पर हुए हिमस्खलन की वजह से यह हादसा हुआ। </p><p dir="ltr">लेकिन विशेषज्ञों और स्थानीय निवासियों का मानना है कि इस दुर्घटना को एक प्राकृतिक आपदा बताकर सिर्फ खानापूर्ति की जा रही है और इसके असल कारण को छुपाया जा रहा है । प्रदेश सरकार प्राकृतिक आपदा की आड़ में पर्यावरण सम्बन्धी नियमों को दरकिनार कर रही है। साथ ही जलविद्द्युत और अन्य परियोजनाओं को लगातार मंजूरी देती जा रही है।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">नियमों की अनदेखी</span></b></p><p dir="ltr">2013 में आयी <a href="https://www.downtoearth.org.in/coverage/natural-disasters/heavens-rage-41497"><u>भीषण बाढ़ </u></a>के बाद उच्चतम न्यायलय ने उत्तराखंड में निर्माणाधीन 24 जलविद्द्युत परियोजनाओं पर <a href="https://www.thehindubusinessline.com/opinion/stop-work-on-uttarakhand-hydel-projects/article23101774.ece"><u>रोक </u></a>लगा दी थी।</p><p dir="ltr"><a href="https://peoplesscienceinstitute.org/"><u>पीपल साइन्स इंस्टीट्यूट</u></a> के पूर्व डायरेक्टर डॉ रवि चोपड़ा का <a href="https://www.thehindu.com/news/national/until-about-10-years-ago-i-believed-that-it-was-possible-to-have-hydropower-projects-in-uttarakhand-peoples-science-institute-director/article33811190.ece"><u>मानना </u></a>है कि उत्तराखंड में होने वाली घटनाएँ एक तरह से मानव निर्मित हैं। </p><p dir="ltr">"ऐसा नही है कि ऐसी घटनाएँ सिर्फ़ गर्मियों के दिनों में होती हैं या फिर सर्दियों में ऐसी घटनाओं का होना एक आश्चर्यजनक बात है। ऐसी घटनाएँ होती रहती है। इस घटना में अभी तक समझ में आया है कि इसमें किसी प्रकार का ग्लेशियर नहीं टूटा बल्कि एक ग्लेशियर लेक बह गई है। जिसकी वजह सोलर इंसोलशन थी। घटना से पहले उस इलाके में भारी बर्फबारी हुई थी फिर उसके बाद अचानक से गर्मी बढ़ जाने की वजह से बर्फ पिघली और यह हादसा हुआ," डॉ चोपड़ा ने इंडियास्पेंड हिंदी से फ़ोन पर बात करते हुए बताया। </p><p dir="ltr">डॉ चोपड़ा आगे बताते है कि इस घटना का लोगों को इसलिए पता चला क्योंकि इसमें जनहानि हुई। ये पूछे जाने पर कि उच्चतम न्यायलय द्वारा पहाडी क्षेत्रों में हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स पर दिए गए <a href="https://sandrp.files.wordpress.com/2018/03/supreme-court2019s-directions-on-uttarakhand-hydropower-projects.pdf"><u>निर्देशों</u></a> पर क्या कभी कोई पालन हुआ तो उनका जवाब था कि ऐसे दिशा निर्देश आते रहते है लेकिन उनका पालन कड़ाई से नहीं हो पाता है।</p><p dir="ltr">डॉ चोपड़ा ने 2013 कि घटना के लिए भी उत्तराखंड की जलविद्द्युत परियोजनाओं और विकास कार्यों को ज़िम्मेदार ठहराया था</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">ऊंचाई पर</span></b><span style="font-size: 22px;"> </span><b><span style="font-size: 22px;">एक कतार में परियोजनाएं दुर्घटनाओं को निमंत्रण</span></b></p><p dir="ltr">जानकारों के अनुसार ऊंचाई वाले क्षेत्रों में एक के नीचे एक बन रही जलविद्द्युत परियोजनाएं या बाँध दुर्घटनाओं को आमंत्रित करने जैसा है । </p><p dir="ltr">इस महीने हुई त्रासदी में भी कुछ ही मिनटों में 13 मेगावाट की ऋषिगंगा जलविद्द्युत परियोजना का नामो निशान मिट गया। इससे करीब 5 किलोमीटर नीचे तपोवन क्षेत्र में एनटीपीसी की 530 मेगावाट की तपोवन-विष्णुगाड परियोजना निर्माणाधीन थी। जहां रविवार का दिन होने के बावजूद बड़ी संख्या में मज़दूर काम कर रहे थे। कई मज़दूर टनल के भीतर मौजूद थे। जो इस आपदा की चपेट में आए। ये टनल करीब 2 किलोमीटर लंबी थी।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/02/23/425829--.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421ow5pr33gySSUXvcjHEefvlD0cUYYgSSz6914373" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1614066917247" title="तपोवन टनल के पास रेस्क्यू ऑपरेशन। फोटो: वर्षा सिंह" alt="तपोवन टनल के पास रेस्क्यू ऑपरेशन। फोटो: वर्षा सिंह" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1614066917247"><p>तपोवन टनल के पास रेस्क्यू ऑपरेशन। फोटो: वर्षा सिंह</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">तपोवन से करीब 15 किलोमीटर आगे नदी का तेज़ बहाव जोशीमठ तक आया। जोशीमठ के नीचे विष्णुप्रयाग संगम पर अलकनंदा और धौलीगंगा नदी मिलती है। इस पर नदी से करीब 50-60 फीट ऊपर बना वर्षों पुराना पुल भी बाढ़-मलबा बहा कर ले गया। यह पुल इतना मजबूत था कि 2013 की आपदा में भी इसे नुकसान नहीं हुआ था। आगे नंदप्रयाग तक आते-आते नदी का वेग थमा। लेकिन पानी में मौजूद मलबे ने नदी की सूरत ही बदल दी।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">नदी पर एक सीध में बनाई गयी परियोजनाएं ऐसी स्थिति में ऊंचे क्षेत्रों में काफी घातक सिद्ध होती हैं।</p><p dir="ltr">डॉ चोपड़ा कि अध्यक्षता वाली एक समिति की 2013 की रिपोर्ट में ये बताया गया था की 2,200 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों को जलविद्द्युत परियोजनाओं से मुक्त रखा जाना चाहिए।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/02/23/425831--.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421swtjtO1I4NljujtA5zONm0LAH0Q4yy3d6991846" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1614066994691" title="वैज्ञानिकों के मुताबिक ऋषिगंगा के कैचमेंट एरिया के ग्लेशियर्स के बीच भू-स्खलन और ग्लेशियर टूटने से बना रॉक और स्नो एवलॉन्च इस तबाही की वजह बना। फोटो: वर्षा सिंह" alt="वैज्ञानिकों के मुताबिक ऋषिगंगा के कैचमेंट एरिया के ग्लेशियर्स के बीच भू-स्खलन और ग्लेशियर टूटने से बना रॉक और स्नो एवलॉन्च इस तबाही की वजह बना। फोटो: वर्षा सिंह" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1614066994691"><p>वैज्ञानिकों के मुताबिक ऋषिगंगा के कैचमेंट एरिया के ग्लेशियर्स के बीच भू-स्खलन और ग्लेशियर टूटने से बना रॉक और स्नो एवलॉन्च इस तबाही की वजह बना। फोटो: वर्षा सिंह</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">ऋषिगंगा प्रोजेक्ट पेरा ग्लैशिअल जोन (समुद्री सतह से 2200 मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित) में आता है जबकि तपोवन प्रोजेक्ट 1803 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।<br></p><p dir="ltr"><a href="https://waics.wihg.res.in/"><u>वाडिया इंस्टीटूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी</u></a> में कार्यरत जियोलॉजिस्ट डॉ विक्रम गुप्ता बताते है कि पहले रॉक एवलांच आया जो कि बर्फ को लेकर नीचे आया और क्योंकि रौन्ति गढ़ का रास्ता काफ़ी संकरा है और ऊपर से आये बर्फ, चट्टान के मलबे के कारण वहां पर कुछ अवरोध जैसी स्थिति बनी, इस वजह से फ़्लैश फ्लड कि स्थिति निर्मित हुई। </p><p dir="ltr">"यह इलाका बहुत ही संवेदनशील है और यह इस तरह के एक के बाद एक बनने वाले विद्द्युत परियोजनाओं के लिए उपयुक्त नहीं है",साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम, रिवर्स एंड पीपल के हिमांशु ठक्कर का ऐसा <a href="https://www-deccanherald-com.cdn.ampproject.org/v/s/www.deccanherald.com/amp/science-and-environment/uttarakhand-disaster-highlights-pressure-on-asias-great-rivers-949347.html?amp_js_v=a6&amp;_gsa=1&amp;usqp=mq331AQHKAFQArABIA%3D%3D#aoh=16138901788108&amp;_ct=1613890275163&amp;referrer=https%3A%2F%2Fwww.google.com&amp;_tf=From%20%251%24s&amp;ampshare=https%3A%2F%2Fwww.deccanherald.com%2Fscience-and-environment%2Futtarakhand-disaster-highlights-pressure-on-asias-great-rivers-949347.html"><u>मानना </u></a>है।<br></p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">बिजली से आय एक घाटे का सौदा</span></b><br></p><p dir="ltr">उत्तराखंड में 2857 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में तकरीबन 968 <a href="http://hpccc.gov.in/PDF/MoEF%20Dissussion%20Paper%20on%20Himalayan%20Glaciers.pdf">ग्लेशियर</a> मौजूद हैं। जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का तकरीबन 7.63% है। इन ग्लेशियरों से निकलने वाली नदियां स्थानीय लोगों के जीवन में तो कोई अहम भूमिका नहीं निभाती, लेकिन इनका तीव्र वेग जल-विद्युत उर्जा उत्पादन की दृष्टि से काफी फ़ायदेमंद है।<br></p><p dir="ltr"><a href="https://forest.uk.gov.in/files/sTATISTICS_2013/Uttarakhand_Statistics_2013.pdf"><u>71.05% वन क्षेत्र वाले उत्तराखंड </u></a>के लिए राज्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आय के साधन जुटाना बड़ी चुनौती है। इस स्थिति में प्रदेश की आय काफी हद तक कृषि, पर्यटन और जल विद्युत पर निर्भर करती है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड ने जल विद्युत परियोजनाओं पर बहुत ज़ोर दिया है और इसे अधिकतम क्षमता तक ले जाने का प्रयास किया है।<br></p><p dir="ltr">उत्तराखंड सरकार की आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में 25,000 मेगावाट से भी अधिक जलविद्द्युत उत्पादन की क्षमता है। जबकि अभी तकरीबन 4 हज़ार मेगावाट की परियोजनाएं ही चल रही हैं।<br></p><p dir="ltr">इसलिए उत्तराखंड सरकार रुकी हुई जलविद्द्युत परियोजनाओं को हरी झंडी दिलाने की भरपूर कोशिश करती है। </p><p dir="ltr">आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 की<a href="https://des.uk.gov.in/pages/display/157-%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3-2018-19"><u> रिपोर्ट</u></a> के मुताबिक वर्ष 2017-18 में राज्य की जीडीपी 167.73 लाख करोड़ रुपये रही। जलविद्द्युत निगम लिमिटेड के मुताबिक राज्य को वर्ष 2017-18 में जलविद्द्युत ऊर्जा से कुल 770 करोड़ की आय हुई। जबकि 2016-17 में ये रकम 640 करोड़ थी। जलविद्द्युत निगम लिमिटेड ने वित्तीय <a href="https://www.ujvnl.com/key-financial-data"><u>वर्ष 2019-20 </u></a>में 1318 मेगावाट की स्थापित क्षमता के साथ 923 मेगावाट बिजली की बिक्री के साथ 121 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया । इस वर्ष कंपनी की आय 964 करोड़ रुपये थी ।<br></p><p dir="ltr">"हिमाचल और उत्तराखंड दोनों हिमालयी राज्य हैं। दोनों की जलविद्द्युत उर्जा उत्पादन की क्षमता करीब 25,000 मेगावाट है। हिमाचल प्रदेश में 10 हज़ार मेगावाट की परियोजनाएं कार्य कर रही हैं और 9 हज़ार मेगावाट की परियोजनाओं पर काम चल रहा है। उत्तराखंड में <a href="https://www.uttarakhandirrigation.com/hydropower-projects"><u>4000</u></a> मेगावाट की जल-विद्युत परियोजनाएं कार्य कर रही हैं और 2500 मेगावाट की परियोजनाओं पर काम चल रहा है", ऐसा उत्तराखंड पावर ट्रांसमिशन लिमिटेड के प्रबंध निदेशक संदीप सिंघल का कहना है।<br></p><p dir="ltr">सिंघल आगे कहते हैं, "दोनों ही प्रदेशों में बड़ा अंतर है। इस तरह की आपदाओं के बाद हम बांधों को दोष देने लगते हैं। वह बताते हैं कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में कोई नई जलविद्द्युत परियोजना न बनाने का फ़ैसला लिया जा चुका था। 2013 की आपदा के बाद कोई भी नया प्रोजेक्ट अलकनंदा-भागीरथी पर शुरू नहीं हुआ है।"<br></p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">स्थानीय निवासियों का लगातार विरोध</span></b><br></p><p dir="ltr">वर्ष 2003-04 में तपोवन-विष्णुगाड परियोजना प्रस्तावित हुई थी। स्थानीय लोगों ने कई वर्षों तक इस परियोजना का विरोध किया था। जोशीमठ में मौजूद अतुल सती इस विरोध में शामिल मुख्य लोगों में से एक हैं। वह बताते हैं "तपोवन प्रोजेक्ट को लेकर स्थानीय विरोध बेहद तेज़ था। उस समय के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी परियोजना के उदघाटन के लिए जोशीमठ आने वाले थे। लेकिन स्थानीय विरोध के चलते वे नहीं आ सके। फिर दो-तीन महीने बाद देहरादून के परेड ग्राउंड से उन्होंने प्रतीकात्मक उदघाटन किया।"<br></p><p dir="ltr">अतुल बताते हैं कि तपोवन प्रोजेक्ट से पहले लोग जेपी कंपनी की विष्णुप्रयाग जलविद्द्युत परियोजना देख चुके थे। उस समय सुरंग में जबरदस्त विस्फोट किये जाते थे और पूरा जोशीमठ कांप जाता था। लोगों की खेती तबाह हो गई थी। बगीचे खत्म हो गए थे। इसलिए तपोवन प्रोजेक्ट का भारी विरोध किया गया। स्थानीय विरोध के बावजूद सरकार विकास के नाम पर इन परियोजनाओं को हरी झंडी दिए जा रही थी।<br></p><p dir="ltr"><a href="https://www.britannica.com/topic/Chipko-movement"><u>चिपको आंदोलन</u></a> के लिए गौरा देवी और उनका गांव रैणी पूरी दुनिया में जाना जाता है। इस गांव के लोग अपनी धरती पर बन रहे <a href="https://www.ntpc.co.in/power-generation/hydro-based-power-projects/tapovan-vishnugad"><u>ऋषिगंगा जलविद्द्युत परियोजना</u></a> का शुरू से ही <a href="https://thelogicalindian.com/trending/raini-villagers-raised-alarm-26711"><u>विरोध </u></a>कर रहे थे। चमोली हादसे के बाद रैणी गांव में भारी तबाही हुई है। पहाड़ से गिरे पत्थरों की चपेट में आकर तकरीबन सभी मकानों में दरारें पड़ गई हैं। आपदा के बाद प्राथमिक विद्यालय में बने राहत शिविर में रह रहे लोगों का कहना है कि पूरा गांव दहशत में जी रहा है। वे विस्थापन की मांग कर रहे हैं।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/02/23/425833--.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421wv4LgdecMNjL89YvRBWOZbn2F3gEJtt57051676" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1614067054482" title="तपोवन टनल के पास रेस्क्यू ऑपरेशन। फोटो: वर्षा सिंह&nbsp;" alt="तपोवन टनल के पास रेस्क्यू ऑपरेशन। फोटो: वर्षा सिंह " data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1614067054482"><p>तपोवन टनल के पास रेस्क्यू ऑपरेशन। फोटो: वर्षा सिंह&nbsp;</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">देहरादून की डाटा रिसर्च संस्था <a href="https://sdcuk.in/"><u>सोशल डेवलपमेंट ऑफ कम्यूनिटीज़ फाउंडेशन</u></a> के अनूप नौटियाल के मुताबिक हरिद्वार को छोड़ राज्य के 12 ज़िलों में 395 ऐसे गांव हैं जो आपदा के लिहाज़ से बेहद संवेदनशील हैं। इन सभी को विस्थापित किये जाने की मांग लंबे समय से की जा रही है।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">इस घटना का असर ये भी हुआ है कि उत्तराखंड सरकार ने 11 फरवरी को चार ज़िलों टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली और बागेश्वर में आपदा के लिहाज से अति-संवेदनशील परिवारों के पुनर्वास के लिए तकरीबन 2 करोड़ रुपये जारी किए हैं।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">बांध बनाने से पहले ग्लेशियर का नहीं होता अध्ययन</span></b></p><p dir="ltr">केंद्रीय जल आयोग की वर्ष 2019 की<a href="http://cwc.gov.in/sites/default/files/nrld06042019.pdf"><u> रिपोर्ट</u></a> के मुताबिक उत्तराखंड में 25 बड़ी जल-विद्युत परियोजनाएं हैं। इनमें से 17 परियोजनाओं से बिजली बन रही है। जबकि 8 परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। एनटीपीसी की तपोवन परियोजना भी इनमें से एक थी।<br></p><p dir="ltr">इन परियोजनाओं का पर्यावरणीय अध्ययन तो कराया जाता है। लेकिन वाडिया संस्थान के वैज्ञानिक डॉ प्रदीप श्रीवास्तव कहते हैं कि किसी परियोजना की डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट या पर्यावरणीय अध्ययन के लिए सरकार के पास कई संस्थाएं होती हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी, सेंट्रल वाटर कमीशन, सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट, सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, आईआईटी, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिग, वाडिया हिमालयन जियोलॉजी, जीबी पंत इस्टीट्यूट जैसे कई संस्थान हैं जो इस तरह का अध्ययन करते हैं।<br></p><p dir="ltr">सभी संस्थाओं की अपनी ख़ास विशेषता है जिसके आधार पर वो अध्ययन करते हैं। जैसे हाइड्रोलॉजी इंस्टीट्यूट जल प्रवाह से जुड़ा अध्ययन करेगा। आईआईटी की विशेषता इंजीनियरिंग में है। तो जिस संस्था से सरकार को बांधों के पक्ष में रिपोर्ट मिल जाती है उसे मंजूर कर लिया जाता है। जबकि एक जलविद्द्युत परियोजना के लिए नदी का प्रवाह, वहां की भौगोलिक स्थिति, बांध की तकनीकी दक्षता, वहां मौजूद ग्लेशियर की स्थिति जैसे कई पक्षों को देखना होता है।<br></p><p dir="ltr">वाडिया संस्थान के वैज्ञानिक रहे ग्लेशियरोलॉजिस्ट डॉ डीपी डोभाल ने भी यही बात कही। तपोवन परियोजना के पर्यावरणीय अध्ययन में वहां मौजूद ग्लेशियर के बांध पर पड़ने वाले असर का आकलन नहीं किया गया। जबकि यहां तबाही की वजह ग्लेशियर बने।<br></p><p dir="ltr">डॉ डोभाल कहते हैं कि बांधों को बनाने से जुड़े पर्यावरणीय अध्ययन में हम उसके ईर्द-गिर्द मौजूद ग्लेशियर का अध्ययन नहीं करते। नदी के जिस पानी के आधार पर हम बिजली बना रहे हैं, वो पानी जिस ग्लेशियर से आ रहा है, उसकी स्थिति समझनी बेहद जरूरी है। डॉ डोभाल आगे कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग का असर ग्लेशियर पर भी पड़ रहा है। जिससे ग्लेशियर में बदलाव आ रहे हैं लेकिन उनकी मॉनीटरिंग नहीं हो रही। ग्लेशियर में झीलें बन रही हैं, झीलों की मौजूदा स्थिति क्या है, ग्लेशियर से होने वाला पानी का डिस्चार्ज कितना है, बांधों से जुड़ी परियोजना तैयार करने में इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है।<br></p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं</i></p><div><i><br></i></div><div><br></div><div><br></div><div><br></div></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/uttarakhand/uttarakhand-sacrificing-environment-for-the-business-of-electricity-730157</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/uttarakhand/uttarakhand-sacrificing-environment-for-the-business-of-electricity-730157</guid>
<category><![CDATA[Development,Economy,Uttarakhand,अर्थव्यवस्था व नीति,कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[सौरभ शर्मा]]></dc:creator>
<pubDate>Tue, 23 Feb 2021 08:18:19 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/02/23/500x300_425821--.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[उत्तर प्रदेश: नवजात शिशुओं की मृत्युदर में कैसे होगा सुधार?]]></title>
<description><![CDATA[उत्तर प्रदेश में 10 में से 8 नवजात शिशुओं की मौत जन्म के सात दिनों के अंदर हो जाती है। बहुत ही कम संस्थागत प्रसव डॉक्टरों की निगरानी में होते हैं, अधिकतर मामलों में सहायक नर्स या आशा कार्यकर्ता मौजूद होती हैं।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>लखनऊ</b>। 27 जून 2020 का दिन सुधा देवी के लिए इतना मनहूस होगा उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा। जिस दिन का इंतजार वो नौ महीने से कर रही थीं वो दिन उनके जिंदगी के सबसे बुरे दिनों में शामिल हो जाएगा किसे पता था।</p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के मझनपुर की रहने वाली सुधा गर्भवती थीं । सुबह 4 बजे सुधा को जब प्रसव पीड़ा हुई तो परिवार ने एम्बुलेन्स को फोन किया । एम्बुलेन्स फोन के <b>4</b> घंटे बाद सुबह <b>8</b> बजे आई और उन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया गया। डॉक्टर के मौजूद न होने की स्थिति में स्टाफ नर्स और दाई शाम 5 बजे तक प्रयास करते रहे। उसके बाद परिवार वालों ने सुधा को अस्पताल से 5 किमी दूर एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया। यहां सुधा ने शाम सात बजे नॉर्मल डिलीवरी से बेटे को जन्म दिया।</p><p dir="ltr">अस्पताल से सुधा को दूसरे दिन छुट्टी भी मिल गई लेकिन घर जाकर बच्चे को सांस लेने में दिक्कत होने लगी। बच्चे को अगली सुबह अस्पताल में भर्ती किया गया लेकिन दूसरे दिन यानि 29 जून को उसकी मृत्यु हो गई।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/02/19/416432-img1.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421lv9uaBixD89GuHHW0yxQccGeMV5HU8Zz9469272" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1613719469342" title="कौशाम्बी जिले में समय से एंबुलेंस न पहुंचने और सरकारी अस्पताल में डॉक्टर न मिलने की वजह से डिलीवरी में काफी समय लगा और दूसरे दिन बच्चे की मृत्यु हो गई, सुधा देवी कहती हैं|फोटो: श्रृंखला पाण्डेय" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1613719469342"><p>कौशाम्बी जिले में समय से एंबुलेंस न पहुंचने और सरकारी अस्पताल में डॉक्टर न मिलने की वजह से डिलीवरी में काफी समय लगा और दूसरे दिन बच्चे की मृत्यु हो गई, सुधा देवी कहती हैं|फोटो: श्रृंखला पाण्डेय</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"बच्चा जब हुआ था तब भी नहीं रोया था लेकिन अस्पताल वालों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। अगर उसी समय उसकी सही देखभाल होती तो आज वो जिंदा होता। हम गरीब लोग हैं इतने पैसे नहीं थे कि अपनी गाड़ी से किसी अच्छे अस्पताल जाते," सुधा ने बताया।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">शिशु मृत्युदर के आंकड़े चौंकाने वाले</span></b></p><p dir="ltr">उत्तर प्रदेश में बाल मृत्यु के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। <a href="https://www.unicef.org/india/hi/%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AC%E0%A4%9A%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A5%87"><u>यूनिसेफ की 2018 </u></a>की रिपोर्ट के मुताबिक यहां हर दिन पांच साल से कम उम्र के करीब 700 बच्चों की मौत हो जाती है।</p><p dir="ltr">बच्चों के अधिकारों पर काम करने वाली गैर सरकारी संस्था <a href="https://www.cry.org/wp-content/uploads/2020/10/an-in-depth-study-on-neonatal-health-in-three-districts-of-uttar-pradesh.pdf"><u>चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राइ) </u></a>ने हाल ही में उत्तर प्रदेश के नवजातों के स्वास्थ्य को लेकर एक अध्ययन किया। इसमें उत्तर प्रदेश के वाराणसी, कौशाम्बी व सोनभद्र जिलों को शामिल किया गया। इस स्टडी में पता चला कि 10 में से 8 नवजात शिशुओं की मौत जन्म के सात दिनों के अंदर हो जाती है। यानि 82% नवजात शिशुओं की मौत जन्म के एक सप्ताह के अंदर हुई। इस स्टडी के अनुसार 78% प्रसव संस्थागत थे लेकिन उनमें केवल 14% प्रसव ही डॉक्टर ने कराए बाकी प्रसव एनएएम (सहायक नर्स) ने कराए थे। जिलेवार देखें, तो वाराणसी में 80% प्रसवों में एएनएम ने सहायता की, जबकि 20% प्रसव डॉक्टर की देखरेख में किए गए। कौशाम्बी में 88% प्रसव एएनएम ने कराए और केवल 12% डॉक्टर ने किए। सोनभद्र के आंकड़ों से पता चलता है कि संस्थागत प्रसवों में 87.5% प्रसवों में एएनएम ने सहायता की और 12.5% डॉक्टर ने किए। निष्कर्ष यह भी बताते हैं कि 17% प्रसवों को किसी भी कुशल या प्रशिक्षित सहायक द्वारा सहायता प्रदान नहीं की गई थी बल्कि दाई या रिश्तेदारों द्वारा मदद ली गयी।</p><p dir="ltr">कौशाम्बी जिले के बैरीपुर गांव की रहने वाली सुनीता मौर्या (28) ने हाल ही में बेटे को जन्म दिया था। सुनीता ने बताया कि जन्म से पहले वो अस्पताल जांच के लिए जाती थीं लेकिन तब डॉक्टर ने सबकुछ नॉर्मल बताया और डिलीवरी के एक दिन बाद मेरा बच्चा नहीं रहा। </p><p dir="ltr">''ज्यादातर मामले जिसमें बच्चों की जन्म के एक या दो दिन में ही मौत हो जाती है उसमें सबसे बड़ा कारण प्रीमेच्योरिटी होती है या बच्चे का वजन कम होना होता है। या फिर बच्चे में कोई जन्मजात दोष होता हो। इससे भी बच्चे की मौत हो सकती है। इसके अलावा एक और बड़ा कारण है बर्थ डिस्फेक्टिया यानि दम घुटना। कई बार बच्चे का माँ के पेट से ही दम घुटने लगता है यानि सांस लेने में दिक्कत होती है ऐसे में भी बच्चे की मौत जन्म के बाद होने की संभावना रहती है,'' लखनऊ की प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ नीलम सिंह ने बताया। </p><p dir="ltr"><a href="https://www.thelancet.com/journals/lancet/article/PIIS0140-6736(20)30471-2/fulltext#sec1"><u>लैसेंट रिपोर्ट</u></a> के मुताबिक भारत में 2017 में पांच साल से कम उम्र के 68% बच्चों की मौत की वजह बच्चे और उसकी माँ का कुपोषण है। 83% शिशुओं की मृत्यु की वजह जन्म के समय कम वजन और समय पूर्व प्रसव होना है।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">आशा व एएनएम के भरोसे गर्भवती महिलाएं</span></b></p><p dir="ltr">ग्रामीण महिला स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी आशा व एएनएम के कंधों पर है। टीकाकरण, पोषण से लेकर प्रजनन संबंधी कई काम इनके ही भरोसे हैं ऐसे में इनकी ट्रेनिंग कैसे होती है ये एक अहम सवाल है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टर का अभाव भी ऐसी स्थिति पैदा करते हैं। </p><p dir="ltr"><a href="https://www.who.int/gho/health_workforce/physicians_density/en/">वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़़ेशन</a> (डब्ल्यूएचओ) के मानकों के हिसाब से हर 1,000 लोगों पर एक डॉक्टर का अनुपात होना चाहिए। उत्तर प्रदेश की जनसंख्या लगभग 20 करोड़ है, <a href="https://censusindia.gov.in/2011census/censusinfodashboard/stock/profiles/en/IND009_Uttar%20Pradesh.pdf">2011 की जनगणना</a> के अनुसार। इस हिसाब से राज्य में कम से कम 20 लाख डॉक्टर होने चाहिए। लोकसभा में <a href="http://164.100.24.220/loksabhaquestions/annex/173/AS90.pdf">7 फ़रवरी 2020 को पेश आंकड़ों के मुताबिक़</a> उत्तर प्रदेश में 30 सितंबर 2019 तक 81,348 एलोपेथिक डॉक्टर ही रजिस्टर्ड थे। यानी राज्य में ज़रूरत के हिसाब से लगभग 60% डॉक्टरों की कमी थी। राज्य की 75% से ज़्यादा आबादी गांवों में रहती है। जहां लोग स्वास्थ्य सेवाओं के लिए प्राथमिक स्वास्थ केंद्र (पीएचसी) और सामुदायिक स्वास्थ केंद्र (सीएचसी) पर निर्भर करते हैं। ग्रामीण इलाक़ों में पीएचसी और सीएचसी दोनों को मिलाकर कुल 3,664 डॉक्टर ही उपलब्ध हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों की जनसंख्या 15.5 करोड़ है। वहीं स्त्री रोग विशेषज्ञ और प्रसूति विशेषज्ञ की बात करें तो <a href="https://main.mohfw.gov.in/sites/default/files/Final%20RHS%202018-19_0.pdf"><u>राज्य में 2019 </u></a>में कुल 2716 पदों की जरूरत थी जिनमें सिर्फ 484 पद कार्यरत हैं और 2232 पद खाली हैं।</p><p dir="ltr">सोनभद्र जिले की आशा बहू सुनीता देवी पिछले 12 साल से आशा बहू हैं। वो बताती हैं, "हमें वजन नापने, आयरन की गोलियां कब कैसे कितनी देनी है, गर्भवती महिलाओं की देखरेख, उन्हें अस्पताल ले जाना, जांच करवाना ये सब काम कैसे करना है ये बताया जाता है। हमें प्राथमिक जानकारी ही होती है।"</p><p dir="ltr">एएनएम कविता देवी ने बताया, ''कई बार ऐसा होता है कि महिला को लेबर पेन शुरू हो जाता है और आस-पास के अस्पताल में कोई डॉक्टर नहीं होता है तो ऐसे में डिलीवरी हमें ही करानी पड़ती है। हम नॉर्मल डिलीवरी तो करा ही सकते हैं इतना अनुभव है। लेकिन जब अचानक कोई दिक्कत आ जाती है तो हमारी समझ से बाहर हो जाता है क्योंकि हम कोई एमबीबीएस डॉक्टर तो हैं नहीं।''</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">माँओं को नहीं मिली प्रसवोत्तर जांच</span> </b></p><p dir="ltr"><a href="https://www.cry.org/wp-content/uploads/2020/10/an-in-depth-study-on-neonatal-health-in-three-districts-of-uttar-pradesh.pdf"><u>क्राइ (CRY)</u></a> की स्टडी में ये बात भी सामने आई थी कि केवल 28% माताओं के बच्चों को ही जन्म के पहले हफ्ते में प्रसवोत्तर जांच मिली।</p><p dir="ltr">सोनभद्र जिले के राबर्ट्सगंज ब्लॉक के अमौली गांव में रहने वाली रजनी यादव पांचवी बार माँ बनने वाली थीं। उनकी डिलीवरी एएनएम के घर में हुई थी लेकिन बच्चे की दूसरे दिन मौत हो गई। रजनी के जच्चा बच्चा कार्ड में एएनसी (प्रसव पूर्ण होने वाली देखभाल व जांचें) के चारों जांचें दर्ज थीं लेकिन रजनी का कहना है कि उनकी सिर्फ दो ही जांच हुई थी। रजनी ने ये भी बताया कि उनके गांव से स्वास्थ्य उपकेंद्र की दूरी महज 5 किमी है लेकिन वहां पर कोई भी प्रसव नहीं कराया जाता सभी की डिलीवरी एएनएम के घर पर ही होती है। एएनएम अपने घर के एक कमरे में सभी का प्रसव कराती हैं।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/02/19/416435-img2.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421PaMcMM9N3mQHZAv4rVpBDNnT8oCTbWQE9543928" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1613719545350" title="सोनभद्र जिले की रहने वाली रजनी के बच्चे की जन्म के दूसरे दिन ही मृत्यु हो गई। बच्चे का प्रसव डॉक्टर की अनुपस्थिति में एएनएएम ने घर पर कराया था। फोटो: श्रृंखला पाण्डेय" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1613719545350"><p>सोनभद्र जिले की रहने वाली रजनी के बच्चे की जन्म के दूसरे दिन ही मृत्यु हो गई। बच्चे का प्रसव डॉक्टर की अनुपस्थिति में एएनएएम ने घर पर कराया था। फोटो: श्रृंखला पाण्डेय</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">हमने एएनएम से बच्चे की मौत का कारण और अस्पताल में प्रसव न होने का कारण पूृछा तो उन्होंने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि अक्सर ऐसा होता है कि दोपहर दो बजे के बाद अस्पताल में कोई डॉक्टर नहीं होता ऐसे में मरीज को ज्यादा दिक्कत होती है। गर्भवती महिला की पहले की जांचों में अगर कोई समस्या वाली बात नहीं रहती तो हम लोग ही डिलीवरी करा देते हैं इसलिए लोग सीधे घर ही आ जाते हैं।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">बच्चे की मौत पर एएनएम ने बताया कि बच्चे की पसली ठीक चल रही थी लेकिन पता नहीं अचानक क्या हुआ। हमने वो सबकुछ किया था जो प्रसव के बाद किया जाना चाहिए था। डिस्चार्ज के बारे में पूछने पर एएनएएम ने बताया कि जगह की कमी होने के कारण 4 घंटे बाद हमने जच्चा-बच्चा को घर भेज दिया था।</p><p dir="ltr">इंडिया स्पेंड ने जब इस बारे में सोनभद्र के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ नेम सिंह से बात की तो उन्होंने कहा जिले में डॉक्टरों की कमी नहीं है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में कई बार ऐसी शिकायत मिलती है कि डॉक्टर समय पर नहीं रहते। हम ऐसी जगहों पर निगरानी की कड़ी व्यवस्था कर रहे हैं।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">कैग की रिपोर्ट में भी मौत के आंकड़े छुपाने की बात</span></b></p><p dir="ltr">उत्तर प्रदेश में बच्चों के मौत के आंकड़े छुपाए जाने की बात <a href="https://cag.gov.in/uploads/download_audit_report/2019/Chapter_5_Maternity_Services_of_Report_No_2_of_2019_Hospital_Management_in_Uttar_Pradesh_Government_of_Uttar_Pradesh.pdf"><u>कैग </u></a>(CAG) की रिपोर्ट में भी सामने आई है। कैग ने 2018 में यूपी के अस्पतालों में ऑडिट किया था जिसमें ये बात सामने आई। इस रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में मृत नवजातों के आंकड़ों को जिला अस्पताल में रिकार्ड नहीं किया गया। कैग की रिपोर्ट में ये भी पाया गया कि किसी भी अस्पताल ने जांच के दौरान पीएनसी नहीं रजिस्टर की है। पीएनसी डिलीवरी के बाद होने वाली जटिलताओं को कम करने में सहायक होती है। इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया कि नवजात शिशु की मृत्यु मातृ स्वास्थ्य और जन्म के बाद बच्चे की देखभाल की ओर संकेत करती है। नियम के अनुसार अस्पतालों में एनएचएम टूलकिट रखने का प्रावधान है, जिससे अस्पतालों के लेबर रूम में हर महीने होने वाले नवजात शिशु की मौत, कारण सहित दर्ज हो। लेकिन कैग ने ऑडिट के दौरान ये पाया कि अस्पतालों के पास ऐसा कोई भी रिकार्ड नहीं है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों के अस्पतालों के पास प्रसव के दौरान होने वाली मृत्यु का कोई रिकार्ड नहीं था। न ही अस्पतालों में इमरजेंसी दवाएं व समय से पहले होने वाली डिलीवरी को नियंत्रित करने वाले इंजेक्शन मौजूद थे। </p><p dir="ltr">यूपी सरकार के मुताबिक, राज्य में प्रति 100 गर्भवती में से 1. 63% बच्चे मृत पैदा हुए जबकि कैग की रिपोर्ट में ये आंकड़ा 2.2% का है और 0.8% प्रेग्नेंसी के क्या परिणाम हुए इसका कोई रिकार्ड ही नहीं है।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">शिशु मृत्युदर के कारणों को गंभीरता से लेने की जरूरत</span></b></p><p dir="ltr">चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राइ) की क्षेत्रीय निदेशक सोहा मोइत्रा ने इंडियास्पेंड से कहा, "नवजात शिशुओं की मौत को लेकर क्राइ कौशाम्बी के 60 , वाराणसी के 50 गांवों (ग्रामीण) और सोनभद्र के 28 गांवों में काम कर रहा है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत की वजह भले निमोनिया और डायरिया हो लेकिन जब बच्चे की मौत जन्म के कुछ घंटों बाद या दो, तीन दिन में हो जाती है तो इसके पीछे सबसे बड़ी वजह रेस्पिरेट्री डिस्ट्रेस सिंड्रोम हो सकता है यानि बच्चा सांस लेने में तकलीफ महसूस करे।" </p><p dir="ltr">उन्होंने आगे ये भी कहा कि, "भारत में 2018 में नवजात शिशु मृत्युदर 1000 जीवित पर 23 थी। ग्रामीण क्षेत्रों में इसके पीछे का कारण स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच का न होना और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी भी है। इसके अलावा महिलाओं में एनीमिया की वजह से जन्म के समय में बच्चे का कम वजन भी मौत का एक कारण हो सकता है। संस्थान ने इस शोध के जरिये नवजात मृत्यु के पीछे के कारणों और इसे रोकने के लिए सिस्टम, समुदाय और व्यक्तिगत स्तर पर किए जा सकने वाली आवश्यक कार्रवाई को गहराई से तब्दील करने की आवश्यकता महसूस हुई"। </p><p dir="ltr">क्राइ की स्टडी में भी ये बात सामने आई है कि अधिकांश महिलाओं के सामान्य प्रसव (89%) और उनमें से लगभग आधी (44%) महिलाओं में खून की कमी के कारण और महिलाओं के वजन में कमी के कारण हाई रिस्क प्रेगनेंसी थी। इन सभी हाई रिस्क प्रेगनेंसी में से (29 %) प्रसव घर में हुए है।</p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="https://indiaspendhindi.com/economy-policy/mail%20to:%20respond@indiaspend.org"><i>respond@indiaspend.org</i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i><br></p><div><br></div></div><p><br></p>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/health/how-will-uttar-pradeshs-infant-mortality-rate-improve-728597</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/health/how-will-uttar-pradeshs-infant-mortality-rate-improve-728597</guid>
<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश,कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,सेहत,सेहतकीपड़ताल,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[श्रृंखला पांडेय]]></dc:creator>
<pubDate>Fri, 19 Feb 2021 07:37:28 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/02/19/500x300_416450.jpgnet-compress-image-7.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल्ली की महिलाओं पर महामारी की गाज, छीन लिया रोज़गार]]></title>
<description><![CDATA[कोविड-19 महामारी ने दिल्ली जैसे महानगरों में जीवनयापन करने वाली महिलाओं को खासा नुकसान पहुंचाया। एक तरफ जहां संगठित क्षेत्र में नौकरी करने वाली महिलाओं को वेतन कटौती और छटनी के रूप में मुश्किलों का सामना करना पड़ा, वहीं असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं का रोज़गार छिन गया जिससे भोजन और बच्चों की शिक्षा जैसी मूलभूत ज़रूरतों की पूर्ति पर भी ग्रहण लग गया।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>नई</b><b> </b><b>दिल्ली</b> : "लॉकडाउन के दौरान कोई कामकाज नहीं बचा था। हमारे लिए दिन में एक बार भोजन करना भी मुश्किल हो गया था। कुछ दिनों तक मैं रिठाला के एक औद्योगिक क्षेत्र में कचरे के ढेरों और गलियों में कबाड़ खोजने जाती थी, जिसे बेचा जा सके। लेकिन पिछले कुछ महीनों में कबाड़ की कीमत भी कम हो गई है और इन दिनों कबाड़ को खोजना भी ज्यादा मुश्किल हो गया है। लॉकडाउन से पहले जहां मैं 35-40 रुपये प्रति किलोग्राम में कबाड़ बेचती थी, लॉकडाउन में दाम घटकर 10 रुपये प्रति किलोग्राम रह गया है।"<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">उपरोक्त शब्द हैं, 29 वर्षीय लुतफुन निशा के, जो उत्तर-पश्चिम दिल्ली में <a href="https://www.indiaspend.com/sanitation-workers-at-risk-from-discarded-medical-waste-related-to-covid-19/"><u>कचरा</u><u> </u><u>इकट्ठा करने</u><u> </u><u>का काम </u></a>करती है। यह ऐसा इलाका है जहां राष्ट्रीय राजधानी की लगभग <a href="https://www.indiaspend.com/uploads/2020/12/14/file_upload-356947.pdf"><u>20% आबादी </u></a>रहती है। इन्हीं में से एक है निशा, जो अपने माता-पिता व आठ साल के बेटे के साथ 90 वर्ग फुट की एक झुग्गी में रहती हैं। दिसंबर 2020 की बात है। निशा ने <b>इंडियास्पेंड</b> को फोन पर बताया कि हमें पिछले वर्ष बमुश्किल भोजन मिला था। पहले वह हर महीने कुछ हजार रूपये तक कमा लेती थी और किसी तरह गुजारा चल जाता था, लेकिन अब एक महीने में आधा किलो चावल प्रति व्यक्ति से घटकर चौथाई किलो पर आ गया है। लॉकडाउन के दौरान एक वक्त भी पेट भरकर खाना नहीं मिला। यूएन वूमेन की सितंबर 2020 की एक <a href="https://www.unwomen.org/en/digital-library/publications/2020/09/gender-equality-in-the-wake-of-covid-19"><u>रिपोर्ट</u><u> </u></a>के अनुसार, कोविड-19 महामारी के पहले महीने में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की आमदनी में 60% तक की कमी हुई थी। वैश्विक स्तर पर असंगठित अर्थव्यवस्था में शामिल लगभग 74 करोड़ महिलाओं में से लुतफुन निशा भी एक हैं।</p><p dir="ltr">भारत की राजधानी और देश के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य दिल्ली में करीब 97.5% <a href="https://www.census2011.co.in/facts/topstateurban.html"><u>शहरी आबादी </u></a>निवास करती है। जहां मई से अगस्त 2020 के बीच <a href="https://www.mha.gov.in/sites/default/files/Unlock3_29072020.pdf"><u>अनलॉक </u></a>के पहले तीन चरणों के दौरान श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) 33% के साथ सबसे कम और बेरोज़गारी दर (23.3%) चौथे स्थान पर सबसे अधिक रही थी। <a href="https://www.cmie.com/"><u>सेंटर</u><u> </u><u>फॉर</u><u> </u><u>मॉनिटरिंग</u><u> </u><u>इंडियन</u><u> </u><u>इकनॉमी</u></a> (सीएमआईई) के <a href="https://www.indiaspend.com/uploads/2021/01/13/file_upload-382884.pdf"><u>आंकड़ों </u></a>में बताया गया। एलएफपीआर भारत में काम करने वाले सभी उम्र के लोगों का अनुपात है जिनके पास या तो रोज़गार है या नौकरी की तलाश में हैं। बेरोज़गारी दर, श्रम बल में उन लोगों का अनुपात है जिनके पास नौकरी नहीं है। सीएमआईई के आंकड़ों के अनुसार, लैंगिक आधार पर दिल्ली में पुरुषों की 57% एलएफपीआर की तुलना में महिला एलएफपीआर 5.5% है, जबकि पुरुषों की 21% की बेरोज़गारी दर की तुलना में महिलाओं के लिए यह आंकड़ा 47% का है।</p><p dir="ltr"><a href="https://www.indiaspend.com/uploads/2020/12/14/file_upload-356954.pdf"><u>पीएलएफएस</u><u>, 2018-19</u></a> के आंकड़ों पर गौर करें तो तब भारत की एलएफपीआर 50.2% थी। ऐसा लगता है कि महामारी की वजह से बेरोज़गारी और बढ़ गई। सीएमआईई के अनुसार मई से अगस्त 2020 के बीच एलएफपीआर घटकर 40.2% रह गई। महिलाओं की श्रम भागीदारी दर 9.3% थी और इसकी तुलना में पुरुषों के लिए यह आंकड़ा 67.4% का था। शहरों में महिलाओं की बेरोज़गारी दर 21.9% रही और इसकी तुलना में शहरों में पुरुषों के लिए यह दर 11.7% की थी।</p><p dir="ltr">दुनिया भर में और भारत में भी यह बात किसी से छिपी नहीं है कि महिलाओं को बेहतर नौकरियाँ कम ही दी जाती हैं और<a href="https://www.indiaspend.com/womenwork/women-hold-up-the-economy-yet-they-continue-to-disappear-from-workforce-701865"> <u>नौकरियों जैसे ही कम होती हैं</u></a><u> </u>उन्हें ही सबसे पहले बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। "दिल्ली में नौकरियाँ खोजने वाले लोगों (पहले के निवासी और शहर में नए आने वाले दोनों) और नौकरियों की कुल उपलब्धता के बीच गहरी खाई है। पहले से चली आ रही आर्थिक मंदी और अब महामारी की वजह से स्थिति बहुत ही खराब हुई है। आने वाले वक्त में इस बात की आशंका प्रबल है कि इसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा महिलाओं को ही भुगतना होगा", ऐसी विकास अर्थ-शास्त्री जयंती घोष का कहना है।</p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div class="h-embed" contenteditable="false"><div class="h-embed-wrapper desktop-only-embed"><iframe src="https://e.infogram.com/e384af3b-5df3-4e76-9647-efd3418243af?src=embed" title="Decline In Women In The Labour Force, 2004-05 to 2018-19" width="700" height="500" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></div></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><br></p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div class="h-embed" contenteditable="false"><div class="h-embed-wrapper mobile-only-embed"><iframe src="https://e.infogram.com/e384af3b-5df3-4e76-9647-efd3418243af?src=embed" title="Decline In Women In The Labour Force, 2004-05 to 2018-19" width="320" height="500" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></div></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">इस रिपोर्ट में हमने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली जिसे एक विश्व-स्तरीय शहर कह सकते हैं, में महिला कर्मियों की स्थिति की समीक्षा की है जहां रोज़गार की दर<a href="http://delhiplanning.nic.in/content/economic-survey-delhi-2018-19"> <u>1981 से ही लगभग स्थिर</u></a> रही हैं। महिलाओं की कामकाज में भागीदारी लंबे समय से कम दिख रही है, लेकिन महामारी ने तो बची-खुची चीजें भी लगभग खत्म सी कर दी है। निश्चित रूप से दिल्ली में असंगठित क्षेत्र के कर्मियों को बड़ा नुकसान हुआ है और बहुत सी महिलाओं ने अपनी नौकरी या कामकाज गँवाना है। संगठित क्षेत्र में भी महिलाओं ने काफी मुश्किलों का सामना किया है जिनमें वेतन कटौती से लेकर छटनी तक शामिल हैं। बिना भुगतान वाले घरेलू कार्य का बोझ बढ़ने से संकट और बढ़ा है।<a href="https://populationfoundation.in/"> </a>"दिल्ली के संदर्भ में बात करें तो नौकरी पर जाने के लिए यात्रा में अधिक समय लगना, कार्य के घंटे और सुरक्षा जैसे मुद्दों से महिलाओं को काफी जूझना पड़ा है जिससे श्रम बल में उनकी हिस्सेदारी में काफी कमी दर्ज की गई है।", <a href="https://populationfoundation.in/"><u>पॉपुलेशन फ़ाउंडेशन ऑफ इंडिया</u></a> की वरिष्ठ मैनेजर, संघमित्रा सिंह का कहती हैं।<br></p><p dir="ltr"> <b><span style="font-size: 22px;">एक से अधिक शिफ्ट में कार्य करना बड़ी चुनौती</span></b></p><p dir="ltr">दिल्ली के ओखला औद्योगिक क्षेत्र में रहने वाली 38 साल की दुर्गा देवी नेहरू प्लेस और ग्रेटर कैलाश में तीन घरों में घरेलू कार्य करती हैं। लॉकडाउन की<a href="https://pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1607997"> <u>घोषणा</u></a> होने के दिन ही उसे तीनों घरों के मालिकों ने काम पर आने से मना कर दिया। अपने दुख-दर्द को बयान करते हुए दुर्गा ने बताया, "मैं एक दशक से अधिक समय से इन घरों में कार्य कर रही थी और मुझे कुल 9,000 रुपये की आमदनी होती थी। अचानक से यह काम खत्म हो गया। लॉकडाउन के दौरान कोई वेतन भी इन लोगों ने मुझे नहीं दिया।"</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/02/15/411700-durga-devi.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421G4sZO0CBOrHcYi92hhzqnTzcXCPmAaUa2620809" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1613392623161" title="दुर्गा देवी, जो बिहार के मधुबनी के गाँव से 20 साल पहले आयी थीं, दिल्ली के ओखला में अपने घर पर" alt="दुर्गा देवी, जो बिहार के मधुबनी के गाँव से 20 साल पहले आयी थीं, दिल्ली के ओखला में अपने घर पर" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1613392623161"><p>दुर्गा देवी, जो बिहार के मधुबनी के गाँव से 20 साल पहले आयी थीं, दिल्ली के ओखला में अपने घर पर</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">तीन बच्चों की मां, दुर्गा बिहार के मधुबनी से 20 साल पहले आई थी। हालांकि पति की सिक्योरिटी गार्ड के तौर पर नौकरी तो बची रही, लेकिन दोबारा काम शुरू होने में छह महीने लग गए। ये दौर बेहद मुश्किल के थे। भोजन तक में "कटौतियां" करनी पड़ी मसलन भोजन में दो के बजाय एक आलू खाना।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"मेरे बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई के लिए एक कंप्यूटर की जरूरत थी। हम इसे नहीं खरीदते तो उसकी पढ़ाई पर असर पड़ता", <b>इंडियास्पेंड </b>से बातचीत में दुर्गा ने बताया। यूएन वूमेन की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में 72% घरेलू कर्मियों ने कोविड-19 महामारी के कारण अपनी नौकरियां खो दी, जिनमें से 80% महिलाएं है।</p><p dir="ltr"><a href="http://mospi.nic.in/about-ministry-0"><u>नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस</u></a> के एक सर्वे<a href="http://mospi.nic.in/sites/default/files/publication_reports/Report_TUS_2019_0.pdf?download=1"> <u>टाइम यूज इन इंडिया-2019</u></a> के अनुसार, महिलाएं घर पर बिना भुगतान वाले घरेलू कार्य में लगभग पांच घंटे लगाती हैं और इसकी तुलना में पुरुष केवल डेढ़ घंटा ही लगाते हैं। दुर्गा के जीवन की ही दिनचर्या ले लें, वह सुबह 5.30 बजे उठ जाती हैं और 8.30 पर कार्य शुरू करने से पहले अपने परिवार के लिए खाना पकाकर और सफाई करके जाती हैं। शाम को घर लौटने के बाद वह रात का भी भोजन बनाती हैं और अपने बच्चों की देखभाल भी करती हैं। दुर्गा बताती हैं, "मुझे कोई छुट्टियाँ नहीं मिलती, वीकेंड पर भी नहीं। जब बच्चों की परीक्षाएं या स्कूल से जुड़े मसले होते हैं तो मुझे एक दिन की छुट्टी लेनी पड़ती है और उसके लिए मेरा पैसा काट लिया जाता है।"</p><p dir="ltr">एक और अहम बात यह भी है कि महामारी की वजह से घर में देखभाल की ज़िम्मेदारी काफी बढ़ गई है और इसका बोझ महिलाओं को ही उठाना पड़ता है। "आर्थिक सुरक्षा की कमी के साथ ही देखभाल का बोझ अधिक होने से बहुत सी महिलाओं के रोज़गार के बाजार से पूरी तरह बाहर होने का खतरा मंडराने लगा है। पिछली महामारियों पर गौर करें तो तय मानिए, इससे इन महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को भी नुकसान होगा। दिल्ली में अधिकतर नौकरियाँ सर्विस सेक्टर में हैं। जिनके लिए उच्च शैक्षिक योग्यताओं की जरूरत है, जो समाज के कमजोर तबक़ों से आने वाली महिलाओं के लिए हासिल करना मुश्किल होगा", संघमित्रा सिंह इस बारे में बात करते हुए कहती है। महामारी के दौरान, नौकरियाँ गँवाने की शुरुआत महिलाओं से ही सबसे पहले शुरू हुई थी और इसके साथ ही उन्होंने 'टाइम पोवर्टी' का भी सामना किया। टाइम पोवर्टी का मतलब घर की देखभाल करने में अधिक समय बिताने और घरेलू काम करने से है जिसके लिए उन्हें कोई भुगतान नहीं मिलता है।<br></p><p dir="ltr">"यह एक कड़वा सच है कि महिलाओं के समय को अहमियत नहीं दी जाती है। खाना पकाने और सफाई में तकनीकी चीजों को छोड़ दिया जाए तो, चार दशक पहले जब रसोई में प्रेशर कुकर का बहुत कम इस्तेमाल होता था, क्या तब पुरुष रसोई के काम में महिलाओं की मदद करते थे? जवाब है- न के बराबर। दरअसल भारत में अन्य विकासशील देशों की तुलना में घरेलू कार्य में पुरुषों की भागीदारी सबसे कम है।"  <a href="http://www.ranchiuniversity.ac.in/phocadownload/Official_Document/6_Economics.pdf"><u>रांची</u><u> </u><u>यूनिवर्सिटी</u></a> के अर्थ-शास्त्र विभाग में अतिथि प्रोफेसर जीन ड्रेज का ऐसा मानना है।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">जीवन को मुश्किल बनाती नौकरी की अनिश्चितता</span></b></p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/02/15/411704-mehrunissa.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="44212qaxS2pPkCT8rLw8TNcYdcVyhIjx5JoY2699094" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1613392701352" title="मेहर-उन-निसा अपने और अपने पडोसी के बच्चों के साथ दिल्ली के ओखला में अपने घर पर । वो कुछ साल पहले अच्छी ज़िन्दगी की तलाश में बिहार के मोतिहारी से दिल्ली आयी थीं ।" alt="मेहर-उन-निसा अपने और अपने पडोसी के बच्चों के साथ दिल्ली के ओखला में अपने घर पर । वो कुछ साल पहले अच्छी ज़िन्दगी की तलाश में बिहार के मोतिहारी से दिल्ली आयी थीं ।" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1613392701352"><p>मेहर-उन-निसा अपने और अपने पडोसी के बच्चों के साथ दिल्ली के ओखला में अपने घर पर । वो कुछ साल पहले अच्छी ज़िन्दगी की तलाश में बिहार के मोतिहारी से दिल्ली आयी थीं ।</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">दिल्ली के ओखला स्थित किराये के घर में अपने और पड़ोसी के बच्चों के साथ बैठी मेहर-उन-निसा अपने परिवार के लिए बेहतर जीवन की उम्मीद लेकर कुछ साल पहले ही बिहार के मोतिहारी जिले से राजधानी दिल्ली आई थी। यहां एक गारमेंट फ़ैक्टरी में उन्हें नौकरी मिली। लेकिन इससे वो अपने महीने का खर्चा बहुत मुश्किल से चला पाती हैं।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">30 साल की मेहर-उन-निसा इन दिनों एक 'अर्जेंट शिपमेंट' के चलते वस्त्र निर्यात की फ़ैक्टरी में नौकरी करती है। जिसमें उन्हें सुबह 9.30 बजे से शाम के 6.30 बजे तक कपड़ों पर कढ़ाई का काम करना होता है। इसके अलावा दो घंटे का ओवर-टाइम भी उपलब्धता के आधार पर करती हैं। मेहर-उन-निसा का साफ-तौर पर कहना है कि अगर वह नौकरी नहीं करेगी तो उसे भोजन नहीं मिलेगा। पांच लोगों के परिवार में मेहर अकेली कमाने वाली है। पिछले साल मार्च से जून के बीच उसके पास कोई नौकरी नहीं थी और स्वयंसेवकों की ओर से मिलने वाले भोजन पर परिवार का गुजारा होता था। उसके 50 वर्षीय पति को डायबिटीज़ है और घुटने में लगातार दर्द की वजह से वह कोई काम नहीं कर सकें। वह अपने मासिक वेतन 6,000 रुपये और ओवर-टाइम मिलने पर 7,000 रुपये पर ही आश्रित है। जिससे वह अपने तीन बच्चों के भोजन और 2,000 रुपये घर का किराया चुकाती है। देर शाम को घर जाते हुए मेहर ने इंडियास्पेंड को फोन पर बताया, "मैं कोई बचत नहीं कर पाती। आमतौर पर फ़ैक्टरी से मुझे घर छोड़ा जाता है लेकिन कुछ दिनों से यह सुविधा नहीं मिल रही है। मुझे एक ऑटोरिक्शा लेना पड़ता है, जो काफी महँगा पड़ता है।"</p><p dir="ltr">वर्ल्ड बैंक ने पिछले वर्ष अक्टूबर में कहा था, महामारी के नकारात्मक आर्थिक प्रभाव से 2020 में 8.8 करोड़ और लोग गरीबी के कुचक्र में फँस जाएंगे। यूएन वूमेन की रिपोर्ट में यह आंकड़ा करीब 9.6 करोड़ बताया गया है, जिनमें 4.7 करोड़ महिलाएं और लड़कियाँ हैं। दक्षिण एशिया में महामारी से पूर्व महिला गरीबी दर 2021 में 10% होने का अनुमान था, लेकिन अब यह 13% पर पहुंच सकता है। 2030 तक दुनिया की गरीब महिलाओं में से 18.6% दक्षिण एशिया में होंगी, यह महामारी के पहले के अनुमानों से 2.8% अधिक है। यूएन वूमेन की मानें तो 2021 में, दुनिया भर में हर 100 पुरुषों पर 118 महिलाएं गरीबी में होंगी। यह अनुपात 2030 तक बढ़कर 121:100 हो सकता है।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">आज़ादी के </span></b><b><span style="font-size: 22px;">73</span></b><b><span style="font-size: 22px;"> साल बाद भी लिंग भेद बरकरार</span></b></p><p dir="ltr">आज़ादी के 73 साल बाद भी भारत में महिलाओं के कार्य में सबसे बड़ी बाधा समाज का लैंगिक ढाँचा है। महिलाओं के कार्य को पहचान न मिलना और उनके लिए कार्य स्थितियाँ और श्रम का विभाजन जैसी कमियाँ आज भी बरकरार हैं। "महिलाओं की अधिकतर आर्थिक गतिविधि दिखती नहीं है। सांस्कृतिक रुकावटें राज्यों और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हैं। उदाहरण के लिए, दक्षिण भारत में स्थिति उत्तर भारत की तुलना में काफी अलग है", ऐसा जयंती घोष महिलाओं की स्थिति के बारे में बात करते हुए कहती हैं।, महिलाओं में एक और बड़ी समस्या शारीरिक सुरक्षा की है जो कार्यस्थल पर जाने और वापस लौटने को लेकर है। "ग्रामीण क्षेत्रों में एक विशेष आयु के बाद लड़कियों को स्कूल नहीं भेजा जाता, क्योंकि उनपर यह रोक होती है कि वे कितनी दूर तक यात्रा कर सकती हैं। यह एक नियंत्रण का मामला भी है कि परिवार की अनुमति के बिना आप यात्रा नहीं कर सकते। आने-जाने पर काफी नियंत्रण रखा जाता है", इस बारे में घोष आगे बताती हैं।</p><p dir="ltr">पॉपुलेशन फ़ाउंडेशन ऑफ इंडिया की संघमित्रा सिंह कहती हैं कि इस लिहाज से दिल्ली बहुत अलग नहीं है जहां ट्रांसपोर्ट सिस्टम और आवाजाही की समस्या है। यह कामकाजी महिलाओं के लिए अवसरों में बड़ी रुकावट के तौर पर  है। ये रुकावटें ग्रामीण क्षेत्रों या कम आमदनी वाले वर्ग में महिलाओं तक ही सीमित नहीं हैं। हरियाणा में गुरुग्राम की 42 वर्षीय दिव्या शेषन एक मानव संसाधन प्रोफेशनल और एकल मां हैं। लॉकडाउन के दौरान दिव्या की नौकरी चली गई थी। दिव्या बताती हैं, "मैं एक स्टार्टअप में नौकरी करती थी और मुझे समय पर वेतन नहीं मिलता था। महामारी शुरू होने पर वेतन मिलना बंद हो गया था। कुछ समय बाद एक अन्य नौकरी मिली लेकिन वेतन 40% घट गया था। मेरे पास 15 वर्ष का अनुभव है और मुझसे पहला प्रश्न यह पूछा गया कि क्या अपनी आयु और एक बच्चे को देखते हुए ठीक से नौकरी कर सकेंगी। वे ऐसी स्थिति में एक पुरुष से कभी यह सवाल नहीं पूछते।"</p><p dir="ltr">लॉकडाउन में घर से कार्य करने के दौरान, दिव्या से पूछा गया था कि खाना, सफाई और उनके बेटे की पढ़ाई का ध्यान कौन रखेगा। दिव्या ने कहा, भारत में महिलाओं के कार्य के प्रत्येक कदम पर रुकावटें हैं, जिसमें जातिवाद भी शामिल है। इसके साथ ही एक गलत धारणा यह भी है कि विकल्प मिलने पर कंपनियां एकल मां की बजाय एकल महिला को प्राथमिकता देती हैं। जयंती घोष बताती हैं, दोहरे मापदंड के ये उदाहरण एक बड़ी रुकावट हैं और इन्हें सामने लाना बहुत जरूरी है। इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि कोविड-19 के दौरान मध्यम वर्ग के लोगों का उनके घरेलू सहायकों के साथ व्यवहार कैसा रहा। महामारी के सबसे बुरे दौर में, इन सहायकों को वेतन नहीं दिया गया और उन्हें घर में आने की अनुमति भी नहीं थी। इस परिस्थिति में घर की महिलाओं ने भी उन्हें संदेह की नज़रों से देखा था।</p><p dir="ltr">भारतीय समाज को कामकाजी महिलाओं के प्रति नज़रिया बदलने की जरूरत है। जीवन की बुनियादी सुविधाओं से जुड़े क्षेत्रों में सिंगल वूमन को काफी मुश्किलातों का सामना करना पड़ता है। मसलन, चाहे वो सरकारी विभाग के अधिकारी हों या फिर बैंकों से जुड़े मसले महिलाओं की खुद की पहचान को अभी भी अनदेखा किया जाता है, ऐसा दिव्या का मानना है। एक सरकारी दफ्तर में मेरे पूर्व पति का नाम मेरे बेटे के एक फॉर्म में भरने को कहा गया वो भी स्वर्गीय लगाकर, जबकि वो जिंदा हैं। इसी तरह बैंक के लोन अधिकारी मेरे खुद के अपार्टमेंट के कोलेटरेल सिक्योरिटी को दरकिनार कर बैकअप आय को लेकर प्रताड़ित करने की कोशिश की। मुझे एक सलाहकार ने सलाह भी दी कि नौकरी पाने से पहले मुझे एक ग्रूमिंग सेशन की सख्त जरूरत है। यहां मेरा सवाल यही है कि क्या एच.आर. के पद को पाने के लिए मुझे इंटरव्यू में आकर्षक दिखना जरूरी है? बात यहीं खत्म नहीं होती है। हमारे पड़ोसी ने एक कैमरा लगा रखा है सिर्फ ये देखने के लिए कि मेरे घर कौन आता-जाता है। बहरहाल, कामकाजी महिलाओं और खासतौर से सिंगल वूमन के लिए अभी भी दिल्ली जैसे महानगरों में नौकरी करना और अपने तरीके से जीने की आज़ादी नहीं है, अपने अनुभवों को साझा करते हुए दिव्या आगे बताती है। </p><p dir="ltr">(यह खबर <a href="https://www.indiaspend.com/"><u>इंडियास्पेंड </u></a>में प्रकाशित की गई <a href="https://www.indiaspend.com/womenwork/how-the-pandemic-affected-urban-working-women-714688"><u>खबर </u></a>का हिंदी अनुवाद है।)</p><p dir="ltr">हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया <a href="mailto:respond@indiaspend.org">respond@indiaspend.org</a> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं</p><div><br></div></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/womenwork/from-delhi-a-view-of-womens-work-hit-by-the-pandemic-727000</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/womenwork/from-delhi-a-view-of-womens-work-hit-by-the-pandemic-727000</guid>
<category><![CDATA[Development,कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,नारी श्रमशक्ति,महिलाएं,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[शालिनी सिंह]]></dc:creator>
<pubDate>Mon, 15 Feb 2021 13:38:24 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/02/16/500x300_412264-slide2.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बजट-2021 में रोज़गार बढ़ाने का पुख्ता इंतजाम नहीं : विशेषज्ञ]]></title>
<description><![CDATA[रोज़गार के मुद्दे पर आर्थिक विशेषज्ञों का साफ-तौर पर कहना है कि केंद्रीय बजट 2021-22 में शहरी क्षेत्रों में रोज़गार को लेकर कोई नया प्रावधान नहीं है और लघु उद्यमियों को भी मामूली राहत दी गई है। ग्रामीण रोज़गार कार्यक्रमों के लिए भी इस बजट में मात्र 73 हज़ार करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो 2020-21 के संशोधित अनुमानित आवंटन 1,11,500 करोड़ से 35% कम और अपर्याप्त हैं।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>बेंगलुरु एवं मुंबई: </b>कोरोना महामारी और लॉकडाउन की वजह से भारत में जिस तरह का <a href="https://www.indiaspend.com/economy/millions-have-been-forced-into-self-employment-715974"><u>रोज़गार संकट </u></a>खड़ा हो गया है, उससे निपटने के लिए केंद्रीय बजट 2021-22 के पूंजीगत खर्च में <a href="https://www.indiabudget.gov.in/doc/Budget_Speech.pdf"><u>34</u></a>% की बढ़ोतरी को काफी कम करके आंका जा रहा है। 2020-21 की बात करें तो पूंजीगत खर्च 4 लाख 12 हजार करोड़ रुपये का था, जिसे बढ़ाकर अब 2021-22 के बजट में 5 लाख 54 हजार करोड़ रुपये किया गया है।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">हालांकि दीर्घकालिक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को प्रोत्साहित करना अच्छी बात है, लेकिन इससे बहुत अधिक नौकरियां पैदा हो जाएंगी, यह सोचना गलत होगा, ऐसा आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है। इसके अलावा इस बजट में 2019 और 2020 में सामाजिक सुरक्षा तथा सर्वमान्य न्यूनतम मज़दूरी से जुड़े <a href="https://pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1657898"><u>प्रावधानों </u></a>को बस दोहराया गया है।</p><p dir="ltr">इस बजट के आवंटन पर गौर फरमाएं तो 'मनरेगा' यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के बजट आवंटन में भी कटौती कर दी गई है। यह भारत के गाँवों में रोज़गार सृजन की सबसे अहम योजना है। लॉकडाउन के दौरान रोज़गार गँवाकर घर लौटने वाले <a href="http://mnregaweb4.nic.in/netnrega/all_lvl_details_dashboard_new.aspx?Fin_Year=2020-2021&amp;Digest=ueg/HtV54GGJ8ZQ6GUB2ew"><u>लाखों प्रवासी मज़दूरों </u></a>के लिए 'मनरेगा' जीवनदायिनी साबित हुई थी। शहरी क्षेत्रों में भी रोज़गार बढ़ाने के लिए किसी भी तरह का क़दम नहीं उठाया गया है जबकि कोरोना से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दबाव को कम करने के लिए आजीविका से जुड़ी एजेंसियों ने इसकी पुरजोर <a href="https://www.indiaspend.com/indias-job-crisis/will-new-labour-laws-drive-job-creation-in-2021-708372"><u>वकालत </u></a>की थी।</p><p dir="ltr">श्रम और रोज़गार मंत्रालय को <a href="https://www.indiabudget.gov.in/doc/eb/sbe63.pdf"><u>13,306.5 करोड़ ($1.82 बिलियन) आवंटित </u></a>किए गए हैं जो 2020-21 की संशोधित आवंटन से 413 करोड़ रुपये कम हैं। इसमें भी श्रमिकों के लिए मौजूद सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं के बजट को 3.4% कम करके 11,104 करोड़ ($ 1.52 बिलियन) कर दिया गया है। दिसंबर 2019 यानी लॉकडाउन की घोषणा से चार महीने पहले भारत के कुल मानव संसाधन का 48% हिस्सा स्व-रोज़गार से जुड़ा था। अगस्त 2020 में ऐसे लोगों की संख्या बढ़कर 64% हो गई। इंडियास्पेंड ने तब जनवरी, 2021 में रोज़गार के अवसरों में लगातार होने वाली कटौती को लेकर एक <a href="https://www.indiaspend.com/economy/pandemic-effect-9-months-on-more-younger-workers-remain-jobless-716310"><u>रिपोर्ट </u></a>प्रकाशित की थी।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">आखिर क्यों बड़े इंफ्रा-प्रोजेक्ट से अधिक नौकरियाँ नहीं आएँगी</span></b></p><p dir="ltr">अपने 110 मिनट के लंबे बजट <a href="https://www.indiabudget.gov.in/doc/Budget_Speech.pdf"><u>भाषण </u></a>में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने टेक्सटाइल, शिपिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के लिए योजनाओं और आवंटन की घोषणाएँ की है, जिससे उम्मीद की जा रही है कि नौकरियाँ बढ़ेंगी। मसलन,</p><ul class="hocalwire-editor-list"><li><span style="color: rgb(68, 68, 68); background-color: rgb(255, 255, 255);">13 क्षेत्रों में प्रोडक्शन-लिंक्ड इनिशिएटिव (पीएलआई) के लिए पांच सालों में 1.97 लाख करोड़ ($ 27 बिलियन) का प्रावधान किया जाएगा।</span></li><li>बजट में अगले तीन सालों में सात <a href="https://pib.gov.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1694058" style="background-color: rgb(255, 255, 255);"><u>मेगा इन्वेस्टेमेंट टेक्सटाइल्स पार्क </u></a><span style="background-color: rgb(249, 249, 249); color: rgb(0, 0, 0);">(मित्र) शुरू किए जाएंगे।</span></li><li>टेक्सटाइल इंडस्ट्री के कच्चे माल के लिए मौलिक सीमा-शुल्क को कम करके 5% किया गया है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के साथ-साथ तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल और असम में आर्थिक मार्ग और राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए 1,08,230 करोड़ रुपये ($ 14.8 बिलियन) की पूँजी तय की गई है।</li><li>पब्लिक-प्राइवेट पार्टनर-शिप मॉडल के तहत शहरी क्षेत्रों में सार्वजनिक बस परिवहन वृद्धि योजना के लिए 18,000 करोड़ रुपये की घोषणा की गई है।</li></ul><p dir="ltr" role="presentation">उपरोक्त घोषणाओं की बात करें तो विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार की इन योजनाओं और पहल से रोज़गार के अवसर सृजित तो होंगे, लेकिन इसमें लंबा वक्त लगेगा। इससे तत्काल राहत की बात करना बेमानी होगी।<br></p><p dir="ltr" role="presentation">"इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को प्रोत्साहित करना अच्छा कदम है लेकिन यह इस पर निर्भर करेगा कि आर्थिक मार्ग जैसे प्रोजेक्ट कितनी जल्दी शुरू होते हैं। क्योंकि आमतौर पर इन प्रोजेक्ट्स के शुरू होने में लंबा वक्त लगता है। इसलिए इस बात की आशंका ज्यादा है कि इसमें बड़े पैमाने पर शायद रोज़गार सृजित ना हों। इसके अलावा यह सहायता ज़्यादातर पूँजी प्रधान उद्योगों को ही मिली है," <a href="http://icrier.org/"><u>इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकॉनामिक रिलेशन </u></a>(आईसीआरआईईआर) की वरिष्ठ व्यक्ति और अर्थ-शास्त्री राधिका कपूर ने इंडियास्पेंड के साथ बातचीत में बताया।</p><p dir="ltr" role="presentation">"बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में इन दिनों काफी बड़ी पूँजी लगती है," अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में सहयोगी प्रोफेसर और <a href="https://cse.azimpremjiuniversity.edu.in/"><u>सेंटर फॉर सस्टेनेबल एंप्लायमेंट </u></a>में शोधकर्ता अमित बासोले का ऐसा मानना है। "निर्माण क्षेत्र की ज़्यादातर नौकरियाँ आवासीय और व्यावसायिक परियोजनाओं में सृजित होती हैं, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में नहीं," नौकरियों के ज़्यादा अवसर नहीं होने की वजह बताते हुए बासोले ने आगे कहा"</p><p dir="ltr" role="presentation">टेक्सटाइल्स पार्क की स्थापना एक सकारात्मक क़दम है क्योंकि इस क्षेत्र में ज़्यादा श्रमिकों की ज़रूरत होती है लेकिन इसके लिए जितना बजट आवंटित किया जाना चाहिए था उतना नहीं किया गया," नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक फ़ाइनेंस एंड पॉलिसी (एनआईपीएफपी) के अर्थ-शास्त्री भाबेश हज़ारिका का ऐसा कहना है। उन्होंने बजट आवंटन को अपर्याप्त बताया।\</p><p dir="ltr" role="presentation">सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) के लिए बजट में राहत की कमी की तरफ विशेषज्ञों ने इशारा किया है। यह मंत्रालय देश के असंगठित क्षेत्र के <a href="https://www.ceew.in/sites/default/files/CEEW-NIPFP-Jobs,Growth-and-Sustainability-study-11Jun20.pdf"><u>40% </u></a>कर्मचारियों को रोज़गार प्रदान करता है। अमित बासोले का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान सबसे ज़्यादा मार इसी सेक्टर पर पड़ी थी और कई लघु उद्योग धंधों के विभाग दिवालिया हो गए। एमएसएमई मंत्रालय के लिए वर्तमान वित्तीय अनुमान 7,572 करोड़ को <a href="https://www.indiabudget.gov.in/doc/eb/allsbe.pdf"><u>दोगुना</u></a> करके 2021-22 में 15,700 करोड़ कर दिया गया है। हालांकि कुल आवंटन का 64% हिस्सा <a href="https://pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1669449"><u>गारंटी इमर्जेंसी क्रेडिट लाइन </u></a>(जीईसीएल) सुविधा के लिए है। यह योजना एमएसएमईस, व्यापार उद्योगों, व्यक्तिगत उद्यमियों, माइक्रो यूनिट्स डवलपमेंट एंड रिफाइनेंस एजेंसीज़ (मुद्रा) से उधार लेने वालों को पूरी तरह से गारंटी-युक्त और कोलैटरल फ्री क्रेडिट मुहैया कराती है।</p><p dir="ltr" role="presentation"><b><span style="font-size: 22px;">ग्रामीण रोज़गार योजना में पहले से कम आवंटन</span></b></p><p dir="ltr" role="presentation">प्रत्येक ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को साल में 100 दिन रोज़गार की गारंटी देने वाली ग्रामीण रोज़गार योजना में <a href="http://mnregaweb4.nic.in/netnrega/all_lvl_details_dashboard_new.aspx?Fin_Year=2020-2021&amp;Digest=ueg/HtV54GGJ8ZQ6GUB2ew"><u>14.4 करोड़ कार्यकर्ता </u></a>है। काम न होने की वजह से अपने घरों को लौटने वाले बेरोज़गार प्रवासी मज़दूरों ने लॉकडाउन के दौरान मनरेगा के तहत <a href="https://www.indiaspend.com/post-lockdown-workers-demand-more-work-better-wages-under-rural-jobs-scheme/"><u>काम के लिए आवेदन </u></a>किया था, लेकिन 97 लाख ज़रूरतमंद लोगों को काम नहीं मिला। इंडियास्पेंड ने 4 जनवरी, 2021 को प्रकाशित <a href="https://www.indiaspend.com/indias-job-crisis/will-new-labour-laws-drive-job-creation-in-2021-708372"><u>रिपोर्ट </u></a>में इस बात का जिक्र किया था।</p><p dir="ltr" role="presentation">जून 2020 में, मनरेगा के लिए रिकॉर्ड 61,500 करोड़ रुपये ($ 8.4 बिलियन) का आवंटन किया गया था। बाद में महामारी के दौरान रोज़गार संकट का सामना करने के लिए अतिरिक्त <a href="https://pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=1628782"><u>40 हज़ार करोड़ रुपये </u></a>($ 5.5 बिलियन) भी दिए गए थे। 2021-22 में बजट में इज़ाफे के साथ 73 हज़ार करोड़ आवंटित किए गए, यह 2020-21 के संशोधित अनुमान की तुलना में <a href="https://www.indiabudget.gov.in/doc/Budget_at_Glance/bag7.pdf"><u>35% कम </u></a>है। 2020-21 के अनुमानित राशि के हिसाब से इस मद मे 1,11,500 करोड़ रुपये ($ 15.3 बिलियन) ख़र्च हुए।</p><p dir="ltr" role="presentation"><span style="background-color: rgb(255, 255, 255);">इस बजटीय आवंटन को अपर्याप्त बताते हुए आईसीआरआईईआर की राधिका कपूर आगे कहती है कि "मनरेगा में मांग की स्थिति बरकरार है क्योंकि श्रम बाज़ार काफी दबाव में है और कोविड का संकट अभी ख़त्म नहीं हुआ है।" </span><a href="https://hss.iitd.ac.in/" style="background-color: rgb(255, 255, 255);"><u>आईआईटी दिल्ली </u></a><span style="background-color: rgb(255, 255, 255);">की सहयोगी प्रोफेसर और अर्थ-शास्त्री रितिका खेरा का भी कहना है कि "मांग के मुकाबले बजट में मनरेगा के लिए हमेशा कम पैसे दिए जाते हैं। पिछले साल इस मद में आवंटन बढ़ाया गया था लेकिन वह पैसा भी नौकरी कार्ड वाले सभी परिवारों को सौ दिन काम देने के लिए ज़रूरी पैसे का महज एक तिहाई है।"</span></p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div class="h-embed" contenteditable="false"><div class="h-embed-wrapper desktop-only-embed"><iframe src="https://e.infogram.com/4f16ddef-a832-4517-9c98-eccb706b9a2f?src=embed" title="35% Less Funds For Rural Jobs Programme" width="700" height="618" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></div></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr" role="presentation"><span style="background-color: rgb(255, 255, 255);"><br></span></p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div class="h-embed" contenteditable="false"><div class="h-embed-wrapper mobile-only-embed"><iframe src="https://e.infogram.com/4f16ddef-a832-4517-9c98-eccb706b9a2f?src=embed" title="35% Less Funds For Rural Jobs Programme" width="320" height="618" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></div></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr" role="presentation">भारत में भीषण आर्थिक <a href="https://www.oxfamindia.org/press-release/inequality-virus-india-supplement-2021"><u>असमानता </u></a>को देखते हुए बजट आवंटन में मनरेगा के लिए भुगतान बढ़ाने की ज़रूरत है ताकि शहरों की तरफ होने वाला पलायन कम हो, ऐसा राजेंद्रन नारायण का कहना है। राजेंद्रन <a href="https://azimpremjiuniversity.edu.in/SitePages/index.aspx"><u>अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी </u></a>के असिसटेंट प्रोफेसर और ग्रामीण इलाकों में सार्वजनिक सेवाओं की पहुंच में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए काम करने वाले प्रोजेक्ट <a href="https://libtech.in/"><u>लिबटेक इंडिया </u></a>के संस्थापक सदस्य है। "सरकार ने बजट में सप्लाई के सभी मापदंडों पर ज्यादा ध्यान दिया है, लेकिन मांग संबंधी मापदंडों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया गया है। यह मनरेगा और आजीविका देने वाली तमाम दूसरी योजनाओं के आवंटन पर अपने मौन से साफ स्पष्ट है", इस बारे में बताते हुए राजेंद्रन आगे कहते है।<br></p><p dir="ltr" role="presentation"><b><span style="font-size: 22px;">अवसर को गँवाने जैसा है शहरी रोज़गार की उपेक्षा</span></b></p></div><p>मनरेगा की तर्ज़ पर शहरी क्षेत्रों में रोज़गार बढ़ाने की योजना कई राज्यों मसलन <a href="https://twitter.com/bmcbbsr/status/1312997151652282369"><u>ओडिशा</u></a>, <a href="http://ud.hp.gov.in/sites/default/files/MMSAGY/MMSAGYNotification.pdf"><u>हिमाचल प्रदेश</u></a>, <a href="https://scroll.in/latest/970416/jharkhand-cm-hemant-soren-launches-job-scheme-for-unskilled-workers-in-urban-areas"><u>झारखंड</u></a> और <a href="http://lsgkerala.gov.in/en/schemes/ayyankali_urban_employment_guarantee_scheme"><u>केरल </u></a>में लागू है। राज्य सरकार की ये योजनाएं मौजूदा संकट का सामना करने में मददगार है, ऐसा इंडियास्पेंड ने 4 जनवरी, 2021 को प्रकाशित अपनी <a href="https://www.indiaspend.com/indias-job-crisis/will-new-labour-laws-drive-job-creation-in-2021-708372"><u>रिपोर्ट </u></a>में बताया था। 2020 में कृषि क्षेत्र में आम दिनों की तुलना में ज़्यादा लोगों को रोज़गार मिला। इससे पता चलता है कि शहर के गैर-कृषि क्षेत्रों में कोरोना के असर के चलते नौकरियों के अवसर कम हैं, <a href="https://www.cmie.com/kommon/bin/sr.php?kall=warticle&amp;dt=2021-01-19%2010:45:34&amp;msec=233"><u>सेंटर फॉर मानिटरिंग इंडियन इकनॉमी </u></a>ने जनवरी, 2021 में अपने विश्लेषण में बताया। इस विश्लेषण के मुताबिक, कृषि क्षेत्र में रोज़गार की बात करें तो अक्टूबर-दिसंबर, 2020 में रोज़गार पिछली तिमाही यानी जुलाई-सितंबर 2020 के 15.8 करोड़ से गिरकर 15.4 करोड़ रह गया। लेकिन अक्टूबर-दिसंबर 2019 की तुलना में यह 3.5% ज़्यादा है।<br></p><p dir="ltr" role="presentation">अमित बासोले का मानना है कि नए बजट में शहरों में रोज़गार सृजन के लिए किसी तरह का पहल नहीं किया जाना अवसर के छूट जाने के समान है। बासोले ने कहा, "यह महत्वपूर्ण होता कि सरकार इसके ज़रिए न केवल सबसे ज़्यादा प्रभावित शहरी कामगारों को मुआवजा दे पाती, बल्कि वह यह भी दिखा पाती कि एयरपोर्ट और राजमार्गों जैसे बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के साथ ही वह लोकल इंफ्रास्ट्रक्चर को भी बेहतर करने के लिए भी प्रतिबद्ध है।"</p><p dir="ltr" role="presentation"><a href="https://www.indiabudget.gov.in/economicsurvey/"><u>आर्थिक सर्वेक्षण </u></a>ने कोविड-19 संकट के चलते उत्पन्न बेरोज़गारी की समस्या को स्वीकार नहीं किया, जेवियर स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट (एक्सएलआरआई) में मानव संसाधन प्रबंधन के प्रोफेसर के. आर. श्याम का कहना है उन्होंने यह सवाल भी उठाया है कि "क्या यह शहरी रोज़गार आश्वासन योजना शुरू करने का उचित समय नहीं था? वह भी तब जब <a href="https://www.esic.nic.in/Tender/ESIAct1948Amendedupto010610.pdf"><u>एंप्लायज स्टेट इंश्यूरेंस एक्ट</u></a>, 1948 (जिसमें बेहद कम लोगों को काम मिला है) के अलावा देश में बेरोज़गारी भत्ता या सहायता देने की कोई योजना नहीं है?"</p><p dir="ltr" role="presentation"><b><span style="font-size: 22px;">सलाह मात्र है असंगठित क्षेत्रों के श्रमिकों की सुरक्षा</span></b></p><p dir="ltr" role="presentation">लॉकडाउन के दौरान भारत के <a href="https://www.indiaspend.com/90-of-jobs-created-over-two-decades-post-liberalisation-were-informal/"><u>असंगठित क्षेत्र </u></a>में रोज़गार संकट को बताने वाला <a href="https://www.indiaspend.com/indias-job-crisis/will-new-labour-laws-drive-job-creation-in-2021-708372"><u>कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं </u></a>है। सरकार ने संसद में इस बात को <a href="http://164.100.24.220/loksabhaquestions/annex/174/AU174.pdf"><u>स्वीकार </u></a>भी किया कि उसके पास कोई आंकड़ा नहीं है जो यह बताए कि कितने प्रवासी मज़दूरों की नौकरियाँ चली गईं या फिर <a href="https://indianexpress.com/article/india/the-long-walk-of-indias-migrant-workers-in-covid-hit-2020-7118809/"><u>पैदल घर जाते वक्त </u></a>कितने प्रवासी मज़दूरों की मौत हो गई। सरकार ने विशेषज्ञों के एक <a href="https://pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1663173"><u>समूह का गठन </u></a>भी किया है, जो प्रवासी मज़दूरों के आंकड़ों को एकत्रित करके उनकी कामकाज की स्थिति और नौकरियों के अवसर को बेहतर करने के लिए तरीके बताएगा।</p><p dir="ltr" role="presentation">बजट में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का नेशनल डेटाबेस तैयार करने के लिए 150 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इसके तहत एक पोर्टल बनाने का प्रस्ताव है जिसमें <a href="https://www.indiaspend.com/women-2/gig-jobs-give-women-higher-incomes-but-little-security-711758"><u>असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों</u></a>, इमारत और कंस्ट्रक्शन से जुड़े मज़दूरों के अलावा दूसरे मज़दूरों की जानकारी एकत्रित की जाएगी और इस जानकारी के आधार पर उन्हें घर, स्किल ट्रेनिंग, बीमा, क्रेडिट और खाद्य सुरक्षा जैसी योजनाओं का लाभ मुहैया कराया जाएगा।</p><p dir="ltr" role="presentation">बजट की घोषणा में <a href="https://www.indiaspend.com/indias-gig-workers-overworked-and-underpaid/"><u>असंगठित क्षेत्र </u></a>के अंशकालिक औऱ दूसरे मज़दूरों के लिए दुनिया भर में पहली बार सामाजिक सुरक्षा देने की बात कही गई है। लेकिन यह एक तरह से सरकार के <a href="https://labour.gov.in/sites/default/files/SS_Code_Gazette.pdf"><u>सामाजिक सुरक्षा से जुड़े कोड </u></a>को दोहराने की औपचारिकता भर है क्योंकि इस मकसद को पूरा करने के लिए किसी तरह के बजट का आवंटन नहीं किया गया है, ऐसा विशेषज्ञों का कहना है। "कोड के तहत असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए सुरक्षा का प्रावधान है लेकिन यह केवल सलाह के तौर पर है क्योंकि नेशनल डेटाबेस बनाने के अलावा असंगठित क्षेत्र के लिए किसी बजट का आवंटन नहीं किया गया है", आईसीआरआईईआर की राधिका कपूर ने बताया।</p><p dir="ltr" role="presentation">कोड के मुताबिक, अंशकालिक और असंगठित श्रमिकों के नियोक्ताओं को केंद्र या राज्य सरकार के साथ मिलकर एक सामाजिक सुरक्षा फंड तैयार करना चाहिए। इसमें नियोक्ताओं को अपने सालाना टर्नओवर का 1-2% राशि का भुगतान करना चाहिए। हालांकि कोड में यह स्पष्ट तौर पर नहीं बताया गया है कि कौन सा प्लेटफॉर्म होगा, कौन अंशकालिक श्रमिक होंगे, इस लिहाज से इन प्रावधानों को लागू करना कठिन है,  इस बारे में बताते हुए कपूर आगे कहती हैं।</p><p dir="ltr" role="presentation">(यह खबर <a href="https://www.indiaspend.com/"><u>इंडियास्पेंड </u></a>में प्रकाशित की गई <a href="https://www.indiaspend.com/budget/budget-2021-not-enough-to-boost-employment-experts-721700"><u>खबर </u></a>का हिंदी अनुवाद है।)</p><p dir="ltr" role="presentation">हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं</p>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/budget/budget-2021-not-enough-to-boost-employment-experts-721700</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/budget/budget-2021-not-enough-to-boost-employment-experts-721700</guid>
<category><![CDATA[budget,Development,Economy,अर्थव्यवस्था व नीति,नवीनतम रिपोर्ट,रोजगार,शासन,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[श्रेया रमन]]></dc:creator>
<pubDate>Tue, 09 Feb 2021 06:58:18 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/02/09/500x300_406372-budget-employment.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महामारी के बावजूद , स्वास्थ्य बजट में वास्तविक बढ़त बहुत कम दिखी]]></title>
<description><![CDATA[स्वास्थ्य बजट में शामिल पानी और स्वच्छता का परिव्यय; पोषण परिव्यय में वास्तविक गिरावट]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p>वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने नई स्वास्थ्य योजना - प्रधानमंत्री आत्मनिर्भर स्वस्थ भारत योजना की <a href="https://www.indiabudget.gov.in/doc/hbs.pdf"><u>घोषणा </u></a>की। जिसके लिए उन्होंने 64,180 करोड़ रुपये ($8.7 बिलियन) खर्च का लक्ष्य रखा। स्वास्थ्य मंत्रालय को 2020-21 के लिए केंद्र का आवंटन 67,112 करोड़ रुपये ($9.18 बिलियन) था। यह नई योजना सम्पूर्ण स्वास्थ्य आवंटन में  100% की वृद्धि करती प्रतीत होती है। हालांकि, सीतारमण ने यह भी कहा कि यह योजना छह सालों में शुरू हो जायेगी।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">लेकिन विस्तृत बजट <a href="https://www.indiabudget.gov.in/doc/eb/hallsbe.pdf"><u>दस्तावेज </u></a>में 2021-22 की इस योजना का कोई जिक्र नहीं है। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि इस साल यह धनराशि किसी भी स्वास्थ्य व्यय में कैसे अपना रास्ता बनायेगी।</p><p dir="ltr">सरकार ने स्वास्थ्य सेवा के लिए अभूतपूर्व परिव्यय की <a href="https://twitter.com/PIB_India/status/1356124902160392193"><u>घोषणा </u></a>भी की है। जिसके लिए 2,23,846 करोड़ रुपये ($30.6 बिलियन) का आवंटन किया गया है। वित्त मंत्री के अनुसार यह 2020-21 के बजट में 137% की वृद्धि है।</p><p dir="ltr">हालांकि बजट में पारंपरिक रूप से स्वास्थ्य सेवाओं पर पूरा खर्च स्वास्थ्य मंत्रालय को ही जाता था। इस बार सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं को और भी कई सारे हिस्सों में पेश किया है। जिसमें स्वास्थ्य सेवाओं के उन सभी हिस्सों और योजनाओं को भी इसमें जोड़ा गया है जो कि स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन नहीं आते थे। वहीं सरल शब्दों में कहें तो पहले के मुकाबले कोई नया पैसा इस बजट में स्वास्थ्य सेवाओं के खर्च के लिए नहीं दिया गया। लेकिन वर्तमान की ही अलग-अलग कई सारी योजनाओं को आपस में जोड़ा गया है। जिससे स्वास्थ्य सेवाओं के खर्च के इन आंकड़ों में 137 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी नज़र आती है।</p>बढ़े हुए <a href="https://www.indiabudget.gov.in/doc/hbs.pdf"><u>आवंटन </u></a>में निम्नलिखित बजट प्रमुख आते है: स्वास्थ्य मंत्रालय, आयुष मंत्रालय, पेयजल और स्वच्छता विभाग,  <a href="https://fincomindia.nic.in/WriteReadData/html_en_files/oldcommission_html/fincom15/XVFC_Report_for_Year_2020_21_English.pdf"><u>वित्त आयोग </u></a>द्वारा स्वास्थ्य, पानी और स्वच्छता के लिए आवंटन और कोविड-19 टीकाकरण के लिए धनराशि का नया आवंटन।</div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/02/04/402539-health2.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421sAzkXfqcYnhXTlkw6NZGI0Axo0i5T2w24848922" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1612444849569" title="स्त्रोत: केंद्रीय बजट" alt="स्त्रोत: केंद्रीय बजट" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1612444849569"><p>स्त्रोत: केंद्रीय बजट</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><b><span style="font-size: 22px;">स्वास्थ्य मंत्रालय को खुद कितना प्राप्त हुआ?</span></b><br></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">महामारी के बावजूद भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय के लिए वास्तविक आवंटन में कोई बढ़त नहीं हुई। 2020-21के बजट में भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय को 67,112 करोड़ रुपये ($9.18 अरब) आवंटित किए गए, जैसा कि भारत में कोविड-19 महामारी चल रही थी। वर्तमान वित्त वर्ष के लिए 82,928 करोड़ ($11.4 बिलियन) का संशोधित अनुमान या अनुमानित पैसा खर्च किया गया है।</p><p dir="ltr">2021-22 के लिए, भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय को 73,931.77 करोड़ रुपये ($10.12 बिलियन) आवंटित किए गए है। यह 2020-21 के अनुमानित बजट से 10.16% अधिक है, लेकिन चालू वित्त वर्ष के संशोधित अनुमान से 10.84% कम है।</p><p dir="ltr">"स्वास्थ्य मंत्रालय का बजट यह नहीं दर्शाता है कि कोविड-19 महामारी पिछले साल से हो रही है," <a href="https://accountabilityindia.in/"><u>अकाउंटेबिलिटी इनिशियेटिव </u></a>की निदेशक अवनी कपूर ने बताया। </p><p dir="ltr">उनका कहना है कि लोगों ने नियमित स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच खो दी है, जिसकी भरपाई के लिए और नए स्वास्थ्य मुद्दों से निपटने के लिए और अधिक आवंटन किया जाना चाहिए था । बजट इनमें से किसी को भी प्रतिबिंबित करने में विफल रहा है।</p><p dir="ltr">"इस साल स्वास्थ्य आवंटन में लगभग 10% का इज़ाफा हुआ है, ऐसा देश जो हमेशा स्वास्थ्य पर कम खर्च करता है, उसके लिए यह बहुत अच्छा नहीं है। दूसरी ओर महामारी को देखते हुए इस साल स्वास्थ्य पर अधिक खर्च करना पूरी तरह से उचित है," कपूर ने आगे कहा।</p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div class="h-embed" contenteditable="false"><div class="h-embed-wrapper desktop-only-embed"><iframe src="https://e.infogram.com/f57b9559-a6ce-44fb-a8bb-842a78863b48?src=embed" title="Increase In Allocations To Health Ministry, 2018-19 To 2021-22" width="700" height="737" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></div></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><br></p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div class="h-embed" contenteditable="false"><div class="h-embed-wrapper mobile-only-embed"><iframe src="https://e.infogram.com/f57b9559-a6ce-44fb-a8bb-842a78863b48?src=embed" title="Increase In Allocations To Health Ministry, 2018-19 To 2021-22" width="320" height="737" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></div></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">पोषण के लिए कितना आवंटन हुआ?</span></b><br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">दिसंबर 2020 में राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2019-20 के पहले चरण के नए आंकड़ों से पता चला है कि <a href="https://www.indiaspend.com/health/india-may-be-reversing-decades-of-progress-on-child-nutrition-new-govt-data-show-701363"><u>भारत में पोषण का स्तर गिर गया था</u></a>। जैसा कि हमने <a href="https://www.indiaspend.com/health/india-may-be-reversing-decades-of-progress-on-child-nutrition-new-govt-data-show-701363"><u>रिपोर्ट </u></a>किया था कि बच्चों में अल्प-पोषण, अपव्यय और कमज़ोरी के स्तर में अधिकांश राज्यों में वृद्धि दिखी है, जिसके लिए डाटा जारी किया गया था और यह भारत के दशकों से किए काम को उलट सकता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार सर्वेक्षण में 22 में से 18 राज्यों में एक चौथाई बच्चे अविकसित थे। इस बार का बजट पोषण सेवाओं के लिए बड़ा आवंटन करने में विफल रहा, जो कि सफल हो सकता था।</p><p dir="ltr">"कुल मिलाकर, मैं बजट से आवंटन को पोषण संबंधी चुनौती की गंभीरता से जुड़ा हुआ नहीं देख पा रही हूं जो भारत के सामने है," अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान में <a href="https://www.ifpri.org/profile/purnima-menon"><u>पूर्णिमा मेनन </u></a>ने कहा। उनका कहना है कि इस नए बजट में पोषण सेवाओं के लिए आवंटन में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं किया गया है, "जो कि समस्यात्मक भी है क्योंकि आईसीडीएस (एकीकृत बाल विकास सेवाएं) प्रारंभ के सालों में भी कई बच्चों तक नहीं पहुंची है।"</p><p dir="ltr">पिछले कुछ सालों में, सरकार पहले से ही पोषण के लिए अपने दिए गए आवंटन को कम कर रही है और फिर भविष्य में अपने आवंटन में पर्याप्त वृद्धि नहीं कर रही है, ऐसा अंबेडकर विश्वविद्यालय की प्राध्यापक <a href="https://aud.ac.in/faculty/dr-dipa-sinha"><u>दीपा सिन्हा </u></a>का कहना है। उन्होंने आगे कहा कि, "हम पिछले कुछ सालों के अनुमानित संशोधित बजट से जानते है कि कई महिलाओं को उनके पोषण से संबंधित मातृत्व अधिकार नहीं मिल रहा है और आंगनबाड़ियों में घर का राशन कम स्तर पर मिल रहा है। इस कमी को बजट आंकड़े ही दर्शाते हैं ।"</p><p dir="ltr">पोषण के नए सरकारी आंकड़ों और महामारी के तनाव का मतलब है कि "यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि देशभर में पोषण का स्तर इस साल और भी खराब होगा", जो कि पहले से ही विकट स्थिति को और बढ़ाएगा।</p><p dir="ltr">सिन्हा का कहना है कि "यह साल बच्चों और परिवारों के लिए पोषण में धनराशि लगाने के लिए होना चाहिए था।" </p><p dir="ltr">पोषण बजट को महिला और बाल विकास मंत्रालय (जो नई माताओं और बच्चों के पोषण का ध्यान रखता है) और मानव संसाधन विकास मंत्रालय (जो स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए मिड-डे मील का ख्याल रखता है) के द्वारा संभाला जाता है। इनमें से कोई भी स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा नियंत्रित नहीं किया जाता है।</p><p dir="ltr"><a href="https://www.indiabudget.gov.in/doc/hbs.pdf"><u>मिशन पोषण 2.0</u></a> के लिए <a href="https://www.indiabudget.gov.in/doc/eb/hallsbe.pdf"><u>20,105 </u></a>करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। यह <a href="https://pib.gov.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1694035"><u>योजना </u></a>मौजूदा दो पोषण कार्यक्रमों का समावेश होगी, जो कि 112 आंकाक्षापूर्ण जिलों में पोषण परिणामों में सुधार करने के लिए गहन उपाय है।</p><p dir="ltr">इससे पहले, "अम्ब्रेला एकीकृत बाल विकास सेवाओं" के तहत मातृक, बच्चे और किशोर के स्वास्थ्य से संबंधित अन्य भागों के साथ पोषण को भी शामिल किया गया है। जिसे अब बजट से हटा दिया गया है। पिछले बजटों में, इस भाग को 28,557 करोड़ रुपये (2020-21), 27,584.37 करोड़ (2019-20) और 23,088.28 करोड़ (2018-19) आवंटित किए गए थे।</p><p dir="ltr">यह दर्शाता है कि 2021-22 में पोषण के लिए 20,105 करोड़ रुपये का आवंटन पिछले तीन सालों के आवंटन से कम है।</p><p dir="ltr">मिड-डे मील योजना जो स्कूल जाने वाले बच्चों की पोषण की जरूरतों को पूरा करती है, उसे वर्तमान वित्तीय वर्ष (11,000 करोड़ रुपये) की तुलना में  2021-22 (11,500 करोड़ रुपये) में 500 करोड़ रुपये अधिक आवंटित किए गए है। <a href="http://mdm.nic.in/mdm_website/"><u>सरकारी आंकड़ों </u></a>के अनुसार, लगभग 1160 लाख बच्चे मिड-डे मिल पर निर्भर करते है।</p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div class="h-embed" contenteditable="false"><div class="h-embed-wrapper desktop-only-embed"><iframe src="https://e.infogram.com/bc2af0f8-1c1e-49b8-b913-6b067e6b3026?src=embed" title="Allocations To Nutrition Schemes, 2018-18 To 2021-22" width="700" height="447" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></div></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><br></p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div class="h-embed" contenteditable="false"><div class="h-embed-wrapper mobile-only-embed"><iframe src="https://e.infogram.com/bc2af0f8-1c1e-49b8-b913-6b067e6b3026?src=embed" title="Allocations To Nutrition Schemes, 2018-18 To 2021-22" width="320" height="447" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></div></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">टीकाकरण को कैसे फंड किया जाएगा?</span></b><br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">कोविड-19 के लिए विशेष आवंटन में, सरकार ने कोविड-19 के टीकों के लिए 35,000 करोड़ रुपये ($4.7 बिलियन) आवंटित किए है। यह पूरे स्वास्थ्य मंत्रालय के लिए आवंटन का लगभग आधा है।</p><p dir="ltr">पूरे बजट में से कोविड-19 के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय को 11,756 करोड़ रुपये दिये गये है। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के टीकाकरण की प्रक्रिया के लिए 360 करोड़ रुपये भी निर्धारित किए गए है।</p><p dir="ltr">"मैं उम्मीद कर रहा था कि सरकार बोर्ड में रिक्त पदों को भरने के लिए पैसे लगाए, जिससे जमीनी स्तर पर लाभ के लिए अधिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता टीकाकरण को संबोधित कर पाएं," पर्यवेक्षक अनुसंधान संस्था के स्वास्थ्य पहल के प्रमुख ओमन सी. कुरियन ने कहा।</p><p dir="ltr">उन्होंने बताया कि कोविड-19 वैक्सीन के लिए आवंटित 35,000 करोड़ रुपये वास्तविक वैक्सीन शॉट्स खरीदने के लिए लगते हैं, न कि स्वास्थ्य सेवा कर्मियों या टीकाकरण की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए आवश्यक मूलभूत संरचना के लिए।</p><p dir="ltr">"ये स्वास्थ्यकर्मी वह सेना होगी जिसकी जरूरत हमें इस साल महामारी को हराने में है। यह अफ़सोस की बात है कि उन्हें कम वेतन दिया जाता है और अस्थायी रूप से काम पर रखा जाता है। इस महामारी ने दिखाया है कि सार्वजनिक क्षेत्र को स्वास्थ्य सेवा का बोझ उठाना पड़ेगा। यह बजट इसे बेहतर तरीके से संबोधित कर सकता था,"  कुरियन ने आगे इस बारे में बताते हुए कहा।</p><p dir="ltr"><i>(यह खबर </i><a href="https://www.indiaspend.com/"><i><u>इंडियास्पेंड </u></i></a><i>में प्रकाशित की गई </i><a href="https://www.indiaspend.com/budget/despite-pandemic-health-budget-sees-little-real-increase-721259"><i><u>खबर </u></i></a><i>का हिंदी अनुवाद है।)</i></p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><i><a href="mailto: respond@indiaspend.org">respond@indiaspend.org</a></i><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i></p></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/economy-policy/despite-pandemic-health-budget-sees-little-real-increase-722525</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/economy-policy/despite-pandemic-health-budget-sees-little-real-increase-722525</guid>
<category><![CDATA[Development,Economy,अर्थव्यवस्था व नीति,शासन,सेहत,सेहतकीपड़ताल,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[अनू भूयन]]></dc:creator>
<pubDate>Thu, 04 Feb 2021 13:40:58 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/02/04/500x300_402537-health1.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[पहले कोरोना और अब बर्ड फ्लू से बर्बादी के कगार पर छोटे पोल्‍ट्री कारोबारी]]></title>
<description><![CDATA[कोरोना महामारी के बीच अफवाहों और देशव्यापी लॉकडाउन से उभर रहे छोटे पोल्ट्री फार्मर्स पर अब बर्ड फ्लू की भी मार पड़ रही है। इन दो बड़े झटकों से संभालना कई फार्मर्स के लिए काफी कठिन हो रहा है और छोटे स्तर के फार्मर्स अब या तो ये धंधा छोड़ रहे हैं और या फिर लाखों रुपये के क़र्ज़ में दबते जा रहे हैं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>लखनऊ।:&nbsp;</b>लखनऊ के मंडावली गांव के रहने वाले अब्‍दुल फरीद (45) ने 2014 मे बाग़बानी का काम छोड़ कर अच्छी कमाई के लिये पोल्ट्री फार्म खोला लेकिन फरीद को ये नहीं पता था की ये कदम उनको कुछ ही सालों में लाखों रुपये का कर्ज़दार बना देगा । फरीद को कोरोना वायरस से जुडी अफ़वाहों और लॉकडाउन ने काम बंद करने को मजबूर कर दिया ।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">कोरोना के भारत मे फैलने से ठीक पहले फरीद के पास 2 हजार मुर्ग‍ियों की क्षमता वाला एक पोल्‍ट्री फार्म था, लेकिन आज वह दूसरे के पोल्‍ट्री फार्म में मासिक 8 हजार रुपए की नौकरी कर रहे हैं। इसके अलावा उन पर पोल्‍ट्री फार्म से जुड़ा करीब 5 लाख रुपए का कर्ज भी है। </p><p dir="ltr">"कोरोना से पहले मेरे पक्षी (मुर्गियां ) तैयार हो चुके थे, लेकिन तभी अफ़वाह फैली कि चिकन खाने से कोरोना हो जाएगा। मार्केट में कोई ख़रीदार नहीं था। मेरे पास मुर्ग‍ियों को ख‍िलाने के ल‍िए दाना भी नहीं था। ऐसे में मुझे औने-पौने दाम पर मुर्ग‍ियां बेचनी पड़ी। उस वक्त‍ मैंने 100 रुपए में 7 मुर्ग‍ियां बेची थी। एक-एक मुर्गी का वजन 2 किलो से ज्‍यादा था," फरीद कहते हैं। </p><p dir="ltr">फरीद अपने परिवार के कमाने वाले अकेले व्‍यक्‍ति हैं। उनकी कमाई पर चार लोगों का गुजर-बसर होता है, फरीद, उनकी पत्‍नी और दो बच्‍चे। फरीद 2014 से ही मुर्गी पालन का काम कर रहे थे। कभी फायदा और कभी घाटा सहते हुए हर दो महीने पर उनके पास करीब 30 हजार रुपए बच जाते थे। उन्हें इस कारोबार में कई बार नुकसान झेलना पड़ा, लेकिन कभी ऐसा घाटा नहीं हुआ जैसा कोरोना के वक्त‍ उन्हें झेलना पड़ा। उन्‍होंने पोल्‍ट्री फार्म के ल‍िए बाजार से कर्ज ले रखा था। अब उनपर कर्ज तो लदा हुआ है, लेकिन फार्म नहीं बचा है। </p><p dir="ltr">"पहले बागों में मजूदरी करता था, पैसे जोड़कर पोल्‍टी फार्म खोला था। कोरोना में यह भी बर्बाद हो गया, कर्ज अलग लद चुका है। अब धीरे-धीरे कर्ज चुकाएंगे। क्‍या कर सकते हैं," फरीद कहते हैं ।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/28/396784-img1.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421UPxiny7RE9dIO2TQGyY6EUhXU0M8GqnH7547706" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1611837551439" title="पोल्‍ट्री फार्म में काम करने के दौरान अब्‍दुल फरीद। फोटो: रणव‍िजय सिंह" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1611837551439"><p>पोल्‍ट्री फार्म में काम करने के दौरान अब्‍दुल फरीद। फोटो: रणव‍िजय सिंह</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">यह कहानी केवल फरीद की नहीं है। फरीद की तरह पोल्‍ट्री कारोबार से जुड़े बहुत से छोटे किसान कोरोना से प्रभावित हुए और अब बर्ड फ्लू के चलते काम बंद करने पर मजबूर हैं ।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"कोरोना के बीच फैली अफ़वाह से कारोबार जमींदोज हो गया था। धीरे-धीरे हालात सही हुए और करीब <a href="https://twitter.com/pfbwfindia/status/1347505279080939522?s=08"><u>40%</u></a> कारोबार खड़ा हो पाया। अब फिर से चिकन और अंडा खाने से बर्ड फ्लू होने की अफ़वाह फैल गई है और च‍िकन, अंडे के दाम कम हो गए हैं," पोल्ट्री फार्मर्स के राष्ट्रीय संगठन '<a href="https://poultryfarmersindia.com/home-english/"><u>पोल्‍ट्री फार्मर्स ब्रॉयलर्स फेडरेशन</u></a>' के अध्‍यक्ष एफ.एम शेख ने बताया </p><p dir="ltr">पोल्‍ट्री फार्मर्स ब्रॉयलर्स फेडरेशन के <a href="https://poultryfederation.blogspot.com/2021/01/blog-post.html"><u>मुताबिक</u></a>, पोल्‍ट्री कारोबार से गांव, कस्‍बों और शहरों के किसान और व्‍यवसायी जुड़े हैं। इस कारोबार का सालाना टर्न ओवर 1.5 लाख करोड़ रुपए से अध‍िक का है। देश में पोल्‍ट्री कारोबार से सीधे तौर पर 10 लाख से ज्‍यादा लोगों को रोजगार मिलता है। वहीं, देश में पैदा होने वाला मक्‍का, बाजरा का करीब 70% और सोयाबीन, सरसों, मूंगफली, सूरजमुखी की खलियों का करीब 90% खपत पोल्‍ट्री बर्ड्स के खाने के तौर पर होता है। इस तरह इन फसलों की खेती से जुड़े करीब 2 करोड़ किसानों की आय का ज़रिया भी पोल्‍ट्री कारोबार है। </p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">बर्ड फ्लू से कैसे प्रभावति हुआ पोल्‍ट्री कोरोबार?</span></b></p><p dir="ltr">इस साल जनवरी के पहले हफ्ते से बर्ड फ्लू के <a href="https://www.financialexpress.com/lifestyle/health/bird-flu-in-india-2021-latest-updates-cases-in-kerala-himachal-madhya-pradesh-rajasthan/2164183/"><u>मामले सामने </u></a>आने लगे। हर बार की तरह इसका सीधा असर पोल्‍ट्री कारोबार पर पड़ना था। इसकी वजह से चिकन और अंडे के दामों में अप्रत्‍याश‍ित कमी देखने को मिली। </p><p dir="ltr">दामों के घटने और मांग में कमी होने के कारण मुर्गी पालकों को दोहरी मार झेलनी पड़ती है ।</p><p dir="ltr">पोल्‍ट्री फार्म में मुर्गी के बच्‍चे को तैयार होने में 35 दिन लगते हैं। 35 दिन में इनका वजन करीब 2 किलो का होता है। अगर 35 दिन में मुर्ग‍ियां नहीं बिकती हैं तो पोल्‍ट्री फार्मर ज्‍यादा से ज्‍यादा 10 दिन और इन मुर्गियों को रख सकता है। हालांकि, 10 दिन रखने पर मुर्गियों की लागत तेजी से बढ़ती है, क्‍योंकि बड़ी मुर्गियां ज्‍यादा दाना खाती हैं और हर दिन के हिसाब से उनका खाना बढ़ता जाता है।</p><p dir="ltr">लखनऊ के काकोरी के रहने वाले मो. आबिद (40) भी पोल्‍ट्री कारोबार से जुड़े हैं। उनके पोल्‍ट्री फार्म की क्षमता करीब 5 हजार मुर्गियों की है। मो. आब‍िद ने बर्ड फ्लू के बाद हुए नुकसान को एक मुर्गी के हिसाब से समझाया - </p><p dir="ltr">एक मुर्गी के बच्‍चे का दाम: <b>45 रुपए</b><br></p><p dir="ltr">एक मुर्गी ने दाना खाया (35 दिन): <b>105 रुपए</b></p><p dir="ltr">फार्म रेंट, लेबर, बिजली, वैक्‍सीन खर्च: <b>10 रुपए</b></p><p dir="ltr">35 द‍िन में मुर्गी की लागत (2 किलो की मुर्गी): <b>160 रुपए</b></p><p dir="ltr">बर्ड फ्लू के बाद मार्केट रेट: <b>60 रुपए किलो</b></p><p dir="ltr">हर मुर्गी पर नुकसान: <b>40 रुपए </b></p><p dir="ltr">2 हजार मुर्ग़ियों की क्षमता वाले किसान का नुकसान: 80 हजार रुपए</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/28/396457-danishs-farm.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421CCOFX0zPfJCz47Pt5eCP2qdCFJyD0Kxu8145161" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1611818148469" title="मो. दानिश का दुबग्‍गा स्थित पोल्‍ट्री फार्म जो कि अब बंद पड़ा है । फोटो: रणव‍िजय सिंह" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1611818148469"><p>मो. दानिश का दुबग्‍गा स्थित पोल्‍ट्री फार्म जो कि अब बंद पड़ा है । फोटो: रणव‍िजय सिंह</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">लखनऊ के दुबग्‍गा के रहने वाले मो. दानिश ने भी पिछले साल लॉकडाउन से पहले मुर्गियों को 35 द‍िन पर नहीं बेचा था। होली के वक्‍त उनके पास 2,500 मुर्ग‍ियां तैयार थीं, लेकिन कोरोना की वजह से दाम सही नहीं थे। दानिश ने सोचा कुछ दिन में दाम सही होंगे तो मुर्गियां बेच दी जाएंगी, लेकिन दाम उठे नहीं। वहीं, 35 दिन से ऊपर की यह मुर्गियां हर द‍िन 7 से 8 बैग फीड खा रही थीं। एक बैग की कीमत तब 1600 रुपए थी। आखिर में फीड देने वाली कंपनी ने भी उधार देने से मना कर दिया और दानिश को 100 रुपए में 4 मुर्गियां बेचनी पड़ी। इस घाटे के बाद दानिश यह कारोबार छोड़ चुके हैं।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">बर्ड फ्लू का असर च‍िकन की तरह ही अंडे के दाम पर भी पड़ा है। <a href="https://www.e2necc.com/home/eggprice"><u>नेशनल एग कोऑर्ड‍िनेशन कमेटी (NECC)</u></a> के मुताबिक, यूपी के लखनऊ में एक जनवरी को अंडे की कीमत 633 रुपए सैकड़ा थी। वहीं, 24 जनवरी को अंड़े की कीमत 473 रुपए सैकड़ा थी। यानी एक अंडे के दाम में करीब 1.5 रुपए के कमी हो गई। </p><p dir="ltr">बर्ड फ्लू के वजह से अंडे के घटते दाम पर उत्‍तर प्रदेश पोल्‍ट्री फार्मर एसोसिएशन के अध्‍यक्ष अली अकबर कहते हैं, "इस सीजन में अंडे के दाम बढ़ते हैं, लेकिन बर्ड फ्लू ने मार्केट खराब कर द‍िया है। जनवरी की शुरुआत में 570 रुपए के 100 अंडे ब‍िक रहे थे, लेकिन आज कोई 400 रुपए सैकडे में भी अंडे लेने को तैयार नहीं हो रहा। सिर्फ अफवाह की वजह से हर अंडे पर 1.5 रुपए का नुकसान हो रहा है।" अली अकबर ने अंडे के फार्म के खर्च और एक अंडे की लागत के बारे में जानकारी दी है- </p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">30 हजार मुर्ग‍ियों का फार्म</span> </b></p><p dir="ltr">- हर द‍िन मुर्ग‍ियों के दाने पर करीब <b>65 हजार </b>का खर्च</p><p dir="ltr">- इसके अलावा मजदूरी, बिजली और अन्‍य खर्चे भी शामिल</p><p dir="ltr">- करीब 28 हजार अंडे रोज</p><p dir="ltr">- एक अंडे की लागत करीब 3 रुपए </p><p dir="ltr">- बर्ड फ्लू से पहले 210 अंडे के एक बॉक्‍स का दाम 1200 रुपए (5.7 रुपए का एक अंडा)</p><p dir="ltr">- बर्ड फ्लू के बाद 210 अंडे के एक बॉक्‍स का दाम 800 रुपए (3.8 रुपए का एक अंडा)</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">बर्ड फ्लू को लेकर पशुपालन विभाग क्‍या कर रहा है?</span></b><br></p><p dir="ltr">अंडे और च‍िकन से बर्ड फ्लू होने की अफवाह के मद्देनज़र पशुपालन विभाग भी बार-बार कह रहा है कि भारत में पक्ष‍ियों से इंसानों में बर्ड फ्लू फैलने का एक भी मामला सामने नहीं आया है। च‍िकन और अंडे को अच्‍छे से पकाकर खाना पूरी तरह सुरक्ष‍ित है।</p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div class="h-embed" contenteditable="false"><div class="h-embed-wrapper"><blockquote contenteditable="false" class="twitter-tweet"><p lang="hi" dir="ltr">बर्ड फ़्लू के दौरान, पोल्ट्री और पोल्ट्री-उत्पाद को अनुकूल तापमान पर पकाएँ तथा पकाने की प्रक्रिया में स्वच्छता का पूर्ण रूप से ध्यान रखें |<a href="https://twitter.com/hashtag/AvianFlu?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw">#AvianFlu</a> <a href="https://twitter.com/hashtag/BirdFlu?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw">#BirdFlu</a> <a href="https://twitter.com/hashtag/AvianFluFacts?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw">#AvianFluFacts</a> <a href="https://twitter.com/hashtag/%E0%A4%AC%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%82?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw">#बर्डफ़्लू</a> <a href="https://twitter.com/hashtag/%E0%A4%8F%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%A8%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%82?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw">#एवियनफ़्लू</a> <a href="https://t.co/XHNQJKRIQZ">pic.twitter.com/XHNQJKRIQZ</a></p>— Dept of Animal Husbandry &amp; Dairying, Min of FAH&amp;D (@Dept_of_AHD) <a href="https://twitter.com/Dept_of_AHD/status/1349627779105529856?ref_src=twsrc%5Etfw">January 14, 2021</a></blockquote> </div></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">यूपी सहित कई राज्‍यों ने दूसरे राज्‍यों से च‍िकन और अंडे के ट्रांसपोर्ट पर <a href="https://twitter.com/ANINewsUP/status/1348844894358528000?s=19"><u>रोक</u></a> लगाई थी। इसे लेकर पशुपालन एवं डेयरी मंत्री गिरिराज सिंह ने 11 जनवरी को अलग-अलग राज्‍यों के मुख्‍यमंत्र‍ियों को एक <a href="https://twitter.com/girirajsinghbjp/status/1349665929043476480"><u>पत्र</u></a> ल‍िखा था। इस पत्र में बताया गया कि बर्ड फ्लू पहली बार भारत में 2006 में पाया गया। इसके बाद से हर साल सर्दियों के महीने में इस बीमारी का संक्रमण पक्ष‍ियों में हो जाता है। 2006 से लेकर अभी तक बर्ड फ्लू का पोल्‍ट्री से मनुष्‍य में फैलने का एक भी मामला सामने नहीं आया है। विश्‍व पशु स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने भी बताया है कि अच्‍छी तरह पकाकर अंडे और पोल्‍ट्री मीट को खाना सुरक्ष‍ित है।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">इस पत्र के बाद से राज्‍यों ने च‍िकन की बिक्री और ट्रांसपोर्ट से संबंध‍ित अपने आदेश वापस लि‍ए थे। इसी कड़ी में यूपी में भी ट्रांसपोर्ट पर लगी रोक को हटा लिया गया। यूपी के पशुपालन विभाग के निदेशक रोग नियंत्रण, "डॉ. रामपाल सिंह ने इंड‍ियास्‍पेंड को बताया, भारत सरकार के दिशा निर्देश पर बाहर से आने वाले पोल्‍ट्री चिकन पर रोक हटा ली गई है। यूपी के 6 जिलों सीतापुर, लखीमपुर, पीलीभीत, मुजफ्फरनगर, उन्‍नाव और कानपुर में बर्ड फ्लू पाया गया है। इसमें से पीलीभीत में पोल्‍ट्री फार्म में बर्ड फ्लू पाया गया। बर्ड फ्लू को लेकर प्रदेश अलर्ट मोड पर है।" </p><p dir="ltr">यूपी पशुपालन विभाग की ओर से लगातार सर्विलांस का काम हो रहा है। अगर कहीं बर्ड फ्लू का मामला मिलता है तो उसके एक किलोमीटर के दायरे में सभी पालतू पक्ष‍ियों को मार दिया जा रहा है। मारे गए पक्ष‍ियों को तीन मीटर गहरे गड्ढे में चूना और ब्लीचिंग पाउडर डालकर दफना दिया जाता है। साथ ही यह प्रचारित भी किया जा रहा कि चिकन और अंडे को अच्छे से पकाकर खाना पूरी तरह सुरक्षित है। </p><p dir="ltr"><a href="https://fssai.gov.in/hi/"><u>भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण</u></a> (FSSAI) द्वारा जारी किये गए <a href="https://fssai.gov.in/upload/uploadfiles/files/Guidance_Note_Meat_Egg_Bird_Flu_20_01_2021.pdf"><u>दिशा निर्देशों </u></a>में भी अंडे और चिकन का सेवन ना करने का कोई निर्देश नहीं दिया गया है और कहा गया है की चिकन और अंडे का सेवन पूरी तरह से पकने के बाद करना चाहिए । कच्चे अंडे या कच्चे मांस के सेवन से बर्ड फ्लू के मनुष्यों में संक्रमण की सम्भावना होती है लेकिन मनुष्य से मनुष्य में इस वायरस के फैलने की संभावना काफी कम है ।</p><p dir="ltr">हालांकि इन प्रयासों के बाद भी लोगों में बर्ड फ्लू का डर है और इसकी वजह से चिकन और अंडा खाने से बच रहे हैं। "मेरे घर में हफ्ते में 2 दिन चिकन या मटन बनता ही है। जबसे बर्ड फ्लू चला है हमने चिकन खाना बंद कर दिया है। जब तक बर्ड फ्लू खत्म नहीं होता, चिकन खाने से बचेंगे," बलिया जिले के नारायणपुर गांव के रहने वाले रविन्द्र सिंह (52) कहते हैं।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">बर्बाद होते कारोबार के ल‍िए क्‍या कदम उठाए जा रहे?</span> </b></p><p dir="ltr">सरकार बर्ड फ्लू की रोकथाम के ल‍िए तमाम कदम उठा रही है, लेकिन अफवाहों से पोल्‍ट्री कारोबार को हो रहे नुकसान पर कुछ खास नहीं किया जा रहा है। इससे पहले कोरोना से तबाह हुए छोटे मुर्गी पालकों के लिए भी कुछ नहीं किया गया। यही वजह रही कि फरीद को दूसरे के पोल्‍ट्री फार्म में काम करना पड़ रहा है और दानिश पोल्‍ट्री फार्म बंद करके सिलाई का काम कर रहे हैं। यह दोनों ही छोटे किसान थे। लखनऊ के मंडावली गांव में ही करीब 10 छोटे किसानों ने अपने फार्म बंद कर दिए हैं।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/28/396462-fm-sheikh.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421mA7T6oxpe5TVjpoCEYTCLmtxddkOoPeW8353157" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1611818356154" title="पोल्‍ट्री फार्मर्स ब्रॉयलर्स फेडरेशन के अध्‍यक्ष एफ.एम शेख।&nbsp;" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1611818356154"><p>पोल्‍ट्री फार्मर्स ब्रॉयलर्स फेडरेशन के अध्‍यक्ष एफ.एम शेख।&nbsp;</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"सरकार की ओर से पोल्‍ट्री फार्मिंग को लेकर कोई ध्‍यान नहीं रहता। यह अनऑर्गनाइज्‍ड प्राइवेट सेक्‍टर है। पशु पालन विभाग को यह पता ही नहीं होता कि इस करोबार से कितने परिवार जुड़े हैं। यूपी सरकार 2013 में एक योजना लाई थी। यही एक योजना अभी चल रही है। यह दो से तीन करोड़ की योजना है, जिसका फायदा छोटे किसान नहीं उठा सकते," पोल्‍ट्री फार्मर्स ब्रॉयलर्स फेडरेशन के अध्‍यक्ष एफ.एम शेख ने कहा।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">शेख यूपी सरकार की जिस योजना की बात कर रहे हैं उसका नाम <a href="http://www.animalhusb.upsdc.gov.in/sites/default/files/Poultry%20Development%20Policy.pdf"><u>'उत्‍तर प्रदेश कुक्‍कुट विकास नीति - 2013'</u></a> है। यह योजना पहले 2018 तक के ल‍िए थी, जिसे बढ़ाकर 2022 तक कर दिया गया है। इसके तहत कॉमर्शियल लेयर फार्म और ब्रायलर पैरेंट फार्म लगवाने के ल‍िए बैंक लोन के ब्‍याज पर सरकार सब्सिडी देती है। कॉमर्शियल लेयर फार्म का मतलब जहां अंडे वाली मुर्ग‍ियां रखी जाएंगी और ब्रायलर पैरेंट फार्म का मतलब जहां चूजे पैदा होंगे। </p><p dir="ltr">'उत्‍तर प्रदेश कुक्‍कुट विकास नीति - 2013' के बारे में बताते हुए यूपी कुक्‍कुट विभाग के उपनिदेशक डॉ. हरदेव सिंह यादव कहते हैं, "सरकार की यह योजना बड़े पोल्‍ट्री फार्मर के ल‍िए है। यह 70 लाख से लेकर 1.5 करोड़ तक की योजना है। इसके अलावा हम जिलों में अनुसूच‍ित जाति के 100 किसान चुनते हैं, जिन्‍हें 50 चूजे देते हैं।" </p><p dir="ltr">इस योजना के अलावा यूपी सरकार की कोई ऐसी योजना नहीं जो छोटे पोल्‍ट्री फार्मर के ल‍िए हो। कुक्‍कुट विभाग के पास यह आंकड़ा भी नहीं कि कितने किसान पोल्‍ट्री कारोबार से जुड़े हैं। हालांकि बर्ड फ्लू की वजह से अलग-अलग जिलों में 9,329 पोल्‍ट्री फार्म चिन्‍हित हुए हैं। वहीं, 'उत्‍तर प्रदेश कुक्‍कुट विकास नीति - 2013' के तहत 30 हजार की क्षमता वाले कॉमर्शियल लेयर फार्म की संख्‍या 355 है और 10 हजार की क्षमता वाले फार्म की संख्‍या 312 है। ब्रायलर पैरेंट फार्म की संख्‍या 38 है। </p><p dir="ltr">"जब विभागों के पास कारोबार से जुड़े किसानों का आंकड़ा ही नहीं है तो किसी किसान की बर्बादी का आंकलन कहां से होगा। कोरोना से पहले यूपी में करीब 75 हजार परिवार पोल्‍ट्री कारोबार से जुड़े थे। अब यह संख्‍या आधी हो गई होगी। हर साल अफवाहें उड़ती हैं और हमारा कारोबार बर्बाद होता जा रहा है। इलेक्‍ट्रॉन‍िक मीडिया पर एक खबर चलती है कि 'मुर्गा खाने से होगा बर्ड फ्लू,' इसके बाद व्‍यापार ठप हो जाता है। इन अफवाहों को रोकने की जरूरत है। हम इसे लेकर राष्‍ट्रपति और प्रधानमंत्री को खत ल‍िखेंगे," शेख ने कहा।</p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i></p></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/top-stories/first-corona-now-bird-flu-pushing-small-poultry-farmers-to-quit-the-profession-719409</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/top-stories/first-corona-now-bird-flu-pushing-small-poultry-farmers-to-quit-the-profession-719409</guid>
<category><![CDATA[Covid-19,अर्थव्यवस्था व नीति,कवर स्टोरी,सेहत,सेहतकीपड़ताल,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[रणविजय सिंह]]></dc:creator>
<pubDate>Thu, 28 Jan 2021 08:17:00 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/28/500x300_396783-bird-flu-poultry-farmers.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[किशोर सेक्स, गर्भनिरोधक और पोषण संबंधी मुश्किलों का समाधान है महिलाओं का समूह]]></title>
<description><![CDATA[महिलाओं के स्व-सहायता समूहों के नेतृत्व में स्वाभिमान के जन-जागरूकता कार्यक्रम और बैठकों से स्वास्थ्य सेवाओं और गर्भनिरोधकों की मांग में नि:संदेह इजाफा हुआ है, लेकिन अभी भी सेक्स के बारे में बातचीत को लेकर बस्तर का समाज सहज नहीं है। यह एक बड़ी चुनौती है।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>बस्तर/मुंबई : </b>नवंबर का महीना और आंगन में गुनगुनी धूप। अपने 17 दिन के नवजात को तौलिए में लपेटकर यही गुनगुनी धूप सेकती 20 साल की रत्नी कश्यप कहती हैं, अगर मुझे परिवार नियोजन के बारे में पता होता तो शायद कभी इस बच्चे का जन्म नहीं होता। मैं 17 साल की थी तभी शादी हो गई थी। साथ में वह यह भी जोड़ती है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में उनके आदिवासी बहुल गांव बालेंगा में तो लड़कियों की शादी कई बार 14 या 15 साल की उम्र में ही कर दी जाती है। शादी के एक महीने के अंदर ही वह गर्भवती हो गई थी और उसका पहला बच्चा अब दो साल का है।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">पिछले साल की शुरुआत यानी शादी के तीसरे साल जब रत्नी दूसरी गर्भावस्था के तीसरे महीने में थी तो उसे नवविवाहिता, गर्भवती महिलाओं और युवा मांओं के लिए स्थानीय स्व-सहायता समूह 'आमचो बासुल' द्वारा गांव स्तर पर आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने का मौका मिला। इसी में उसे पहली बार गर्भनिरोधक यानी कंडोम, इंट्रायूटरिन कॉन्ट्रासेप्टिव डिवाइस (IUCD) यानी कॉपर टी, परिवार नियोजन और गर्भनिरोधक गोलियों आदि के बारे में पता चला।</p><p dir="ltr">स्वाभिमान कार्यक्रम के तहत महिलाओं की स्व-सहायता समूहों द्वारा यह बैठक पूरे बस्तर में महीने में एक बार आयोजित की जाती है जिसे छत्तीसगढ़, ओडिशा और बिहार की महिला समूहों द्वारा संचालित किया जाता है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन इस कार्यक्रम को तीनों राज्यों में स्वास्थ्य, नागरिक आपूर्ति, सामाजिक कल्याण, कृषि और सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी की भागीदारी से चलाता है। इस कार्यक्रम को यूनिसेफ तकनीकी और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराता है, जो क्षमता निर्माण में भी शामिल है।</p><p dir="ltr">छत्तीसगढ़ में, साल 2016 से चल रहे स्वाभिमान का संचालन '<a href="http://bihan.gov.in/home.aspx"><u>बिहान</u></a>', या सीजीएसआरएलएम यानी<a href="http://bihan.gov.in/home.aspx"><u> छत्तीसगढ़ ग्रामीण आजीविका मिशन</u></a> के तहत होता है। स्वाभिमान का जोर ऐसे समूहों पर है जिन्हें कुपोषण का अधिक खतरा है। इनमें किशोर उम्र की लड़कियां, नवविवाहित जोड़े, गर्भवती महिलाएं और दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों की माएं शामिल हैं। इसका मकसद पोषण में सुधार करना, खून की कमी (एनीमिया) को दूर करना, स्वास्थ्य सेवाओं की मांग बढ़ाना, साफ-सफाई में सुधार करना और अनचाहे गर्भ को रोकना है।<br></p><p dir="ltr">इसके अलावा आमचो बासुल 14 साल या इससे अधिक उम्र की किशोरियों के लिए किशोरी बैठकें नाम से अलग से भी बैठकें आयोजित करता है जो मुख्य तौर पर पोषण और स्वच्छता पर केंद्रित होता है। इसमें महिलाओं के स्वास्थ्य और उनके कल्याण से संबंधित विभिन्न पहलुओं के बारे में चर्चा करने और सीखने के लिए महिला समूहों को इकट्ठा किया जाता है।<br></p><p dir="ltr">ऐसी बैठकों की अगुवाई मंगुन मित्स या पोषण सखियां करती हैं, जिन्हें जागरूकता फैलाने, चर्चाओं का नेतृत्व करने और इन मुद्दों से जुड़ी तमाम गतिविधियां आयोजित करने के लिए प्रशिक्षण मिला होता है। सभी पोषण सखियां इन्हीं समुदायों से चुनी गई महिलाएं होती हैं।</p><p dir="ltr">अपनी दूसरी गर्भावस्था के दौरान पिछले कुछ महीनों में रत्नी कश्यप ने आमचो बासुल की कुछ अन्य बैठकों में हिस्सा लिया, जिसमें उसे मातृत्व और परिवार नियोजन से संबंधित कुछ सरकारी योजनाओं और उसकी पात्रता के बारे में भी जानकारी मिली। इनमें<a href="https://wcd.nic.in/schemes/pradhan-mantri-matru-vandana-yojana-0"><u> प्रधानमंत्री मातृ वंदन योजना</u></a> और<a href="https://nhm.gov.in/images/pdf/programmes/family-planing/schemes/FP_Indemnity_Scheme_2013.pdf"><u> नेशनल फैमिली प्लानिंग इनडेमिनिटी स्कीम</u></a> (एनएफपीआईएस) शामिल हैं, जो माहवारी और स्वच्छता, टीकाकरण, प्रतिरक्षण, पोषण युक्त भोजन और परिवार नियोजन से संबंधित है। इन बैठकों में हिस्सा लेने के बाद, रत्नी प्रसव से पहले तीन बार स्वास्थ्य जांच के लिए गई। इस दौरान नियमित तौर पर आयरन फॉलिक एसिड और कैल्शियम की गोलियां भी ली और भोजन में हरी सब्जियां और अंडे की मात्रा भी बढ़ाई। रत्नी ने बताया कि इस दौरान उसने मछली भी खानी शुरू की, जबकि उनका समुदाय गर्भवती महिलाओं को मछली खाने से मना करता था। इसका फायदा यह हुआ कि उसका दूसरा बच्चा पहले बच्चे की तुलना में सेहतमंद हुआ। वह अब इस बात को समझ चुकी थी कि बच्चे को पहले छह महीनों तक सिर्फ स्तनपान कराने की जरूरत होती है और फिर उसे वह नियमित तौर पर प्रतिरक्षण के लिए भी ले जाती हैं। रत्नी को इस बात का भरोसा हो गया कि उसके बच्चे अब बड़े होने पर भी स्वस्थ रहेंगे क्योंकि वह अब जान चुकी है उसे कब क्या खिलाना है और कब हैल्थ चेकअप के लिए ले जाना है।</p><p dir="ltr">रत्नी ने इंडिया स्पेंड को बताया कि अगर उन्हें पहले गर्भावस्था को टालने और दो बच्चों के बीच कितना अंतर होना चाहिए इस बारे में जानकारी होती, तो वह कम से कम दो वर्षों तक अपने दूसरे बच्चे को जन्म नहीं देती। अब जबकि गर्भनिरोध के बारे में जानकारी हो गई है तो अगले कई वर्षों तक वह तीसरे बच्चे की योजना नहीं बनाएगी।</p><p dir="ltr">देशभर में रत्नी कश्यप जैसी बहुत सी किशोरवय लड़कियों का कम उम्र में विवाह कर दिया जाता है या भागकर विवाह कर लेती हैं, सेक्स करती हैं और गर्भवती हो जाती हैं। उन्हें अक्सर गर्भनिरोधक उपायों के बारे में बहुत कम या बिल्कुल जानकारी नहीं होती। वे स्वयं तो कुपोषित होती ही हैं, कम उम्र की लड़कियां कुपोषित बच्चों को ही जन्म देती हैं और उन्हें यह नहीं पता होता कि उसे खुद क्या खाना है और बच्चों को क्या खिलाना है, कब चेकअप कराना है।</p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div class="h-embed" contenteditable="false"><div class="h-embed-wrapper desktop-only-embed"><iframe src="https://e.infogram.com/6e0567b1-9ec9-44a9-9838-7610e29baed8?src=embed" title="Women and Child Health Indicators for Chhattisgarh" width="700" height="910" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></div></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><br></p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div class="h-embed" contenteditable="false"><div class="h-embed-wrapper mobile-only-embed"><iframe src="https://e.infogram.com/6e0567b1-9ec9-44a9-9838-7610e29baed8?src=embed" title="Women and Child Health Indicators for Chhattisgarh" width="320" height="460" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></div></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"बस्तर नक्सलियों का गढ़ है जहां काफी पुराने आदिवासी समूह निवास करते हैं। इनमें से अधिकांश महिलाओं में सेहत को लेकर परेशानी बनी रहती है और प्रसव पूर्व स्वास्थ्य जांच जैसी सेवाएं ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंच नहीं पाती हैं," छत्तीसगढ़ स्थित यूनिसेफ (संयुक्त राष्ट्र बाल कोष) की पोषण विशेषज्ञ फरहत कहती हैं ।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">इंडियास्पेंड ने बस्तर में सात गांवों का दौरा किया जहां स्वाभिमान कार्यक्रम को लागू किया गया है। इस दौरान हमने पाया कि किशोर लड़कियों और युवा मांओं को स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी सुविधा और पात्रता की जानकारी, सही पोषण की अहमियत, साफ-सफाई, स्कूल की पढ़ाई छोड़ने, कम उम्र में शादी और गर्भधारण से नुकसानों की जानकारी मुहैया कराई जा रही है। पोषण और माहवारी के दौरान स्वच्छता जैसे विषयों पर बात करना पहले से आसान हुआ है, लेकिन परिवार नियोजन और गर्भनिरोध जैसे मुद्दों से अभी भी दूरी रखी जाती है।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/20/390506-1-19-year-old-severely-stunted800.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421K4EzZrKXrFP9gMNmDWQNOGtuJVqUFK6w8854918" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1611128856113" title="गंभीर रूप से अविकसित 19 वर्षीय किशोरी अपनी रसोई में मक्की का मांड बनती हुई ।" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1611128856113"><p>गंभीर रूप से अविकसित 19 वर्षीय किशोरी अपनी रसोई में मक्की का मांड बनती हुई ।<br></p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">स्वाभिमान के तहत सामुदायिक गतिविधियों का विस्तार</span></b><br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">स्वाभिमान कार्यक्रम तीन राज्यों के चार जिलों- बिहार में पूर्णिया, छत्तीसगढ़ में बस्तर और ओडिशा में कोरापुट और आंगुल में चल रहा है और इसकी पहुंच 356 गांवों और 1 लाख 25 हजार 97 परिवारों तक है।<a href="http://www.roshni-cwcsa.in/UploadDocument/Document-2020-08-31-07-08-06.pdf"><u> 2016-2019</u></a> की वार्षिक प्रगति रिपोर्ट के अनुसार, इस कार्यक्रम से अभी तक 11 हजार 180 ग्राम पंचायतों में 18 हजार 700 लड़कियों और महिलाओं को लाभ मिला है।</p><p dir="ltr"><a href="http://rchiips.org/nfhs/NFHS-4Reports/India.pdf"><u>नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे, 2015-16</u></a> के अनुसार, छत्तीसगढ़ में गर्भवती महिलाओं में से 4 प्रतिशत का प्रसव पूर्व जांच का कोई प्रमाण नहीं मिला, सिर्फ 22 प्रतिशत महिलाओं को ही प्रसव पूर्व पूर्ण स्वास्थ्य जांच मिल सकी थी। यूनिसेफ एंड<a href="https://www.iipsindia.ac.in/"><u> इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज (आईआईपीएस)</u></a> की ओर से की गई 2019 की एक अन्य<a href="https://bmcwomenshealth.biomedcentral.com/articles/10.1186/s12905-019-0787-1#citeas"><u> स्टडी</u></a> में 83 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनके परिवार के लोग अभी भी खुले में शौच कर रहे हैं, किशोर उम्र की लड़कियों में से 75 प्रतिशत ने बताया कि उन्होंने माहवारी के दौरान सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल नहीं किया। सिर्फ 14 प्रतिशत किशोर उम्र की लड़कियों ने ही सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाया।</p><p dir="ltr">यूनिसेफ की 2019 की एक<a href="https://www.cambridge.org/core/journals/journal-of-biosocial-science/article/abs/predictors-of-the-diets-consumed-by-adolescent-girls-pregnant-women-and-mothers-with-children-under-age-two-years-in-rural-eastern-india/24D7C1B803C1E57A0340F1C53E5C0D7E"><u> स्टडी</u></a> के अनुसार, एक थाली में विभिन्न खाद्य पदार्थों के पोषक तत्वों को मापने के लिए<a href="https://inddex.nutrition.tufts.edu/data4diets/data-source/dietary-diversity"><u> आहार विविधता</u></a> स्कोर का उपयोग किया गया तो पता चला कि छत्तीसगढ़ में किशोर उम्र की लड़कियों का स्कोर 4.45 प्वाइंट था। यह काफी कम है क्योंकि 6-10 प्वाइंट के एक आहार विविधता स्कोर का मतलब होता है, व्यक्ति सभी 10 खाद्य समूहों (पशु-आधारित खाद्य पदार्थों, सब्जी-आधारित खाद्य पदार्थों आदि) की खपत करता है।<br></p><p dir="ltr">मंगुन मित्स यानी पोषण सखियां नवविवाहिता, युवा मांओं और किशोर उम्र की लड़कियों के साथ मासिक बैठकें कर स्वास्थ्य और पोषण के लक्ष्यों की निगरानी करती हैं। आमचो बासुल की बैठकों में माइक्रो फाइनेंसिंग, गर्भावस्था, बच्चों की देखभाल, प्रतिरक्षण और परिवार नियोजन के मुद्दों पर बातचीत की जाती है, जबकि किशोरी बैठकों में बाल विवाह, कम उम्र में गर्भवती होने और शिक्षा से जुड़े मुद्दे प्रमुख होते हैं। सफाई, माहवारी के दौरान स्वच्छता, पोषण, आहार में विविधता और खुले में शौच के मुद्दों पर दोनों बैठकों में चर्चा की जाती है। आमतौर पर इन बैठकों में 15-20 सदस्य हिस्सा लेते हैं और वे इन जानकारियों को जीवन में उतारने के लिए तरह-तरह के गेम्स खेलते हैं।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/20/390511-2-mangun-mit800.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421PGnZQi4XH2UUdNXCOkmSHrUDM0HRk0xf8992388" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1611128993698" title="एक मंगुन मित एक चार्ट के माध्यम से इलाके की किशोरियों और महिलाओं के द्वारा झेली जाने वाली समस्याओं को समझते हुए।" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1611128993698"><p>एक मंगुन मित एक चार्ट के माध्यम से इलाके की किशोरियों और महिलाओं के द्वारा झेली जाने वाली समस्याओं को समझते हुए।<br></p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">आईआईपीएस, एनआरएलएम और यूनिसेफ की ओर से किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि किशोर उम्र की लड़कियों के बीच सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल 2016 में 36% से बढ़कर 2018 में 62% पर पहुंच गया। 10-14 साल की उम्र के बीच किशोर लड़कियों का स्कूलों में नामांकन 2016 में 86% से बढ़कर 2018 में 91% हो गया, जबकि 15-19 साल की लड़कियों के लिए यह 2016 में 55% से 2018 में 64% हो गया। लड़कियों की खुराक में भी अंडा/मीट/मछली की खपत बढ़ने से सुधार हुआ, यह 2016 में 21% से बढ़कर 2018 में 26% रहा और विटामिन ए की अधिक मात्रा वाले सब्जियों और फलों की खपत भी समान अवधि में 91.5% से बढ़कर 95% हो गई। आयरन और फॉलिक एसिड की गोलियों को लेने के प्रतिशत में भी सुधार हुआ और यह 2016 में 52% से 2018 में 55% हो गया। इसके साथ ही सामुदायिक स्वास्थ्य और स्वच्छता कार्यक्रमों में हिस्सेदारी बढ़ी।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"पिछले चार वर्षों में स्वाभिमान ने लोगों के बीच काफी जागरूकता फैलाई है। लेकिन ताली दोनों हाथों से बजती है। हम जिसे सेवाएं दे रहे हैं उसकी ओर से भी रिस्पांस मिलना जरूरी होता है," यूनिसेफ की फरहत बताती हैं। फरहत ने एक मां का उदाहरण दिया जिसे उसके बच्चे के लिए टीकाकरण की जानकारी दी गई थी लेकिन उसे स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र में टीका मिला ही नहीं।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">स्वच्छता और पोषण में सुधार</span> </b></p><p dir="ltr">17 वर्ष की सानिया मंघोरे और 16 साल की निर्वती नाग कक्षा -11 में पढ़ती हैं, जबकि 15 साल की सुबाती बघेल कक्षा-9 में। तीनों बस्तर के मुंडापाल गांव के एक ही स्कूल में जाती हैं और एक साथ किशोरी बैठकों में भी हिस्सा लेती हैं। इन तीनों की जीवन को लेकर एक जैसी योजनाएं हैं मसलन, स्कूल के बाद कंप्यूटर साइंस और नर्सिंग पढ़ना, फिर शादी और बच्चे।</p><p dir="ltr">इन तीनों से बातचीत में पता चला कि किशोरी बैठकों में शामिल होने के बाद तीनों को स्वास्थ्य और स्वच्छता के बारे में अच्छी जानकारी है, लेकिन वे अपने जीवन में इसे व्यावहारिक तौर पर अपना नहीं पाती हैं।</p><p dir="ltr">सानिया ने माहवारी चक्र के अपने पहले अनुभव के बारे में बताया कि सहेलियों से माहवारी के बारे में सुनने के बावजूद, पहली बार का अनुभव काफी डरावना था। उसने शर्माते हुए कहा, "जब मैं सोकर उठी और मैंने खून देखा तो मुझे कुछ अजीब सा लगा था। मैंने सोचा कि मैं मर जाऊंगी। मैं एक सहेली के पास गई जिसने मुझे इस बारे में पूरी जानकारी दी और मुझे इस्तेमाल करने के लिए एक कपड़ा दिया। मुझे अपने घर जाते डर लग रहा था। मेरी मां ने मुझे रसोई में नहीं आने दिया और नमक या अचार छूने से मना कर दिया। मैं बेडरूम में भी नहीं जा सकती थी जहां हम एक छोटी वेदी रखते हैं।" निर्वती और सुबाती के भी उनकी पहली माहवारी को लेकर एक जैसे अनुभव थे।</p><p dir="ltr">किशोरी बैठकों में हिस्सा लेने के साथ ही इन लड़कियों के जीवन में बदलाव आया। सानिया ने बताया, "जब दीदी (एक मंगुन मित) ने चीजों को समझाया, तो मेरी मां ने मुझे हल्दी के पानी से स्नान करने के बाद रसोई में मदद करने साथ ही सभी कमरों में जाने की भी अनुमति दी।" हल्दी में<a href="https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC6509173/"><u> संक्रमण-रोधी गुण</u></a> होते हैं और इसका धार्मिक व पारंपरिक अनुष्ठानों या रीति-रिवाजों में शुद्धीकरण के तौर पर उपयोग किया जाता है। लेकिन सानिया को अभी भी माहवारी के दौरान वेदी को छूने की अनुमति नहीं है।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/20/390516-3-sania-manghogre800.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="44216RrXv9aK0Zh3XdlpyzUwRxwiP10KwVHL9075344" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1611129076969" title="सानिया मंघोरे, 17, निर्वती नाग, 16, और सुबाती बघेल, 15, तीनों बस्तर के मुंडापाल गांव के एक ही स्कूल में जाती हैं और एक साथ किशोरी बैठकों में भी हिस्सा लेती हैं।&nbsp;" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1611129076969"><p>सानिया मंघोरे, 17, निर्वती नाग, 16, और सुबाती बघेल, 15, तीनों बस्तर के मुंडापाल गांव के एक ही स्कूल में जाती हैं और एक साथ किशोरी बैठकों में भी हिस्सा लेती हैं।&nbsp;</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">तीनों लड़कियों ने बताया कि उन्हें इन बैठकों की वजह से स्वस्थ रहने के तौर तरीकों की जानकारी मिली है। इंडियास्पेंड से बातचीत में निर्वती ने बताया, "बैठकों में हमने सीखा कि माहवारी के दौरान सूती कपड़े या सैनिटरी पैड का इस्तेमाल करना चाहिए और हर छह घंटे में इसे बदलना चाहिए। अब हमें पता है कि हर बार पैड बदलने पर उसे साबुन और पानी से पूरी तरह साफ करने की जरूरत है। हमें किसी कपड़े को तीन महीने से अधिक इस्तेमाल नहीं करना है और इसका निस्तारण उसे जलाकर या जमीन में दबाकर करना चाहिए।"<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">अब ये तीनों लड़कियां सिर्फ सैनिटरी पैड का ही इस्तेमाल करती हैं। वे सात पैड का एक पैकेट 30 रुपये में खरीदती हैं और यह एक चक्र तक चलता है। हालांकि, सुबाती ने बताया वे सामान्य सलाह से इतर एक ही पैड को 12 घंटे से अधिक इस्तेमाल करती हैं क्योंकि पैड की सोखने की क्षमता ज्यादा है और ज्यादा चलता भी है। उसने ये भी बताया कि एक महीने में 30 रुपये खर्चना काफी महंगा है, हम इससे अधिक खर्च नहीं कर सकते।"</p><p dir="ltr">बैठकों में पोषण पर सबसे अधिक चर्चा होती है और इस तरह से इन लड़कियों के लिए यह अब सामान्य जानकारी बन गई है। उन्हें घर पर सब्जियां उगाने का तरीका भी सिखाया गया है लेकिन वे नियमित तौर पर इसे नहीं अपना रही हैं। सुबाती ने कहा, "हम आयरन-फॉलिक एसिड की गोलियां लेते हैं लेकिन जितनी बताई गई हैं उतनी नहीं क्योंकि इससे हमारा पेट खराब हो जाता है।"</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/20/390519-4-adolescent-girl1000.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421TiH7RoxjXgo3aXH0nvsXZ7TWStgVe3Gf9159898" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1611129162926" title="एक किशोरी हरी सब्ज़ियों की देखभाल, जो उसने किशोरी बैठक में सीखा, करते हुए&nbsp;" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1611129162926"><p>एक किशोरी हरी सब्ज़ियों की देखभाल, जो उसने किशोरी बैठक में सीखा, करते हुए&nbsp;</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"शाकाहारी परिवारों की बहुत सी लड़कियों की खुराक में अभी भी पर्याप्त प्रोटीन नहीं है। सब्जियां उगाने वाली लड़कियों के माता-पिता अक्सर सब्जियों को घर पर पकाने के बजाय बेच देते हैं क्योंकि यहां अधिकतर परिवार गरीब हैं," अलवाही गांव की एक मंगुन मित, ललिता बघेल ने बताया।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">असहज होता है सेक्स के बारे में बात करना</span></b></p><p dir="ltr">चूंकि इन बैठकों में सेक्स और गर्भनिरोध के मुद्दों पर बातचीत करना असहज होता है, लिहाजा इन तीनों किशोर उम्र की लड़कियों ने गर्भनिरोधकों के बारे में अनौपचारिक स्रोतों मसलन अपनी भाभी, अन्य रिश्तेदारों या घर से भागने वाली सहेलियों से जानकारी हासिल की है।</p><p dir="ltr">किशोरी बैठकों में हिस्सा ले चुकी बहुत सी किशोर उम्र की लड़कियों ने इंडियास्पेंड को बताया कि उन्हें बाल विवाह और किशोरावस्था में गर्भवती होने के नुकसानों की जानकारी थी लेकिन उन्हें परिवार नियोजन के बारे में कुछ नहीं पता था।</p><p dir="ltr">सानिया कहती है कि लोग लड़कियों को सेक्स न करने की सलाह देते हैं, हालांकि ये उसकी मर्जी पर छोड़ दिया जाना चाहिए। उसे किसी से प्यार हो सकता है या वह किसी के साथ भाग सकती है। फिर जब वह गर्भवती हो जाती है, तो पूरा दोष उस पर मढ़ दिया जाता है, इसलिए लड़कियों को सुरक्षित सेक्स के बारे में बैठकों में बताया जाना चाहिए। सानिया ने आगे कहा, "अभी तक इस तरह का कोई सत्र नहीं हुआ है। अगर दीदी (मंगुन मित) हमें सुरक्षित सेक्स के बारे में बताएंगी, तो हम उसे जरूर सुनेंगे।"</p><p dir="ltr">सेक्स के बारे में अपनी सीमित जानकारी के बावजूद, सानिया कंडोम को बेहतर गर्भनिरोधक मानती है। उसने बताया, "मैं अपने पति से इसे इस्तेमाल करने को कहूंगी।" जबकि निर्वती को गर्भनिरोधक गोलियां पसंद है। उसके मुताबिक, ऐसी चीजों के बारे में पति से नहीं कहा जा सकता। तो सुबाती स्थानीय परंपरागत तरीकों को सही मानती हैं। उसने बताया, "मैं इमली का इस्तेमाल करूंगी क्योंकि मेरी भाभी इसका इस्तेमाल करती हैं और वह अभी तक गर्भवती नहीं हुई हैं।"</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/20/390529-5-everybody-sania898.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-uid="4421g2cQfOmSmdYhkFgNrSQrL3Vrik7m23789679100" data-float-none="true" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1611132268685"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none" id="info_item_1611132268685"><br></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p style="text-align: center; "><span style="font-size: 14px;">"सब लड़कियों को सेक्स ना करने की सलाह देते हैं, लेकिन ये उसकी इच्छा है... इस लिए हमे सुरक्षित सेक्स के बारे में बताया जाना चाहिए," 17 वर्षीय सानिया कहती है</span>&nbsp;</p><p dir="ltr">इंडियास्पेंड ने लड़कियों और महिलाओं के साथ बातचीत में पाया कि बस्तर के इलाकों में लड़कियों की कम उम्र में ही यौन सक्रियता बढ़ जाती है। एक स्थानीय मंगुन मित ने बताया कि प्रेमियों के साथ भागना और कम आयु में विवाह भी सामान्य है, खासतौर पर आदिवासी क्षेत्रों में। सोनरपाल गांव की एक मंगुन मित, नुपुर हल्दर ने बताया, "ऐसी बातचीत करना मुश्किल है, हमें भी हिचक होती है, हम इसे प्रोत्साहित नहीं करना चाहते।"<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">सेक्स और गर्भनिरोधकों के बारे में बात करना मंगुन मित के लिए न सिर्फ असहज होता है, बल्कि शादी से पहले चाहे वो किसी भी उम्र की हों, यौन संबंध बनाने को वह सिरे से खारिज करती हैं। इसकी वजह बताते हुए बघेल ने बताया, "लड़कियां अगर शादी से पहले यौन संबंध बनाती है तो इसका खामियाजा उसे ही भुगतना पड़ता है।" बस्तर के इलाकों में कम उम्र में यौन सक्रियता को बघेल स्वाभिमान कार्यक्रम के लिए चुनौती मानती हैं।</p><p dir="ltr">"इस बारे में आप जागरूकता बढ़ा सकते हैं, जानकारी मुहैया करा सकते हैं लेकिन आप व्यवहार में त्वरित बदलाव सुनिश्चित नहीं कर सकते। इस तरह के बदलाव में वक्त लगता है," बस्तर में स्वाभिमान कार्यक्रम में मदद कर रही भारती साहू ने बताया।</p><p dir="ltr">स्वाभिमान कार्यक्रम के सामने अन्य चुनौतियों में गरीबी, कम आमदनी, लड़कियों को शिक्षा देने के कम आर्थिक लाभ, कम आयु में शादी को सामाजिक स्वीकृति और कुपोषण शामिल हैं।</p><p dir="ltr"><i>(यह खबर </i><a href="https://indiaspend.com/"><i><u>इंडियास्पेंड </u></i></a><i>में प्रकाशित की गई </i><a href="https://www.indiaspend.com/women-2/women-collectives-tackle-teen-sex-contraception-and-nutrition-705646"><i><u>खबर</u></i></a><i> का हिंदी अनुवाद है।)</i></p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i></p></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/women-2/women-collectives-tackle-teen-sex-contraception-and-nutrition-716466</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/women-2/women-collectives-tackle-teen-sex-contraception-and-nutrition-716466</guid>
<category><![CDATA[Chattisgarh,Welfare,नवीनतम रिपोर्ट,महिलाएं,शासन,सेहत,सेहतकीपड़ताल,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[प्राची सालवे]]></dc:creator>
<pubDate>Wed, 20 Jan 2021 07:56:05 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/20/500x300_390470-women-contraception-and-nutrition.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[भारत के कोविड-19 वैक्सीन ट्रायल में शामिल होने वालों ने लगाया गुमराह करने का आरोप]]></title>
<description><![CDATA[हमारी ग्राउंड रिपोर्ट से पता चला है कि कोवैक्सीन ट्रायल में हिस्सा लेने वाले आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्र के लोगों को 750 रुपये मिलने का लालच दिया गया था और उन्हें यह समझ नहीं आया कि वे एक ट्रायल में शामिल हो रहे हैं। इस ट्रायल के बाद एक व्यक्ति की मृत्यु हुई है और हिस्सा लेने वाले बहुत से लोग बीमार हो रहे हैं।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>भोपालः </b>जनवरी की दोपहर में भोपाल में अपने पड़ोसी के घर के बाहर बैठे मान सिंह परिहार, 74, गुस्से में हैं। उन्हें पिछले कुछ दिनों से बुखार और शरीर में दर्द है। उन्होंने पिछले दिसंबर में पूरी जानकारी के बिना कोविड-19 वैक्सीन ट्रायल में हिस्सा लिया था। उन्हें लगता है कि टीका लगाए जाने के कारण उन्हें इन परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">इंडियास्पेंड के साथ इस बातचीत से पहले तक उन्हें यह ध्यान नहीं आया था कि उन्हें उस हॉस्पिटल को फ़ोन करना चाहिए, जहां उन्हें इंजेक्शन लगाया गया था। क्लिनिकल ट्रायल के प्रायोजकों और जाँचकर्ताओं को हिस्सा लेने वाले लोगों के स्वास्थ्य की निगरानी और उसका रिकॉर्ड रखना होता है। इसके बाद परिहार ने अपने बेटे से हॉस्पिटल को फ़ोन करने के लिए कहा, लेकिन उनके बेटे के फ़ोन में बैलेंस नहीं था । परिहार के बेटे की टीबी के कारण कुछ महीनों पहले नौकरी छूट गई थी और उसके बाद से उसके फोन में बैलेंस नहीं है। फोन करने के लिए पैसे नहीं होने के कारण, परिहार वैक्सीन ट्रायल के बाद अपनी खराब सेहत को लेकर डॉक्टर से संपर्क नहीं कर सकते थे। उन्होंने बताया कि उन्हें किसी ने फ़ोन भी नहीं किया है।</p><p dir="ltr">"दिसंबर में इस इलाके में एक ट्रक आया था और लाउडस्पीकर पर घोषणा की गई थी कि जो भी व्यक्ति कोविड-19 वैक्सीन और इसे लगवाने के लिए 750 रुपये चाहता है, वह पास के पीपल्स हॉस्पिटल में जाकर इसे लगवा सकता है। मुझे पैसे की जरूरत थी," परिहार ने बताया. इंडियास्पेंड ने उत्तर भोपाल में गरीब नगर और ओरिया बस्ती में लगभग एक दर्जन लोगों से बात की और उन सभी ने ऐसी ही जानकारी दी।<br></p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/14/385755-covaxin-trial-particiapant-bhopal.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421r9O0oKbPynji4okd7MI4FBnL1UE6VuRX6639245" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1610656639384"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none" id="info_item_1610656639384"><br></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">परिहार <a href="http://ctri.nic.in/Clinicaltrials/showallp.php?mid1=48057&amp;EncHid=&amp;userName=CTRI/2020/11/028976"><u>कोवैक्सीन</u></a> की बात कर रहे रहे थे, जिसे भारत में <a href="https://pib.gov.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1685761"><u>रेस्ट्रिक्टेड इमरजेंसी अप्रूवल</u></a> दिया गया है, इसका अभी तक क्लिनिकल ट्रायल चल रहा है। देश में बनी इस वैक्सीन को एक प्राइवेट कंपनी, <a href="https://www.bharatbiotech.com/"><u>भारत बायोटेक</u></a> और एक सरकारी एजेंसी इंडियन <a href="https://www.icmr.gov.in/"><u>काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च</u></a> ने मिलकर विकसित किया है।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">ट्रायल में गड़बड़ियों की ख़बरें मिलने के बाद, इस रिपोर्टर ने भोपाल के कम आमदनी वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की ओर से लगाए गए आरोपों की जांच के लिए इन क्षेत्रों का दौरा किया। बहुत से लोगों ने कहा कि उन्हें यह नहीं पता था कि वे एक क्लिनिकल ट्रायल का हिस्सा हैं और उन्हें लगा कि उन्हें वास्तविक कोविड-19 वैक्सीन दी गई थी। अधिकतर लोगों के लिए इसमें शामिल होने का कारण पैसा था। इनमें से कई ने बताया कि वे अनपढ़ हैं और उन फॉर्म को नहीं पढ़ सकते थे जिन पर उन्होंने हस्ताक्षर किए थे।</p><p dir="ltr">इन लोगों का यह भी आरोप है कि उन्हें दुष्प्रभावों की आशंका या मृत्यु या दिव्यांग होने जैसे गंभीर परिणामों के लिए मुआवजा मिल सकने की जानकारी नहीं दी गई थी। हालांकि, भारत बायोटेक ने एक प्रेस रिलीज जारी कर दावा किया है कि जिन प्रतिकूल प्रभावों की रिपोर्ट मिली है उन्हें उपयुक्त तरीके से रिकॉर्ड किया गया है। इसमें यह भी कहा गया है कि ट्रायल में शामिल बहुत से लोगों के पास मोबाइल फोन नहीं थे जिस पर उनके स्वास्थ्य की स्थिति के बारे में पूछा जा सकता। कंपनी ने बताया है कि उनसे किसी अन्य जरिए से भी संपर्क नहीं किया गया।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">बीमारी और मृत्यु</span></b></p><p dir="ltr">7 जनवरी को, भारत बायोटेक ने क्लिनिकल ट्रायल के महत्वपूर्ण तीसरे चरण में सभी <a href="http://ctri.nic.in/Clinicaltrials/showallp.php?mid1=48057&amp;EncHid=&amp;userName=CTRI/2020/11/028976"><u>26</u></a> साइट्स के लिए 25,800 वॉलंटियर्स को सफलतापूर्वक नियुक्त करने की <a href="https://twitter.com/BharatBiotech/status/1347112997009854467"><u>घोषणा</u></a> की थी। ट्रायल के पहले दो चरणों में लगभग <a href="https://pib.gov.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1685761"><u>800 लोग</u></a> शामिल थे।</p><p dir="ltr">भोपाल में कोवैक्सीन का ट्रायल <a href="https://www.peoplesuniversity.edu.in/"><u>पीपल्स यूनिवर्सिटी</u></a> में किया जा रहा है, जो गरीब नगर और ओरिया बस्ती के निकट है जहां सैंकड़ों कम आमदनी वाले परिवार --इनमें से कई 1984 की <a href="https://web.archive.org/web/20120518020821/http:/www.mp.gov.in/bgtrrdmp/relief.htm"><u>भोपाल गैस त्रासदी</u></a> में बच गए थे – रहते हैं। इन इलाकों में रहने वालों ने इंडियास्पेंड को बताया कि महामारी के कारण पूरे वर्ष स्कूलों में छात्र नहीं गए और बहुत से पुरुषों के पास पिछले पूरे वर्ष रोज़गार या आमदनी नहीं थी । </p><p dir="ltr">भोपाल के एक अन्य हिस्से में, वैजंती, जो एकल नाम का इस्तेमाल करती हैं, रो रही हैं और बहुत से टेलीविजन कैमरा और रिपोर्टर उनके एक कमरे के किराए के घर में मौजूद हैं। उनके पति दीपक मरावी की कोविड-19 ट्रायल में हिस्सा लेने के नौ दिन बाद मृत्यु हो गई थी। उन्हें जनवरी में पोस्ट-मार्टम रिपोर्ट मिली थी, जिसमें बताया गया था कि उनकी मृत्यु <b>"</b>संदिग्ध तौर पर जहर देने<b>"</b> से हुई होगी।</p><p dir="ltr">वैजंती ने 9 जनवरी को इंडियास्पेंड को बताया, "वैक्सीन से मेरे पति को जहर दिया गया था।" उन्होंने कहा था कि वैक्सीन ट्रायल टीम से किसी ने भी मृत्यु की जांच के लिए उनके परिवार से संपर्क नहीं किया है।</p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div class="h-embed" contenteditable="false"><div class="h-embed-wrapper"><blockquote contenteditable="false" class="twitter-tweet" data-conversation="none" data-dnt="true"><p lang="en" dir="ltr">Maravi's family in Bhopal say they believe he died because of the vaccine. They have not received any information from the govt or <a href="https://twitter.com/BharatBiotech?ref_src=twsrc%5Etfw">@bharatbiotech</a> on what happened to Maravi, they say <a href="https://t.co/fDlizD32mO">pic.twitter.com/fDlizD32mO</a></p>— IndiaSpend (@IndiaSpend) <a href="https://twitter.com/IndiaSpend/status/1347849700477599747?ref_src=twsrc%5Etfw">January 9, 2021</a></blockquote> </div></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">भारत बायोटेक ने 9 जनवरी को प्रेस को दिए एक बयान में मरावी के क्लिनिकल ट्रायल में शामिल होने की पुष्टि की है। इसमें कहा गया है कि एक शुरुआती समीक्षा में यह संकेत मिला है कि "मृत्यु का संबंध स्टडी में दी गई डोज से नहीं है"। इसकी "विस्तृत जांच की गई है" और पाया गया है कि "मृत्यु वैक्सीन या प्लसिबो से संबंधित नहीं है।" कंपनी ने बताया कि वह "इसकी पुष्टि नहीं कर सकती कि वॉलंटियर को स्टडी वैक्सीन दी गई थी या एक प्लसिबो क्योंकि स्टडी ब्लाइंडेड (डोज के प्रकार की जानकारी नहीं होना) थी।"<br></p><p dir="ltr">मरावी और परिहार ने भारत बायोटेक के क्लिनिकल ट्रायल के लिए अपने परिवारों को सूचना दिए बिना हस्ताक्षर किए थे, परिवारों को उनके बीमार पड़ने के बाद ही इसका पता चला था। मरावी की पत्नी वैजंती और परिहार दोनों ने कहा कि उन्हें उस कंसेंट फॉर्म (सहमति पत्र) की कॉपी नहीं मिली है जिस पर साइन किए गए थे।<br></p><p dir="ltr">"हॉस्पिटल में उस दिन वैक्सीन लगवाने का इंतजार कर रहे सैंकड़ों लोग थे। प्रत्येक व्यक्ति मेरी तरह निर्धन था। मुझे वहां कोई भी अमीर व्यक्ति इंजेक्शन लगवाते नहीं दिखा था," परिहार ने बताया। अब, वह दूसरी बार इंजेक्शन लगवाने वापस नहीं जाना चाहते, जो इस महीने लगना है।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/14/385756-covid-vaccine-trial-near-peoples-hospital-gareeb-nagar.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421AbCRBPzuDEtkmYriuWvPik54qBNolMvV6696108" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1610656695694"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none" id="info_item_1610656695694"><br></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">कंपनी के दावे बनाम लोगों के अनुभव</span></b><br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">भोपाल में ट्रायल में शामिल हुए कई लोगों ने इंडियास्पेंड को बताया कि उन्होंने सोचा था कि उन्हें वास्तविक वैक्सीन दी जा रही है और उन्हें यह नहीं पता था कि उन्होंने एक क्लिनिकल ट्रायल के लिए हस्ताक्षर किए थे। ट्रायल में शामिल हुए गरीब नगर से निवासी, राम सिंह अहीरवाल ने बताया, "मैं अनपढ़ हूं और मैं उन दस्तावेज़ों को नहीं पढ़ सका था जो उन्होंने दिखाए थे... लेकिन मैंने उन पर हस्ताक्षर किए थे।" अन्यों ने भी इसी तरह की जानकारी दी।<br></p><p dir="ltr">उनका यह भी आरोप था कि उन्हें संभावित दुष्प्रभावों के बारे में चेतावनी नहीं दी गई और ट्रायल के बाद बीमार पड़ने पर उनकी शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया गया।<br></p><p dir="ltr"><a href="https://cdsco.gov.in/opencms/export/sites/CDSCO_WEB/Pdf-documents/NewDrugs_CTRules_2019.pdf"><u>देश में क्लिनिकल ट्रायल के नियमों</u></a> में कहा गया है कि क्लिनिकल ट्रायल में शामिल होने वाले लोगों को इसके बारे में जानकारी देकर उनकी सहमति ली जानी चाहिए, जिसमें उन लोगों के लिए एक अलग प्रक्रिया शामिल है जो पढ़ या लिख नहीं सकते या वे 'जो कमजोर विषय' हो सकते हैं। जो लोग पढ़ या लिख नहीं सकते उनके लिए, जानकारी देकर सहमति लेने और दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करने की पूरी प्रक्रिया के दौरान 'एक निष्पक्ष' गवाह मौजूद होना चाहिए। नियमों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि 'कमजोर विषयों' के शामिल होने पर जानकारी वाली सहमति प्रक्रिया की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग होनी चाहिए।</p><p dir="ltr">पीपल्स यूनिवर्सिटी के डीन ए. के दीक्षित ने बताया, "कमरे में वीडियोग्राफर था जिसने जानकारी वाली सहमति की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग की थी।" लेकिन इंडियास्पेंड को कई लोगों ने बताया कि उन्हें ट्रायल में कोई ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं दिखी थी। "मैंने किसी को भी पूरी प्रक्रिया का ऑडियो या वीडियो रिकॉर्ड करते नहीं देखा," अहीरवाल ने कहा।<br></p><p dir="ltr">भारत बायोटेक के बयान और मरावी की मृत्यु से इनमें से बहुत से मुद्दों पर लापरवाही दिखी है। बयान में कहा गया है कि ट्रायल में हिस्सा लेने वालों पर फैसला शामिल करने के तय मापदंड के आधार पर किया गया था और ट्रायल में शामिल करने से पहले हिस्सा लेने वालों के स्वास्थ्य का आकलन हुआ था।<br></p><p dir="ltr">इसमें यह भी बताया गया है कि सभी प्रतिकूल घटनाओं और गंभीर प्रतिकूल प्रभावों, जैसे जिनसे मृत्यु या दिव्यांगता हो सकती है, की रिपोर्ट एथिक्स कमेटी और सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन को <a href="https://cdsco.gov.in/opencms/export/sites/CDSCO_WEB/Pdf-documents/NewDrugs_CTRules_2019.pdf"><u>भारतीय कानून के अनुसार</u></a> दी गई थी। इसमें दावा किया गया है कि उनके प्रोटोकॉल के अनुसार, हिस्सा लेने वाले सभी लोगों से टेस्ट और चेक-अप के लिए संपर्क किया जा रहा है।<br></p><p dir="ltr">लेकिन परिहार जैसे बहुत से लोगों के पास स्वास्थ्य के जुड़ी अपनी मुश्किलों की शिकायत करने के लिए हॉस्पिटल से संपर्क करने का पैसा नहीं है, और अन्यों के पास ऐसा करने के लिए मोबाइल फोन नहीं है।<br></p><p dir="ltr">ट्रायल में हिस्सा लेने वालों को प्रति डोज़ 750 रुपये का भुगतान करने के बारे में, कंपनी ने कहा कि देश की <a href="http://www.sgpgi.ac.in/sop/GCP-%20Indian.pdf"><u>गुड क्लिनिकल प्रैक्टिस गाइडलाइंस</u></a> में इसकी अनुमति है। इस राशि का फैसला उन संस्थानों में एथिक्स कमेटियां करती हैं जहां ट्रायल किए जा रहे हैं।<br></p><p dir="ltr">गाइडलाइंस में कहा गया है कि भुगतान "इतना अधिक" नहीं होना चाहिए जिससे लोगों को ट्रायल में "उनकी बेहतर समझ (लालच)" के खिलाफ हिस्सा लेने के लिए मजबूर होना पड़े। भारत बायोटेक ने इस पर कहा कि 750 रुपये का भुगतान "एक लालच" नहीं था।<br></p><p dir="ltr">हालांकि, इंडियास्पेंड ने जिन लोगों से बात की उनमें से कई ने कहा कि उनके लिए 750 रुपये दो दिन की दिहाड़ी के बराबर थे, और परिहार जैसे लोगों को इंजेक्शन लगवाने के लिए पैसा एक पर्याप्त कारण लगा था।<br></p><p dir="ltr">इंडियास्पेंड ने भोपाल में कोवैक्सीन क्लिनिकल ट्रायल में शामिल हुए लोगों की ओर से लगाए गए आरोपों पर भारत बायोटेक और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) को प्रश्न भेजे हैं। उनके उत्तर मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा।<br></p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">समान ट्रायल, अलग शहर</span></b><br></p><p dir="ltr">मुंबई में, 22 वर्षीय रौनक, जिनका एकल नाम है, ने दिसंबर 2020 में सायन हॉस्पिटल में भारत बायोटेक के फेज 3 ट्रायल में हिस्सा लिया था। भोपाल में गड़बड़ी जैसी स्थिति के विपरीत, उन्होंने इंडियास्पेंड को जनवरी में फोन पर बताया कि उनका अनुभव अच्छा रहा था। एक बड़े शहर में कॉलेज छात्र, रौनक की सामाजिक-आर्थिक स्थिति भोपाल के निम्नवर्गीय इलाकों में रहने वालों से काफी अलग है।<br></p><p dir="ltr">भोपाल में किए गए ट्रायल के तरीके से अलग, मुंबई में, रौनक ने बताया कि सायन हॉस्पिटल में ट्रायल कर रहे लोगों ने यह समझाने में कम से कम 10 मिनट लगाए थे कि प्रक्रिया किस तरह होगी। रौनक से प्रश्न पूछने और अपने संदेह को दूर करने का मौका दिया गया था। हालांकि, भोपाल में कई लोगों के मामले की तरह, रौनक ने भी <a href="https://archive.org/details/bbv-152-consent-and-information-sheet-1/page/4/mode/2up"><u>सहमति पत्र</u></a> पर हस्ताक्षर करने से पहले उसे पूरी तरह नहीं पढ़ा था। हालांकि, उन्हें इस सहमति की एक कॉपी घर ले जाने के लिए दी गई थी।<br></p><p dir="ltr">भोपाल में हिस्सा लेने वालों की तरह, उन्हें भी ट्रायल में हिस्सा लेने के लिए कुछ राशि (1,500 रुपये) दिए गए थे। हालांकि, यह भोपाल से कुछ अलग था, जहां हिस्सा लेने वालों ने आरोप लगाया है कि उन्हें नामांकन के लिए एक लालच के तौर पर राशि के बारे में पहले बताया गया था।<br></p><p dir="ltr">भोपाल गैस त्रासदी में बचे लोगों के साथ कार्य करने वाली रचना ढींगरा ने कहा, "मुझे शक है कि भारत बायोटेक या कोई अन्य एजेंसी एक बड़े शहर के समृद्ध हिस्से में ट्रकों और लाउडस्पीकरों के साथ जाएगी और लोगों को 750 रुपये [प्रति विजिट] की पेशकश और यह दावा करेगी कि यह वैक्सीन के लिए है।"<br></p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">'क्लिनिकल ट्रायल मोड'</span></b><br></p><p dir="ltr">देश में क्लिनिकल ट्रायल पर <a href="http://legislative.gov.in/sites/default/files/A1940-23.pdf"><u>ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940</u></a> और <a href="https://cdsco.gov.in/opencms/export/sites/CDSCO_WEB/Pdf-documents/NewDrugs_CTRules_2019.pdf"><u>न्यू ड्रग्स एंड क्लिनिकल ट्रायल्स रूल्स, 2019</u></a> के तहत नियंत्रण किया जाता है।<br></p><p dir="ltr">देश के ड्रग कंट्रोलर ने 3 जनवरी को एक प्रेस बयान जारी कर भारत में बनी दो कोविड-19 वैक्सीन के लिए <a href="https://pib.gov.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1685761"><u>सीमित आपात अनुमति</u></a> दी थी, लेकिन इसमें कहा गया था कि भारत बायोटेक की कोवैक्सीन को <b>"</b>क्लिनिकल ट्रायल मोड<b>"</b> में लगाया जाएगा। भारतीय कानून में <b>"</b>क्लिनिकल ट्रायल मोड<b>"</b> में वैक्सीन लगाने के कोई प्रावधान नहीं हैं।</p><p dir="ltr"><a href="https://www.youtube.com/watch?v=mMbVLR1QTp8"><u>दो दिन बाद</u></a>, आईसीएमआर के प्रमुख ने स्पष्ट किया था कि "क्लिनिकल ट्रायल मोड" का मतलब है कि इन दोनों वैक्सीन को लगवाने वाले लोगों को सहमति देने और उनका फॉलो-अप किए जाने की जरूरत होगी। उन्होंने यह नहीं कहा था कि क्या ट्रायल में हिस्सा लेने वालों को किन्हीं गंभीर प्रतिकूल दुष्प्रभावों के लिए मुआवजा मिलेगा, हालांकि, देश में इसे लेकर सख्त नियम हैं।<br></p><p dir="ltr">मुआवज़े का फैसला एक फ़ॉर्मूला के आधार पर किया जाता है जिसमें हिस्सा लेने वाले की आयु, अन्य बीमारियाँ होना और बीमारियों की अवधि, जन्म से कमी होना और क्या ट्रायल से हुए गंभीर प्रतिकूल दुष्प्रभाव को ठीक किया जा सकता है, जैसे तथ्यों पर ध्यान दिया जाता है। मृत्यु के लिए मुआवज़े की शुरुआत 8 लाख रुपये ($10,902) से होती है।<br></p><p dir="ltr">विदेश में, ट्रायल में हिस्सा लेने वालों की मृत्यु या उनमें अन्य प्रतिकूल प्रभावों की रिपोर्टों पर कोविड-19 वैक्सीन के कुछ बड़े क्लिनिकल ट्रायल को रोक दिया गया है।<br></p><p dir="ltr">पिछले वर्ष एस्ट्राजेनेका ने अपने अंतिम-चरण के ट्रायल को हिस्सा लेने वाले एक व्यक्ति में प्रतिकूल प्रभाव होने की रिपोर्ट मिलने के बाद <a href="https://www.nytimes.com/2020/09/08/health/coronavirus-astrazeneca-vaccine-safety.html"><u>रोक दिया</u></a> था। अक्टूबर में, जॉन्सन एंड जॉन्सन ने अपने <a href="https://store.wsj.com/shop/apac/in/wsjinss21/?trackingCode=aaqwghvn&amp;cid=WSJ_RD_ALL_ACQ_NA"><u>क्लिनिकल ट्रायल को तब तक के लिए रोक दिया</u></a> था जब तक विशेषज्ञों का एक पैनल उनके ट्रायल में हिस्सा लेने वाले एक व्यक्ति को एक बीमारी होने की जांच पूरी करता है। जनवरी में नॉर्वे की सरकार ने भी फ़ाइज़र की कोविड-19 वैक्सीन लगवाने वाले दो लोगों की <a href="https://nypost.com/2021/01/07/norway-investigating-two-deaths-of-people-who-took-pfizer-vaccine/"><u>मृत्यु की एक जांच</u></a> शुरू की है।</p><p dir="ltr">भारत में, ड्रग कंट्रोलर ने सीरम इंस्टीट्यूट को एस्ट्राजेनेका/ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन के लिए ट्रायल में शामिल होने वाले लोगों की <a href="https://www.thehindu.com/news/national/oxford-vaccine-dcgi-directs-serum-institute-of-india-to-suspend-recruitment-for-trials/article32587331.ece"><u>नियुक्ति रोकने</u></a> को कहा था। यह निर्देश ब्रिटेन में इस वैक्सीन के ट्रायल में एक व्यक्ति में प्रतिकूल प्रभाव होने की रिपोर्ट मिलने के बाद दिया गया था।<br></p><p dir="ltr">भारत वैक्सीन की कोवैक्सीन के विपरीत, कोविड-19 वैक्सीन को लेकर दौड़ में आगे चल रहे बहुत से संस्थानों ने अपने क्लिनिकल प्रोटोकॉल और सहमति पत्रों का सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध कराया है। (<a href="https://www.modernatx.com/sites/default/files/mRNA-1273-P301-Protocol.pdf"><u>मॉडर्ना</u></a>, <a href="https://s3.amazonaws.com/ctr-med-7111/D8110C00001/52bec400-80f6-4c1b-8791-0483923d0867/c8070a4e-6a9d-46f9-8c32-cece903592b9/D8110C00001_CSP-v2.pdf"><u>एस्ट्राजेनेका/ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी</u></a>, <a href="https://www.jnj.com/coronavirus/covid-19-phase-3-study-clinical-protocol"><u>जैनसेन</u></a>, <a href="https://www.jnj.com/coronavirus/covid-19-phase-3-study-clinical-protocol"><u>फाइजर</u></a>, <a href="https://www.novavax.com/sites/default/files/2020-11/2019nCoV302Phase3UKVersion2FinalCleanRedacted.pdf"><u>नोवोवैक्स</u></a>, <a href="https://www.novavax.com/sites/default/files/2020-11/2019nCoV302Phase3UKVersion2FinalCleanRedacted.pdf"><u>कैनसाइनो</u></a> के लिए क्लिनिकल प्रोटोकॉल और <a href="https://www.modernatx.com/sites/default/files/u1421/Moderna_mRNA-1273-P301-Informed-Consent.pdf"><u>मॉडर्ना</u></a>, <a href="https://www.covid19vaccinetrial.co.uk/files/cov002pisages18-55yearsv15010dec2020pdf"><u>एस्ट्राजेनेका/ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी</u></a>, <a href="https://www.henryford.com/-/media/files/henry-ford/hcp/covid19/j-and-j-covid19-study/informed-consent-form--irb-jj-trial.pdf"><u>जैनसेन</u></a> के लिए सहमति पत्रों को देखें)।<br></p><p dir="ltr"><i>(यह खबर </i><a href="https://www.indiaspend.com/"><i><u>इंडियास्पेंड </u></i></a><i>में प्रकाशित की गई </i><a href="https://www.indiaspend.com/covid-19/indias-covid-19-vaccine-trial-participants-claim-they-were-misled-713061"><i><u>खबर </u></i></a><i>का हिंदी अनुवाद है।)</i><br></p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i><br></p><div><br></div></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/covid-19/indias-covid-19-vaccine-trial-participants-claim-they-were-misled-714369</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/covid-19/indias-covid-19-vaccine-trial-participants-claim-they-were-misled-714369</guid>
<category><![CDATA[Covid-19,Development,Madhya Pradesh,कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,सेहत,सेहतकीपड़ताल,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[अनू भूयन]]></dc:creator>
<pubDate>Thu, 14 Jan 2021 20:39:51 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/14/500x300_385754-peoples-university-bhopal-covaxin-vaccine-cover.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बिहार की महिलाएं इंटरनेट से काफी दूर, 5 में से 4 ने कभी नहीं किया
इस्तेमाल]]></title>
<description><![CDATA[बिहार में उन महिलाओं का सबसे कम प्रतिशत है जिन्होंने कहा कि उनके पास इंटरनेट तक पहुंच है (20.6%); सिक्किम में सबसे अधिक है (76.7%), पांचवें नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के हाल ही में जारी किये गये आंकड़े बताते हैं। ये आंकड़े ये भी दर्शाते हैं की महिलाओं के मुकाबले पुरुषों और ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले शहरी क्षेत्रों के पास इंटरनेट की पहुँच बेहतर है ।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>नई दिल्लीः </b>क्या आपने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल किया है? जब ये प्रश्न बिहार के लोगों से पूछा गया तो पाया गया की प्रदेश में पांच में से चार महिलाओं ने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं किया है। बिहार में ऐसी महिलाएं जिन्होंने कम से कम एक बार इंटरनेट का प्रयोग किया है 20.6% हैं जबकि पुरुषों में ये आंकड़ा 43.6% है जो की महिलाओं से दुगने से भी अधिक है ।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">भारत में पहली बार सरकार के एक सर्वेक्षण में लोगों ने यह पूछा गया कि क्या उन्होंने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल किया है। यह प्रश्न पांचवें नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) का हिस्सा था, जिसके आंकड़े हाल ही में जारी किये गये हैं। सर्वेक्षण पिछले वर्ष किया गया था।</p><p dir="ltr">बिहार में उन महिलाओं का सबसे कम प्रतिशत था जिन्होंने कहा कि उनके पास इंटरनेट तक पहुंच है (20.6%), सिक्किम में सबसे अधिक था (76.7%)। पुरुषों में, मेघालय में सबसे कम (42.1%) और गोवा में सबसे अधिक (82.9%) था।</p><p dir="ltr">नए एनएफएचएस के आंकड़े अधूरे हैं -- इसमें केवल 22 राज्यों से परिणाम हैं, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े राज्य इसमें शामिल नहीं हैं। इस कारण से सर्वेक्षण के आंकड़ों का पूरी तरह निष्कर्ष निकालना अभी संभव नहीं है। इस लेख में जिन परिणामों पर चर्चा की गई है वे केवल इस पहले चरण से हैं, और इनमें पुरुषों और महिलाओं के बीच, राज्यों के बीच और शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े अंतर दिख रहे हैं।</p><p dir="ltr">हालांकि, दुनिया भर में कोविड-19 महामारी के फैलने के बाद से कामकाज, शिक्षा और मेडिकल कंसल्टेशन के बड़े हिस्से करोड़ों लोगों के लिए ऑनलाइन हो गए हैं और यह चलन आगे भी जारी रह सकता है। भारत सरकार की भी अधिक भारतीयों को ऑनलाइन लाने की अपनी डिजिटल महत्वाकांक्षा है। इसे देखते हुए, सर्वेक्षण के इस विशेष प्रश्न के लिए डेटा महत्वपूर्ण है। सरकार की अपनी योजनाओं और ट्रैक्टर किराए पर लेने और मौसम की जानकारी जैसी सर्विसेज देने से जुड़ी किसानों के <a href="https://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/govt-launches-mobile-app-for-farmers-to-hire-tractor-farm-machineries/articleshow/71277472.cms"><u>सरकार की ऐप</u></a> के लिए भी इंटरनेट तक पहुंच महत्वपूर्ण है।</p><p dir="ltr">टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया से <a href="https://trai.gov.in/sites/default/files/PR_No.92of2020.pdf"><u>डेटा</u></a> के अनुसार, 2019 में, भारत में 71.87 करोड़ इंटरनेट या ब्रॉडबैंड यूजर थे, यह संख्या 2018 की तुलना में 19% अधिक थी। </p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">क्या आपने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल किया है</span></b><b><span style="font-size: 22px;">?</span></b></p><p dir="ltr">इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कार्य करने वाली <a href="https://internetdemocracy.in/"><u>इंटरनेट डेमोक्रेसी प्रोजेक्ट</u></a> की डायरेक्टर, एंजा कोवाक्स ने कहा, "यह प्रश्न दो तरीकों से मददगार है। पहला यह है कि इससे इंटरनेट के बारे में जागरूकता का एक संकेत मिलता है। दूसरा यह एक उपयोगी आधार रेखा हैः भविष्य के सर्वेक्षणों में, ये आंकड़े बढ़ने चाहिए, जिससे उस जागरूकता के और फैलने का संकेत मिलेगा।"</p><p dir="ltr">उन्होंने इसके साथ ही कहा कि इंटरनेट के साथ भारत के जुड़ाव को वास्तव में समझने के लिए केवल यह पता लगाना कि क्या लोगों ने एक बार भी "कभी" इंटरनेट का इस्तेमाल किया है, पर्याप्त जानकारी नहीं है।</p><p dir="ltr">एनएफएचएस के पास इंटरनेट से जुड़े कुछ और प्रश्न भी थेः</p><p dir="ltr">"[क्या आपने] इंटरनेट पर परिवार नियोजन के बारे में कोई चीज देखी है"?</p><p dir="ltr">"जानकारी के कौन से स्रोतों से आपको एचआईवी/एड्स के बारे में पता चला?", जिसके लिए इंटरनेट उत्तर के विकल्पों में शामिल था।</p><p dir="ltr">कोवाक्स ने बताया, "ये आंकड़े नियमित इस्तेमाल के बारे में कुछ नहीं कहते, जो वास्तव में महत्वपूर्ण है, लेकिन ये केवल इस बारे में हैं कि किसने इंटरनेट का कभी भी इस्तेमाल किया है।" उनका कहना था, "इस मामले में ये अंतिम नहीं हैं और इसके आगे पड़ताल करने की जरूरत होगी। वास्तव में, यह प्रश्न 'क्या आपने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल किया है?' के बाद एक और प्रश्न होना चाहिए था जो यह जानने की कोशिश करता कि यह इस्तेमाल कितना नियमित या हाल का था। इंटरनेट का भी इस्तेमाल करना जागरूकता का एक अच्छा संकेत है लेकिन यह आवश्यक तौर पर वास्तविक इस्तेमाल नहीं है।"</p><p dir="ltr">इंटरनेट के इस्तेमाल के आंकड़ों की कमी से कुछ विशेषज्ञ हैरान नहीं है। सामाजिक समानता के लिए डिजिटल टेक्नोलॉजी का लाभ उठाने पर कार्य करने वाली <a href="https://itforchange.net/"><u>आईटी फॉर चेंज</u></a> की कार्यकारी निदेशक, अनिता गुरूमूर्ति ने कहा, "मुझे आंकड़ों में इंटरनेट का अधिक इस्तेमाल देखने की उम्मीद नहीं थी। निजी इंटरनेट सुविधाएँ इंटरनेट के इस्तेमाल के बारे में सोचने का एकमात्र तरीका नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों और हॉस्पिटल जैसे सार्वजनिक संस्थानों में स्थिर ब्रॉडबैंड, मोबाइल से इंटरनेट पहुंच कहानी का केवल एक हिस्सा है। बिजली और ब्रॉडबैंड में पर्याप्त निवेश के बिना, डिजिटल तौर पर सक्षम बनाना संभव नहीं है। व्यक्तिगत इस्तेमाल का चलन ऐसी संस्थागत मजबूती के साथ चलना चाहिए।"</p><p dir="ltr">ऑनलाइन स्वतंत्रता के मुद्दों को उठाने वाली <a href="https://internetfreedom.in/"><u>इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन</u></a> के कार्यकारी निदेशक और वकील, अपार गुप्ता ने कहा कि इंटरनेट के इस्तेमाल में ग्रामीण बनाम शहरी और पुरुषों और महिलाओं के बीच असमानताएं पहले से सामने हैं। उन्होंने बताया, "केवल ब्रॉडबैंड इंफ्रास्ट्रक्चर को तैयार करने से ग्रामीण जनसंख्या या महिलाओं के बीच इंटरनेट के अधिक इस्तेमाल का अपने आप परिणाम नहीं मिलेगा।" इसके साथ ही उन्होंने कहा कि इसके लिए स्थानीय समुदायों और गैर लाभकारी संस्थाओं के साथ कार्य करने जैसे "बड़े कदमों" की जरूरत होगी, जिससे यह सुनिश्चित किया जाए कि ऑफलाइन असमानताएं ऑनलाइन पर न जाएं।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">इंटरनेट पर महिलाएं बनाम पुरुष</span></b></p><p dir="ltr">"क्या आपने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल किया है?", इस प्रश्न पर महिलाओं का प्रदर्शन पुरुषों की तुलना में काफी कम था। बिहार में इंटरनेट का कभी इस्तेमाल करने वाली महिलाओं की संख्या 20.6% के साथ सबसे कम थी। राज्य में 79.4% महिलाओं ने कहा कि वे कभी ऑनलाइन नहीं रहीं। इसके विपरीत सिक्किम था जहां 76.7% महिलाओं ने कहा कि उन्होंने इंटरनेट का इस्तेमाल किया है।</p><p dir="ltr">इंटरनेट का सबसे कम इस्तेमाल करने वाले पुरुषों वाला राज्य मेघालय था, जहां 42.1% पुरुषों ने ही इसके लिए हां में उत्तर दिया। गोवा में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले पुरुषों की संख्या 82.9% के साथ सबसे अधिक थी।</p><p dir="ltr">इंटरनेट तक पहुंच को लेकर पुरुषों और महिलाओं के बीच असमानता को समझाने के लिए गुरूमूर्ति ने शिक्षा, रोज़गार और आमदनी में ऑफलाइन लैंगिक असमानताओं का कारण बताया जो ऑनलाइन भी लैंगिक असमानताएं तय करता है। गुरूमूर्ति ने कहा, "लैंगिक आधार पर उत्पीड़न, ट्रोलिंग और ऑनलाइन पुलिसिंग से स्व-अनुशासन के तौर पर नकारात्मक परिणाम होते हैं, जबकि युवा महिलाओं की अपने व्यक्तित्व और पहचान को मजबूत करने के लिए इंटरनेट के जरिए सामाजिक मेल-जोल बनाने में दिलचस्पी हो सकती है।"</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">मोबाइल फोन के जरिए महिलाओं का सशक्तिकरण</span></b></p><p dir="ltr">हाल के एनएफएचएस में पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए इंटरनेट के इस्तेमाल पर प्रश्न शामिल था, जबकि पिछले सर्वेक्षण में विशेष तौर पर महिलाओं के लिए एक प्रश्न दिया गया थाः क्या उनके पास एक मोबाइल फोन है और क्या वे उस पर एसएमएस पढ़ सकती हैं। इस प्रश्न को हाल के सर्वेक्षण में दोहराया गया है।</p><p dir="ltr">प्रश्न को "महिलाओं के सशक्तिकरण" के वर्ग में अन्य प्रश्नों के साथ शामिल किया गया था। अन्य प्रश्नों में पूछा गया था कि क्या महिलाएं परिवार के निर्णयों का एक हिस्सा थी, क्या उनके पास एक बैंक एकाउंट है, जमीन की मालिक हैं और उन्हें कैसे भुगतान मिला।</p><p dir="ltr">2015-16 के <a href="http://rchiips.org/nfhs/pdf/NFHS4/India.pdf"><u>चौथे एनएफएचएस</u></a> के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में 61.85% महिलाओं, ग्रामीण इलाकों में 36.9%, और देश भर में 45.9% महिलाओं ने कहा था कि उनके पास एक मोबाइल फोन है जो "वे खुद इस्तेमाल करती हैं।" मोबाइल फोन रखने वाली महिलाओं में से दो-तिहाई ने यह भी बताया था कि वे उस पर मैसेज पढ़ सकती हैं।</p><p dir="ltr">इस वर्ष 22 राज्यों से एनएफएचएस आंकड़ों में महिलाओं के मोबाइल फोन के इस्तेमाल के लिहाज से एक सुधार दिखा है। 2015-16 में आंध्र प्रदेश में केवल 36.2% महिलाओं ने कहा था कि उन्होंने मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया है, जो देश में सबसे कम था। हाल के आंकड़ों में, मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने वाली महिलाओ का सबसे कम प्रतिशत गुजरात में 48.8% दर्ज किया गया। देश में महिलाओं के मोबाइल फोन का सबसे अधिक इस्तेमाल पिछले एनएफएचएस में केरल में 81.2% का था। इस वर्ष, गोवा में 91.2 पर्सेंट के साथ महिलाओं की ओर से मोबाइल फोन का इस्तेमाल सबसे अधिक दर्ज किया गया।</p><p dir="ltr">चौथे एनएफएचएस में आयु के साथ मोबाइल फोन रखने में बढ़ोतरी दिखी हैः यह 15-19 वर्ष की आयु वाली महिलाओं के लिए 25%, 25-29 वर्ष के आयु वर्ग के लिए 56% था। हालांकि, आयु के साथ मैसेज पढ़ने की क्षमता घटी हैः 15-19 की आयु वाली महिलाओं के लिए 88% और 40-49 वर्ष के आयु वर्ग के लिए 48%। मोबाइल फोन रखने और इसका इस्तेमाल ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरों में अधिक था, और इसमें संपत्ति के साथ बढ़ोतरी हुई है।</p><p>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया <a href="mailto:respond@indiaspend.org">respond@indiaspend.org</a> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</p></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/women-2/4-in-5-bihar-women-have-never-used-the-internet-711268</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/women-2/4-in-5-bihar-women-have-never-used-the-internet-711268</guid>
<category><![CDATA[Bihar,नवीनतम रिपोर्ट,महिलाएं,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[अनू भूयन]]></dc:creator>
<pubDate>Thu, 07 Jan 2021 10:18:12 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/07/500x300_377061-bihar-women.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दरभंगा में गर्भवती महिलाओं के लिए 'वंडर ऐप']]></title>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>पटना:</b> कुछ महीने पहले दरभंगा ज़िले के बहादुरपुर ब्लॉक की देसली पंचायत की एक गर्भवती महिला की जांच रिपोर्ट स्थानीय प्राइमरी हेल्थ सेंटर (पीएचसी) में जमा होने के कुछ देर बाद ही पंचायत की आक्ज़लरी नर्स मिडवाइफ (एएनएम) मोनालीसा देवी के पास हेल्थ सेंटर से एक आपातकालीन फोन आया। मोनालिसा को बताया गया कि उस गर्भवती महिला के शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी का पता चला है अतः वे उनसे तुरंत संपर्क करें।</p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"जब मैंने पता लगाया, तो पता चला कि वह कहीं और गई हुई हैं। फिर हमने उनसे फोन पर बात की और पूछा कि उन्हें किसी तरह की दिक्कत तो नहीं आ रही है, तो महिला ने बताया कि कोई दिक्कत नहीं है। हमने हेल्थ सेंटर की तरफ से दी गई आयरन फ़ोलिक एसिड और कैल्शियम की गोलियां नियमित खाने की सलाह दी," मोनालीसा देवी ने <b>इंडियास्पेंड</b> को बत</p><p dir="ltr">मोनालिसा की तरह दरभंगा ज़िले की अन्य एएनएम के पास भी अक्सर पीएचसी से इस तरह के फ़ोन आते हैं और उनके इलाकों की गर्भवती महिलाओं के शरीर में आयरन, ख़ून में हीमोग्लोबिन की कमी व अन्य गंभीर समस्याओं के बारे में बताकर तुरंत संपर्क करने को कहा जाता है। अगर स्थिति गंभीर होती है, तो तुरंत स्थानीय सरकारी अस्पताल में भर्ती कराने का निर्देश दिया जाता है।</p><p dir="ltr">गर्भवती महिलाओं में समस्याओं की जानकारी पीएचसी के चिकित्सकों को वुमेन्स ऑब्सटेट्रिकल नियोनेटल डेथ इवैल्यूएशन एंड रिएक्शन यानी वंडर ऐप के ज़रिये मिलती है, जिसे दरभंगा ज़िले के डीएम त्यागराजन एसएम की पहल पर पिछले साल दरभंगा में लांच किया गया था। राज्य सरकार अब इस ऐप को पूरे राज्य में शुरू करने की तैयारी कर रही है।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">बिहार में मातृत्व मृत्यु दर के आंकड़े</span></b> </p><p dir="ltr">मातृत्व मृत्यु पूरे देश के लिए एक बड़ी समस्या है। बिहार में हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। साल 2016-2018 में बिहार में मातृ मृत्यु दर 149 थी। इससे पहले 2015-2017 में यह दर 165 थी, लोकसभा में इस साल 18 सितंबर को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की तरफ से दी गई <a href="http://164.100.24.220/loksabhaquestions/annex/174/AU993.pdf"><u>जानकारी</u></a> के मुताबिक़। </p><p dir="ltr">वर्ष 2015-2017 में अकेले बिहार में 4,900 गर्भवती महिलाओं की मौत हुई थी, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की तरफ से पिछले साल 22 नवंबर को लोकसभा में पेश किए गए <a href="http://164.100.24.220/loksabhaquestions/annex/172/AU985.pdf"><u>आंकड़ों</u></a> के अनुसार।     </p><p dir="ltr">बिहार में हर साल 3,171,910 महिलाएं गर्भवती होती हैं। इनमें से 432,533 महिलाओं को प्रसव में दिक्कत आने की आशंका रहती है। 288,355 गर्भवती महिलाओं को ऑपरेशन कराना पड़ता है, दरभंगा ज़िला प्रशासन की तरफ से दिए गए पूरे राज्य के आंकड़ों के मुताबिक़।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">कैसे काम करता है ऐप</span></b></p><p dir="ltr">इस ऐप को लांच करने में सबसे बड़ी भूमिका डीएम त्यागराजन एसएम की है। डीएम एक कार्यक्रम के सिलसिले में तमिलनाडु गये हुए थे, जहां उन्हें पता चला कि मातृत्व मृत्यु दर कम करने के लिए यहां इरोड ज़िले में साल 2017 में वंडर ऐप <a href="https://www.womensweb.in/2018/04/narmadha-kuppuswamy-save-pregnant-women-topical/"><u>शुरू</u></a> किया गया था, लेकिन वह फ़ेल हो गया। इस ऐप को जानी-मानी गायनोकोलॉजिस्ट डॉ नर्मदा कुप्पुस्वामी ने <a href="https://www.3blmedia.com/News/Using-Technology-Fight-Maternal-Mortality-Worldwide"><u>तैयार</u></a> किया है।  </p>"वहां वो ऐप सफल नहीं हो पाई, लेकिन मुझे वो आइडिया पसंद आया। दरभंगा में चूंकि मातृत्व मृत्यु दर ज़्यादा है, इसलिए मैंने ये ऐप यहां शुरू करने पर विचार किया," डीएम त्यागराजन ने <b>इंडियास्पेंड</b> से कहा।</div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2020/12/24/365570-screenshot2020-12-23-22-35-38-537comgoogleandroidappsdocs.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421m7gwy80aBfVSYO74wc3e6ZVoUHCd1Qfd2911037" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1608792909539" title="इस साल फ़रवरी तक वंडर ऐप पर 18,277 अलर्ट आये, जिनमें से 91% येलो और 9% रेड अलर्ट थे।" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1608792909539"><p>इस साल फ़रवरी तक वंडर ऐप पर 18,277 अलर्ट आये, जिनमें से 91% येलो और 9% रेड अलर्ट थे।<br></p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><span style="background-color: rgb(249, 249, 249);">"सबसे पहले दो ब्लॉक बहादुरपुर और बेनीपुर में पिछले साल जून में इस सेवा की शुरुआत हुई, जिसे 23 जुलाई को सभी 20 ब्लॉकों में लागू किया गया," वंडर ऐप की नोडल अफसर डॉ श्रद्धा ने </span><b>इंडियास्पेंड</b><span style="background-color: rgb(249, 249, 249);"> को जानकारी दी।</span><br></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">इस ऐप में दरभंगा ज़िले की हर गर्भवती महिला का प्रोफाइल बनाया जाता है और 9 महीने की अवधि में एक नियमित अंतराल पर वज़न, लंबाई, ब्लड प्रेशर, शुगर, हीमोग्लोबिन, ग्लूकोज़, एचआईवी आदि की जांच रिपोर्ट ऐप में अपलोड की जाती है। </p><p dir="ltr">"हम लोग सभी गर्भवती महिलाओं को बुलाते हैं और उन्हें पीएचसी में ले जाकर सभी तरह की जांच करवाते हैं। जांच रिपोर्ट में जो डाटा मिलता है, उसे फॉर्म में भरकर पीएचसी में जमा करते हैं। पीएचसी में आईटी कर्मचारी ये डाटा अपलोड करते हैं," दरभंगा ज़िले के जाले ब्लॉक में काम कर रही एएनएम रूबी देवी ने <b>इंडियास्पेंड</b> को बताया।</p><p dir="ltr">पहले ये डाटा कागज़ों में रह जाता था, लेकिन वंडर ऐप के आने से इसे ऑनलाइन किया गया है और कुछ भी सामान्य से कम होने पर अलर्ट आ जाता है, बहादुरपुर में काम कर रही एएनएम मोनालीसा देवी ने कहा।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">ऐप से मिलते हैं दो तरह के अलर्ट</span></b></p><p dir="ltr">किसी गर्भवती महिला में हीमोग्लोबिन, आयरन या अन्य तत्वों की कमी है, तो डाटा अपलोड करते ही पीएचसी के चिकित्सकों के मोबाइल में मौजूद ऐप में संकेत आने लगता है।</p><p dir="ltr">"टेस्ट रिपोर्ट में जो आंकड़े मिलते हैं, उन्हें ऐप डालते हैं। अगर कोई भी आंकड़ा नॉर्मल से कम हुआ, तो तुरंत अलार्म बजता है और एक अलर्ट जारी होता है। अगर रिपोर्ट में किसी तत्व में एकदम मामूली कमी है और दवा की ज़रूरत नहीं है, लेकिन देखभाल की ज़रूरत है, तो येलो (पीला) अलर्ट आता है,"  डॉ श्रद्धा बताती हैं, "अगर रिपोर्ट में आये आंकड़े सामान्य से काफी कम होते हैं और गर्भवती महिलाओं को तत्काल इलाज की जरूरत होती है, तो अलार्म के साथ रेड (लाल) अलर्ट आता है। इससे हमें पता चल जाता है कि किन गर्भवती महिलाओं को ज़्यादा देखभाल की ज़रूरत है। दो अलर्ट के अलावा एक और फ़ीचर है, जिससे अलर्ट के साथ ही एक मैसेज भी मोबाइल स्क्रीन पर आ जाता है, जिसमें बताया जाता है कि गर्भवती महिलाओं को तुरंत राहत देने के लिए क्या किया जाना चाहिए। सब कुछ सामान्य होने पर ग्रीन सिग्नल आता है।"</p><p dir="ltr">अलर्ट आने पर सुविधा ये होती है कि हमें पता चल जाता है कि किन गर्भवती महिलाओं पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है और उसी हिसाब से हम लोग एएनएम, आशा व जीविका दीदियों को निर्देश दे देते हैं कि इन महिलाओं का विशेष ध्यान रखा जाए, डॉ श्रद्धा ने बताया। </p><p dir="ltr">दरभंगा के सिंघवाड़ा की रहने वाली साइमा परवीन काफी समय से दिल्ली में थी। पिछले साल गर्भवती थी, तो वह गांव लौट आईं। यहां लौटते ही आशा और एएनएम ने उनसे संपर्क किया और वंडर ऐप में उनका रजिस्ट्रेशन कराकर जांच करवाई और सारे डाटा की एंट्री कराई। </p><p dir="ltr">"एएनएम की तत्परता और जांच और वंडर ऐप में एंट्री से मुझे भरोसा हुआ कि सरकारी व्यवस्था ठीक है," उन्होंने बताया। </p><p dir="ltr">उन्होंने निजी अस्पताल की जगह सिंघवाड़ा कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में भर्ती होना उचित समझा और वहां उनकी डिलीवरी हुई।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2020/12/24/365575-img2.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421RUhLUfYAC9NO63tVezxV501YiLcri8Rt3062389" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1608793061803" title="वंडर ऐप से गर्भवती महिलाओं के रेफरल के 85 मामले आये, जिनमें से 44 मामलों में महिलाओं को दरभंगा मेडिकल कॉलेज ले जाया गया।" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1608793061803"><p>वंडर ऐप से गर्भवती महिलाओं के रेफरल के 85 मामले आये, जिनमें से 44 मामलों में महिलाओं को दरभंगा मेडिकल कॉलेज ले जाया गया।<br></p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><div><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">रेफ़रल मामलों में सहूलियत</span></b><br></p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">दरभंगा में मातृत्व मृत्यु दर के आंकड़ों से पता चलता है कि ज़्यादातर मामलों में गर्भवती महिलाओं की मृत्यु इसलिए हो जाती है, क्योंकि वे समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाती हैं, डीएम त्यागराजन ने कहा।</p><p dir="ltr">इसे ध्यान में रखते हुए मोबाइल ऐप में रेफरल मामलों के लिए भी विशेष फीचर है, जो बहुत कारगर है। मसलन, अगर एक गर्भवती महिला को पीएचसी लाया गया है, लेकिन मामला संगीन है और उसे दरभंगा मेडिकल कॉलेज व अस्पताल में रेफर किया जाना है, तो मोबाइल ऐप में महिला की बीमारी का ज़िक्र करते हुए रेफर का विकल्प डाल दिया जाता है। ये अलर्ट दरभंगा मेडिकल कॉलेज व अस्पताल के अधीक्षक व अन्य अधिकारियों के मोबाइल पर पहुंच जाता है, डॉ श्रद्धा ने बताया।</p><p dir="ltr">"मान लीजिये कि किसी महिला को ख़ून की ज़रूरत है, तो इसका ज़िक्र वंडर ऐप में कर दिया जाता है। अस्पताल के अधीक्षक व अन्य अधिकारियों के पास ये अलर्ट महज़ तीन सेकेंड में पहुंच जाता है कि एक महिला कुछ देर में अस्पताल आ रही है और उसे खून चाहिए, तो वे पहले से ही खून का इंतजाम कर लेते है," उन्होंने बताया।</p><p dir="ltr">जून 2019 से 11 फरवरी 2020 तक वंडर ऐप पर 43,450 गर्भवती महिलाओं का रजिस्ट्रेशन किया गया, जिनमें से 18,277 महिलाओं को लेकर स्वास्थ्य अधिकारियों के पास अलर्ट आया। इनमें 91% यानी 13,678 येलो अलर्ट और 1,420 (9%) रेड अलर्ट थे। ऐप के जरिये 85 महिलाओं को बेहतर इलाज के लिए रेफर किया गया, दरभंगा डीएम कार्यालय से मिले आंकड़ों के अनुसार।</p><p dir="ltr">दरभंगा ज़िले में वंडर ऐप से गर्भवती महिलाओं को ट्रैक करने और समुचित इलाज में मिल रही मदद को देखते हुए बिहार सरकार इस ऐप को अब बिहार के अन्य जिलों में भी लागू करने की तैयारी कर रही है।</p><p dir="ltr">"ये ऐप निश्चित तौर पर मातृत्व मृत्यु दर कम करने में मदद करेगा। राज्य स्वास्थ्य प्रशासन की कोशिश रहेगी कि इस ऐप को पूरे राज्य में लागू किया जाए, जिससे दरभंगा की तरह पूरे राज्य में मातृत्व मृत्यु दर में कमी आए," 3 दिसंबर को दरभंगा में ऐप से मिल रही सहूलियतों को लेकर एक पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन देखने के बाद राज्य के स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत ने <a href="https://react.etvbharat.com/hindi/bihar/state/darbhanga/state-health-secretary-visit-to-darbhanga/bh20201204051035633"><u>कहा</u></a> था।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2020/12/24/365577-7868959926004923668525064227234094079016960o.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421n8OEYCQMsIanU1T0fXFU98830FRYQ4rN3138852" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1608793138667" title="वंडर ऐप से मिल रहे फायदे को लेकर बैठक में शामिल डीएम त्यागराजन एस एम (कत्थई जैकेट में)। उनकी पहल पर ही पिछले साल दरभंगा में इस ऐप को लांच किया गया था, जिसे पूरे बिहार में शुरू करने की तैयारी है।" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1608793138667"><p>वंडर ऐप से मिल रहे फायदे को लेकर बैठक में शामिल डीएम त्यागराजन एस एम (कत्थई जैकेट में)। उनकी पहल पर ही पिछले साल दरभंगा में इस ऐप को लांच किया गया था, जिसे पूरे बिहार में शुरू करने की तैयारी है।</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><div><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">लॉकडाउन में बंद रही सेवा</span></b><br></p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">कोविड-19 को लेकर मार्च से लगे लॉकडाउन के कारण इस ऐप में एंट्री भी प्रभावित हुई थी। लॉकडाउन के कारण ऐप पूरी तरह संचालित नहीं हो पा रहा था। इससे बहुत सारी महिलाओं को ऐप का लाभ नहीं मिल सका।</p><p dir="ltr">दरभंगा ज़िले के केवटी ब्लॉक के असराहा गांव की रहने वाली रुखसाना परवीन लॉकडाउन के दौरान गर्भवती थीं। जुलाई में जब बाढ़ आई हुई थी, तो उसी दौरान उनके पेट में दर्द होने लगा। लेकिन, उन्हें ऐप से कोई मदद नहीं मिली। मजबूरन स्थानीय लोगों ने केले के पत्तों की नाव बनाई और उसे अस्पताल पहुंचाया।</p><p dir="ltr">"हमें नहीं पता कि कोई ऐप भी है। जब बेटी को दर्द हुआ, तो हम लोग स्थानीय अस्पताल ले गये, जहां उसे दवा दी गई। तीन महीने पहले ही उसने बच्चा जना है, लेकिन डिलीवरी भी घर में ही करवानी पड़ी," रुखसाना की मां कनीज़ा ख़ातून ने <b>इंडियास्पेंड</b> से कहा।</p><p dir="ltr">लॉकडाउन में ऐप का काम बंद होने की बात डॉ श्रद्धा ने भी स्वीकार की। "कोविड-19 के वक्त ऐप सेवा बंद थी, लेकिन हम लोगों ने मोबाइल फ़ोन के जरिये गर्भवती महिलाओं का हालचाल जाना। अब ऐप सेवा दोबारा शुरू हो गई है," उन्होंने कहा।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">अन्य राज्यों में भी गर्भवती महिलाओं की ट्रैकिंग</span></b></p><p dir="ltr">ओडिशा के संबलपुर जिले में वंडर ऐप तो नहीं लेकिन, ऐसा ही एक मोबाइल ऐप हाई रिस्क मदर ट्रैकिंग इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे मातृत्व व शिशु मृत्यु दर में काफी गिरावट आई है।</p><p dir="ltr">संबलपुर में ये मोबाइल ऐप 2017 में लांच किया गया था। साल 2018-2019 में 19,262 गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी हुई, जिनमें से 284 नवजात शिशुओं की मौत हो गई। साल 2017-2018 में ये आंकड़ा 356 था। साल 2018-2019 में 18 गर्भवती महिलाओं की मौत हुई जबकि वित्त वर्ष 2017-2018 में 46 महिलाओं की जान चली गई थी," द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की इस <a href="https://www.newindianexpress.com/states/odisha/2019/may/14/app-helps-bring-down-maternal-mortality-1976722.amp"><u>रिपोर्ट</u></a> में ज़िले के अतिरिक्त ज़िला मेडिकल ऑफिसर (फैमिली वेलफेयर) डॉ कुबेर चंद्र मोहंता ने बताया।</p><p dir="ltr">हरियाणा में गर्भवती महिलाओं को ट्रैक करने के लिए राज्य सरकार सरकार ने 2017 में एक पोर्टल शुरू किया था। इस पोर्टल के ज़रिए ये सुनिश्चित किया जाता है कि गर्भवती महिला को प्रसव पूर्व सभी चेक अप, सप्लीमेंट्स मिलें और ज़रूरत पड़ने पर सामुदायिक या ज़िला चिकित्सा केंद्र में विशेषज्ञों की सुविधा आसानी से मिल सके, नवंबर 2019 की <b>इंडियास्पेंड </b>की इस <a href="https://indiaspendhindi.com/%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%88-%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87/"><u>रिपोर्ट</u></a> के अनुसार।</p><p dir="ltr">जानकारों का कहना है कि ऐप कुछ हद तक मददगार हो सकता है, लेकिन ये हर समस्या का इकलौता समाधान नहीं हो सकता है। "ऐप से निश्चित तौर पर मातृत्व मृत्यु दर में कमी लाने में मदद मिलेगी, लेकिन इसके साथ ही बुनियादी ढांचों को विकसित करना भी ज़रूरी है। अगर ऐप में ये पता भी चल गया कि किसी गर्भवती महिला को क्या इलाज चाहिए, तो इलाज तब ही संभव हो पायेगा, जब प्राइमरी हेल्थ सेंटर या कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में इलाज की व्यवस्था होगी," जन स्वास्थ्य <a href="https://phmindia.org/about-us/"><u>अभियान</u></a> से जुड़े डॉ शकील ने <b>इंडियास्पेंड</b> से कहा।<br></p></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/health/wonder-app-for-pregnant-women-in-darbhanga-705654</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/health/wonder-app-for-pregnant-women-in-darbhanga-705654</guid>
<category><![CDATA[Bihar,कवर स्टोरी,महिलाएं,सेहत,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[उमेश कुमार राय]]></dc:creator>
<pubDate>Thu, 24 Dec 2020 07:04:50 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2020/12/24/500x300_365580-fbimg1608583264411.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[यूपी में कुपोषण की जंग में नाकाफ़ी साबित हो रहे पोषण पुनर्वास केंद्र]]></title>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>लखनऊ:</b> बब्ली (34) की तीन साल की बेटी आरोही लखनऊ के ज़िला अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्र में को लेकर भर्ती हैं। "मेरी बेटी को बहुत दस्त हो रहे थे। मौहल्ले के डॉक्टर ने कहा कि ज़िला अस्पताल जाने के लिए कहा। यहां आए तो पहले इमरजेंसी में भर्ती रहे और फिर यहां भेज दिया गया। डॉक्टर ने बताया है कि बच्ची कमज़ोर और इसमें खून की कमी है," लखनऊ के डालीगंज की रहने वाली बब्ली ने बताया।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"आरोही 28 नवंबर को यहां भर्ती हुई। जब आई थी तो इसे इडिमा (अतिकुपोषण का एक लक्षण) था, साथ ही ग्लूकोज़ की भी कमी थी। अब धीरे-धीरे ये ठीक हो रही है। अभी आरोही को डिस्चार्ज होने में एक हफ्ते का वक्त है, तब तक स्थिति में और सुधार होगा," पोषण पुनर्वास केंद्र की डाइटीशियन शाहीन फ़ातिमा ने बताया। </p><p dir="ltr">बच्चों में कुपोषण की स्थिति को सुधारने के लिए पूरे देश में <a href="http://upnrhm.gov.in/assets/site-files/quality_assurance/NRC%20SOP.pdf">पोषण पुनर्वास केंद्र</a> चलाए जाते हैं। इन केंद्रों में उन <a href="https://www.unicef.org/nutrition/index_sam.html">अतिकुपोषित</a> बच्चों को रखा जाता है जिन्हें क्लीनिकल उपचार की जरूरत होती है। इन बच्चों को केंद्र पर रखकर 14 दिन तक निशुल्क दवाई और विशेष आहार दिया जाता है। साथ ही मां को दैनिक भत्ता, खाना और बच्चों के स्वास्थ्य से संबंधित आवश्यक सलाह दी जाती है। </p><p dir="ltr">सितंबर के महीने में पोषण माह के दौरान उत्तर प्रदेश में 6 साल तक के 15 लाख से अधिक <a href="https://indiaspendhindi.com/%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%b7%e0%a4%a3-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b9-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8c%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%aa%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/">कुपोषित</a> बच्चे मिले। इनमें से 1.88 लाख बच्चे अतिकुपोषित बच्चे पाए गए। अतिकुपोषित बच्चों में से 2,823 को उपचार के लिए पोषण पुनर्वास केंद्र भेजा गया। </p><p dir="ltr">आरोही की तरह हर कुपोषित बच्चा इस सुविधा का लाभ नहीं ले पाता। ऐसा इसलिए कि उत्तर प्रदेश में अतिकुपोषित बच्चों के अनुपात में पोषण पुर्नवास केंद्र की क्षमता काफी कम है। इसी समस्या के मद्देनज़र इस साल सितंबर में यूपी एनएचएम की ओर से <a href="http://upnrhm.gov.in/uploads/8980115186354998.pdf">गाइडलाइंस</a> जारी की गई हैं।</p>इनके मुताबिक, कुपोषित/अतिकुपोषित बच्चों की पहचान गांव स्तर पर की जानी चाहिए, और जिन बच्चों को जटिल चिकित्सीय समस्या न हो और भूख भी लगती हो, उनका उपचार समुदाय स्तर पर ही किया जाए। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इक्विपमेंट और ट्रेेनिंग के बिना ऐसा करना मुमकिन नहीं होगा।</div><div contenteditable="false" data-width="987" style="left:0%;width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2020/12/16/358675-image-1.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421fWacIxxKwWbTDfXRQryvs1G0wSELYaMN3326992" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1608103328965" title="आरोही की मां बब्ली देवी से को पोषण से संबंधित सलाह देती हुई लखनऊ के पोषण पुनर्वास केंद्र की केयर टेकर सुशीला शर्मा। फ़ोटो: रणविजय सिंह&nbsp;" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1608103328965"><p>आरोही की मां बब्ली देवी से को पोषण से संबंधित सलाह देती हुई लखनऊ के पोषण पुनर्वास केंद्र की केयर टेकर सुशीला शर्मा। फ़ोटो: रणविजय सिंह&nbsp;</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p><b><span style="font-size: 22px;">पोषण पुनर्वास केंद्र की क्षमता काफी कम</span></b><br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"वर्तमान में प्रदेश के 71 जिलों में 77 पोषण पुनर्वास केंद्रों के माध्यम से अतिकुपोषित बच्चों का उपचार हो रहा है। इन केंद्रों की क्षमता हर साल लगभग <a href="http://upnrhm.gov.in/uploads/8980115186354998.pdf">18 हजार बच्चों</a> को उपचारित करने की है, जो कि राज्य के अतिकुपोषित बच्चों का मात्र 1.5% ही है," मुख्य चिकित्सा अधिकारियों (सीएमओ) को गाइडलाइंस के साथ 21 सितंबर 2020 को भेजे एक पत्र में यूपी एनएचएम की निदेशक अपर्णा उपाध्याय ने कहा। </p><p dir="ltr">आरोही की तरह ही लखनऊ में पांच साल से कम उम्र के <a href="http://rchiips.org/nfhs/FCTS/UP/UP_Factsheet_157_Lucknow.pdf">17.9% बच्चे</a> अतिकुपोषित (SAM) हैं। जबकि पूरे राज्य में यह आंकड़ा <a href="http://rchiips.org/nfhs/pdf/NFHS4/UP_FactSheet.pdf">6%</a> है, <a href="http://rchiips.org/nfhs/NFHS-4Report.shtml">नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4</a> के आंकड़ों के मुताबिक। इसके बाद 2019 में आए राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण के दौरान, यूपी में 6 से 59 महीने के 1,723 बच्चों का वज़न किया गया। इसमें से <a href="https://nhm.gov.in/WriteReadData/l892s/1405796031571201348.pdf">1.5%</a> बच्चे अतिकुपोषित पाए गए।  </p><p dir="ltr">"अतिकुपोषित बच्चों में अन्य बच्चों के मुकाबले मौत की संभावना ज़्यादा होती है। इनमें से करीब 10% बच्चों को क्लीनिकल उपचार की ज़रूरत भी होती है, जिसके लिए पोषण पुर्नवास केंद्र बनाए गए हैं," लखनऊ ज़िला अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्र के प्रभारी देवेंद्र सिंह ने कहा। </p><p dir="ltr">यूपी एनएचएम से मिले आंकड़ों के मुताबिक, 2019-20 में पोषण पुनर्वास केंद्रों में 15,011 बच्चों का उपचार हुआ। वहीं, इस साल कोरोना की वजह से पोषण पुनर्वास केंद्रों का काम प्रभाव‍ित हुआ है। लॉकडाउन की वजह से बीच में केंद्र बंद भी थे। ऐसे में इस साल (2020-21) नवंबर के महीने तक 1,400 बच्चों का उपचार हो पाया है। जबकि यूपी एनएचएम की ओर से सीएमओ को भेजे गए पत्र में राज्य में अतिकुपोषित बच्चों की अनुमानित संख्या 11 लाख बताई गई है।</p><p dir="ltr">पत्र में यह भी कहा गया कि प्रदेश के अधिकांश कुपोषित/अतिकुपोषित बच्चे चिकित्सीय उपचार से वंचित रह जाते हैं। इस पत्र से साफ है कि यूपी में पोषण पुनर्वास केंद्र की क्षमता कितनी कम है। इसी समस्या से निपटने के लिए ये गाइडलाइंस जारी की गई हैं और एक मैनेजमेंट सिस्टम बनाया गया है जो पूरे प्रदेश में लागू होगा।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2020/12/16/358679-img2.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421tI7JjmT5D2eCBY2ad6t51Ybjq76aCjXI3406024" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1608103407586" title="लखनऊ का पोषण पुनर्वास केंद्र। फ़ोटो: रणविजय सिंह&nbsp;" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1608103407586"><p>लखनऊ का पोषण पुनर्वास केंद्र। फ़ोटो: रणविजय सिंह&nbsp;</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">"पोषण पुनर्वास केंद्र से ख़त्म नहीं होगा कुपोषण"</span></b><br></p><p dir="ltr">इन गाइडलाइंस को तबके महाप्रबंधक बाल स्वास्थ्य डॉ. वेद प्रकाश ने जारी किया था। डॉ. वेद प्रकाश अब यूपी एनएचएम में ही राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के महाप्रबंधक हैं। "मैंने जब बाल स्वास्थ्य देखना शुरू किया तो यह नोटिस किया कि एक तरफ़ बात होती है कि कुपोषण बहुत ज़्यादा है, इसे खत्म करना है। दूसरी तरफ़ हेल्थ डिपार्टमेंट के पास कुपोषण से निपटने के नाम पर पोषण पुनर्वास केंद्र ही हैं, जबकि इससे कुपोषण खत्म नहीं होने वाला है," डॉ. वेद ने इंडियास्पेंड से कहा। </p><p dir="ltr">गाइडलाइंस में कुपोषि‍त बच्चों की पहचान से लेकर उन्हें आहार के तौर पर क्‍या देना है सबकी जानकारी शामिल है। मकसद यह है कि प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और हेल्थ वेलनेस सेंटर पर तैनात डॉक्टरों को पता रहे कि कुपोषित बच्चों की पहचान कैसे करनी है। डॉ. वेद प्रकाश ने इस संबंध में ज़िला स्तर पर ऑनलाइन ट्रेनिंग भी दी है। उन्हें उम्मीद है कि इन गाइडलाइंस का पालन करने से आने वाले समय में अच्छा नतीजा मिलेगा। </p><p dir="ltr">"पोषण पुनर्वास केंद्र में बच्चे तब भर्ती होते हैं, जब वह बहुत ज़्यादा कुपोषित हो गए हों। यानी अतिकुपोषित बच्चों में भी वह बच्चे ज‍िनको उपचार की जरूरत है। जबकि अतिकुपोषित बच्चों के मुकाबले कुपोषित बच्चों की संख्या काफी ज़्यादा है, ज‍िनको पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती नहीं किया जाता," डॉ. वेद प्रकाश ने अपनी बात के समर्थन में तर्क दिया। </p><p dir="ltr">इस साल सितंबर में हुए पोषण माह के दौरान यूपी से मिले कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चों के आंकड़े डॉ. वेद प्रकाश के तर्क की पुष्टि काफ़ी हद तक करते हैं। राज्य में 6 साल तक के 15 लाख से अधिक कुपोषित बच्चे मिले। इनमें से 13.4 लाख बच्चे कुपोषित और 1.88 लाख बच्चे अतिकुपोषित पाए गए। इंडियास्पेंड की एक दिसंबर 2020 की इस <a href="https://indiaspendhindi.com/%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%b7%e0%a4%a3-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b9-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8c%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%aa%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/">रिपोर्ट</a> के अनुसार।  </p><p dir="ltr">डॉ. वेद प्रकाश के मुताबिक इस स्थिति में पोषण पुनर्वास केंद्र कुपोषित बच्चों की संख्या का 1% भी नहीं संभाल रहे हैं। साथ ही कुपोषित बच्चों के लिए जो पोषित आहार दिया जाता है वो भी कुपोषण पर ख़ास असर करता नहीं द‍िखता।  </p><p dir="ltr">"कुपोषण को ख़त्म करने की बातें बहुत हो रही थीं, लेकिन कोई ठोस प्लान नहीं था। इसीलिए ये गाइडलाइंस जारी की गई हैं। इसके पीछे मकसद यह है कि जो बच्चे पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती नहीं हो पाते उनकी भी पहचान हो सके और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर ही उन्हें बेहतर इलाज मिल जाए," डॉ. वेद प्रकाश ने कहा। </p><p dir="ltr">"आज तक मुझे शायद ही काई ऐसा गांव मिला होगा जहां आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की जानकारी में कोई कुपोषित बच्चा था। ऐसे में समझ आया कि लोगों को कुपोषण की जानकारी ही नहीं है। जब कोई मरीज़ ही नहीं होगा तो इलाज किसका करेंगे," डॉ. वेद प्रकाश ने बच्चों में कुपोषण से जुड़ी एक और समस्या के बारे में कहा। </p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">गाइडलाइन में क्‍या है?</span> </b></p><p dir="ltr">यूपी एनएचएम की ओर से जारी गाइडलाइन में दो बातों पर ज्यादा जोर दिया गया है। पहला कि कुपोषित/अतिकुपोषित बच्चों की पहचान गांव स्तर की जाए। दूसरा यह कि अतिकुपोषित बच्चों में से जिन्हें जटिल चिकित्सीय समस्या न हो और भूख भी अच्छी हो उनका उपचार समुदाय स्तर पर किया जाए। ऐसे बच्चों को हेल्थ वेलनेस सेंटर, प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से दवा और पोषक तत्व देकर उपचार किया जाए। गाइडलाइन में इसी उपचार के संबंध में चिकित्सीय प्रोटोकॉल जारी किया गया है।<br></p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2020/12/16/358680-img3.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421U2ieSdAiqo93xSKmzikm6C2WnXUv3IM43460209" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1608103460726" title="गाइडलाइंस में दिए गए चिकित्सीय प्रोटोकॉल।" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1608103460726"><p>गाइडलाइंस में दिए गए चिकित्सीय प्रोटोकॉल।</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p>हालांकि, हेल्‍थ एक्‍सपर्ट का मानना है कि इस गाडइलाइन का ज़मीन पर ज़्यादा असर नहीं होगा। "आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को कुपोषण की पहचान के संबंध में पहले भी ट्रेनिंग दी जाती रही है। इसमें कुछ नया नहीं है। असल समस्या है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के पास कुपोषण की पहचान करने के साधन ही मौजूद नहीं हैं। इसे दुरुस्त करने की ज़रूरत है। अगर ज़मीन पर अच्छे रिज़ल्ट चाहिए तो आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की संख्या भी बढ़ानी होगी। ऐसे ही ट्रेनिंग दे देना और गाइडलाइंस निकाल देने से ज़्यादा असर नहीं होने वाला है," <a href="http://phmindia.org/">जन स्वास्थ्य अभियान</a> की सह संयोजक डॉ. सुलक्षणा नंदी ने कहा।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के पास कुपोषण की पहचान करने के साधन न होने की जो बात सुलक्षण नंदी कह रही हैं, यही बात राज्य पोषण मिशन के निदेशक कपिल सिंह ने <a href="https://indiaspendhindi.com/%E0%A4%AA%E0%A5%8B%E0%A4%B7%E0%A4%A3-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B9-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A6%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%AA%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82/">पोषण माह</a> पर की गई रिपोर्ट के दौरान इंडियास्पेंड से कही थी। कपिल सिंह के मुताबिक, अभी तक आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के पास कुपोषण की पहचान करने के साधनों की कमी थी। इसको देखते हुए राज्य सरकार की ओर से इन साधनों की ख़रीद की गई है और अब इन्हें आंगनबाड़ी केंद्रों पर भेजा जा रहा है। इन साधनों में इन्फ़ेंटोमीटर, इंफ़ेंट वेइंग मशीन, एडल्ट वेइंग मशीन, स्टेरियो मीटर शामिल है।<br></p><div><p><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया <a href="mailto:respond@indiaspend.org">respond@indiaspend.org</a> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i></p></div></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/health/not-enough-nutrition-rehab-centres-in-uttar-pradesh-702559</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/health/not-enough-nutrition-rehab-centres-in-uttar-pradesh-702559</guid>
<category><![CDATA[कवर स्टोरी,सेहत,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[रणविजय सिंह]]></dc:creator>
<pubDate>Wed, 16 Dec 2020 07:41:33 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2020/12/16/500x300_358689-coverimg.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महामारी ने कैसे छीना उत्तर प्रदेश की महिलाओं से रोज़गार]]></title>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>नई दिल्ली: </b>उत्तर प्रदेश के अमेठी ज़िले की रहने वाली विद्या कौशल (22) ने छह महीने का ब्यूटीशियन का कोर्स किया और फिर अपने गृह नगर जगदीशपुर में 'She' नाम से अपना सलून शुरु किया। विद्या ने पिछले साल ही स्नातक की डिग्री हासिल की है। उनका परिवार चाहता था कि वो शिक्षक बने लेकिन उन्होंने एक उद्यमी बनना तय किया।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">सलून शुरु करने के लिए विद्या ने 50,000 रुपए का निवेश किया। गांधी परिवार के असर वाला जगदीशपुर कभी औद्योगिक क्षेत्र हुआ करता था। लेकिन पिछले एक दशक में यहां <a href="https://www.dnaindia.com/india/report-industries-shut-down-in-gandhi-land-1149353"><u>फ़ैक्ट्रियां बंद</u></a> हुर्ई हैं और रोज़गार के अवसर कम होते गए हैं लेकिन मार्च 2020 में शुरू हुआ विद्या का ब्यूटी पार्लर ठीक ठाक चल रहा था।  </p><p dir="ltr">दो हफ्ते बाद, देश में कोविड-19 से निपटने के लिए <a href="https://pib.gov.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1607997"><u>देशव्यापी लॉकडाउन</u></a> घोषित हो गया। सख्त सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों के साथ, सौंदर्य का व्यवसाय अस्थिर हो गया। 'She' को बंद होना पड़ा। अनलॉक के साथ ही एक बार फिर जुलाई में पार्लर खुल गया, लेकिन कुछ ही ग्राहक आते हैं, विद्या ने कहा, हालांकि वह पार्लर में स्वच्छता और शारीरिक दूरी का ख़्याल रखती हैं।</p><p dir="ltr">"अगर दिन अच्छा हो तो पांच ग्राहक आ जाते हैं; ज़्यादातर दिन इससे कम ग्राहक ही आते है। लोग वास्तव में डरे हुए हैं। मुझे महीनों तक नुकसान हुआ है और अगर मैं कीमतें बढ़ाती हूं, तो ग्राहक भुगतान करने से इनकार करते हैं। अकेले पार्लर चलाना भी मुश्किल है," विद्या ने कहा। उन्होंने उम्मीद जताई कि शादियों इस सीज़न से उनका काम थोड़ा बढ़ेगा।</p><p dir="ltr">हमने लखनऊ, इलाहाबाद, सीतापुर और अमेठी सहित उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में अपनी रिपोर्टिंग में पाया कि महिलाओं में सिर्फ़ उद्यमी ही नहीं हैं जो संघर्ष कर रहे हैं। शहरों में निर्माण स्थलों, कॉल सेंटरों, हस्तशिल्प, खुदरा इकाइयों और घरेलू मदद के रूप में काम करने वाली महिलाओं की नौकरियां चली गई हैं। गांवों में, सार्वजनिक रोज़गार योजनाओं में महिलाओं की भागीदारी कम हुई है। शहरों से लौटे पुरुषों ने उनकी जगह ले ली है।</p><p dir="ltr">महिलाओं के रोज़गार पर लॉकडाउन के प्रभाव पर प्रारंभिक शोध से वही पता चलता है जो शरुआती ख़बरों से पता चला था। रोज़गार में गिरावट लिंग-तटस्थ नहीं है। "रोज़गार में पहले से मौजूद पुरुषों और महिलाओं के बीच बड़े अंतराल को देखते हुए, महिलाओं की तुलना में पुरुषों ने ज़्यादा रोज़गार खोया है। हालांकि, लॉकडाउन से पहले, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के नियोजित होने की संभावना लगभग 20%  कम थी, अशोका यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर, अश्विनी देशपांडे की रिपोर्ट में कहा गया। उन्होंने <a href="https://www.cmie.com/"><u>सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी</u></a> के आंकड़ों की <a href="https://ideas.repec.org/p/ash/wpaper/30.html">पड़ताल</a> की थी।</p><p dir="ltr">तीन-भागों की इस श्रृंखला में, <b>इंडियास्पेंड</b> देश में रोज़गार और आजीविका पर कोविड-19 संकट के प्रभाव की जांच कर रहा है। पहले भाग में, हमने उन श्रमिकों के बारे में बताया जो <a href="https://indiaspendhindi.com/%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a5%89%e0%a4%ac-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%96/"><u>दक्षिणी राजस्थान</u></a> के गांवों में वापस आ गए थे। दूसरे भाग में, हमने <a href="https://indiaspendhindi.com/%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%95%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a4%89%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%be/"><u>ओडिशा के प्रवासी श्रमिकों की</u></a> सूरत और अन्य प्रवासी स्थलों की वापसी की बात की। इस  तीसरे और समापन भाग में, हम बताएंगे उत्तर प्रदेश के श्रमबल, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं का जीवन कैसे महामारी से प्रभावित हुआ है। </p><p dir="ltr">महामारी से पहले भी, भारत के श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से कम थी, जैसा कि <b>इंडियास्पेंड</b> ने अपनी <a href="https://www.indiaspend.com/category/womenwork/">श्रृंखला</a> Women@Work में बताया है। भारत में यह दर केवल 24% है जो दक्षिण एशिया में सबसे कम है, <a href="http://mofapp.nic.in:8080/economicsurvey/pdf/102-118_Chapter_07_ENGLISH_Vol_01_2017-18.pdf">आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18</a> के अनुसार।</p><p dir="ltr">महिला रोज़गार के मामले में सबसे कम दर वाले राज्य बिहार (2.8%), उत्तर प्रदेश (9.4%), असम (9.8%) थे, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण (2017-18) के राज्यवार विश्लेषण के अनुसार ।</p><p dir="ltr"><br></p><p dir="ltr"><b style="color: rgb(95, 100, 104); font-family: inherit; font-size: 1.5em; background-color: rgb(255, 255, 255);">मंदी से प्रभावित महिलाओं के व्यवसाय</b></p><p dir="ltr"><a href="https://msme.gov.in/sites/default/files/FINAL_MSME_ENGLISH_AR_2019-20.pdf">आंकड़े</a> बताते हैं कि विद्या कौशल और उन जैसी महिलाओं के व्यवसाय को इस संकट से भारी नुकसान हुआ है।</p><p dir="ltr">देश के सौंदर्य उद्योग के प्रतिनिधियों, ज्यादातर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई), ने लॉकडाउन के दौरान एमएसएमई मंत्री नितिन गडकरी से सरकारी सहायता की <a href="https://www.livemint.com/news/india/gadkari-assures-relief-measures-as-70-lakh-beauty-wellness-jobs-at-stake-11588671783692.html">मांग</a> की थी। उन्होंने बताया कि इस श्रेणी के व्यवसायों में 70 लाख लोगों की नौकरियां पर तलवार लटकी थी। इन व्यवसायों में हर तीन में से दो कर्मचारी महिला या प्रवासी श्रमिक हैं।</p><p dir="ltr">महामारी संकट में सबसे अधिक प्रभावित होने वाले क्षेत्र - रेस्तरां, खुदरा, सौंदर्य, पर्यटन, शिक्षा, घरेलू काम, और युवा और बुजुर्गों के लिए देखभाल - में महिलाओं की भागीदारी <a href="https://www.ilo.org/wcmsp5/groups/public/---asia/---ro-bangkok/---sro-new_delhi/documents/publication/wcms_614693.pdf">ज़्यादा</a> है, आजीविका पर काम करने वाले संगठन <a href="https://www.labournet.in/">Labournet</a> की चेयरपर्सन, गायत्री वासुदेवन ने कहा।</p><p dir="ltr">अपने परिवार की बचत से अपना व्यवसाय शुरू करने वाली विद्या को सरकार से किसी भी तरह की मदद की उम्मीद नहीं है। "मेरे आसपास के सभी व्यवसाय बर्बाद हो गए हैं और हमें अपने दम पर कुछ करना होगा," उन्होंने कहा।</p><p dir="ltr">73% महिला उद्यमी लॉकडाउन और महामारी से प्रभावित हुई हैं, 21% की आमदनी लगभग बंद हो चुकी है, मैनेजमेंट कंसलटेंट कंपनी, बैन एंड कंपनी की एक <a href="https://www.bain.com/insights/can-covid-19-be-the-turning-point-for-women-entrepreneurs-in-india/">रिपोर्ट</a> में कहा गया है। सर्वे में शामिल 35% महिलाओं ने आमदनी में महत्वपूर्ण गिरावट (25% -75%) की सूचना दी। रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन के दौरान अतिरिक्त घरेलू काम का बोझ बढ़ने की वजह से महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक प्रभावित हुई हैं।</p><p dir="ltr"><br></p><p dir="ltr"><b style="color: rgb(95, 100, 104); font-family: inherit; font-size: 1.5em; background-color: rgb(255, 255, 255);">शिल्प इकाइयां बंद</b></p><p dir="ltr">लॉकडाउन और आर्थिक मंदी ने लैंगिक असमानताओं को बढ़ा दिया है, कई रिपोर्टों में (<a href="https://idronline.org/how-will-covid-19-affect-women-entrepreneurs/">यहां</a>, <a href="https://indianexpress.com/article/opinion/coronavirus-gender-inequality-india-6414659/">यहां</a> और <a href="https://populationfoundation.in/wp-content/uploads/2020/07/Policy-Brief_Impact-of-COVID-19-on-Women.pdf">यहां</a>) यह बताया गया है। महिलाओं ने नौकरी और आजीविका खो दी है, जबकि उन पर घरेलू काम का बोझ भी बढ़ा है।</p><p dir="ltr">भारत में महिलाओं को मिलने वाले काम कम विकास, कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में <a href="https://indianexpress.com/article/business/female-labour-force-participation-falls-to-26-in-2018-from-36-7-in-2005-report-5617044/">सीमित हैं</a>, मुख्य रूप से कृषि आधारित या घर पर ही अनौपचारिक काम। <a href="http://www.sewa.org/Fifty-four.asp">अनुमान</a> है कि लखनऊ में 250,000 चिकनकारी और ज़रदोज़ी श्रमिक हैं - ऐसे शिल्पकार जिन्हें कढ़ाई में कौशल की आवश्यकता होती है। इन शिल्पकारों में से अधिकांश महिलाएं हैं, और लॉकडाउन के दौरान मांग घटने के साथ, अधिकांश ने नौकरी और कमाई खो दी है। </p><p dir="ltr">"लॉकडाउन के बाद से काम पूरी तरह से रुक गया है। ये महिलाएं अपने परिवार की मदद करती हैं, लेकिन वे गायब हैं," उत्तर प्रदेश की एक एक्टिविस्ट और एक एनजीओ <a href="https://napm-india.org/">नेशनल अलायंस ऑफ़ पीपुल्स मूवमेंट</a> की संयोजक, अरुंधति ध्रुव ने कहा।</p><p dir="ltr">विशेषज्ञों ने कहा कि 2018-19 में भारत के श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी आज़ादी के बाद से सबसे कम हुई है - 18.6% - <a href="https://pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=1629366"><u>आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण </u></a>2018-19 के अनुसार, महामारी का भारत में महिला रोज़गार पर गंभीर परिणाम पड़ सकता है, विशेषज्ञों ने कहा।</p><p dir="ltr">"जहां तक ​​महामारी के सामाजिक-आर्थिक असर का संबंध है, महिलाएं सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई हैं," टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ के एडवांस्ड सेंटर फ़ॉर वुमेन स्टडीज़ की पूर्व प्रोफ़ेसर, विभूति पटेल ने कहा। "यह सिर्फ बढ़े हुए देखभाल के काम के कारण नहीं है, यह हकदारी के कारण भी है - जब भी बेरोज़गारी की दर अधिक होती है, तो पुरुषों को प्राथमिकता मिलती है [नौकरियों के लिए] क्योंकि उन्हें कमाने वाला और महिलाओं को गृहिणी के रूप में देखा जाता है। आर्थिक समृद्धि के समय में, महिलाओं को अंत में काम पर रखा जाता है, और एक संकट के दौरान उन्हें पहले निकाल दिया जाता है।"</p><p dir="ltr"><br></p><p dir="ltr"><b style="color: rgb(95, 100, 104); font-family: inherit; font-size: 1.5em; background-color: rgb(255, 255, 255);">पुरुषों को तरजीह</b></p><p dir="ltr">उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां महिलाओं पर <a href="https://www.ilo.org/wcmsp5/groups/public/---asia/---ro-bangkok/---sro-new_delhi/documents/publication/wcms_614693.pdf"><u>सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतिबंध</u></a> हैं, वर्तमान संकट के प्रभाव और भी अधिक लिंग-विषम हैं, विशेषज्ञों ने कहा। 2017-18 में, शहरी क्षेत्रों में केवल 8.2% और ग्रामीण क्षेत्रों में 9.7% महिलाएं राज्य के श्रमबल में थीं। </p><p dir="ltr">इस साल मई में, उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत महिलाओं के रोज़गार के मुद्दे को हल करने के <a href="https://timesofindia.indiatimes.com/city/lucknow/rural-scheme-to-churn-out-jobs-for-women/articleshow/75863549.cms">उपायों</a> की घोषणा की। इनमें से एक <a href="https://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/up-scheme-to-attract-women-voters/articleshow/76098908.cms?from=mdr">योजना</a> राज्य की सभी 58,000 ग्राम पंचायतों में बैंकों और महिला ग्राहकों के बीच संबंधों के रूप में कार्य करने के लिए 'बैंकिंग कॉरेस्पॉन्डेंट सखी'नियुक्त करने की थी। अन्य परियोजनाओं में मास्क बनाने, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों के निर्माण और स्कूल की वर्दी की सिलाई शामिल थे।</p><p dir="ltr">"उत्तर प्रदेश, श्रम में महिलाओं की भागीदारी के मामले सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाले राज्यों में से एक रहा है। हमारे पास संख्या नहीं है, लेकिन हमें लगता है कि लॉकडाउन के बाद से भारी गिरावट आई है," नेशनल अलायंस ऑफ़ पीपुल्स मूवमेंट की अरुंधति ने कहा।</p><p dir="ltr">महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार सृजन योजना (मनरेगा) में महिलाओं की भागीदारी पर लॉकडाउन का क्या असर पड़ा, इस अनौपचारिक मूल्यांकन के लिए अरुंधति ने सीतापुर, हरदोई और उन्नाव ज़िलों का दौरा किया। उन्होंने पाया कि इस योजना के तहत काम करने वाली महिलाओं की जगह उनके पति, <a href="https://indianexpress.com/article/india/migrants-back-women-share-in-nregs-dips-to-8-year-low-6568476/">प्रवासी कामगारों</a> ने ले ली थी, जो लॉकडाउन के दौरान लाखों की संख्या में शहरों से लौटे थे। "जैसे ही पुरुष नौकरियों के लिए जाते हैं, महिलाओं के लिए दरवाज़े बंद हो जाते हैं," उन्होंने कहा।</p><p dir="ltr">उत्तर प्रदेश में <a href="https://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/over-21-lakh-migrant-labourers-have-returned-to-up-official/articleshow/76108717.cms?from=mdr">21 लाख </a>से अधिक प्रवासी श्रमिकों की घर वापसी के साथ, इस वर्ष मनरेगा के तहत काम की अभूतपूर्व मांग थी। जून में <a href="https://indianexpress.com/article/india/have-employed-57-13-lakh-under-mgnrega-up-govt-6460766/">रिपोर्ट </a>किए गए राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार, इस योजना के तहत रोज़गार देने वाले राज्यों की सूची में यूपी सबसे ऊपर है - 57 लाख श्रमिक। राजधानी लखनऊ के ठीक बाद सीतापुर ज़िले से सबसे अधिक संख्या - 191,000 थी।</p><p dir="ltr">मनरेगा का ज़्यादातर काम पुरुषों को मिलता है, सीतापुर ज़िले में महिलाओं के अधिकारों और आजीविका के मुद्दे पर काम कर रहे संगठन, <a href="https://sangtin.org/">संगतिन किसान मज़दूर संगठन</a> की ऋचा सिंह ने कहा। "महिलाओं के लिए 33% आरक्षण के प्रावधान के बावजूद, हमारे ज़िले में मनरेगा में महिला श्रमिकों का अनुपात देश में सबसे कम 5% था। अब इसमें सुधार हुआ है और यह 20% के करीब है। महिलाओं के लिए इस क्षेत्र में काम करना आसान नहीं है," उन्होंने कहा।</p><p dir="ltr">2006 में, जब देश में यह योजना शुरू की गई थी, तब सीतापुर ज़िले की 46 वर्षीय रामबेटी पहली महिला थीं जिन्होंने अपने गांव में मनरेगा के तहत काम की मांग की थी। उनके गांव, अलीपुर से अधिकांश परिवार काम के लिए शहरों की ओर पलायन करने लगे थे, लेकिन वे अपने पति और चार बच्चों के साथ वहीं रहीं। परिवार ने अपनी सात बीघा ज़मीन पर खेती करके और मनरेगा के काम से गुज़ारा किया। रामबेटी को मनरेगा के तहत एक महीने में औसतन 10 से 12 दिन का काम मिलता है। जब दिवाली से कुछ दिन पहले <b>इंडियास्पेंड</b> ने उनसे संपर्क किया, तो वह अपने गांव के बाहर एक मनरेगा साइट पर काम कर रही थीं।</p><p dir="ltr">"एक बार जब आप शहर चले जाते हैं, तो गांव में काम करना आसान नहीं होता है। आपको पंचायत के साथ काम करने के अपने अधिकार के लिए लड़ना होता है। आपको लंबी दूरी तक चलना होता है और सूरज तपिश में खड़े होकर कठिन श्रम करना होता है," रामबेटी ने कहा, जो संगतिन किसान मज़दूर संगठन के हिस्से के रूप में मनरेगा में काम करने के लिए अपने गांव की महिलाओं को जुटाती हैं। </p><p dir="ltr">रामबेटी ने जो महिलाएं जुटाई हैं, उनमें से एक सुनीता देवी हैं, जो जुलाई में जयपुर से अलीपुर लौटी थीं, जब उनके पति ने एक निजी कंपनी में अपनी नौकरी गंवा दी थी। उसके 10, सात और दो साल की उम्र के तीन बच्चे हैं, और यह पहली बार है जब उन्होंने कोई ऐसा काम किया है जिसके उन्हें पैसे मिले हैं। "मुझे खुदाई करना और कीचड़ में काम करने में बहुत मुश्किल आई, लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं है। हमारे बच्चों को शिक्षा की ज़रूरत है और मेरे पति को उनकी नौकरी वापस नहीं मिली है," उन्होंने कहा। परिवार के पास दो बीघा ज़मीन है, जिस पर वे गेहूं और मूंगफली की खेती करते हैं। "वहां पर्याप्त पानी नहीं है क्योंकि मिट्टी सूखी है और उपज कम है। यह काफ़ी नहीं है," उन्होंने कहा।</p><p dir="ltr"><br></p><p dir="ltr"><b style="color: rgb(95, 100, 104); font-family: inherit; font-size: 1.5em; background-color: rgb(255, 255, 255);">सब-कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाली महिलाओं की आमदनी घटी</b></p><p dir="ltr">भारत में जो महिलाएं <a href="https://www.ashoka.edu.in/static/doc_uploads/file_1590845004.pdf">घर से काम</a> करती हैं उन्हें काफ़ी कम मेहनताना मिलता है, अदृश्य, मगर वो घरेलू और वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। </p><p dir="ltr">भारत की श्रम श्रृंखला में वे सबसे निचले पायदान पर हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड की इस <a href="https://www.indiaspend.com/pandemic-crisis-migrant-home-based-women-workers-work-8-hours-day-for-rs-10-15/">रिपोर्ट</a> में कहा गया है। उदाहरण के लिए कपड़ा और वस्त्र उद्योग में उन्हें हर पीस के हिसाब से भुगतान किया जाता है। घर से होने वाले अन्य कामों में पापड़ और अगरबत्तियां बनाना और बीड़ी बनाना शामिल है। भारत में <a href="https://scroll.in/magazine/854568/the-stories-of-the-37-4-million-invisible-and-underpaid-home-based-workers-in-india">3.7 करोड़</a> से अधिक श्रमिक हैं जो घरों से काम करते हैं, इनमें से अधिकांश महिलाएं हैं। महामारी से पहले एक दिन में औसतन 40 से 50 रुपए कमाने वाली ये महिलाएं हाशिये पर चली गई हैं।</p><p dir="ltr">मार्च और जुलाई के बीच अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम करने वाली 15 लाख महिलाओं की यूनियन, सेल्फ़-एम्पलाइड वीमेन एसोसिएशन ने जो <a href="https://www.sewafederation.org/wp-content/uploads/2020/09/COVID-and-Co-ops_-Adovcacy-note-from-SEWA-Cooperative-Federation_Sept.-2020.pdf">आंकलन</a> किया उसके अनुसार जो महिलाएं हस्तशिल्प, सर्विस और वित्तीय क्षेत्रों में काम करती हैं उनकी आमदनी कम हो गई है क्योंकि या तो वो उद्यम पूरी तरह से बंद हो चुके हैं या फिर उन्होंने अपने कर्मचारियों की संख्या घटाकर 50% से कम कर दी है। "अनौपचारिक महिला श्रमिकों की सहायता में सामूहों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। जो इन सामूहों से जुड़े थे, इस संकट में उन्हें एक सहारा मिला," सेवा संगठन की सीनियर कोऑर्डिनेटर, सलोनी मुरलीधर हिरियुर ने कहा। </p><p dir="ltr">रानी केवल आठ साल की थीं जब उन्होंने ज़रदोज़ी का काम सीखा और अपने परिवार की मदद करनी शुरू की। इस साल उन्होंने 15 साल में पहली बार अपनी सुई का इस्तेमाल नहीं किया। </p><p dir="ltr">"मैं सात घंटे काम करती थी और मुझे 150 रुपए मिलते थे। मेरी आंखें खराब हो गई हैं क्योंकि काम बहुत जटिल है, मैं अब शायद ही ये काम कर सकूं," रानी ने बताया। रानी को उम्मीद है कि अगले साल बाजार ठी हो जाएगा और वह एक कार्यशाला खोल सकेगी।</p><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/covid-19/how-pandemic-is-pushing-women-out-of-jobs-in-up-699774</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/covid-19/how-pandemic-is-pushing-women-out-of-jobs-in-up-699774</guid>
<category><![CDATA[Covid-19,Economy,उत्तर प्रदेश,महिलाएं,रोजगार,विशेष खंड,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[सुनयना कुमार]]></dc:creator>
<pubDate>Wed, 09 Dec 2020 11:20:48 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2020/12/09/500x300_353107-womensalon1440.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बिहार में महिला समूहों की बैठकों से गर्भवती माओं की जांच और पोषण में सुधार]]></title>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>नई दिल्ली:</strong> सात महीने पहले 22 साल की उम्र में जूली देवी दूसरी बार मां बनी थी। जूली लगभग 18 साल की थी जब उसने अपने पहले बच्चे को जन्म दिया। पहले बच्चे का प्रसव घर में ही गांव की एक दाई की सहायता से हुआ।</p>

<p style="text-align: justify;">"मैं दो दिन तक दर्द में थी, प्रसव के दौरान बहुत दिक्कत हुई पर नॉर्मल डिलीवरी हो गई," बिहार के पूर्णिया ज़िले की रहने वाली जूली ने बताया। जन्म के समय इस बच्चे का वज़न दो किलो था, जबकि सामान्य बच्चे का वज़न 2.5 किलो होना जाहिए। इस बच्चे के जन्म के दौरान ख़ुद जूली का वज़न भी काफ़ी कम था और वो काफ़ी दुबली थी। इस दौरान जूली ने ना आयरन की गोलियां खाईं ना खान-पान का ध्यान रखा। जूली को पोषण के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। वो महज़ तीसरी क्लास तक पढ़ी थी और बिहार के अररिया ज़िले में रहने वाले उसके माता-पिता ने 17 साल की उम्र में उसकी शादी कर दी थी। </p>

<p style="text-align: justify;">जूली का दूसरा बच्चा स्वस्थ है। दूसरे बच्चे के प्रसव के दौरान जूली ने चार जांचें करवाईं। उसे आंगनबाड़ी से हर महीने आयरन-फ़ालिक एसिड और कैल्शियम की गोलियां दी गईं और दो इंजेक्शन भी लगाए गए। "मैं हरी सब्ज़ियां, साग और रोज़ एक अंडा खाती थी," जूली ने बताया। दूसरा बच्चा अस्पताल में पैदा हुआ जिसका वज़न जन्म के समय 4.5 किलो था। जूली अब जानती है कि इस बच्चे को छः महीने तक सिर्फ़ अपना दूध पिलाना है। इस बच्चे का टीकाकरण कार्ड भी जूली ने बनवा लिया है।</p>

<p style="text-align: justify;">जूली की दोनो गर्भावस्थाओं और शिशुओं के स्वास्थ्य में इतना अंतर इसलिए रहा क्योंकि दूसरा बच्चा होने से पहले जूली ने गांव में होने वाली बैठक में जाना शुरू कर दिया था। महिला समूह की हर पंद्रह दिन पर होने वाली इस बैठक में जूली को स्वच्छता और पोषण जैसे मुद्दों पर जानकारी मिलती रही। </p>

<p style="text-align: justify;">ये बैठकें गांवों में बिहार सरकार के राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, जीविका के तहत करवाई जाती हैं जो स्वाभिमान कार्यक्रम का एक हिस्सा है। यह कार्यक्रम तीन राज्यों--बिहार, छत्तीसगढ़ और ओडिशा--में सक्रिय है और 356 गांवों के 1,25,097 घरों तक पहुंचता है। </p>

<p style="text-align: justify;">स्वाभिमान कार्यक्रम किशोरियों, नव-विवाहित महिलाओं, गर्भवती माओं और दो साल से कम उम्र के बच्चों की माओं पर केंद्रित है। किसी भी उम्र की गर्भवती महिला के लिए दो सबसे ज़रूरी बिंदु हैं पोषक आहार, सही जांच और देखभाल। इन दोनों में किसी भी तरह की कमी या असंतुलन जच्चा-बच्चा दोनो पर बुरा असर डालता है और बच्चे को जन्म से पहले ही कुपोषित कर सकता है। बिहार की गर्भवती महिलाओं के लिए इन दोनो पहलुओं से जुड़े आंकड़े ख़राब हैं।</p>

<p style="text-align: justify;">गर्भावस्था के दौरान देखभाल या जांच कम से कम चार बार यानी हर तिमाही में एक बार होनी चाहिए। लेकिन साल 2015-16 में आए सर्वेय के अनुसार 44% महिलाओं की 2005-06 के बाद से उनकी आख़िरी गर्भावस्था के दौरान देखभाल या जांच (एएनसी) एक बार भी नहीं की गई।इसके साथ ही, एक टीटी इंजेक्शन और कम से कम सौ दिन आयरन-फ़ालिक एसिड की गोली का सेवन ज़रूरी है। बिहार में सिर्फ़ 3% महिलाओं को ही अपने आख़िरी बच्चे के दौरान पूरी एएनसी मिल पाई, नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे 2015-16 (एनएफ़एचएस-4) के आंकड़े दिखाते हैं।</p>

<p style="text-align: justify;">इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फ़ॉर पॉपुलेशन साइंसेज़ (आईआईपीएस) और यूनिसेफ़ ने बिहार, छत्तीसगढ़ और ओडिशा राज्यों की सरकारों की सहायता से जून 2019 में किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और दो साल से कम उम्र के बच्चों की मांओं और उनके खान-पान और पोषण पर सर्वे किया। इस सर्वे में 17,680 किशोरियां और महिलाएं शामिल थीं। </p>

<p style="text-align: justify;">सर्वे में पाया गया कि तीनों राज्यों में सभी श्रेणियों की महिलाओं का खान-पान सबसे ज़्यादा ख़राब या असंतुलित बिहार में है। डाइटरी डाइवर्सिटी स्कोर यानी खान-पान में तरह-तरह के पोषक तत्व शामिल हैं या नहीं, इस मामले में बिहार का औसत किशोरियों के लिए 10 में से 3.98 अंक, गर्भवती माओं के लिए 4.05 अंक और दो साल से कम उम्र के बच्चों की माओं के लिए 3.76 अंक था।</p>

<p style="text-align: justify;">इस सर्वे के लगभग 6 महीने बाद, दिसम्बर 2019 में आईआईपीएस, यूनिसेफ़ और तीनों राज्यों की सरकारों ने गर्भावस्था के दौरान जांच और देखभाल को लेकर सर्वे किया। सर्वे में 15 से 49 साल की कुल 2,573 गर्भवती महिलाएं शामिल थीं जिनमें से 10% 15 से 19 साल की किशोरियां थीं और बाक़ी वयस्क। सर्वे में बिहार के पूर्णिया ज़िले के कसबा और जलालगढ़ ब्लॉक में 27, 41 और 36 गांवों के 3 ग्रुप से 936 गर्भवती महिलाएं शामिल की गईं, जिसमें 75 किशोरियां थीं। पूर्णिया, बिहार में सबसे कम साक्षरता वाला ज़िला है, यहां एनीमिक महिलाओं की संख्या भी राज्य में सबसे ज़्यादा (70% से अधिक) है।</p>

<p style="text-align: justify;">इस सर्वे में भी बिहार ज़्यादतर पैमानों पर बाक़ी दोनों राज्यों से पीछे नज़र आया। सर्वे में सुझाव दिया गया है कि बिहार में पोषण पर ख़ास ध्यान देने की ज़रूरत है। ये ज़रूरत स्वाभिमान के तहत बनाए गए महिला समूह पूरी करते दिखाई दे रहे हैं। जिन गांवों में ये समूह चालए जा रहे हैं वहां की ज़्यादातर किशोरियां और महिलाएं पहले से ज़्यादा जागरूक हैं और अपने और अपने परिवार के पोषण और स्वास्थ की बेहतर देखभाल कर पा रही हैं। </p> 

<p style="text-align: justify;"><em>(</em><strong><em>साधिका,</em></strong> <strong><em>इंडियास्पेंड</em></strong><em> के साथ प्रिन्सिपल कॉरेस्पॉंडेंट है।) </em></p>

<p style="text-align: justify;"><em>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </em><em>respond@indiaspend.org</em><em> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</em></p>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/बिहार-में-महिला-समूहों-की/</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/बिहार-में-महिला-समूहों-की/</guid>
<category><![CDATA[कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[साधिका तिवारी]]></dc:creator>
<pubDate>Mon, 07 Dec 2020 06:39:35 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/old_images/500x300_352453-coverimg-1.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA['पुरुषों को जो कहना है कहें, मैं वही करती हूं जो मुझे करना है']]></title>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>पटना: </strong>रामवती देवी (बदला हुआ नाम) को पहली बार जब पता चला कि बिहार के एक गांव की मुखिया महिला है तो वो हैरान रह गई। “मेरी तो समझ में ही नहीं आया कि कोई महिला नेतृत्व कैसे कर सकती है। जिस गांव में उसने सारी ज़िंदगी घूंघट में जी हो वहां पुरुषों पर या प्रभावशाली जातियों पर वो कैसे हुकुम चला सकती है?” पिछले महीने <strong>इंडियास्पेंड</strong> से बात करते हुए 50 वर्षीय रामवती देवी ने कहा।</p>

<p style="text-align: justify;">साल 2006 में, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली बिहार सरकार ने राज्य की पंचायतों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण की शुरुआत की थी ताकि अधिक से अधिक महिलाएं <a href="https://www.researchgate.net/publication/319297501_Empowerment_of_Women_Representatives_in_Panchayat_Raj_Institutions_A_Thematic_Review">मुख्यधारा की</a> राजनीति में शामिल हो सकें। बिहार, देश का पहला राज्य था जहां सबसे <a href="https://www.theigc.org/wp-content/uploads/2014/09/Kumar-Prakash-2012-Working-Paper.pdf">पहले</a> महिलाओं के लिए पंचायतों में आधी सीटें आरक्षित की गई। अब जब राज्य में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के <a href="https://www.indiaspend.com/bihars-women-win-against-alcohol-but-lose-to-illicit-liquor-drugs/">2016 में शराबबंदी</a> से लेकर छात्राओं के लिए फ़्री साइकिल देने महिलाओं को लुभाने वाले फ़ैसले सरकार का भविष्य तय करेंगे। </p> 

<p style="text-align: justify;">बिहार के ग्रामीण शासन में महिलाओं के लिए आरक्षण, लिंग भेद को कम कर रहा है, इन संस्थाओं में 70,400 महिलाएं ग्रामीण बिहार के लिए फ़ैसले करती हैं, <a href="https://www.c3india.org/uploads/news/Bihar_Gender_Report_Card_2019_28th_Jan_2020_FOR_WEB_FILE.pdf">जेंडर रिपोर्ट कार्ड 2019</a> के अनुसार। पिछले 14 साल में रामवती देवी ने अपने और दूसरी महिला नेताओं में आए बदलाव को देखा है- अपने पतियों और पुरुष रिश्तेदारों की रबर स्टैम्प से लेकर स्वत्रंत आवाज़ों तक। </p>

<p style="text-align: justify;">रामवती देवी अब पटना ज़िले की एक ग्राम पंचायत की वार्ड मेम्बर हैं। उनके पास क़रीब दस साल का अनुभव है। बीते कुछ वर्षों में उन्हें एक एनजीओ के समर्थन का भी लाभ मिला है। फ़ैसले लेने में उनकी भागीदारी होती है, वह ब्लॉक स्तर की बैठकों में भाग लेती हैं और अक्सर मुखिया से मिलती हैं। “मैंने गर्भनिरोधक के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए हाल ही में वार्ड में कंडोम भी बांटे। मर्दों को जो कहना है कहते रहें, हम वही करेंगे जो  हमको करना है,” उन्होंने कहा।</p>

<p style="text-align: justify;">पटना के सात और मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले के पांच गांवों में पंचायतों के लिए चुनी गई महिलाओं से बातचीत में हमने पाया कि अभी भी, पंचायतों की अनगिनत महिला नेता अभी भी पितृसत्ता और संसाधनों की कमी से जूझ रही हैं। कई महिला नेताओं के पास अभी भी जानकारियां, ट्रेनिंग आदि नहीं है ताकि वे आत्मविश्वास से भरा निर्णय ले सकें, स्थानीय शासन में महिलाओं को सलाह देने वाले विशेषज्ञों और गैर-सरकारी संगठनों के साथ सक्रिय कार्यकर्ताओं ने <strong>इंडियास्पेंड </strong>को बताया।</p>

<p style="text-align: justify;">बिहार के जेंडर इंडिकेटर बताते हैं कि यह राज्य राष्ट्रीय औसत से पीछे है - महिला साक्षरता दर 2005-06 में 37% थी जो 2015-16 में बढ़कर 50% हो गई, लेकिन फिर भी यह राष्ट्रीय औसत, 68.4% से कम है। <a href="http://rchiips.org/nfhs/pdf/NFHS4/BR_FactSheet.pdf">राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16</a> के अनुसार। श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी सभी राज्यों में सबसे ख़राब है। इसकी दर राष्ट्रीय औसत, 23.3% की तुलना में 4.1% है, नेशनल सैंपल सर्वे <a href="http://www.mospi.gov.in/sites/default/files/publication_reports/Annual%20Report%2C%20PLFS%202017-18_31052019.pdf">2017</a> के अनुसार।</p>

<iframe style="display:block;" src="https://e.infogram.com/bceb5805-6546-4ca8-b23d-5c557cb6c9fc?src=embed" title="Bihar_Women" width="620" height="820" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe>

<p style="text-align: justify;">"महिलाओं के नाम सिस्टम में तो आ गए हैं, लेकिन उनकी आवाज़ अभी भी अनसुनी है," पटना में परसा बाज़ार की एक सामाजिक कार्यकर्ता प्रतिमा कुमारी पासवान ने कहा। प्रतिमा, राज्य में हो रहे विधानसभा चुनाव में फुलवारी शरीफ़ निर्वाचन क्षेत्र से एक निर्दलीय उम्मीदवार हैं।</p>

<p style="text-align: justify;"><strong>पंचायतों में शामिल होने के बावजूद राजनीति में कम महिलाएं</strong></p>

<p style="text-align: justify;">लैंगिक रूढ़ियों, मनोवैज्ञानिक और पारंपरिक बाधाओं, और शिक्षा, प्रशिक्षण और संसाधनों में असमानताओं के कारण दुनिया में हर जगह राजनीति में महिलाओं की भागीदारी <a href="https://www.un.org/womenwatch/osagi/wps/publication/WomenAndElections.pdf">सीमित</a> है। पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण से महिलाओं के सशक्त होने और राजनीति में नेता और वोटर के तौर पर उनकी भागीदारी में सुधार की <a href="https://www.researchgate.net/publication/319297501_Empowerment_of_Women_Representatives_in_Panchayat_Raj_Institutions_A_Thematic_Review">उम्मीद</a> थी।</p>

<p style="text-align: justify;">हालांकि बिहार में वोट देने वाली महिलाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन कुल मिलाकर राज्य की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम है। इसका पता राजनैतिक पार्टियों के उम्मीदवारों की सूची से लगाया जा सकता है। नीतीश कुमार की अगुवाई वाले जनता दल (यूनाइटेड) ने 78 में से 18% सीटों पर महिला उम्मीदवारों को उतारा है, जो कि पहले दो चरणों में चुनाव लड़ रही हैं। जेडीयू की मुख्य प्रतिद्वंद्वी, राष्ट्रीय जनता दल ने 97 में से 14.4% महिलाओं को टिकट दिया है, चुनाव आयोग के शुरु के दो चरणों के आंकड़ों के अनुसार। इन आंकड़ों का <a href="https://myneta.info/Bihar2020/index.php?action=summary&amp;subAction=women_candidate&amp;sort=candidate#summary">संकलन और विश्लेषण</a> एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स ने किया है। अन्य पार्टियों में, लोक जनशक्ति ने 93 में से 16% सीटों पर, भारतीय जनता पार्टी ने 75 में से 9% सीटों पर, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 45 में से 9% सीटों पर और वामपंथी पार्टियों सीपीआई, सीपीआई (एम) और सीपीआई (एमएल) ने 22 में से 4.5% सीटों पर महिला उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं।</p>

<iframe style="display:block;" src="https://e.infogram.com/688c6dd6-ef18-4042-9cd6-425428d6539c?src=embed" title="Bihar_Women_Contestants" width="620" height="760" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe>

<p style="text-align: justify;">राज्य की निवर्तमान विधानसभा के 240 सदस्यों में से <a href="https://adrindia.org/content/bihar-assembly-election-2015-analysis-criminal-background-financial-education-gender-and">12%</a> महिलाएं हैं, 2010-2015 की विधानसभा की तुलना में कम। पिछली विधानसभा में <a href="http://www.vidhansabha.bih.nic.in/pdf/former%20women%20member/15.pdf">14%</a> सदस्य महिलाएं थीं।</p>

<p style="text-align: justify;">बिहार में 50% महिलाएं साक्षर हैं, एनएफ़एचएस-2015-16 के <a href="http://rchiips.org/nfhs/pdf/NFHS4/BR_FactSheet.pdf">आंकड़ों</a> के अनुसार। ग्राम पंचायत की सदस्य के रूप में चुनी गई ज़्यादातर महिलाएं न्यूनतम शिक्षा, कम या बिना राजनीतिक अनुभव वाली होती हैं, और उनकी भूमिका या उसके द्वारा किए जाने वाले कार्यक्रमों और परियोजनाओं के बारे में उन्हें बहुत कम जानकारी होती है, विशेषज्ञों ने बताया। महिलाओं की तुलना में पुरष इन सभी पैमानों पर उनसे आगे हैं। दरअसल सामाजिक-राजनीतिक प्रणाली उनके पक्ष में है, जिससे वो बेहतर शिक्षा हासिल कर पाते हैं और राजनीति में बेहतर मुकाम हासिल कर पाते हैं।</p>

<p style="text-align: justify;">तमिलनाडु में महिला पंचायत प्रमुखों के सामने आने वाली चुनौतियों का अध्ययन करने के लिए हुई <strong>इंडियास्पेंड</strong> छह भाग की <a href="https://www.indiaspend.com/the-triumph-of-sharmila-devi-and-tamil-nadus-women-leaders-34320/">श्रृंखला</a> के दौरान हमने पाया था कि महिलाओं को अक्सर जातिवाद, वित्तीय बाधाओं, लिंगभेद और हिंसा का सामना करना पड़ता है। उनका सार्वजनिक जीवन उनके कार्यकाल के साथ ख़त्म हो जाता है, बिना किसी अन्य प्रशासनिक भूमिका या मुख्यधारा की राजनीति में कोई जगह बनाए बिना- जो अक्सर पुरुषों के लिए आसानी से उपलब्ध हो जाता है।</p>

<iframe style="display:block;" width="560" height="315" src="https://www.youtube.com/embed/eT3u5URpjQQ" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture" allowfullscreen></iframe>

<p style="text-align: justify;"><strong>प्रशिक्षण और सलाहकारों की ज़रूरत </strong></p>

<p style="text-align: justify;">साल 1993 में संविधान में <a href="https://niti.gov.in/planningcommission.gov.in/docs/reports/sereport/ser/bihinter/st_bihch11.pdf">73वां संशोधन</a> कर संसद में महिला आरक्षण बिल लाया गया। देश के कई राज्यों में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित कर दी गई, <a href="https://www.theigc.org/wp-content/uploads/2014/09/Kumar-Prakash-2012-Working-Paper.pdf">संशोधन के मुताबिक़</a> कम से कम। बिहार ने सबसे ज़्यादा, 50% सीटें आरक्षित की। उसके बाद 19 अन्य राज्यों ने भी 50% आरक्षण की <a href="https://www.panchayat.gov.in/reservation-of-women-in-pris">पेशकश</a> की।</p>

<p style="text-align: justify;">चूंकि गांवों में अभी भी सामाजिक और राजनीतिक नेटवर्क का नियंत्रण पुरुषों के पास है, महिला मुखिया अक्सर वास्तविक निर्णय लेने वालों की रबर स्टैम्प बनकर रह जाती हैं -- पति या परिवार के अन्य पुरुषों के लिए -- जैसा कि <a href="https://www.c3india.org/takeastand-pahel">तमाम दस्तावेज़ों में</a> दर्ज है। हमने पाया कि अधिकांश महिला नेता अभी भी महत्वपूर्ण मुद्दों पर मार्गदर्शन के लिए पुरुषों की ओर देखती हैं।</p>

<p style="text-align: justify;">“जब भी महिला मुखियाओं को आधिकारिक बैठकों के लिए बुलाया जाना होता है, तब भी पत्र <em>मुखियापति </em>को संबोधित किया जाता है । इस व्यवस्था से सिस्टम को कोई समस्या नहीं है,” पटना के मसौरही ब्लॉक में <a href="https://lokmadhyam.com/about/">लोकमध्यम</a> नाम के एनजीओ से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता, प्रमिला कुमारी ने कहा। </p>

<p style="text-align: justify;">इनमें से कुछ महिलाओं में 2016 के आसपास बदलाव आने लगा, 50% आरक्षण के कदम के एक दशक बाद, जब कई महिलाएं दूसरी बार चुनाव लड़ रही थीं, उन्होंने कहा, और स्वतंत्र निर्णय लेने वाली महिला पंचायत प्रमुखों के भी उदाहरण थे। "लेकिन अब भी मैं उनकी संख्या को मात्र 15% पर रखूंगी और इनमें से अधिकांश महिलाओं को विभिन्न ग़ैर सरकारी संगठनों या सहायता समूहों से कुछ बाहरी मार्गदर्शन मिलता है," उन्होंने कहा।</p>

<p style="text-align: justify;">शिक्षा, डिजिटल साक्षरता और प्रशिक्षण की कमी एक महिला के निवेश के निर्णयों और निगरानी क्षमताओं को पंचायत प्रमुख के रूप में सीमित कर सकती है, लेकिन प्रशिक्षण और सही सलाह के ज़रिए इसे बदला जा सकता है, महिला पंचायत सदस्यों के साथ काम करने वाली संस्थाओं से जुड़ी, मधु जोशी ने कहा। </p>

<p style="text-align: justify;">“ये महिलाएं आरक्षण के कारण चुनी जाती हैं। यहां तक ​​कि मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट तक उनकी पहुंच और उसका उपयोग इनके लिए सीमित है। इसके अलावा, उन्हें परिवार के भीतर और समुदाय में पितृसत्ता की बाधाओं से भी जूझना होता है,” मधु जोशी ने कहा। "इन महिला नेताओं को खुद को मुखर करने के लिए सलाह, प्रदर्शन और सामूहिक प्लेटफार्मों की आवश्यकता है।"</p>

<p style="text-align: justify;"><strong>'अगर मुझसे बात ही नहीं करेंगे तो मैं सीखूंगी कैसे?'</strong></p>

<p style="text-align: justify;">56 साल की रेणु देवी की पटना जिले की तिनेरि  पंचायत की मुखिया हैं। वह एक पक्के मकान में रहती हैं, जिसमें एक तरफ़ एक दीवार है ताकि उस तरफ़ रहने वाले मुसहर समुदाय के लोगों को दूर रखा जा सके। मुसहर समुदाय, दलितों के बीच सबसे अधिक हाशिए पर रहने वाला समुदाय है । दरवाज़े के अंदर, एक बोर्ड पर रेणु देवी का नाम लिखा है, मुखिया की मीटिंग के लिए एक कुर्सी और टेबल है, आने वालों के लिए प्लास्टिक की लाल कुर्सियां हैं।</p>

<p style="text-align: justify;">जब हम उनसे मिलने गए, तो रेणु देवी ने घोषणा की कि उनके पति बाहर हैं और यह सुनकर आश्चर्यचकित हुईं  कि हम उनसे मिलने आए हैं। वह प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठने के लिए आगे बढ़ी। वह मुखिया की कुर्सी पर क्यों नहीं बैठीं, हमने पूछा। क्योंकि वह [असली] मुखिया नहीं हैं, उन्होंने जवाब दिया।</p>

<p style="text-align: justify;">दाई की सहायता से ज़मीन पर अपने बच्चों को जन्म देने को याद करते हुए, उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने पति को सुझाव दिया था कि गांव के आंगनबाड़ी केंद्र में महिलाओं के लिए प्रसवपूर्व देखभाल को और अधिक सुलभ बनाया जाए। "मैंने उनसे कहा, लेकिन कौन सुनता है, पुरुषों को इन समस्याओं से कोई मतलब नहीं है," उन्होंने कहा लेकिन तुरंत ही बात बदल दी। "वैसे भी वो अधिक शिक्षित हैं, वो बेहतर जानते होंगे, वो हमेशा सही काम करते हैं।"</p>

<p style="text-align: justify;">प्रमिला कुमारी ने कहा कि इस अंतर का कारण यह है कि महिलाओं को शायद ही कभी आत्मविश्वास या खुद को महत्व देना सिखाया जाता है। "महिलाओं के परिवार के लोग उन्हें लगातार याद दिलाते हैं कि वे कितनी मूर्ख, अयोग्य और अनुभवहीन हैं, उन्हें सिखाया जाता है कि सामने न आएं," उन्होंने कहा। "पुरुष यह भी सुनिश्चित करते हैं कि उनकी पत्नियों के पास बस थोड़ी सी ही शक्ति या स्वतंत्रता रहे, इसलिए इन महिलाओं के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र होना और कामकाज संभालना बहुत मुश्किल है।"</p>

<p style="text-align: justify;">जो महिला मुखिया बुलंद हैं, वो भी शिकायत करती हैं कि ब्लॉक अधिकारी उन्हें गंभीरता से नहीं लते हैं। "उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी थी, उन्होंने मेरे पति से पूछा और मेरे सुझावों पर ध्यान नहीं दिया। उनकी धारणा यह थी कि मुझे कुछ समझ नहीं आएगा और मैं केवल आरक्षण की वजह से जीती हूं," पटना की चपौर पंचायत की मुखिया, अनामिका देवी (40) ने कहा। "अगर वे मुझसे बात ही नहीं करेंगे तो मैं कुछ भी कैसे सीखूंगी?"</p>

<p style="text-align: justify;">समय लगा लेकिन लोगों ने अनामिका देवी को सुनना शुरू कर दिया क्योंकि "उन्हें पता है कि मैं काम करवा सकती हूं इसलिए उन्हें भी मेरी बात सुननी पड़ती है, यहां तक कि प्रभावशाली जातियों के लोगों को भी बात सुननी पड़ती है"। चपौर पंचायत में प्रभावशाली जातियों के तीन पुरुष और दो महिला वार्ड मेम्बर हैं।</p>

<p style="text-align: justify;">"सिस्टम विशेष रूप से पिछड़ी जातियों की महिलाओं के ख़िलाफ है," सामाजिक कार्यकर्ता प्रतिमा कुमारी पासवान ने कहा।  "उन्हें लगता है कि वह आसानी से इन महिलाओं भयभीत और उनकी बात सुनने के लिए मजबूर कर सकते हैं।"</p>

<p style="text-align: justify;">तमिलनाडु के कुड्डालोर ज़िले की एक हालिया <a href="https://www.newindianexpress.com/states/tamil-nadu/2020/oct/10/woman-dalit-panchayat-chief-humiliated-by-junior-in-cuddalore-two-arrested-2208597.html">रिपोर्ट</a> से पता चला है कि एक दलित महिला पंचायत के प्रमुख एस राजेश्वरी को मीटिंग के दौरान फ़र्श पर बैठने के लिए कहा गया, जबकि बाकी लोग कुर्सियों पर बैठे थे। पटना की तिनेरी पंचायत की वार्ड सदस्य सुनीता कुमारी, अपने शुरुआती वर्षों में इसी तरह के अनुभवों के बारे में बताया। "जब मैं जीतने के बाद ग्राम सभा की पहली मीटिंग में शामिल हुई, तो भूमिहार [प्रभावशाली जाति] मुखिया ने मुझे वार्ड सदस्य होने के बावजूद फर्श पर बैठने के लिए कहा, मैंने उनसे कहा कि मैं फ़र्श पर नहीं बैठूंगी, आपके साथ बैठने का मेरा अधिकार है,” रेणु देवी के पति की तरफ़ इशारा करते हुए उन्होंने कहा। उस समय रेणु देवी के पति मुखिया थे।</p>

<p style="text-align: justify;"><strong>महिलाएं बेहतर सुविधाएं सुनिश्चित करती हैं</strong></p>

<p style="text-align: justify;">एक <a href="http://economics.mit.edu/files/769">रिसर्च</a> से पता चला है कि महिलाओं के लिए आरक्षित पंचायतों में सार्वजनिक सुविधाओं जैसे पेयजल, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, उचित मूल्य की दुकानों आदि की बेहतर उपलब्धता देखने को मिली है।</p>

<p style="text-align: justify;">"हमारे घर में लंबे समय तक नल का पानी नहीं था, हम मांग करते थे लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।" मसौढ़ी ब्लॉक की 40 वर्षीय लीला देवी ने कहा। “तब मुझे एहसास हुआ - जो मेरा अधिकार है उसके लिए मुझे बार-बार क्यों मांग करनी? इसलिए मैंने चुनाव लड़ा और वार्ड सदस्य बन गई और सबसे पहले मैंने स्वीकृत धनराशि से अपने वार्ड में हर घर में नल का पानी पहुंचाने का काम किया।”</p>

<p style="text-align: justify;">महिला नेता बुनियादी सेवाओं को प्राथमिकता देती हैं, सेंटर फ़ॉर केटेलाइज़िंग चेंज के 2015 में हुए एक <a href="https://www.c3india.org/uploads/news/Pahel_-_Women_Leading_Change.pdf">अध्ययन</a> के अनुसार। “जब मैं स्कूल में थी, तब हमारी क्लास में केवल दो लड़कियां थीं, किसी ने भी हमें पोषण, मासिक धर्म या परिवार नियोजन के बारे में नहीं बताया। मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटी उसी तरह से बड़ी हो, जैसे मैं हुई, ” नाम न बताने की शर्त पर एक महिला मुखिया ने कहा। अब वह स्थानीय स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्रों के साथ बात कर रही हैं ताकि किशोरियों के लिए मुफ़्त सेनेटरी पैड उपलब्ध हो सकें।</p>

<p style="text-align: justify;">हालांकि,महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (<a href="https://nrega.nic.in/netnrega/home.aspx">मनरेगा</a>) के तहत कार्यान्वित परियोजनाओं पर महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व के प्रभाव का आकलन करने वाले एक <a href="https://econpapers.repec.org/paper/indisipdp/13-02.htm">अध्ययन</a> में पाया गया कि जिन पंचायतों की मुखिया महिला हैं वहां इन कार्यक्रमों में ज़्यादा अनियमितताएं पाई गईं।</p>

<p style="text-align: justify;">"यह भी याद रखना भी ज़रूरी है कि महिलाएं वित्तीय और डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण विवश हैं, जो काफ़ी हद तक उन्हें शक्तिशाली लोगों के साथ उलझने और उन्हें चुनौती देने में रुकावट है," मधु जोशी ने कहा, "हालांकि, अध्ययन से यह भी पता चलता है कि महिलाओं का अनुभव जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, शासन में सुधार होता जाता है।"</p>

<p style="text-align: justify;">"आरक्षण महिला मतदाताओं को खुश करने के लिए एक राजनैतिक कदम था, लेकिन राज्य में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी भी बड़ी संख्या में बढ़ रही है," सामाजिक कार्यकर्ता प्रतिमा कुमारी पासवान ने कहा। साल 2000 तक पुरुषों और महिलाओं के बीच मतदान का अंतर <a href="https://www.livemint.com/Politics/vwjDtQWrXgL75CCmh1mkdN/Women-voters-behind-Nitishs-success.html">20%</a> (पुरुषों के पक्ष में) था लेकिन 2015 के चुनाव में महिलाओं का <a href="https://eci.gov.in/files/file/3904-bihar-2015/">मतदान</a> 60% था जबकि पुरुषों का मतदान 53% रहा। </p>

<p style="text-align: justify;"><em>(</em><strong>साधिका</strong><em>, </em><strong>इंडियास्पेंड</strong> के साथ प्रिन्सिपल कॉरेस्पॉंडेंट हैं।<em>)</em></p>

<p style="text-align: justify;"><em>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</em></p>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/पुरुषों-को-जो-कहना-है-कहें/</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/पुरुषों-को-जो-कहना-है-कहें/</guid>
<category><![CDATA[कवर स्टोरी,जेंडरचेक,नवीनतम रिपोर्ट,महिलाएं,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[साधिका तिवारी]]></dc:creator>
<pubDate>Tue, 03 Nov 2020 11:31:37 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/old_images/500x300_346081-sunita-devi1440.jpg]]></image>
</item>
</channel>
</rss>
