<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?>
<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" version="2.0">
<channel>
<title><![CDATA[इंडियास्पेंड: डेटा पत्रकारिता, भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्लेषण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कृषि, राजनीति]]></title>
<description><![CDATA[इंडियास्पेंड: डेटा पत्रकारिता, भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्लेषण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कृषि, राजनीति]]></description>
<link>https://www.indiaspendhindi.com</link>
<image>
<url>https://www.indiaspendhindi.com/images/logo.png</url>
<title>इंडियास्पेंड: डेटा पत्रकारिता, भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्लेषण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कृषि, राजनीति</title>
<link>https://www.indiaspendhindi.com</link>
</image>
<generator>Hocalwire</generator>
<lastBuildDate>Sat, 01 May 2021 03:38:20 GMT</lastBuildDate>
<atom:link href="https://www.indiaspendhindi.com/category/women-2/feeds.xml" rel="self" type="application/rss+xml"/>
<pubDate>Sat, 01 May 2021 03:38:20 GMT</pubDate>
<copyright><![CDATA[Indiaspend Hindi]]></copyright>
<language><![CDATA[hi]]></language>
<managingEditor><![CDATA[editor@indiaspendhindi.com (IndiaSpend Hindi)]]></managingEditor>
<ttl>1</ttl>
<item>
<title><![CDATA[पश्चिम बंगाल के चाय बागानों में अपने बच्चों को खोती माएं]]></title>
<description><![CDATA[पश्चिम बंगाल के चाय बागानों में काम करने वाले कुल कर्मचारियों में से लगभग 50% महिलाएँ हैं। चाय बागान में काम कर रही महिलाओं के पास मातृत्व सुविधाएँ, शिशु गृह की सुविधा, अवकाश, उचित दिहाड़ी, सुलभ शौचालय, पीने का पानी, नज़दीकी अस्पताल और अन्य कई मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>जलपाईगुड़ी, दार्जीलिंग (पश्चिम बंगाल): </b>रंजीता डे, 45, पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग के फांसीदेवा ब्लॉक के एक चाय बागान में काम करती हैं। रंजीता की शादी करीब दो दशक पहले हुई थी और तब से ही वह यहां काम कर रही हैं। लेकिन इस दौरान वह कई आकस्मिक गर्भपात, एक ऑपरेशन, और पैदा होने के बाद अपने 6 बच्चों की मौत देख चुकी हैं।</p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">रंजीता की कहानी सिर्फ़ उनकी ही नहीं है। उनके साथ बागान में पत्तियां तोड़ने वाली कई महिलाएं भी ऐसी ही कहानियां बताती हैं। गर्भावस्था के दौरान काम करते करते बच्चा गिरना इनके जीवन का आम हिस्सा हो गया है। "साड़ी उठाकर देखते हैं, खून दिखता है तो पता चलता है कि बच्चा गिर गया, अक्सर दर्द भी नहीं होता। उस दिन घर जल्दी वापस चले जाते हैं, अगले दिन सुबह फिर आते हैं," यहां काम करने वाली एक महिला ने बताया।</p><p dir="ltr">इसका कारण हैं चाय बागानों की विषम परिस्थितियां जिनसे जूझते हुए ये महिलाएं यहां काम करते हुए अपना जीवनयापन करती हैं।</p><p dir="ltr">भारत दुनिया का <a href="http://www.iuf.org/w/sites/default/files/FFMFINALReport_160616_web.pdf"><u>दूसरा सबसे बड़ा</u></a> चाय उत्पादक देश है, और भारत की सबसे ज़्यादा चाय, असम के बाद पश्चिम बंगाल के बागानों से आती है। चाय भारत का <a href="http://www.iuf.org/w/sites/default/files/FFMFINALReport_160616_web.pdf"><u>दूसरा सबसे बड़ा रोज़गार</u></a> देने वाला उद्योग है, जिसमें ज्यादातर महिलाएं शामिल हैं। चाय बागानों में काम करने वाले कुल कर्मचारियों में से लगभग <a href="https://www.cwds.ac.in/wp-content/uploads/2020/06/Working-Paper-15.pdf"><u>50% महिलाएँ</u></a> हैं। पश्चिम बंगाल के चाय बागानों में <a href="https://wblc.gov.in/download/Synopsis-of-Tea-Garden-Survey-Final-Report.pdf"><u>2.06 लाख</u></a> से ज़्यादा महिलाएं काम करती हैं।</p><p dir="ltr">ये महिलाएँ और इनके परिवार, जिनमे से ज़्यादातर दार्जीलिंग और जलपाईगुड़ी में रहते हैं, 17 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के 8 चरण में हो रहे विधानसभा चुनाव में मतदान करेंगे।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/16/458353-mother-child.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421qHo4ZlAjU62gN3LsnlwgdMpOuRiWj3Ds3962223" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1618583980300" title="दार्जिलिंग के फांसीदेवा के चाय बागान में अपने बच्चे को पीठ पर बांध कर काम कर रही एक महिला। फोटो: साधिका तिवारी" alt="दार्जिलिंग के फांसीदेवा के चाय बागान में अपने बच्चे को पीठ पर बांध कर काम कर रही एक महिला। फोटो: साधिका तिवारी" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1618583980300"><p>दार्जिलिंग के फांसीदेवा के चाय बागान में अपने बच्चे को पीठ पर बांध कर काम कर रही एक महिला। फोटो: साधिका तिवारी</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">रंजीता के गाँव में, घर के पास और चाय बागान के रास्ते में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के सैकड़ों रंगीन झंडे और पोस्टर दिखाई देते हैं, पर रंजीता जैसे वोटर और उनकी समस्याएँ चुनाव-दर-चुनाव नजरअंदाज की जाती हैं।<br></p><p dir="ltr"><b>'कई आकस्मिक गर्भपात, एक ऑपरेशन और 6 बच्चों की मौत'</b><br></p><p dir="ltr">"शनिवार का दिन था, शनिवार को मेरी छुट्टी 4 बजे ही हो जाती थी। उस दिन बारिश हो रही थी। गाँव से थोड़ी दूर मेला लगा था तो मैंने सोचा मैं जल्दी-जल्दी पाती तोड़ कर चली जाऊंगी। उस दिन मैं साइकिल भी नहीं लायी थी, तो पैदल चल कर ही जाना था," रंजीता लगभग 20 साल पहले की घटना बताती है, जब वो 5 या 6 महीने के गर्भ से थीं।<br></p><p dir="ltr">"मैंने जल्दी-जल्दी काम निपटाया, इसके बाद करीब 20-25 किलो पत्तियाँ मैंने उठायी और उनको जमा करने गयी। चाय बागान में पानी के बहाव के लिए नालियाँ होती हैं जिन्हें कूद कूद कर जाना होता है, मेरे पेट में बच्चा था और सर पर पत्तियाँ। उस दिन मैंने रोज़ की तरह नाली कूदी और फिसल कर नाली में गिर गयी, मैंने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया, पत्तियां जमा करके घर चली गयी," रंजीता ने बताया।<br></p><p dir="ltr">"उस दिन मेरा बच्चा पेट में मर गया और मुझे पता भी नहीं चला, उस समय ज़्यादा कुछ पता भी नहीं था, इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। कुछ 10-12 दिन बाद मुझे गंध आने लगी, कुछ कमजोरी भी महसूस हुई। तब चाय बाग़ान की और औरतों ने बताया कि शायद नाली कूदने से मेरा बच्चा मर गया, सड़ गया और मुझे पता भी नहीं चला," रंजीता बताती हैं।<br></p><p dir="ltr">"एक दीदी ने कहा डॉक्टर के पास जाना ज़रूरी है, पर मैंने कहा कि अभी तो काम है, काम ख़त्म करके पति को पूछूँगी। मैंने पती को बोला की जाना पड़ेगा, खुड़बाड़ी (पास का एक गाँव) अस्पताल भी यहाँ से बहुत दूर है, तो साइकल से वो मुझे डॉक्टर के पास ले कर गया। वहाँ डॉक्टर ने कहा कि गर्भपात हो गया है और अब अस्पताल में भर्ती होना पड़ेगा, इसके उसने 35,000 रुपए माँगे। पति वापस आया और पूरी बस्ती वालों से पैसे उधार लिया, पता नहीं कितने पैसे जमा हुए, कितने दिए गए," रंजीता ने बताया।<br></p><p dir="ltr">रंजीता ने गर्भावस्था के दौरान कभी भी जाँचें नहीं करवाई। सरकार के अनुसार गर्भावस्था के दौरान <a href="https://nhm.gov.in/images/pdf/programmes/maternal-health/guidelines/my_safe_motherhood_booklet_english.pdf"><u>चार जाँचें ज़रूरी</u></a> होती हैं, ये जाँच हर सरकारी अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्र या आंगनबाड़ी केंद्र में मुफ़्त की जाती। इनके किसी भी बच्चे का कोई भी टीकाकरण नहीं हुआ, बीते 5-6 सालों में पैदा हुए बच्चों को सिर्फ़ पोलियो की दावा दी गयी। रंजीता के सारे बच्चे घर पर ही पैदा हुए, प्रसव के समय उनके साथ कोई दाई भी नहीं थी।<br></p><p dir="ltr">"दर्द होते ही बच्चा आ जाता था बस, अस्पताल जाना ही मुश्किल था," रंजीता ने बताया।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/16/458354-long-shot-tea-pluckers.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421eMUYNmhgR9t5dMS7EoX5OBJwHqJOWCwx4086042" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1618584090485" title="चाय बागान में काम कर रहीं महिलाएँ, जो 8 से 12 घंटे काम करती हैं&nbsp;" alt="चाय बागान में काम कर रहीं महिलाएँ, जो 8 से 12 घंटे काम करती हैं " data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1618584090485"><p>चाय बागान में काम कर रहीं महिलाएँ, जो 8 से 12 घंटे काम करती हैं&nbsp;</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">इन सालों में चाय बागान के कर्मचारियों ने कई बार बेहतर दिहाड़ी की मांग की जिसके बाद आज रंजीता 15 दिन के रुपए 2,130 कमाती हैं। बागान की अन्य सभी महिलाओं की तरह वो सुबह 3 बजे उठती हैं, दिन में 12 घंटे चाय बागान में काम करती है जिसके उन्हें रोज़ाना रुपए 142 मिलते हैं। इसके सिवा ये घर का सारा काम, खाना बनाना, बच्चों की देखरेख भी करती है।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">इन सालों में रंजीता ने अपने 6 बच्चे खोए हैं। उन्हें उनकी मृत्यु का कारण नहीं पता, उनके अनुसार कुछ बच्चे पैदा होने के कुछ घंटों में ही मर गए और कुछ थोड़े दिन या महीने के बाद।<br></p><p dir="ltr">हर बच्चे की मौत रंजीता को उतनी ही स्पष्टता से याद है। सालों बाद भी उनकी बात करते हुए रंजीता की आंखों में आंसू आ जाते हैं। </p><p dir="ltr">"याद करने से क्या होगा, कोई बच्चा वापस थोड़ी आएगा। मेरी आख़री बच्ची जो मरी, उसका नाम दशमी था, वो दुर्गा पूजा में पैदा हुई थी। उसके इलाज में डेढ़ दो लाख रुपए ख़र्च हुआ, पूरी बस्ती से उधार लिया, उसका उधार रुपए 500 दे देकर अभी तक चुका रहे हैं," रंजीता ने बताया। </p><p dir="ltr">अभी रंजीता की दो बेटियां हैं, एक 14 और एक 12 साल की। इतना सब कुछ होने के बावजूद भी रंजीता इन चाय बागानों में काम करने को मजबूर हैं।<br></p><p dir="ltr">"हम लोग तो बागान के आदमी हैं, चाय बागान हमारा सब कुछ खा गया, फिर भी मजबूरी में यहाँ काम करते हैं।"<br></p><p dir="ltr"><b>चाय बागान में काम करने वाली महिलाओं की समस्याएं</b><br></p><p dir="ltr">"चाय बागान में काम करने में बहुत तकलीफ़ है, पैसा भी कम है, धूप, बरसात, ठंड, हम हर समय काम करते है। कोई छुट्टी नहीं होती, बागान में शौचालय भी नहीं होता है," 45 वर्ष की मिलाईका ने बताया जो 15 साल की उम्र से ही इन बागानों में काम कर रही हैं।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/16/458355-women-working.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421Cnw8JrBud4nNkHkbmPhs98AtzH8rruc94189853" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1618584193411" title="&nbsp;चाय बागान में छतरी और दस्ताने पहनकर काम कर रही महिलाएं। ये सुविधाएँ सिर्फ़ कुछ कर्मचारियों को ही नियमित रूप से मिल पाती हैं" alt=" चाय बागान में छतरी और दस्ताने पहनकर काम कर रही महिलाएं। ये सुविधाएँ सिर्फ़ कुछ कर्मचारियों को ही नियमित रूप से मिल पाती हैं" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1618584193411"><p>&nbsp;चाय बागान में छतरी और दस्ताने पहनकर काम कर रही महिलाएं। ये सुविधाएँ सिर्फ़ कुछ कर्मचारियों को ही नियमित रूप से मिल पाती हैं</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"गर्भवती महिला को काम करने में बहुत असुविधा होती है, भारी भारी 25-30-50 किलो पत्तियां सिर पर उठानी पड़ती है। सिर पर पत्तियां रख कर, नाली कूद कर चाय बागान से ऑफिस तक इन्हें जमा करने जाना पड़ता है," मिलाईका ने बताया।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">गर्भावस्था के दौरान कोई छुट्टी नहीं मिलती, जितने दिन काम नहीं होता उतने दिन के पैसे नहीं मिलते, मजबूरी में महिलाएं काम करती रहती हैं।<br></p><p dir="ltr">"खाने के लिए पैसा चाहिए, तो आख़िरी महीनो में पूरे दिन काम कर के जब रात को सोते हैं तो अक्सर समय से पहले ही दर्द होता है और घर में ही बच्चा हो जाता है," दो बेटों की माँ और चाय बाग़ान में 20 साल से काम रही, 35 वर्ष की अरुणा किसपोट्टा ने बताया।<br></p><p dir="ltr">बच्चा पैदा होने के बाद भी ये दिक़्क़तें जारी रहती हैं, बागानों में कोई शिशु गृह नहीं होता, "बच्चे को दूध पिलाने का भी समय नहीं होता, हम बागान में छुप छुप कर दूध पिलाते हैं," अरुणा ने बताया। बागान में काम के बीच कोई ब्रेक भी नहीं मिलता, "जब गर्भ से होती है, या गर्भपात या प्रसव के बाद जब कमजोरी लगती है तो छुप के सोना पड़ता है, बाक़ी दीदी लोग ध्यान रखती हैं," अरुणा ने बताया।<br></p><p dir="ltr">"पीठ में बच्चा बांध कर, सिर भी पट्टी रख कर पूरे दिन काम करना पड़ता है, इतना चलना पड़ता है, रास्ता भी ठीक नहीं है, बड़ा बड़ा नाला होता है। ये सब करो तब पैसा मिलेगा," दो बच्चों की माँ, मिलाईका ने बताया।<br></p><p dir="ltr"><b>नियमों के बावजूद कोई सुविधा नहीं</b><b><br></b></p><p dir="ltr">"बाग में काम करने वाले लोगों का हर महीने में ब्लड टेस्ट होना चाहिए, वो कभी नहीं होता, सबको मास्क देना चाहिए, दस्ताने देने चाहिए, जो किसी-किसी को ही मिलते हैं। चप्पल साल में दो बार मिलती है, छतरी दो-तीन साल में एक बार, इतने में कैसे चलेगा। पूरी मेडिकल व्यवस्था होनी चाहिए पर ऐसा कुछ नहीं होता है। कभी कभी सबको एंटीबायोटिक की गोली दे देते हैं," रोमा रश्मि एक्का, 30, ने बताया जो चाय बागान के खाडुभंगा गाँव में रहती है, और चाय बागान में काम कर रही आदिवासी महिलाओं के साथ काम करने वाली एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।<br></p><p dir="ltr">"फ़र्स्ट एड भी आधा अधूरा होता है, कितने लोगों को बाग में सांप काटता है, पर इसके ज़हर के लिए फर्स्ट एड में कुछ नहीं होता, ऐम्ब्युलन्स टाइम पर आ नहीं पाती और कितने लोग इसकी वजह से ही मार जाते हैं," रोमा ने बताया।<br></p><p dir="ltr"><b>चाय बग़ानो में मूलभूत सुविधाओं की कमी</b><br></p><p dir="ltr">चाय बागानों में काम करने वाले लोग आस-पास के गांवों में रहते हैं। इन गाँवों में ज़्यादातर घर कच्चे हैं, घर के शौचालयों में पानी की व्यवस्था ठीक नहीं है, पीने का पानी अक्सर पास के हैंडपंप से आता है, गांव से बाहर जाने के लिए उचित जन परिवहन उपलब्ध नहीं है क्योंकि बागान शहर से कटे हुए हैं, लोग ज़्यादातर साइकिल का इस्तेमाल करते हैं, खाना बनाने के लिए लोग चूल्हों का इस्तेमाल करते हैं क्योंकि यहाँ तक गैस सिलेंडर लाना और भी महँगा है, बरसात में बाग से ख़तरनाक सांप निकलते हैं और रात को कभी कभी तेंदुआ आ जाता है।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/16/458356-tea-garden.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="44210mu5HtpcM7P3ThB0teX1R0ha6fEvMmpX4293753" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1618584296004" title="दार्जिलिंग के चाय बागान जो दुनिया भर में अपनी पत्तियों की गुणवत्ता के लिए मशहूर है" alt="दार्जिलिंग के चाय बागान जो दुनिया भर में अपनी पत्तियों की गुणवत्ता के लिए मशहूर है" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1618584296004"><p>दार्जिलिंग के चाय बागान जो दुनिया भर में अपनी पत्तियों की गुणवत्ता के लिए मशहूर है</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">यहाँ काम करने वाले लोग अभी भी मूलभूत सुविधाओं के लिए परेशान हैं जबकि भारत की अर्थव्यवस्था को इनकी मेहनत से काफ़ी लाभ होता है। दुनिया के दूसरे सबसे बड़ा चाय उत्पादक, भारत ने साल <a href="https://www.ibef.org/exports/indian-tea-industry.aspx#:~:text=As%20of%202019%2C%20India%20was,stood%20at%2030.54%20million%20kgs."><u>2019 में 1,340 kg</u></a> चाय का उत्पादन किया और 831 मिलियन अमरीकी डॉलर का निर्यात किया। कुल उत्पादन का <a href="https://wblc.gov.in/download/Synopsis-of-Tea-Garden-Survey-Final-Report.pdf"><u>81%</u></a> असम और पश्चिम बंगाल से आता है।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">पश्चिम बंगाल में <a href="https://wblc.gov.in/download/Synopsis-of-Tea-Garden-Survey-Final-Report.pdf"><u>276 पंजीक्रत</u></a> चाय बागान हैं, उनमें से <a href="https://wblc.gov.in/download/Synopsis-of-Tea-Garden-Survey-Final-Report.pdf"><u>ज़्यादातर जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग में हैं, सिर्फ़ एक</u></a> बाग़ान कूच बिहार ज़िले में है। बंगाल में साल 2019 में<a href="https://www.statista.com/statistics/868978/india-tea-production-volume-by-state/"><u> 39.4 करोड़ kg</u></a> चाय का उत्पादन किया।<br></p><p dir="ltr">दार्जिलिंग के चाय बागान <a href="https://www.cwds.ac.in/wp-content/uploads/2020/06/Working-Paper-15.pdf"><u>1859</u></a> में और जलपाईगुड़ी के <a href="https://www.cwds.ac.in/wp-content/uploads/2020/06/Working-Paper-15.pdf"><u>1879</u></a> में शुरू गए थे और यहां काम करने वाले लोग ज़्यादातर <a href="https://www.cwds.ac.in/wp-content/uploads/2020/06/Working-Paper-15.pdf"><u>आदिवासी</u></a> या अनुसूचित जनजातियों से थे या नेपाली समुदाय की <a href="https://www.cwds.ac.in/wp-content/uploads/2020/06/Working-Paper-15.pdf"><u>अनुसूचित जातियों</u></a> से थे। <a href="https://www.cwds.ac.in/wp-content/uploads/2020/06/Working-Paper-15.pdf"><u>ऐतिहासिक</u></a> तौर पर इन कर्मचारियों में ज्यादातर महिलाएं शामिल रही हैं। <a href="https://www.cwds.ac.in/wp-content/uploads/2020/06/Working-Paper-15.pdf"><u>लेबर ब्यूरो के 2012 के आंकड़ों</u></a> के अनुसार देशभर के सभी चाय बागानों के कुल कर्मचारियों में 55.9% महिलाएं थी।<br></p><p dir="ltr">उत्तर बंगाल के चाय बागानों में उपलब्ध सुविधाओं और काम की परिस्थितियों का मुआयना करने के लिए स्थानीय श्रमिक कार्यालयों ने संयुक्त श्रम आयुक्त के अंतर्गत, साल 2013 में, बंगाल के 276 चाय बागानों में से 273 का एक <a href="https://wblc.gov.in/download/Synopsis-of-Tea-Garden-Survey-Final-Report.pdf"><u>सर्वे</u></a> किया। इस सर्वे के नतीजे हालात को और स्पष्ट करते हैं। </p><p dir="ltr">सर्वे किए चाय बागानों में से सिर्फ़ 166 में अस्पताल हैं, जिसमें से सिर्फ़ 56 में पूर्णकालिक आवासीय डॉक्टर मौजूद है, अन्य 110 अस्पताल विस्टिंग डॉक्टर पर निर्भर हैं और सिर्फ़ 74 अस्पतालों में एमबीबीएस डॉक्टर मौजूद है, 116 अस्पतालों में कोई नर्स नहीं है और 107 अस्पतालों में कोई डॉक्टर ही उपलब्ध नहीं है। </p><p dir="ltr">सिर्फ़ 160 बग़ानो में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है, जबकि 85 बागानों में डिस्पेंसरी तक नहीं है, सिर्फ़ 160 बागानों में ऐम्ब्युलन्स की सुविधा उपलब्ध है, जिनमें से ज्यादातर ऐम्ब्युलन्स की स्थिति ज़रूरी मानकों के अनुसार ख़राब है।<br></p><p dir="ltr"><b>चाय बागान की परिस्थिति कर्मचारियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन</b><br></p><p dir="ltr">चाय बागानों के कर्मचारी काफ़ी सारी मूलभूत सुविधाओं के लिए प्लैंटेशन स्टेटस पर निर्भर होते हैं, क़ानूनी तौर पर इन्हें ऐसा करना का अधिकार 1951 के <a href="https://equityhealthj.biomedcentral.com/articles/10.1186/s12939-020-1147-3"><u>प्लांटेशन मज़दूर कानून</u></a> के तहत अधिकार दिया गया है और इन कर्मचारियों के मानवाधिकारों का अक्सर उल्लंघन होता है। </p><p dir="ltr"><a href="https://www.righttofoodandnutrition.org/"><u>ग्लोबल नेटवर्क फॉर द राइट टू फूड एंड न्यूट्रिशन</u></a> की एक साल 2016 की <a href="http://pre2020.iuf.org/w/sites/default/files/FFMFINALReport_160616_web.pdf"><u>तथ्यान्वेषी मिशन रिपोर्ट </u></a>के अनुसार लगभग सभी चाय बागानों में अंतरराष्ट्रीय और भारतीय कानूनों के तहत महिलाओं के अधिकारों का हनन और लिंग आधारित भेद-भाव पाया गया। </p><p dir="ltr">सरकार का दायित्व है कि महिलाएं भी काम करने के अधिकार का पूरा लाभ पा सके पर चाय बागान में ऐसा होता नहीं है, मर्द ज्यादा तनख्वाह की बेहतर नौकरियां करते हैं और औरतें सिर्फ़ पत्तियां तोड़ने का काम जहाँ पदोन्नति की संभावना नहीं होती, रिपोर्ट में पाया गया।<br></p><p dir="ltr">ज़्यादातर बागानों में महिलाओं के मातृत्व सुरक्षा अधिकारों का हनन होता है, ख़ासकर गर्भावस्था के दौरान महिला के स्वास्थ्य की सही देखभाल और सुरक्षा, मातृत्व अवकाश, स्तनपान के लिए ब्रेक, और प्रसव-पूर्व एवं प्रसव के बाद जांच। महिलाओं से गर्भावस्था के दौरान भी वही काम करवाए जाते हैं, अक्सर गर्भ के आठ मास तक, अन्य महिलाओं के इसके बदले ज़्यादा कार्यभार माँगने के बावजूद।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/16/458357-close-shot-tea-pluckers.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421J0VqTOTVwTqDw2DcKsNXmewYiHYlbgrz4381566" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1618584383762" title="बिना किसी मास्क, दस्ताने या छतरी के साथ चाय बागान में काम कर रही महिला, ये सुविधाएं हर कर्मचारी को मिलना अनिवार्य है" alt="बिना किसी मास्क, दस्ताने या छतरी के साथ चाय बागान में काम कर रही महिला, ये सुविधाएं हर कर्मचारी को मिलना अनिवार्य है" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1618584383762"><p>बिना किसी मास्क, दस्ताने या छतरी के साथ चाय बागान में काम कर रही महिला, ये सुविधाएं हर कर्मचारी को मिलना अनिवार्य है</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">गर्भावस्था अवकाश ज़्यादातर दिहाड़ी मज़दूरों के लिए होता ही नहीं है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय, दोनों कानूनों का उल्लंघन करते हुए इन महिलाओं को काम पर वापस जाने के बाद स्तनपान कराने का ब्रेक नहीं दिया जाता, और रिपोर्ट के अनुसार स्तनपान कराती हुई माओं के साथ यौन उत्पीड़न के मामले भी सामने आए हैं।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के लिए शिशुगृह होना अनिवार्य है, पर ये ज्यादातर जगहों पर मौजूद नहीं है, जहाँ हैं वहाँ ये ज़रूरत से छोटा और अस्वच्छ है।<br></p><p dir="ltr">गर्भ के दौरान और बाद की जांच चाय बागान की महिलाओं में कम और पहुँच से बाहर पायी गयी। सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों ने बताया कि ज्यादातर गर्भवती महिलाएं एनीमिया का शिकार हैं और प्रसव के दौरान आने वाली समस्याओं से अक्सर इनकी मौत हो जाती है। इन इलाकों में किशोरी गर्भधारण के मामले भी काफ़ी ज़्यादा हैं जिसमें जच्चा-बच्चा दोनो को ज़्यादा ख़तरा होता है।<br></p><p dir="ltr">गर्भधारण में दिक्कत, प्रसव में कठिनाइयां और स्तनपान में नुक़सान का एक कारण बाग में छिड़के जाने वाले कीटनाशक का असर भी पाया गया। बागानों में पीने के पानी की दिक्कत भी महिलाओं पर ज़्यादा भारी पड़ती है क्योंकि अक्सर महिलाओं को ही पानी भरने जाना पड़ता है, रिपोर्ट ने बताया। साथ ही उपयुक्त शौचालय ना होने का असर पुरुषों के मुक़ाबले,  महिलाओं पर ज़्यादा पड़ता हैं जिन्हें शर्म और सामाजिक दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं और साथ ही इन्फेक्शन का ख़तरा भी ज़्यादा होता है।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/16/458358-hands-plucking-tea.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421SdLG5hWdR43mF2xAxVUOxGIe4uBjUmvJ4460770" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1618584462015" title="दस्ताने पहन कर चाय बागान में पत्तियां तोड़ती महिलाएं" alt="दस्ताने पहन कर चाय बागान में पत्तियां तोड़ती महिलाएं" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1618584462015"><p>दस्ताने पहन कर चाय बागान में पत्तियां तोड़ती महिलाएं</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">साल 2021-22 के बजट में सरकार ने चाय बागान कर्मचारियों के कल्याण के लिए <a href="https://www.thehindubusinessline.com/news/national/tea-board-to-soon-submit-details-of-welfare-scheme-for-women-workers-in-assam-west-bengal/article33801280.ece"><u>₹1,000</u></a> करोड़ रुपए आवंटित करने का प्रस्ताव रखा है, और कहा है कि इसके लिए एक ख़ास योजना भी बनाई जाएगी। इस चुनाव में भी ये लोग ना तो किसी पार्टी के चुनावी भाषण का हिस्सा हैं और ना ही किसी नेता की चिंता।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">रंजीता का कहना है कि उन्हें इस चुनाव से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, "सरकार तो कोई भी आए हमको क्या मिलेगा, मेरा बच्चा कोई थोड़े ही वापस लाएगा।"<br></p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i></p></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/cover-story/mothers-losing-their-children-to-the-tea-gardens-of-west-bengal-742334</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/cover-story/mothers-losing-their-children-to-the-tea-gardens-of-west-bengal-742334</guid>
<category><![CDATA[West Bengal,कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,महिलाएं,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[साधिका तिवारी]]></dc:creator>
<pubDate>Fri, 16 Apr 2021 14:50:10 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/04/16/500x300_458351--.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बाघ और बेरोज़गारी से जूझती सुंदरबन की महिलाएँ अकेले जीवन-यापन करने को मजबूर]]></title>
<description><![CDATA[सुंदरबन के इलाक़े कई में गांव ऐसे हैं जहां के पुरुष या तो जंगल में बाघ के शिकार बन गए हैं या फिर दुसरे शहरों में मजदूरी के लिए चले गए हैं। ऐसे में परिवारों की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से महिलाओं के कन्धों पर आ गयी है]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>दक्षिण 24 परगना, पश्चिम बंगाल: </b>पश्चिम बंगाल का सुंदरबन का इलाक़ा जो कि अपने बाघों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है धीरे-धीरे ऐसे गावों में तब्दील होता जा रहा है जहां अब सिर्फ महिलाएं ही मौजूद हैं।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">सुंदरबन के कई गांवों में सिर्फ महिलाएं ही रहती हैं क्योंकि इनमे से कइयों के पति आजीविका ढूंढने के लिए अन्य शहरों में मज़दूरी करने चले गए हैं या फिर <a href="http://sundarbantigerreserve.org/str/"><u>सुंदरबन टाइगर रिज़र्व </u></a>में मछली पकड़ने के दौरान बाघ का शिकार बन गए। कुल मिलाकर इन गावों में बच गयी हैं सिर्फ महिलाएं जो अपने अकेले के दम पर परिवारों का भरण पोषण करने पर मजबूर हैं।</p><p dir="ltr">पश्चिम बंगाल के दक्षिणी ज़िले, दक्षिण 24 परगना के सुंदरबन के जंगलों से सटा एक गाँव-- देऊलबाड़ी। इस गाँव को इस इलाक़े में 'विधवापाड़ा' के नाम से भी जाना जाता है, विधवापाड़ा यानी विधवाओं का गाँव। इस गाँव के हर दूसरे घर में एक विधवा रहती है जिसके पति की मौत बाघ का शिकार बनने से हुई हैं।</p><p dir="ltr">देऊलबाड़ी की रहने वाली 23 वर्षीय अंजलि बैद्य के पति इस साल फरवरी की पहली तारीख को रोज़ की तरह जंगल में काम पर गए थे लेकिन कभी नहीं लौटे।</p><p dir="ltr">अंजली की शादी सात साल पहले हुई थी जिस दौरान उनके पति 6 महीने जंगलों में जाकर मछली पकड़ने का काम करते थे और बाकी के 6 महीने कोलकाता में मजदूरी करके अपने परिवार का भरण पोषण करते थे। अंजलि अपने दो बच्चों को शहर में पढ़ाना चाहती थी लेकिन बीते महीने में वो कई दिन उनके लिए दो वक़्त का खाना भी जुटा नहीं पायी है</p><p dir="ltr">"मैं सोचती रहती हूँ कि मेरी ज़िंदगी का क्या होगा, मेरे बच्चों का क्या होगा, वो कैसे बड़े होंगे, मैं अकेले क्या करूँगी, ये ज़िंदगी बहुत बड़ी है, सब कैसे होगा? आज से मेरे घर में चूल्हा जलना शुरू हुआ है, लोगों से जो चावल माँगा है वो पका रही हूँ एक महीने से गाँव वालों से माँग कर ही बच्चों को खिला रही हूँ," अंजली ने बताया। </p><p dir="ltr">"कोई चावल देता है, कोई सब्ज़ी देता है, ऐसे ही सबसे माँग कर चलता है। ऐसे भी दिन होते हैं की कोई भी खाना नहीं देता, बच्चों को भूखा सोना पड़ता है, जब से इनके पिता की मौत हुई है, ऐसे कई दिन गुजरे हैं जब इनको भूखे पेट सुलाना पड़ा है," अंजली ने बताया। </p><p dir="ltr">अंजलि की तरह ही इस इलाक़े में कई महिलाएं हैं जिनके पति को बाघ ने मार दिया।</p><p dir="ltr"><b>पश्चिम बंगाल की बाघ विधवा</b></p><p dir="ltr">देऊलबाड़ी गांव जहाँ अंजली रहती है, इस गाँव के हर दूसरे घर में एक विधवा रहती है।</p><p dir="ltr">किसी के पति की मौत 10 दिन पहले हुई है और शोक नया है, किसी के पति की मौत 10 साल पहले, और शोक काफ़ी समय पहले ख़त्म हो चुका है। लेकिन संघर्ष दोनो का बराबर है, किसी के लिए नया है, किसी को इससे जूझने की आदत हो चुकी है। </p><p dir="ltr">इन सब के पतियों की मौत का कारण एक ही है, बाघ द्वारा मारा जाना। सुंदरबन दुनिया भर में अपने आदमखोर रॉयल बंगाल बाघ के लिए जाना जाता है, जो एक लुप्तप्राय प्रजाति है। सुंदरबन में फ़िलहाल <a href="https://www.thehindu.com/life-and-style/tiger-population-in-sunderbans-rises-to-96/article31529772.ece"><u>96 बाघ </u></a>हैं।</p><p dir="ltr">"ये समस्या समय के साथ बढ़ती जा रही है, हर दिन खबर आती है कि बाघ किसी को खा गया। ऐसा होने के बाद पूरा परिवार बिगड़ जाता है, बच्चों की पढ़ाई, खानपान सब मुश्किल हो जाता है," इस इलाके में महिलाओं के साथ काम करने वाली संस्था '<a href="http://rupantaranfoundation.org/"><u>रूपांतरण</u></a>' के साथ जुड़ी, स्मिता सेन ने बताया।</p><p dir="ltr">"बाघ का शिकार होने वाले लोगों का सरकारी आंकड़ा हकीकत से काफी दूर है। सरकार सिर्फ उन्ही को गिनती में शामिल करती है जिनके पास जंगल में जाने का परमिट होता है। पर हकीकत में 80% लोगों के पास परमिट होता  ही नहीं है," नकुल जाना, 77, <a href="http://tigerwidows.in/index.aspx"><u>सुंदरबन टाइगर विडो वेलफेयर सोसाइटी </u></a>के अध्यक्ष ने बताया।</p><p dir="ltr">"हम 2011 से बाघ विधवाओं का आंकड़ा इकट्ठा कर रहे हैं, सुंदरबन में  ये आंकड़ा लगभग 3,000 है। आखिरी मौत यहां 7 मार्च को हुई," नकुल ने बताया।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/30/448878-women-in-vidhwapada.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421R0R6GPrEv6fuUu4el97M6SS8cgxDvHhO8392446" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1617118401164" title="विधवापाड़ा गांव में महिलाएं। फोटो: साधिका तिवारी" alt="विधवापाड़ा गांव में महिलाएं। फोटो: साधिका तिवारी" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1617118401164"><p>विधवापाड़ा गांव में महिलाएं। फोटो: साधिका तिवारी</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b>मुआवज़े की बातें एक 'कागज़ी शेर'</b><br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">बाघ विधवाओं की मुश्किलें सिर्फ यहां पर ही खत्म नहीं होती हैं। जब मुआवज़े की बात आती हैं तो इनमे से बहुत ही कम महिलाओं को सरकार की तरफ से मुआवज़े की राशि प्राप्त हुई हैं।</p><p dir="ltr">"मेरा पति मर गया पर सरकार ने मुझे कुछ नहीं दिया, बाक़ी कई लोगों को मिला पर मुझे नहीं मिला। मैंने सबको पूछा, सबको बताया पर एक पैसा भी नहीं मिला आज तक। मेरे पति को मरे हुए एक साल से भी ज़्यादा हो गया, कितनी बार बोला पर कुछ नहीं मिला। मैं किस से शिकायत करूँ, मेरी कौन सुनेगा?" जमुना बैद्य, 60, ने बताया।</p><p>"मेरा बेटा काम नहीं करता, अपाहिज है, हमारे पास खाने को भी कुछ नहीं होता," जमुना ने कहा।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/30/448879-jamuna-baidya.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421zQvWo7e0oJ79cehw6yN1iGm8xKKSi3ub8563490" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1617118571225" title="जमुना बैद्य अपने घर के बाहर। फोटो: साधिका तिवारी" alt="जमुना बैद्य अपने घर के बाहर। फोटो: साधिका तिवारी " data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1617118571225"><p>जमुना बैद्य अपने घर के बाहर। फोटो: साधिका तिवारी<br></p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p>"मुआवजा दिलवाने में कोई भी महिला की मदद नहीं करता, न ही रिश्तेदार, न ही कोई पड़ोसी। एक फॉर्म भरना ही इतना मुश्किल होता है। ये पूरी व्यवस्था ही बहुत खराब है। परिवार अक्सर विधवा महिलाओं को पाप या अशुभ बुला कर उसकी मदद करने की बजाय उसे परिवार से निकाल देते हैं, ताकि घर की जायदाद में से उसका हिस्सा खत्म हो जाए," नकुल ने बताया।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">'मुआवजा तीन अलग अलग विभाग देते हैं, कागज पर तो आजकल ये राशि काफी बढ़ गई है पर ये असल में कितनों को मिलती है ये अलग बात है। किसी को एक लाख, दो लाख या पांच लाख तक मुआवजा मिलता हैं। पर्यावरण और वन विभाग, पांच लाख रुपए देता है, दो लाख मछली पालन विभाग देता है और बीमा की तरफ से एक लाख रुपए," नकुल ने बताया।<br></p><p dir="ltr">"मेरे घर के पास जिस महिला के पति को बाघ ने मारा उसको 4 लाख रुपए मिले सरकार से," अंजली ने बताया। पर अभी तक अंजली को कुछ नहीं मिला है, वो कई बार सरकारी दफ़्तरों के चक्कर लगा चुकी है पर अभी तक उन्हें कोई आर्थिक मदद नहीं मिली।<br></p><p dir="ltr">"मैं सरकारी दफ़्तर में गयी, नाव के मालिक से लड़ाई भी की, पुलिस को पूछा, पर कुछ नहीं हुआ," अंजली ने बताया, "मेरे पति का डेथ सर्टिफ़िकेट भी अभी तक नहीं मिला है।"<br></p><p dir="ltr">"बिना परमिट के जंगल में जाने के लिए सरकार जेल और जुर्माना लगा सकती है। लोगों में इतना डर है कि अक्सर किसी महिला का पति मर जाता है और वो किसी को नही बताती, उसकी चिता नही जलाती, शोक नही मनाती। महिलाएं झूठ बोल देती है की उनका पति शहर में काम करने गया है, 6-7 महीने में सब भूल जाते हैं," नकुल ने बताया।<br></p><p dir="ltr"><b>बाघ का डर या रोज़गार की कमी, सुंदरबन में अकेले संघर्ष कर रही महिलाएँ</b><br></p><p dir="ltr">"सुंदरबन के खेत कम होते जा रहे हैं, खेतों का बढ़ता खारापन धान की उत्पादकता कम रहा है, कुछ खेत इतने खारे हो चुके हैं की किसान इन्हें कम दाम पर बेचने पर मजबूर है, इस खेत के ख़रीददार है प्रॉन मछली का उत्पादन कर रहे किसान क्योंकि प्रॉन खारे पानी में बेहतर होता है, फ़िशरी में भी मछलियां कम है," इस इलाक़े के जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दों पर काम कर रहे, शौमित्रा दास ने बताया, "यहाँ जीवन यापन बहुत कठिन है, लोग यहाँ से पलायन करने पर मजबूर हैं।"</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/30/448880-fishery-in-sinderbans.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="44214fFVTZF4e67InitGxXH9I3Cgv0Nd9uYs8669130" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1617118671795" title="सुंदरबन में होने वाला मछली पालन। फोटो: साधिका तिवारी&nbsp;" alt="सुंदरबन में होने वाला मछली पालन। फोटो: साधिका तिवारी " data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1617118671795"><p>सुंदरबन में होने वाला मछली पालन। फोटो: साधिका तिवारी&nbsp;</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"अक्सर लोग पूरे परिवार के साथ पलायन करते हैं, पर भारी संख्या में महिलाएं और बच्चे घर पर रहते हैं," सुंदरबन में महिलाओं के साथ काम करने वाले संगठन, रूपांतरण के साथ जुड़ी स्मिता सेन ने बताया, "नतीजा ये है कि पलायन का कारण दूसरे शहरों में नौकरी हो हो या बाघ, महिलाएं यहाँ अकेले ही अपने और अपने बच्चों का ख़याल रखने को मजबूर हैं।"<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">पति को बाघ ने मार दिया हो या वो नौकरी के लिए शहर गया हो, समानता ये है कि सभी महिलाएं अकेले संघर्ष कर रही है। कुछ पति के पैसे भेजने की उम्मीद के साथ, कुछ इसके बिना।</p><p dir="ltr">जितनी महिलाओं से <b>इंडियास्पेंड </b>ने बात की वो या तो दूसरे के खेतों में दिहाड़ी करती हैं, ये काम ज्यादातर लोगों को हफ़्ते में सिर्फ़ दो दिन मिलता है, प्रतिदिन रुपए 200-250 के मेहनताने के साथ। इसके अलावा जब मौक़ा मिलता है ये फ़िशरी में काम करती हैं।<br></p><p dir="ltr">इस सब के बीच जब अम्फान या बुलबुल जैसे तूफ़ान आते हैं और जीवन फिर एक सिरे से दोबारा बसाना पड़ता है तो ये भी महिलाएं अकेले करती हैं। ज़्यादातर महिलाएं रोजमर्रा के संघर्षों से इतनी घिरी हुई हैं कि घर उजाड़ने पर मिलने वाले मुआवज़े के लिए फ़ॉर्म भरना या सरकारी दफ़्तर जाने का ना ही इनके पास समय है और ना ही संसाधन।<br></p><p dir="ltr">अम्फान के बाद राज्य सरकार ने पीड़ितों को घर बनाने और खेती में हुए नुक्सान के लिए <a href="https://thewire.in/rights/west-bengal-cyclone-amphan-victims-compensation-corruption-irregularities"><u>मुआवज़े </u></a>कि घोषणा की थी। लेकिन ये राशि अभी भी कई पीड़ितों तक नहीं पहुँच पायी हैं।।<br></p><p dir="ltr">"अम्फान के बाद से हम घर फिर से बनाने की कोशिश कर रहे थे, मेरा घर भी पूरा बना नहीं है, अभी इसमें और मिट्टी लगेगी, घर बनाने के लिए पैसे भी मेरे पति के ही पास थे, पता नहीं अब ये घर कैसे बनेगा," अंजली ने कहा।<br></p><p dir="ltr">"यही एक छोटा घर है, वो पूरी तरह टूट गया था अमफान में, पर सरकार से कोई मदद नहीं मिली, ये अभी धीरे धीरे बनाना शुरू किया है। अगर मुआवज़ा माँगने सरकारी दफ़्तर जाऊँगी तो उस दिन का पैसा कौन लाएगा, खाना कौन बनाएगा, बच्चे कौन देखेगा," अंजली ने बताया।<br></p><p dir="ltr">चंदना मंडल, 36, के पति की मौत लगभग 3 महीने पहले हुई। चंदना के तीन बच्चे हैं जिनके पालन पोषण के लिए उन्होंने काम करना शुरू किया है।<br></p><p dir="ltr">"मैं पहले काम नहीं करती थी, अब मैंने काम करना शुरू किया है, अभी मैं धान के खेत में काम करती हूँ, जो भी काम मिलेगा खेत में या फ़िशरी में, मैं करूँगी। अभी एक दिन काम करने के रुपए 200 से 250 मिलते हैं, पर काम हफ़्ते में सिर्फ़ दो बार मिलता है," चंदना ने बताया।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/30/448883-chandana-mandal.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421tYJkpbbKBYAqBEpDBi5GH8ZIgWKYQhJy8777995" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1617118785284" title="चंदना मंडल अपने घर पर। फोटो: साधिका तिवारी" alt="चंदना मंडल अपने घर पर। फोटो: साधिका तिवारी" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1617118785284"><p>चंदना मंडल अपने घर पर। फोटो: साधिका तिवारी</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"पर इतने पैसे में कुछ नहीं होता है, बच्चों के लिए खाना भी पूरा नहीं पड़ता है, जब से पति की मौत हुई है बच्चों के लिए खाना भी पूरा नहीं पड़ता है, कई दिन रोते रोते भूखे सो जाते हैं, मैं क्या करूँ। कुछ दिन गांव वालों से माँग कर कुछ खाया पर गाँव वाले भी मदद नहीं करते हैं। 15 दिन से मेरी तबियत ख़राब है पर पैसा नहीं है डॉक्टर के पास जाने का," चंदना ने बताया। चंदना को भी कई चक्कर लगाने के बाद भी सरकार से अभी तक कोई पैसा नहीं मिला है।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">ज़्यादातर महिलाएं इसी गांव में रहकर काम करना चाहती हैं, भले ही काम और आमदनी दोनों कम हो। वहीं अंजली जैसी कुछ महिलाएं अपने बच्चों को बेहतर जीवन देने के लिए पलायन कर के किसी बड़े शहर जाना चाहती हैं, भले ही संघर्ष कितना भी हो।<br></p><p dir="ltr">"अगर हो सकेगा तो किसी के घर में काम करके अपने लड़का, लड़की को हॉस्टल में पढ़ाऊँगी। मुझे आगे बढ़ना पड़ेगा, कुछ काम करना पड़ेगा, कोई थोड़ी ना खिलाएगा मुझे और मेरे बच्चों को," अंजली ने सुबकते हुए कहा, "मैं कोलकाता जाऊँगी तो बच्चों के साथ नहीं रहूँगी, वहाँ उनके रहने की जगह थोड़ी मिलेगी। मैं किसी के घर काम करूँगी तो महीने के रुपए 10 हज़ार मिलेंगे।"<br></p><p dir="ltr">"मैं चुनाव ख़त्म होने का इंतज़ार कर रही हूँ, चुनाव ख़त्म हो जाए तो मैं कोलकाता चली जाऊँगी वहाँ किसी के घर में काम करूँगी," अंजली ने कहा।<br></p><p dir="ltr"><b>ख़तरे के बावजूद क्यों जाते हैं लोग जंगलों में?</b></p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/30/448884-saline-land-sunderbans.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421ANcxJxSW7CoaOnEeqNv5Ijj7ilXn1IuU9175844" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1617119196728" title="सुंदरबन में लगातार खरे होते भूक्षेत्र। फोटो: साधिका तिवारी" alt="सुंदरबन में लगातार खरे होते भूक्षेत्र। फोटो: साधिका तिवारी" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1617119196728"><p>सुंदरबन में लगातार खरे होते भूक्षेत्र। फोटो: साधिका तिवारी</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">सुंदरबन बंगाल की खाड़ी से सटे हुए मैंग्रोव जंगल हैं जो भारत में पश्चिम बंगाल के उत्तर और दक्षिणी 24 परगना से शुरू होकर बांग्लादेश तक फैले हुए हैं, दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव जंगल। मैंग्रोव खारे पानी या अर्ध-खारे पानी में पाए जाते हैं, अक्सर जहाँ नदी किसी सागर में बह रही होती है, और मीठा पानी खारे पानी से मिलता है।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">सुंदरबन के जंगलों में कई भिन्न प्रकार और प्रजाति के पेड़-पौधे, जीव-जंतु, जानवर और मछलियाँ पायी जाती है। सुंदरबन से सटे गाँवो में ज़्यादातर लोग जीवनयापन के लिए धान की खेती, मछली पालन और वन उपज पर निर्भर होते हैं।<br></p><p dir="ltr">जलवायु परिवर्तन जैसे कई अन्य कारणों के चलते, तटों के क़रीब स्थित खेतों की ज़मीन में खारापन समय के साथ बढ़ता जा रहा है जिसकी वजह से धान की उपज कम हो रही है, इसके सिवा ज़्यादातर लोगों के पास खेती के लिए ज़मीन भी नहीं है, ज़्यादातर किसान लघु भूमिधारक हैं। साथ ही मछलीपालन में भी मुनाफ़ा कम होता जा रहा है।<br></p><p dir="ltr">हर साल बाढ़ आने के बाद, तट से सटे खेत और डूबते जाते हैं, ज़मीन कम होती जाती है, जो ज़मीन बचती है वो बाढ़ के बाद महीनो खारी रहती है जहाँ धान उगना मुश्किल होता है। समय समय पर आने वाली प्रक्रतिक आपदाएँ जैसे मई 2019 में आया तूफ़ान अम्फान या नवंबर 2019 में आया तूफ़ान बुलबुल जो खेत, तालाब, घर सब तहस-नहस कर देते हैं।<br></p><p dir="ltr">ऐसे में दो ही रास्ते बचते हैं, या तो शहर जा कर काम करना,  प्रवासी मज़दूर बनना या ख़तरे से वाक़िफ़ होते हुए भी अपनी जान जोखिम में डालकर इन जंगलों में जाना। जंगल में ज़्यादातर लोग वनोपज जैसे की लकड़ी या शहद या बेहतर मछली की तलाश में जाते हैं, जहाँ इनका सामना आदमखोर बाघ से होता है।</p><p dir="ltr">"जंगल के अंदर जाने के लिए तीन तरह की परमिट चाहिए होती है, मछुआरे का लाइसेंस, नाव का लाइसेंस और इंश्योरेंस या बीमा के कागज," नकुल ने बताया, "सरकार ठीक से लोगों का जन्म और मौत रिकॉर्ड नहीं कर पाती है यहां, बाघ ने किसको मारा ये कौन देखेगा।"</p><p dir="ltr">"हर दिन जब मेरा पति जंगल में जाता था, रोज़ लगता था की शायद आज ना आए, सबको पता है की ख़तरा है लेकिन सब उम्मीद करते हैं की शायद उनके साथ ऐसा नहीं होगा," भद्रा नया, 23, ने बताया, "और कोई कर भी क्या सकता है? आदमी पेट पालने के लिए सब करता है। या तो जंगल में जा कर खुद मरो, नहीं तो बच्चों को रोज़ भूखा देखो।"<br></p><p dir="ltr">"सुंदरबन इलाके में लगभग 30,000 परिवार रहते हैं, यानी लगभग 15 लाख लोग। इसमें से 10% पूरी तरह से वनोपज पर निर्भर हैं। कोई एक सरकार या संस्था यहां के हालात बदल नहीं पाएगी। बदलाव लाने के लिए जरूरी है की इन 30,000 परिवारों के लिए व्यवसाय के अन्य रास्ते खोले जाए," नकुल ने बताया।</p><p dir="ltr"><i style="">हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org" style=""><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i style=""> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i><br></p><div><br></div></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/women-2/women-of-sundarban-forced-to-struggle-live-alone-738924</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/women-2/women-of-sundarban-forced-to-struggle-live-alone-738924</guid>
<category><![CDATA[कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,महिलाएं,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[साधिका तिवारी]]></dc:creator>
<pubDate>Tue, 30 Mar 2021 15:52:45 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/30/500x300_448863--.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA['सरकार कहती है सबका साथ सबका विकास, मगर ये असल में नहीं हो पा रहा है']]></title>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>नई दिल्ली:</b> सरकारी आंकड़ों के अनुसार महिलाओं के खिलाफ हिंसा के आंकड़े लगातार बढ़ते जा रहे हैं, बाल-विवाह और दहेज प्रथा जैसी कुरीतियां आज भी बरकरार हैं। आँकड़ों के अनुसार महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले जुर्म देश भर में हो रहे कुल जुर्म का 10% हिस्सा हैं। हिंसा के बाद 40% से भी कम महिलाएं इंसाफ़ पाने की कोशिश करती हैं, इसकी वजह से कई महिलाएं पढ़ नहीं पाती हैं और इनकी उम्र से पहले शादी कर दी जाती है। शादी के बाद पती द्वारा हिंसा के आंकड़े भी लॉकडाउन के दौरान बढ़ गए हैं।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">महिलाओं के पास परिवार नियोजन के सही तरीक़े उपलब्ध नहीं है, जबकि इसकी पूरी ज़िम्मेदारी उन पर है। ऐसा ही कई मुद्दों पर हमने बात की पूनम मुटरेजा से, जो पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी निदेशक हैं। इसके पहले पून भारत में<a href="https://www.macfound.org/about/"><u> मैक आर्थर फ़ाउंडेशन</u></a> की राष्ट्रीय डिरेक्टर थी। ये पिछले 35 वर्षों से महिला अधिकार से जुड़े मुद्दों पर काम कर रहीं हैं और कई एनजीओ के बोर्ड की सदस्य रह चुकी हैं। ये <a href="https://dastkar.org/"><u>दस्तकार</u></a>, <a href="https://www.wishfoundationindia.org/"><u>विश फ़ाउंडेशन</u></a> और <a href="https://www.ashoka.org/en-in"><u>अशोका फ़ाउंडेशन</u></a>, नाम के संस्थानो की सह संस्थापक हैं और <a href="https://www.harvard.edu/"><u>हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय के जॉन एफ केनेडी स्कूल ओफ़ गवर्न्मेंट </u></a>से पढ़ी हुई हैं। </p><p dir="ltr">हमने इस इंटरव्यू में पूनम से कुछ अहम मुद्दों पर बात की जैसे किशोरियों के साथ हो रही हिंसा का उनके जीवन पर कितना दुष्प्रभाव पड़ता है, इंटरनेट की दुनिया में महिलाएं क्यों हिंसा का शिकार बन रही हैं, परिवार नियोजन में पुरुषों की ज़िम्मेदारी क्यों ज़रूरी है और प्रजनन इंसाफ़ क्या है। </p><p dir="ltr">पूनम का कहना है की साल 2021 के महिला दिवस पर, जो की हर साल 8 मार्च को मनाया जाता है, अगर किसी एक मुद्दे पर ध्यान देना बेहद ज़रूरी है, वो है साइबर सेक्शुअल अब्यूज यानी महिलाओं के ख़िलाफ़ इंटरनेट पर हो रही यौन हिंसा और दुर्व्यवहार।</p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><iframe src="https://www.facebook.com/plugins/video.php?href=https%3A%2F%2Fwww.facebook.com%2FIndiaSpendHindi%2Fvideos%2F147398507163954%2F&amp;show_text=0&amp;width=560" width="560" height="315" style="border:none;overflow:hidden" scrolling="no" frameborder="0" allowfullscreen="true" allow="autoplay; clipboard-write; encrypted-media; picture-in-picture; web-share"></iframe></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b>आँकड़ों के अनुसार महिलाओं के खिलाफ हिंसा बढ़ती जा रही है। स्कूलों में होने वाली हिंसा, संस्थागत हिंसा, घर के अंदर होने वाली हिंसा और अपने पति या पार्टनर द्वारा होने वाली हिंसा बढ़ती जा रहा है। तो घर के भीतर और बाहर ये हिंसा किस स्तर पर हो रही है और ये महिलाओं और किशोरियों के लिए कितनी बड़ी समस्या है?</b><br></p><p dir="ltr">कोविड महामारी के बाद से महिलाओं के लिए सबसे बड़ी समस्या है घर में और घर के बाहर होने वाली हिंसा इसमें यौन हिंसा और अन्य सभी तरह की हिंसा शामिल है। इसके बढ़ने के कुछ मुख्य कारण हैं। पहला, ऐसे बहुत से रेप के मामले मीडिया के ज़रिए सामने आए हैं, खासकर कुछ प्रांतों से, जहां सरकार आरोपियों का संरक्षण कर रही है। ये बहुत बढ़ावा देता है कि आप संरक्षण के साथ लड़कियों और महिलाओं को कुछ भी कर दें और आप के खिलाफ कोई कड़े क़दम नहीं उठाए जाएँगे। इससे जो संदेश पुरुषों को मिल रहा है ये बहुत ग़लत है और ये इस हिंसा को और बढ़ावा देगा, और आने वाले समय में हिंसा और बढ़ सकती है, मुझे ये चिंता है।<br></p><p dir="ltr">दूसरा, जब लड़कियां स्कूल जाती हैं, गाँवों में ही नहीं शहरों में भी, हमें मालूम है कि रास्ते में उन्हें लड़के छेड़ रहे होते हैं। लोग अपनी बेटियों को स्कूल भेजने से डरते हैं। बाल विवाह के आंकड़ों में भारत में कुछ सुधार आया है, पहले के मुकाबले, पर ये सुधार बहुत कम है। अभी भी क्यों लगभग एक चौथाई लड़कियों की शादी कम उम्र में कर दी जाती है? इसलिए क्योंकि अभिभावकों को भी मालूम है की उनकी बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं।<br></p><p dir="ltr">सरकार का बहुत अच्छा नारा था, 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ', ये उल्टा हो रहा है। इसलिए सरकार को पुनर्विचार करना होगा की हमें क्या करना है, कैसे हमारी लड़कियों को सुरक्षित रखना है।<br></p><p dir="ltr">जहाँ तक सजा की बात है, मैं फांसी के ख़िलाफ़ हूँ, लोगों को लगता है की फाँसी की माँग करने से ये सब ख़त्म हो जाएगा, लेकिन ये सुनिश्चित करना ज़रूरी है की इंसाफ मिलेगा और जल्दी मिलेगा। असली इंसाफ का मतलब है हिंसा की रोकथाम करना। हम हिंसा से बचाव के लिए रोकथाम पर ध्यान नहीं दे रहे हैं।<br></p><p dir="ltr">स्कूलों में भी शिक्षकों द्वारा दुर्व्यवहार के कितने मामले सामने आते हैं। लड़कियों के साथ यौन हिंसा का सबसे बड़ा कारण हैं उनके पिता और घर के अन्य पुरुष, इसके बाद दूसरा सबसे बड़ा कारण हैं अध्यापक, हम इसके लिए क्या कर रहे हैं?<br></p><p dir="ltr">हाल ही में किसी जज ने भी कहा है कि घर में अगर किसी लड़की के साथ बलात्कार या यौन हिंसा की जाती है तो उसकी शादी करवा दी जाए। ये सब हमारे देश की लड़कियों के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा को सिर्फ़ बढ़ावा देगा, उसे कम नहीं करेगा। हमें इस पर बहुत गंभीरता से सोचना है और मै फिर से कहूँगी की रोकथाम इलाज से बेहतर है।<br></p><p dir="ltr">साथ ही जन स्वास्थ्य प्रतिक्रिया पर ध्यान देना ज़रूरी है। अगर आप किसी गाँव या शहर में किसी सरकारी डॉक्टर से बात करें, तो अगर उन्हें पता भी है कि बच्ची या महिला के साथ यौन हिंसा हो रही है घर में या स्कूल में, वो कुछ नहीं करेंगे क्योंकि ये उनकी जिम्मेदारी नहीं है।<br></p><p dir="ltr">मैं बहुत सालों से ये बात दोहरा रही हूँ की जन स्वास्थ्य की एक प्रक्रिया निर्धारित होनी चाहिए क्योंकि स्वास्थ्यकर्मी जैसे आशा या आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, उन्ही से सम्पर्क होता है गाँव की महिलाओं और बच्चियों का। इन स्वस्थकर्मियों को ट्रेनिंग देना और इसे एक जन स्वास्थ्य मुद्दा बनाना ज़रूरी है। क्योंकि हर महिला जन स्वास्थ सेवाओं से जुड़ी होती है या तो प्रजनन सुविधाओं के लिए या फिर जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को लेके।<br></p><p dir="ltr">इसलिए ऐसा करना बहुत ज़रूरी है और ये बहुत ग़लत है की अब तक ऐसा नहीं हुआ है। मुझे मालूम है कि स्वास्थ्य मंत्रालय ऐसा चाहता था मगर होम मिनिस्ट्री ने अपना कोई कार्यक्रम बनाया था, अब वो कितना प्रभावी है ये देखा ही जा सकता है।<br></p><p dir="ltr">साथ ही अध्यापकों को ट्रेनिंग देनी चाहिए, उन्हें जानकारी देनी चाहिए। मै ये नहीं कहती की सभी शिक्षक यौन हिंसा करते हैं, मगर जो कर रहे हैं उनके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए और उन्हें रोकने के लिए बाक़ी शिक्षकों के पास ये जानकारी होनी ज़रूरी है ताकि वो ऐसा करने के लिए सशक्त महसूस करें। हालांकि ये सिर्फ़ अध्यापकों के बारे में नहीं है।</p><p dir="ltr">मगर घर और स्कूल के बीच बच्चियाँ सुरक्षित नहीं है। इसलिए उन्हें स्कूल नहीं भेजा जाता, उनकी शादी जल्दी करवा दी जाती है। ये एक महिला के ऊपर काफ़ी दुष्प्रभाव डालता है और उसके पूरे जीवन को प्रभावित करता है।<br></p><p dir="ltr"><b>शारीरिक हिंसा या शारीरिक हिंसा के डर के बाद सबसे बड़ा ख़तरा जो लगातार बढ़ रहा है वो है इंटरनेट पर होने वाली हिंसा। जैसे-जैसे इंटरनेट की पहुँच बढ़ती जा रही है और ज़्यादा से ज़्यादा लड़कियों के पास इंटरनेट की सुविधा है उसी के साथ इन तक पहुँचने वाले अब्यूज़र के लिए भी इंटरनेट एक और साधन बनता जा रहा है। डिजिटल दुनिया में महिलाएँ बदसलूकी और दुर्व्यवहार का निशाना बन रही हैं और इंटरनेट पर इनका अनुभव पुरुषों से काफ़ी अलग बनता जा रहा है। इसका कितना असर पड़ रहा है और ये महिलाओं के लिए कितनी बड़ी समस्या है?</b><br></p><p dir="ltr">साइबर-स्पेस या इंटरनेट पर जो दुर्व्यवहार या बदसूलूकी महिलाएँ झेल रही हैं ये उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। ये मानसिक और भावपूर्ण उत्पीड़न है, ये साइको-सेक्शुअल उत्पीड़न है जो शारीरिक हिंसा के ही समान है, इसका प्रभाव शारीरिक हिंसा से ज़्यादा या उसका जितना ही ख़राब है।<br></p><p dir="ltr">ये लड़की को हर वक़्त एक डर के साथ जीने पर मजबूर करता है कि कभी भी उसको इंटरनेट पर दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ सकता है। और ज्यादातर महिलाओं का अनुभव है ऐसा ही है, चाहे वो वरिष्ठ महिला पत्रकार हों, या स्कूल में पढ़ने वाली किशोरियाँ हों।<br></p><p dir="ltr">हमने बिहार में एक सर्वे किया जिसके नतीजे काफ़ी चिंताजनक थे, इसमें सामने आया की लड़कियां सबसे ज़्यादा हिंसा या दुर्व्यवहार का सामना अपने मोबाइल फ़ोन पर कर रही हैं। ये बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है और हमारा सामाजिक और राजनीतिक वातावरण इसको बढ़ावा दे रहा है। राजनीतिक पार्टियां इस मामले में मार्गदर्शन करती दिखाई दे रही हैं, और इसमें सभी पार्टियां शामिल हैं। कोई कुछ भी कह सकता है, किसी भी महिला को परेशान कर सकता है, इस से दुष्कर्मियों को और बढ़ावा मिलता है।<br></p><p dir="ltr">मै वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त का नाम लेना चाहूँगी, उन्होंने किस तरह के दुर्व्यवहार का सामना किया और सरकार और पुलिस ने इसके ख़िलाफ़ कोई क़दम नहीं उठाए। कोई क़दम न उठाना ही सबसे ज़्यादा बढ़ावा देता है। दुनिया भर में इंटरनेट पर दुर्व्यवहार को रोकने के लिए नीतियां हैं, भारत में भी कुछ नीतियां हैं जो इंटरनेट पर बाक़ी कई चीजों को नियंत्रित करती हैं पर दुर्व्यवहार से जुड़ी ऐसी कोई नीतियाँ नहीं है, जिनकी सख़्त ज़रूरत भी है।<br></p><p dir="ltr">बल्कि इस 8 मार्च को अगर हम एक सबसे बड़ी माँग आगे रख सकते हैं जो एक बड़ी संख्या में महिलाओं को लाभान्वित करेगी तो वो है ऐसी नीतियों। क्योंकि इसके अभाव में महिलाएँ डर में जी रही हैं। मै एक फ़िल्म निर्माता को जानती हूँ जो किसी भी मुद्दे पर बोलने से आज इंकार कर रहीं थी क्योंकि वो एक डर के साथ ज़िंदा रहती हैं की उनके साथ एक महिला, एक मुस्लिम और एक सशक्त, आत्मनिर्भर और खुल कर बोलने वाली महिला होने के लिए दुर्व्यवहार झेलना पड़ता है।<br></p><p dir="ltr">महिलाओं का सशक्त दिखना भी उनके लिए ख़तरा बन गया है। ग्रामीण या ग़रीब इलाकों में महिलाओं के सफल होने की क्षमता या इंटरनेट पर मौजूद अवसरों का इस्तेमाल करना भी एक ख़तरा हो गया है क्योंकि उनकी सफलता उन्हें इस हिंसा का निशाना बना रही है।<br></p><p dir="ltr">आने वाले समय में ये सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है और इसे पूरी तरह से खत्म करना पड़ेगा क्योंकि महिलाएं तब तक टेक्नॉलजी का इस्तेमाल नहीं कर सकती जब तक वो 24 घंटे डर में रहेगी।<br></p><p dir="ltr"><b>देश की लगभग 50% महिलाएं किसी भी परिवार नियोजन के तरीके का इस्तेमाल नहीं करती हैं। देश की 30 मिलियन शादी-शुदा महिलाएँ है जिनकी परिवार नियोजन की ज़रूरत पूरी नहीं हो पा रही है। परिवार नियोजन का सारा बोझ महिलाओं पर है, कंडोम, नसबंदी या पुरुषों के लिए मौजूद अन्य तरीकों का इस्तेमाल ना के बराबर है। काफ़ी कोशिशों कि बाद भी परिवार नियोजन से जुड़ी समस्याओं में सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है?</b></p><p dir="ltr">परिवार नियोजन से जुड़ा सरकारी डेटा होने के बावजूद इस के साथ कई मिथक और ग़लत फ़हमियाँ जुड़ी हुई हैं। हमारे पास राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के हर चार साल के आंकड़े हैं, साथ ही जनगणना रिपोर्ट के आंकड़े हैं जो सब साफ़ साफ़ बताते हैं कि क्या करने की ज़रूरत है।</p><p dir="ltr">महिलाएं चाहती हैं की कम बच्चे करें, हमें सिर्फ़ उन्हें ऐसा करने के लिए सुविधाएं उपलब्ध करवानी हैं। भारत में कोई भी महिला, किसी भी धर्म या तबके की हो, दो से ज़्यादा बच्चे नहीं चाहती।<br></p><p dir="ltr">लोग ज़्यादा बच्चे चाहते थे क्योंकि उन्हें लगता था की बच्चे उनका समर्थन करेंगे पर जब नौकरियां ही नहीं है तो मां-बाप ही बच्चे का समर्थन करते हैं, बहुत महंगाई बढ़ गयी है खाने के दाम इतने बढ़ गए हैं की लोग अपने बच्चों को ठीक से खाना भी नहीं खिला पा रहे हैं।<br></p><p dir="ltr">पुरुष अपनी कोई भी जिम्मेदारी परिवार नियोजन में नहीं निभा रहे हैं, बल्कि उनका गैर जिम्मेदाराना बर्ताव सामने आ रहा है। सिर्फ़ 0.3% पुरुष नसबंदी करवाते हैं जबकि ये बहुत सरल और साधारण तरीक़ा है जो वापस भी किया जा सकता है अगर बच्चा चाहते हैं तो। महिलाओं की नसबंदी में एनेस्थीसिया दिया जाता है, कई मुश्किलें आती है, बिलासपुर में एक नसबंदी कैंप में 17 महिलाओं की मौत हो गयी थी। फिर भी सिर्फ़ महिलें ही नसबंदी करवाती हैं।<br></p><p dir="ltr">साथ ही हमारे यहाँ स्पेसिंग यानी बच्चों में अंतर रखने के तरीक़ों को बढ़ावा देने पर हम ख़र्च ही नहीं करते, हमारा स्वास्थ्य बजट पहले से ही कम है, इसका सिर्फ़ 4% परिवार नियोजन पर ख़र्च होता है और इसमें से भी सिर्फ़ 2 से 3% स्पेसिंग के तरीक़ों पर ख़र्च होता है।<br></p><p dir="ltr">इतनी बड़ी जवान आबादी होने के बाद भी हमारे पास परिवार नियोजन के इतने कम साधान हैं। ख़ासकर जवान लोगों के पास तो और भी कम साधान हैं जिन्हें अस्थायी साधनो की ज़रूरत है, ना की नसबंदी की। साधन की कमी की वजह से महिलाएं जितने चाहती हैं उस से ज़्यादा बच्चे पैदा करती हैं और कोई भी बच्चा अनचाहा नहीं होना चाहिए।<br></p><p dir="ltr">परिवार नियोजन रोकथाम का एक सस्ता, टिकाऊ तरीक़ा है और परिवार की और देश की अर्थव्यवस्था के लिए, महिलाओं के लिए और देश के लिए अच्छा है। परिवार नियोजन में सुधार लाना और इसपर ख़र्च बढ़ाना ज़रूरी है। दुनिया भर की महिलाएँ यहाँ तक की नेपाल और बांग्लादेश की महिलाओं को भी जो भी साधन उपलब्ध हैं वो भी भारत की महिलाओं के पास नहीं है। छोटे छोटे देश जो हमसे ज़्यादा पिछड़े है वहाँ भी परिवार नियोजन के 4-5 ज़्यादा साधन उपलब्ध हैं।<br></p><p dir="ltr">हमें इस मुद्दे को राजनीतिक ना बनाते हुए इसपर काम करना है और ये मुद्दा सिर्फ़ औरतों का नहीं है, ये पुरुषों का मुद्दा है, मर्दों को ज़िम्मेदारी लेनी पड़ेगी। ये सामाजिक मुद्दा है, सिर्फ़ औरतों का नहीं।<br></p><p dir="ltr"><b>प्रजनन न्याय या रिप्रोडक्टिव जस्टिस क्या है और ये प्रजनन के अधिकार से कैसे अलग है?</b><br></p><p dir="ltr">प्रजनन न्याय हाशिए पर खड़ी महिलाओं को केंद्र में रखकर ये सुनिश्चित करता है की अगर महिला ग़रीब, दलित या मुस्लिम है तो भी उसे बराबर सुविधाएं मिलें। हम देखते हैं की बेहतर स्थिति में रह रही महिलाओं को बेहतर सुविधाएं मिलती हैं और ख़राब स्थिति में रह रही महिलाओं को ख़राब।<br></p><p dir="ltr">अगर एक महिला के पास अपने परिवार के अंदर या अपने लिए चीजें माँगने का हक़ नहीं है तो ये सिर्फ़ उसकी ज़िम्मेदारी नहीं है, एक समाज के तौर पर ये हमारी जिम्मेदारी है की हम उसके लिए न्याय सुनिश्चित करें। हम ये नहीं कह सकते की एक महिला की सास उसे कुछ करने नहीं दे रही, ये हमारे जन स्वास्थ्य और सरकार की भी बराबर ज़िम्मेदारी है की हम उस तक, उसकी सास तक पहुंचे और चीजों को सुधारें।<br></p><p dir="ltr">यहाँ न्याय का मतलब है की महिला को पास ये अधिकार हो की वो चुन सके की वो कब शादी करे, कितना पढ़े, कब बच्चे पैदा करे, कितने बच्चे पैदा करे। कोई लड़की जो पढ़ना चाहती है पर उसकी 16 साल की उम्र में शादी कर दी जाती है तो ये अन्याय है।<br></p><p dir="ltr">प्रजनन न्याय में सिर्फ़ परिवार नियोजन की सुविधाएं नहीं शामिल हैं, इसमें शिक्षा, प्रजनन स्वास्थ्य की जानकारी, बचपन में या किशोरावस्था में कुपोषण, अगर उसके साथ बलात्कार हुआ है या पति ने कंडोम इस्तेमाल नहीं किया है तो उसका गर्भपात करवाने का हक़, सब शामिल है।<br></p><p dir="ltr">एक लड़की जिसके साथ बलात्कार किया जाता है, उसे गर्भपात की इजाज़त के लिए सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट जाना पड़ता है, ये कैसे ठीक है। लड़की को नहीं पता चलेगा की वो गर्भ से है जब तक इसकी जांच नहीं होती है या ऐसा पाया नहीं जाएगा, जो कि 20 हफ़्ते के बाद भी हो सकता है। पर हमें पता है की इसके बाद भी गर्भपात सुरक्षित है और आसानी से किया जा सकता है।</p><p dir="ltr">जब एमटीपी कानून आया था तब ये जानकारी नहीं थी, पर अब डॉक्टर ये जानते हैं। ये न्याय है की क़ानून में ज़रूरत के अनुसार बदलाव लाए जाएं। महिला को इसकी इजाज़त लेने कोर्ट में जाने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। अगर वो बच्चा नहीं चाहती है तो गर्भपात हर महिला का हक़ है, भले ही गर्भ धारण कैसे भी हुआ हो । </p><p dir="ltr">साथ ही यौन शिक्षा भी बहुत ज़रूरी है, ये अन्याय है की किसी लड़का या लड़की को ये नहीं पता की असुरक्षित यौन संबंध बनाने से लड़की गर्भवती हो सकती है या इस से कई तरह के संक्रमण और बीमारियां हो सकती हैं। हर यौन रूप से सक्रिय व्यक्ति को इसके बारे में सही जानकारी हो ये उसका अधिकार है, और इस जानकारी का अभाव अन्याय है।<br></p><p dir="ltr">सरकार कहती है सबका साथ सबका विकास, मगर ये असल में नहीं हो पा रहा है, इसके बारे में सोचना होगा।<br></p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i><br></p><div><br></div></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/women-2/government-says-sabka-saath-sabka-vikas-but-thats-not-really-heppening-734061</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/women-2/government-says-sabka-saath-sabka-vikas-but-thats-not-really-heppening-734061</guid>
<category><![CDATA[कवर स्टोरी,महिलाएं,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[साधिका तिवारी]]></dc:creator>
<pubDate>Mon, 08 Mar 2021 16:26:08 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/08/500x300_435000-womens-day-is-hindi.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA['विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की बेहतर भागीदारी को पॉलिसी सपोर्ट की आवश्यकता है']]></title>
<description><![CDATA[महिलाओं के लिए परिवहन के सुरक्षित साधन, सुविधाजनक ऑफिस टाइमिंग, घर से काम करने की सुविधा और बेहतर शिकायत निवारण व्यवस्था महिलाओं की कामकाजी ज़िन्दगी के समस्याएँ कम कर सकती हैं]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b><i>बेंगलुरु: </i></b><i>विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी विश्व स्तर पर काफी कम है, विश्व में 30% से कम महिलाएं वैज्ञानिक शोध में पायी गयी, यूनेस्को के इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्टेटिस्टिक्स के 2017 में जारी की गयी </i><a href="https://unesdoc.unesco.org/ark:/48223/pf0000253479_eng"><i><u>फैक्टशीट </u></i></a><i>के अनुसार। लेकिन इसके दूसरी तरह भारत में वैज्ञानिक शोध में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती हुई दिखाई देती है। केंद्रीय मानवसंसाधन विकास मंत्रायलय के द्वारा जारी किये गए ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) 2018-19 के अनुसार पीएचडी के लिए दाखिला लेने वाली महिलाओं की </i><a href="http://aishe.nic.in/aishe/viewDocument.action?documentId=262"><i><u>दर 48% </u></i></a><i>थी।</i><br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><i>"समय के साथ विज्ञान और शोध जैसे क्षेत्रों में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ रहा है लेकिन उस ही के साथ संस्थानों और कंपनीयो की भी ये ज़िम्मेदारी बनती है की वो महिलाओं को सुरक्षित और समानता का वातावरण प्रदान करें," डॉ जया नागराजा, मॉलिक्यूलर कनेक्शंस की चीफ साइंटिस्ट का कहना है।</i></p><b><i>इंडियास्पेंड </i></b><i>ने डॉ जया नागराजा से बात की, कि एक महिला रिसर्चर होने के नाते वो भारत में महिलों कि विज्ञान और शोध के क्षेत्र में भागीदारी को कैसे देखती हैं। डॉ नागराजा ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ बर्न, स्विट्ज़रलैंड, से अपनी पीएचडी पूरी करने के बाद कैंसर और अस्थमा पर रिसर्च किया और साल 2000 तक अमेरिका और फ्रांस में रिसर्च साइंटिस्ट के तौर पर कार्यरत रहीं । इसके बाद डॉ नागराजा ने भारत वापसी की और फिलहाल वे मॉलिक्यूलर कनेक्शंस में चीफ साइंटिस्ट के पद पर कार्यरत हैं।</i></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><iframe src="https://www.facebook.com/plugins/video.php?height=314&amp;href=https%3A%2F%2Fwww.facebook.com%2FIndiaSpendHindi%2Fvideos%2F513073859681353%2F&amp;show_text=false&amp;width=560" width="560" height="314" style="border:none;overflow:hidden" scrolling="no" frameborder="0" allowfullscreen="true" allow="autoplay; clipboard-write; encrypted-media; picture-in-picture; web-share"></iframe></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><i>संपादित अंश:</i></p><p dir="ltr"><b>पश्चिमी देशों में अपनी उच्च भुगतान वाली नौकरी के बाद आपने भारत वापस आने का विकल्प क्यों चुना?</b></p><p dir="ltr">यह केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि भारत में कई सारे अवसर पैदा हो रहे थे। अब और उस समय की शिक्षा के समय में बहुत अंतर था। उस समय की मुश्किलों को देखते हुए औरत के रूप में हमने बहुत कुछ हासिल किया है, जैसे कि विदेश जाने आदि। उस समय इस अकादमिक पृष्ठभूमि के होने के कारण, हममें से बहुत से लोग जो वापस आए वो सोचते थे कि अगर हम भारतीय समाज और विश्व विज्ञान में अपनी क्षमता से योगदान दे सकते है तो यह बहुत अच्छी बात है।</p><p dir="ltr">और मॉलिक्यूलर कनेक्शंस एक ऐसा माध्यम था, जिसने मेरे दरवाजे खटखटाकर मुझे वह अवसर दिया। 2000 के दशक की शुरुआत में, जब मॉलिक्यूलर कनेक्शंस की स्थापना हुई थी, मैं उन महिलाओं में से एक थी, जिन्हें इस संगठन की स्थापना करने का अवसर मिला। इसके साथ ही कॉलेज से आए  नए-नए युवाओं को एक पेशेवर सेट-अप में ढ़ालने में मदद करने का, कई परियोजनाओं के लिए दिशानिर्देश स्थापित करने में मदद करने आदि का अवसर प्राप्त हुआ।<br></p><p dir="ltr"><b>जिस समय आपने अपना काम शुरू किया उस समय विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं का होना कैसा था?</b><br></p><p dir="ltr">मैंने अपनी पीएच.डी. स्विट्जरलैंड में विदेश से की और जब तक आप अपने काम में अच्छे हैं तब तक महिला वैज्ञानिकों के साथ शैक्षणिक क्षेत्र में कभी भेदभाव नहीं किया गया। उस समय वैज्ञानिक के लिए वातावरण प्रेरणादायक था क्योंकि उस देश से नोबेल पुरस्कार विजेता और प्रमुख खोज थी। मैं बहुत उत्सुक थी। लेकिन सामान्य रूप से परिवार और समाज में, विशेषकर भारत में विवाह क्षेत्र में महिलाओं के लिए पीएचडी की योग्यता को अति-योग्यता माना जाता था। लेकिन परिवार और माता-पिता के सहयोग से हम यह सब दूर कर सकते हैं।<br></p><p dir="ltr"><b>महिलाओं की भागीदारी और स्वीकृति के मामले में इन सभी वर्षों के दौरान क्या बदलाव या सुधार हुआ है?</b><br></p><p dir="ltr">सामान्य तौर पर, हाल के समय में महिलाओं को सभी कैरियर क्षेत्रों और सभी नेतृत्व भूमिकाओं में बहुत अच्छी तरह से स्वीकार किया जाता है। यहां कई भारतीय वैज्ञानिक हैं जिन्होंने भारत के साथ-साथ प्रतिष्ठित संस्थानों से भी अपने लिए पहचान बनायी है। महिलाएं खुद को दृढ़ कर रही हैं, उनमें सहानुभूति हैं, वो नेतृत्व की भूमिकाएं निभाती हैं, उनके पास काम के घंटों में लचीलापन हैं, मातृत्व अवकाश से उनकी सफलता में कोई बाधा नहीं है। सामान्य तौर पर महिलाओं को वैज्ञानिक करियर में समान अवसर दिया जाता है।<br></p><p dir="ltr"><b>क्या आपने अपने पेशे की यात्रा में एक महिला के रूप में किसी भेदभाव का सामना किया है, यदि हाँ, तो आपने इसका सामना कैसे किया? कृपया घटना का उल्लेख करें।</b><br></p><p dir="ltr">नहीं, सौभाग्य से मैंने कभी भी अपने शैक्षणिक या पेशेवर जीवन में किसी भी लिंग भेदभाव का सामना नहीं किया है। कुछ क्षेत्रों में महिलाओं के लिए कुछ भेदभाव हो सकता है, लेकिन वैज्ञानिक स्तर पर नहीं। यदि आवश्यक हो, तो, हम इन बाधाओं के खिलाफ काम कर सकते हैं। मुझे यह भी लगता है कि अमरीका जैसे देशों की तुलना में भारत में भेदभाव कम है। </p><p dir="ltr">यदि आप मॉलिक्यूलर कनेक्शंस को देखें तो 70% से अधिक कार्यबल में महिलाएं है (नीचे से नेतृत्व की भूमिकाओं तक) इससे पता चलता है कि यह एक समान अवसर नियोजक है। (वास्तव में पूर्वाग्रह मॉलिक्यूलर कनेक्शंस में उल्टे क्रम में है)। मॉलिक्यूलर कनेक्शंस विकास में शुद्ध रूप से योग्यता संचालित और लिंग तटस्थ है।<br></p><p dir="ltr"><b>कार्यस्थलों पर लिंग अंतर को हटाने के लिए और क्या बदलने की आवश्यकता है?</b><br></p><p dir="ltr">इसके लिए काम के घंटों में लचीलापन, महिलाओं के लिए सुरक्षित परिवहन सुविधाएं व घर से काम करने की सुविधाऔं की जरूरत है। इसके अलावा बेहतर नियम और निवारण प्रणालियां जो महिलाओं द्वारा सामना किए जा रहे मुद्दों का समाधान कर सकती हैं।<br></p><p dir="ltr"><b>वेतन समता पर आपके क्या विचार हैं? और आपके अनुसार असमानता के मुद्दे पर कैसे ध्यान दिया जा सकता है?</b><br></p><p dir="ltr">महिलाओं और पुरुषों के मामले में वेतन असमानता क्यों होनी चाहिए। यह तो क्षमता और योगदान पर आधारित होनी चाहिए, लिंग पर नहीं । मुझे लगता है कि वैज्ञानिकों के स्तर पर यह भारत में एक मुद्दा नहीं है, लेकिन कुछ पश्चिमी देशों में कुछ असमानता के बारे में सुना है।<br></p><p dir="ltr"><b>क्या आपको लगता है कि ऐसी नीतियां जो महिलाओं के लिए अनुकूल हैं जैसे मातृत्व का अवकाश, मासिक धर्म के लिए अवकाश आदि महिलाओं को अधिक हासिल करने में मदद करेंगे?</b><br></p><p dir="ltr">हाँ, अब मातृत्व अवकाश और शायद पितृत्व अवकाश भी मदद करेंगे। हम हमेशा महिलाओं को अपने अवकाश को बढ़ाने के लिए मदद करते है और उन्हें डब्ल्यूएफएच के अवसर और फ्लेक्सी काम के समय भी देते हैं।<br></p><p dir="ltr"><b>'ग्लास सीलिंग' के बारे में आप क्या सोचते हैं, क्या यह वास्तव में महिलाओं के लिए मौजूद है?</b><br></p><p dir="ltr">समाज स्तर पर सब कुछ बदलने की जरूरत है। मानसिकता को बदलने की जरूरत है और पुरुषों को जीवन के सभी क्षेत्रों में महिलाओं को सम्मान और स्वीकार करने की आवश्यकता है।</p><p dir="ltr">केवल 2 चुनौतियां हैं जिनका सामना महिलाओं को कॉर्पोरेट में करना पड़ता है, और  विश्व स्तर पर - एक काम-जीवन संतुलन बनाए रखने के लिए और कैरियर की सीढ़ी पर सी-सूट पदों पर चढ़ने के लिए, यह बात कामकाजी महिलाओं के लिए सच है। महिलाएं पुरुषों के बराबर अनुपात में उद्योग में प्रवेश करती हैं, हालांकि जब तक वे टीम की लीडर और प्रबंधक बन पाती हैं, तब तक वे परिवार और बच्चों को प्राथमिकता देना शुरू कर देती हैं। अधिकांश महिलाएं अपने परिवार की देखभाल करने के लिए अपने करियर में अपने कदम पीछे ले लेती हैं और जो लोग उस कार्य संतुलन पर प्रहार करते हैं और नेतृत्व की स्थिति में पहुंच जाते हैं, उन्हें 'ग्लास सीलिंग' से टकराना मुश्किल लगता है।</p><p dir="ltr">कई संगठन विविधता और समावेश की पहल कर रहे हैं। कई भारतीय मूल संगठनों के लिए भी, रिमोट काम करना एक नया तरीका है। महिला सशक्तिकरण नेटवर्क अभी भी एक और पहल है जो कुछ बड़े संगठन महिलाओं को नेटवर्क के लिए प्रोत्साहित करने और संगठन में नेतृत्व के पदों को लेने के लिए चलाते हैं। हालांकि, उनमें से कुछ मुट्ठी भर लोग नेतृत्व स्तर पर लिंग विविधता प्राप्त करने में सफल रहे हैं।</p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i></p><br></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/women-2/how-to-increase-women-participation-in-the-field-of-science-734052</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/women-2/how-to-increase-women-participation-in-the-field-of-science-734052</guid>
<category><![CDATA[कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,महिलाएं,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[शैलेष श्रीवास्तव]]></dc:creator>
<pubDate>Mon, 08 Mar 2021 15:22:51 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/03/08/500x300_434993--.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दिल्ली की महिलाओं पर महामारी की गाज, छीन लिया रोज़गार]]></title>
<description><![CDATA[कोविड-19 महामारी ने दिल्ली जैसे महानगरों में जीवनयापन करने वाली महिलाओं को खासा नुकसान पहुंचाया। एक तरफ जहां संगठित क्षेत्र में नौकरी करने वाली महिलाओं को वेतन कटौती और छटनी के रूप में मुश्किलों का सामना करना पड़ा, वहीं असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं का रोज़गार छिन गया जिससे भोजन और बच्चों की शिक्षा जैसी मूलभूत ज़रूरतों की पूर्ति पर भी ग्रहण लग गया।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>नई</b><b> </b><b>दिल्ली</b> : "लॉकडाउन के दौरान कोई कामकाज नहीं बचा था। हमारे लिए दिन में एक बार भोजन करना भी मुश्किल हो गया था। कुछ दिनों तक मैं रिठाला के एक औद्योगिक क्षेत्र में कचरे के ढेरों और गलियों में कबाड़ खोजने जाती थी, जिसे बेचा जा सके। लेकिन पिछले कुछ महीनों में कबाड़ की कीमत भी कम हो गई है और इन दिनों कबाड़ को खोजना भी ज्यादा मुश्किल हो गया है। लॉकडाउन से पहले जहां मैं 35-40 रुपये प्रति किलोग्राम में कबाड़ बेचती थी, लॉकडाउन में दाम घटकर 10 रुपये प्रति किलोग्राम रह गया है।"<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">उपरोक्त शब्द हैं, 29 वर्षीय लुतफुन निशा के, जो उत्तर-पश्चिम दिल्ली में <a href="https://www.indiaspend.com/sanitation-workers-at-risk-from-discarded-medical-waste-related-to-covid-19/"><u>कचरा</u><u> </u><u>इकट्ठा करने</u><u> </u><u>का काम </u></a>करती है। यह ऐसा इलाका है जहां राष्ट्रीय राजधानी की लगभग <a href="https://www.indiaspend.com/uploads/2020/12/14/file_upload-356947.pdf"><u>20% आबादी </u></a>रहती है। इन्हीं में से एक है निशा, जो अपने माता-पिता व आठ साल के बेटे के साथ 90 वर्ग फुट की एक झुग्गी में रहती हैं। दिसंबर 2020 की बात है। निशा ने <b>इंडियास्पेंड</b> को फोन पर बताया कि हमें पिछले वर्ष बमुश्किल भोजन मिला था। पहले वह हर महीने कुछ हजार रूपये तक कमा लेती थी और किसी तरह गुजारा चल जाता था, लेकिन अब एक महीने में आधा किलो चावल प्रति व्यक्ति से घटकर चौथाई किलो पर आ गया है। लॉकडाउन के दौरान एक वक्त भी पेट भरकर खाना नहीं मिला। यूएन वूमेन की सितंबर 2020 की एक <a href="https://www.unwomen.org/en/digital-library/publications/2020/09/gender-equality-in-the-wake-of-covid-19"><u>रिपोर्ट</u><u> </u></a>के अनुसार, कोविड-19 महामारी के पहले महीने में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की आमदनी में 60% तक की कमी हुई थी। वैश्विक स्तर पर असंगठित अर्थव्यवस्था में शामिल लगभग 74 करोड़ महिलाओं में से लुतफुन निशा भी एक हैं।</p><p dir="ltr">भारत की राजधानी और देश के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य दिल्ली में करीब 97.5% <a href="https://www.census2011.co.in/facts/topstateurban.html"><u>शहरी आबादी </u></a>निवास करती है। जहां मई से अगस्त 2020 के बीच <a href="https://www.mha.gov.in/sites/default/files/Unlock3_29072020.pdf"><u>अनलॉक </u></a>के पहले तीन चरणों के दौरान श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) 33% के साथ सबसे कम और बेरोज़गारी दर (23.3%) चौथे स्थान पर सबसे अधिक रही थी। <a href="https://www.cmie.com/"><u>सेंटर</u><u> </u><u>फॉर</u><u> </u><u>मॉनिटरिंग</u><u> </u><u>इंडियन</u><u> </u><u>इकनॉमी</u></a> (सीएमआईई) के <a href="https://www.indiaspend.com/uploads/2021/01/13/file_upload-382884.pdf"><u>आंकड़ों </u></a>में बताया गया। एलएफपीआर भारत में काम करने वाले सभी उम्र के लोगों का अनुपात है जिनके पास या तो रोज़गार है या नौकरी की तलाश में हैं। बेरोज़गारी दर, श्रम बल में उन लोगों का अनुपात है जिनके पास नौकरी नहीं है। सीएमआईई के आंकड़ों के अनुसार, लैंगिक आधार पर दिल्ली में पुरुषों की 57% एलएफपीआर की तुलना में महिला एलएफपीआर 5.5% है, जबकि पुरुषों की 21% की बेरोज़गारी दर की तुलना में महिलाओं के लिए यह आंकड़ा 47% का है।</p><p dir="ltr"><a href="https://www.indiaspend.com/uploads/2020/12/14/file_upload-356954.pdf"><u>पीएलएफएस</u><u>, 2018-19</u></a> के आंकड़ों पर गौर करें तो तब भारत की एलएफपीआर 50.2% थी। ऐसा लगता है कि महामारी की वजह से बेरोज़गारी और बढ़ गई। सीएमआईई के अनुसार मई से अगस्त 2020 के बीच एलएफपीआर घटकर 40.2% रह गई। महिलाओं की श्रम भागीदारी दर 9.3% थी और इसकी तुलना में पुरुषों के लिए यह आंकड़ा 67.4% का था। शहरों में महिलाओं की बेरोज़गारी दर 21.9% रही और इसकी तुलना में शहरों में पुरुषों के लिए यह दर 11.7% की थी।</p><p dir="ltr">दुनिया भर में और भारत में भी यह बात किसी से छिपी नहीं है कि महिलाओं को बेहतर नौकरियाँ कम ही दी जाती हैं और<a href="https://www.indiaspend.com/womenwork/women-hold-up-the-economy-yet-they-continue-to-disappear-from-workforce-701865"> <u>नौकरियों जैसे ही कम होती हैं</u></a><u> </u>उन्हें ही सबसे पहले बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। "दिल्ली में नौकरियाँ खोजने वाले लोगों (पहले के निवासी और शहर में नए आने वाले दोनों) और नौकरियों की कुल उपलब्धता के बीच गहरी खाई है। पहले से चली आ रही आर्थिक मंदी और अब महामारी की वजह से स्थिति बहुत ही खराब हुई है। आने वाले वक्त में इस बात की आशंका प्रबल है कि इसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा महिलाओं को ही भुगतना होगा", ऐसी विकास अर्थ-शास्त्री जयंती घोष का कहना है।</p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div class="h-embed" contenteditable="false"><div class="h-embed-wrapper desktop-only-embed"><iframe src="https://e.infogram.com/e384af3b-5df3-4e76-9647-efd3418243af?src=embed" title="Decline In Women In The Labour Force, 2004-05 to 2018-19" width="700" height="500" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></div></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><br></p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div class="h-embed" contenteditable="false"><div class="h-embed-wrapper mobile-only-embed"><iframe src="https://e.infogram.com/e384af3b-5df3-4e76-9647-efd3418243af?src=embed" title="Decline In Women In The Labour Force, 2004-05 to 2018-19" width="320" height="500" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></div></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">इस रिपोर्ट में हमने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली जिसे एक विश्व-स्तरीय शहर कह सकते हैं, में महिला कर्मियों की स्थिति की समीक्षा की है जहां रोज़गार की दर<a href="http://delhiplanning.nic.in/content/economic-survey-delhi-2018-19"> <u>1981 से ही लगभग स्थिर</u></a> रही हैं। महिलाओं की कामकाज में भागीदारी लंबे समय से कम दिख रही है, लेकिन महामारी ने तो बची-खुची चीजें भी लगभग खत्म सी कर दी है। निश्चित रूप से दिल्ली में असंगठित क्षेत्र के कर्मियों को बड़ा नुकसान हुआ है और बहुत सी महिलाओं ने अपनी नौकरी या कामकाज गँवाना है। संगठित क्षेत्र में भी महिलाओं ने काफी मुश्किलों का सामना किया है जिनमें वेतन कटौती से लेकर छटनी तक शामिल हैं। बिना भुगतान वाले घरेलू कार्य का बोझ बढ़ने से संकट और बढ़ा है।<a href="https://populationfoundation.in/"> </a>"दिल्ली के संदर्भ में बात करें तो नौकरी पर जाने के लिए यात्रा में अधिक समय लगना, कार्य के घंटे और सुरक्षा जैसे मुद्दों से महिलाओं को काफी जूझना पड़ा है जिससे श्रम बल में उनकी हिस्सेदारी में काफी कमी दर्ज की गई है।", <a href="https://populationfoundation.in/"><u>पॉपुलेशन फ़ाउंडेशन ऑफ इंडिया</u></a> की वरिष्ठ मैनेजर, संघमित्रा सिंह का कहती हैं।<br></p><p dir="ltr"> <b><span style="font-size: 22px;">एक से अधिक शिफ्ट में कार्य करना बड़ी चुनौती</span></b></p><p dir="ltr">दिल्ली के ओखला औद्योगिक क्षेत्र में रहने वाली 38 साल की दुर्गा देवी नेहरू प्लेस और ग्रेटर कैलाश में तीन घरों में घरेलू कार्य करती हैं। लॉकडाउन की<a href="https://pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1607997"> <u>घोषणा</u></a> होने के दिन ही उसे तीनों घरों के मालिकों ने काम पर आने से मना कर दिया। अपने दुख-दर्द को बयान करते हुए दुर्गा ने बताया, "मैं एक दशक से अधिक समय से इन घरों में कार्य कर रही थी और मुझे कुल 9,000 रुपये की आमदनी होती थी। अचानक से यह काम खत्म हो गया। लॉकडाउन के दौरान कोई वेतन भी इन लोगों ने मुझे नहीं दिया।"</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/02/15/411700-durga-devi.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421G4sZO0CBOrHcYi92hhzqnTzcXCPmAaUa2620809" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1613392623161" title="दुर्गा देवी, जो बिहार के मधुबनी के गाँव से 20 साल पहले आयी थीं, दिल्ली के ओखला में अपने घर पर" alt="दुर्गा देवी, जो बिहार के मधुबनी के गाँव से 20 साल पहले आयी थीं, दिल्ली के ओखला में अपने घर पर" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1613392623161"><p>दुर्गा देवी, जो बिहार के मधुबनी के गाँव से 20 साल पहले आयी थीं, दिल्ली के ओखला में अपने घर पर</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">तीन बच्चों की मां, दुर्गा बिहार के मधुबनी से 20 साल पहले आई थी। हालांकि पति की सिक्योरिटी गार्ड के तौर पर नौकरी तो बची रही, लेकिन दोबारा काम शुरू होने में छह महीने लग गए। ये दौर बेहद मुश्किल के थे। भोजन तक में "कटौतियां" करनी पड़ी मसलन भोजन में दो के बजाय एक आलू खाना।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"मेरे बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई के लिए एक कंप्यूटर की जरूरत थी। हम इसे नहीं खरीदते तो उसकी पढ़ाई पर असर पड़ता", <b>इंडियास्पेंड </b>से बातचीत में दुर्गा ने बताया। यूएन वूमेन की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में 72% घरेलू कर्मियों ने कोविड-19 महामारी के कारण अपनी नौकरियां खो दी, जिनमें से 80% महिलाएं है।</p><p dir="ltr"><a href="http://mospi.nic.in/about-ministry-0"><u>नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस</u></a> के एक सर्वे<a href="http://mospi.nic.in/sites/default/files/publication_reports/Report_TUS_2019_0.pdf?download=1"> <u>टाइम यूज इन इंडिया-2019</u></a> के अनुसार, महिलाएं घर पर बिना भुगतान वाले घरेलू कार्य में लगभग पांच घंटे लगाती हैं और इसकी तुलना में पुरुष केवल डेढ़ घंटा ही लगाते हैं। दुर्गा के जीवन की ही दिनचर्या ले लें, वह सुबह 5.30 बजे उठ जाती हैं और 8.30 पर कार्य शुरू करने से पहले अपने परिवार के लिए खाना पकाकर और सफाई करके जाती हैं। शाम को घर लौटने के बाद वह रात का भी भोजन बनाती हैं और अपने बच्चों की देखभाल भी करती हैं। दुर्गा बताती हैं, "मुझे कोई छुट्टियाँ नहीं मिलती, वीकेंड पर भी नहीं। जब बच्चों की परीक्षाएं या स्कूल से जुड़े मसले होते हैं तो मुझे एक दिन की छुट्टी लेनी पड़ती है और उसके लिए मेरा पैसा काट लिया जाता है।"</p><p dir="ltr">एक और अहम बात यह भी है कि महामारी की वजह से घर में देखभाल की ज़िम्मेदारी काफी बढ़ गई है और इसका बोझ महिलाओं को ही उठाना पड़ता है। "आर्थिक सुरक्षा की कमी के साथ ही देखभाल का बोझ अधिक होने से बहुत सी महिलाओं के रोज़गार के बाजार से पूरी तरह बाहर होने का खतरा मंडराने लगा है। पिछली महामारियों पर गौर करें तो तय मानिए, इससे इन महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को भी नुकसान होगा। दिल्ली में अधिकतर नौकरियाँ सर्विस सेक्टर में हैं। जिनके लिए उच्च शैक्षिक योग्यताओं की जरूरत है, जो समाज के कमजोर तबक़ों से आने वाली महिलाओं के लिए हासिल करना मुश्किल होगा", संघमित्रा सिंह इस बारे में बात करते हुए कहती है। महामारी के दौरान, नौकरियाँ गँवाने की शुरुआत महिलाओं से ही सबसे पहले शुरू हुई थी और इसके साथ ही उन्होंने 'टाइम पोवर्टी' का भी सामना किया। टाइम पोवर्टी का मतलब घर की देखभाल करने में अधिक समय बिताने और घरेलू काम करने से है जिसके लिए उन्हें कोई भुगतान नहीं मिलता है।<br></p><p dir="ltr">"यह एक कड़वा सच है कि महिलाओं के समय को अहमियत नहीं दी जाती है। खाना पकाने और सफाई में तकनीकी चीजों को छोड़ दिया जाए तो, चार दशक पहले जब रसोई में प्रेशर कुकर का बहुत कम इस्तेमाल होता था, क्या तब पुरुष रसोई के काम में महिलाओं की मदद करते थे? जवाब है- न के बराबर। दरअसल भारत में अन्य विकासशील देशों की तुलना में घरेलू कार्य में पुरुषों की भागीदारी सबसे कम है।"  <a href="http://www.ranchiuniversity.ac.in/phocadownload/Official_Document/6_Economics.pdf"><u>रांची</u><u> </u><u>यूनिवर्सिटी</u></a> के अर्थ-शास्त्र विभाग में अतिथि प्रोफेसर जीन ड्रेज का ऐसा मानना है।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">जीवन को मुश्किल बनाती नौकरी की अनिश्चितता</span></b></p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/02/15/411704-mehrunissa.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="44212qaxS2pPkCT8rLw8TNcYdcVyhIjx5JoY2699094" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1613392701352" title="मेहर-उन-निसा अपने और अपने पडोसी के बच्चों के साथ दिल्ली के ओखला में अपने घर पर । वो कुछ साल पहले अच्छी ज़िन्दगी की तलाश में बिहार के मोतिहारी से दिल्ली आयी थीं ।" alt="मेहर-उन-निसा अपने और अपने पडोसी के बच्चों के साथ दिल्ली के ओखला में अपने घर पर । वो कुछ साल पहले अच्छी ज़िन्दगी की तलाश में बिहार के मोतिहारी से दिल्ली आयी थीं ।" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1613392701352"><p>मेहर-उन-निसा अपने और अपने पडोसी के बच्चों के साथ दिल्ली के ओखला में अपने घर पर । वो कुछ साल पहले अच्छी ज़िन्दगी की तलाश में बिहार के मोतिहारी से दिल्ली आयी थीं ।</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">दिल्ली के ओखला स्थित किराये के घर में अपने और पड़ोसी के बच्चों के साथ बैठी मेहर-उन-निसा अपने परिवार के लिए बेहतर जीवन की उम्मीद लेकर कुछ साल पहले ही बिहार के मोतिहारी जिले से राजधानी दिल्ली आई थी। यहां एक गारमेंट फ़ैक्टरी में उन्हें नौकरी मिली। लेकिन इससे वो अपने महीने का खर्चा बहुत मुश्किल से चला पाती हैं।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">30 साल की मेहर-उन-निसा इन दिनों एक 'अर्जेंट शिपमेंट' के चलते वस्त्र निर्यात की फ़ैक्टरी में नौकरी करती है। जिसमें उन्हें सुबह 9.30 बजे से शाम के 6.30 बजे तक कपड़ों पर कढ़ाई का काम करना होता है। इसके अलावा दो घंटे का ओवर-टाइम भी उपलब्धता के आधार पर करती हैं। मेहर-उन-निसा का साफ-तौर पर कहना है कि अगर वह नौकरी नहीं करेगी तो उसे भोजन नहीं मिलेगा। पांच लोगों के परिवार में मेहर अकेली कमाने वाली है। पिछले साल मार्च से जून के बीच उसके पास कोई नौकरी नहीं थी और स्वयंसेवकों की ओर से मिलने वाले भोजन पर परिवार का गुजारा होता था। उसके 50 वर्षीय पति को डायबिटीज़ है और घुटने में लगातार दर्द की वजह से वह कोई काम नहीं कर सकें। वह अपने मासिक वेतन 6,000 रुपये और ओवर-टाइम मिलने पर 7,000 रुपये पर ही आश्रित है। जिससे वह अपने तीन बच्चों के भोजन और 2,000 रुपये घर का किराया चुकाती है। देर शाम को घर जाते हुए मेहर ने इंडियास्पेंड को फोन पर बताया, "मैं कोई बचत नहीं कर पाती। आमतौर पर फ़ैक्टरी से मुझे घर छोड़ा जाता है लेकिन कुछ दिनों से यह सुविधा नहीं मिल रही है। मुझे एक ऑटोरिक्शा लेना पड़ता है, जो काफी महँगा पड़ता है।"</p><p dir="ltr">वर्ल्ड बैंक ने पिछले वर्ष अक्टूबर में कहा था, महामारी के नकारात्मक आर्थिक प्रभाव से 2020 में 8.8 करोड़ और लोग गरीबी के कुचक्र में फँस जाएंगे। यूएन वूमेन की रिपोर्ट में यह आंकड़ा करीब 9.6 करोड़ बताया गया है, जिनमें 4.7 करोड़ महिलाएं और लड़कियाँ हैं। दक्षिण एशिया में महामारी से पूर्व महिला गरीबी दर 2021 में 10% होने का अनुमान था, लेकिन अब यह 13% पर पहुंच सकता है। 2030 तक दुनिया की गरीब महिलाओं में से 18.6% दक्षिण एशिया में होंगी, यह महामारी के पहले के अनुमानों से 2.8% अधिक है। यूएन वूमेन की मानें तो 2021 में, दुनिया भर में हर 100 पुरुषों पर 118 महिलाएं गरीबी में होंगी। यह अनुपात 2030 तक बढ़कर 121:100 हो सकता है।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">आज़ादी के </span></b><b><span style="font-size: 22px;">73</span></b><b><span style="font-size: 22px;"> साल बाद भी लिंग भेद बरकरार</span></b></p><p dir="ltr">आज़ादी के 73 साल बाद भी भारत में महिलाओं के कार्य में सबसे बड़ी बाधा समाज का लैंगिक ढाँचा है। महिलाओं के कार्य को पहचान न मिलना और उनके लिए कार्य स्थितियाँ और श्रम का विभाजन जैसी कमियाँ आज भी बरकरार हैं। "महिलाओं की अधिकतर आर्थिक गतिविधि दिखती नहीं है। सांस्कृतिक रुकावटें राज्यों और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हैं। उदाहरण के लिए, दक्षिण भारत में स्थिति उत्तर भारत की तुलना में काफी अलग है", ऐसा जयंती घोष महिलाओं की स्थिति के बारे में बात करते हुए कहती हैं।, महिलाओं में एक और बड़ी समस्या शारीरिक सुरक्षा की है जो कार्यस्थल पर जाने और वापस लौटने को लेकर है। "ग्रामीण क्षेत्रों में एक विशेष आयु के बाद लड़कियों को स्कूल नहीं भेजा जाता, क्योंकि उनपर यह रोक होती है कि वे कितनी दूर तक यात्रा कर सकती हैं। यह एक नियंत्रण का मामला भी है कि परिवार की अनुमति के बिना आप यात्रा नहीं कर सकते। आने-जाने पर काफी नियंत्रण रखा जाता है", इस बारे में घोष आगे बताती हैं।</p><p dir="ltr">पॉपुलेशन फ़ाउंडेशन ऑफ इंडिया की संघमित्रा सिंह कहती हैं कि इस लिहाज से दिल्ली बहुत अलग नहीं है जहां ट्रांसपोर्ट सिस्टम और आवाजाही की समस्या है। यह कामकाजी महिलाओं के लिए अवसरों में बड़ी रुकावट के तौर पर  है। ये रुकावटें ग्रामीण क्षेत्रों या कम आमदनी वाले वर्ग में महिलाओं तक ही सीमित नहीं हैं। हरियाणा में गुरुग्राम की 42 वर्षीय दिव्या शेषन एक मानव संसाधन प्रोफेशनल और एकल मां हैं। लॉकडाउन के दौरान दिव्या की नौकरी चली गई थी। दिव्या बताती हैं, "मैं एक स्टार्टअप में नौकरी करती थी और मुझे समय पर वेतन नहीं मिलता था। महामारी शुरू होने पर वेतन मिलना बंद हो गया था। कुछ समय बाद एक अन्य नौकरी मिली लेकिन वेतन 40% घट गया था। मेरे पास 15 वर्ष का अनुभव है और मुझसे पहला प्रश्न यह पूछा गया कि क्या अपनी आयु और एक बच्चे को देखते हुए ठीक से नौकरी कर सकेंगी। वे ऐसी स्थिति में एक पुरुष से कभी यह सवाल नहीं पूछते।"</p><p dir="ltr">लॉकडाउन में घर से कार्य करने के दौरान, दिव्या से पूछा गया था कि खाना, सफाई और उनके बेटे की पढ़ाई का ध्यान कौन रखेगा। दिव्या ने कहा, भारत में महिलाओं के कार्य के प्रत्येक कदम पर रुकावटें हैं, जिसमें जातिवाद भी शामिल है। इसके साथ ही एक गलत धारणा यह भी है कि विकल्प मिलने पर कंपनियां एकल मां की बजाय एकल महिला को प्राथमिकता देती हैं। जयंती घोष बताती हैं, दोहरे मापदंड के ये उदाहरण एक बड़ी रुकावट हैं और इन्हें सामने लाना बहुत जरूरी है। इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि कोविड-19 के दौरान मध्यम वर्ग के लोगों का उनके घरेलू सहायकों के साथ व्यवहार कैसा रहा। महामारी के सबसे बुरे दौर में, इन सहायकों को वेतन नहीं दिया गया और उन्हें घर में आने की अनुमति भी नहीं थी। इस परिस्थिति में घर की महिलाओं ने भी उन्हें संदेह की नज़रों से देखा था।</p><p dir="ltr">भारतीय समाज को कामकाजी महिलाओं के प्रति नज़रिया बदलने की जरूरत है। जीवन की बुनियादी सुविधाओं से जुड़े क्षेत्रों में सिंगल वूमन को काफी मुश्किलातों का सामना करना पड़ता है। मसलन, चाहे वो सरकारी विभाग के अधिकारी हों या फिर बैंकों से जुड़े मसले महिलाओं की खुद की पहचान को अभी भी अनदेखा किया जाता है, ऐसा दिव्या का मानना है। एक सरकारी दफ्तर में मेरे पूर्व पति का नाम मेरे बेटे के एक फॉर्म में भरने को कहा गया वो भी स्वर्गीय लगाकर, जबकि वो जिंदा हैं। इसी तरह बैंक के लोन अधिकारी मेरे खुद के अपार्टमेंट के कोलेटरेल सिक्योरिटी को दरकिनार कर बैकअप आय को लेकर प्रताड़ित करने की कोशिश की। मुझे एक सलाहकार ने सलाह भी दी कि नौकरी पाने से पहले मुझे एक ग्रूमिंग सेशन की सख्त जरूरत है। यहां मेरा सवाल यही है कि क्या एच.आर. के पद को पाने के लिए मुझे इंटरव्यू में आकर्षक दिखना जरूरी है? बात यहीं खत्म नहीं होती है। हमारे पड़ोसी ने एक कैमरा लगा रखा है सिर्फ ये देखने के लिए कि मेरे घर कौन आता-जाता है। बहरहाल, कामकाजी महिलाओं और खासतौर से सिंगल वूमन के लिए अभी भी दिल्ली जैसे महानगरों में नौकरी करना और अपने तरीके से जीने की आज़ादी नहीं है, अपने अनुभवों को साझा करते हुए दिव्या आगे बताती है। </p><p dir="ltr">(यह खबर <a href="https://www.indiaspend.com/"><u>इंडियास्पेंड </u></a>में प्रकाशित की गई <a href="https://www.indiaspend.com/womenwork/how-the-pandemic-affected-urban-working-women-714688"><u>खबर </u></a>का हिंदी अनुवाद है।)</p><p dir="ltr">हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया <a href="mailto:respond@indiaspend.org">respond@indiaspend.org</a> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं</p><div><br></div></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/womenwork/from-delhi-a-view-of-womens-work-hit-by-the-pandemic-727000</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/womenwork/from-delhi-a-view-of-womens-work-hit-by-the-pandemic-727000</guid>
<category><![CDATA[Development,कवर स्टोरी,नवीनतम रिपोर्ट,नारी श्रमशक्ति,महिलाएं,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[शालिनी सिंह]]></dc:creator>
<pubDate>Mon, 15 Feb 2021 13:38:24 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/02/16/500x300_412264-slide2.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[किशोर सेक्स, गर्भनिरोधक और पोषण संबंधी मुश्किलों का समाधान है महिलाओं का समूह]]></title>
<description><![CDATA[महिलाओं के स्व-सहायता समूहों के नेतृत्व में स्वाभिमान के जन-जागरूकता कार्यक्रम और बैठकों से स्वास्थ्य सेवाओं और गर्भनिरोधकों की मांग में नि:संदेह इजाफा हुआ है, लेकिन अभी भी सेक्स के बारे में बातचीत को लेकर बस्तर का समाज सहज नहीं है। यह एक बड़ी चुनौती है।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>बस्तर/मुंबई : </b>नवंबर का महीना और आंगन में गुनगुनी धूप। अपने 17 दिन के नवजात को तौलिए में लपेटकर यही गुनगुनी धूप सेकती 20 साल की रत्नी कश्यप कहती हैं, अगर मुझे परिवार नियोजन के बारे में पता होता तो शायद कभी इस बच्चे का जन्म नहीं होता। मैं 17 साल की थी तभी शादी हो गई थी। साथ में वह यह भी जोड़ती है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में उनके आदिवासी बहुल गांव बालेंगा में तो लड़कियों की शादी कई बार 14 या 15 साल की उम्र में ही कर दी जाती है। शादी के एक महीने के अंदर ही वह गर्भवती हो गई थी और उसका पहला बच्चा अब दो साल का है।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">पिछले साल की शुरुआत यानी शादी के तीसरे साल जब रत्नी दूसरी गर्भावस्था के तीसरे महीने में थी तो उसे नवविवाहिता, गर्भवती महिलाओं और युवा मांओं के लिए स्थानीय स्व-सहायता समूह 'आमचो बासुल' द्वारा गांव स्तर पर आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने का मौका मिला। इसी में उसे पहली बार गर्भनिरोधक यानी कंडोम, इंट्रायूटरिन कॉन्ट्रासेप्टिव डिवाइस (IUCD) यानी कॉपर टी, परिवार नियोजन और गर्भनिरोधक गोलियों आदि के बारे में पता चला।</p><p dir="ltr">स्वाभिमान कार्यक्रम के तहत महिलाओं की स्व-सहायता समूहों द्वारा यह बैठक पूरे बस्तर में महीने में एक बार आयोजित की जाती है जिसे छत्तीसगढ़, ओडिशा और बिहार की महिला समूहों द्वारा संचालित किया जाता है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन इस कार्यक्रम को तीनों राज्यों में स्वास्थ्य, नागरिक आपूर्ति, सामाजिक कल्याण, कृषि और सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी की भागीदारी से चलाता है। इस कार्यक्रम को यूनिसेफ तकनीकी और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराता है, जो क्षमता निर्माण में भी शामिल है।</p><p dir="ltr">छत्तीसगढ़ में, साल 2016 से चल रहे स्वाभिमान का संचालन '<a href="http://bihan.gov.in/home.aspx"><u>बिहान</u></a>', या सीजीएसआरएलएम यानी<a href="http://bihan.gov.in/home.aspx"><u> छत्तीसगढ़ ग्रामीण आजीविका मिशन</u></a> के तहत होता है। स्वाभिमान का जोर ऐसे समूहों पर है जिन्हें कुपोषण का अधिक खतरा है। इनमें किशोर उम्र की लड़कियां, नवविवाहित जोड़े, गर्भवती महिलाएं और दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों की माएं शामिल हैं। इसका मकसद पोषण में सुधार करना, खून की कमी (एनीमिया) को दूर करना, स्वास्थ्य सेवाओं की मांग बढ़ाना, साफ-सफाई में सुधार करना और अनचाहे गर्भ को रोकना है।<br></p><p dir="ltr">इसके अलावा आमचो बासुल 14 साल या इससे अधिक उम्र की किशोरियों के लिए किशोरी बैठकें नाम से अलग से भी बैठकें आयोजित करता है जो मुख्य तौर पर पोषण और स्वच्छता पर केंद्रित होता है। इसमें महिलाओं के स्वास्थ्य और उनके कल्याण से संबंधित विभिन्न पहलुओं के बारे में चर्चा करने और सीखने के लिए महिला समूहों को इकट्ठा किया जाता है।<br></p><p dir="ltr">ऐसी बैठकों की अगुवाई मंगुन मित्स या पोषण सखियां करती हैं, जिन्हें जागरूकता फैलाने, चर्चाओं का नेतृत्व करने और इन मुद्दों से जुड़ी तमाम गतिविधियां आयोजित करने के लिए प्रशिक्षण मिला होता है। सभी पोषण सखियां इन्हीं समुदायों से चुनी गई महिलाएं होती हैं।</p><p dir="ltr">अपनी दूसरी गर्भावस्था के दौरान पिछले कुछ महीनों में रत्नी कश्यप ने आमचो बासुल की कुछ अन्य बैठकों में हिस्सा लिया, जिसमें उसे मातृत्व और परिवार नियोजन से संबंधित कुछ सरकारी योजनाओं और उसकी पात्रता के बारे में भी जानकारी मिली। इनमें<a href="https://wcd.nic.in/schemes/pradhan-mantri-matru-vandana-yojana-0"><u> प्रधानमंत्री मातृ वंदन योजना</u></a> और<a href="https://nhm.gov.in/images/pdf/programmes/family-planing/schemes/FP_Indemnity_Scheme_2013.pdf"><u> नेशनल फैमिली प्लानिंग इनडेमिनिटी स्कीम</u></a> (एनएफपीआईएस) शामिल हैं, जो माहवारी और स्वच्छता, टीकाकरण, प्रतिरक्षण, पोषण युक्त भोजन और परिवार नियोजन से संबंधित है। इन बैठकों में हिस्सा लेने के बाद, रत्नी प्रसव से पहले तीन बार स्वास्थ्य जांच के लिए गई। इस दौरान नियमित तौर पर आयरन फॉलिक एसिड और कैल्शियम की गोलियां भी ली और भोजन में हरी सब्जियां और अंडे की मात्रा भी बढ़ाई। रत्नी ने बताया कि इस दौरान उसने मछली भी खानी शुरू की, जबकि उनका समुदाय गर्भवती महिलाओं को मछली खाने से मना करता था। इसका फायदा यह हुआ कि उसका दूसरा बच्चा पहले बच्चे की तुलना में सेहतमंद हुआ। वह अब इस बात को समझ चुकी थी कि बच्चे को पहले छह महीनों तक सिर्फ स्तनपान कराने की जरूरत होती है और फिर उसे वह नियमित तौर पर प्रतिरक्षण के लिए भी ले जाती हैं। रत्नी को इस बात का भरोसा हो गया कि उसके बच्चे अब बड़े होने पर भी स्वस्थ रहेंगे क्योंकि वह अब जान चुकी है उसे कब क्या खिलाना है और कब हैल्थ चेकअप के लिए ले जाना है।</p><p dir="ltr">रत्नी ने इंडिया स्पेंड को बताया कि अगर उन्हें पहले गर्भावस्था को टालने और दो बच्चों के बीच कितना अंतर होना चाहिए इस बारे में जानकारी होती, तो वह कम से कम दो वर्षों तक अपने दूसरे बच्चे को जन्म नहीं देती। अब जबकि गर्भनिरोध के बारे में जानकारी हो गई है तो अगले कई वर्षों तक वह तीसरे बच्चे की योजना नहीं बनाएगी।</p><p dir="ltr">देशभर में रत्नी कश्यप जैसी बहुत सी किशोरवय लड़कियों का कम उम्र में विवाह कर दिया जाता है या भागकर विवाह कर लेती हैं, सेक्स करती हैं और गर्भवती हो जाती हैं। उन्हें अक्सर गर्भनिरोधक उपायों के बारे में बहुत कम या बिल्कुल जानकारी नहीं होती। वे स्वयं तो कुपोषित होती ही हैं, कम उम्र की लड़कियां कुपोषित बच्चों को ही जन्म देती हैं और उन्हें यह नहीं पता होता कि उसे खुद क्या खाना है और बच्चों को क्या खिलाना है, कब चेकअप कराना है।</p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div class="h-embed" contenteditable="false"><div class="h-embed-wrapper desktop-only-embed"><iframe src="https://e.infogram.com/6e0567b1-9ec9-44a9-9838-7610e29baed8?src=embed" title="Women and Child Health Indicators for Chhattisgarh" width="700" height="910" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></div></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><br></p></div><div class="hocal-draggable" draggable="true"><div class="h-embed" contenteditable="false"><div class="h-embed-wrapper mobile-only-embed"><iframe src="https://e.infogram.com/6e0567b1-9ec9-44a9-9838-7610e29baed8?src=embed" title="Women and Child Health Indicators for Chhattisgarh" width="320" height="460" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></div></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"बस्तर नक्सलियों का गढ़ है जहां काफी पुराने आदिवासी समूह निवास करते हैं। इनमें से अधिकांश महिलाओं में सेहत को लेकर परेशानी बनी रहती है और प्रसव पूर्व स्वास्थ्य जांच जैसी सेवाएं ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंच नहीं पाती हैं," छत्तीसगढ़ स्थित यूनिसेफ (संयुक्त राष्ट्र बाल कोष) की पोषण विशेषज्ञ फरहत कहती हैं ।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">इंडियास्पेंड ने बस्तर में सात गांवों का दौरा किया जहां स्वाभिमान कार्यक्रम को लागू किया गया है। इस दौरान हमने पाया कि किशोर लड़कियों और युवा मांओं को स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी सुविधा और पात्रता की जानकारी, सही पोषण की अहमियत, साफ-सफाई, स्कूल की पढ़ाई छोड़ने, कम उम्र में शादी और गर्भधारण से नुकसानों की जानकारी मुहैया कराई जा रही है। पोषण और माहवारी के दौरान स्वच्छता जैसे विषयों पर बात करना पहले से आसान हुआ है, लेकिन परिवार नियोजन और गर्भनिरोध जैसे मुद्दों से अभी भी दूरी रखी जाती है।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/20/390506-1-19-year-old-severely-stunted800.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421K4EzZrKXrFP9gMNmDWQNOGtuJVqUFK6w8854918" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1611128856113" title="गंभीर रूप से अविकसित 19 वर्षीय किशोरी अपनी रसोई में मक्की का मांड बनती हुई ।" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1611128856113"><p>गंभीर रूप से अविकसित 19 वर्षीय किशोरी अपनी रसोई में मक्की का मांड बनती हुई ।<br></p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">स्वाभिमान के तहत सामुदायिक गतिविधियों का विस्तार</span></b><br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">स्वाभिमान कार्यक्रम तीन राज्यों के चार जिलों- बिहार में पूर्णिया, छत्तीसगढ़ में बस्तर और ओडिशा में कोरापुट और आंगुल में चल रहा है और इसकी पहुंच 356 गांवों और 1 लाख 25 हजार 97 परिवारों तक है।<a href="http://www.roshni-cwcsa.in/UploadDocument/Document-2020-08-31-07-08-06.pdf"><u> 2016-2019</u></a> की वार्षिक प्रगति रिपोर्ट के अनुसार, इस कार्यक्रम से अभी तक 11 हजार 180 ग्राम पंचायतों में 18 हजार 700 लड़कियों और महिलाओं को लाभ मिला है।</p><p dir="ltr"><a href="http://rchiips.org/nfhs/NFHS-4Reports/India.pdf"><u>नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे, 2015-16</u></a> के अनुसार, छत्तीसगढ़ में गर्भवती महिलाओं में से 4 प्रतिशत का प्रसव पूर्व जांच का कोई प्रमाण नहीं मिला, सिर्फ 22 प्रतिशत महिलाओं को ही प्रसव पूर्व पूर्ण स्वास्थ्य जांच मिल सकी थी। यूनिसेफ एंड<a href="https://www.iipsindia.ac.in/"><u> इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज (आईआईपीएस)</u></a> की ओर से की गई 2019 की एक अन्य<a href="https://bmcwomenshealth.biomedcentral.com/articles/10.1186/s12905-019-0787-1#citeas"><u> स्टडी</u></a> में 83 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनके परिवार के लोग अभी भी खुले में शौच कर रहे हैं, किशोर उम्र की लड़कियों में से 75 प्रतिशत ने बताया कि उन्होंने माहवारी के दौरान सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल नहीं किया। सिर्फ 14 प्रतिशत किशोर उम्र की लड़कियों ने ही सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाया।</p><p dir="ltr">यूनिसेफ की 2019 की एक<a href="https://www.cambridge.org/core/journals/journal-of-biosocial-science/article/abs/predictors-of-the-diets-consumed-by-adolescent-girls-pregnant-women-and-mothers-with-children-under-age-two-years-in-rural-eastern-india/24D7C1B803C1E57A0340F1C53E5C0D7E"><u> स्टडी</u></a> के अनुसार, एक थाली में विभिन्न खाद्य पदार्थों के पोषक तत्वों को मापने के लिए<a href="https://inddex.nutrition.tufts.edu/data4diets/data-source/dietary-diversity"><u> आहार विविधता</u></a> स्कोर का उपयोग किया गया तो पता चला कि छत्तीसगढ़ में किशोर उम्र की लड़कियों का स्कोर 4.45 प्वाइंट था। यह काफी कम है क्योंकि 6-10 प्वाइंट के एक आहार विविधता स्कोर का मतलब होता है, व्यक्ति सभी 10 खाद्य समूहों (पशु-आधारित खाद्य पदार्थों, सब्जी-आधारित खाद्य पदार्थों आदि) की खपत करता है।<br></p><p dir="ltr">मंगुन मित्स यानी पोषण सखियां नवविवाहिता, युवा मांओं और किशोर उम्र की लड़कियों के साथ मासिक बैठकें कर स्वास्थ्य और पोषण के लक्ष्यों की निगरानी करती हैं। आमचो बासुल की बैठकों में माइक्रो फाइनेंसिंग, गर्भावस्था, बच्चों की देखभाल, प्रतिरक्षण और परिवार नियोजन के मुद्दों पर बातचीत की जाती है, जबकि किशोरी बैठकों में बाल विवाह, कम उम्र में गर्भवती होने और शिक्षा से जुड़े मुद्दे प्रमुख होते हैं। सफाई, माहवारी के दौरान स्वच्छता, पोषण, आहार में विविधता और खुले में शौच के मुद्दों पर दोनों बैठकों में चर्चा की जाती है। आमतौर पर इन बैठकों में 15-20 सदस्य हिस्सा लेते हैं और वे इन जानकारियों को जीवन में उतारने के लिए तरह-तरह के गेम्स खेलते हैं।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/20/390511-2-mangun-mit800.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421PGnZQi4XH2UUdNXCOkmSHrUDM0HRk0xf8992388" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1611128993698" title="एक मंगुन मित एक चार्ट के माध्यम से इलाके की किशोरियों और महिलाओं के द्वारा झेली जाने वाली समस्याओं को समझते हुए।" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1611128993698"><p>एक मंगुन मित एक चार्ट के माध्यम से इलाके की किशोरियों और महिलाओं के द्वारा झेली जाने वाली समस्याओं को समझते हुए।<br></p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">आईआईपीएस, एनआरएलएम और यूनिसेफ की ओर से किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि किशोर उम्र की लड़कियों के बीच सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल 2016 में 36% से बढ़कर 2018 में 62% पर पहुंच गया। 10-14 साल की उम्र के बीच किशोर लड़कियों का स्कूलों में नामांकन 2016 में 86% से बढ़कर 2018 में 91% हो गया, जबकि 15-19 साल की लड़कियों के लिए यह 2016 में 55% से 2018 में 64% हो गया। लड़कियों की खुराक में भी अंडा/मीट/मछली की खपत बढ़ने से सुधार हुआ, यह 2016 में 21% से बढ़कर 2018 में 26% रहा और विटामिन ए की अधिक मात्रा वाले सब्जियों और फलों की खपत भी समान अवधि में 91.5% से बढ़कर 95% हो गई। आयरन और फॉलिक एसिड की गोलियों को लेने के प्रतिशत में भी सुधार हुआ और यह 2016 में 52% से 2018 में 55% हो गया। इसके साथ ही सामुदायिक स्वास्थ्य और स्वच्छता कार्यक्रमों में हिस्सेदारी बढ़ी।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"पिछले चार वर्षों में स्वाभिमान ने लोगों के बीच काफी जागरूकता फैलाई है। लेकिन ताली दोनों हाथों से बजती है। हम जिसे सेवाएं दे रहे हैं उसकी ओर से भी रिस्पांस मिलना जरूरी होता है," यूनिसेफ की फरहत बताती हैं। फरहत ने एक मां का उदाहरण दिया जिसे उसके बच्चे के लिए टीकाकरण की जानकारी दी गई थी लेकिन उसे स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र में टीका मिला ही नहीं।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">स्वच्छता और पोषण में सुधार</span> </b></p><p dir="ltr">17 वर्ष की सानिया मंघोरे और 16 साल की निर्वती नाग कक्षा -11 में पढ़ती हैं, जबकि 15 साल की सुबाती बघेल कक्षा-9 में। तीनों बस्तर के मुंडापाल गांव के एक ही स्कूल में जाती हैं और एक साथ किशोरी बैठकों में भी हिस्सा लेती हैं। इन तीनों की जीवन को लेकर एक जैसी योजनाएं हैं मसलन, स्कूल के बाद कंप्यूटर साइंस और नर्सिंग पढ़ना, फिर शादी और बच्चे।</p><p dir="ltr">इन तीनों से बातचीत में पता चला कि किशोरी बैठकों में शामिल होने के बाद तीनों को स्वास्थ्य और स्वच्छता के बारे में अच्छी जानकारी है, लेकिन वे अपने जीवन में इसे व्यावहारिक तौर पर अपना नहीं पाती हैं।</p><p dir="ltr">सानिया ने माहवारी चक्र के अपने पहले अनुभव के बारे में बताया कि सहेलियों से माहवारी के बारे में सुनने के बावजूद, पहली बार का अनुभव काफी डरावना था। उसने शर्माते हुए कहा, "जब मैं सोकर उठी और मैंने खून देखा तो मुझे कुछ अजीब सा लगा था। मैंने सोचा कि मैं मर जाऊंगी। मैं एक सहेली के पास गई जिसने मुझे इस बारे में पूरी जानकारी दी और मुझे इस्तेमाल करने के लिए एक कपड़ा दिया। मुझे अपने घर जाते डर लग रहा था। मेरी मां ने मुझे रसोई में नहीं आने दिया और नमक या अचार छूने से मना कर दिया। मैं बेडरूम में भी नहीं जा सकती थी जहां हम एक छोटी वेदी रखते हैं।" निर्वती और सुबाती के भी उनकी पहली माहवारी को लेकर एक जैसे अनुभव थे।</p><p dir="ltr">किशोरी बैठकों में हिस्सा लेने के साथ ही इन लड़कियों के जीवन में बदलाव आया। सानिया ने बताया, "जब दीदी (एक मंगुन मित) ने चीजों को समझाया, तो मेरी मां ने मुझे हल्दी के पानी से स्नान करने के बाद रसोई में मदद करने साथ ही सभी कमरों में जाने की भी अनुमति दी।" हल्दी में<a href="https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC6509173/"><u> संक्रमण-रोधी गुण</u></a> होते हैं और इसका धार्मिक व पारंपरिक अनुष्ठानों या रीति-रिवाजों में शुद्धीकरण के तौर पर उपयोग किया जाता है। लेकिन सानिया को अभी भी माहवारी के दौरान वेदी को छूने की अनुमति नहीं है।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/20/390516-3-sania-manghogre800.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="44216RrXv9aK0Zh3XdlpyzUwRxwiP10KwVHL9075344" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1611129076969" title="सानिया मंघोरे, 17, निर्वती नाग, 16, और सुबाती बघेल, 15, तीनों बस्तर के मुंडापाल गांव के एक ही स्कूल में जाती हैं और एक साथ किशोरी बैठकों में भी हिस्सा लेती हैं।&nbsp;" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1611129076969"><p>सानिया मंघोरे, 17, निर्वती नाग, 16, और सुबाती बघेल, 15, तीनों बस्तर के मुंडापाल गांव के एक ही स्कूल में जाती हैं और एक साथ किशोरी बैठकों में भी हिस्सा लेती हैं।&nbsp;</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">तीनों लड़कियों ने बताया कि उन्हें इन बैठकों की वजह से स्वस्थ रहने के तौर तरीकों की जानकारी मिली है। इंडियास्पेंड से बातचीत में निर्वती ने बताया, "बैठकों में हमने सीखा कि माहवारी के दौरान सूती कपड़े या सैनिटरी पैड का इस्तेमाल करना चाहिए और हर छह घंटे में इसे बदलना चाहिए। अब हमें पता है कि हर बार पैड बदलने पर उसे साबुन और पानी से पूरी तरह साफ करने की जरूरत है। हमें किसी कपड़े को तीन महीने से अधिक इस्तेमाल नहीं करना है और इसका निस्तारण उसे जलाकर या जमीन में दबाकर करना चाहिए।"<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">अब ये तीनों लड़कियां सिर्फ सैनिटरी पैड का ही इस्तेमाल करती हैं। वे सात पैड का एक पैकेट 30 रुपये में खरीदती हैं और यह एक चक्र तक चलता है। हालांकि, सुबाती ने बताया वे सामान्य सलाह से इतर एक ही पैड को 12 घंटे से अधिक इस्तेमाल करती हैं क्योंकि पैड की सोखने की क्षमता ज्यादा है और ज्यादा चलता भी है। उसने ये भी बताया कि एक महीने में 30 रुपये खर्चना काफी महंगा है, हम इससे अधिक खर्च नहीं कर सकते।"</p><p dir="ltr">बैठकों में पोषण पर सबसे अधिक चर्चा होती है और इस तरह से इन लड़कियों के लिए यह अब सामान्य जानकारी बन गई है। उन्हें घर पर सब्जियां उगाने का तरीका भी सिखाया गया है लेकिन वे नियमित तौर पर इसे नहीं अपना रही हैं। सुबाती ने कहा, "हम आयरन-फॉलिक एसिड की गोलियां लेते हैं लेकिन जितनी बताई गई हैं उतनी नहीं क्योंकि इससे हमारा पेट खराब हो जाता है।"</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/20/390519-4-adolescent-girl1000.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421TiH7RoxjXgo3aXH0nvsXZ7TWStgVe3Gf9159898" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1611129162926" title="एक किशोरी हरी सब्ज़ियों की देखभाल, जो उसने किशोरी बैठक में सीखा, करते हुए&nbsp;" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1611129162926"><p>एक किशोरी हरी सब्ज़ियों की देखभाल, जो उसने किशोरी बैठक में सीखा, करते हुए&nbsp;</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"शाकाहारी परिवारों की बहुत सी लड़कियों की खुराक में अभी भी पर्याप्त प्रोटीन नहीं है। सब्जियां उगाने वाली लड़कियों के माता-पिता अक्सर सब्जियों को घर पर पकाने के बजाय बेच देते हैं क्योंकि यहां अधिकतर परिवार गरीब हैं," अलवाही गांव की एक मंगुन मित, ललिता बघेल ने बताया।<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">असहज होता है सेक्स के बारे में बात करना</span></b></p><p dir="ltr">चूंकि इन बैठकों में सेक्स और गर्भनिरोध के मुद्दों पर बातचीत करना असहज होता है, लिहाजा इन तीनों किशोर उम्र की लड़कियों ने गर्भनिरोधकों के बारे में अनौपचारिक स्रोतों मसलन अपनी भाभी, अन्य रिश्तेदारों या घर से भागने वाली सहेलियों से जानकारी हासिल की है।</p><p dir="ltr">किशोरी बैठकों में हिस्सा ले चुकी बहुत सी किशोर उम्र की लड़कियों ने इंडियास्पेंड को बताया कि उन्हें बाल विवाह और किशोरावस्था में गर्भवती होने के नुकसानों की जानकारी थी लेकिन उन्हें परिवार नियोजन के बारे में कुछ नहीं पता था।</p><p dir="ltr">सानिया कहती है कि लोग लड़कियों को सेक्स न करने की सलाह देते हैं, हालांकि ये उसकी मर्जी पर छोड़ दिया जाना चाहिए। उसे किसी से प्यार हो सकता है या वह किसी के साथ भाग सकती है। फिर जब वह गर्भवती हो जाती है, तो पूरा दोष उस पर मढ़ दिया जाता है, इसलिए लड़कियों को सुरक्षित सेक्स के बारे में बैठकों में बताया जाना चाहिए। सानिया ने आगे कहा, "अभी तक इस तरह का कोई सत्र नहीं हुआ है। अगर दीदी (मंगुन मित) हमें सुरक्षित सेक्स के बारे में बताएंगी, तो हम उसे जरूर सुनेंगे।"</p><p dir="ltr">सेक्स के बारे में अपनी सीमित जानकारी के बावजूद, सानिया कंडोम को बेहतर गर्भनिरोधक मानती है। उसने बताया, "मैं अपने पति से इसे इस्तेमाल करने को कहूंगी।" जबकि निर्वती को गर्भनिरोधक गोलियां पसंद है। उसके मुताबिक, ऐसी चीजों के बारे में पति से नहीं कहा जा सकता। तो सुबाती स्थानीय परंपरागत तरीकों को सही मानती हैं। उसने बताया, "मैं इमली का इस्तेमाल करूंगी क्योंकि मेरी भाभी इसका इस्तेमाल करती हैं और वह अभी तक गर्भवती नहीं हुई हैं।"</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/20/390529-5-everybody-sania898.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-uid="4421g2cQfOmSmdYhkFgNrSQrL3Vrik7m23789679100" data-float-none="true" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1611132268685"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none" id="info_item_1611132268685"><br></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p style="text-align: center; "><span style="font-size: 14px;">"सब लड़कियों को सेक्स ना करने की सलाह देते हैं, लेकिन ये उसकी इच्छा है... इस लिए हमे सुरक्षित सेक्स के बारे में बताया जाना चाहिए," 17 वर्षीय सानिया कहती है</span>&nbsp;</p><p dir="ltr">इंडियास्पेंड ने लड़कियों और महिलाओं के साथ बातचीत में पाया कि बस्तर के इलाकों में लड़कियों की कम उम्र में ही यौन सक्रियता बढ़ जाती है। एक स्थानीय मंगुन मित ने बताया कि प्रेमियों के साथ भागना और कम आयु में विवाह भी सामान्य है, खासतौर पर आदिवासी क्षेत्रों में। सोनरपाल गांव की एक मंगुन मित, नुपुर हल्दर ने बताया, "ऐसी बातचीत करना मुश्किल है, हमें भी हिचक होती है, हम इसे प्रोत्साहित नहीं करना चाहते।"<br></p></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">सेक्स और गर्भनिरोधकों के बारे में बात करना मंगुन मित के लिए न सिर्फ असहज होता है, बल्कि शादी से पहले चाहे वो किसी भी उम्र की हों, यौन संबंध बनाने को वह सिरे से खारिज करती हैं। इसकी वजह बताते हुए बघेल ने बताया, "लड़कियां अगर शादी से पहले यौन संबंध बनाती है तो इसका खामियाजा उसे ही भुगतना पड़ता है।" बस्तर के इलाकों में कम उम्र में यौन सक्रियता को बघेल स्वाभिमान कार्यक्रम के लिए चुनौती मानती हैं।</p><p dir="ltr">"इस बारे में आप जागरूकता बढ़ा सकते हैं, जानकारी मुहैया करा सकते हैं लेकिन आप व्यवहार में त्वरित बदलाव सुनिश्चित नहीं कर सकते। इस तरह के बदलाव में वक्त लगता है," बस्तर में स्वाभिमान कार्यक्रम में मदद कर रही भारती साहू ने बताया।</p><p dir="ltr">स्वाभिमान कार्यक्रम के सामने अन्य चुनौतियों में गरीबी, कम आमदनी, लड़कियों को शिक्षा देने के कम आर्थिक लाभ, कम आयु में शादी को सामाजिक स्वीकृति और कुपोषण शामिल हैं।</p><p dir="ltr"><i>(यह खबर </i><a href="https://indiaspend.com/"><i><u>इंडियास्पेंड </u></i></a><i>में प्रकाशित की गई </i><a href="https://www.indiaspend.com/women-2/women-collectives-tackle-teen-sex-contraception-and-nutrition-705646"><i><u>खबर</u></i></a><i> का हिंदी अनुवाद है।)</i></p><p dir="ltr"><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i></p></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/women-2/women-collectives-tackle-teen-sex-contraception-and-nutrition-716466</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/women-2/women-collectives-tackle-teen-sex-contraception-and-nutrition-716466</guid>
<category><![CDATA[Chattisgarh,Welfare,नवीनतम रिपोर्ट,महिलाएं,शासन,सेहत,सेहतकीपड़ताल,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[प्राची सालवे]]></dc:creator>
<pubDate>Wed, 20 Jan 2021 07:56:05 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/20/500x300_390470-women-contraception-and-nutrition.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[बिहार की महिलाएं इंटरनेट से काफी दूर, 5 में से 4 ने कभी नहीं किया
इस्तेमाल]]></title>
<description><![CDATA[बिहार में उन महिलाओं का सबसे कम प्रतिशत है जिन्होंने कहा कि उनके पास इंटरनेट तक पहुंच है (20.6%); सिक्किम में सबसे अधिक है (76.7%), पांचवें नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के हाल ही में जारी किये गये आंकड़े बताते हैं। ये आंकड़े ये भी दर्शाते हैं की महिलाओं के मुकाबले पुरुषों और ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले शहरी क्षेत्रों के पास इंटरनेट की पहुँच बेहतर है ।]]></description>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>नई दिल्लीः </b>क्या आपने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल किया है? जब ये प्रश्न बिहार के लोगों से पूछा गया तो पाया गया की प्रदेश में पांच में से चार महिलाओं ने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं किया है। बिहार में ऐसी महिलाएं जिन्होंने कम से कम एक बार इंटरनेट का प्रयोग किया है 20.6% हैं जबकि पुरुषों में ये आंकड़ा 43.6% है जो की महिलाओं से दुगने से भी अधिक है ।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">भारत में पहली बार सरकार के एक सर्वेक्षण में लोगों ने यह पूछा गया कि क्या उन्होंने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल किया है। यह प्रश्न पांचवें नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) का हिस्सा था, जिसके आंकड़े हाल ही में जारी किये गये हैं। सर्वेक्षण पिछले वर्ष किया गया था।</p><p dir="ltr">बिहार में उन महिलाओं का सबसे कम प्रतिशत था जिन्होंने कहा कि उनके पास इंटरनेट तक पहुंच है (20.6%), सिक्किम में सबसे अधिक था (76.7%)। पुरुषों में, मेघालय में सबसे कम (42.1%) और गोवा में सबसे अधिक (82.9%) था।</p><p dir="ltr">नए एनएफएचएस के आंकड़े अधूरे हैं -- इसमें केवल 22 राज्यों से परिणाम हैं, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े राज्य इसमें शामिल नहीं हैं। इस कारण से सर्वेक्षण के आंकड़ों का पूरी तरह निष्कर्ष निकालना अभी संभव नहीं है। इस लेख में जिन परिणामों पर चर्चा की गई है वे केवल इस पहले चरण से हैं, और इनमें पुरुषों और महिलाओं के बीच, राज्यों के बीच और शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े अंतर दिख रहे हैं।</p><p dir="ltr">हालांकि, दुनिया भर में कोविड-19 महामारी के फैलने के बाद से कामकाज, शिक्षा और मेडिकल कंसल्टेशन के बड़े हिस्से करोड़ों लोगों के लिए ऑनलाइन हो गए हैं और यह चलन आगे भी जारी रह सकता है। भारत सरकार की भी अधिक भारतीयों को ऑनलाइन लाने की अपनी डिजिटल महत्वाकांक्षा है। इसे देखते हुए, सर्वेक्षण के इस विशेष प्रश्न के लिए डेटा महत्वपूर्ण है। सरकार की अपनी योजनाओं और ट्रैक्टर किराए पर लेने और मौसम की जानकारी जैसी सर्विसेज देने से जुड़ी किसानों के <a href="https://timesofindia.indiatimes.com/business/india-business/govt-launches-mobile-app-for-farmers-to-hire-tractor-farm-machineries/articleshow/71277472.cms"><u>सरकार की ऐप</u></a> के लिए भी इंटरनेट तक पहुंच महत्वपूर्ण है।</p><p dir="ltr">टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया से <a href="https://trai.gov.in/sites/default/files/PR_No.92of2020.pdf"><u>डेटा</u></a> के अनुसार, 2019 में, भारत में 71.87 करोड़ इंटरनेट या ब्रॉडबैंड यूजर थे, यह संख्या 2018 की तुलना में 19% अधिक थी। </p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">क्या आपने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल किया है</span></b><b><span style="font-size: 22px;">?</span></b></p><p dir="ltr">इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कार्य करने वाली <a href="https://internetdemocracy.in/"><u>इंटरनेट डेमोक्रेसी प्रोजेक्ट</u></a> की डायरेक्टर, एंजा कोवाक्स ने कहा, "यह प्रश्न दो तरीकों से मददगार है। पहला यह है कि इससे इंटरनेट के बारे में जागरूकता का एक संकेत मिलता है। दूसरा यह एक उपयोगी आधार रेखा हैः भविष्य के सर्वेक्षणों में, ये आंकड़े बढ़ने चाहिए, जिससे उस जागरूकता के और फैलने का संकेत मिलेगा।"</p><p dir="ltr">उन्होंने इसके साथ ही कहा कि इंटरनेट के साथ भारत के जुड़ाव को वास्तव में समझने के लिए केवल यह पता लगाना कि क्या लोगों ने एक बार भी "कभी" इंटरनेट का इस्तेमाल किया है, पर्याप्त जानकारी नहीं है।</p><p dir="ltr">एनएफएचएस के पास इंटरनेट से जुड़े कुछ और प्रश्न भी थेः</p><p dir="ltr">"[क्या आपने] इंटरनेट पर परिवार नियोजन के बारे में कोई चीज देखी है"?</p><p dir="ltr">"जानकारी के कौन से स्रोतों से आपको एचआईवी/एड्स के बारे में पता चला?", जिसके लिए इंटरनेट उत्तर के विकल्पों में शामिल था।</p><p dir="ltr">कोवाक्स ने बताया, "ये आंकड़े नियमित इस्तेमाल के बारे में कुछ नहीं कहते, जो वास्तव में महत्वपूर्ण है, लेकिन ये केवल इस बारे में हैं कि किसने इंटरनेट का कभी भी इस्तेमाल किया है।" उनका कहना था, "इस मामले में ये अंतिम नहीं हैं और इसके आगे पड़ताल करने की जरूरत होगी। वास्तव में, यह प्रश्न 'क्या आपने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल किया है?' के बाद एक और प्रश्न होना चाहिए था जो यह जानने की कोशिश करता कि यह इस्तेमाल कितना नियमित या हाल का था। इंटरनेट का भी इस्तेमाल करना जागरूकता का एक अच्छा संकेत है लेकिन यह आवश्यक तौर पर वास्तविक इस्तेमाल नहीं है।"</p><p dir="ltr">इंटरनेट के इस्तेमाल के आंकड़ों की कमी से कुछ विशेषज्ञ हैरान नहीं है। सामाजिक समानता के लिए डिजिटल टेक्नोलॉजी का लाभ उठाने पर कार्य करने वाली <a href="https://itforchange.net/"><u>आईटी फॉर चेंज</u></a> की कार्यकारी निदेशक, अनिता गुरूमूर्ति ने कहा, "मुझे आंकड़ों में इंटरनेट का अधिक इस्तेमाल देखने की उम्मीद नहीं थी। निजी इंटरनेट सुविधाएँ इंटरनेट के इस्तेमाल के बारे में सोचने का एकमात्र तरीका नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों और हॉस्पिटल जैसे सार्वजनिक संस्थानों में स्थिर ब्रॉडबैंड, मोबाइल से इंटरनेट पहुंच कहानी का केवल एक हिस्सा है। बिजली और ब्रॉडबैंड में पर्याप्त निवेश के बिना, डिजिटल तौर पर सक्षम बनाना संभव नहीं है। व्यक्तिगत इस्तेमाल का चलन ऐसी संस्थागत मजबूती के साथ चलना चाहिए।"</p><p dir="ltr">ऑनलाइन स्वतंत्रता के मुद्दों को उठाने वाली <a href="https://internetfreedom.in/"><u>इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन</u></a> के कार्यकारी निदेशक और वकील, अपार गुप्ता ने कहा कि इंटरनेट के इस्तेमाल में ग्रामीण बनाम शहरी और पुरुषों और महिलाओं के बीच असमानताएं पहले से सामने हैं। उन्होंने बताया, "केवल ब्रॉडबैंड इंफ्रास्ट्रक्चर को तैयार करने से ग्रामीण जनसंख्या या महिलाओं के बीच इंटरनेट के अधिक इस्तेमाल का अपने आप परिणाम नहीं मिलेगा।" इसके साथ ही उन्होंने कहा कि इसके लिए स्थानीय समुदायों और गैर लाभकारी संस्थाओं के साथ कार्य करने जैसे "बड़े कदमों" की जरूरत होगी, जिससे यह सुनिश्चित किया जाए कि ऑफलाइन असमानताएं ऑनलाइन पर न जाएं।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">इंटरनेट पर महिलाएं बनाम पुरुष</span></b></p><p dir="ltr">"क्या आपने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल किया है?", इस प्रश्न पर महिलाओं का प्रदर्शन पुरुषों की तुलना में काफी कम था। बिहार में इंटरनेट का कभी इस्तेमाल करने वाली महिलाओं की संख्या 20.6% के साथ सबसे कम थी। राज्य में 79.4% महिलाओं ने कहा कि वे कभी ऑनलाइन नहीं रहीं। इसके विपरीत सिक्किम था जहां 76.7% महिलाओं ने कहा कि उन्होंने इंटरनेट का इस्तेमाल किया है।</p><p dir="ltr">इंटरनेट का सबसे कम इस्तेमाल करने वाले पुरुषों वाला राज्य मेघालय था, जहां 42.1% पुरुषों ने ही इसके लिए हां में उत्तर दिया। गोवा में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले पुरुषों की संख्या 82.9% के साथ सबसे अधिक थी।</p><p dir="ltr">इंटरनेट तक पहुंच को लेकर पुरुषों और महिलाओं के बीच असमानता को समझाने के लिए गुरूमूर्ति ने शिक्षा, रोज़गार और आमदनी में ऑफलाइन लैंगिक असमानताओं का कारण बताया जो ऑनलाइन भी लैंगिक असमानताएं तय करता है। गुरूमूर्ति ने कहा, "लैंगिक आधार पर उत्पीड़न, ट्रोलिंग और ऑनलाइन पुलिसिंग से स्व-अनुशासन के तौर पर नकारात्मक परिणाम होते हैं, जबकि युवा महिलाओं की अपने व्यक्तित्व और पहचान को मजबूत करने के लिए इंटरनेट के जरिए सामाजिक मेल-जोल बनाने में दिलचस्पी हो सकती है।"</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">मोबाइल फोन के जरिए महिलाओं का सशक्तिकरण</span></b></p><p dir="ltr">हाल के एनएफएचएस में पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए इंटरनेट के इस्तेमाल पर प्रश्न शामिल था, जबकि पिछले सर्वेक्षण में विशेष तौर पर महिलाओं के लिए एक प्रश्न दिया गया थाः क्या उनके पास एक मोबाइल फोन है और क्या वे उस पर एसएमएस पढ़ सकती हैं। इस प्रश्न को हाल के सर्वेक्षण में दोहराया गया है।</p><p dir="ltr">प्रश्न को "महिलाओं के सशक्तिकरण" के वर्ग में अन्य प्रश्नों के साथ शामिल किया गया था। अन्य प्रश्नों में पूछा गया था कि क्या महिलाएं परिवार के निर्णयों का एक हिस्सा थी, क्या उनके पास एक बैंक एकाउंट है, जमीन की मालिक हैं और उन्हें कैसे भुगतान मिला।</p><p dir="ltr">2015-16 के <a href="http://rchiips.org/nfhs/pdf/NFHS4/India.pdf"><u>चौथे एनएफएचएस</u></a> के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में 61.85% महिलाओं, ग्रामीण इलाकों में 36.9%, और देश भर में 45.9% महिलाओं ने कहा था कि उनके पास एक मोबाइल फोन है जो "वे खुद इस्तेमाल करती हैं।" मोबाइल फोन रखने वाली महिलाओं में से दो-तिहाई ने यह भी बताया था कि वे उस पर मैसेज पढ़ सकती हैं।</p><p dir="ltr">इस वर्ष 22 राज्यों से एनएफएचएस आंकड़ों में महिलाओं के मोबाइल फोन के इस्तेमाल के लिहाज से एक सुधार दिखा है। 2015-16 में आंध्र प्रदेश में केवल 36.2% महिलाओं ने कहा था कि उन्होंने मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया है, जो देश में सबसे कम था। हाल के आंकड़ों में, मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने वाली महिलाओ का सबसे कम प्रतिशत गुजरात में 48.8% दर्ज किया गया। देश में महिलाओं के मोबाइल फोन का सबसे अधिक इस्तेमाल पिछले एनएफएचएस में केरल में 81.2% का था। इस वर्ष, गोवा में 91.2 पर्सेंट के साथ महिलाओं की ओर से मोबाइल फोन का इस्तेमाल सबसे अधिक दर्ज किया गया।</p><p dir="ltr">चौथे एनएफएचएस में आयु के साथ मोबाइल फोन रखने में बढ़ोतरी दिखी हैः यह 15-19 वर्ष की आयु वाली महिलाओं के लिए 25%, 25-29 वर्ष के आयु वर्ग के लिए 56% था। हालांकि, आयु के साथ मैसेज पढ़ने की क्षमता घटी हैः 15-19 की आयु वाली महिलाओं के लिए 88% और 40-49 वर्ष के आयु वर्ग के लिए 48%। मोबाइल फोन रखने और इसका इस्तेमाल ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरों में अधिक था, और इसमें संपत्ति के साथ बढ़ोतरी हुई है।</p><p>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया <a href="mailto:respond@indiaspend.org">respond@indiaspend.org</a> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</p></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/women-2/4-in-5-bihar-women-have-never-used-the-internet-711268</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/women-2/4-in-5-bihar-women-have-never-used-the-internet-711268</guid>
<category><![CDATA[Bihar,नवीनतम रिपोर्ट,महिलाएं,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[अनू भूयन]]></dc:creator>
<pubDate>Thu, 07 Jan 2021 10:18:12 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2021/01/07/500x300_377061-bihar-women.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[दरभंगा में गर्भवती महिलाओं के लिए 'वंडर ऐप']]></title>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>पटना:</b> कुछ महीने पहले दरभंगा ज़िले के बहादुरपुर ब्लॉक की देसली पंचायत की एक गर्भवती महिला की जांच रिपोर्ट स्थानीय प्राइमरी हेल्थ सेंटर (पीएचसी) में जमा होने के कुछ देर बाद ही पंचायत की आक्ज़लरी नर्स मिडवाइफ (एएनएम) मोनालीसा देवी के पास हेल्थ सेंटर से एक आपातकालीन फोन आया। मोनालिसा को बताया गया कि उस गर्भवती महिला के शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी का पता चला है अतः वे उनसे तुरंत संपर्क करें।</p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">"जब मैंने पता लगाया, तो पता चला कि वह कहीं और गई हुई हैं। फिर हमने उनसे फोन पर बात की और पूछा कि उन्हें किसी तरह की दिक्कत तो नहीं आ रही है, तो महिला ने बताया कि कोई दिक्कत नहीं है। हमने हेल्थ सेंटर की तरफ से दी गई आयरन फ़ोलिक एसिड और कैल्शियम की गोलियां नियमित खाने की सलाह दी," मोनालीसा देवी ने <b>इंडियास्पेंड</b> को बत</p><p dir="ltr">मोनालिसा की तरह दरभंगा ज़िले की अन्य एएनएम के पास भी अक्सर पीएचसी से इस तरह के फ़ोन आते हैं और उनके इलाकों की गर्भवती महिलाओं के शरीर में आयरन, ख़ून में हीमोग्लोबिन की कमी व अन्य गंभीर समस्याओं के बारे में बताकर तुरंत संपर्क करने को कहा जाता है। अगर स्थिति गंभीर होती है, तो तुरंत स्थानीय सरकारी अस्पताल में भर्ती कराने का निर्देश दिया जाता है।</p><p dir="ltr">गर्भवती महिलाओं में समस्याओं की जानकारी पीएचसी के चिकित्सकों को वुमेन्स ऑब्सटेट्रिकल नियोनेटल डेथ इवैल्यूएशन एंड रिएक्शन यानी वंडर ऐप के ज़रिये मिलती है, जिसे दरभंगा ज़िले के डीएम त्यागराजन एसएम की पहल पर पिछले साल दरभंगा में लांच किया गया था। राज्य सरकार अब इस ऐप को पूरे राज्य में शुरू करने की तैयारी कर रही है।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">बिहार में मातृत्व मृत्यु दर के आंकड़े</span></b> </p><p dir="ltr">मातृत्व मृत्यु पूरे देश के लिए एक बड़ी समस्या है। बिहार में हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। साल 2016-2018 में बिहार में मातृ मृत्यु दर 149 थी। इससे पहले 2015-2017 में यह दर 165 थी, लोकसभा में इस साल 18 सितंबर को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की तरफ से दी गई <a href="http://164.100.24.220/loksabhaquestions/annex/174/AU993.pdf"><u>जानकारी</u></a> के मुताबिक़। </p><p dir="ltr">वर्ष 2015-2017 में अकेले बिहार में 4,900 गर्भवती महिलाओं की मौत हुई थी, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की तरफ से पिछले साल 22 नवंबर को लोकसभा में पेश किए गए <a href="http://164.100.24.220/loksabhaquestions/annex/172/AU985.pdf"><u>आंकड़ों</u></a> के अनुसार।     </p><p dir="ltr">बिहार में हर साल 3,171,910 महिलाएं गर्भवती होती हैं। इनमें से 432,533 महिलाओं को प्रसव में दिक्कत आने की आशंका रहती है। 288,355 गर्भवती महिलाओं को ऑपरेशन कराना पड़ता है, दरभंगा ज़िला प्रशासन की तरफ से दिए गए पूरे राज्य के आंकड़ों के मुताबिक़।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">कैसे काम करता है ऐप</span></b></p><p dir="ltr">इस ऐप को लांच करने में सबसे बड़ी भूमिका डीएम त्यागराजन एसएम की है। डीएम एक कार्यक्रम के सिलसिले में तमिलनाडु गये हुए थे, जहां उन्हें पता चला कि मातृत्व मृत्यु दर कम करने के लिए यहां इरोड ज़िले में साल 2017 में वंडर ऐप <a href="https://www.womensweb.in/2018/04/narmadha-kuppuswamy-save-pregnant-women-topical/"><u>शुरू</u></a> किया गया था, लेकिन वह फ़ेल हो गया। इस ऐप को जानी-मानी गायनोकोलॉजिस्ट डॉ नर्मदा कुप्पुस्वामी ने <a href="https://www.3blmedia.com/News/Using-Technology-Fight-Maternal-Mortality-Worldwide"><u>तैयार</u></a> किया है।  </p>"वहां वो ऐप सफल नहीं हो पाई, लेकिन मुझे वो आइडिया पसंद आया। दरभंगा में चूंकि मातृत्व मृत्यु दर ज़्यादा है, इसलिए मैंने ये ऐप यहां शुरू करने पर विचार किया," डीएम त्यागराजन ने <b>इंडियास्पेंड</b> से कहा।</div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2020/12/24/365570-screenshot2020-12-23-22-35-38-537comgoogleandroidappsdocs.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421m7gwy80aBfVSYO74wc3e6ZVoUHCd1Qfd2911037" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1608792909539" title="इस साल फ़रवरी तक वंडर ऐप पर 18,277 अलर्ट आये, जिनमें से 91% येलो और 9% रेड अलर्ट थे।" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1608792909539"><p>इस साल फ़रवरी तक वंडर ऐप पर 18,277 अलर्ट आये, जिनमें से 91% येलो और 9% रेड अलर्ट थे।<br></p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><span style="background-color: rgb(249, 249, 249);">"सबसे पहले दो ब्लॉक बहादुरपुर और बेनीपुर में पिछले साल जून में इस सेवा की शुरुआत हुई, जिसे 23 जुलाई को सभी 20 ब्लॉकों में लागू किया गया," वंडर ऐप की नोडल अफसर डॉ श्रद्धा ने </span><b>इंडियास्पेंड</b><span style="background-color: rgb(249, 249, 249);"> को जानकारी दी।</span><br></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">इस ऐप में दरभंगा ज़िले की हर गर्भवती महिला का प्रोफाइल बनाया जाता है और 9 महीने की अवधि में एक नियमित अंतराल पर वज़न, लंबाई, ब्लड प्रेशर, शुगर, हीमोग्लोबिन, ग्लूकोज़, एचआईवी आदि की जांच रिपोर्ट ऐप में अपलोड की जाती है। </p><p dir="ltr">"हम लोग सभी गर्भवती महिलाओं को बुलाते हैं और उन्हें पीएचसी में ले जाकर सभी तरह की जांच करवाते हैं। जांच रिपोर्ट में जो डाटा मिलता है, उसे फॉर्म में भरकर पीएचसी में जमा करते हैं। पीएचसी में आईटी कर्मचारी ये डाटा अपलोड करते हैं," दरभंगा ज़िले के जाले ब्लॉक में काम कर रही एएनएम रूबी देवी ने <b>इंडियास्पेंड</b> को बताया।</p><p dir="ltr">पहले ये डाटा कागज़ों में रह जाता था, लेकिन वंडर ऐप के आने से इसे ऑनलाइन किया गया है और कुछ भी सामान्य से कम होने पर अलर्ट आ जाता है, बहादुरपुर में काम कर रही एएनएम मोनालीसा देवी ने कहा।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">ऐप से मिलते हैं दो तरह के अलर्ट</span></b></p><p dir="ltr">किसी गर्भवती महिला में हीमोग्लोबिन, आयरन या अन्य तत्वों की कमी है, तो डाटा अपलोड करते ही पीएचसी के चिकित्सकों के मोबाइल में मौजूद ऐप में संकेत आने लगता है।</p><p dir="ltr">"टेस्ट रिपोर्ट में जो आंकड़े मिलते हैं, उन्हें ऐप डालते हैं। अगर कोई भी आंकड़ा नॉर्मल से कम हुआ, तो तुरंत अलार्म बजता है और एक अलर्ट जारी होता है। अगर रिपोर्ट में किसी तत्व में एकदम मामूली कमी है और दवा की ज़रूरत नहीं है, लेकिन देखभाल की ज़रूरत है, तो येलो (पीला) अलर्ट आता है,"  डॉ श्रद्धा बताती हैं, "अगर रिपोर्ट में आये आंकड़े सामान्य से काफी कम होते हैं और गर्भवती महिलाओं को तत्काल इलाज की जरूरत होती है, तो अलार्म के साथ रेड (लाल) अलर्ट आता है। इससे हमें पता चल जाता है कि किन गर्भवती महिलाओं को ज़्यादा देखभाल की ज़रूरत है। दो अलर्ट के अलावा एक और फ़ीचर है, जिससे अलर्ट के साथ ही एक मैसेज भी मोबाइल स्क्रीन पर आ जाता है, जिसमें बताया जाता है कि गर्भवती महिलाओं को तुरंत राहत देने के लिए क्या किया जाना चाहिए। सब कुछ सामान्य होने पर ग्रीन सिग्नल आता है।"</p><p dir="ltr">अलर्ट आने पर सुविधा ये होती है कि हमें पता चल जाता है कि किन गर्भवती महिलाओं पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है और उसी हिसाब से हम लोग एएनएम, आशा व जीविका दीदियों को निर्देश दे देते हैं कि इन महिलाओं का विशेष ध्यान रखा जाए, डॉ श्रद्धा ने बताया। </p><p dir="ltr">दरभंगा के सिंघवाड़ा की रहने वाली साइमा परवीन काफी समय से दिल्ली में थी। पिछले साल गर्भवती थी, तो वह गांव लौट आईं। यहां लौटते ही आशा और एएनएम ने उनसे संपर्क किया और वंडर ऐप में उनका रजिस्ट्रेशन कराकर जांच करवाई और सारे डाटा की एंट्री कराई। </p><p dir="ltr">"एएनएम की तत्परता और जांच और वंडर ऐप में एंट्री से मुझे भरोसा हुआ कि सरकारी व्यवस्था ठीक है," उन्होंने बताया। </p><p dir="ltr">उन्होंने निजी अस्पताल की जगह सिंघवाड़ा कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में भर्ती होना उचित समझा और वहां उनकी डिलीवरी हुई।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2020/12/24/365575-img2.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421RUhLUfYAC9NO63tVezxV501YiLcri8Rt3062389" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1608793061803" title="वंडर ऐप से गर्भवती महिलाओं के रेफरल के 85 मामले आये, जिनमें से 44 मामलों में महिलाओं को दरभंगा मेडिकल कॉलेज ले जाया गया।" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1608793061803"><p>वंडर ऐप से गर्भवती महिलाओं के रेफरल के 85 मामले आये, जिनमें से 44 मामलों में महिलाओं को दरभंगा मेडिकल कॉलेज ले जाया गया।<br></p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><div><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">रेफ़रल मामलों में सहूलियत</span></b><br></p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">दरभंगा में मातृत्व मृत्यु दर के आंकड़ों से पता चलता है कि ज़्यादातर मामलों में गर्भवती महिलाओं की मृत्यु इसलिए हो जाती है, क्योंकि वे समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाती हैं, डीएम त्यागराजन ने कहा।</p><p dir="ltr">इसे ध्यान में रखते हुए मोबाइल ऐप में रेफरल मामलों के लिए भी विशेष फीचर है, जो बहुत कारगर है। मसलन, अगर एक गर्भवती महिला को पीएचसी लाया गया है, लेकिन मामला संगीन है और उसे दरभंगा मेडिकल कॉलेज व अस्पताल में रेफर किया जाना है, तो मोबाइल ऐप में महिला की बीमारी का ज़िक्र करते हुए रेफर का विकल्प डाल दिया जाता है। ये अलर्ट दरभंगा मेडिकल कॉलेज व अस्पताल के अधीक्षक व अन्य अधिकारियों के मोबाइल पर पहुंच जाता है, डॉ श्रद्धा ने बताया।</p><p dir="ltr">"मान लीजिये कि किसी महिला को ख़ून की ज़रूरत है, तो इसका ज़िक्र वंडर ऐप में कर दिया जाता है। अस्पताल के अधीक्षक व अन्य अधिकारियों के पास ये अलर्ट महज़ तीन सेकेंड में पहुंच जाता है कि एक महिला कुछ देर में अस्पताल आ रही है और उसे खून चाहिए, तो वे पहले से ही खून का इंतजाम कर लेते है," उन्होंने बताया।</p><p dir="ltr">जून 2019 से 11 फरवरी 2020 तक वंडर ऐप पर 43,450 गर्भवती महिलाओं का रजिस्ट्रेशन किया गया, जिनमें से 18,277 महिलाओं को लेकर स्वास्थ्य अधिकारियों के पास अलर्ट आया। इनमें 91% यानी 13,678 येलो अलर्ट और 1,420 (9%) रेड अलर्ट थे। ऐप के जरिये 85 महिलाओं को बेहतर इलाज के लिए रेफर किया गया, दरभंगा डीएम कार्यालय से मिले आंकड़ों के अनुसार।</p><p dir="ltr">दरभंगा ज़िले में वंडर ऐप से गर्भवती महिलाओं को ट्रैक करने और समुचित इलाज में मिल रही मदद को देखते हुए बिहार सरकार इस ऐप को अब बिहार के अन्य जिलों में भी लागू करने की तैयारी कर रही है।</p><p dir="ltr">"ये ऐप निश्चित तौर पर मातृत्व मृत्यु दर कम करने में मदद करेगा। राज्य स्वास्थ्य प्रशासन की कोशिश रहेगी कि इस ऐप को पूरे राज्य में लागू किया जाए, जिससे दरभंगा की तरह पूरे राज्य में मातृत्व मृत्यु दर में कमी आए," 3 दिसंबर को दरभंगा में ऐप से मिल रही सहूलियतों को लेकर एक पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन देखने के बाद राज्य के स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत ने <a href="https://react.etvbharat.com/hindi/bihar/state/darbhanga/state-health-secretary-visit-to-darbhanga/bh20201204051035633"><u>कहा</u></a> था।</p></div><div contenteditable="false" data-width="100%" style="width:100%" class="image-and-caption-wrapper clearfix hocalwire-draggable float-none" has-title="true"><img src="https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2020/12/24/365577-7868959926004923668525064227234094079016960o.webp" draggable="true" class="hocalwire-draggable float-none" data-float-none="true" data-uid="4421n8OEYCQMsIanU1T0fXFU98830FRYQ4rN3138852" data-watermark="false" style="width: 100%;" info-selector="#info_item_1608793138667" title="वंडर ऐप से मिल रहे फायदे को लेकर बैठक में शामिल डीएम त्यागराजन एस एम (कत्थई जैकेट में)। उनकी पहल पर ही पिछले साल दरभंगा में इस ऐप को लांच किया गया था, जिसे पूरे बिहार में शुरू करने की तैयारी है।" alt="" data-compression="false"><div class="inside_editor_caption image_caption hocalwire-draggable float-none edited-info" id="info_item_1608793138667"><p>वंडर ऐप से मिल रहे फायदे को लेकर बैठक में शामिल डीएम त्यागराजन एस एम (कत्थई जैकेट में)। उनकी पहल पर ही पिछले साल दरभंगा में इस ऐप को लांच किया गया था, जिसे पूरे बिहार में शुरू करने की तैयारी है।</p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><div><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">लॉकडाउन में बंद रही सेवा</span></b><br></p></div></div><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">कोविड-19 को लेकर मार्च से लगे लॉकडाउन के कारण इस ऐप में एंट्री भी प्रभावित हुई थी। लॉकडाउन के कारण ऐप पूरी तरह संचालित नहीं हो पा रहा था। इससे बहुत सारी महिलाओं को ऐप का लाभ नहीं मिल सका।</p><p dir="ltr">दरभंगा ज़िले के केवटी ब्लॉक के असराहा गांव की रहने वाली रुखसाना परवीन लॉकडाउन के दौरान गर्भवती थीं। जुलाई में जब बाढ़ आई हुई थी, तो उसी दौरान उनके पेट में दर्द होने लगा। लेकिन, उन्हें ऐप से कोई मदद नहीं मिली। मजबूरन स्थानीय लोगों ने केले के पत्तों की नाव बनाई और उसे अस्पताल पहुंचाया।</p><p dir="ltr">"हमें नहीं पता कि कोई ऐप भी है। जब बेटी को दर्द हुआ, तो हम लोग स्थानीय अस्पताल ले गये, जहां उसे दवा दी गई। तीन महीने पहले ही उसने बच्चा जना है, लेकिन डिलीवरी भी घर में ही करवानी पड़ी," रुखसाना की मां कनीज़ा ख़ातून ने <b>इंडियास्पेंड</b> से कहा।</p><p dir="ltr">लॉकडाउन में ऐप का काम बंद होने की बात डॉ श्रद्धा ने भी स्वीकार की। "कोविड-19 के वक्त ऐप सेवा बंद थी, लेकिन हम लोगों ने मोबाइल फ़ोन के जरिये गर्भवती महिलाओं का हालचाल जाना। अब ऐप सेवा दोबारा शुरू हो गई है," उन्होंने कहा।</p><p dir="ltr"><b><span style="font-size: 22px;">अन्य राज्यों में भी गर्भवती महिलाओं की ट्रैकिंग</span></b></p><p dir="ltr">ओडिशा के संबलपुर जिले में वंडर ऐप तो नहीं लेकिन, ऐसा ही एक मोबाइल ऐप हाई रिस्क मदर ट्रैकिंग इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे मातृत्व व शिशु मृत्यु दर में काफी गिरावट आई है।</p><p dir="ltr">संबलपुर में ये मोबाइल ऐप 2017 में लांच किया गया था। साल 2018-2019 में 19,262 गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी हुई, जिनमें से 284 नवजात शिशुओं की मौत हो गई। साल 2017-2018 में ये आंकड़ा 356 था। साल 2018-2019 में 18 गर्भवती महिलाओं की मौत हुई जबकि वित्त वर्ष 2017-2018 में 46 महिलाओं की जान चली गई थी," द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की इस <a href="https://www.newindianexpress.com/states/odisha/2019/may/14/app-helps-bring-down-maternal-mortality-1976722.amp"><u>रिपोर्ट</u></a> में ज़िले के अतिरिक्त ज़िला मेडिकल ऑफिसर (फैमिली वेलफेयर) डॉ कुबेर चंद्र मोहंता ने बताया।</p><p dir="ltr">हरियाणा में गर्भवती महिलाओं को ट्रैक करने के लिए राज्य सरकार सरकार ने 2017 में एक पोर्टल शुरू किया था। इस पोर्टल के ज़रिए ये सुनिश्चित किया जाता है कि गर्भवती महिला को प्रसव पूर्व सभी चेक अप, सप्लीमेंट्स मिलें और ज़रूरत पड़ने पर सामुदायिक या ज़िला चिकित्सा केंद्र में विशेषज्ञों की सुविधा आसानी से मिल सके, नवंबर 2019 की <b>इंडियास्पेंड </b>की इस <a href="https://indiaspendhindi.com/%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%88-%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87/"><u>रिपोर्ट</u></a> के अनुसार।</p><p dir="ltr">जानकारों का कहना है कि ऐप कुछ हद तक मददगार हो सकता है, लेकिन ये हर समस्या का इकलौता समाधान नहीं हो सकता है। "ऐप से निश्चित तौर पर मातृत्व मृत्यु दर में कमी लाने में मदद मिलेगी, लेकिन इसके साथ ही बुनियादी ढांचों को विकसित करना भी ज़रूरी है। अगर ऐप में ये पता भी चल गया कि किसी गर्भवती महिला को क्या इलाज चाहिए, तो इलाज तब ही संभव हो पायेगा, जब प्राइमरी हेल्थ सेंटर या कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में इलाज की व्यवस्था होगी," जन स्वास्थ्य <a href="https://phmindia.org/about-us/"><u>अभियान</u></a> से जुड़े डॉ शकील ने <b>इंडियास्पेंड</b> से कहा।<br></p></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/health/wonder-app-for-pregnant-women-in-darbhanga-705654</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/health/wonder-app-for-pregnant-women-in-darbhanga-705654</guid>
<category><![CDATA[Bihar,कवर स्टोरी,महिलाएं,सेहत,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[उमेश कुमार राय]]></dc:creator>
<pubDate>Thu, 24 Dec 2020 07:04:50 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2020/12/24/500x300_365580-fbimg1608583264411.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA[महामारी ने कैसे छीना उत्तर प्रदेश की महिलाओं से रोज़गार]]></title>
<content:encoded><![CDATA[<p><b>नई दिल्ली: </b>उत्तर प्रदेश के अमेठी ज़िले की रहने वाली विद्या कौशल (22) ने छह महीने का ब्यूटीशियन का कोर्स किया और फिर अपने गृह नगर जगदीशपुर में 'She' नाम से अपना सलून शुरु किया। विद्या ने पिछले साल ही स्नातक की डिग्री हासिल की है। उनका परिवार चाहता था कि वो शिक्षक बने लेकिन उन्होंने एक उद्यमी बनना तय किया।<br></p><div class="pasted-from-word-wrapper"><p dir="ltr">सलून शुरु करने के लिए विद्या ने 50,000 रुपए का निवेश किया। गांधी परिवार के असर वाला जगदीशपुर कभी औद्योगिक क्षेत्र हुआ करता था। लेकिन पिछले एक दशक में यहां <a href="https://www.dnaindia.com/india/report-industries-shut-down-in-gandhi-land-1149353"><u>फ़ैक्ट्रियां बंद</u></a> हुर्ई हैं और रोज़गार के अवसर कम होते गए हैं लेकिन मार्च 2020 में शुरू हुआ विद्या का ब्यूटी पार्लर ठीक ठाक चल रहा था।  </p><p dir="ltr">दो हफ्ते बाद, देश में कोविड-19 से निपटने के लिए <a href="https://pib.gov.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1607997"><u>देशव्यापी लॉकडाउन</u></a> घोषित हो गया। सख्त सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों के साथ, सौंदर्य का व्यवसाय अस्थिर हो गया। 'She' को बंद होना पड़ा। अनलॉक के साथ ही एक बार फिर जुलाई में पार्लर खुल गया, लेकिन कुछ ही ग्राहक आते हैं, विद्या ने कहा, हालांकि वह पार्लर में स्वच्छता और शारीरिक दूरी का ख़्याल रखती हैं।</p><p dir="ltr">"अगर दिन अच्छा हो तो पांच ग्राहक आ जाते हैं; ज़्यादातर दिन इससे कम ग्राहक ही आते है। लोग वास्तव में डरे हुए हैं। मुझे महीनों तक नुकसान हुआ है और अगर मैं कीमतें बढ़ाती हूं, तो ग्राहक भुगतान करने से इनकार करते हैं। अकेले पार्लर चलाना भी मुश्किल है," विद्या ने कहा। उन्होंने उम्मीद जताई कि शादियों इस सीज़न से उनका काम थोड़ा बढ़ेगा।</p><p dir="ltr">हमने लखनऊ, इलाहाबाद, सीतापुर और अमेठी सहित उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में अपनी रिपोर्टिंग में पाया कि महिलाओं में सिर्फ़ उद्यमी ही नहीं हैं जो संघर्ष कर रहे हैं। शहरों में निर्माण स्थलों, कॉल सेंटरों, हस्तशिल्प, खुदरा इकाइयों और घरेलू मदद के रूप में काम करने वाली महिलाओं की नौकरियां चली गई हैं। गांवों में, सार्वजनिक रोज़गार योजनाओं में महिलाओं की भागीदारी कम हुई है। शहरों से लौटे पुरुषों ने उनकी जगह ले ली है।</p><p dir="ltr">महिलाओं के रोज़गार पर लॉकडाउन के प्रभाव पर प्रारंभिक शोध से वही पता चलता है जो शरुआती ख़बरों से पता चला था। रोज़गार में गिरावट लिंग-तटस्थ नहीं है। "रोज़गार में पहले से मौजूद पुरुषों और महिलाओं के बीच बड़े अंतराल को देखते हुए, महिलाओं की तुलना में पुरुषों ने ज़्यादा रोज़गार खोया है। हालांकि, लॉकडाउन से पहले, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के नियोजित होने की संभावना लगभग 20%  कम थी, अशोका यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर, अश्विनी देशपांडे की रिपोर्ट में कहा गया। उन्होंने <a href="https://www.cmie.com/"><u>सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी</u></a> के आंकड़ों की <a href="https://ideas.repec.org/p/ash/wpaper/30.html">पड़ताल</a> की थी।</p><p dir="ltr">तीन-भागों की इस श्रृंखला में, <b>इंडियास्पेंड</b> देश में रोज़गार और आजीविका पर कोविड-19 संकट के प्रभाव की जांच कर रहा है। पहले भाग में, हमने उन श्रमिकों के बारे में बताया जो <a href="https://indiaspendhindi.com/%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a5%89%e0%a4%ac-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%96/"><u>दक्षिणी राजस्थान</u></a> के गांवों में वापस आ गए थे। दूसरे भाग में, हमने <a href="https://indiaspendhindi.com/%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%95%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a4%89%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a4%bc%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%be/"><u>ओडिशा के प्रवासी श्रमिकों की</u></a> सूरत और अन्य प्रवासी स्थलों की वापसी की बात की। इस  तीसरे और समापन भाग में, हम बताएंगे उत्तर प्रदेश के श्रमबल, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं का जीवन कैसे महामारी से प्रभावित हुआ है। </p><p dir="ltr">महामारी से पहले भी, भारत के श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से कम थी, जैसा कि <b>इंडियास्पेंड</b> ने अपनी <a href="https://www.indiaspend.com/category/womenwork/">श्रृंखला</a> Women@Work में बताया है। भारत में यह दर केवल 24% है जो दक्षिण एशिया में सबसे कम है, <a href="http://mofapp.nic.in:8080/economicsurvey/pdf/102-118_Chapter_07_ENGLISH_Vol_01_2017-18.pdf">आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18</a> के अनुसार।</p><p dir="ltr">महिला रोज़गार के मामले में सबसे कम दर वाले राज्य बिहार (2.8%), उत्तर प्रदेश (9.4%), असम (9.8%) थे, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण (2017-18) के राज्यवार विश्लेषण के अनुसार ।</p><p dir="ltr"><br></p><p dir="ltr"><b style="color: rgb(95, 100, 104); font-family: inherit; font-size: 1.5em; background-color: rgb(255, 255, 255);">मंदी से प्रभावित महिलाओं के व्यवसाय</b></p><p dir="ltr"><a href="https://msme.gov.in/sites/default/files/FINAL_MSME_ENGLISH_AR_2019-20.pdf">आंकड़े</a> बताते हैं कि विद्या कौशल और उन जैसी महिलाओं के व्यवसाय को इस संकट से भारी नुकसान हुआ है।</p><p dir="ltr">देश के सौंदर्य उद्योग के प्रतिनिधियों, ज्यादातर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई), ने लॉकडाउन के दौरान एमएसएमई मंत्री नितिन गडकरी से सरकारी सहायता की <a href="https://www.livemint.com/news/india/gadkari-assures-relief-measures-as-70-lakh-beauty-wellness-jobs-at-stake-11588671783692.html">मांग</a> की थी। उन्होंने बताया कि इस श्रेणी के व्यवसायों में 70 लाख लोगों की नौकरियां पर तलवार लटकी थी। इन व्यवसायों में हर तीन में से दो कर्मचारी महिला या प्रवासी श्रमिक हैं।</p><p dir="ltr">महामारी संकट में सबसे अधिक प्रभावित होने वाले क्षेत्र - रेस्तरां, खुदरा, सौंदर्य, पर्यटन, शिक्षा, घरेलू काम, और युवा और बुजुर्गों के लिए देखभाल - में महिलाओं की भागीदारी <a href="https://www.ilo.org/wcmsp5/groups/public/---asia/---ro-bangkok/---sro-new_delhi/documents/publication/wcms_614693.pdf">ज़्यादा</a> है, आजीविका पर काम करने वाले संगठन <a href="https://www.labournet.in/">Labournet</a> की चेयरपर्सन, गायत्री वासुदेवन ने कहा।</p><p dir="ltr">अपने परिवार की बचत से अपना व्यवसाय शुरू करने वाली विद्या को सरकार से किसी भी तरह की मदद की उम्मीद नहीं है। "मेरे आसपास के सभी व्यवसाय बर्बाद हो गए हैं और हमें अपने दम पर कुछ करना होगा," उन्होंने कहा।</p><p dir="ltr">73% महिला उद्यमी लॉकडाउन और महामारी से प्रभावित हुई हैं, 21% की आमदनी लगभग बंद हो चुकी है, मैनेजमेंट कंसलटेंट कंपनी, बैन एंड कंपनी की एक <a href="https://www.bain.com/insights/can-covid-19-be-the-turning-point-for-women-entrepreneurs-in-india/">रिपोर्ट</a> में कहा गया है। सर्वे में शामिल 35% महिलाओं ने आमदनी में महत्वपूर्ण गिरावट (25% -75%) की सूचना दी। रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन के दौरान अतिरिक्त घरेलू काम का बोझ बढ़ने की वजह से महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक प्रभावित हुई हैं।</p><p dir="ltr"><br></p><p dir="ltr"><b style="color: rgb(95, 100, 104); font-family: inherit; font-size: 1.5em; background-color: rgb(255, 255, 255);">शिल्प इकाइयां बंद</b></p><p dir="ltr">लॉकडाउन और आर्थिक मंदी ने लैंगिक असमानताओं को बढ़ा दिया है, कई रिपोर्टों में (<a href="https://idronline.org/how-will-covid-19-affect-women-entrepreneurs/">यहां</a>, <a href="https://indianexpress.com/article/opinion/coronavirus-gender-inequality-india-6414659/">यहां</a> और <a href="https://populationfoundation.in/wp-content/uploads/2020/07/Policy-Brief_Impact-of-COVID-19-on-Women.pdf">यहां</a>) यह बताया गया है। महिलाओं ने नौकरी और आजीविका खो दी है, जबकि उन पर घरेलू काम का बोझ भी बढ़ा है।</p><p dir="ltr">भारत में महिलाओं को मिलने वाले काम कम विकास, कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में <a href="https://indianexpress.com/article/business/female-labour-force-participation-falls-to-26-in-2018-from-36-7-in-2005-report-5617044/">सीमित हैं</a>, मुख्य रूप से कृषि आधारित या घर पर ही अनौपचारिक काम। <a href="http://www.sewa.org/Fifty-four.asp">अनुमान</a> है कि लखनऊ में 250,000 चिकनकारी और ज़रदोज़ी श्रमिक हैं - ऐसे शिल्पकार जिन्हें कढ़ाई में कौशल की आवश्यकता होती है। इन शिल्पकारों में से अधिकांश महिलाएं हैं, और लॉकडाउन के दौरान मांग घटने के साथ, अधिकांश ने नौकरी और कमाई खो दी है। </p><p dir="ltr">"लॉकडाउन के बाद से काम पूरी तरह से रुक गया है। ये महिलाएं अपने परिवार की मदद करती हैं, लेकिन वे गायब हैं," उत्तर प्रदेश की एक एक्टिविस्ट और एक एनजीओ <a href="https://napm-india.org/">नेशनल अलायंस ऑफ़ पीपुल्स मूवमेंट</a> की संयोजक, अरुंधति ध्रुव ने कहा।</p><p dir="ltr">विशेषज्ञों ने कहा कि 2018-19 में भारत के श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी आज़ादी के बाद से सबसे कम हुई है - 18.6% - <a href="https://pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=1629366"><u>आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण </u></a>2018-19 के अनुसार, महामारी का भारत में महिला रोज़गार पर गंभीर परिणाम पड़ सकता है, विशेषज्ञों ने कहा।</p><p dir="ltr">"जहां तक ​​महामारी के सामाजिक-आर्थिक असर का संबंध है, महिलाएं सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई हैं," टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ के एडवांस्ड सेंटर फ़ॉर वुमेन स्टडीज़ की पूर्व प्रोफ़ेसर, विभूति पटेल ने कहा। "यह सिर्फ बढ़े हुए देखभाल के काम के कारण नहीं है, यह हकदारी के कारण भी है - जब भी बेरोज़गारी की दर अधिक होती है, तो पुरुषों को प्राथमिकता मिलती है [नौकरियों के लिए] क्योंकि उन्हें कमाने वाला और महिलाओं को गृहिणी के रूप में देखा जाता है। आर्थिक समृद्धि के समय में, महिलाओं को अंत में काम पर रखा जाता है, और एक संकट के दौरान उन्हें पहले निकाल दिया जाता है।"</p><p dir="ltr"><br></p><p dir="ltr"><b style="color: rgb(95, 100, 104); font-family: inherit; font-size: 1.5em; background-color: rgb(255, 255, 255);">पुरुषों को तरजीह</b></p><p dir="ltr">उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां महिलाओं पर <a href="https://www.ilo.org/wcmsp5/groups/public/---asia/---ro-bangkok/---sro-new_delhi/documents/publication/wcms_614693.pdf"><u>सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतिबंध</u></a> हैं, वर्तमान संकट के प्रभाव और भी अधिक लिंग-विषम हैं, विशेषज्ञों ने कहा। 2017-18 में, शहरी क्षेत्रों में केवल 8.2% और ग्रामीण क्षेत्रों में 9.7% महिलाएं राज्य के श्रमबल में थीं। </p><p dir="ltr">इस साल मई में, उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत महिलाओं के रोज़गार के मुद्दे को हल करने के <a href="https://timesofindia.indiatimes.com/city/lucknow/rural-scheme-to-churn-out-jobs-for-women/articleshow/75863549.cms">उपायों</a> की घोषणा की। इनमें से एक <a href="https://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/up-scheme-to-attract-women-voters/articleshow/76098908.cms?from=mdr">योजना</a> राज्य की सभी 58,000 ग्राम पंचायतों में बैंकों और महिला ग्राहकों के बीच संबंधों के रूप में कार्य करने के लिए 'बैंकिंग कॉरेस्पॉन्डेंट सखी'नियुक्त करने की थी। अन्य परियोजनाओं में मास्क बनाने, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों के निर्माण और स्कूल की वर्दी की सिलाई शामिल थे।</p><p dir="ltr">"उत्तर प्रदेश, श्रम में महिलाओं की भागीदारी के मामले सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाले राज्यों में से एक रहा है। हमारे पास संख्या नहीं है, लेकिन हमें लगता है कि लॉकडाउन के बाद से भारी गिरावट आई है," नेशनल अलायंस ऑफ़ पीपुल्स मूवमेंट की अरुंधति ने कहा।</p><p dir="ltr">महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार सृजन योजना (मनरेगा) में महिलाओं की भागीदारी पर लॉकडाउन का क्या असर पड़ा, इस अनौपचारिक मूल्यांकन के लिए अरुंधति ने सीतापुर, हरदोई और उन्नाव ज़िलों का दौरा किया। उन्होंने पाया कि इस योजना के तहत काम करने वाली महिलाओं की जगह उनके पति, <a href="https://indianexpress.com/article/india/migrants-back-women-share-in-nregs-dips-to-8-year-low-6568476/">प्रवासी कामगारों</a> ने ले ली थी, जो लॉकडाउन के दौरान लाखों की संख्या में शहरों से लौटे थे। "जैसे ही पुरुष नौकरियों के लिए जाते हैं, महिलाओं के लिए दरवाज़े बंद हो जाते हैं," उन्होंने कहा।</p><p dir="ltr">उत्तर प्रदेश में <a href="https://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/over-21-lakh-migrant-labourers-have-returned-to-up-official/articleshow/76108717.cms?from=mdr">21 लाख </a>से अधिक प्रवासी श्रमिकों की घर वापसी के साथ, इस वर्ष मनरेगा के तहत काम की अभूतपूर्व मांग थी। जून में <a href="https://indianexpress.com/article/india/have-employed-57-13-lakh-under-mgnrega-up-govt-6460766/">रिपोर्ट </a>किए गए राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार, इस योजना के तहत रोज़गार देने वाले राज्यों की सूची में यूपी सबसे ऊपर है - 57 लाख श्रमिक। राजधानी लखनऊ के ठीक बाद सीतापुर ज़िले से सबसे अधिक संख्या - 191,000 थी।</p><p dir="ltr">मनरेगा का ज़्यादातर काम पुरुषों को मिलता है, सीतापुर ज़िले में महिलाओं के अधिकारों और आजीविका के मुद्दे पर काम कर रहे संगठन, <a href="https://sangtin.org/">संगतिन किसान मज़दूर संगठन</a> की ऋचा सिंह ने कहा। "महिलाओं के लिए 33% आरक्षण के प्रावधान के बावजूद, हमारे ज़िले में मनरेगा में महिला श्रमिकों का अनुपात देश में सबसे कम 5% था। अब इसमें सुधार हुआ है और यह 20% के करीब है। महिलाओं के लिए इस क्षेत्र में काम करना आसान नहीं है," उन्होंने कहा।</p><p dir="ltr">2006 में, जब देश में यह योजना शुरू की गई थी, तब सीतापुर ज़िले की 46 वर्षीय रामबेटी पहली महिला थीं जिन्होंने अपने गांव में मनरेगा के तहत काम की मांग की थी। उनके गांव, अलीपुर से अधिकांश परिवार काम के लिए शहरों की ओर पलायन करने लगे थे, लेकिन वे अपने पति और चार बच्चों के साथ वहीं रहीं। परिवार ने अपनी सात बीघा ज़मीन पर खेती करके और मनरेगा के काम से गुज़ारा किया। रामबेटी को मनरेगा के तहत एक महीने में औसतन 10 से 12 दिन का काम मिलता है। जब दिवाली से कुछ दिन पहले <b>इंडियास्पेंड</b> ने उनसे संपर्क किया, तो वह अपने गांव के बाहर एक मनरेगा साइट पर काम कर रही थीं।</p><p dir="ltr">"एक बार जब आप शहर चले जाते हैं, तो गांव में काम करना आसान नहीं होता है। आपको पंचायत के साथ काम करने के अपने अधिकार के लिए लड़ना होता है। आपको लंबी दूरी तक चलना होता है और सूरज तपिश में खड़े होकर कठिन श्रम करना होता है," रामबेटी ने कहा, जो संगतिन किसान मज़दूर संगठन के हिस्से के रूप में मनरेगा में काम करने के लिए अपने गांव की महिलाओं को जुटाती हैं। </p><p dir="ltr">रामबेटी ने जो महिलाएं जुटाई हैं, उनमें से एक सुनीता देवी हैं, जो जुलाई में जयपुर से अलीपुर लौटी थीं, जब उनके पति ने एक निजी कंपनी में अपनी नौकरी गंवा दी थी। उसके 10, सात और दो साल की उम्र के तीन बच्चे हैं, और यह पहली बार है जब उन्होंने कोई ऐसा काम किया है जिसके उन्हें पैसे मिले हैं। "मुझे खुदाई करना और कीचड़ में काम करने में बहुत मुश्किल आई, लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं है। हमारे बच्चों को शिक्षा की ज़रूरत है और मेरे पति को उनकी नौकरी वापस नहीं मिली है," उन्होंने कहा। परिवार के पास दो बीघा ज़मीन है, जिस पर वे गेहूं और मूंगफली की खेती करते हैं। "वहां पर्याप्त पानी नहीं है क्योंकि मिट्टी सूखी है और उपज कम है। यह काफ़ी नहीं है," उन्होंने कहा।</p><p dir="ltr"><br></p><p dir="ltr"><b style="color: rgb(95, 100, 104); font-family: inherit; font-size: 1.5em; background-color: rgb(255, 255, 255);">सब-कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाली महिलाओं की आमदनी घटी</b></p><p dir="ltr">भारत में जो महिलाएं <a href="https://www.ashoka.edu.in/static/doc_uploads/file_1590845004.pdf">घर से काम</a> करती हैं उन्हें काफ़ी कम मेहनताना मिलता है, अदृश्य, मगर वो घरेलू और वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। </p><p dir="ltr">भारत की श्रम श्रृंखला में वे सबसे निचले पायदान पर हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड की इस <a href="https://www.indiaspend.com/pandemic-crisis-migrant-home-based-women-workers-work-8-hours-day-for-rs-10-15/">रिपोर्ट</a> में कहा गया है। उदाहरण के लिए कपड़ा और वस्त्र उद्योग में उन्हें हर पीस के हिसाब से भुगतान किया जाता है। घर से होने वाले अन्य कामों में पापड़ और अगरबत्तियां बनाना और बीड़ी बनाना शामिल है। भारत में <a href="https://scroll.in/magazine/854568/the-stories-of-the-37-4-million-invisible-and-underpaid-home-based-workers-in-india">3.7 करोड़</a> से अधिक श्रमिक हैं जो घरों से काम करते हैं, इनमें से अधिकांश महिलाएं हैं। महामारी से पहले एक दिन में औसतन 40 से 50 रुपए कमाने वाली ये महिलाएं हाशिये पर चली गई हैं।</p><p dir="ltr">मार्च और जुलाई के बीच अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम करने वाली 15 लाख महिलाओं की यूनियन, सेल्फ़-एम्पलाइड वीमेन एसोसिएशन ने जो <a href="https://www.sewafederation.org/wp-content/uploads/2020/09/COVID-and-Co-ops_-Adovcacy-note-from-SEWA-Cooperative-Federation_Sept.-2020.pdf">आंकलन</a> किया उसके अनुसार जो महिलाएं हस्तशिल्प, सर्विस और वित्तीय क्षेत्रों में काम करती हैं उनकी आमदनी कम हो गई है क्योंकि या तो वो उद्यम पूरी तरह से बंद हो चुके हैं या फिर उन्होंने अपने कर्मचारियों की संख्या घटाकर 50% से कम कर दी है। "अनौपचारिक महिला श्रमिकों की सहायता में सामूहों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। जो इन सामूहों से जुड़े थे, इस संकट में उन्हें एक सहारा मिला," सेवा संगठन की सीनियर कोऑर्डिनेटर, सलोनी मुरलीधर हिरियुर ने कहा। </p><p dir="ltr">रानी केवल आठ साल की थीं जब उन्होंने ज़रदोज़ी का काम सीखा और अपने परिवार की मदद करनी शुरू की। इस साल उन्होंने 15 साल में पहली बार अपनी सुई का इस्तेमाल नहीं किया। </p><p dir="ltr">"मैं सात घंटे काम करती थी और मुझे 150 रुपए मिलते थे। मेरी आंखें खराब हो गई हैं क्योंकि काम बहुत जटिल है, मैं अब शायद ही ये काम कर सकूं," रानी ने बताया। रानी को उम्मीद है कि अगले साल बाजार ठी हो जाएगा और वह एक कार्यशाला खोल सकेगी।</p><i>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया </i><a href="mailto:respond@indiaspend.org"><i><u>respond@indiaspend.org</u></i></a><i> पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</i></div>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/covid-19/how-pandemic-is-pushing-women-out-of-jobs-in-up-699774</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/covid-19/how-pandemic-is-pushing-women-out-of-jobs-in-up-699774</guid>
<category><![CDATA[Covid-19,Economy,उत्तर प्रदेश,महिलाएं,रोजगार,विशेष खंड,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[सुनयना कुमार]]></dc:creator>
<pubDate>Wed, 09 Dec 2020 11:20:48 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/2020/12/09/500x300_353107-womensalon1440.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA['पुरुषों को जो कहना है कहें, मैं वही करती हूं जो मुझे करना है']]></title>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>पटना: </strong>रामवती देवी (बदला हुआ नाम) को पहली बार जब पता चला कि बिहार के एक गांव की मुखिया महिला है तो वो हैरान रह गई। “मेरी तो समझ में ही नहीं आया कि कोई महिला नेतृत्व कैसे कर सकती है। जिस गांव में उसने सारी ज़िंदगी घूंघट में जी हो वहां पुरुषों पर या प्रभावशाली जातियों पर वो कैसे हुकुम चला सकती है?” पिछले महीने <strong>इंडियास्पेंड</strong> से बात करते हुए 50 वर्षीय रामवती देवी ने कहा।</p>

<p style="text-align: justify;">साल 2006 में, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली बिहार सरकार ने राज्य की पंचायतों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण की शुरुआत की थी ताकि अधिक से अधिक महिलाएं <a href="https://www.researchgate.net/publication/319297501_Empowerment_of_Women_Representatives_in_Panchayat_Raj_Institutions_A_Thematic_Review">मुख्यधारा की</a> राजनीति में शामिल हो सकें। बिहार, देश का पहला राज्य था जहां सबसे <a href="https://www.theigc.org/wp-content/uploads/2014/09/Kumar-Prakash-2012-Working-Paper.pdf">पहले</a> महिलाओं के लिए पंचायतों में आधी सीटें आरक्षित की गई। अब जब राज्य में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के <a href="https://www.indiaspend.com/bihars-women-win-against-alcohol-but-lose-to-illicit-liquor-drugs/">2016 में शराबबंदी</a> से लेकर छात्राओं के लिए फ़्री साइकिल देने महिलाओं को लुभाने वाले फ़ैसले सरकार का भविष्य तय करेंगे। </p> 

<p style="text-align: justify;">बिहार के ग्रामीण शासन में महिलाओं के लिए आरक्षण, लिंग भेद को कम कर रहा है, इन संस्थाओं में 70,400 महिलाएं ग्रामीण बिहार के लिए फ़ैसले करती हैं, <a href="https://www.c3india.org/uploads/news/Bihar_Gender_Report_Card_2019_28th_Jan_2020_FOR_WEB_FILE.pdf">जेंडर रिपोर्ट कार्ड 2019</a> के अनुसार। पिछले 14 साल में रामवती देवी ने अपने और दूसरी महिला नेताओं में आए बदलाव को देखा है- अपने पतियों और पुरुष रिश्तेदारों की रबर स्टैम्प से लेकर स्वत्रंत आवाज़ों तक। </p>

<p style="text-align: justify;">रामवती देवी अब पटना ज़िले की एक ग्राम पंचायत की वार्ड मेम्बर हैं। उनके पास क़रीब दस साल का अनुभव है। बीते कुछ वर्षों में उन्हें एक एनजीओ के समर्थन का भी लाभ मिला है। फ़ैसले लेने में उनकी भागीदारी होती है, वह ब्लॉक स्तर की बैठकों में भाग लेती हैं और अक्सर मुखिया से मिलती हैं। “मैंने गर्भनिरोधक के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए हाल ही में वार्ड में कंडोम भी बांटे। मर्दों को जो कहना है कहते रहें, हम वही करेंगे जो  हमको करना है,” उन्होंने कहा।</p>

<p style="text-align: justify;">पटना के सात और मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले के पांच गांवों में पंचायतों के लिए चुनी गई महिलाओं से बातचीत में हमने पाया कि अभी भी, पंचायतों की अनगिनत महिला नेता अभी भी पितृसत्ता और संसाधनों की कमी से जूझ रही हैं। कई महिला नेताओं के पास अभी भी जानकारियां, ट्रेनिंग आदि नहीं है ताकि वे आत्मविश्वास से भरा निर्णय ले सकें, स्थानीय शासन में महिलाओं को सलाह देने वाले विशेषज्ञों और गैर-सरकारी संगठनों के साथ सक्रिय कार्यकर्ताओं ने <strong>इंडियास्पेंड </strong>को बताया।</p>

<p style="text-align: justify;">बिहार के जेंडर इंडिकेटर बताते हैं कि यह राज्य राष्ट्रीय औसत से पीछे है - महिला साक्षरता दर 2005-06 में 37% थी जो 2015-16 में बढ़कर 50% हो गई, लेकिन फिर भी यह राष्ट्रीय औसत, 68.4% से कम है। <a href="http://rchiips.org/nfhs/pdf/NFHS4/BR_FactSheet.pdf">राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16</a> के अनुसार। श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी सभी राज्यों में सबसे ख़राब है। इसकी दर राष्ट्रीय औसत, 23.3% की तुलना में 4.1% है, नेशनल सैंपल सर्वे <a href="http://www.mospi.gov.in/sites/default/files/publication_reports/Annual%20Report%2C%20PLFS%202017-18_31052019.pdf">2017</a> के अनुसार।</p>

<iframe style="display:block;" src="https://e.infogram.com/bceb5805-6546-4ca8-b23d-5c557cb6c9fc?src=embed" title="Bihar_Women" width="620" height="820" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe>

<p style="text-align: justify;">"महिलाओं के नाम सिस्टम में तो आ गए हैं, लेकिन उनकी आवाज़ अभी भी अनसुनी है," पटना में परसा बाज़ार की एक सामाजिक कार्यकर्ता प्रतिमा कुमारी पासवान ने कहा। प्रतिमा, राज्य में हो रहे विधानसभा चुनाव में फुलवारी शरीफ़ निर्वाचन क्षेत्र से एक निर्दलीय उम्मीदवार हैं।</p>

<p style="text-align: justify;"><strong>पंचायतों में शामिल होने के बावजूद राजनीति में कम महिलाएं</strong></p>

<p style="text-align: justify;">लैंगिक रूढ़ियों, मनोवैज्ञानिक और पारंपरिक बाधाओं, और शिक्षा, प्रशिक्षण और संसाधनों में असमानताओं के कारण दुनिया में हर जगह राजनीति में महिलाओं की भागीदारी <a href="https://www.un.org/womenwatch/osagi/wps/publication/WomenAndElections.pdf">सीमित</a> है। पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण से महिलाओं के सशक्त होने और राजनीति में नेता और वोटर के तौर पर उनकी भागीदारी में सुधार की <a href="https://www.researchgate.net/publication/319297501_Empowerment_of_Women_Representatives_in_Panchayat_Raj_Institutions_A_Thematic_Review">उम्मीद</a> थी।</p>

<p style="text-align: justify;">हालांकि बिहार में वोट देने वाली महिलाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन कुल मिलाकर राज्य की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम है। इसका पता राजनैतिक पार्टियों के उम्मीदवारों की सूची से लगाया जा सकता है। नीतीश कुमार की अगुवाई वाले जनता दल (यूनाइटेड) ने 78 में से 18% सीटों पर महिला उम्मीदवारों को उतारा है, जो कि पहले दो चरणों में चुनाव लड़ रही हैं। जेडीयू की मुख्य प्रतिद्वंद्वी, राष्ट्रीय जनता दल ने 97 में से 14.4% महिलाओं को टिकट दिया है, चुनाव आयोग के शुरु के दो चरणों के आंकड़ों के अनुसार। इन आंकड़ों का <a href="https://myneta.info/Bihar2020/index.php?action=summary&amp;subAction=women_candidate&amp;sort=candidate#summary">संकलन और विश्लेषण</a> एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स ने किया है। अन्य पार्टियों में, लोक जनशक्ति ने 93 में से 16% सीटों पर, भारतीय जनता पार्टी ने 75 में से 9% सीटों पर, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 45 में से 9% सीटों पर और वामपंथी पार्टियों सीपीआई, सीपीआई (एम) और सीपीआई (एमएल) ने 22 में से 4.5% सीटों पर महिला उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं।</p>

<iframe style="display:block;" src="https://e.infogram.com/688c6dd6-ef18-4042-9cd6-425428d6539c?src=embed" title="Bihar_Women_Contestants" width="620" height="760" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe>

<p style="text-align: justify;">राज्य की निवर्तमान विधानसभा के 240 सदस्यों में से <a href="https://adrindia.org/content/bihar-assembly-election-2015-analysis-criminal-background-financial-education-gender-and">12%</a> महिलाएं हैं, 2010-2015 की विधानसभा की तुलना में कम। पिछली विधानसभा में <a href="http://www.vidhansabha.bih.nic.in/pdf/former%20women%20member/15.pdf">14%</a> सदस्य महिलाएं थीं।</p>

<p style="text-align: justify;">बिहार में 50% महिलाएं साक्षर हैं, एनएफ़एचएस-2015-16 के <a href="http://rchiips.org/nfhs/pdf/NFHS4/BR_FactSheet.pdf">आंकड़ों</a> के अनुसार। ग्राम पंचायत की सदस्य के रूप में चुनी गई ज़्यादातर महिलाएं न्यूनतम शिक्षा, कम या बिना राजनीतिक अनुभव वाली होती हैं, और उनकी भूमिका या उसके द्वारा किए जाने वाले कार्यक्रमों और परियोजनाओं के बारे में उन्हें बहुत कम जानकारी होती है, विशेषज्ञों ने बताया। महिलाओं की तुलना में पुरष इन सभी पैमानों पर उनसे आगे हैं। दरअसल सामाजिक-राजनीतिक प्रणाली उनके पक्ष में है, जिससे वो बेहतर शिक्षा हासिल कर पाते हैं और राजनीति में बेहतर मुकाम हासिल कर पाते हैं।</p>

<p style="text-align: justify;">तमिलनाडु में महिला पंचायत प्रमुखों के सामने आने वाली चुनौतियों का अध्ययन करने के लिए हुई <strong>इंडियास्पेंड</strong> छह भाग की <a href="https://www.indiaspend.com/the-triumph-of-sharmila-devi-and-tamil-nadus-women-leaders-34320/">श्रृंखला</a> के दौरान हमने पाया था कि महिलाओं को अक्सर जातिवाद, वित्तीय बाधाओं, लिंगभेद और हिंसा का सामना करना पड़ता है। उनका सार्वजनिक जीवन उनके कार्यकाल के साथ ख़त्म हो जाता है, बिना किसी अन्य प्रशासनिक भूमिका या मुख्यधारा की राजनीति में कोई जगह बनाए बिना- जो अक्सर पुरुषों के लिए आसानी से उपलब्ध हो जाता है।</p>

<iframe style="display:block;" width="560" height="315" src="https://www.youtube.com/embed/eT3u5URpjQQ" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture" allowfullscreen></iframe>

<p style="text-align: justify;"><strong>प्रशिक्षण और सलाहकारों की ज़रूरत </strong></p>

<p style="text-align: justify;">साल 1993 में संविधान में <a href="https://niti.gov.in/planningcommission.gov.in/docs/reports/sereport/ser/bihinter/st_bihch11.pdf">73वां संशोधन</a> कर संसद में महिला आरक्षण बिल लाया गया। देश के कई राज्यों में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित कर दी गई, <a href="https://www.theigc.org/wp-content/uploads/2014/09/Kumar-Prakash-2012-Working-Paper.pdf">संशोधन के मुताबिक़</a> कम से कम। बिहार ने सबसे ज़्यादा, 50% सीटें आरक्षित की। उसके बाद 19 अन्य राज्यों ने भी 50% आरक्षण की <a href="https://www.panchayat.gov.in/reservation-of-women-in-pris">पेशकश</a> की।</p>

<p style="text-align: justify;">चूंकि गांवों में अभी भी सामाजिक और राजनीतिक नेटवर्क का नियंत्रण पुरुषों के पास है, महिला मुखिया अक्सर वास्तविक निर्णय लेने वालों की रबर स्टैम्प बनकर रह जाती हैं -- पति या परिवार के अन्य पुरुषों के लिए -- जैसा कि <a href="https://www.c3india.org/takeastand-pahel">तमाम दस्तावेज़ों में</a> दर्ज है। हमने पाया कि अधिकांश महिला नेता अभी भी महत्वपूर्ण मुद्दों पर मार्गदर्शन के लिए पुरुषों की ओर देखती हैं।</p>

<p style="text-align: justify;">“जब भी महिला मुखियाओं को आधिकारिक बैठकों के लिए बुलाया जाना होता है, तब भी पत्र <em>मुखियापति </em>को संबोधित किया जाता है । इस व्यवस्था से सिस्टम को कोई समस्या नहीं है,” पटना के मसौरही ब्लॉक में <a href="https://lokmadhyam.com/about/">लोकमध्यम</a> नाम के एनजीओ से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता, प्रमिला कुमारी ने कहा। </p>

<p style="text-align: justify;">इनमें से कुछ महिलाओं में 2016 के आसपास बदलाव आने लगा, 50% आरक्षण के कदम के एक दशक बाद, जब कई महिलाएं दूसरी बार चुनाव लड़ रही थीं, उन्होंने कहा, और स्वतंत्र निर्णय लेने वाली महिला पंचायत प्रमुखों के भी उदाहरण थे। "लेकिन अब भी मैं उनकी संख्या को मात्र 15% पर रखूंगी और इनमें से अधिकांश महिलाओं को विभिन्न ग़ैर सरकारी संगठनों या सहायता समूहों से कुछ बाहरी मार्गदर्शन मिलता है," उन्होंने कहा।</p>

<p style="text-align: justify;">शिक्षा, डिजिटल साक्षरता और प्रशिक्षण की कमी एक महिला के निवेश के निर्णयों और निगरानी क्षमताओं को पंचायत प्रमुख के रूप में सीमित कर सकती है, लेकिन प्रशिक्षण और सही सलाह के ज़रिए इसे बदला जा सकता है, महिला पंचायत सदस्यों के साथ काम करने वाली संस्थाओं से जुड़ी, मधु जोशी ने कहा। </p>

<p style="text-align: justify;">“ये महिलाएं आरक्षण के कारण चुनी जाती हैं। यहां तक ​​कि मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट तक उनकी पहुंच और उसका उपयोग इनके लिए सीमित है। इसके अलावा, उन्हें परिवार के भीतर और समुदाय में पितृसत्ता की बाधाओं से भी जूझना होता है,” मधु जोशी ने कहा। "इन महिला नेताओं को खुद को मुखर करने के लिए सलाह, प्रदर्शन और सामूहिक प्लेटफार्मों की आवश्यकता है।"</p>

<p style="text-align: justify;"><strong>'अगर मुझसे बात ही नहीं करेंगे तो मैं सीखूंगी कैसे?'</strong></p>

<p style="text-align: justify;">56 साल की रेणु देवी की पटना जिले की तिनेरि  पंचायत की मुखिया हैं। वह एक पक्के मकान में रहती हैं, जिसमें एक तरफ़ एक दीवार है ताकि उस तरफ़ रहने वाले मुसहर समुदाय के लोगों को दूर रखा जा सके। मुसहर समुदाय, दलितों के बीच सबसे अधिक हाशिए पर रहने वाला समुदाय है । दरवाज़े के अंदर, एक बोर्ड पर रेणु देवी का नाम लिखा है, मुखिया की मीटिंग के लिए एक कुर्सी और टेबल है, आने वालों के लिए प्लास्टिक की लाल कुर्सियां हैं।</p>

<p style="text-align: justify;">जब हम उनसे मिलने गए, तो रेणु देवी ने घोषणा की कि उनके पति बाहर हैं और यह सुनकर आश्चर्यचकित हुईं  कि हम उनसे मिलने आए हैं। वह प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठने के लिए आगे बढ़ी। वह मुखिया की कुर्सी पर क्यों नहीं बैठीं, हमने पूछा। क्योंकि वह [असली] मुखिया नहीं हैं, उन्होंने जवाब दिया।</p>

<p style="text-align: justify;">दाई की सहायता से ज़मीन पर अपने बच्चों को जन्म देने को याद करते हुए, उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने पति को सुझाव दिया था कि गांव के आंगनबाड़ी केंद्र में महिलाओं के लिए प्रसवपूर्व देखभाल को और अधिक सुलभ बनाया जाए। "मैंने उनसे कहा, लेकिन कौन सुनता है, पुरुषों को इन समस्याओं से कोई मतलब नहीं है," उन्होंने कहा लेकिन तुरंत ही बात बदल दी। "वैसे भी वो अधिक शिक्षित हैं, वो बेहतर जानते होंगे, वो हमेशा सही काम करते हैं।"</p>

<p style="text-align: justify;">प्रमिला कुमारी ने कहा कि इस अंतर का कारण यह है कि महिलाओं को शायद ही कभी आत्मविश्वास या खुद को महत्व देना सिखाया जाता है। "महिलाओं के परिवार के लोग उन्हें लगातार याद दिलाते हैं कि वे कितनी मूर्ख, अयोग्य और अनुभवहीन हैं, उन्हें सिखाया जाता है कि सामने न आएं," उन्होंने कहा। "पुरुष यह भी सुनिश्चित करते हैं कि उनकी पत्नियों के पास बस थोड़ी सी ही शक्ति या स्वतंत्रता रहे, इसलिए इन महिलाओं के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र होना और कामकाज संभालना बहुत मुश्किल है।"</p>

<p style="text-align: justify;">जो महिला मुखिया बुलंद हैं, वो भी शिकायत करती हैं कि ब्लॉक अधिकारी उन्हें गंभीरता से नहीं लते हैं। "उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी थी, उन्होंने मेरे पति से पूछा और मेरे सुझावों पर ध्यान नहीं दिया। उनकी धारणा यह थी कि मुझे कुछ समझ नहीं आएगा और मैं केवल आरक्षण की वजह से जीती हूं," पटना की चपौर पंचायत की मुखिया, अनामिका देवी (40) ने कहा। "अगर वे मुझसे बात ही नहीं करेंगे तो मैं कुछ भी कैसे सीखूंगी?"</p>

<p style="text-align: justify;">समय लगा लेकिन लोगों ने अनामिका देवी को सुनना शुरू कर दिया क्योंकि "उन्हें पता है कि मैं काम करवा सकती हूं इसलिए उन्हें भी मेरी बात सुननी पड़ती है, यहां तक कि प्रभावशाली जातियों के लोगों को भी बात सुननी पड़ती है"। चपौर पंचायत में प्रभावशाली जातियों के तीन पुरुष और दो महिला वार्ड मेम्बर हैं।</p>

<p style="text-align: justify;">"सिस्टम विशेष रूप से पिछड़ी जातियों की महिलाओं के ख़िलाफ है," सामाजिक कार्यकर्ता प्रतिमा कुमारी पासवान ने कहा।  "उन्हें लगता है कि वह आसानी से इन महिलाओं भयभीत और उनकी बात सुनने के लिए मजबूर कर सकते हैं।"</p>

<p style="text-align: justify;">तमिलनाडु के कुड्डालोर ज़िले की एक हालिया <a href="https://www.newindianexpress.com/states/tamil-nadu/2020/oct/10/woman-dalit-panchayat-chief-humiliated-by-junior-in-cuddalore-two-arrested-2208597.html">रिपोर्ट</a> से पता चला है कि एक दलित महिला पंचायत के प्रमुख एस राजेश्वरी को मीटिंग के दौरान फ़र्श पर बैठने के लिए कहा गया, जबकि बाकी लोग कुर्सियों पर बैठे थे। पटना की तिनेरी पंचायत की वार्ड सदस्य सुनीता कुमारी, अपने शुरुआती वर्षों में इसी तरह के अनुभवों के बारे में बताया। "जब मैं जीतने के बाद ग्राम सभा की पहली मीटिंग में शामिल हुई, तो भूमिहार [प्रभावशाली जाति] मुखिया ने मुझे वार्ड सदस्य होने के बावजूद फर्श पर बैठने के लिए कहा, मैंने उनसे कहा कि मैं फ़र्श पर नहीं बैठूंगी, आपके साथ बैठने का मेरा अधिकार है,” रेणु देवी के पति की तरफ़ इशारा करते हुए उन्होंने कहा। उस समय रेणु देवी के पति मुखिया थे।</p>

<p style="text-align: justify;"><strong>महिलाएं बेहतर सुविधाएं सुनिश्चित करती हैं</strong></p>

<p style="text-align: justify;">एक <a href="http://economics.mit.edu/files/769">रिसर्च</a> से पता चला है कि महिलाओं के लिए आरक्षित पंचायतों में सार्वजनिक सुविधाओं जैसे पेयजल, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, उचित मूल्य की दुकानों आदि की बेहतर उपलब्धता देखने को मिली है।</p>

<p style="text-align: justify;">"हमारे घर में लंबे समय तक नल का पानी नहीं था, हम मांग करते थे लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।" मसौढ़ी ब्लॉक की 40 वर्षीय लीला देवी ने कहा। “तब मुझे एहसास हुआ - जो मेरा अधिकार है उसके लिए मुझे बार-बार क्यों मांग करनी? इसलिए मैंने चुनाव लड़ा और वार्ड सदस्य बन गई और सबसे पहले मैंने स्वीकृत धनराशि से अपने वार्ड में हर घर में नल का पानी पहुंचाने का काम किया।”</p>

<p style="text-align: justify;">महिला नेता बुनियादी सेवाओं को प्राथमिकता देती हैं, सेंटर फ़ॉर केटेलाइज़िंग चेंज के 2015 में हुए एक <a href="https://www.c3india.org/uploads/news/Pahel_-_Women_Leading_Change.pdf">अध्ययन</a> के अनुसार। “जब मैं स्कूल में थी, तब हमारी क्लास में केवल दो लड़कियां थीं, किसी ने भी हमें पोषण, मासिक धर्म या परिवार नियोजन के बारे में नहीं बताया। मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटी उसी तरह से बड़ी हो, जैसे मैं हुई, ” नाम न बताने की शर्त पर एक महिला मुखिया ने कहा। अब वह स्थानीय स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्रों के साथ बात कर रही हैं ताकि किशोरियों के लिए मुफ़्त सेनेटरी पैड उपलब्ध हो सकें।</p>

<p style="text-align: justify;">हालांकि,महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (<a href="https://nrega.nic.in/netnrega/home.aspx">मनरेगा</a>) के तहत कार्यान्वित परियोजनाओं पर महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व के प्रभाव का आकलन करने वाले एक <a href="https://econpapers.repec.org/paper/indisipdp/13-02.htm">अध्ययन</a> में पाया गया कि जिन पंचायतों की मुखिया महिला हैं वहां इन कार्यक्रमों में ज़्यादा अनियमितताएं पाई गईं।</p>

<p style="text-align: justify;">"यह भी याद रखना भी ज़रूरी है कि महिलाएं वित्तीय और डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण विवश हैं, जो काफ़ी हद तक उन्हें शक्तिशाली लोगों के साथ उलझने और उन्हें चुनौती देने में रुकावट है," मधु जोशी ने कहा, "हालांकि, अध्ययन से यह भी पता चलता है कि महिलाओं का अनुभव जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, शासन में सुधार होता जाता है।"</p>

<p style="text-align: justify;">"आरक्षण महिला मतदाताओं को खुश करने के लिए एक राजनैतिक कदम था, लेकिन राज्य में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी भी बड़ी संख्या में बढ़ रही है," सामाजिक कार्यकर्ता प्रतिमा कुमारी पासवान ने कहा। साल 2000 तक पुरुषों और महिलाओं के बीच मतदान का अंतर <a href="https://www.livemint.com/Politics/vwjDtQWrXgL75CCmh1mkdN/Women-voters-behind-Nitishs-success.html">20%</a> (पुरुषों के पक्ष में) था लेकिन 2015 के चुनाव में महिलाओं का <a href="https://eci.gov.in/files/file/3904-bihar-2015/">मतदान</a> 60% था जबकि पुरुषों का मतदान 53% रहा। </p>

<p style="text-align: justify;"><em>(</em><strong>साधिका</strong><em>, </em><strong>इंडियास्पेंड</strong> के साथ प्रिन्सिपल कॉरेस्पॉंडेंट हैं।<em>)</em></p>

<p style="text-align: justify;"><em>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</em></p>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/पुरुषों-को-जो-कहना-है-कहें/</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/पुरुषों-को-जो-कहना-है-कहें/</guid>
<category><![CDATA[कवर स्टोरी,जेंडरचेक,नवीनतम रिपोर्ट,महिलाएं]]></category>
<dc:creator><![CDATA[साधिका तिवारी]]></dc:creator>
<pubDate>Tue, 03 Nov 2020 11:31:37 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/old_images/500x300_352461-sunita-devi1440.jpg]]></image>
</item>
<item>
<title><![CDATA['पुरुषों को जो कहना है कहें, मैं वही करती हूं जो मुझे करना है']]></title>
<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>पटना: </strong>रामवती देवी (बदला हुआ नाम) को पहली बार जब पता चला कि बिहार के एक गांव की मुखिया महिला है तो वो हैरान रह गई। “मेरी तो समझ में ही नहीं आया कि कोई महिला नेतृत्व कैसे कर सकती है। जिस गांव में उसने सारी ज़िंदगी घूंघट में जी हो वहां पुरुषों पर या प्रभावशाली जातियों पर वो कैसे हुकुम चला सकती है?” पिछले महीने <strong>इंडियास्पेंड</strong> से बात करते हुए 50 वर्षीय रामवती देवी ने कहा।</p>

<p style="text-align: justify;">साल 2006 में, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली बिहार सरकार ने राज्य की पंचायतों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण की शुरुआत की थी ताकि अधिक से अधिक महिलाएं <a href="https://www.researchgate.net/publication/319297501_Empowerment_of_Women_Representatives_in_Panchayat_Raj_Institutions_A_Thematic_Review">मुख्यधारा की</a> राजनीति में शामिल हो सकें। बिहार, देश का पहला राज्य था जहां सबसे <a href="https://www.theigc.org/wp-content/uploads/2014/09/Kumar-Prakash-2012-Working-Paper.pdf">पहले</a> महिलाओं के लिए पंचायतों में आधी सीटें आरक्षित की गई। अब जब राज्य में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के <a href="https://www.indiaspend.com/bihars-women-win-against-alcohol-but-lose-to-illicit-liquor-drugs/">2016 में शराबबंदी</a> से लेकर छात्राओं के लिए फ़्री साइकिल देने महिलाओं को लुभाने वाले फ़ैसले सरकार का भविष्य तय करेंगे। </p> 

<p style="text-align: justify;">बिहार के ग्रामीण शासन में महिलाओं के लिए आरक्षण, लिंग भेद को कम कर रहा है, इन संस्थाओं में 70,400 महिलाएं ग्रामीण बिहार के लिए फ़ैसले करती हैं, <a href="https://www.c3india.org/uploads/news/Bihar_Gender_Report_Card_2019_28th_Jan_2020_FOR_WEB_FILE.pdf">जेंडर रिपोर्ट कार्ड 2019</a> के अनुसार। पिछले 14 साल में रामवती देवी ने अपने और दूसरी महिला नेताओं में आए बदलाव को देखा है- अपने पतियों और पुरुष रिश्तेदारों की रबर स्टैम्प से लेकर स्वत्रंत आवाज़ों तक। </p>

<p style="text-align: justify;">रामवती देवी अब पटना ज़िले की एक ग्राम पंचायत की वार्ड मेम्बर हैं। उनके पास क़रीब दस साल का अनुभव है। बीते कुछ वर्षों में उन्हें एक एनजीओ के समर्थन का भी लाभ मिला है। फ़ैसले लेने में उनकी भागीदारी होती है, वह ब्लॉक स्तर की बैठकों में भाग लेती हैं और अक्सर मुखिया से मिलती हैं। “मैंने गर्भनिरोधक के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए हाल ही में वार्ड में कंडोम भी बांटे। मर्दों को जो कहना है कहते रहें, हम वही करेंगे जो  हमको करना है,” उन्होंने कहा।</p>

<p style="text-align: justify;">पटना के सात और मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले के पांच गांवों में पंचायतों के लिए चुनी गई महिलाओं से बातचीत में हमने पाया कि अभी भी, पंचायतों की अनगिनत महिला नेता अभी भी पितृसत्ता और संसाधनों की कमी से जूझ रही हैं। कई महिला नेताओं के पास अभी भी जानकारियां, ट्रेनिंग आदि नहीं है ताकि वे आत्मविश्वास से भरा निर्णय ले सकें, स्थानीय शासन में महिलाओं को सलाह देने वाले विशेषज्ञों और गैर-सरकारी संगठनों के साथ सक्रिय कार्यकर्ताओं ने <strong>इंडियास्पेंड </strong>को बताया।</p>

<p style="text-align: justify;">बिहार के जेंडर इंडिकेटर बताते हैं कि यह राज्य राष्ट्रीय औसत से पीछे है - महिला साक्षरता दर 2005-06 में 37% थी जो 2015-16 में बढ़कर 50% हो गई, लेकिन फिर भी यह राष्ट्रीय औसत, 68.4% से कम है। <a href="http://rchiips.org/nfhs/pdf/NFHS4/BR_FactSheet.pdf">राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16</a> के अनुसार। श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी सभी राज्यों में सबसे ख़राब है। इसकी दर राष्ट्रीय औसत, 23.3% की तुलना में 4.1% है, नेशनल सैंपल सर्वे <a href="http://www.mospi.gov.in/sites/default/files/publication_reports/Annual%20Report%2C%20PLFS%202017-18_31052019.pdf">2017</a> के अनुसार।</p>

<iframe style="display:block;" src="https://e.infogram.com/bceb5805-6546-4ca8-b23d-5c557cb6c9fc?src=embed" title="Bihar_Women" width="620" height="820" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe>

<p style="text-align: justify;">"महिलाओं के नाम सिस्टम में तो आ गए हैं, लेकिन उनकी आवाज़ अभी भी अनसुनी है," पटना में परसा बाज़ार की एक सामाजिक कार्यकर्ता प्रतिमा कुमारी पासवान ने कहा। प्रतिमा, राज्य में हो रहे विधानसभा चुनाव में फुलवारी शरीफ़ निर्वाचन क्षेत्र से एक निर्दलीय उम्मीदवार हैं।</p>

<p style="text-align: justify;"><strong>पंचायतों में शामिल होने के बावजूद राजनीति में कम महिलाएं</strong></p>

<p style="text-align: justify;">लैंगिक रूढ़ियों, मनोवैज्ञानिक और पारंपरिक बाधाओं, और शिक्षा, प्रशिक्षण और संसाधनों में असमानताओं के कारण दुनिया में हर जगह राजनीति में महिलाओं की भागीदारी <a href="https://www.un.org/womenwatch/osagi/wps/publication/WomenAndElections.pdf">सीमित</a> है। पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण से महिलाओं के सशक्त होने और राजनीति में नेता और वोटर के तौर पर उनकी भागीदारी में सुधार की <a href="https://www.researchgate.net/publication/319297501_Empowerment_of_Women_Representatives_in_Panchayat_Raj_Institutions_A_Thematic_Review">उम्मीद</a> थी।</p>

<p style="text-align: justify;">हालांकि बिहार में वोट देने वाली महिलाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन कुल मिलाकर राज्य की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम है। इसका पता राजनैतिक पार्टियों के उम्मीदवारों की सूची से लगाया जा सकता है। नीतीश कुमार की अगुवाई वाले जनता दल (यूनाइटेड) ने 78 में से 18% सीटों पर महिला उम्मीदवारों को उतारा है, जो कि पहले दो चरणों में चुनाव लड़ रही हैं। जेडीयू की मुख्य प्रतिद्वंद्वी, राष्ट्रीय जनता दल ने 97 में से 14.4% महिलाओं को टिकट दिया है, चुनाव आयोग के शुरु के दो चरणों के आंकड़ों के अनुसार। इन आंकड़ों का <a href="https://myneta.info/Bihar2020/index.php?action=summary&amp;subAction=women_candidate&amp;sort=candidate#summary">संकलन और विश्लेषण</a> एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स ने किया है। अन्य पार्टियों में, लोक जनशक्ति ने 93 में से 16% सीटों पर, भारतीय जनता पार्टी ने 75 में से 9% सीटों पर, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 45 में से 9% सीटों पर और वामपंथी पार्टियों सीपीआई, सीपीआई (एम) और सीपीआई (एमएल) ने 22 में से 4.5% सीटों पर महिला उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं।</p>

<iframe style="display:block;" src="https://e.infogram.com/688c6dd6-ef18-4042-9cd6-425428d6539c?src=embed" title="Bihar_Women_Contestants" width="620" height="760" scrolling="no" frameborder="0" style="border:none;" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe>

<p style="text-align: justify;">राज्य की निवर्तमान विधानसभा के 240 सदस्यों में से <a href="https://adrindia.org/content/bihar-assembly-election-2015-analysis-criminal-background-financial-education-gender-and">12%</a> महिलाएं हैं, 2010-2015 की विधानसभा की तुलना में कम। पिछली विधानसभा में <a href="http://www.vidhansabha.bih.nic.in/pdf/former%20women%20member/15.pdf">14%</a> सदस्य महिलाएं थीं।</p>

<p style="text-align: justify;">बिहार में 50% महिलाएं साक्षर हैं, एनएफ़एचएस-2015-16 के <a href="http://rchiips.org/nfhs/pdf/NFHS4/BR_FactSheet.pdf">आंकड़ों</a> के अनुसार। ग्राम पंचायत की सदस्य के रूप में चुनी गई ज़्यादातर महिलाएं न्यूनतम शिक्षा, कम या बिना राजनीतिक अनुभव वाली होती हैं, और उनकी भूमिका या उसके द्वारा किए जाने वाले कार्यक्रमों और परियोजनाओं के बारे में उन्हें बहुत कम जानकारी होती है, विशेषज्ञों ने बताया। महिलाओं की तुलना में पुरष इन सभी पैमानों पर उनसे आगे हैं। दरअसल सामाजिक-राजनीतिक प्रणाली उनके पक्ष में है, जिससे वो बेहतर शिक्षा हासिल कर पाते हैं और राजनीति में बेहतर मुकाम हासिल कर पाते हैं।</p>

<p style="text-align: justify;">तमिलनाडु में महिला पंचायत प्रमुखों के सामने आने वाली चुनौतियों का अध्ययन करने के लिए हुई <strong>इंडियास्पेंड</strong> छह भाग की <a href="https://www.indiaspend.com/the-triumph-of-sharmila-devi-and-tamil-nadus-women-leaders-34320/">श्रृंखला</a> के दौरान हमने पाया था कि महिलाओं को अक्सर जातिवाद, वित्तीय बाधाओं, लिंगभेद और हिंसा का सामना करना पड़ता है। उनका सार्वजनिक जीवन उनके कार्यकाल के साथ ख़त्म हो जाता है, बिना किसी अन्य प्रशासनिक भूमिका या मुख्यधारा की राजनीति में कोई जगह बनाए बिना- जो अक्सर पुरुषों के लिए आसानी से उपलब्ध हो जाता है।</p>

<iframe style="display:block;" width="560" height="315" src="https://www.youtube.com/embed/eT3u5URpjQQ" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture" allowfullscreen></iframe>

<p style="text-align: justify;"><strong>प्रशिक्षण और सलाहकारों की ज़रूरत </strong></p>

<p style="text-align: justify;">साल 1993 में संविधान में <a href="https://niti.gov.in/planningcommission.gov.in/docs/reports/sereport/ser/bihinter/st_bihch11.pdf">73वां संशोधन</a> कर संसद में महिला आरक्षण बिल लाया गया। देश के कई राज्यों में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित कर दी गई, <a href="https://www.theigc.org/wp-content/uploads/2014/09/Kumar-Prakash-2012-Working-Paper.pdf">संशोधन के मुताबिक़</a> कम से कम। बिहार ने सबसे ज़्यादा, 50% सीटें आरक्षित की। उसके बाद 19 अन्य राज्यों ने भी 50% आरक्षण की <a href="https://www.panchayat.gov.in/reservation-of-women-in-pris">पेशकश</a> की।</p>

<p style="text-align: justify;">चूंकि गांवों में अभी भी सामाजिक और राजनीतिक नेटवर्क का नियंत्रण पुरुषों के पास है, महिला मुखिया अक्सर वास्तविक निर्णय लेने वालों की रबर स्टैम्प बनकर रह जाती हैं -- पति या परिवार के अन्य पुरुषों के लिए -- जैसा कि <a href="https://www.c3india.org/takeastand-pahel">तमाम दस्तावेज़ों में</a> दर्ज है। हमने पाया कि अधिकांश महिला नेता अभी भी महत्वपूर्ण मुद्दों पर मार्गदर्शन के लिए पुरुषों की ओर देखती हैं।</p>

<p style="text-align: justify;">“जब भी महिला मुखियाओं को आधिकारिक बैठकों के लिए बुलाया जाना होता है, तब भी पत्र <em>मुखियापति </em>को संबोधित किया जाता है । इस व्यवस्था से सिस्टम को कोई समस्या नहीं है,” पटना के मसौरही ब्लॉक में <a href="https://lokmadhyam.com/about/">लोकमध्यम</a> नाम के एनजीओ से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता, प्रमिला कुमारी ने कहा। </p>

<p style="text-align: justify;">इनमें से कुछ महिलाओं में 2016 के आसपास बदलाव आने लगा, 50% आरक्षण के कदम के एक दशक बाद, जब कई महिलाएं दूसरी बार चुनाव लड़ रही थीं, उन्होंने कहा, और स्वतंत्र निर्णय लेने वाली महिला पंचायत प्रमुखों के भी उदाहरण थे। "लेकिन अब भी मैं उनकी संख्या को मात्र 15% पर रखूंगी और इनमें से अधिकांश महिलाओं को विभिन्न ग़ैर सरकारी संगठनों या सहायता समूहों से कुछ बाहरी मार्गदर्शन मिलता है," उन्होंने कहा।</p>

<p style="text-align: justify;">शिक्षा, डिजिटल साक्षरता और प्रशिक्षण की कमी एक महिला के निवेश के निर्णयों और निगरानी क्षमताओं को पंचायत प्रमुख के रूप में सीमित कर सकती है, लेकिन प्रशिक्षण और सही सलाह के ज़रिए इसे बदला जा सकता है, महिला पंचायत सदस्यों के साथ काम करने वाली संस्थाओं से जुड़ी, मधु जोशी ने कहा। </p>

<p style="text-align: justify;">“ये महिलाएं आरक्षण के कारण चुनी जाती हैं। यहां तक ​​कि मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट तक उनकी पहुंच और उसका उपयोग इनके लिए सीमित है। इसके अलावा, उन्हें परिवार के भीतर और समुदाय में पितृसत्ता की बाधाओं से भी जूझना होता है,” मधु जोशी ने कहा। "इन महिला नेताओं को खुद को मुखर करने के लिए सलाह, प्रदर्शन और सामूहिक प्लेटफार्मों की आवश्यकता है।"</p>

<p style="text-align: justify;"><strong>'अगर मुझसे बात ही नहीं करेंगे तो मैं सीखूंगी कैसे?'</strong></p>

<p style="text-align: justify;">56 साल की रेणु देवी की पटना जिले की तिनेरि  पंचायत की मुखिया हैं। वह एक पक्के मकान में रहती हैं, जिसमें एक तरफ़ एक दीवार है ताकि उस तरफ़ रहने वाले मुसहर समुदाय के लोगों को दूर रखा जा सके। मुसहर समुदाय, दलितों के बीच सबसे अधिक हाशिए पर रहने वाला समुदाय है । दरवाज़े के अंदर, एक बोर्ड पर रेणु देवी का नाम लिखा है, मुखिया की मीटिंग के लिए एक कुर्सी और टेबल है, आने वालों के लिए प्लास्टिक की लाल कुर्सियां हैं।</p>

<p style="text-align: justify;">जब हम उनसे मिलने गए, तो रेणु देवी ने घोषणा की कि उनके पति बाहर हैं और यह सुनकर आश्चर्यचकित हुईं  कि हम उनसे मिलने आए हैं। वह प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठने के लिए आगे बढ़ी। वह मुखिया की कुर्सी पर क्यों नहीं बैठीं, हमने पूछा। क्योंकि वह [असली] मुखिया नहीं हैं, उन्होंने जवाब दिया।</p>

<p style="text-align: justify;">दाई की सहायता से ज़मीन पर अपने बच्चों को जन्म देने को याद करते हुए, उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने पति को सुझाव दिया था कि गांव के आंगनबाड़ी केंद्र में महिलाओं के लिए प्रसवपूर्व देखभाल को और अधिक सुलभ बनाया जाए। "मैंने उनसे कहा, लेकिन कौन सुनता है, पुरुषों को इन समस्याओं से कोई मतलब नहीं है," उन्होंने कहा लेकिन तुरंत ही बात बदल दी। "वैसे भी वो अधिक शिक्षित हैं, वो बेहतर जानते होंगे, वो हमेशा सही काम करते हैं।"</p>

<p style="text-align: justify;">प्रमिला कुमारी ने कहा कि इस अंतर का कारण यह है कि महिलाओं को शायद ही कभी आत्मविश्वास या खुद को महत्व देना सिखाया जाता है। "महिलाओं के परिवार के लोग उन्हें लगातार याद दिलाते हैं कि वे कितनी मूर्ख, अयोग्य और अनुभवहीन हैं, उन्हें सिखाया जाता है कि सामने न आएं," उन्होंने कहा। "पुरुष यह भी सुनिश्चित करते हैं कि उनकी पत्नियों के पास बस थोड़ी सी ही शक्ति या स्वतंत्रता रहे, इसलिए इन महिलाओं के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र होना और कामकाज संभालना बहुत मुश्किल है।"</p>

<p style="text-align: justify;">जो महिला मुखिया बुलंद हैं, वो भी शिकायत करती हैं कि ब्लॉक अधिकारी उन्हें गंभीरता से नहीं लते हैं। "उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी थी, उन्होंने मेरे पति से पूछा और मेरे सुझावों पर ध्यान नहीं दिया। उनकी धारणा यह थी कि मुझे कुछ समझ नहीं आएगा और मैं केवल आरक्षण की वजह से जीती हूं," पटना की चपौर पंचायत की मुखिया, अनामिका देवी (40) ने कहा। "अगर वे मुझसे बात ही नहीं करेंगे तो मैं कुछ भी कैसे सीखूंगी?"</p>

<p style="text-align: justify;">समय लगा लेकिन लोगों ने अनामिका देवी को सुनना शुरू कर दिया क्योंकि "उन्हें पता है कि मैं काम करवा सकती हूं इसलिए उन्हें भी मेरी बात सुननी पड़ती है, यहां तक कि प्रभावशाली जातियों के लोगों को भी बात सुननी पड़ती है"। चपौर पंचायत में प्रभावशाली जातियों के तीन पुरुष और दो महिला वार्ड मेम्बर हैं।</p>

<p style="text-align: justify;">"सिस्टम विशेष रूप से पिछड़ी जातियों की महिलाओं के ख़िलाफ है," सामाजिक कार्यकर्ता प्रतिमा कुमारी पासवान ने कहा।  "उन्हें लगता है कि वह आसानी से इन महिलाओं भयभीत और उनकी बात सुनने के लिए मजबूर कर सकते हैं।"</p>

<p style="text-align: justify;">तमिलनाडु के कुड्डालोर ज़िले की एक हालिया <a href="https://www.newindianexpress.com/states/tamil-nadu/2020/oct/10/woman-dalit-panchayat-chief-humiliated-by-junior-in-cuddalore-two-arrested-2208597.html">रिपोर्ट</a> से पता चला है कि एक दलित महिला पंचायत के प्रमुख एस राजेश्वरी को मीटिंग के दौरान फ़र्श पर बैठने के लिए कहा गया, जबकि बाकी लोग कुर्सियों पर बैठे थे। पटना की तिनेरी पंचायत की वार्ड सदस्य सुनीता कुमारी, अपने शुरुआती वर्षों में इसी तरह के अनुभवों के बारे में बताया। "जब मैं जीतने के बाद ग्राम सभा की पहली मीटिंग में शामिल हुई, तो भूमिहार [प्रभावशाली जाति] मुखिया ने मुझे वार्ड सदस्य होने के बावजूद फर्श पर बैठने के लिए कहा, मैंने उनसे कहा कि मैं फ़र्श पर नहीं बैठूंगी, आपके साथ बैठने का मेरा अधिकार है,” रेणु देवी के पति की तरफ़ इशारा करते हुए उन्होंने कहा। उस समय रेणु देवी के पति मुखिया थे।</p>

<p style="text-align: justify;"><strong>महिलाएं बेहतर सुविधाएं सुनिश्चित करती हैं</strong></p>

<p style="text-align: justify;">एक <a href="http://economics.mit.edu/files/769">रिसर्च</a> से पता चला है कि महिलाओं के लिए आरक्षित पंचायतों में सार्वजनिक सुविधाओं जैसे पेयजल, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, उचित मूल्य की दुकानों आदि की बेहतर उपलब्धता देखने को मिली है।</p>

<p style="text-align: justify;">"हमारे घर में लंबे समय तक नल का पानी नहीं था, हम मांग करते थे लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।" मसौढ़ी ब्लॉक की 40 वर्षीय लीला देवी ने कहा। “तब मुझे एहसास हुआ - जो मेरा अधिकार है उसके लिए मुझे बार-बार क्यों मांग करनी? इसलिए मैंने चुनाव लड़ा और वार्ड सदस्य बन गई और सबसे पहले मैंने स्वीकृत धनराशि से अपने वार्ड में हर घर में नल का पानी पहुंचाने का काम किया।”</p>

<p style="text-align: justify;">महिला नेता बुनियादी सेवाओं को प्राथमिकता देती हैं, सेंटर फ़ॉर केटेलाइज़िंग चेंज के 2015 में हुए एक <a href="https://www.c3india.org/uploads/news/Pahel_-_Women_Leading_Change.pdf">अध्ययन</a> के अनुसार। “जब मैं स्कूल में थी, तब हमारी क्लास में केवल दो लड़कियां थीं, किसी ने भी हमें पोषण, मासिक धर्म या परिवार नियोजन के बारे में नहीं बताया। मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटी उसी तरह से बड़ी हो, जैसे मैं हुई, ” नाम न बताने की शर्त पर एक महिला मुखिया ने कहा। अब वह स्थानीय स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्रों के साथ बात कर रही हैं ताकि किशोरियों के लिए मुफ़्त सेनेटरी पैड उपलब्ध हो सकें।</p>

<p style="text-align: justify;">हालांकि,महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (<a href="https://nrega.nic.in/netnrega/home.aspx">मनरेगा</a>) के तहत कार्यान्वित परियोजनाओं पर महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व के प्रभाव का आकलन करने वाले एक <a href="https://econpapers.repec.org/paper/indisipdp/13-02.htm">अध्ययन</a> में पाया गया कि जिन पंचायतों की मुखिया महिला हैं वहां इन कार्यक्रमों में ज़्यादा अनियमितताएं पाई गईं।</p>

<p style="text-align: justify;">"यह भी याद रखना भी ज़रूरी है कि महिलाएं वित्तीय और डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण विवश हैं, जो काफ़ी हद तक उन्हें शक्तिशाली लोगों के साथ उलझने और उन्हें चुनौती देने में रुकावट है," मधु जोशी ने कहा, "हालांकि, अध्ययन से यह भी पता चलता है कि महिलाओं का अनुभव जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, शासन में सुधार होता जाता है।"</p>

<p style="text-align: justify;">"आरक्षण महिला मतदाताओं को खुश करने के लिए एक राजनैतिक कदम था, लेकिन राज्य में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी भी बड़ी संख्या में बढ़ रही है," सामाजिक कार्यकर्ता प्रतिमा कुमारी पासवान ने कहा। साल 2000 तक पुरुषों और महिलाओं के बीच मतदान का अंतर <a href="https://www.livemint.com/Politics/vwjDtQWrXgL75CCmh1mkdN/Women-voters-behind-Nitishs-success.html">20%</a> (पुरुषों के पक्ष में) था लेकिन 2015 के चुनाव में महिलाओं का <a href="https://eci.gov.in/files/file/3904-bihar-2015/">मतदान</a> 60% था जबकि पुरुषों का मतदान 53% रहा। </p>

<p style="text-align: justify;"><em>(</em><strong>साधिका</strong><em>, </em><strong>इंडियास्पेंड</strong> के साथ प्रिन्सिपल कॉरेस्पॉंडेंट हैं।<em>)</em></p>

<p style="text-align: justify;"><em>हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।</em></p>]]></content:encoded>
<link>https://www.indiaspendhindi.com/पुरुषों-को-जो-कहना-है-कहें/</link>
<guid isPermaLink="true">https://www.indiaspendhindi.com/पुरुषों-को-जो-कहना-है-कहें/</guid>
<category><![CDATA[कवर स्टोरी,जेंडरचेक,नवीनतम रिपोर्ट,महिलाएं,Top Stories]]></category>
<dc:creator><![CDATA[साधिका तिवारी]]></dc:creator>
<pubDate>Tue, 03 Nov 2020 11:31:37 GMT</pubDate>
<image><![CDATA[https://www.indiaspendhindi.com/h-upload/old_images/500x300_346081-sunita-devi1440.jpg]]></image>
</item>
</channel>
</rss>
