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18 अक्टूबर, 2015 को ‘ऑल इंडिया स्टूडेंट यूनियन’ के सदस्य नई दिल्ली में पुलिस मुख्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन करते हुए

पिछले पांच वर्षों में दिल्ली में दर्ज होने वाले बलात्कार के मामलों की संख्या में तीन गुना वृद्धि हुई है। दिल्ली पुलिस द्वारा हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2011 में यह संख्या 572 थी, जो वर्ष 2016 में बढ़ कर 2,155 हुई है। यानी बलात्कार के मामले में 277 फीसदी की वृद्धि हुई है।

6 दिसंबर, 2012 को दिल्ली में चलती बस में एक 23 वर्षीय पैरामेडिकल छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया था। बाद में उस लड़की को निर्भया नाम दिया गया था। इस घटना के तुरंत बाद, दिल्ली में रिपोर्ट किए गए मामलों की संख्या में 132 फीसदी की वृद्धि देखी गई है। इसके बाद भी लगातार 32 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2013 में यह संख्या 1,636 थी जो 2016 में बढ़ कर 2,155 हो गया।

भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत ‘शील भंग करने के इरादे से एक महिला पर हमला’ करने से जुड़े मामलों में 473 फीसदी की वृद्धि हुई है। इसपर आंकड़े वर्ष 2012 में 727 थे। वर्ष 2016 में 4,165 हुए हैं।

महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकारी पहल (जैसे राष्ट्रीय वाहन सुरक्षा और ट्रैकिंग सिस्टम और महिलाओं की हेल्पलाइन स्थापित करना ) बलात्कार और अन्य यौन-संबंधित अपराधों की रिपोर्टों की संख्या कम करने में विफल रहा है।

इसी समस्या पर सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं की सुरक्षा में सुधार के लिए आवंटित धन भी साल के अंत तक कम इस्तेमाल हुआ है, जैसा कि लोकसभा में दिए गए इस जवाब से पता चलता है।

दहशत जारी

वर्ष 2017 के पहले पांच महीनों में पुलिस ने 836 बलात्कार के मामले दर्ज किए हैं।

इन आंकड़ों में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ( एनसीआर ) की महिलाओं द्वारा सामना किए जाने वाले दहशत शामिल नहीं हैं। उदाहरण के लिए, 19 जून 2017 को 48 घंटों में, पांच बलात्कार की घटनाएं दर्ज की गई हैं। इनके अलावा, 20 जून, 2017 को दिल्ली में एक मॉल के बाहर खड़ी एक कार में एक 24 वर्षीय महिला के साथ बलात्कार किया गया। एक अन्य मामले में दिल्ली के बाहरी इलाके में ही एक 26 वर्षीय महिला के साथ एक चलती कार में सामूहिक बलात्कार किया गया था।

वर्ष 2015 में, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, एनसीआर क्षेत्र में 3,430 बलात्कार के मामले सामने आए हैं, जिनमें से अकेले 64 फीसदी मामले दिल्ली में हुए हैं।

एनसीआर क्षेत्र में दर्ज हुए बलात्कार के मामले, वर्ष 2015

NCR map - D

Source: National Crimes Record Bureau

दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ होने वाले सबसे ज्यादा दर्ज अपराधों में पति और ससुराल द्वारा क्रूरता, अपहरण, और महिलाओं का शील भंग करना शामिल है।

‘शील भंग करने के इरादे से महिला पर हमला’ के तहत अधिक गंभीर अपराध जैसे कि 'यौन उत्पीड़न', निर्वस्त्र करना, दर्शनरति, पकड़ने के लिये पीछा करने के इरादे से महिलाओं पर आपराधिक बल का इस्तेमाल शामिल हैं।

‘महिलाओं के शील भंग’ में काम के स्थान, सार्वजनिक परिवहन और ऐसे ही स्थानों पर यौन-प्रेरित टिप्पणियां या इशारे करना शामिल हैं।

क्यों बढ़ रही है घटनाओं की रिपोर्ट ?

दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में बलात्कार की संख्या में हर साल वृद्धि हुई है। यह आंकड़े वर्ष 2011 में 572 थे, जो 277 फीसदी बढ़कर वर्ष 2016 में 2,155 हो गए।

निर्भया मामले के बाद जनवरी 2013से मई 2017 के बीत दिल्ली में 8,992 बलात्कार के मामले दर्ज, वर्ष 2011 के बाद से 10,270 मामले

Source: Delhi Police *Figures up to May 31, 2017

मामलों की संख्या में वृद्धि का मतलब जरुरी नहीं कि बलात्कार की संख्या में वृद्धि हुई है। इसका मतलब पीड़ित लोगों का अधिकारियों से संपर्क करने के लिए अधिक इच्छा और साथ ही शिकायत दर्ज करने के लिए पुलिस अधिकारियों पर अधिक से अधिक दबाव हो सकता है।

नाम न छापने की शर्त पर एक सरकारी अधिकारी ने इंडियास्पेंड को बताया कि, बलात्कार के मामले दर्ज होने वाली संख्या में वृद्धि का कारण सरकार और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी परामर्श है, जो कहता है कि उन पुलिस कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी जो बलात्कार और अन्य संज्ञेय अपराधों के लिए प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज करने में विफल होंगे।

दिल्ली स्थित एक कार्यकर्ता और वकील अनंत कुमार अस्थाना ने इस पर सहमति जताते हुए कहा, “महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों के सूचना की संख्या में वृद्धि ‘यौन अपराध कानून से बच्चों का संरक्षण- 2012’ और ‘आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम-2013’ जैसे कानूनों के सख्त पालन की वजह से हुई है।”

‘यौन अपराध कानून से बच्चों का संरक्षण- 2012’ बच्चों के खिलाफ यौन अपराध की शिकायत दर्ज करने के लिए नागरिकों को बाध्य करता है।

आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम को लोकप्रिय रूप से निर्भय अधिनियम के रूप में जाना जाता है। यह अधिनियन 2 अप्रैल, 2013 को लागू हुआ था और आपराधिक प्रक्रिया संहिता में यौन प्रकृति की आपराधिक शिकायतों को महिला पुलिस द्वारा दर्ज कराने को अनिवार्य बनाने के लिए प्रावधान डाला गया है। इसमें उन जन सेवक के लिए, जो एक संज्ञेय अपराध की शिकायत दर्ज करने में विफल रहता है, उनके लिए मौद्रिक जुर्माना के अलावा छह महीने से दो साल के बीच कठोर कारावास का प्रावधान करता है।

मुंबई स्थित संस्था ‘स्नेहा’ (सोसायटी फॉर न्यूट्रिशन, एजुकेशन एंड हेल्थ एक्शन) में महिलाओं और बच्चों के विरूद्ध हिंसा पर कार्यक्रम समन्वयक प्रीति पिंटो ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि, "अधिक कड़े कानून पारित होने के साथ, जन जागरूकता बढ़ रही है, मीडिया ने भी यौन उत्पीड़न के अधिक मामलों की रिपोर्टिंग की है। इससे मामलों की रिपोर्टिंग में वृद्धि जरूर हुई है, लेकिन अभी भी यह संख्या होनेवाली घटनाओं से बहुत पीछे है।"

कामन्वेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशटिव (सीएचआरआई) द्वारा वर्ष 2015 में दिल्ली और मुंबई के घरों में आयोजित एक सार्वजनिक सर्वेक्षण ‘क्राइम विक्टिमाइजेशन एंड सेफ्टी परसेपशन’ में पाया गया कि कुल मामलों में से केवल 50 फीसदी मामले ही दर्ज किए जाते हैं और इनमें से केवल आधे एफआईआर के रूप में पंजीकृत होते हैं।

सीएचआरआई का अनुमान है कि दिल्ली में यौन उत्पीड़न के 13 मामले दर्ज किए गए थे। उसी समय, 2014 और 2015 से दिल्ली पुलिस के रिपोर्टों की तुलना से पता चलता है कि, बलात्कार के मामलों को वापस लेने की प्रवृति में वृद्धि हुई है। यह आंकड़े 81 से 104 हुए हैं। यह संभवतः आपराधिक-न्याय प्रणाली में विश्वास की कमी का संकेत देते हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 12 अगस्त 2016 की रिपोर्ट में विस्तार से बताया है।

अपराध सिद्धि की दर कम

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2015 में दिल्ली में बलात्कार के लिए सजा दर गिरकर 29.7 फीसदी हो गया है। हालांकि, ये आंकड़े अखिल भारतीय औसत ( टेबल 2 देखें) की तुलना में बेहतर हैं।

देश भर में, बलात्कार के चार मुकदमों में से एक को दोषी ठहराया जाता है। इसपर इंडियास्पेंड 9 मार्च, 2015 की रिपोर्ट में विस्तार से बताया है।

दिल्ली में बलात्कार के लिए सजा दर, वर्ष 2011-15

Source: National Crime Records Bureau; Figures in percentage

अस्थाना कहते हैं, “बलात्कार के मामलों में सजा दर घटने का सामान्य तौर पर मतलब है, दर्ज मामलों में से कम संख्या में अपराध अदालत में साबित हो पाते हैं। इससे यह संदेह उत्पन्न होता है कि झूठे मामले भी दर्ज होते हैं। हालांकि इसका यह भी मतलब हो सकता है कि पुलिस अच्छी तरह जांच करने में सक्षम नहीं है या पीड़ितों को सुनवाई के दौरान कानून के जानकार प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है। कारण कुछ भी हो, लेकिन सजा की संख्या कम होना, एक चिंता का विषय है और संभावित कारणों के लिए जांच की जानी चाहिए। ”

सरकार की लाचार पहल

वर्ष 2014 में पुलिस अनुसंधान ब्यूरो और राष्ट्रीय पुलिस कामकाजी स्थितियों पर विकास अध्ययन के अनुसार, निर्भया की घटना के बाद, दिल्ली पुलिस ने महिला अधिकारियों द्वारा 161 सहायता डेस्क की स्थापना की है। साथ ही यह घोषणा भी की गई है कि 70 फीसदी महिला अधिकारी प्रत्येक दिन आठ घंटे की शिफ्ट करेंगी। हालांकि, जो लोग इन सहायता-डेस्क के साथ काम करते हैं, उनकी क्षमता पर सवाल उठते रहे हैं। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 12 अगस्त 2016 की रिपोर्ट में बताया है। वर्ष 2013 में, वित्त मंत्रालय ने घोषणा की थी कि वह देश में महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने के उद्देश्य से 1000 करोड़ रुपये ( 156 मिलियन डॉलर ) का निर्भया कोष की स्थापना करेगी।

6 अप्रैल, 2017 को सरकार द्वारा राज्यसभा को दिए गए एक उत्तर अनुसार, इस प्रकार अब तक 3,100 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की गई है। कुल 2,348.850 करोड़ रुपए के कम से कम 16 प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं, जिसमें से 15 के लिए 2,047.85 करोड़ रुपए की राशि को मंजूरी दे दी गई है।

प्रारंभ से निर्भया फंड को आवंटित राशि

Sources: Rajya Sabha; Figures in Rs Crore

महिला और बाल विकास मंत्रालय (एमडब्ल्यूसीडी) ने निर्भया कोष के तहत तीन योजनाएं शुरू की हैं । हिंसा से प्रभावित महिलाओं के लिए एक स्टॉप केंद्र (ओएससी), जिसके तहत 84 केंद्र चालू हैं । महिला हेल्पलाइन का सार्वभौमिकरण, जिसके अंतर्गत 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने हेल्पलाइन स्थापित की है और महिला पुलिस स्वयंसेवी (एमपीवी), जिसका पायलट वर्तमान में कई राज्यों में चल रहे हैं।

तीव्र सार्वजनिक प्रतिक्रिया के कारण मंत्रालय ने 27 फरवरी, 2017 को एक स्पष्टीकरण जारी किया है, जिसमें निर्भाय कोष के तहत विभिन्न मंत्रालयों द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न योजनाओं को शामिल किया गया था। हालांकि, इन योजनाओं में अलग-अलग इस्तेमाल की गई राशि या खर्च का कोई भी उल्लेख नहीं किया गया है, जबकि 1,530 करोड़ रुपये का कुल आवंटन और 400 करोड़ रुपये का अनुमानित व्यय का हवाला दिया गया।

26 मई 2016 को सर्वोच्च न्यायालय ने, निर्भया कोष को अर्पयाप्त बताते हुए केंद्र बलात्कार पीड़ितों के लिए राहत प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय नीति तैयार के लिए कहा है।

वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि निर्भया कोष के तहत कई तरह के पहल के बावजूद, महिलाओं के खिलाफ अपराध निरंतर चल रहा है, जैसा कि 7 फरवरी, 2017 को द हिंदू में छपी यह रिपोर्ट कहती है। जयसिंग कहती हैं, “जब वह जरूरतमंद हाथों तक नहीं पहुंचता है, तो एक फंड होने का क्या उद्देश्य है? इसका इस्तेमाल शायद ही होता है और ऐसा प्रतीत होता है कि इसका प्रयोग अलग-अलग राज्यों में 'एक स्टॉप क्राइसिस सेंटर' की स्थापना करना ही रह गया है।”

सामाजिक व्यवहार को बदलने की जरुरत

दिल्ली से अपराध के आंकड़े ऐसे तर्क का समर्थन करते हैं कि बलात्कार को रोकने को जो भी पहल हो रहे हैं, वे काफी नहीं हैं।

फिर भी, अकेले कानून और पुलिस ही यौन प्रकृति के अपराधों को नहीं रोक सकती है।

प्रीति पिंटो कहती हैं, “यौन उत्पीड़न को रोकना दीर्घकालीन प्रक्रिया है और ऐसा करने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका है कि व्यक्तियों और समाज के व्यवहार को बदलना। कानून और सख्त पुलिस व्यवस्था के सशक्त कार्यान्वयन से मदद जरूर मिलेगी, लेकिन असली बदलाव तब आएगा, जब बलात्कारियों को अपने अपराधों के लिए लगातार दोषी ठहराया जाएगा और पीड़ितों को संदेह की नजर से देखना हम बंद करेंगे। साथ ही पीड़ितों को हमारा समाज शर्मिदा होने से बचाने में आगे आए ।”

पिंटो सामाजिक व्यवहार को बदलने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहती हैं- “जब तक महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध हिंसा को हम निजी मामला की तरह देखना बंद नहीं करेंगे और इसेएक सार्वजनिक समस्या नहीं मानेंगे, तब तक इस समस्या का हल संभव नहीं।”

(मल्लापुर विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 08 जुलाई 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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