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नई दिल्ली: 2015 तक, एक दशक में, दस्त से निपटने के लिए भारत के प्रयासों से सुधार हुआ है। चार साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु में 52 फीसदी की गिरावट आई है, लेकिन राष्ट्रीय स्वास्थ्य के आंकड़ों के मुताबिक, 9.2 फीसदी पर दस्त का प्रसार उच्च रहा है। हम बता दें कि दस्त एक ऐसी बीमारी है जिसे साफ-सफाई और सुरक्षित पेयजल के माध्यम से आसानी से रोका जा सकता है।

दस्त से निपटने के लिए भारत के प्रयासों में बेहतर उपचार भी शामिल था, बावजूद इसके कि कम ही प्रभावित बच्चों को समुचित आहार और तरल पदार्थ ( दस्त से लड़ने के लिए मूल चीजें ) दिए गए थे, जैसा कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 (एनएफएचएस -4) के आंकड़ों से पता चलता है।

दस्त से बाल मृत्यु, 2006-2015

मृत्यु दर में सुधार के बावजूद, अभी भी पांच साल से कम उम्र के भारतीय बच्चों में मौत के प्रमुख कारण दस्त रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़ों के मुताबिक, 2015 में रोजाना 321 बच्चों की मौत दस्त के कारण हुई है।

दस्त के कारण निर्जलीकरण होता है और यह विश्व स्तर पर कुपोषण का एक प्रमुख कारण भी है। 2016 में, स्टंटिंग ( आयु के अनुसार कम कद ) के संबंध में 132 देशों में से भारत 114वें स्थान पर था।

2015 में, कुल मौतों में से 5 वर्ष से कम उम्र के भारतीय बच्चों में दस्त के कारण होने वाली मृत्यु की हिस्सेदारी 10 फीसदी (117,285) रही है। यह आंकड़े प्रति व्यक्ति कम आय वाले देश जैसे कि म्यांमार में 7 फीसदी (3,273 बच्चों), केन्या में 7 फीसदी (5,442 बच्चों) और पाकिस्तान में 9 फीसदी (39,484 बच्चे) से उच्च है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 29 जुलाई, 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

2000-2012 के बीच, भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के बीच शिशु मृत्यु दर में सालाना 3.7 फीसदी की दर से गिरावट हुई है, जैसा कि ‘द लैनसेंट’ में प्रकाशित सितंबर 2013 के इस अध्ययन में बताया गया है। ‘द लैनसेंट’ के अध्ययन का जिक्र करते हुए 2015 का यह पेपर कहता है, "यहां तक ​​कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों में होने वाली मृत्युओं में गिरावट आई है, डायरिया जैसे बीमारियों द्वारा आनुपातिक मृत्यु दर अभी भी बनी हुई है।"

अधिक प्रभावित बच्चों को पुनर्जलीकरण चिकित्सा प्राप्त

जैसा कि हमने कहा, मृत्यु दर में कमी टीकाकरण के लिए कई कार्यक्रमों की स्थापना और सफलता मौखिक रीहाइड्रेशन नमक (ओआरएस) को बढ़ावा देने के माध्यम से अतिसारीय बीमारियों के नियंत्रण, स्तनपान प्रथाओं और संस्थागत जन्म में सुधार से प्ररित था, जैसा कि ऊपर उद्धृत ‘द लैनसेंट’ के अध्ययन में बताया गया है।

भारत ने 2014 में निमोनिया और डायरिया (आईएपीपीडी) की रोकथाम और नियंत्रण के लिए एकीकृत कार्य योजना अपनाई है।

मौजूदा तरीकों को सुदृढ़ करने के अलावा, आईएपीपीडी का लक्ष्य हस्तक्षेप के उच्च कवरेज प्राप्त करना है, जिसमें उचित शिशु और युवाओं का खानपान, सुरक्षित पेयजल और बेहतर स्वच्छता का प्रावधान, विटामिन ए पूरक, खसरा टीकाकरण, निमोनिया और मेनिन्जाइटिस को रोकने के लिए हिब टीकाकरण, हाथ धोने और व्यक्तिगत स्वच्छता और ओआरएस या जिंक की व्यवस्था शामिल है।

ओआरएस स्वच्छ पानी, नमक और चीनी का एक मिश्रण है, जो छोटी आंत में अवशोषित हो जाता है और पानी की जगह और मल के माध्यम से खो जाने वाले इलेक्ट्रोलाइट्स को बदल देता है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, जिंक की खुराक दस्त प्रकरण की अवधि को 25 फीसदी तक कम करता है।

2015-16 में, दस्त के साथ 60 फीसदी बच्चों को किसी न किसी रुप में मौखिक रीहाइड्रेशन ( ओआरएस पैकेट -51 फीसदी या दलिया -28 फीसदी या समुचित तरल पदार्थ -7 फीसदी ) मिला था। एनएफएचएस-4 के आंकड़ों के अनुसार 2005-06 में ये आंकड़े 43 फीसदी थे।

दस्त से पीड़ित बच्चे जिन्हें ओआरएस पैकेट से रीहायडेशन थेरेपी प्राप्त हुआ है, उनका अनुपात 2005-06 में 26 फीसदी से बढ़कर 2015-16 में 51 फीसदी हुआ है।

फिर भी, बच्चों को ओआरएस और जिंक गोलियां प्रदान करने से भी भारत का प्रदर्शन अपने पड़ोसी देश बंग्लादेश और पाकिस्तान से भी बद्तर है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 18 नवंबर, 2016 की रिपोर्ट में बताया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, दस्त के साथ 38 फीसदी से अधिक बच्चों को लगातार भोजन और मौखिक रीहाइड्रेशन प्राप्त नहीं हुआ है । 2015-16 में, दस्त के साथ 68 फीसदी बच्चों के लिए स्वास्थ्य सुविधा या प्रदाता से सलाह या उपचार की मांग की गई थी, जो कि एक दशक की तुलना में 60 फीसदी ज्यादा है।

बचपन के दस्त के लिए किए गए 90 फीसदी इलाज गलत हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड 18 फरवरी, 2015 की रिपोर्ट में बताया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, बड़े पैमाने पर अयोग्य चिकित्सक अपरिचित, एंटीबायोटिक दवाओं और अन्य संभावित हानिकारक दवाओं की सलाह देते हैं।

स्वच्छता के अंतराल में दस्त का खतरा अधिक

एनसीएचएचएस -4 के आंकड़ों के मुताबिक, 2015-16 में, पांच वर्ष से कम 9.2 फीसदी भारतीय बच्चों में दस्त था। 2005-06 में यह 9 फीसदी था।

6-11 महीने के बच्चों के बीच प्रसार 2 प्रतिशत अंक गिरा है, जब पूरक आहार और अन्य तरल पदार्थ पेश किए जाते हैं, जबकि 12-23 महीने की आयु के बच्चों में यह 0.8 प्रतिशत अंक गिरा है, जब बच्चे चलना शुरू करते हैं और पर्यावरण से दूषित होने का खतरा बढ़ते हैं।

आयु वर्ग के अनुसार बच्चों के बीच दस्त की व्यापकता

2017 में मई की इस डब्ल्यूएचओ तथ्यपत्र के अनुसार, बेहतर स्वच्छता दस्त को रोकने के लिए महत्वपूर्ण उपाय है। 2015-16 में, राज्य जहां स्वच्छता सुविधाओं का कम उपयोग हुआ था ( जैसे कि झारखंड, बिहार और ओडिसा जहां क्रमश: 24 फीसदी, 25 फीसदी, 29 फीसदी घरों में स्वच्छता सुविधाओं में सुधार हुआ है ) वहां पांच से कम उम्र के बच्चों का उच्च अनुपात भी था, जो दस्त से पीड़ित थे। एनएफएचएस -4 के आंकड़ों के अनुसार इस राज्यों में दस्त पीड़ित बच्चों के लिए आंकड़े क्रमश: 7 फीसदी, 10 फीसदी और 10 फीसदी रहा है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 29 जुलाई, 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

बेहतर स्वच्छता का संदर्भ घर में शौचालय होने से है जो एक पाइप युक्त सीवर प्रणाली से जुड़ा हो या सेप्टिक टैंक में फ्लश हो, हवादार गड्ढे / बायोगैस शौचालय, स्लैब के साथ गड्ढे शौचालय, जुड़वां गड्ढे / खाद बनाने वाला शौचालय, जिसे किसी अन्य घर के साथ साझा नहीं किया गया हो।

मार्च 20, 2018 के अनुसार, आंकड़ों से पता चलता है कि पीने के पानी और स्वच्छता मंत्रालय के स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) के तहत, लक्षित 12 मिलियन ग्रामीण भारतीय परिवारों में से 52.16 फीसदी परिवारों के लिए शौचालय का निर्माण किया गया है।

दस्त के दौरान कुछ ही बच्चों को सिफारिश किया गया आहार प्राप्त

2015-16 में, दस्त के साथ पांच साल से कम उम्र के केवल 7 फीसदी भारतीय बच्चों में डब्ल्यूएचओ द्वारा सिफारिश सामान्य से अधिक तरल पदार्थ दिया गया था। यह आंकड़े 2005-06 के 10.2 फीसदी से कम है, जैसा कि एनएफएचएस -4 के आंकड़ों से पता चलता है।

जबकि 31 फीसदी बच्चों को तरल पदार्थ की सामान्य मात्रा प्राप्त हुई है, वहीं दस्त के साथ 57 फीसदी बच्चों को पीने के लिए कम दिया गया था। यह आंकड़े एक दशक पहले के 37 फीसदी से ज्यादा हैं।

एनएफएचएस -4 रिपोर्ट में कहा गया है, "निर्जलीकरण को कम करने और पोषण संबंधी स्थिति पर दस्त के प्रभाव को कम करने के लिए, माताओं को दस्त वाले बच्चों के सामान्य आहार को जारी रखने और तरल पदार्थ की मात्रा में वृद्धि करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। "

2015-16 में, केवल 31 फीसदी दस्त के साथ भारतीय बच्चों को अनुशंसित अभ्यास के अनुसार या ज्यादा खाना दिया गया है। यह आंकड़े 2005-06 के 39.4 फीसदी से कम है।

तुलनात्मक रुप से, दस्त के एक प्रकरण के दौरान सामान्य की तुलना में 56 फीसदी बीमार बच्चों को कम भोजन दिया गया है। यह आंकड़े एक दशक पहले के 41.8 फीसदी से ज्यादा हैं।

(त्रिपाठी संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 27 मार्च 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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