अमीर, गरीब एक समान, 4 साल के 38% भारतीय बच्चे अविकसित कद के

मुंबई: भारत के अमीर घरों के हर पांच में से एक बच्चा यानी करीब 22% स्टंड या अविकसित कद के हैं। ग़रीब परिवारों के बच्चों की स्थिति तो और भी बदतर है।  गरीब परिवारों के आधे से ज़्यादा बच्चों ( 51% ) का कद अविकसित है। अमीर और ग़रीब, कुल मिलाकर, भारत में चार साल से कम उम्र के 38% बच्चों का कद उनकी उम्र के हिसाब से कम है। ये आंकड़े 15 अक्टूबर 2019 को जारी यूनिसेफ़ की ‘स्टेट ऑफ द वर्ल्ड चिल्ड्रन’ (एसओडब्ल्यूसी) रिपोर्ट में सामने आए हैं। स्टंड का मतलब है, बच्चों की आयु के हिसाब से उनका कद कम रह जाना। 

विशेषज्ञों का कहना है कि कद विकसित न हो पाने का कारण कुपोषण है और भारत में अमीर और गरीब, दोनों के बच्चों का आहार ठीक नहीं है। हालांकि दोनों वर्गों में इसके कारण अलग-अलग हैं। पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया 5 में एडिश्नल प्रोफेसर और न्यूट्रिशन रिसर्च की प्रमुख, श्वेता खंडेलवाल कहती हैं, "भारत में स्वस्थ आहार के बारे में जागरूकता की कमी है, यहां तक कि जो लोग आर्थिक रुप से संपन्न हैं, उनमें भी इसके बारे में जागरुकता नहीं हैं।"

भारत में वेस्टेड बच्चों की संख्या भी काफी ज्यादा है। यानी ऐसे बच्चे जिनका वजन उनकी उम्र के हिसाब से कम है। एसओडब्ल्यूसी की रिपोर्ट के अनुसार, भारत, ऐसे बच्चों की संख्या के मामले में दुनिया में तीसरे नम्बर पर है। जिबूती और दक्षिण सूडान के बाद भारत का नंबर है। भारत में 21% बच्चों का वजन उनके कद से कम है।

बचपन में कम वजन और कद छोटा रह जाने का कारण कुपोषण है और इसके परिणाम काफी गंभीर हो सकते हैं। जो बच्चे आवश्यक पोषक तत्वों की कमी वाले अपर्याप्त भोजन लेते हैं वे बार-बार बीमार पड़ते हैं और वयस्क होने पर वे कम कमाते हैं और इस तरह गरीबी के जाल में फंसे रहते हैं।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स-2019 (जीएचआई) में भारत 102 वें स्थान पर है। पाकिस्तान 94 पर, बांग्लादेश 88 पर और नेपाल 73 पर है। इस इन्डेक्स की रेंकिंग में, अविकसित कद और कम वजन की दर का औसत शामिल होता है।  जीएचआई के मुताबिक, 2008 से 12 के बीच भारत में वैस्टेड बच्चों का प्रतिशत 16.5% था, जो 2014 से 18 के बीच बढ़कर 20.8% हो गया।

जीवन के पहले 1,000 दिनों में अपर्याप्त भोजन लेने का परिणाम

मुंबई की बाल रोग विशेषज्ञ रूपल दलाल कहती हैं, “जीवन के शुरुआती दिनों में खराब पोषण से अविकसित कद होने की आशंका ज्यादा होती है और आईक्यू भी कम होता है, जिसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।”

दलाल मुंबई के ‘इंडियन इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी’ के सेंटर फॉर टेक्नोलोजी अल्टरनेटिवज फॉर रुरल एरियाज में सहायक प्रोफेसर और श्रीमती मालती दहानुकर ट्रस्ट में स्वास्थ्य निदेशक हैं।

खंडेलवाल कहती हैं, “जिन बच्चों को उनके जीवन के पहले 1,000 दिन में अपर्याप्त और पोषण रहित भोजन मिलता है, उनमें अविकसित कद और कमजोर दिमाग होने की आशंका आम है। इसके परिणाम इतने गंभीर होते हैं कि जिंदगी भर इससे बाहर आना काफी मुश्किल होता है।”

विशेषज्ञों का मानना है कि, बचपन में जो कुपोषण के शिकार होते हैं, वयस्क होने पर उनमें हाईपरटेंशन, डायबिटीज और दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है।

इसके अलावा, अविकसित कद की गर्भवती माओं को गर्भावस्था के दौरान जटिलताओं का सामना करना पड़़ता है और यह उनके बच्चों की सेहत पर भी असर डालता है।

एसओडब्ल्यूसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि, जिन बच्चों का उनके जीवन के पहले दो वर्षों में अविकसित कद होता है, वे स्कूल में कम समय बिताते हैं और औसत कद वाले अपने साथियों की तुलना में $ 1,440 तक (लगभग एक लाख रुपये) अपनी जिंदगी में कम कमाते हैं।

गरीब बच्चों को पर्याप्त प्रोटीन नहीं मिलता 

कॉम्प्रिहेंसिव नेशनल न्यूट्रिशन सर्वे (सीएनएनएस) के अनुसार, प्रोटीन यक्त चीज़ों, जैसे दूध या उससे बनी चीज़ें और अंडे की भूमिका आमदनी मेंं स्पष्ट है। पैसे वाले घरों के 2 से 4 साल की उम्र के 82.7% बच्चे डेयरी उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं, वहीं गरीब परिवारों के बच्चों में से इन उत्पादों का सेवन करने वाले बच्चों की संख्या करीब आधी (41.3%) है।

इसी तरह, सबसे गरीब घरों के 8.2% बच्चों ने ही अंडे मिलने की बात की, वहीं अमीर परिवारों के बच्चों में से 20% अंडे खाने वाले मिले।

सीएनएनएस के अध्ययन में कहा गया है कि कुल मिलाकर, 2 से 4 वर्ष की आयु के कुछ ही बच्चों को ही प्रोटीन खाना मिला, 62% ने डेयरी उत्पादों का सेवन किया, 15.6% बच्चों ने अंडे और 31.6% ने दाल और  बादाम आदि खाए। इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि भले ही घरेलू आय कुछ भी हो, कुछ ही बच्चे आवश्यक मात्रा में प्रोटीन का सेवन करते हैं।

दो साल से कम उम्र के बच्चों को भले ही स्तनपान कराया गया हो या नहीं, उन्हें जरूरी पोषण नहीं मिलता है और इस मामले में परिवार की आर्थिक स्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ता है। सीएनएनएस की रिपोर्ट में पाया गया है कि इस आयु वर्ग के केवल 6.4% बच्चों के भोजन में आवश्यक पोषक तत्वों की पर्याप्त मात्रा थी।

अध्ययन में पाया गया कि भारत के पूर्वी और मध्य भागों में ग़रीब राज्यों के बच्चों में प्रोटीन की खपत कम थी।

Source: Comprehensive National Nutrition Survey

खंडेलवाल कहती हैं, "पर्याप्त मात्रा में आहार न मिलना और कम कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन वाले आहार के सेवन का सीधा संबंध बच्चे के विकास से जुड़ा हुआ है और इसका परिणाम अविकसित कद या कम वजन के रुप में हो सकता है। जीवन के पहले 1,000 दिन मस्तिष्क के विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान प्रमुख पोषक तत्व नहीं मिलने का सीधा असर दिमाग पर हो सकता है जिससे बाहर निकलना जिंदगी भर बेहद मुश्किल है।"

दलाल बताती हैं कि बढ़ते बच्चों को पोषक तत्वों से भरपूर आहार की आवश्यकता होती है, विशेष रूप से अंडे, दूध, फलियां, बादाम, बीज, मछली और मांस आदि। उन्होंने आगे बताया "प्रोटीन, अच्छा फ़ैट और कैल्शियम और विटामिन-सी वाले आहार को की जगह सिर्फ कैलोरी वाले आहार दिये जाते हैं, जिसका असर बच्चों के विकास पर पड़ता है। उनमें लगातार संक्रमण की आशंका होती है । वे बच्चे स्कूल में ध्यान नहीं दे पाते और उन्हें थकान जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।"

चावल और गेहूं की खपत ज्यादा, फल और सब्जियों की कमी

एसओडब्लूसी की रिपोर्ट के अनुसार, सर्वेक्षण में शामिल किए गए 6 से 23 महीने की उम्र के लगभग 55% बच्चों ने कोई फल या सब्जी नहीं खाई गई थी। लेकिन सभी आयु वर्ग में, लगभग सभी बच्चों ने अनाज और आलू (स्टार्च से भरपूर) आदि खाए, जैसा कि सीएनएनएस की रिपोर्ट में भी कहा गया है।

कॉर्नेल विश्वविद्यालय के शोधकर्ता प्रभु पिंगली की किताब ‘ट्रांसफॉर्मिंग फूड सिस्टम्स फॉर ए राइजिंग इंडिया’2019 में आई है। इस किताब के अनुसार, परंपरागत भारतीय आहार, कभी बाजरा और दाल जैसे पोषक तत्वों से भरपूर हुआ करते थे। जबकि, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, भारत सरकार ने ऐसी नीतियां बनाईं हैं, जिनसे किसानों को फल और सब्जियों और पशुधन उत्पादों की बजाय चावल और गेहूं की उपज के लिए सहायता मिलती है।

सीएनएनएस के अनुसार, नतीजा ये है कि कई परिवारों के लिए फल और सब्जियां बहुत महंगी हैं। 2 से 4 साल के सबसे गरीब बच्चों में केवल 25.4% ने फल और 54% ने सब्जियां खाई हैं। अपेक्षाकृत अमीर घरों के बच्चों का प्रदर्शन थोड़ा बेहतर रहा (56.7% सबसे अमीर बच्चों ने फल और 61% ने सब्जियां खाईं हैं)।

लेकिन उनकी कम संख्या बताती है कि उन बच्चों को भी पौष्टिक आहार नहीं दिया जाता है, जिनका ख़र्च उनके माता-पिता आसानी से उठा सकते हैं।

खंडेलवाल ने कहा, "अधिकांश अध्ययनों में कहा गया है किअगर बच्चों को सात में से चार भोजन समूह का आहार मिलता है तो उन्हें पर्याप्त रूप से विविध आहार का सेवन करने वाला माना जा सकता है।"

डब्ल्यूएचओ की ओर से शिशु और युवा बच्चे के आहार के दिशानिर्देशों के अनुसार सात खाद्य समूह में अनाज, मूल, और कंद, फलियां और नट्स, डेयरी उत्पाद, मांस, अंडे, विटामिन ए से भरपूर फल और सब्जियां और अन्य फल और सब्जियां शामिल हैं।

Source: Comprehensive National Nutrition Survey

खंडेलवाल ने आगे कहा कि, " भोजन में विविधता का अभाव एक गंभीर ख़तरा है, जो हमें धीरे-धीरे गरीबी की ओर धकेलता है। कई सूक्ष्म पोषक तत्व, विटामिन और मिनरल्स हमारे आहार से गायब हो गए हैं, क्योंकि हमने अपने दैनिक भोजन में कई तरह की कटौतियां की है। समय और संसाधन (धन, शिक्षा, पहुंच, उपलब्धता) के कारण अधिकांश परिवार, पारंपरिक स्थानीय आहार, सब्जियों और फलों से दूर हो रहे हैं और वे बाहर के भोजन की ओर आकर्षित हो रहे हैं।" उन्होंने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति में फ़ैट, प्रोटीन, कार्बोहाईड्रेट्स और विटामिन्स, मिनरल वाले संतुलित स्वस्थ आहार पर ज़ोर देना जरूरी है।

एनीमिया, मोटापा और अविकसित कद /कम वजन

जैसा कि हमने बताया, चार साल से कम उम्र के 38% भारतीय बच्चे अविकसित कद के हैं और इनमें अमीर परिवारों के बच्चे भी शामिल हैं। इन बच्चों में मोटापे के मामले कम हैं - एसओडब्ल्यूसी की रिपोर्ट के अनुसार, उस उम्र के सभी बच्चों में से 2% अधिक वजन वाले या मोटे हैं। सीएनएनएस के अनुसार, 1 से 4 वर्ष की आयु के 40% से अधिक बच्चे एनीमिक हैं यानी उनमें ख़ून की कमी है।

अविकसित कद के अलावा, आयरन से भरपूर सब्जियां, फल और मांस का खर्च उठा सकने वाले अमीर घरों के बच्चों में भी ख़ून की कमी के मामले मिले हैं। ऐसे बच्चों में से एक तिहाई (34.2%) और सबसे गरीब बच्चों में से आधे (46%) से कुछ कम बच्चों में ख़ून की कमी है

ख़ून की कमी, मोटापा और अविकसित कद / कम वजन का एक साथ होना ही है, जिसे पोषण विशेषज्ञ "कुपोषण का तिहरा बोझ" कहते हैं।

दलाल के अनुसार, मां के आहार में अपर्याप्त प्रोटीन और अच्छे फ़ैट की कमी भी अविकसित कद का एक कारण है। वह कहती हैं, “एक बच्चे के जीवन के शुरुआती महीनों में विकास में कमी का एक महत्वपूर्ण कारण, सही तरीके से स्तनपान के बारे में जागरूकता की कमी है।”

स्तनपान कराए गए बच्चों के आहार में पर्याप्त प्रोटीन और अन्य पोषक तत्व नहीं होते हैं। दलाल बताती हैं, "सब्जियों और फलों को आहार में शामिल करना उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि साबुत अनाज जैसे बाजरा, ज्वार आदि। उन बच्चों को बिस्कुट, चिप्स, बटाटा-वडा, भजिया, (पौष्टिक सप्लीमेंट्स) पेडियाश्योर, हॉर्लिक्स, हाई शुगर / गुड़ से बनी चीज़ें, मीठे पेय पदार्थ और केक और पेस्ट्री जैसे जंक फूड से परहेज करना चाहिए।"

डब्ल्यूएचओ ने सिफारिश की है “चूंकि बढ़ते हुए शरीर की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए केवल दूध पर्याप्त नहीं है, छह महीने में बच्चे को धीरे-धीरे सेमि-सोलिड और सोलिड फ़ूड देना शुरु करना चाहिए।” इस बारे में सीएनएनएस की रिपोर्ट में भी कहा गया है। लेकिन दलाल कहती हैं, “ अधिकांश बच्चों को खिलाए गए सप्लीमेंट्स में प्रोटीन और अन्य विटामिन्स की कमी होती है। वे नीरस और पानीनुमा होते हैं और उनमें बीज, नट, फलियां और एनीमल प्रोटीन शामिल नहीं होते हैं।"

आहार में विविधता की ज़रूरत

खंडेलवाल कहती हैं कि केवल कार्यक्रमों से पोषण में सुधार नहीं किया जा सकता है और कुपोषण के कई रूपों से निपटने के भारत के प्रयास कमजोर पड़ गए हैं, "शुरुआत के 1,000 दिनों के दौरान स्वास्थ्य देखभाल में कमी, पोषण रहित आहार, खराब पर्यावरणीय कारक, घरेलू हिंसा, धूम्रपान या अल्कोहल की वजह से भी अविकसित कद की समस्या हो सकती है।"

उन्होंने कहा, "आय, शिक्षा, लिंग, महिला सशक्तीकरण, गरीबी, सामाजिक समावेश / कल्याणकारी योजनाओं, स्वच्छता आदि से जुड़े कई मुद्दे हैं जो जनता के पोषण की स्थिति पर प्रभाव डालते हैं। इन मुद्दों को ठोस रणनीति के तहत सुचारू रूप से हल करने की जरूरत है।”

खंडेलवाल बहु-विषयक रणनीतियों पर जोर देती हैं, "अभी के अधिकांश कार्यक्रम और नीतियों 

में दो तरह के कार्यक्रमों के बीच सामंजस्य नहीं है। इससे सामूहिक जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती।”

खंडेलवाल कुछ सुझाव भी देती हैं, “मूल्यांकन और उच्च स्वास्थ्य सेवा  में सुधार, प्रशिक्षित स्टाफ और कुपोषण से संबंधित मुद्दों से निपटने की क्षमता बढ़ाने के लिए एक ठोस योजना जरूरी है। पोषण को केवल ‘कितना और क्या खाएं’ से जोड़कर नहीं देखना चाहिए, बल्कि इससे जुड़ी बाकी चीज़ों को भी देखना चाहिए तभी इसका सार्वजनिक स्वास्थ्य और पोषण पर सार्थक असर पड़ेगा।” 

(इकबाल इंडियास्पेंड  में इंटर्न हैं। )

यह आलेख पहली बार हेल्थचेक पर यहां प्रकाशित हुआ है।

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मुंबई: भारत के अमीर घरों के हर पांच में से एक बच्चा यानी करीब 22% स्टंड या अविकसित कद के हैं। ग़रीब परिवारों के बच्चों की स्थिति तो और भी बदतर है।  गरीब परिवारों के आधे से ज़्यादा बच्चों ( 51% ) का कद अविकसित है। अमीर और ग़रीब, कुल मिलाकर, भारत में चार साल से कम उम्र के 38% बच्चों का कद उनकी उम्र के हिसाब से कम है। ये आंकड़े 15 अक्टूबर 2019 को जारी यूनिसेफ़ की ‘स्टेट ऑफ द वर्ल्ड चिल्ड्रन’ (एसओडब्ल्यूसी) रिपोर्ट में सामने आए हैं। स्टंड का मतलब है, बच्चों की आयु के हिसाब से उनका कद कम रह जाना। 

विशेषज्ञों का कहना है कि कद विकसित न हो पाने का कारण कुपोषण है और भारत में अमीर और गरीब, दोनों के बच्चों का आहार ठीक नहीं है। हालांकि दोनों वर्गों में इसके कारण अलग-अलग हैं। पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया 5 में एडिश्नल प्रोफेसर और न्यूट्रिशन रिसर्च की प्रमुख, श्वेता खंडेलवाल कहती हैं, "भारत में स्वस्थ आहार के बारे में जागरूकता की कमी है, यहां तक कि जो लोग आर्थिक रुप से संपन्न हैं, उनमें भी इसके बारे में जागरुकता नहीं हैं।"

भारत में वेस्टेड बच्चों की संख्या भी काफी ज्यादा है। यानी ऐसे बच्चे जिनका वजन उनकी उम्र के हिसाब से कम है। एसओडब्ल्यूसी की रिपोर्ट के अनुसार, भारत, ऐसे बच्चों की संख्या के मामले में दुनिया में तीसरे नम्बर पर है। जिबूती और दक्षिण सूडान के बाद भारत का नंबर है। भारत में 21% बच्चों का वजन उनके कद से कम है।

बचपन में कम वजन और कद छोटा रह जाने का कारण कुपोषण है और इसके परिणाम काफी गंभीर हो सकते हैं। जो बच्चे आवश्यक पोषक तत्वों की कमी वाले अपर्याप्त भोजन लेते हैं वे बार-बार बीमार पड़ते हैं और वयस्क होने पर वे कम कमाते हैं और इस तरह गरीबी के जाल में फंसे रहते हैं।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स-2019 (जीएचआई) में भारत 102 वें स्थान पर है। पाकिस्तान 94 पर, बांग्लादेश 88 पर और नेपाल 73 पर है। इस इन्डेक्स की रेंकिंग में, अविकसित कद और कम वजन की दर का औसत शामिल होता है।  जीएचआई के मुताबिक, 2008 से 12 के बीच भारत में वैस्टेड बच्चों का प्रतिशत 16.5% था, जो 2014 से 18 के बीच बढ़कर 20.8% हो गया।

जीवन के पहले 1,000 दिनों में अपर्याप्त भोजन लेने का परिणाम

मुंबई की बाल रोग विशेषज्ञ रूपल दलाल कहती हैं, “जीवन के शुरुआती दिनों में खराब पोषण से अविकसित कद होने की आशंका ज्यादा होती है और आईक्यू भी कम होता है, जिसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।”

दलाल मुंबई के ‘इंडियन इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी’ के सेंटर फॉर टेक्नोलोजी अल्टरनेटिवज फॉर रुरल एरियाज में सहायक प्रोफेसर और श्रीमती मालती दहानुकर ट्रस्ट में स्वास्थ्य निदेशक हैं।

खंडेलवाल कहती हैं, “जिन बच्चों को उनके जीवन के पहले 1,000 दिन में अपर्याप्त और पोषण रहित भोजन मिलता है, उनमें अविकसित कद और कमजोर दिमाग होने की आशंका आम है। इसके परिणाम इतने गंभीर होते हैं कि जिंदगी भर इससे बाहर आना काफी मुश्किल होता है।”

विशेषज्ञों का मानना है कि, बचपन में जो कुपोषण के शिकार होते हैं, वयस्क होने पर उनमें हाईपरटेंशन, डायबिटीज और दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है।

इसके अलावा, अविकसित कद की गर्भवती माओं को गर्भावस्था के दौरान जटिलताओं का सामना करना पड़़ता है और यह उनके बच्चों की सेहत पर भी असर डालता है।

एसओडब्ल्यूसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि, जिन बच्चों का उनके जीवन के पहले दो वर्षों में अविकसित कद होता है, वे स्कूल में कम समय बिताते हैं और औसत कद वाले अपने साथियों की तुलना में $ 1,440 तक (लगभग एक लाख रुपये) अपनी जिंदगी में कम कमाते हैं।

गरीब बच्चों को पर्याप्त प्रोटीन नहीं मिलता 

कॉम्प्रिहेंसिव नेशनल न्यूट्रिशन सर्वे (सीएनएनएस) के अनुसार, प्रोटीन यक्त चीज़ों, जैसे दूध या उससे बनी चीज़ें और अंडे की भूमिका आमदनी मेंं स्पष्ट है। पैसे वाले घरों के 2 से 4 साल की उम्र के 82.7% बच्चे डेयरी उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं, वहीं गरीब परिवारों के बच्चों में से इन उत्पादों का सेवन करने वाले बच्चों की संख्या करीब आधी (41.3%) है।

इसी तरह, सबसे गरीब घरों के 8.2% बच्चों ने ही अंडे मिलने की बात की, वहीं अमीर परिवारों के बच्चों में से 20% अंडे खाने वाले मिले।

सीएनएनएस के अध्ययन में कहा गया है कि कुल मिलाकर, 2 से 4 वर्ष की आयु के कुछ ही बच्चों को ही प्रोटीन खाना मिला, 62% ने डेयरी उत्पादों का सेवन किया, 15.6% बच्चों ने अंडे और 31.6% ने दाल और  बादाम आदि खाए। इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि भले ही घरेलू आय कुछ भी हो, कुछ ही बच्चे आवश्यक मात्रा में प्रोटीन का सेवन करते हैं।

दो साल से कम उम्र के बच्चों को भले ही स्तनपान कराया गया हो या नहीं, उन्हें जरूरी पोषण नहीं मिलता है और इस मामले में परिवार की आर्थिक स्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ता है। सीएनएनएस की रिपोर्ट में पाया गया है कि इस आयु वर्ग के केवल 6.4% बच्चों के भोजन में आवश्यक पोषक तत्वों की पर्याप्त मात्रा थी।

अध्ययन में पाया गया कि भारत के पूर्वी और मध्य भागों में ग़रीब राज्यों के बच्चों में प्रोटीन की खपत कम थी।

Source: Comprehensive National Nutrition Survey

खंडेलवाल कहती हैं, "पर्याप्त मात्रा में आहार न मिलना और कम कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन वाले आहार के सेवन का सीधा संबंध बच्चे के विकास से जुड़ा हुआ है और इसका परिणाम अविकसित कद या कम वजन के रुप में हो सकता है। जीवन के पहले 1,000 दिन मस्तिष्क के विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान प्रमुख पोषक तत्व नहीं मिलने का सीधा असर दिमाग पर हो सकता है जिससे बाहर निकलना जिंदगी भर बेहद मुश्किल है।"

दलाल बताती हैं कि बढ़ते बच्चों को पोषक तत्वों से भरपूर आहार की आवश्यकता होती है, विशेष रूप से अंडे, दूध, फलियां, बादाम, बीज, मछली और मांस आदि। उन्होंने आगे बताया "प्रोटीन, अच्छा फ़ैट और कैल्शियम और विटामिन-सी वाले आहार को की जगह सिर्फ कैलोरी वाले आहार दिये जाते हैं, जिसका असर बच्चों के विकास पर पड़ता है। उनमें लगातार संक्रमण की आशंका होती है । वे बच्चे स्कूल में ध्यान नहीं दे पाते और उन्हें थकान जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।"

चावल और गेहूं की खपत ज्यादा, फल और सब्जियों की कमी

एसओडब्लूसी की रिपोर्ट के अनुसार, सर्वेक्षण में शामिल किए गए 6 से 23 महीने की उम्र के लगभग 55% बच्चों ने कोई फल या सब्जी नहीं खाई गई थी। लेकिन सभी आयु वर्ग में, लगभग सभी बच्चों ने अनाज और आलू (स्टार्च से भरपूर) आदि खाए, जैसा कि सीएनएनएस की रिपोर्ट में भी कहा गया है।

कॉर्नेल विश्वविद्यालय के शोधकर्ता प्रभु पिंगली की किताब ‘ट्रांसफॉर्मिंग फूड सिस्टम्स फॉर ए राइजिंग इंडिया’2019 में आई है। इस किताब के अनुसार, परंपरागत भारतीय आहार, कभी बाजरा और दाल जैसे पोषक तत्वों से भरपूर हुआ करते थे। जबकि, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, भारत सरकार ने ऐसी नीतियां बनाईं हैं, जिनसे किसानों को फल और सब्जियों और पशुधन उत्पादों की बजाय चावल और गेहूं की उपज के लिए सहायता मिलती है।

सीएनएनएस के अनुसार, नतीजा ये है कि कई परिवारों के लिए फल और सब्जियां बहुत महंगी हैं। 2 से 4 साल के सबसे गरीब बच्चों में केवल 25.4% ने फल और 54% ने सब्जियां खाई हैं। अपेक्षाकृत अमीर घरों के बच्चों का प्रदर्शन थोड़ा बेहतर रहा (56.7% सबसे अमीर बच्चों ने फल और 61% ने सब्जियां खाईं हैं)।

लेकिन उनकी कम संख्या बताती है कि उन बच्चों को भी पौष्टिक आहार नहीं दिया जाता है, जिनका ख़र्च उनके माता-पिता आसानी से उठा सकते हैं।

खंडेलवाल ने कहा, "अधिकांश अध्ययनों में कहा गया है किअगर बच्चों को सात में से चार भोजन समूह का आहार मिलता है तो उन्हें पर्याप्त रूप से विविध आहार का सेवन करने वाला माना जा सकता है।"

डब्ल्यूएचओ की ओर से शिशु और युवा बच्चे के आहार के दिशानिर्देशों के अनुसार सात खाद्य समूह में अनाज, मूल, और कंद, फलियां और नट्स, डेयरी उत्पाद, मांस, अंडे, विटामिन ए से भरपूर फल और सब्जियां और अन्य फल और सब्जियां शामिल हैं।

Source: Comprehensive National Nutrition Survey

खंडेलवाल ने आगे कहा कि, " भोजन में विविधता का अभाव एक गंभीर ख़तरा है, जो हमें धीरे-धीरे गरीबी की ओर धकेलता है। कई सूक्ष्म पोषक तत्व, विटामिन और मिनरल्स हमारे आहार से गायब हो गए हैं, क्योंकि हमने अपने दैनिक भोजन में कई तरह की कटौतियां की है। समय और संसाधन (धन, शिक्षा, पहुंच, उपलब्धता) के कारण अधिकांश परिवार, पारंपरिक स्थानीय आहार, सब्जियों और फलों से दूर हो रहे हैं और वे बाहर के भोजन की ओर आकर्षित हो रहे हैं।" उन्होंने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति में फ़ैट, प्रोटीन, कार्बोहाईड्रेट्स और विटामिन्स, मिनरल वाले संतुलित स्वस्थ आहार पर ज़ोर देना जरूरी है।

एनीमिया, मोटापा और अविकसित कद /कम वजन

जैसा कि हमने बताया, चार साल से कम उम्र के 38% भारतीय बच्चे अविकसित कद के हैं और इनमें अमीर परिवारों के बच्चे भी शामिल हैं। इन बच्चों में मोटापे के मामले कम हैं - एसओडब्ल्यूसी की रिपोर्ट के अनुसार, उस उम्र के सभी बच्चों में से 2% अधिक वजन वाले या मोटे हैं। सीएनएनएस के अनुसार, 1 से 4 वर्ष की आयु के 40% से अधिक बच्चे एनीमिक हैं यानी उनमें ख़ून की कमी है।

अविकसित कद के अलावा, आयरन से भरपूर सब्जियां, फल और मांस का खर्च उठा सकने वाले अमीर घरों के बच्चों में भी ख़ून की कमी के मामले मिले हैं। ऐसे बच्चों में से एक तिहाई (34.2%) और सबसे गरीब बच्चों में से आधे (46%) से कुछ कम बच्चों में ख़ून की कमी है

ख़ून की कमी, मोटापा और अविकसित कद / कम वजन का एक साथ होना ही है, जिसे पोषण विशेषज्ञ "कुपोषण का तिहरा बोझ" कहते हैं।

दलाल के अनुसार, मां के आहार में अपर्याप्त प्रोटीन और अच्छे फ़ैट की कमी भी अविकसित कद का एक कारण है। वह कहती हैं, “एक बच्चे के जीवन के शुरुआती महीनों में विकास में कमी का एक महत्वपूर्ण कारण, सही तरीके से स्तनपान के बारे में जागरूकता की कमी है।”

स्तनपान कराए गए बच्चों के आहार में पर्याप्त प्रोटीन और अन्य पोषक तत्व नहीं होते हैं। दलाल बताती हैं, "सब्जियों और फलों को आहार में शामिल करना उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि साबुत अनाज जैसे बाजरा, ज्वार आदि। उन बच्चों को बिस्कुट, चिप्स, बटाटा-वडा, भजिया, (पौष्टिक सप्लीमेंट्स) पेडियाश्योर, हॉर्लिक्स, हाई शुगर / गुड़ से बनी चीज़ें, मीठे पेय पदार्थ और केक और पेस्ट्री जैसे जंक फूड से परहेज करना चाहिए।"

डब्ल्यूएचओ ने सिफारिश की है “चूंकि बढ़ते हुए शरीर की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए केवल दूध पर्याप्त नहीं है, छह महीने में बच्चे को धीरे-धीरे सेमि-सोलिड और सोलिड फ़ूड देना शुरु करना चाहिए।” इस बारे में सीएनएनएस की रिपोर्ट में भी कहा गया है। लेकिन दलाल कहती हैं, “ अधिकांश बच्चों को खिलाए गए सप्लीमेंट्स में प्रोटीन और अन्य विटामिन्स की कमी होती है। वे नीरस और पानीनुमा होते हैं और उनमें बीज, नट, फलियां और एनीमल प्रोटीन शामिल नहीं होते हैं।"

आहार में विविधता की ज़रूरत

खंडेलवाल कहती हैं कि केवल कार्यक्रमों से पोषण में सुधार नहीं किया जा सकता है और कुपोषण के कई रूपों से निपटने के भारत के प्रयास कमजोर पड़ गए हैं, "शुरुआत के 1,000 दिनों के दौरान स्वास्थ्य देखभाल में कमी, पोषण रहित आहार, खराब पर्यावरणीय कारक, घरेलू हिंसा, धूम्रपान या अल्कोहल की वजह से भी अविकसित कद की समस्या हो सकती है।"

उन्होंने कहा, "आय, शिक्षा, लिंग, महिला सशक्तीकरण, गरीबी, सामाजिक समावेश / कल्याणकारी योजनाओं, स्वच्छता आदि से जुड़े कई मुद्दे हैं जो जनता के पोषण की स्थिति पर प्रभाव डालते हैं। इन मुद्दों को ठोस रणनीति के तहत सुचारू रूप से हल करने की जरूरत है।”

खंडेलवाल बहु-विषयक रणनीतियों पर जोर देती हैं, "अभी के अधिकांश कार्यक्रम और नीतियों 

में दो तरह के कार्यक्रमों के बीच सामंजस्य नहीं है। इससे सामूहिक जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती।”

खंडेलवाल कुछ सुझाव भी देती हैं, “मूल्यांकन और उच्च स्वास्थ्य सेवा  में सुधार, प्रशिक्षित स्टाफ और कुपोषण से संबंधित मुद्दों से निपटने की क्षमता बढ़ाने के लिए एक ठोस योजना जरूरी है। पोषण को केवल ‘कितना और क्या खाएं’ से जोड़कर नहीं देखना चाहिए, बल्कि इससे जुड़ी बाकी चीज़ों को भी देखना चाहिए तभी इसका सार्वजनिक स्वास्थ्य और पोषण पर सार्थक असर पड़ेगा।” 

(इकबाल इंडियास्पेंड  में इंटर्न हैं। )

यह आलेख पहली बार हेल्थचेक पर यहां प्रकाशित हुआ है।

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