आवंटित राशि ख़र्च करने में नाकाम नमामि गंगे योजना, बजट में दूसरी नदियों की उपेक्षा

नई दिल्लीः गंगा नदी की सफ़ाई के लिए केंद्र सरकार के महत्वाकांक्षी मिशन, नमामि गंगे के वर्ष 2020-21 के प्रस्तावित बजट में मामूली बढ़ोत्तरी की गई है। सरकारी आंकडों के अनुसार, इस योजना के लिए आवंटित राशि पूरी तरह से ख़र्च नहीं की जा रही है जिसका असर नए वित्त वर्ष के लिए इस योजना आवंटन पर भी पड़ रहा है। 

इंडियास्पेंड के बजट 2020-21 के विश्लेषण के अनुसार, नमामि गंगे का 2020-21 का प्रस्तावित बजट पूर्व के आवंटित बजट से 6.6% अधिक है लेकिन 2019-20 के संशोधित बजट अनुमान से पता चलता है कि पिछले अनुमान की तुलना में 53% कम ख़र्च हुआ है।

आवंटित राशि पूरी ख़र्च ना होने का सिलसिला साल 2014 से ही चल रहा है जब नमामि गंगे योजना की शुरूआत हुई थी।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साल 2014 में इस योजना की शुरुआत बहुत ज़ोर-शोर से की थी लेकिन कमज़ोर प्रशासनिक मशीनरी, अनुमान सही नहीं होने, विभिन्न स्तरों पर राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी और नए मंत्रालय के गठन के लिए प्रशासनिक फेरबदल का ख़ामियाज़ा इस योजना को भुगतना पड़ा है।

हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि इस बीच अन्य नदियों के लिए बजटीय राशि में उतना प्रावधान नहीं किया गया है और वह एक तरह से उपेक्षित ही रह गई हैं।

सरकार ने देश के विभिन्न क्षेत्रों में 300 से अधिक प्रदूषित नदी क्षेत्रों की पहचान की है और इनमें से अधिकतर देश के औद्योगिक राज्यों में हैं, इंडियास्पेंड ने 28 अप्रैल, 2018 को एक रिपोर्ट में इस बारे में बताया था।

हिमालय से निकलकर 2,500 किलोमीटर की यात्रा तय कर बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली गंगा नदी विश्व की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक है और इसके आस-पास घनी आबादी वाले क्षेत्र हैं जिनमें लगभग 50 करोड़ लोग रहते हैं जो अमेरिका और रूस की संयुक्त आबादी से भी ज़्यादा है।

क्या कहते हैं आंकड़े

भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने 1 फ़रवरी 2020 को संसद में बजट पेश किया था और इसमें नमामि गंगे कार्यक्रम को वित्त वर्ष 2020-21 के लिए 800 करोड़ रूपए आवंटित किए गए थे। जल शक्ति मंत्रालय के तहत आने वाले जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनरूद्धार कार्यक्रम विभाग के बजट दस्तावेज़ के अनुसार, यह राशि 2019-20 की तुलना में 50 करोड़ रूपए अधिक है। पिछले बजट में इसके लिए 750 करोड़ रूपए आवंटित हुए थे।

इस कार्यक्रम के संशोधित बजट से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2019-20 में आवंटित 750 करोड़ रूपए में से केवल 353.42 करोड़ रूपए ही ख़र्च होने का अनुमान है।

इस कार्यक्रम में बजटीय आवंटन के मुक़ाबले ख़र्च की जाने वाली राशि में बड़ी कमी वित्त वर्ष 2019-20 में दर्ज की गई थी। वित्त वर्ष 2019-20 में इस योजना को 750 करोड़ रूपए आवंटित किए गए थे जो इससे पहले के वित्त वर्ष की तुलना में 67.39% कम राशि थी और अनुमानित ख़र्च 353.42 करोड़ रूपए भी पहले किए गए खर्च 687.5 करोड़ रूपए की तुलना में लगभग आधा था।

“कम आवंटन और बजटीय राशि को कम ख़र्च करना, यह दोनों इस मुद्दे पर इच्छाशक्ति की कमी को दर्शाते हैं क्योंकि गंगा की स्थिति में सुधार नहीं हुआ है,” ग़ैर लाभकारी संगठनों और लोगों के नेटवर्क साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल के कोओर्डिनेटर हिमांशु ठक्कर ने कहा। “अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है,” उन्होंने कहा।

अभी तक सरकार ने गंगा नदी के किनारे मौजूद शहरों में सीवेज शोधन संयंत्रों का आधारभूत ढांचा बनाने पर ही ध्यान केन्द्रित किया है लेकिन इस कोशिश का कुछ ख़ास प्रभाव नहीं पड़ा है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 15 अप्रैल 2019 की अपनी एक रिपोर्ट में बताया था।

हिमांशु के मुताबिक़, कमज़ोर प्रशासनिक मशीनरी के चलते आवंटित राशि का इस्तेमाल नहीं हो सका है। “ जो आधारभूत ढांचा या सुविधाएं बनाई गई हैं उनके लिए यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जिस उद्देश्य के लिए उन्हें तैयार किया गया था वह उसे हासिल कर सकें,” उन्होंने कहा।

बजटीय राशि में कमी से कोई मदद नहीं मिलेगी क्योंकि जिस तरह से देश में तेज़ी से शहरीकरण हो रहा है उसे देखते हुए प्रदूषित नदियों का पुनरूद्धार एक लगातार प्रकिया के तहत किए जाने की ज़रूरत है, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के महामना मालवीय रिसर्च सेंटर फ़ॉर गंगा, रिवर डेवलेपमेंट एंड वॉटर रिसोर्सेज़ मैनेजमेंट की कोओर्डिनेटर कविता शाह ने कहा। 

“जो एजेंसियां गंगा नदी की सफ़ाई का काम अच्छी तरह कर सकती हैं उन्हें धनराशि के आवंटन की प्रक्रिया में ख़ामियां हैं। इस काम में सहयोग दे रही स्थानीय संस्थाओं को धनराशि देने से इंकार किया जा रहा है,” उन्होंने बताया।

मंत्रालयों में परिवर्तन

नेशनल गंगा काउंसिल नीतियां तय करने वाली सुप्रीम बॉडी है जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं। इसका गठन 2016 में किया गया था और इसकी पहली बैठक दिसंबर 2019 में हुई। इसने नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी (एनजीआरबीए) की जगह ली और इसका काम गंगा नदी की सफ़ाई की निगरानी करना है। इसमें प्रधानमंत्री के अलावा पांच गंगा बेसिन राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल हैं। यह राज्य उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल हैं और इनकी बैठक साल में कम से कम एक बार होनी ज़रूरी है। कई केंद्रीय मंत्री भी इस काउंसिल के सदस्य हैं।

एनजीआरबीए का गठन 2009 में किया गया था और इसका काम गंगा नदी में गिरने वाले सीवेज को रोकना था। गंगा नदी में 53 शहरों (50,000 से 100,000 की आबादी वाले) और 48 कस्बों की गंदगी गिरती है।

मई 2019 में दोबारा सत्ता में आने के बाद नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने दो मंत्रालयों- जल संसाधन, नदी विकास एंव गंगा पुनरूद्धार और पेयजल तथा स्वच्छता मंत्रालय को मिलाकर एक जल शक्ति मंत्रालय का गठन किया था।

संबद्ध मंत्रालयों और इसके अधिकारियों में बदलाव होने से बजटीय आवंटन की प्रक्रिया में रुकावट आई है, कविता शाह ने बताया।

अन्य नदियों के लिए बहुत कम बजट

नेशनल रिवर कंज़र्वेशन प्लान (एनआरसीपी) की शुरुआत गंगा नदी के आसपास के क्षेत्र की सफ़ाई के लिए 1985 में की गई थी और 1995 तक इसके दायरे में सभी बड़ी भारतीय नदियां आ गई थीं। एनआरसीपी का एक हिस्सा गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों की सफ़ाई पर विशेष ध्यान दे रहा है और दूसरा हिस्सा अन्य नदियों के बेसिन से जुड़ा है।

दूसरे हिस्से में 15 राज्यों के 76 शहरों और कस्बों के आसपास की 33 नदियां शामिल हैं और इसके लिए बजटीय आवंटन 2019-20 और 2020-21 के बीच 12.24% बढ़ाकर 196 करोड़ रूपए से 220 करोड़ रूपए किया गया है। हमने पाया कि एनआरसीपी के तहत अन्य बेसिन के लिए मौजूदा आवंटन गंगा नदी मिशन के लिए आवंटित 840 करोड़ रूपए से 74% कम है।

गंगा केन्द्रित एनआरसीपी के बजट आवंटन में 31% की कमी दर्ज की गई है। यह पिछले बजट में 1,220 करोड़ रूपए था और इस बार के बजट में घटकर 840 करोड़ रूपए रह गया है।

एनआरसीपी एक सरकारी निकाय नेशनल रिवर कंज़र्वेशन डायरेक्टोरेट के समन्वय के साथ काम करता था और यह निदेशालय इसके तहत राज्यों और स्थानीय निकायों को गंगा नदी के अलावा अन्य नदियों के प्रदूषण को रोकने के लिए वित्तीय सहायता को मंज़ूरी देता था। जुलाई 2019 में इसे पर्यावरण मंत्रालय से नए बने जल शक्ति मंत्रालय की जल संसाधन इकाई में परिवर्तित कर दिया गया।

“ऐसा करना ज़रूरी नहीं था,” हिमांशु ठक्कर ने कहा। जल संसाधन मंत्रालय का नदियों के संरक्षण से संबद्ध नहीं है। यह काम पर्यावरण मंत्रालय का है और अब नदियां उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है,” उन्होंने कहा।

(त्रिपाठी, इंडियास्पेंड के एक रिपोर्टिंग फेलो हैं।)

यह रिपोर्ट अंग्रेज़ी में 24 फ़रवरी 2020 को IndiaSpend पर प्रकाशित हुई है।

हम फ़ीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

नई दिल्लीः गंगा नदी की सफ़ाई के लिए केंद्र सरकार के महत्वाकांक्षी मिशन, नमामि गंगे के वर्ष 2020-21 के प्रस्तावित बजट में मामूली बढ़ोत्तरी की गई है। सरकारी आंकडों के अनुसार, इस योजना के लिए आवंटित राशि पूरी तरह से ख़र्च नहीं की जा रही है जिसका असर नए वित्त वर्ष के लिए इस योजना आवंटन पर भी पड़ रहा है। 

इंडियास्पेंड के बजट 2020-21 के विश्लेषण के अनुसार, नमामि गंगे का 2020-21 का प्रस्तावित बजट पूर्व के आवंटित बजट से 6.6% अधिक है लेकिन 2019-20 के संशोधित बजट अनुमान से पता चलता है कि पिछले अनुमान की तुलना में 53% कम ख़र्च हुआ है।

आवंटित राशि पूरी ख़र्च ना होने का सिलसिला साल 2014 से ही चल रहा है जब नमामि गंगे योजना की शुरूआत हुई थी।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साल 2014 में इस योजना की शुरुआत बहुत ज़ोर-शोर से की थी लेकिन कमज़ोर प्रशासनिक मशीनरी, अनुमान सही नहीं होने, विभिन्न स्तरों पर राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी और नए मंत्रालय के गठन के लिए प्रशासनिक फेरबदल का ख़ामियाज़ा इस योजना को भुगतना पड़ा है।

हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि इस बीच अन्य नदियों के लिए बजटीय राशि में उतना प्रावधान नहीं किया गया है और वह एक तरह से उपेक्षित ही रह गई हैं।

सरकार ने देश के विभिन्न क्षेत्रों में 300 से अधिक प्रदूषित नदी क्षेत्रों की पहचान की है और इनमें से अधिकतर देश के औद्योगिक राज्यों में हैं, इंडियास्पेंड ने 28 अप्रैल, 2018 को एक रिपोर्ट में इस बारे में बताया था।

हिमालय से निकलकर 2,500 किलोमीटर की यात्रा तय कर बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली गंगा नदी विश्व की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक है और इसके आस-पास घनी आबादी वाले क्षेत्र हैं जिनमें लगभग 50 करोड़ लोग रहते हैं जो अमेरिका और रूस की संयुक्त आबादी से भी ज़्यादा है।

क्या कहते हैं आंकड़े

भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने 1 फ़रवरी 2020 को संसद में बजट पेश किया था और इसमें नमामि गंगे कार्यक्रम को वित्त वर्ष 2020-21 के लिए 800 करोड़ रूपए आवंटित किए गए थे। जल शक्ति मंत्रालय के तहत आने वाले जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनरूद्धार कार्यक्रम विभाग के बजट दस्तावेज़ के अनुसार, यह राशि 2019-20 की तुलना में 50 करोड़ रूपए अधिक है। पिछले बजट में इसके लिए 750 करोड़ रूपए आवंटित हुए थे।

इस कार्यक्रम के संशोधित बजट से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2019-20 में आवंटित 750 करोड़ रूपए में से केवल 353.42 करोड़ रूपए ही ख़र्च होने का अनुमान है।

इस कार्यक्रम में बजटीय आवंटन के मुक़ाबले ख़र्च की जाने वाली राशि में बड़ी कमी वित्त वर्ष 2019-20 में दर्ज की गई थी। वित्त वर्ष 2019-20 में इस योजना को 750 करोड़ रूपए आवंटित किए गए थे जो इससे पहले के वित्त वर्ष की तुलना में 67.39% कम राशि थी और अनुमानित ख़र्च 353.42 करोड़ रूपए भी पहले किए गए खर्च 687.5 करोड़ रूपए की तुलना में लगभग आधा था।

“कम आवंटन और बजटीय राशि को कम ख़र्च करना, यह दोनों इस मुद्दे पर इच्छाशक्ति की कमी को दर्शाते हैं क्योंकि गंगा की स्थिति में सुधार नहीं हुआ है,” ग़ैर लाभकारी संगठनों और लोगों के नेटवर्क साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल के कोओर्डिनेटर हिमांशु ठक्कर ने कहा। “अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है,” उन्होंने कहा।

अभी तक सरकार ने गंगा नदी के किनारे मौजूद शहरों में सीवेज शोधन संयंत्रों का आधारभूत ढांचा बनाने पर ही ध्यान केन्द्रित किया है लेकिन इस कोशिश का कुछ ख़ास प्रभाव नहीं पड़ा है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 15 अप्रैल 2019 की अपनी एक रिपोर्ट में बताया था।

हिमांशु के मुताबिक़, कमज़ोर प्रशासनिक मशीनरी के चलते आवंटित राशि का इस्तेमाल नहीं हो सका है। “ जो आधारभूत ढांचा या सुविधाएं बनाई गई हैं उनके लिए यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जिस उद्देश्य के लिए उन्हें तैयार किया गया था वह उसे हासिल कर सकें,” उन्होंने कहा।

बजटीय राशि में कमी से कोई मदद नहीं मिलेगी क्योंकि जिस तरह से देश में तेज़ी से शहरीकरण हो रहा है उसे देखते हुए प्रदूषित नदियों का पुनरूद्धार एक लगातार प्रकिया के तहत किए जाने की ज़रूरत है, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के महामना मालवीय रिसर्च सेंटर फ़ॉर गंगा, रिवर डेवलेपमेंट एंड वॉटर रिसोर्सेज़ मैनेजमेंट की कोओर्डिनेटर कविता शाह ने कहा। 

“जो एजेंसियां गंगा नदी की सफ़ाई का काम अच्छी तरह कर सकती हैं उन्हें धनराशि के आवंटन की प्रक्रिया में ख़ामियां हैं। इस काम में सहयोग दे रही स्थानीय संस्थाओं को धनराशि देने से इंकार किया जा रहा है,” उन्होंने बताया।

मंत्रालयों में परिवर्तन

नेशनल गंगा काउंसिल नीतियां तय करने वाली सुप्रीम बॉडी है जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं। इसका गठन 2016 में किया गया था और इसकी पहली बैठक दिसंबर 2019 में हुई। इसने नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी (एनजीआरबीए) की जगह ली और इसका काम गंगा नदी की सफ़ाई की निगरानी करना है। इसमें प्रधानमंत्री के अलावा पांच गंगा बेसिन राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल हैं। यह राज्य उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल हैं और इनकी बैठक साल में कम से कम एक बार होनी ज़रूरी है। कई केंद्रीय मंत्री भी इस काउंसिल के सदस्य हैं।

एनजीआरबीए का गठन 2009 में किया गया था और इसका काम गंगा नदी में गिरने वाले सीवेज को रोकना था। गंगा नदी में 53 शहरों (50,000 से 100,000 की आबादी वाले) और 48 कस्बों की गंदगी गिरती है।

मई 2019 में दोबारा सत्ता में आने के बाद नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने दो मंत्रालयों- जल संसाधन, नदी विकास एंव गंगा पुनरूद्धार और पेयजल तथा स्वच्छता मंत्रालय को मिलाकर एक जल शक्ति मंत्रालय का गठन किया था।

संबद्ध मंत्रालयों और इसके अधिकारियों में बदलाव होने से बजटीय आवंटन की प्रक्रिया में रुकावट आई है, कविता शाह ने बताया।

अन्य नदियों के लिए बहुत कम बजट

नेशनल रिवर कंज़र्वेशन प्लान (एनआरसीपी) की शुरुआत गंगा नदी के आसपास के क्षेत्र की सफ़ाई के लिए 1985 में की गई थी और 1995 तक इसके दायरे में सभी बड़ी भारतीय नदियां आ गई थीं। एनआरसीपी का एक हिस्सा गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों की सफ़ाई पर विशेष ध्यान दे रहा है और दूसरा हिस्सा अन्य नदियों के बेसिन से जुड़ा है।

दूसरे हिस्से में 15 राज्यों के 76 शहरों और कस्बों के आसपास की 33 नदियां शामिल हैं और इसके लिए बजटीय आवंटन 2019-20 और 2020-21 के बीच 12.24% बढ़ाकर 196 करोड़ रूपए से 220 करोड़ रूपए किया गया है। हमने पाया कि एनआरसीपी के तहत अन्य बेसिन के लिए मौजूदा आवंटन गंगा नदी मिशन के लिए आवंटित 840 करोड़ रूपए से 74% कम है।

गंगा केन्द्रित एनआरसीपी के बजट आवंटन में 31% की कमी दर्ज की गई है। यह पिछले बजट में 1,220 करोड़ रूपए था और इस बार के बजट में घटकर 840 करोड़ रूपए रह गया है।

एनआरसीपी एक सरकारी निकाय नेशनल रिवर कंज़र्वेशन डायरेक्टोरेट के समन्वय के साथ काम करता था और यह निदेशालय इसके तहत राज्यों और स्थानीय निकायों को गंगा नदी के अलावा अन्य नदियों के प्रदूषण को रोकने के लिए वित्तीय सहायता को मंज़ूरी देता था। जुलाई 2019 में इसे पर्यावरण मंत्रालय से नए बने जल शक्ति मंत्रालय की जल संसाधन इकाई में परिवर्तित कर दिया गया।

“ऐसा करना ज़रूरी नहीं था,” हिमांशु ठक्कर ने कहा। जल संसाधन मंत्रालय का नदियों के संरक्षण से संबद्ध नहीं है। यह काम पर्यावरण मंत्रालय का है और अब नदियां उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है,” उन्होंने कहा।

(त्रिपाठी, इंडियास्पेंड के एक रिपोर्टिंग फेलो हैं।)

यह रिपोर्ट अंग्रेज़ी में 24 फ़रवरी 2020 को IndiaSpend पर प्रकाशित हुई है।

हम फ़ीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।


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