उत्तर प्रदेश में टीबी का इलाज प्रभावित, नए मरीज़ कम हुए

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज‍़िले का एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र। लॉकडाउन की वजह से यहां मरीज़ नहीं आ रहे। फ़ोटो: रणविजय सिंह

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मऊ ज‍़िले में लॉकडाउन से पहले सरकारी अस्पतालों में हर महीने तपेदिक यानी टीबी के 250 से 300 नए मरीज़़ों की पहचान की जाती थी, लेकिन लॉकडाउन में यह संख्या सिर्फ़ 28 से 30 रह गई है। 

यह कहानी सिर्फ मऊ ज‍़िले की नहीं है। मऊ से 96 किलोमीटर दूर गोरखपुर ज़िले के खजनी ब्लॉक के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) का हाल भी कुछ ऐसा ही है। लॉकडाउन से पहले पीएचसी पर महीने में 5 से 6 नए टीबी के मरीज़़ आते थे, लेकिन लॉकडाउन के बाद से यहां एक भी नया मरीज़़ नहीं आया है।

कोरोनावायरस और लॉकडाउन की वजह से टीबी के मरीज़ों के सामने दोहरा संकट पैदा हो गया है। पहला संकट टीबी के उन मरीज़ों का है जिनकी पहचान की जा चुकी है। दरअसल इलाज के साथ-साथ टीबी के मरीज़ों की लगातार निगरानी भी की जाती है ताकि वह वक़्त पर अपनी दवा लेते रहें। दवा छूटने पर टीबी मरीज़ के अंदर ज़्यादा ख़तरनाक ढंग से वापसी कर सकता है। 

दूसरा संकट टीबी के नए मरीज़ों की पहचान का है। लॉ़कडाउन की वजह से जिन लोगों को टीबी होने की आशंका है वह अस्पताल नहीं जा पा रहे हैं। उनको टीबी है या नहीं इस बात की पुष्टि नहीं हो पा रही है। विशेषज्ञों को आशंका है कि नए मरीज़ों की पहचान ना हो पाने से वह अपने परिवार के दूसरे लोगों को टीबी से संक्रमित कर सकते हैं।

लॉकडाउन के दौरान देश में टीबी मरीज़ों के पंजीकरण के मामलों में 75% तक की गिरावट आई है, हाल ही में आई विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 22 मार्च के बाद के तीन हफ़्तों में रिपोर्ट किए गए टीबी के साप्ताहिक मामले 11,367 हैं जबकि साल 2020 में कोविड-19 के पहले के हफ़्तों में यह औसत 45,875 मरीज़ों का था। इस रिपोर्ट में यह भी आशंका जताई गई है कि समय से पंजीकरण ना होने पर आगे चलकर टीबी के मामलों और उससे होने वाली मौतों में वृद्धि देखने को मिल सकती है।

courtsey: WHO 

  

उत्तर प्रदेश के लिए अहम है टीबी से लड़ाई

भारत के लिए टीबी कितनी बड़ी समस्या है इस बात का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि दुनिया के क़रीब 27% टीबी के मरीज़ भारत में हैं। यानी हर 10 में से लगभग 3 टीबी के मरीज़ भारत में हैं। इस जानलेवा बीमारी से भारत में हर दिन क़रीब 1,200 लोगों की मौत होती है, ग्‍लोबल टीबी रिपोर्ट 2019 के मुताबिक़।

2018 में देश में कुल नोट‍िफाइड टीबी के मरीज़ों की संख्या 21.5 लाख थी और इसमें से क़रीब 20% (4.2 लाख) मरीज़ उत्तर प्रदेश में थे, इंडिया टीबी रिपोर्ट 2019 के मुताबिक़। 

इन आंकड़ों से एक बात साफ़ होती है कि भारत और ख़ासकर उत्तर प्रदेश के लिए टीबी से लड़ाई बहुत ज़रूरी है। इसी के मद्देनज़र केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 24 अप्रैल 2020 को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से यह सुनिश्चित करने को कहा कि कोरोनावायरस महामारी के दौरान टीबी के मरीज़ों की देखभाल में कोई रुकावट न आए, लेकिन ऐसा होते नहीं दिख रहा। खुद उत्तर प्रदेश के टीबी ऑफ़िसर डॉ. संतोष गुप्ता यह बात मानते हैं।

“इस वक्त‍ समस्या यह है कि नए मरीज़ों की पहचान नहीं हो पा रही है, क्योंकि टीबी का पूरा स्टाफ़ कोरोनावायरस की ड्यूटी में लगा है। लगभग 30 से 35% मरीज़ प्राइवेट सेक्टर से आते हैं और लॉकडाउन की वजह से प्राइवेट अस्पताल बंद हैं। ऐसे में सरकारी अस्पतालों में जो थोड़े-बहुत मरीज़ आ रहे हैं उनका ही पता चल पा रहा है,” डॉ. संतोष गुप्ता ने इंडियास्पेंड से कहा।

डॉट्स का महत्व

टीबी के मरीज़ों का इलाज, विश्व स्वास्थ्य संगठन की निर्धारित डॉट्स प्रणाली यानी डायरेक्टली ऑबज़र्व्ड ट्रीटमेंट शॉर्ट कोर्स से किया जाता है। इसमें मरीज़ को वक़्त पर दवा लेने और कोर्स पूरा करने की ज़रूरत होती है। आमतौर पर शुरुआती इलाज से फ़ायदा होता देखकर बड़ी संख्या में टीबी के मरीज़ अपना इलाज बीच में ही छोड़ देते थे जिससे वह दोबारा टीबी का शिकार हो जाते थे। डॉट्स के तहत इलाज के साथ-साथ टीबी मरीज़ों की सीधे तौर पर निगरानी भी की जाती है ताकि वो अपना इलाज समय पर पूरा कर सकें। आज DOTS प्रोग्राम 632 डिस्ट्रिक्ट टीबी सेंटर्स के माध्यम से देश भर में चल रहा है। उत्तर प्रदेश में यह कार्यक्रम 75 ज़िलों में 993 टीबी यूनिट्स के माध्यम से चलाया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश के टीबी मरीज़ लॉकडाउन से प्रभावित

कोरोनावायरस और लॉकडाउन की वजह से उत्तर प्रदेश में टीबी के मरीज़ों का इलाज और उनकी निगरानी का काम तो बुरी तरह से प्रभावित हो ही रहा है साथ ही नए मरीज़ों की पहचान भी नहीं हो पा रही है।

“नए मरीज़ों की संख्या में कमी इसलिए आई है कि अस्पतालों में ओपीडी चल नहीं रही है और टीबी की जांच करने वाले लैब टेक्नीशियन कोरोनावायरस की ड्यूटी में लगे हैं,” मऊ ज़िले के टीबी ऑफ़िसर डॉ. एसपी अग्रवाल ने बताया। 

“ग्रामीण इलाकों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर ओपीडी बंद कर दी गई है। इससे सभी तरह की जांच प्रभावित हैं। मरीज़ भी लॉकडाउन में निकल नहीं पा रहे हैं तो अस्पताल कैसे आएंगे,” गोरखपुर ज़िले के खजनी ब्लॉक के पीएचसी के प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ. संजय गुप्ता ने कहा।

 

उत्तर प्रदेश के इन स्वास्थ्य केंद्रों का हाल दर्शाता है कि कोरोनावायरस से लड़ाई के बीच राज्य में टीबी का इलाज प्रभावित हुआ है। यह हाल तब है जब देश के किसी भी राज्य के मुकाबले उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा टीबी के मरीज़ हैं।

उत्तर प्रदेश के मऊ ज‍़िले का एक डॉट्स सेंटर। फ़ोटो: रणविजय सिंह

नए मरीज़ों की पहचान न होने से बढ़ सकता है ख़तरा

यूपी में नए मरीज़ों को नोटिफ़ाई न कर पाने की जो स्थिति पैदा हुई है इससे सवाल उठता है कि आख़िर इससे नुकसान क्‍या है? इस सवाल के जवाब में कई जानकारों का कहना है कि टीबी हवा से फैलता है, जब मरीज़ घर में रहेगा तो दूसरों को भी संक्रमित कर सकता है। ऐसे में टीबी के मामले बढ़ेंगे। 

“अगर पिछले एक डेढ़ महीने में किसी को टीबी हुई होगी और वह खांस रहा होगा तो इसे अपने परिवार में ही फैला रहा होगा। इन मरीज़ों की वक्त‍ रहते पहचान करते हुए इलाज नहीं शुरू होगा तो इससे संक्रमितों की संख्या बढ़ेगी। टीबी के मरीज़ों की जितनी जल्दी पहचान की जाएगी उतनी ही जल्दी इसके फैलाव पर रोक लगाई जा सकती है,” लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के रेसपिरेट्री मेडीसिन विभाग के प्रोफ़ेसर डॉ. संतोष कुमार ने कहा। 

टीबी की रोकथाम के क्षेत्र में लंबे वक्त‍ से काम कर रहे छत्तीसगढ़ के स्टेट हेल्थ‍ रिसोर्स सेंटर के डॉ. प्रबीर चैटर्जी इसे ख़तरनाक स्थिति बताते हैं। “अगर टीबी के मरीज़ की पहचान करने का काम लंबित होगा तो इससे मरीज़ ज़्यादा बीमार हो सकता है, उसकी इलाज से पहले मौत भी हो सकती है। साथ ही लॉकडाउन में अगर ऐसे मरीज़ परिवार के साथ होंगे, ख़ासकर एक कमरे या छोटी जगह में बंद होंगे तो परिवार के लोगों को भी संक्रमित कर सकते हैं,” उन्होंने कहा।

पहले ही भारत में क़रीब 5.5 लाख टीबी के ऐसे मरीज़ हैं जिनकी पहचान नहीं की हो सकी है। टीबी रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक़, भारत में लगभग 27 लाख टीबी के मरीज़ हैं। 2018 तक देश में 21.5 लाख टीबी के मरीज़ों की पहचान की जा सकी, यानी क़रीब 5.5 लाख मरीज़ों की पहचान नहीं हो पाई है, इंडिया टीबी रिपोर्ट 2019 के मुताबिक़।

टीबी के मरीज़ों की पहचान करने में भारत की स्थिति पहले भी अच्छी नहीं रही है। दुनिया भर में 2018 तक चिन्हित मरीज़ों और अनुमानित मरीज़ों के बीच का अंतर देखा जाए तो भारत इस अंतर के लिए क़रीब 25% ज़िम्मेदार है, ग्‍लोबल टीबी रिपोर्ट 2019 में कहा गया है। इन आंकड़ों और वर्तमान स्थिति से विशलेषण किया जाए तो कहा जा सकता है कि टीबी उन्मूलन में भारत के सामने नई चुनौतियां आने वाली हैं।

 

मरीज़ों को पहुंचाई जा रही दवा लेकिन फ़ॉलो-अप पर रोक

उत्तर प्रदेश में नए मरीज़ों की पहचान करने का काम भले न हो पा रहा हो, लेकिन जिन मरीज़ों का इलाज चल रहा है उन्हें दवा पहुंचाने का काम हो रहा है। “इस वक्त‍ हमारा फ़ोकस इस बात पर है कि जो हमारे रजिस्टर्ड मरीज़ हैं उनके इलाज में बाधा न आ पाए, सारा ध्‍यान इसी पर केंद्रित है। हम मरीज़ों को वक्त‍ पर दवा पहुंचा रहे हैं,” स्टेट टीबी ऑफ़िसर संतोष गुप्ता ने बताया। 

स्टेट टीबी ऑफ़िसर की इस बात की तसदीक मरीज़ भी करते हैं। “मैं बरेली में पढ़ती हूं, वहीं के डॉट्स सेंटर से दवा लेती थी। होली पर घर आई तो कोरोनावायरस की वजह से घर पर ही रुकना पड़ा। मेरी दवा ख़त्म‍ होने वाली थी लेकिन तभी मुझे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से दवा मिल गई,” उत्तर प्रदेश के मऊ ज़िले के कुनवा दर्गा गांव की रहने वाली दिव्यांशी मौर्य ने बताया। 

 

हालांकि, दिव्यांशी यह भी बताती हैं कि जब उन्हें सीने में दर्द की शिकायत हुई तो उन्हें डॉक्टर नहीं मिल पाए थे। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर उनसे कहा गया कि मऊ ज़िला अस्पताल में डॉक्टर मिल जाएंगे। गांव से ज़िला अस्पताल दूर होने की वजह से दिव्यांशी अस्पताल नहीं जा पाईं और दर्द की दवा खाकर रह गईं।

मऊ ज़िले के फतेहपुर मण्डाव के जिस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से दिव्यांशी ने दवा ली थी और जहां उसे डॉक्टर नहीं मिले वहां के डॉट्स सेंटर पर सीनियर ट्रीटमेंट सुपरवाइज़र (एसटीएस) के तौर पर विकास कुमार तैनात हैं। एसटीएस की ज़िम्मेदारी होती है कि वो अपने क्षेत्र में टीबी के मरीज़ों तक दवा पहुंचाए और उनका रिकॉर्ड रखे। इन्हें सरकार की ओर से मोटरसाइकिल भी मिली होती है ताकि अगर कोई टीबी का मरीज़ दवा लेने न आ पाए तो यह उसे दवा पहुंचा सकें।

उत्तर प्रदेश के मऊ ज‍़िले के एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर सीनियर ट्रीटमेंट सुपरवाइज़र विकास कुमार। 

“हम मरीज़ों को एक महीने की दवा दे रहे हैं। हर महीने मरीज़ों का फ़ॉलोअप होता है, जो अभी नहीं हो पा रहा, लेकिन दवा दी जा रही है। फ़ॉलोअप इसलिए भी नहीं हो रहा कि मरीज़ों को बलगम लेकर लैब पर आना होता था, लेकिन लैब टेक्नीशियन कोरोनावायरस की ड्यूटी में लगे हैं तो अभी लैब भी बंद हैं,” कोरोनावायरस के संकट के दौर में टीबी के मरीज़ों के इलाज की पद्धति के बारे में बताते हुए विकास कुमार ने कहा।

प्राइवेट अस्पतालों के मरीज़ ज़्यादा परेशान

यह तो हुई सरकारी अस्पतालों में इलाज करा रहे मरीज़ों की बात जिन्हें दवा पहुंचाई जा रही है, लेकिन देश में टीबी के ऐसे मरीज़ भी हैं जो प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं। देश के कुल टीबी के मरीज़ों में से क़रीब आधे मरीज़ प्राइवेट अस्पतालों से इलाज कराते हैं, इंडियास्पेंड की अक्टूबर 2018 की रिपोर्ट के अनुसार।

रवि कुमार (28) के ढाई साल के बेटे को टीबी की शिकायत है और उसका इलाज प्राइवेट अस्पताल में चल रहा था। रवि उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में रहते हैं। लॉकडाउन में जब उनके बेटे की दवा ख़त्म होने वाली थी तो उन्होंने आस-पास की कई दवा दुकानों पर पता किया, लेकिन कहीं दवा नहीं मिली। आख़िर में परी चौक की एक फ़ार्मेसी पर दवा होने की जानकारी उन्हें मिली। “मैं फ़ार्मेसी के लिए निकला तो मेरी गाड़ी ख़राब हो गई। लॉकडाउन में सब बंद है तो कोई साधन भी नहीं मिला, ऐसी स्थिति में मुझे दवा के लिए 23 किलोमीटर चलना पड़ा। मेरे बेटे की चार दवा चलती है, जिसमें से तीन मिल गई, एक नहीं मिली,” रवि ने बताया।

दवा की तलाश में रवि ने सूरजपुर के डॉट्स सेंटर पर संपर्क किया। वहां से उन्हें बताया गया कि बिसरख के डॉट्स सेंटर में दवा मिल जाएगी। रवि जब बिसरख के डॉट्स सेंटर पहुंचे तो उन्हें सात दिन की दवा दी गई। साथ ही यह बताया गया कि पुरानी दवा की जगह इस दवा को चलाया जाए। रवि का इलाक़ा अब कोरोनावायरस के हॉटस्पॉट में शामिल हो गया है, ऐसे में उन्हें यह डर भी सता रहा है कि आगे वो दवा लेने जा पाएंगे भी या नहीं।

“हम एक महीने की दवा सभी को दे रहे हैं। अगर कोई मरीज़ प्राइवेट अस्पताल में भी दिखा रहा था वह भी दवा ले सकता है। उसे बस अपने नज़दीकी डॉट्स सेंटर पर इसकी जानकारी देनी होगी,'' दवा की उपलब्धता पर यूपी स्टेट टीबी टास्क फ़ोर्स के चेयरमैन सूर्यकांत ने बताया।

 

इन तमाम इंतज़ाम के बाद भी लॉकडाउन की वजह से टीबी के मरीज़ परेशान हो रहे हैं। ऐसे में अगर किसी मरीज़ की दवा छूट जाती है तो उसके क्‍या परिणाम हो सकते हैं। “अगर दवा छूटती है तो इलाज के फ़ेल होने का चांस रहता है। दवा छोड़ने की वजह से यह भी होता है कि उस दवा के प्रति टीबी का बैक्टीरिया प्रतिरोधक क्षमता बना लेता है, ऐसे हाल में वह दवा बैक्टीरिया पर काम नहीं करेगी,” केजीएमयू के रेसपिरेट्री मेडिसीन विभाग के प्रोफेसर संतोष कुमार ने बताया। 

डॉ. संतोष ने टीबी की जिस स्टेज के बारे में बताया, उसे 'ड्रग रेज़िस्टेंस टीबी' के तौर पर जाना जाता है। अगर टीबी के मरीज़ निरंतर दवा नहीं लेते तो इस तरह की टीबी होने का ख़तरा रहता है। ड्रग रेज़िस्टेंस टीबी के मरीज़ों की दुनिया में जितनी संख्या है उसके क़रीब 27% मरीज़ भारत में हैं। यह दुनिया के किसी भी देश से ज़्यादा है, भारत के बाद चीन आता है जहां ऐसे 14% मरीज़ हैं।

(रणविजय, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मऊ ज‍़िले में लॉकडाउन से पहले सरकारी अस्पतालों में हर महीने तपेदिक यानी टीबी के 250 से 300 नए मरीज़़ों की पहचान की जाती थी, लेकिन लॉकडाउन में यह संख्या सिर्फ़ 28 से 30 रह गई है। 

यह कहानी सिर्फ मऊ ज‍़िले की नहीं है। मऊ से 96 किलोमीटर दूर गोरखपुर ज़िले के खजनी ब्लॉक के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) का हाल भी कुछ ऐसा ही है। लॉकडाउन से पहले पीएचसी पर महीने में 5 से 6 नए टीबी के मरीज़़ आते थे, लेकिन लॉकडाउन के बाद से यहां एक भी नया मरीज़़ नहीं आया है।

कोरोनावायरस और लॉकडाउन की वजह से टीबी के मरीज़ों के सामने दोहरा संकट पैदा हो गया है। पहला संकट टीबी के उन मरीज़ों का है जिनकी पहचान की जा चुकी है। दरअसल इलाज के साथ-साथ टीबी के मरीज़ों की लगातार निगरानी भी की जाती है ताकि वह वक़्त पर अपनी दवा लेते रहें। दवा छूटने पर टीबी मरीज़ के अंदर ज़्यादा ख़तरनाक ढंग से वापसी कर सकता है। 

दूसरा संकट टीबी के नए मरीज़ों की पहचान का है। लॉ़कडाउन की वजह से जिन लोगों को टीबी होने की आशंका है वह अस्पताल नहीं जा पा रहे हैं। उनको टीबी है या नहीं इस बात की पुष्टि नहीं हो पा रही है। विशेषज्ञों को आशंका है कि नए मरीज़ों की पहचान ना हो पाने से वह अपने परिवार के दूसरे लोगों को टीबी से संक्रमित कर सकते हैं।

लॉकडाउन के दौरान देश में टीबी मरीज़ों के पंजीकरण के मामलों में 75% तक की गिरावट आई है, हाल ही में आई विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 22 मार्च के बाद के तीन हफ़्तों में रिपोर्ट किए गए टीबी के साप्ताहिक मामले 11,367 हैं जबकि साल 2020 में कोविड-19 के पहले के हफ़्तों में यह औसत 45,875 मरीज़ों का था। इस रिपोर्ट में यह भी आशंका जताई गई है कि समय से पंजीकरण ना होने पर आगे चलकर टीबी के मामलों और उससे होने वाली मौतों में वृद्धि देखने को मिल सकती है।

courtsey: WHO 

  

उत्तर प्रदेश के लिए अहम है टीबी से लड़ाई

भारत के लिए टीबी कितनी बड़ी समस्या है इस बात का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि दुनिया के क़रीब 27% टीबी के मरीज़ भारत में हैं। यानी हर 10 में से लगभग 3 टीबी के मरीज़ भारत में हैं। इस जानलेवा बीमारी से भारत में हर दिन क़रीब 1,200 लोगों की मौत होती है, ग्‍लोबल टीबी रिपोर्ट 2019 के मुताबिक़।

2018 में देश में कुल नोट‍िफाइड टीबी के मरीज़ों की संख्या 21.5 लाख थी और इसमें से क़रीब 20% (4.2 लाख) मरीज़ उत्तर प्रदेश में थे, इंडिया टीबी रिपोर्ट 2019 के मुताबिक़। 

इन आंकड़ों से एक बात साफ़ होती है कि भारत और ख़ासकर उत्तर प्रदेश के लिए टीबी से लड़ाई बहुत ज़रूरी है। इसी के मद्देनज़र केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 24 अप्रैल 2020 को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से यह सुनिश्चित करने को कहा कि कोरोनावायरस महामारी के दौरान टीबी के मरीज़ों की देखभाल में कोई रुकावट न आए, लेकिन ऐसा होते नहीं दिख रहा। खुद उत्तर प्रदेश के टीबी ऑफ़िसर डॉ. संतोष गुप्ता यह बात मानते हैं।

“इस वक्त‍ समस्या यह है कि नए मरीज़ों की पहचान नहीं हो पा रही है, क्योंकि टीबी का पूरा स्टाफ़ कोरोनावायरस की ड्यूटी में लगा है। लगभग 30 से 35% मरीज़ प्राइवेट सेक्टर से आते हैं और लॉकडाउन की वजह से प्राइवेट अस्पताल बंद हैं। ऐसे में सरकारी अस्पतालों में जो थोड़े-बहुत मरीज़ आ रहे हैं उनका ही पता चल पा रहा है,” डॉ. संतोष गुप्ता ने इंडियास्पेंड से कहा।

डॉट्स का महत्व

टीबी के मरीज़ों का इलाज, विश्व स्वास्थ्य संगठन की निर्धारित डॉट्स प्रणाली यानी डायरेक्टली ऑबज़र्व्ड ट्रीटमेंट शॉर्ट कोर्स से किया जाता है। इसमें मरीज़ को वक़्त पर दवा लेने और कोर्स पूरा करने की ज़रूरत होती है। आमतौर पर शुरुआती इलाज से फ़ायदा होता देखकर बड़ी संख्या में टीबी के मरीज़ अपना इलाज बीच में ही छोड़ देते थे जिससे वह दोबारा टीबी का शिकार हो जाते थे। डॉट्स के तहत इलाज के साथ-साथ टीबी मरीज़ों की सीधे तौर पर निगरानी भी की जाती है ताकि वो अपना इलाज समय पर पूरा कर सकें। आज DOTS प्रोग्राम 632 डिस्ट्रिक्ट टीबी सेंटर्स के माध्यम से देश भर में चल रहा है। उत्तर प्रदेश में यह कार्यक्रम 75 ज़िलों में 993 टीबी यूनिट्स के माध्यम से चलाया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश के टीबी मरीज़ लॉकडाउन से प्रभावित

कोरोनावायरस और लॉकडाउन की वजह से उत्तर प्रदेश में टीबी के मरीज़ों का इलाज और उनकी निगरानी का काम तो बुरी तरह से प्रभावित हो ही रहा है साथ ही नए मरीज़ों की पहचान भी नहीं हो पा रही है।

“नए मरीज़ों की संख्या में कमी इसलिए आई है कि अस्पतालों में ओपीडी चल नहीं रही है और टीबी की जांच करने वाले लैब टेक्नीशियन कोरोनावायरस की ड्यूटी में लगे हैं,” मऊ ज़िले के टीबी ऑफ़िसर डॉ. एसपी अग्रवाल ने बताया। 

“ग्रामीण इलाकों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर ओपीडी बंद कर दी गई है। इससे सभी तरह की जांच प्रभावित हैं। मरीज़ भी लॉकडाउन में निकल नहीं पा रहे हैं तो अस्पताल कैसे आएंगे,” गोरखपुर ज़िले के खजनी ब्लॉक के पीएचसी के प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ. संजय गुप्ता ने कहा।

 

उत्तर प्रदेश के इन स्वास्थ्य केंद्रों का हाल दर्शाता है कि कोरोनावायरस से लड़ाई के बीच राज्य में टीबी का इलाज प्रभावित हुआ है। यह हाल तब है जब देश के किसी भी राज्य के मुकाबले उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा टीबी के मरीज़ हैं।

उत्तर प्रदेश के मऊ ज‍़िले का एक डॉट्स सेंटर। फ़ोटो: रणविजय सिंह

नए मरीज़ों की पहचान न होने से बढ़ सकता है ख़तरा

यूपी में नए मरीज़ों को नोटिफ़ाई न कर पाने की जो स्थिति पैदा हुई है इससे सवाल उठता है कि आख़िर इससे नुकसान क्‍या है? इस सवाल के जवाब में कई जानकारों का कहना है कि टीबी हवा से फैलता है, जब मरीज़ घर में रहेगा तो दूसरों को भी संक्रमित कर सकता है। ऐसे में टीबी के मामले बढ़ेंगे। 

“अगर पिछले एक डेढ़ महीने में किसी को टीबी हुई होगी और वह खांस रहा होगा तो इसे अपने परिवार में ही फैला रहा होगा। इन मरीज़ों की वक्त‍ रहते पहचान करते हुए इलाज नहीं शुरू होगा तो इससे संक्रमितों की संख्या बढ़ेगी। टीबी के मरीज़ों की जितनी जल्दी पहचान की जाएगी उतनी ही जल्दी इसके फैलाव पर रोक लगाई जा सकती है,” लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के रेसपिरेट्री मेडीसिन विभाग के प्रोफ़ेसर डॉ. संतोष कुमार ने कहा। 

टीबी की रोकथाम के क्षेत्र में लंबे वक्त‍ से काम कर रहे छत्तीसगढ़ के स्टेट हेल्थ‍ रिसोर्स सेंटर के डॉ. प्रबीर चैटर्जी इसे ख़तरनाक स्थिति बताते हैं। “अगर टीबी के मरीज़ की पहचान करने का काम लंबित होगा तो इससे मरीज़ ज़्यादा बीमार हो सकता है, उसकी इलाज से पहले मौत भी हो सकती है। साथ ही लॉकडाउन में अगर ऐसे मरीज़ परिवार के साथ होंगे, ख़ासकर एक कमरे या छोटी जगह में बंद होंगे तो परिवार के लोगों को भी संक्रमित कर सकते हैं,” उन्होंने कहा।

पहले ही भारत में क़रीब 5.5 लाख टीबी के ऐसे मरीज़ हैं जिनकी पहचान नहीं की हो सकी है। टीबी रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक़, भारत में लगभग 27 लाख टीबी के मरीज़ हैं। 2018 तक देश में 21.5 लाख टीबी के मरीज़ों की पहचान की जा सकी, यानी क़रीब 5.5 लाख मरीज़ों की पहचान नहीं हो पाई है, इंडिया टीबी रिपोर्ट 2019 के मुताबिक़।

टीबी के मरीज़ों की पहचान करने में भारत की स्थिति पहले भी अच्छी नहीं रही है। दुनिया भर में 2018 तक चिन्हित मरीज़ों और अनुमानित मरीज़ों के बीच का अंतर देखा जाए तो भारत इस अंतर के लिए क़रीब 25% ज़िम्मेदार है, ग्‍लोबल टीबी रिपोर्ट 2019 में कहा गया है। इन आंकड़ों और वर्तमान स्थिति से विशलेषण किया जाए तो कहा जा सकता है कि टीबी उन्मूलन में भारत के सामने नई चुनौतियां आने वाली हैं।

 

मरीज़ों को पहुंचाई जा रही दवा लेकिन फ़ॉलो-अप पर रोक

उत्तर प्रदेश में नए मरीज़ों की पहचान करने का काम भले न हो पा रहा हो, लेकिन जिन मरीज़ों का इलाज चल रहा है उन्हें दवा पहुंचाने का काम हो रहा है। “इस वक्त‍ हमारा फ़ोकस इस बात पर है कि जो हमारे रजिस्टर्ड मरीज़ हैं उनके इलाज में बाधा न आ पाए, सारा ध्‍यान इसी पर केंद्रित है। हम मरीज़ों को वक्त‍ पर दवा पहुंचा रहे हैं,” स्टेट टीबी ऑफ़िसर संतोष गुप्ता ने बताया। 

स्टेट टीबी ऑफ़िसर की इस बात की तसदीक मरीज़ भी करते हैं। “मैं बरेली में पढ़ती हूं, वहीं के डॉट्स सेंटर से दवा लेती थी। होली पर घर आई तो कोरोनावायरस की वजह से घर पर ही रुकना पड़ा। मेरी दवा ख़त्म‍ होने वाली थी लेकिन तभी मुझे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से दवा मिल गई,” उत्तर प्रदेश के मऊ ज़िले के कुनवा दर्गा गांव की रहने वाली दिव्यांशी मौर्य ने बताया। 

 

हालांकि, दिव्यांशी यह भी बताती हैं कि जब उन्हें सीने में दर्द की शिकायत हुई तो उन्हें डॉक्टर नहीं मिल पाए थे। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर उनसे कहा गया कि मऊ ज़िला अस्पताल में डॉक्टर मिल जाएंगे। गांव से ज़िला अस्पताल दूर होने की वजह से दिव्यांशी अस्पताल नहीं जा पाईं और दर्द की दवा खाकर रह गईं।

मऊ ज़िले के फतेहपुर मण्डाव के जिस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से दिव्यांशी ने दवा ली थी और जहां उसे डॉक्टर नहीं मिले वहां के डॉट्स सेंटर पर सीनियर ट्रीटमेंट सुपरवाइज़र (एसटीएस) के तौर पर विकास कुमार तैनात हैं। एसटीएस की ज़िम्मेदारी होती है कि वो अपने क्षेत्र में टीबी के मरीज़ों तक दवा पहुंचाए और उनका रिकॉर्ड रखे। इन्हें सरकार की ओर से मोटरसाइकिल भी मिली होती है ताकि अगर कोई टीबी का मरीज़ दवा लेने न आ पाए तो यह उसे दवा पहुंचा सकें।

उत्तर प्रदेश के मऊ ज‍़िले के एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर सीनियर ट्रीटमेंट सुपरवाइज़र विकास कुमार। 

“हम मरीज़ों को एक महीने की दवा दे रहे हैं। हर महीने मरीज़ों का फ़ॉलोअप होता है, जो अभी नहीं हो पा रहा, लेकिन दवा दी जा रही है। फ़ॉलोअप इसलिए भी नहीं हो रहा कि मरीज़ों को बलगम लेकर लैब पर आना होता था, लेकिन लैब टेक्नीशियन कोरोनावायरस की ड्यूटी में लगे हैं तो अभी लैब भी बंद हैं,” कोरोनावायरस के संकट के दौर में टीबी के मरीज़ों के इलाज की पद्धति के बारे में बताते हुए विकास कुमार ने कहा।

प्राइवेट अस्पतालों के मरीज़ ज़्यादा परेशान

यह तो हुई सरकारी अस्पतालों में इलाज करा रहे मरीज़ों की बात जिन्हें दवा पहुंचाई जा रही है, लेकिन देश में टीबी के ऐसे मरीज़ भी हैं जो प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं। देश के कुल टीबी के मरीज़ों में से क़रीब आधे मरीज़ प्राइवेट अस्पतालों से इलाज कराते हैं, इंडियास्पेंड की अक्टूबर 2018 की रिपोर्ट के अनुसार।

रवि कुमार (28) के ढाई साल के बेटे को टीबी की शिकायत है और उसका इलाज प्राइवेट अस्पताल में चल रहा था। रवि उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में रहते हैं। लॉकडाउन में जब उनके बेटे की दवा ख़त्म होने वाली थी तो उन्होंने आस-पास की कई दवा दुकानों पर पता किया, लेकिन कहीं दवा नहीं मिली। आख़िर में परी चौक की एक फ़ार्मेसी पर दवा होने की जानकारी उन्हें मिली। “मैं फ़ार्मेसी के लिए निकला तो मेरी गाड़ी ख़राब हो गई। लॉकडाउन में सब बंद है तो कोई साधन भी नहीं मिला, ऐसी स्थिति में मुझे दवा के लिए 23 किलोमीटर चलना पड़ा। मेरे बेटे की चार दवा चलती है, जिसमें से तीन मिल गई, एक नहीं मिली,” रवि ने बताया।

दवा की तलाश में रवि ने सूरजपुर के डॉट्स सेंटर पर संपर्क किया। वहां से उन्हें बताया गया कि बिसरख के डॉट्स सेंटर में दवा मिल जाएगी। रवि जब बिसरख के डॉट्स सेंटर पहुंचे तो उन्हें सात दिन की दवा दी गई। साथ ही यह बताया गया कि पुरानी दवा की जगह इस दवा को चलाया जाए। रवि का इलाक़ा अब कोरोनावायरस के हॉटस्पॉट में शामिल हो गया है, ऐसे में उन्हें यह डर भी सता रहा है कि आगे वो दवा लेने जा पाएंगे भी या नहीं।

“हम एक महीने की दवा सभी को दे रहे हैं। अगर कोई मरीज़ प्राइवेट अस्पताल में भी दिखा रहा था वह भी दवा ले सकता है। उसे बस अपने नज़दीकी डॉट्स सेंटर पर इसकी जानकारी देनी होगी,'' दवा की उपलब्धता पर यूपी स्टेट टीबी टास्क फ़ोर्स के चेयरमैन सूर्यकांत ने बताया।

 

इन तमाम इंतज़ाम के बाद भी लॉकडाउन की वजह से टीबी के मरीज़ परेशान हो रहे हैं। ऐसे में अगर किसी मरीज़ की दवा छूट जाती है तो उसके क्‍या परिणाम हो सकते हैं। “अगर दवा छूटती है तो इलाज के फ़ेल होने का चांस रहता है। दवा छोड़ने की वजह से यह भी होता है कि उस दवा के प्रति टीबी का बैक्टीरिया प्रतिरोधक क्षमता बना लेता है, ऐसे हाल में वह दवा बैक्टीरिया पर काम नहीं करेगी,” केजीएमयू के रेसपिरेट्री मेडिसीन विभाग के प्रोफेसर संतोष कुमार ने बताया। 

डॉ. संतोष ने टीबी की जिस स्टेज के बारे में बताया, उसे 'ड्रग रेज़िस्टेंस टीबी' के तौर पर जाना जाता है। अगर टीबी के मरीज़ निरंतर दवा नहीं लेते तो इस तरह की टीबी होने का ख़तरा रहता है। ड्रग रेज़िस्टेंस टीबी के मरीज़ों की दुनिया में जितनी संख्या है उसके क़रीब 27% मरीज़ भारत में हैं। यह दुनिया के किसी भी देश से ज़्यादा है, भारत के बाद चीन आता है जहां ऐसे 14% मरीज़ हैं।

(रणविजय, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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