कर्नाटक के 88.6 फीसदी क्षेत्र में सूखा, सरकार ने माना कि जल योजनाओं के डिजाइन में दोष

उत्तरी कर्नाटक का सूखाग्रस्त जिले बेलगावी के अठानी तालुका में पांडेगांव गांव के किसान और सामाजिक कार्यकर्ता 68 वर्षीय धोंडीराम तुकाराम (दाएं) बताते हैं, “पानी नहीं है, फसलें खराब हो गई हैं और किसान अपने मवेशी बेचने को मजबूर हैं।”

अठानी, बेलागवी: उत्तरी उत्तरी कर्नाटक के अठानी तालुका में पांडेगांव गांव के 68 वर्षीय किसान और सामाजिक कार्यकर्ता धोंडीराम तुकाराम सुतार के पास 2.5 एकड़ खेत है। वे हर साल ज्वार उगाते हैं। ज्वार एक सूखी भूमि वाली फसल है, जिसे रबी (सर्दियों) और खरीफ (मानसून) दोनों मौसमों में उगाया जा सकता है। पिछले साल, कम वर्षा के कारण सुतार की पूरी फसल खराब हो गई थी, और वह तब से एक और फसल बोने में असमर्थ रहे हैं।

बेलगावी जिले का हिस्सा अठानी तालुका में बहुत सूखा पड़ रहा है - 1 अक्टूबर से 31 दिसंबर, 2018 तक, अठानी में 135.70 मिमी के औसत के मुकाबले 40.38 मिमी वर्षा दर्ज की गई, जबकि जिले को 152.50 मिमी के मानक के अनुसार 50.60 मिमी बारिश हुई, जैसा कि कर्नाटक राज्य प्राकृतिक आपदा निगरानी केंद्र (कर्नाटक स्टेट नेचुरल डिजैस्टर मानटरिंग सेंटर-केएसएनडीएमसी) द्वारा एकत्र किए गए आंकड़ों से पता चलता है। यह कर्नाटक सरकार के राजस्व विभाग से जुड़ा एक स्वायत्त निकाय है।

पिछले एक दशक से अठानी में वर्षा की कमी है। इतनी कमी कि कृषि के लिए अपर्याप्त है। इसलिए अधिकांश किसानों ने आय के वैकल्पिक स्रोत के रूप में मवेशियों को पालना शुरु किया। सुतार के पास तीन गाय और पांच बकरियां हैं। वह उसका दूध 30 रुपये लीटर में बेचता है। वह मांस के लिए बकरियां भी पालता है और हर छह महीने में उनके दो बच्चे बेचता है (एक बच्चे बकरी 4000-7,000 रुपये मिलते हैं, जबकि मादा 10,000 रुपये में बिकता है)।

हालांकि अब, मवेशियों को पालने के लिए भी पर्याप्त पानी नहीं है। तालुका में ज्यादातर किसान जिनकी फसलें खराब हुई हैं, वे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बीमा भुगतान का लाभ उठाने में असमर्थ रहे हैं।

गांधीनगर के ‘इंडियन इंस्ट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी’ द्वारा चलाए जा रहे ‘ड्राउट अर्ली वार्निंग सिस्टम’ के अनुसार 30 मई, 2019 तक देश में कम से कम 43.87 फीसदी क्षेत्र सूखे से प्रभावित हुए हैं। इस सूखे पर हमारी श्रृंखला की यह छठी और अंतिम रिपोर्ट है।आप पिछली रिपोर्ट को यहां, यहां, यहां और यहां  पढ़ सकते हैं।

Source: DEWS, IIT Gandhinagar; May 2019

जिले भर में सूखा

कर्नाटक ने 30 में से 23 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 28 सितंबर, 2018 की रिपोर्ट में बताया है। सेंट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ड्राईलैंड एग्रीकल्चर के एक विश्लेषण के अनुसार, इनमें से कम से कम 16 सूखा-प्रवण हैं। ये जिले देश के उन 24 जिलों में भी शामिल हैं, जो सूखे से निजात दिलाने के लिए चर्चा में हैं, जैसा कि राजस्व मंत्री आर वी देशपांडे ने दिसंबर 2018 में विधान सभा को बताया है। बेलागवी की पहचान स्थायी रूप से सूखाग्रस्त क्षेत्र के रूप में की गई है, जैसा कि ‘द हिंदू’ ने 19 दिसंबर 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

लंबे समय तक सूखे के कारण, उत्तरी कर्नाटक के बेलगावी जिले के अठानी तालुका के गांवों में बोरवेल, जो यहां पानी के प्राथमिक स्रोत हैं, सूख गए हैं। इस कारण गन्ने जैसे फसल नहीं हो पाते हैं।

कर्नाटक में कम से कम सात जिलों को, जहां औसत वर्षा -99 फीसदी और -60 फीसदी के बीच कमी है, ‘न्यून श्रेणी’ में चिह्नित किया गया है। इसका आधार प्री-मॉनसून वर्षा यानी 01 मार्च से 31 मई, 2019 तक की वर्षा पर केएसएनडीएमसी द्वारा एकत्र आंकड़ें हैं।

Source: Karnataka State Natural Disaster Monitoring Centre Note: Data is between March 1 to May 31, 2019

बेलगावी 31 मिमी की वर्षा रिकॉर्ड करने वाले छह जिलों में से एक है, यहां 68 फीसदी की कमी है। अथानी में, प्री-मॉनसून वर्षा 36 मिमी थी; औसत वर्षा से 52 फीसदी की कमी। पड़ोसी तालुकों जैसे चिरकोड़ी (18 मिमी वर्षा, कमी-80 फीसदी), रायबाग (28 मिमी वर्षा, कमी 63 फीसदी) और गोकक (16 मिमी वर्षा, कमी -85 फीसदी) में स्थिति गंभीर है।

Source: Karnataka State Natural Disaster Monitoring Centre * Height above Local Ground Level

अठानी को हर साल औसतन केवल 34 दिनों की बारिश मिली है-बेलगावी जिले के 10 तालुकाओं में सबसे कम। इसका सत्यापन बेलगावी जिला सांख्यिकीय कार्यालय द्वारा 1951 और 2000 के बीच एकत्र किए गए आंकड़ों से होता है। यहां वर्षा जून, जुलाई और अगस्त में केंद्रित है।

तालुका में बारिश का अंतर हर गुजरते साल के साथ स्थिति को और खराब करते हैं। सुतार ने कहा, "पानी नहीं होने के कारण किसान अपने मवेशियों को बेचने के लिए मजबूर हैं।"

इंडियन कांउसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च के तहत ‘ऑल इंडिया कोऑर्डनैटिड रिसर्च प्रोजेक्ट’

( एआईआरसीपी ) पर काम करने वाले एग्रोमेथेरोलॉजिस्ट,एच वेंकटेश के अनुसार, उत्तरी कर्नाटक जिले में वर्षा भी साल-दर-साल बदलती रहती है। जहां एक साल में जून में अच्छी बारिश हो सकती है, वहीं अगले साल जुलाई में मानसून देर से शुरू हो सकता है। वेंकटेश ने कहा, "यह अल्पकालिक फसलों के लिए फसल के मौसम के दौरान अक्टूबर में नियमित रूप से बारिश होती है। हम अल्पकालिक और मध्यम अवधि की बारिश का पूर्वानुमान प्रदान करते हैं। विस्तारित दीर्घकालिक पूर्वानुमान एक प्रयोगात्मक चरण में है। ये भविष्यवाणियां हवामना कृषि मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से किसानों तक पहुंचती हैं।”

केएसएनडीएमसी में वरुण मित्र नाम के तीन-लाइन हेल्प-डेस्क है, जो पूरे कर्नाटक के किसानों को 24x7,मौसम संबंधी जानकारी प्रदान करते हैं। केएसएनडीएमसी के निदेशक जी एस श्रीनिवास रेड्डी कहते हैं, "2018 में, हमें 1,525,000 कॉल मिले, जिसमें से 52,471 कॉल बेलगावी के किसानों के थे।"

भारतीय मौसम विभाग जिलावार मौसम पूर्वानुमान प्रदान करता है, जबकि केएसएनडीएमसी किसानों को गांव स्तर की मौसम की जानकारी देता है। अठानी के शिरुर गांव के किसान 70 वर्षीय पांडुरंग माने 2.5 एकड़ भूमि पर मक्का और बाजरा (मोती बाजरा) उगाते हैं। पिछले दो वर्षों में अपर्याप्त वर्षा के कारण माने की अच्छी फसल नहीं हुई है। वह कहते हैं, "जो बीज मैंने पिछले साल बोया था, वह अंकुरित भी नहीं हुआ।” खेती से माने की वार्षिक आय लगभग 20,000 रुपये है। उसे 5,000-6,000 रुपये बचते हैं, जिसमें वह पैसा भी शामिल है जो उसके बच्चे उसे भेजते हैं। वह कहते हैं, “हर गुजरते साल के साथ, मेरी आय में भारी कमी हो रही है। इस उम्र में मुझे एक खेती मजदूर के रूप में नौकरी भी नहीं मिल सकती है।”

पानी के लिए खुदाई एक वीरता भरा काम

अठानी में लगभग 600,000 लोग अपनी सभी जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भर हैं - पीने से लेकर खेती तक - लेकिन भूजल स्तर इस हद तक कम हो गया है कि बोरवेल, जो क्षेत्र में हर तरफ मौजूद है, सूख गए हैं। लगभग 120 फीट गहराई के कुछ खुले कुएं हैं, लेकिन पानी तक पहुंचने के लिए, कुएं को 700 से 800 फीट गहरा करना होगा, जिसके लिए पंचायतों से अनुमति लेनी होगी।

Source: District Statistical Office, Belagavi

‘इन्स्टटूट फॉर सोशल एंड इकोनोमिक चेंज’ में प्रोफेसर और कृषि जल प्रबंधन के विशेषज्ञ, ए वी मंजूनाथ कहते हैं, "बोरवेल्स अब अपने उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर रहे हैं। इसके अलावा, उच्च फ्लोराइड [सामग्री] के कारण बोरवेल पानी की गुणवत्ता भी खराब है।"

मार्च 2017 में, सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड द्वारा प्रकाशित अथानी तालुका के लिए जल प्रबंधन योजना पर एक रिपोर्ट के अनुसार, पानी में फ्लोराइड और नाइट्रेट के स्तर स्वस्थ सीमा से परे हैं।

इसके अलावा, कोलार और चिक्काबल्लापुर जैसे क्षेत्रों में बांध भी सूख गए हैं।

सीमावर्ती गांवों में स्थिति

कर्नाटक का लगभग 88.6 फीसदी क्षेत्र सूखाग्रस्त है - 176 तालुकाओं में से 156 तालुका सूखे हैं। रबी मौसम में नुकसान का अनुमान लगाने के लिए एक संयुक्त सर्वेक्षण राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा आयोजित किया जाना था। ग्रामीणों ने कहा कि टीमों ने अभी तक सभी गांवों, विशेषकर उन सीमावर्ती महाराष्ट्र का दौरा नहीं किया था। बेलगावी जिला प्रशासन की सर्वेक्षण रिपोर्टों के अनुसार, जिसकी इंडियास्पेंड ने समीक्षा की है, कुछ प्राथमिक सुविधाएं जैसे चारा बैंक और टैंकर पानी की आपूर्ति शुरू की गई हैं, हालांकि उनकी उपलब्धता अपर्याप्त है।

पीने के पानी, पशुओं के लिए चारा, सिंचाई के लिए पानी और आजीविका का साधन के बिना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना-मनरेगा के तहत रोजगार भी कठिन है। सीमा के करीब रहने वाले ग्रामीण महाराष्ट्र के सांगली जिले के केवठे-महंकल, धूलगांव, सालगारे और महालुंगे जैसे गांवों की ओर पलायन कर रहे हैं। पड़ोसी राज्य के क्षेत्र ‘अच्छी तरह से सिंचित’ हैं, और वहां ‘काम ढूंढना आसान है’, ग्रामीणों ने इंडियास्पेंड को बताया।

फसल खराब होने का मुआवजा

उत्तरी कर्नाटक के सूखाग्रस्त अठानी तालुका के 70 वर्षीय पांडुरंग माने (बाएं) कहते हैं, "पिछले साल मैंने जो बीज बोए थे, वे अंकुरित भी नहीं हुए।" उनका कहना है कि हर साल उनकी आमदनी कम होती जा रही है और वह इस उम्र में खेत मजदूर के रूप में काम नहीं कर सकते।

अठानी में जल-गहन गन्ना एक प्रमुख व्यावसायिक फसल है। यह एक आत्म-विनाशकारी पैटर्न में अच्छी तरह से जाना जाता है और किसान अपने संभावित अधिक आकर्षक रिटर्न के लिए गन्ने की खेती करना जारी रखते हैं, जो इसे देश का तीसरा सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक बनाता है और भारत के चीनी उत्पादन में 16 फीसदी की हिस्सेदारी है। वर्तमान में, केवल कृष्णा नदी के किनारे स्थित क्षेत्रों में इसकी खेती की जाती है।

कपास, मक्का, ज्वार, बाजरा, रागी, गेहूं और चना जैसी कई शुष्क फसलें ऐसे क्षेत्रों में उगाई जा रही हैं, जहां पानी की आसान पहुंच नहीं है। ऐनापुर, शिरहट्टी, सप्तसागर, शंकरपट्टी, दारूर और सत्ती जैसे गांव कृष्णा नदी के करीब हैं और पानी से भरपूर फसलों के अनुकूल हैं। ये गांव नदी से दूर स्थित और बेहद कम वर्षा प्राप्त करने वाले गांवों जैसे कि जांबगी, अजुर, मदाभवी, पांडेगांव, मलाबाद, शिरूर, अनंतपुर और शिवनूर की तुलना में उन्नतिशील हैं।

रबी मौसम (2018) के दौरान पानी की कमी के कारण अठानी में कुल फसल नुकसान 34,604 हेक्टेयर (बोए गए क्षेत्र का 1,60,774 हेक्टेयर) है। केंद्रीय टीम की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार पर, 23,375 किसानों को राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष और राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष के तहत संयुक्त रूप से 2,353.08 लाख रुपये का मुआवजा मिलना था। हालांकि, इसके लिए धनराशि अभी जारी नहीं की गई है।

पीएमएफबीवाई फसल बीमा योजना ने बेलगावी जिले में सबसे अधिक नामांकन देखा गया। अकेले 2016 में, रबी मौसम के लिए 140,089 और खरीफ मौसम के लिए 31,538 किसानों ने नामांकन किया था। 2017 में, अच्छी वर्षा के कारण यह संख्या रबी मौसम के लिए केवल 1,910 किसानों और खरीफ सीजन में 151 किसानों ने नामांकन किया।

2018 में, अठानी के 1,849 किसानों ने रबी मौसम के दौरान और खरीफ मौसम के दौरान 8,547 किसानों ने फसल बीमा के लिए नामांकन किया। हालांकि, किसानों को केवल 2016 तक की अवधि के लिए मुआवजा दिया गया है। 2017 और 2018 में फसल विफलता का सामना करने वाले किसानों को मुआवजा दिया जाना बाकी है, क्योंकि केंद्र सरकार ने धनराशि जारी नहीं की है, जैसा कि जिला कलेक्टर एस.बी.बोम्मनहल्ली ने इंडियास्पेंड को बताया है।

मवेशियों के लिए चारा नहीं

खिलेगांव गांव में, पशुओं के चरने के लिए खेत नहीं हैं। गांव के मूल निवासी और 55 वर्षीय किसान अन्नाप्पा निम्बल ने कहा, "हम अपने मवेशियों को पालने के लिए पूरी तरह से चारा बैंकों पर निर्भर हैं।" चार गायों का मालिक माने ने भी सहमति में सिर हिलाया। 2 फरवरी, 2019 को खोले गए शिरूर गांव में चारा बैंक शिरूर, सांबरागी और पांडेगांव गांवों की आपूर्ति करता है। मोल, खलीगांव और अजुर पंचायतों में अधिक चारा बैंक खुले हैं।

बारिश नहीं होने की वजह से चारा बैंकों में सीमित या कोई स्टॉक नहीं होने के कारण, अठानी तालुका के किसान या तो पड़ोसी महाराष्ट्र में अपने रिश्तेदारों के यहां मवेशी भेजते हैं या जहां भी हरियाली उपलब्ध है, उसकी तलाश में मवेशियों को भटकने देते हैं।

चारे का लाभ उठाने के लिए, किसानों को आधार कार्ड प्रदान करना होता है और लेखाकार द्वारा स्वीकार की गई पुस्तक में खरीद का रिकॉर्ड रखना होता है। पशु चिकित्सा अधिकारी प्रत्येक गांव में किसानों की सूची और उनके पास मवेशियों की संख्या के साथ अधिकारियों को प्रदान करते हैं। शिरूर तलाठी कार्यालय में राजस्व विभाग में तालथी (ग्राम लेखाकार), 35 साल के एम बी पाटिल कहते हैं,"यह चारे की वास्तविक समय की आवश्यकता के प्रावधान को सुनिश्चित करता है और चारे के दुरुपयोग को रोकता है।" अकेले शिरूर गांव में 2,200 मवेशी हैं। लगभग 180 किसान नियमित रूप से चारा बैंक की सेवाओं का लाभ उठाते हैं।

ग्रामीण बताते हैं कि प्रत्येक पशु को गीले चारे के लिए 1 रुपये प्रति किलोग्राम और सूखे चारे के लिए 2 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से 15 किलोग्राम चारा दिया जाता है। हालांकि, एक स्वस्थ गाय को पर्याप्त दूध देने के लिए, प्रति दिन कम से कम 20-25 किलोग्राम चारे की आवश्यकता होती है। कभी-कभी, किसान महाराष्ट्र में अपने रिश्तेदारों के यहां मवेशियों को भेज देते हैं, जहां पर्याप्त पानी और चारा होता है।

चीनी मिलों से गन्ना बैगस चारा का प्राथमिक स्रोत है और इसमें प्रत्येक चारा बैंक में लाया गया 1,518 टन गन्ना शामिल है। हालांकि, जब गर्मी के दौरान मिलें बंद हो जाती हैं, तो फीड की कमी होती है। इससे पहले, गोशालाएं (गाय आश्रय स्थल) थीं, लेकिन पिछले पांच वर्षों से यह अवधारणा ठहर सी गई है। सुतार कहते हैं, ''इसे वापस लाया जाना चाहिए।”

इससे पहले, किसान अपने मवेशियों को गोशालाओं में जमा कर सकते थे, जिन्हें पंचायत विकास और राजस्व अधिकारियों के साथ एक टास्क फोर्स द्वारा चलाया जाता था। इन्हें पांच साल पहले चारा बैंकों में बदल दिया गया था।

निकटतम चारा बैंक तक जाने के लिए किसान तीन से चार किलोमीटर तक चलने को मजबूर हैं। पाटिल कहते हैं, ''सूखे की स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है, सांबरगी और अन्य गांवों में और अधिक चारा बैंक खोले जाएंगे।''

सूखे के दौरान रोजगार सृजन महत्वपूर्ण

खलीगांव के किसान निम्बल कहते हैं, “हालांकि हमारे पास कृषि योग्य भूमि है, लेकिन हम खेती करने में असमर्थ हैं। हमें मनरेगा योजना के तहत कोई रोजगार भी नहीं मिल रहा है। हम एक भयावह जीवन जी रहे हैं।”

कोई विकल्प नहीं बचा है, ग्रामीण खेतों और निर्माण स्थलों पर काम की तलाश में पड़ोसी महाराष्ट्र में की ओर जा रहे हैं। शिरूर के रहने वाले माने के दो बेटे हैं, जो अपनी पत्नियों के साथ, महाराष्ट्र में मिराज और सांगली में कुछ अलग तरह के काम करते हैं। माने कहते हैं, "वे महीने में एक बार गांव आते हैं।"

ग्राम पंचायतों ने मनरेगा के तहत नए कार्यों को शुरू करना बंद कर दिया है, और वर्षों से मनरेगा के तहत पूरा होने वाले कार्यों का प्रतिशत कम हो गया है। अधिकारियों का दावा है कि नए विकास कार्यों के लिए कोई बजट आवंटन नहीं है। मनरेगा वेबसाइट के अनुसार, अठानी में, जारी किए गए जॉब कार्ड की संख्या 3,226 है, और 1,403 पंजीकृत सक्रिय कर्मचारी हैं। हालांकि, चालू वर्ष में पंजीकृत सक्रिय श्रमिकों की संख्या केवल 281 है।

बेलगावी के एक कार्यकर्ता, 55 वर्षीय शिवाजी कगनिकर कहते हैं, “जिला पंचायत की ओर से गांवों में बांध निर्माण कार्य करने की आवश्यकता है। यह सूखा प्रभावित क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रहण में मदद करेगा और रोजगार के लिए भी अवसर भी पैदा करेगा।”

ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के लिए मनरेगा एक महत्वपूर्ण जीवन रेखा है, क्योंकि यह योजना सूखा प्रभावित क्षेत्रों में, एक वर्ष में 150 दिन की गारंटी वाले रोजगार का आश्वासन देती है। एनजीओ जनजागरण के साथ जुड़े एक कार्यकर्ता और बेलगावी में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम चलाने वाले एनजीओ, भ्रष्टाचार निर्मूलन समिति के सदस्य, 55 वर्षीय शिवाजी कगनिकर ने कहा, "मनरेगा एकमात्र ऐसा कार्यक्रम है, जो सूखा ग्रस्त क्षेत्रों में गरीब लोगों को दिन में दो बार भोजन प्राप्त करने में मदद करेगा।"

हालांकि, कुछ ग्रामीणों ने इंडियास्पेंड से कहा कि जब तक ग्रामीण महिलाएं बड़ी संख्या में इसके लिए संघर्ष नहीं करतीं, तब तक नौकरी नहीं दी जाती। उन्होंने कहा कि समय पर मजदूरी का भुगतान नहीं किया जाता और भ्रष्टाचार व्याप्त है। “कुछ क्षेत्रों में, लोग नकली जॉब कार्ड और बैंक खाते बनाते हैं”, कगानिकर ने कहा- “जिला पंचायत को सूखा प्रभावित क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रहण के लिए मनरेगा के तहत बांध निर्माण कार्य करना चाहिए, जिससे रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। अधिक पारदर्शिता और कार्यक्रम के बारे में जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है।”

दोषपूर्ण जल योजना

सरकारी पानी टैंकर की ओर से प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 40 लीटर पानी देने की योजना है, लेकिन ग्रामीणों की शिकायत है कि उन्हें केवल 15-20 लीटर (दो से तीन बर्तन) पानी मिलते हैं। उत्तरी कर्नाटक में अठानी तालुका के मोल गांव में एक पानी के टैंकर के सामने बर्तनों की एक कतार।

अठानी के उगर खुर्द शहर की 45 वर्षीय गृहिणी, सावित्री रोकड़े ने हाल ही में पीने के पानी की कमी के खिलाफ एक महिला-विरोध मार्च का नेतृत्व किया है। उन्होंने पानी की समस्या के लिए राजनेताओं को दोषी ठहराया: “यह कुछ वर्षों से चल रहा है, और अधिकारियों को इस मुद्दे को हल करने के लिए एक स्थायी समाधान नहीं मिल पाया है। अमीर लोग 20 रुपये में पानी का बर्तन खरीद सकते हैं। गरीब अपनी प्यास कैसे बुझाएंगे और अपने मवेशियों को कैसे पालेंगे? अधिकारियों को पानी की कमी खत्म होने तक गांवों में पर्याप्त पानी के टैंकर उपलब्ध कराने चाहिए। ”

राज्य सरकार की मल्टी विलेज वाटर स्कीम (एमवीएस), जो गांवों को नदी के पानी की आपूर्ति करती है, कृष्णा नदी से अठानी गांवों को पीने का पानी लाती है। हालांकि, जब नदी गर्मियों में सूख जाती है, तो योजना बेकार हो जाती है, और अठानी और कागवाड तालुका सबसे अधिक पीड़ित होते हैं।

यह ‘डिजाइन दोष’ विभिन्न जल योजनाओं में मौजूद है, जैसा कि ग्रामीण विकास और पंचायत राज मंत्री, कृष्ण बायरे गौड़ा ने 18 मई, 2019 को एक संवाददाता सम्मेलन में स्वीकार किया था। उन्होंने कहा था कि लगभग 75 जल योजनाओं ने काम करना बंद कर दिया है और इसका कारण पानी की कमी और बैक-अप योजना का अभाव है।

स्थिति और बदतर होती जा रही है, क्योंकि महाराष्ट्र सरकार उत्तरी कर्नाटक के कोयना बांध से सूखाग्रस्त गांवों के लिए पानी नहीं छोड़ रही है। पिछले कई वर्षों से पानी छोड़ा जाता रहा है।

केएसएनडीएमसी के अनुसार कर्नाटक के 13 जलाशयों में जल स्तर, उनकी कुल संग्रहण क्षमता के 13.38 फीसदी तक कम है।

सार्वजनिक-निजी भागीदारी मोड में एक बसवेश्वरा-केम्पवाड़ लिफ्ट सिंचाई परियोजना का लक्ष्य 1,363 करोड़ रुपये (204.88 मिलियन डॉलर) की लागत से अठानी में लगभग 27,462 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई करना है। यह लगभग 20 गांवों की कमी पूरा करने के लिए कृष्णा के बाएं किनारे से पानी उठाएगा। इस परियोजना से जुड़े अधिकारी एम श्रीनिवास ने इंडियास्पेंड को बताया, “हालांकि, इस परियोजना के कार्यशील होने में कम से कम साढ़े तीन साल लगेंगे।”

पिछले पांच वर्षों में, केंद्र ने राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल परियोजना के तहत कर्नाटक के लिए 64 फीसदी धन में कटौती की है। डेक्कन हेराल्ड ने फरवरी 2019 में एक रिपोर्ट में बताया था कि 2018-19 में केंद्र का योगदान 868.76 करोड़ रुपये से गिरकर 312.33 करोड़ रुपये हो गया है।

पिछले 14 वर्षों से अठानी में लगातार सूखे का सामना करना पड़ रहा है, बंड (तटबंध और वर्षा जल को रोकने के लिए किए गए तटबंध) और झीलें सूख गई हैं। सरकार कुछ झीलों को फिर से जिंदा कर रही है, लेकिन अभी तक उन पाइपलाइन्स को लगाना बाकी है, जो मानसून के दौरान कृष्णा से झीलों तक पानी ले जाएगी।सरकारी पानी के टैंकरों से प्रति व्यक्ति प्रति दिन कम से कम 40 लीटर पानी की आपूर्ति की जानी है। हालांकि, ग्रामीणों का दावा है कि उन्हें केवल 15-20 लीटर (दो से तीन बर्तन) मिलते हैं - स्नान, कपड़े धोने या खेतों के लिए पानी पर्याप्त नहीं है, इसलिए वे इन गतिविधियों के लिए पीने के पानी का उपयोग करते हैं।

सूखे से बचने का रास्ता

ड्रायलैंड कृषि प्रथाओं से मिट्टी में नमी को संरक्षित करने में मदद मिल सकती है। एआईसीआरपी में एग्रोनॉमी के वरिष्ठ वैज्ञानिक सुरकोद वी. एस कहते हैं, "उत्पादकता बढ़ाने के लिए या अच्छी पैदावार पाने के लिए, सूखे के दौरान भी, किसानों को कम जमीन पर खड़ी जुताई करनी चाहिए, ताकि बारिश का पानी मानसून के दौरान खेतों में काटा जा सके, जो मिट्टी की नमी बनाए रखने में मदद करता है।"

सुरकोद कहते हैं, “रबी के मौसम में, किसानों को बीज बोते समय छोटे चौकोर पैटर्न में भूमि की खेती करनी चाहिए, जो पानी को बनाए रखने और मिट्टी की नमी को बनाए रखने में मदद करता है।” अठानी के पास विजयपुरा में हनवद गांव में किसानों को सूखे के दौरान भी इस पद्धति का अभ्यास करने के लिए भी अच्छी उपज मिल रही है।

सूक्ष्म सिंचाई तकनीक, जैसे ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर से शुष्क क्षेत्रों में व्यवहार्य कृषि की सुविधा प्रदान की जा सकती है। मंजूनाथ कहते हैं, “लोगों को लगता है कि अगर नहरों के माध्यम से सतह का पानी आसानी से उपलब्ध है, तो उन्हें ड्रिप सिंचाई का विकल्प क्यों चुनना चाहिए। हालांकि, नहरों से दूर रहने वाले लोगों को हमेशा कम पानी मिलता है। यदि ऊपर की ओर रहने वाले किसान ड्रिप सिंचाई का उपयोग करते हैं, तो नीचे रहने वाले लोग गंभीर जल तनाव का अनुभव नहीं करेंगे।”

मल्चिंग जैसी पारंपरिक और आसान तकनीक भी मिट्टी की नमी को बनाए रखने और पानी के संरक्षण में मदद कर सकती है। बंड बारिश के पानी को स्टोर करने और बहते पानी को रोकने के लिए एक और साधन है। मिट्टी और जल संरक्षण कार्यक्रमों में ज्यादा निवेश कर्नाटक की सूखे की स्थिति को कम करने के लिए आवश्यक हैं।

सूखे पर हमारी छह-आलेखों की श्रृंखला अब समाप्त होती है। पिछले आलेख आप यहां, यहां, यहां,यहां और यहां पढ़ सकते हैं।

(शंकर बेलगावी में रहने वाले स्वतंत्र पत्रकार हैं और 101Reporters.com के सदस्य हैं। 101Reporters.com जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों का अखिल भारतीय स्तर का नेटवर्क है।)

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 14 जून 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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अठानी, बेलागवी: उत्तरी उत्तरी कर्नाटक के अठानी तालुका में पांडेगांव गांव के 68 वर्षीय किसान और सामाजिक कार्यकर्ता धोंडीराम तुकाराम सुतार के पास 2.5 एकड़ खेत है। वे हर साल ज्वार उगाते हैं। ज्वार एक सूखी भूमि वाली फसल है, जिसे रबी (सर्दियों) और खरीफ (मानसून) दोनों मौसमों में उगाया जा सकता है। पिछले साल, कम वर्षा के कारण सुतार की पूरी फसल खराब हो गई थी, और वह तब से एक और फसल बोने में असमर्थ रहे हैं।

बेलगावी जिले का हिस्सा अठानी तालुका में बहुत सूखा पड़ रहा है - 1 अक्टूबर से 31 दिसंबर, 2018 तक, अठानी में 135.70 मिमी के औसत के मुकाबले 40.38 मिमी वर्षा दर्ज की गई, जबकि जिले को 152.50 मिमी के मानक के अनुसार 50.60 मिमी बारिश हुई, जैसा कि कर्नाटक राज्य प्राकृतिक आपदा निगरानी केंद्र (कर्नाटक स्टेट नेचुरल डिजैस्टर मानटरिंग सेंटर-केएसएनडीएमसी) द्वारा एकत्र किए गए आंकड़ों से पता चलता है। यह कर्नाटक सरकार के राजस्व विभाग से जुड़ा एक स्वायत्त निकाय है।

पिछले एक दशक से अठानी में वर्षा की कमी है। इतनी कमी कि कृषि के लिए अपर्याप्त है। इसलिए अधिकांश किसानों ने आय के वैकल्पिक स्रोत के रूप में मवेशियों को पालना शुरु किया। सुतार के पास तीन गाय और पांच बकरियां हैं। वह उसका दूध 30 रुपये लीटर में बेचता है। वह मांस के लिए बकरियां भी पालता है और हर छह महीने में उनके दो बच्चे बेचता है (एक बच्चे बकरी 4000-7,000 रुपये मिलते हैं, जबकि मादा 10,000 रुपये में बिकता है)।

हालांकि अब, मवेशियों को पालने के लिए भी पर्याप्त पानी नहीं है। तालुका में ज्यादातर किसान जिनकी फसलें खराब हुई हैं, वे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बीमा भुगतान का लाभ उठाने में असमर्थ रहे हैं।

गांधीनगर के ‘इंडियन इंस्ट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी’ द्वारा चलाए जा रहे ‘ड्राउट अर्ली वार्निंग सिस्टम’ के अनुसार 30 मई, 2019 तक देश में कम से कम 43.87 फीसदी क्षेत्र सूखे से प्रभावित हुए हैं। इस सूखे पर हमारी श्रृंखला की यह छठी और अंतिम रिपोर्ट है।आप पिछली रिपोर्ट को यहां, यहां, यहां और यहां  पढ़ सकते हैं।

Source: DEWS, IIT Gandhinagar; May 2019

जिले भर में सूखा

कर्नाटक ने 30 में से 23 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 28 सितंबर, 2018 की रिपोर्ट में बताया है। सेंट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ड्राईलैंड एग्रीकल्चर के एक विश्लेषण के अनुसार, इनमें से कम से कम 16 सूखा-प्रवण हैं। ये जिले देश के उन 24 जिलों में भी शामिल हैं, जो सूखे से निजात दिलाने के लिए चर्चा में हैं, जैसा कि राजस्व मंत्री आर वी देशपांडे ने दिसंबर 2018 में विधान सभा को बताया है। बेलागवी की पहचान स्थायी रूप से सूखाग्रस्त क्षेत्र के रूप में की गई है, जैसा कि ‘द हिंदू’ ने 19 दिसंबर 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

लंबे समय तक सूखे के कारण, उत्तरी कर्नाटक के बेलगावी जिले के अठानी तालुका के गांवों में बोरवेल, जो यहां पानी के प्राथमिक स्रोत हैं, सूख गए हैं। इस कारण गन्ने जैसे फसल नहीं हो पाते हैं।

कर्नाटक में कम से कम सात जिलों को, जहां औसत वर्षा -99 फीसदी और -60 फीसदी के बीच कमी है, ‘न्यून श्रेणी’ में चिह्नित किया गया है। इसका आधार प्री-मॉनसून वर्षा यानी 01 मार्च से 31 मई, 2019 तक की वर्षा पर केएसएनडीएमसी द्वारा एकत्र आंकड़ें हैं।

Source: Karnataka State Natural Disaster Monitoring Centre Note: Data is between March 1 to May 31, 2019

बेलगावी 31 मिमी की वर्षा रिकॉर्ड करने वाले छह जिलों में से एक है, यहां 68 फीसदी की कमी है। अथानी में, प्री-मॉनसून वर्षा 36 मिमी थी; औसत वर्षा से 52 फीसदी की कमी। पड़ोसी तालुकों जैसे चिरकोड़ी (18 मिमी वर्षा, कमी-80 फीसदी), रायबाग (28 मिमी वर्षा, कमी 63 फीसदी) और गोकक (16 मिमी वर्षा, कमी -85 फीसदी) में स्थिति गंभीर है।

Source: Karnataka State Natural Disaster Monitoring Centre * Height above Local Ground Level

अठानी को हर साल औसतन केवल 34 दिनों की बारिश मिली है-बेलगावी जिले के 10 तालुकाओं में सबसे कम। इसका सत्यापन बेलगावी जिला सांख्यिकीय कार्यालय द्वारा 1951 और 2000 के बीच एकत्र किए गए आंकड़ों से होता है। यहां वर्षा जून, जुलाई और अगस्त में केंद्रित है।

तालुका में बारिश का अंतर हर गुजरते साल के साथ स्थिति को और खराब करते हैं। सुतार ने कहा, "पानी नहीं होने के कारण किसान अपने मवेशियों को बेचने के लिए मजबूर हैं।"

इंडियन कांउसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च के तहत ‘ऑल इंडिया कोऑर्डनैटिड रिसर्च प्रोजेक्ट’

( एआईआरसीपी ) पर काम करने वाले एग्रोमेथेरोलॉजिस्ट,एच वेंकटेश के अनुसार, उत्तरी कर्नाटक जिले में वर्षा भी साल-दर-साल बदलती रहती है। जहां एक साल में जून में अच्छी बारिश हो सकती है, वहीं अगले साल जुलाई में मानसून देर से शुरू हो सकता है। वेंकटेश ने कहा, "यह अल्पकालिक फसलों के लिए फसल के मौसम के दौरान अक्टूबर में नियमित रूप से बारिश होती है। हम अल्पकालिक और मध्यम अवधि की बारिश का पूर्वानुमान प्रदान करते हैं। विस्तारित दीर्घकालिक पूर्वानुमान एक प्रयोगात्मक चरण में है। ये भविष्यवाणियां हवामना कृषि मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से किसानों तक पहुंचती हैं।”

केएसएनडीएमसी में वरुण मित्र नाम के तीन-लाइन हेल्प-डेस्क है, जो पूरे कर्नाटक के किसानों को 24x7,मौसम संबंधी जानकारी प्रदान करते हैं। केएसएनडीएमसी के निदेशक जी एस श्रीनिवास रेड्डी कहते हैं, "2018 में, हमें 1,525,000 कॉल मिले, जिसमें से 52,471 कॉल बेलगावी के किसानों के थे।"

भारतीय मौसम विभाग जिलावार मौसम पूर्वानुमान प्रदान करता है, जबकि केएसएनडीएमसी किसानों को गांव स्तर की मौसम की जानकारी देता है। अठानी के शिरुर गांव के किसान 70 वर्षीय पांडुरंग माने 2.5 एकड़ भूमि पर मक्का और बाजरा (मोती बाजरा) उगाते हैं। पिछले दो वर्षों में अपर्याप्त वर्षा के कारण माने की अच्छी फसल नहीं हुई है। वह कहते हैं, "जो बीज मैंने पिछले साल बोया था, वह अंकुरित भी नहीं हुआ।” खेती से माने की वार्षिक आय लगभग 20,000 रुपये है। उसे 5,000-6,000 रुपये बचते हैं, जिसमें वह पैसा भी शामिल है जो उसके बच्चे उसे भेजते हैं। वह कहते हैं, “हर गुजरते साल के साथ, मेरी आय में भारी कमी हो रही है। इस उम्र में मुझे एक खेती मजदूर के रूप में नौकरी भी नहीं मिल सकती है।”

पानी के लिए खुदाई एक वीरता भरा काम

अठानी में लगभग 600,000 लोग अपनी सभी जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भर हैं - पीने से लेकर खेती तक - लेकिन भूजल स्तर इस हद तक कम हो गया है कि बोरवेल, जो क्षेत्र में हर तरफ मौजूद है, सूख गए हैं। लगभग 120 फीट गहराई के कुछ खुले कुएं हैं, लेकिन पानी तक पहुंचने के लिए, कुएं को 700 से 800 फीट गहरा करना होगा, जिसके लिए पंचायतों से अनुमति लेनी होगी।

Source: District Statistical Office, Belagavi

‘इन्स्टटूट फॉर सोशल एंड इकोनोमिक चेंज’ में प्रोफेसर और कृषि जल प्रबंधन के विशेषज्ञ, ए वी मंजूनाथ कहते हैं, "बोरवेल्स अब अपने उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर रहे हैं। इसके अलावा, उच्च फ्लोराइड [सामग्री] के कारण बोरवेल पानी की गुणवत्ता भी खराब है।"

मार्च 2017 में, सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड द्वारा प्रकाशित अथानी तालुका के लिए जल प्रबंधन योजना पर एक रिपोर्ट के अनुसार, पानी में फ्लोराइड और नाइट्रेट के स्तर स्वस्थ सीमा से परे हैं।

इसके अलावा, कोलार और चिक्काबल्लापुर जैसे क्षेत्रों में बांध भी सूख गए हैं।

सीमावर्ती गांवों में स्थिति

कर्नाटक का लगभग 88.6 फीसदी क्षेत्र सूखाग्रस्त है - 176 तालुकाओं में से 156 तालुका सूखे हैं। रबी मौसम में नुकसान का अनुमान लगाने के लिए एक संयुक्त सर्वेक्षण राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा आयोजित किया जाना था। ग्रामीणों ने कहा कि टीमों ने अभी तक सभी गांवों, विशेषकर उन सीमावर्ती महाराष्ट्र का दौरा नहीं किया था। बेलगावी जिला प्रशासन की सर्वेक्षण रिपोर्टों के अनुसार, जिसकी इंडियास्पेंड ने समीक्षा की है, कुछ प्राथमिक सुविधाएं जैसे चारा बैंक और टैंकर पानी की आपूर्ति शुरू की गई हैं, हालांकि उनकी उपलब्धता अपर्याप्त है।

पीने के पानी, पशुओं के लिए चारा, सिंचाई के लिए पानी और आजीविका का साधन के बिना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना-मनरेगा के तहत रोजगार भी कठिन है। सीमा के करीब रहने वाले ग्रामीण महाराष्ट्र के सांगली जिले के केवठे-महंकल, धूलगांव, सालगारे और महालुंगे जैसे गांवों की ओर पलायन कर रहे हैं। पड़ोसी राज्य के क्षेत्र ‘अच्छी तरह से सिंचित’ हैं, और वहां ‘काम ढूंढना आसान है’, ग्रामीणों ने इंडियास्पेंड को बताया।

फसल खराब होने का मुआवजा

उत्तरी कर्नाटक के सूखाग्रस्त अठानी तालुका के 70 वर्षीय पांडुरंग माने (बाएं) कहते हैं, "पिछले साल मैंने जो बीज बोए थे, वे अंकुरित भी नहीं हुए।" उनका कहना है कि हर साल उनकी आमदनी कम होती जा रही है और वह इस उम्र में खेत मजदूर के रूप में काम नहीं कर सकते।

अठानी में जल-गहन गन्ना एक प्रमुख व्यावसायिक फसल है। यह एक आत्म-विनाशकारी पैटर्न में अच्छी तरह से जाना जाता है और किसान अपने संभावित अधिक आकर्षक रिटर्न के लिए गन्ने की खेती करना जारी रखते हैं, जो इसे देश का तीसरा सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक बनाता है और भारत के चीनी उत्पादन में 16 फीसदी की हिस्सेदारी है। वर्तमान में, केवल कृष्णा नदी के किनारे स्थित क्षेत्रों में इसकी खेती की जाती है।

कपास, मक्का, ज्वार, बाजरा, रागी, गेहूं और चना जैसी कई शुष्क फसलें ऐसे क्षेत्रों में उगाई जा रही हैं, जहां पानी की आसान पहुंच नहीं है। ऐनापुर, शिरहट्टी, सप्तसागर, शंकरपट्टी, दारूर और सत्ती जैसे गांव कृष्णा नदी के करीब हैं और पानी से भरपूर फसलों के अनुकूल हैं। ये गांव नदी से दूर स्थित और बेहद कम वर्षा प्राप्त करने वाले गांवों जैसे कि जांबगी, अजुर, मदाभवी, पांडेगांव, मलाबाद, शिरूर, अनंतपुर और शिवनूर की तुलना में उन्नतिशील हैं।

रबी मौसम (2018) के दौरान पानी की कमी के कारण अठानी में कुल फसल नुकसान 34,604 हेक्टेयर (बोए गए क्षेत्र का 1,60,774 हेक्टेयर) है। केंद्रीय टीम की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार पर, 23,375 किसानों को राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष और राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष के तहत संयुक्त रूप से 2,353.08 लाख रुपये का मुआवजा मिलना था। हालांकि, इसके लिए धनराशि अभी जारी नहीं की गई है।

पीएमएफबीवाई फसल बीमा योजना ने बेलगावी जिले में सबसे अधिक नामांकन देखा गया। अकेले 2016 में, रबी मौसम के लिए 140,089 और खरीफ मौसम के लिए 31,538 किसानों ने नामांकन किया था। 2017 में, अच्छी वर्षा के कारण यह संख्या रबी मौसम के लिए केवल 1,910 किसानों और खरीफ सीजन में 151 किसानों ने नामांकन किया।

2018 में, अठानी के 1,849 किसानों ने रबी मौसम के दौरान और खरीफ मौसम के दौरान 8,547 किसानों ने फसल बीमा के लिए नामांकन किया। हालांकि, किसानों को केवल 2016 तक की अवधि के लिए मुआवजा दिया गया है। 2017 और 2018 में फसल विफलता का सामना करने वाले किसानों को मुआवजा दिया जाना बाकी है, क्योंकि केंद्र सरकार ने धनराशि जारी नहीं की है, जैसा कि जिला कलेक्टर एस.बी.बोम्मनहल्ली ने इंडियास्पेंड को बताया है।

मवेशियों के लिए चारा नहीं

खिलेगांव गांव में, पशुओं के चरने के लिए खेत नहीं हैं। गांव के मूल निवासी और 55 वर्षीय किसान अन्नाप्पा निम्बल ने कहा, "हम अपने मवेशियों को पालने के लिए पूरी तरह से चारा बैंकों पर निर्भर हैं।" चार गायों का मालिक माने ने भी सहमति में सिर हिलाया। 2 फरवरी, 2019 को खोले गए शिरूर गांव में चारा बैंक शिरूर, सांबरागी और पांडेगांव गांवों की आपूर्ति करता है। मोल, खलीगांव और अजुर पंचायतों में अधिक चारा बैंक खुले हैं।

बारिश नहीं होने की वजह से चारा बैंकों में सीमित या कोई स्टॉक नहीं होने के कारण, अठानी तालुका के किसान या तो पड़ोसी महाराष्ट्र में अपने रिश्तेदारों के यहां मवेशी भेजते हैं या जहां भी हरियाली उपलब्ध है, उसकी तलाश में मवेशियों को भटकने देते हैं।

चारे का लाभ उठाने के लिए, किसानों को आधार कार्ड प्रदान करना होता है और लेखाकार द्वारा स्वीकार की गई पुस्तक में खरीद का रिकॉर्ड रखना होता है। पशु चिकित्सा अधिकारी प्रत्येक गांव में किसानों की सूची और उनके पास मवेशियों की संख्या के साथ अधिकारियों को प्रदान करते हैं। शिरूर तलाठी कार्यालय में राजस्व विभाग में तालथी (ग्राम लेखाकार), 35 साल के एम बी पाटिल कहते हैं,"यह चारे की वास्तविक समय की आवश्यकता के प्रावधान को सुनिश्चित करता है और चारे के दुरुपयोग को रोकता है।" अकेले शिरूर गांव में 2,200 मवेशी हैं। लगभग 180 किसान नियमित रूप से चारा बैंक की सेवाओं का लाभ उठाते हैं।

ग्रामीण बताते हैं कि प्रत्येक पशु को गीले चारे के लिए 1 रुपये प्रति किलोग्राम और सूखे चारे के लिए 2 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से 15 किलोग्राम चारा दिया जाता है। हालांकि, एक स्वस्थ गाय को पर्याप्त दूध देने के लिए, प्रति दिन कम से कम 20-25 किलोग्राम चारे की आवश्यकता होती है। कभी-कभी, किसान महाराष्ट्र में अपने रिश्तेदारों के यहां मवेशियों को भेज देते हैं, जहां पर्याप्त पानी और चारा होता है।

चीनी मिलों से गन्ना बैगस चारा का प्राथमिक स्रोत है और इसमें प्रत्येक चारा बैंक में लाया गया 1,518 टन गन्ना शामिल है। हालांकि, जब गर्मी के दौरान मिलें बंद हो जाती हैं, तो फीड की कमी होती है। इससे पहले, गोशालाएं (गाय आश्रय स्थल) थीं, लेकिन पिछले पांच वर्षों से यह अवधारणा ठहर सी गई है। सुतार कहते हैं, ''इसे वापस लाया जाना चाहिए।”

इससे पहले, किसान अपने मवेशियों को गोशालाओं में जमा कर सकते थे, जिन्हें पंचायत विकास और राजस्व अधिकारियों के साथ एक टास्क फोर्स द्वारा चलाया जाता था। इन्हें पांच साल पहले चारा बैंकों में बदल दिया गया था।

निकटतम चारा बैंक तक जाने के लिए किसान तीन से चार किलोमीटर तक चलने को मजबूर हैं। पाटिल कहते हैं, ''सूखे की स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है, सांबरगी और अन्य गांवों में और अधिक चारा बैंक खोले जाएंगे।''

सूखे के दौरान रोजगार सृजन महत्वपूर्ण

खलीगांव के किसान निम्बल कहते हैं, “हालांकि हमारे पास कृषि योग्य भूमि है, लेकिन हम खेती करने में असमर्थ हैं। हमें मनरेगा योजना के तहत कोई रोजगार भी नहीं मिल रहा है। हम एक भयावह जीवन जी रहे हैं।”

कोई विकल्प नहीं बचा है, ग्रामीण खेतों और निर्माण स्थलों पर काम की तलाश में पड़ोसी महाराष्ट्र में की ओर जा रहे हैं। शिरूर के रहने वाले माने के दो बेटे हैं, जो अपनी पत्नियों के साथ, महाराष्ट्र में मिराज और सांगली में कुछ अलग तरह के काम करते हैं। माने कहते हैं, "वे महीने में एक बार गांव आते हैं।"

ग्राम पंचायतों ने मनरेगा के तहत नए कार्यों को शुरू करना बंद कर दिया है, और वर्षों से मनरेगा के तहत पूरा होने वाले कार्यों का प्रतिशत कम हो गया है। अधिकारियों का दावा है कि नए विकास कार्यों के लिए कोई बजट आवंटन नहीं है। मनरेगा वेबसाइट के अनुसार, अठानी में, जारी किए गए जॉब कार्ड की संख्या 3,226 है, और 1,403 पंजीकृत सक्रिय कर्मचारी हैं। हालांकि, चालू वर्ष में पंजीकृत सक्रिय श्रमिकों की संख्या केवल 281 है।

बेलगावी के एक कार्यकर्ता, 55 वर्षीय शिवाजी कगनिकर कहते हैं, “जिला पंचायत की ओर से गांवों में बांध निर्माण कार्य करने की आवश्यकता है। यह सूखा प्रभावित क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रहण में मदद करेगा और रोजगार के लिए भी अवसर भी पैदा करेगा।”

ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के लिए मनरेगा एक महत्वपूर्ण जीवन रेखा है, क्योंकि यह योजना सूखा प्रभावित क्षेत्रों में, एक वर्ष में 150 दिन की गारंटी वाले रोजगार का आश्वासन देती है। एनजीओ जनजागरण के साथ जुड़े एक कार्यकर्ता और बेलगावी में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम चलाने वाले एनजीओ, भ्रष्टाचार निर्मूलन समिति के सदस्य, 55 वर्षीय शिवाजी कगनिकर ने कहा, "मनरेगा एकमात्र ऐसा कार्यक्रम है, जो सूखा ग्रस्त क्षेत्रों में गरीब लोगों को दिन में दो बार भोजन प्राप्त करने में मदद करेगा।"

हालांकि, कुछ ग्रामीणों ने इंडियास्पेंड से कहा कि जब तक ग्रामीण महिलाएं बड़ी संख्या में इसके लिए संघर्ष नहीं करतीं, तब तक नौकरी नहीं दी जाती। उन्होंने कहा कि समय पर मजदूरी का भुगतान नहीं किया जाता और भ्रष्टाचार व्याप्त है। “कुछ क्षेत्रों में, लोग नकली जॉब कार्ड और बैंक खाते बनाते हैं”, कगानिकर ने कहा- “जिला पंचायत को सूखा प्रभावित क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रहण के लिए मनरेगा के तहत बांध निर्माण कार्य करना चाहिए, जिससे रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। अधिक पारदर्शिता और कार्यक्रम के बारे में जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है।”

दोषपूर्ण जल योजना

सरकारी पानी टैंकर की ओर से प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 40 लीटर पानी देने की योजना है, लेकिन ग्रामीणों की शिकायत है कि उन्हें केवल 15-20 लीटर (दो से तीन बर्तन) पानी मिलते हैं। उत्तरी कर्नाटक में अठानी तालुका के मोल गांव में एक पानी के टैंकर के सामने बर्तनों की एक कतार।

अठानी के उगर खुर्द शहर की 45 वर्षीय गृहिणी, सावित्री रोकड़े ने हाल ही में पीने के पानी की कमी के खिलाफ एक महिला-विरोध मार्च का नेतृत्व किया है। उन्होंने पानी की समस्या के लिए राजनेताओं को दोषी ठहराया: “यह कुछ वर्षों से चल रहा है, और अधिकारियों को इस मुद्दे को हल करने के लिए एक स्थायी समाधान नहीं मिल पाया है। अमीर लोग 20 रुपये में पानी का बर्तन खरीद सकते हैं। गरीब अपनी प्यास कैसे बुझाएंगे और अपने मवेशियों को कैसे पालेंगे? अधिकारियों को पानी की कमी खत्म होने तक गांवों में पर्याप्त पानी के टैंकर उपलब्ध कराने चाहिए। ”

राज्य सरकार की मल्टी विलेज वाटर स्कीम (एमवीएस), जो गांवों को नदी के पानी की आपूर्ति करती है, कृष्णा नदी से अठानी गांवों को पीने का पानी लाती है। हालांकि, जब नदी गर्मियों में सूख जाती है, तो योजना बेकार हो जाती है, और अठानी और कागवाड तालुका सबसे अधिक पीड़ित होते हैं।

यह ‘डिजाइन दोष’ विभिन्न जल योजनाओं में मौजूद है, जैसा कि ग्रामीण विकास और पंचायत राज मंत्री, कृष्ण बायरे गौड़ा ने 18 मई, 2019 को एक संवाददाता सम्मेलन में स्वीकार किया था। उन्होंने कहा था कि लगभग 75 जल योजनाओं ने काम करना बंद कर दिया है और इसका कारण पानी की कमी और बैक-अप योजना का अभाव है।

स्थिति और बदतर होती जा रही है, क्योंकि महाराष्ट्र सरकार उत्तरी कर्नाटक के कोयना बांध से सूखाग्रस्त गांवों के लिए पानी नहीं छोड़ रही है। पिछले कई वर्षों से पानी छोड़ा जाता रहा है।

केएसएनडीएमसी के अनुसार कर्नाटक के 13 जलाशयों में जल स्तर, उनकी कुल संग्रहण क्षमता के 13.38 फीसदी तक कम है।

सार्वजनिक-निजी भागीदारी मोड में एक बसवेश्वरा-केम्पवाड़ लिफ्ट सिंचाई परियोजना का लक्ष्य 1,363 करोड़ रुपये (204.88 मिलियन डॉलर) की लागत से अठानी में लगभग 27,462 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई करना है। यह लगभग 20 गांवों की कमी पूरा करने के लिए कृष्णा के बाएं किनारे से पानी उठाएगा। इस परियोजना से जुड़े अधिकारी एम श्रीनिवास ने इंडियास्पेंड को बताया, “हालांकि, इस परियोजना के कार्यशील होने में कम से कम साढ़े तीन साल लगेंगे।”

पिछले पांच वर्षों में, केंद्र ने राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल परियोजना के तहत कर्नाटक के लिए 64 फीसदी धन में कटौती की है। डेक्कन हेराल्ड ने फरवरी 2019 में एक रिपोर्ट में बताया था कि 2018-19 में केंद्र का योगदान 868.76 करोड़ रुपये से गिरकर 312.33 करोड़ रुपये हो गया है।

पिछले 14 वर्षों से अठानी में लगातार सूखे का सामना करना पड़ रहा है, बंड (तटबंध और वर्षा जल को रोकने के लिए किए गए तटबंध) और झीलें सूख गई हैं। सरकार कुछ झीलों को फिर से जिंदा कर रही है, लेकिन अभी तक उन पाइपलाइन्स को लगाना बाकी है, जो मानसून के दौरान कृष्णा से झीलों तक पानी ले जाएगी।सरकारी पानी के टैंकरों से प्रति व्यक्ति प्रति दिन कम से कम 40 लीटर पानी की आपूर्ति की जानी है। हालांकि, ग्रामीणों का दावा है कि उन्हें केवल 15-20 लीटर (दो से तीन बर्तन) मिलते हैं - स्नान, कपड़े धोने या खेतों के लिए पानी पर्याप्त नहीं है, इसलिए वे इन गतिविधियों के लिए पीने के पानी का उपयोग करते हैं।

सूखे से बचने का रास्ता

ड्रायलैंड कृषि प्रथाओं से मिट्टी में नमी को संरक्षित करने में मदद मिल सकती है। एआईसीआरपी में एग्रोनॉमी के वरिष्ठ वैज्ञानिक सुरकोद वी. एस कहते हैं, "उत्पादकता बढ़ाने के लिए या अच्छी पैदावार पाने के लिए, सूखे के दौरान भी, किसानों को कम जमीन पर खड़ी जुताई करनी चाहिए, ताकि बारिश का पानी मानसून के दौरान खेतों में काटा जा सके, जो मिट्टी की नमी बनाए रखने में मदद करता है।"

सुरकोद कहते हैं, “रबी के मौसम में, किसानों को बीज बोते समय छोटे चौकोर पैटर्न में भूमि की खेती करनी चाहिए, जो पानी को बनाए रखने और मिट्टी की नमी को बनाए रखने में मदद करता है।” अठानी के पास विजयपुरा में हनवद गांव में किसानों को सूखे के दौरान भी इस पद्धति का अभ्यास करने के लिए भी अच्छी उपज मिल रही है।

सूक्ष्म सिंचाई तकनीक, जैसे ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर से शुष्क क्षेत्रों में व्यवहार्य कृषि की सुविधा प्रदान की जा सकती है। मंजूनाथ कहते हैं, “लोगों को लगता है कि अगर नहरों के माध्यम से सतह का पानी आसानी से उपलब्ध है, तो उन्हें ड्रिप सिंचाई का विकल्प क्यों चुनना चाहिए। हालांकि, नहरों से दूर रहने वाले लोगों को हमेशा कम पानी मिलता है। यदि ऊपर की ओर रहने वाले किसान ड्रिप सिंचाई का उपयोग करते हैं, तो नीचे रहने वाले लोग गंभीर जल तनाव का अनुभव नहीं करेंगे।”

मल्चिंग जैसी पारंपरिक और आसान तकनीक भी मिट्टी की नमी को बनाए रखने और पानी के संरक्षण में मदद कर सकती है। बंड बारिश के पानी को स्टोर करने और बहते पानी को रोकने के लिए एक और साधन है। मिट्टी और जल संरक्षण कार्यक्रमों में ज्यादा निवेश कर्नाटक की सूखे की स्थिति को कम करने के लिए आवश्यक हैं।

सूखे पर हमारी छह-आलेखों की श्रृंखला अब समाप्त होती है। पिछले आलेख आप यहां, यहां, यहां,यहां और यहां पढ़ सकते हैं।

(शंकर बेलगावी में रहने वाले स्वतंत्र पत्रकार हैं और 101Reporters.com के सदस्य हैं। 101Reporters.com जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों का अखिल भारतीय स्तर का नेटवर्क है।)

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 14 जून 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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