कोरोनावायरस और लॉकडाउन से मुहाल हुई बिहार के कुष्ठ रोगियों की ज़िंदगी

पटना के रामनगर कुष्ठ आश्रम का एंट्री पॉइंट। फ़ोटो: पुष्यमित्र

पटना: भोला मिस्त्री की उम्र लगभग 60 साल है। वो कुष्ठ रोगी हैं और बिहार की राजधानी पटना के दानापुर स्टेशन से सटी रामनगर कुष्ठ कालोनी में रहते हैं। जब हम भोला मिस्त्री के घर पहुंचे तो उनके घर के दरवाज़े के बाहर कुछ पुरानी पूरियां सूख रही थीं।

  

“आजकल भीख में भी अच्छी चीज़ें कहां मिलती हैं। जब से कोरोना फैला है, लोग बासी चीज़ें ही खाने के लिए देते हैं। पिछले दिनों एक आदमी ने किसी त्योहार में बची हुई ये पूरियां दे दीं। पहले हम लोग ऐसा खाना लेते नहीं थे, कोई ज़बरदस्ती दे भी देता था, तो फेंक देते थे। अब इसको सुखा रहे हैं कि किसी तरह खाने लायक हो जाएं,” भोला मिस्त्री ने इंडियास्पेंड से कहा।

भोला जैसे 70 कुष्ठ रोगी इस मौहल्ले में अपने परिवारों के साथ रेलवे की पटरियों के किनारे बनी झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं। ये लोग मांग कर अपना और अपने परिवार का गुज़ारा करते हैं। मगर जब से कोरोनावायरस महामारी की शुरुआत हुई है इनके लिए अपना और अपने परिवारों का पेट पालना मुश्किल हो गया है। राष्ट्रीय कुष्ठ निवारण कार्यक्रम के अनुसार, बिहार के अलग-अलग 22 ज़िलों में इसी तरह बसी 63 कॉलोनियों में 1500 से अधिक कुष्ठ रोगी रहते हैं। 

31 मार्च 2018 तक बिहार में कुष्ठ रोगियों की संख्या 14,338 थी, जो एक साल बाद, 31 मार्च 2019 तक 20% बढ़कर 17,154 हो गई।

 

कोरोनावायरस से न केवल इनके सामने आजीविका का संकट पैदा हो गया बल्कि इन्हें चिकित्सा सुविधा भी मिलनी बंद हो गई। इनमें से कई परिवार ऐसे हैं जिन्हें बायोमेट्रिक पहचान साबित न हो पाने की वजह से सामान्य परिवारों को मिलने वाला राशन भी नहीं मिल पा रहा है।  इस साल की शुरुआत में राज्य सरकार ने कुष्ठ रोगियों को दी जाने वाली सामाजिक सुरक्षा पेंशन को 1,500 रुपए से बढ़ाकर 3,000 रुपए महीना करने की घोषणा की थी मगर ये बढ़ोत्तरी भी अभी तक लागू नहीं हो पाई है।

कोरोनावायरस और लॉकडाउन ने मुहाल की ज़िंदगी

कुष्ठ कालोनियों में रहने वाले कुष्ठ रोगियों और उनके परिवारों की आजीविका भीख मांगने पर निर्भर है। सरकार की तरफ़ से इन्हें सामाजिक सुरक्षा के लिए विकलांग पेंशन दिए जाने की व्यवस्था है मगर वो इतनी कम है कि उससे इनका गुज़ारा नहीं हो पाता है।

 

बिहार सरकार कुष्ठ की वजह से विकलांग हुए लोगों को बिहार शताब्दी कुष्ठ कल्याण योजना के अंतर्गत हर महीने 1,500 रुपए की पेंशन दी जाती है। इसी साल जनवरी में राज्य सरकार ने इसे 3,000 रुपए महीना करने का ऐलान किया था मगर अभी तक ये बढ़ोत्तरी लागू नहीं हो पाई है। 1,500 रुपए महीना की पेंशन फ़िलहाल 10 हजार लोगों को दी जा रही है जबकि 31 मार्च 2019 तक राज्य में 17,154 कुष्ठ रोगी थे। 

“हर साल राज्य में औसतन 15 हजार नए कुष्ठ रोगी मिलते हैं। इनमें बच्चों की संख्या लगभग 11% होती है। इनमें से सात से आठ फ़ीसदी रोगी हर साल विकलांग हो जाते हैं,” लेप्रा सोसाइटी के समन्वयक रजनीकांत सिंह ने बताया। 

कोरोनावायरस की शुरुआत के बाद से ही इन्होंने मांगने के लिए बाहर जाना बंद कर दिया। इनकी कॉलोनियों में आकर जो लोग मदद करते थे वो भी मिलनी बंद हो गई। जिससे इनके सामने परिवार का पेट पालने की समस्या खड़ी हो गई है।

कुष्ठ रोगियों को नियमित रूप से बैंडेज की ज़रूरत होती है। कोरोनावायरस के दौर में ये भी मिलनी लगभग बंद ही हो गई हैं। कुष्ठ रोगियों के लिए काम करने वाली संस्था, लेप्रा सोसाइटी की तरफ से इन्हें हर छह महीने में माइक्रो सेल्युलर रबड़ की चप्पलें मिलती थीं, वह भी इस अवधि में नहीं मिली हैं। 

बिहार में कुष्ठ रोगियों की मदद के लिए काम करने वाली संस्था समुत्थान के सचिव ब्रजकिशोर कहते हैं, “राज्य की सभी कुष्ठ कालोनियों में रोगियों के सामने खाने-पीने और इलाज की दिक्कतें पैदा हो गई हैं। कुष्ठ रोग की वजह से इनके संक्रमित होने का ख़तरा भी अधिक रहता है।”

ब्रजकिशोर खुद भी कुष्ठ रोगी रहे हैं। उन्होंने इस रोग से निजात पाने के बाद पारा मेडिकल की ट्रेनिंग ली, कई संस्थाओं के साथ काम किया और 2009 में समुत्थान नाम की संस्था का गठन किया, जो आज पूरे बिहार में कुष्ठ रोगियों के लिए काम कर रही है। 

रामनगर कुष्ठ कालोनी में ही हमें मालती मसोमात नामक महिला मिलीं, जिनकी उम्र लगभह 60 है। मालती की एक बेटी (30 साल) भी उनके साथ रहती हैं, जो गंभीर मनोरोगी हैं। मालती ख़ुद कुष्ठ रोग की वजह से कमज़ोर हो चुकी हैं। इन दोनों मां-बेटियों का जीवन अब तक भीख मांग कर चलता था, मगर अब वह बंद है। न मालती का इलाज हो रहा है, न उनकी बेटी का। रोज़ के खान-पान के लिए दोनों अब पड़ोसियों पर निर्भर हैं। 

इस कॉलोनी में हमें कई ऐसे कुष्ठ रोगी भी मिले जिन्हें राशन नहीं मिल पा रहा है। भोला मिस्त्री भी उन लोगों में से हैं। राशन न मिलने की वजह थी बायोमेट्रिक पहचान साबित न हो पाना। दरअसल कुष्ठ रोग की वजह से इनकी ऊंगलियां खराब हो गई हैं, ये अब राशन डीलर के घर पीओएस मशीन पर उंगलियों की निशानदेही नहीं कर सकते। राशन डीलरों के पास आंख की पुतलियों के ज़रिए आधार वेरिफ़िकेशन की सुविधा नहीं है। ऐसे में जिन पीड़ितों के परिवार में कोई ऐसा सदस्य है जो स्वस्थ है, और उसकी उंगलियां निशानदेही के लायक हैं, सिर्फ उन्हें ही राशन मिल रहा है। 

 

“अंगुलियों के निशान पर राशन मिलने की अनिवार्यता में भी इन कुष्ठ रोगियों को छूट मिलनी चाहिए थी। इन्हें जो सामाजिक सुरक्षा पेंशन मिलती है, उसमें भी बढ़ोतरी की जरूरत है,” ब्रजकिशोर ने कहा।

कोरोनावायरस संक्रमण के डर से इन कुष्ठ रोगियों ने खुद ही मांगने के लिए जाना बंद कर दिया था। लॉकडाउन के दौरान तो स्थिति और बुरी हो गई। ये पूरी तरह उन लोगों पर निर्भर हो गए जो इनकी कॉलोनी में आकर खाना देकर जाते थे।  

बेघर होने का ख़तरा

इसी कालोनी में पिछले साल ऐसे 18 कुष्ठ रोगी बसे हैं, जो प्रेम नगर मौहल्ले में रेलवे पटरियों के किनारे रहते थे। 22 अगस्त, 2019 को रेलवे ने अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत इनके घर बहुत शार्ट नोटिस पर तोड़ दिए थे। उसके बाद ये राम नगर कुष्ठ कालोनी के पास बन रहे ओवर ब्रिज के नीचे आकर बस गए और पिछले एक साल यहीं रह रहे हैं। यहां हमारी मुलाक़ात सोना लाल राम और उनकी पत्नी पार्वती देवी से हुई। 

“हमें सोचने का भी मौका नहीं मिला। बस चेतावनी दी गयी और हटा दिया गया। कहां जाएं, कैसे रहें, कुछ नहीं बताया गया,” सोना लाल ने बताया।

“रेलवे की योजना तो हमारी कालोनी को भी उजाड़ने की थी, मगर समय रहते पटना हाई कोर्ट में दायर याचिका की वजह से इस मौहल्ले को हटाने पर रोक लग गई। नहीं तो इस महामारी के दौरान हमें बेघर होना पड़ता,” रामनगर कुष्ठ कालोनी के प्रधान रमेश प्रसाद ने बताया।

 

बिहार राज्य में कई दशक पहले बसी इन कुष्ठ कालोनियों की कहानी बताते हुए ब्रजकिशोर कहते हैं कि पहले कुष्ठ रोग को लेकर लोगों के मन में घृणा का भाव रहता था। वे इन रोगियों को समाज से बाहर कर देते थे। ऐसे में रोगी किसी एक जगह बसने लगते थे। इसी तरह पूरे बिहार में कई कुष्ठ कालोनियां बस गईं। हाल के दिनों में माहौल कुछ बदला है, जिस वजह से अब कई कुष्ठ पीड़ित अपने परिवार के साथ ही रहते हैं। इलाज भी अब आसान हुआ है। पहले पूरी ज़िंदगी इलाज चलता था, अब लोग छह महीने से एक साल की अवधि तक नियमित इलाज कराने से ठीक हो जाते हैं। मगर जो लोग इसका शिकार होकर विकलांग हो गये, उनकी ज़िंदगी मुश्किल भरी होती है। इन कालोनियों में ज्यादातर ऐसे ही लोग रहते हैं।

 

ठीक से लागू नहीं हो रहा कुष्ठ निवारण कार्यक्रम 

बिहार में 1996 से लेकर अब तक 1,694,000 कुष्ठ रोगियों की पहचान हो चुकी है जिनका इलाज किया गया है । 31 मार्च 2020 तक एक्टिव मामलों की संख्या राज्य में 1,832 थी। ऐसे कुष्ठ रोगी जिन पर आश्रित उनके परिवार के सदस्य कुष्ठ बस्तियों में रहते हैं उनकी संख्या 1,474 है, राष्ट्रीय कुष्ठ निवारण कार्यक्रम के बिहार राज्य कार्यक्रम के पदाधिकारी, डॉ. विजय पांडेय ने बताया।

31 मार्च 2018 तक देश में कुष्ठ रोगियों की संख्या 90,709 थी जिसमे सबसे ज़्यादा, 14,338 कुष्ठ रोगी बिहार में थे, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार। उसके बाद उत्तर प्रदेश में 12,583 और महाराष्ट्र में 9,836 कुष्ठ रोगी थे। इसके एक साल बाद 31 मार्च 2019 तक देश में कुल कुष्ठ रोगियों की संख्या बढ़कर 120,334 हो गई और बिहार में ये संख्या बढ़कर 17,154 हो गई। यानी एक साल में बिहार में कुष्ठ रोगियों की संख्या में 20% की बढ़ोत्तरी हुई है। 

इन कुष्ठ रोगियों और पीड़ितों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम लागू किया गया था। बिहार में इस कार्यक्रम के तहत कई काम होने थे। मगर इन कालोनियों की हालत देखकर ऐसा लगता नहीं है कि कुछ काम हुआ है।

“राष्ट्रीय कुष्ठ निवारण कार्यक्रम का मकसद न सिर्फ इन रोगियों का इलाज करना है, बल्कि इस रोग की वजह से जो लोग विकलांग हो जाते हैं उनकी सहायता करना भी है,” रजनीकांत सिंह ने कहा। 

इस कार्यक्रम के तहत यह तय किया गया था कि हर ज़िले में प्रशासन का एक कर्मी तैनात किया जाएगा, जो ऐसी कुष्ठ कालोनियों के संपर्क में रहेगा और इन कुष्ठ रोगियों और उनके परिवार की देख-रेख के लिए ज़िम्मेदार होगा। वह उनकी चिकित्सा और दूसरी ज़रूरतों का समाधान करने की कोशिश करेगा। 

“राज्य के 22 ज़िलों में स्थित 63 कुष्ठ कालोनियों में अधिकारी नियमित रूप से जाते हैं, हेल्थ कैंप लगाते हैं और लोगों के बीच बैंडेज का वितरण करते हैं,” डॉ. विजय पांडेय ने कहा। 

“ऐसा कोई कर्मचारी आज तक न हमारे मौहल्ले में आया है, न ही हम लोगों से किसी ने संपर्क किया है,” रामनगर कालोनी के प्रधान रमेश प्रसाद ने बताया। 

इन्हें सरकार की तरफ से सेल्फ़ केयर किट और माइक्रो सेल्युलर चप्पलें नियमित रूप से दी जानी थी। मगर ये योजनाएं सभी कालोनियों के लिए नियमित रूप से लागू नहीं हो पाईं। जिन कालोनियों में लेप्रा मिशन और ऐसी दूसरी संस्थाओं ने काम करना शुरू किया, वहां रोगियों को ये सुविधाएं मिलती रहीं। हालांकि कोरोनावायरस के बाद से ये भी बंद हैं। 

लेप्रा सोसाइटी के स्टेट कॉर्डिनेटर रजनीकांत सिंह कहते हैं कि कोरोना की वजह से वह काम बाधित ज़रूर बाधित हुआ है, मगर बंद नहीं हुआ है। डॉ विजय पांडेय कहते हैं कि ज़िला लेप्रेसी कार्यालय में ये सामग्रियां उपलब्ध रहती हैं, मगर कुष्ठ रोगी वहां इन्हें लेने पहुंचते ही नहीं।

 

“राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन योजना का ठीक से लागू नहीं हो पाना और इस योजना में लगातार कटौती होना ही इन कुष्ठ रोगियों की बदहाली की मुख्य वजह है। 2011 में ही बिहार सरकार ने इन्हें अंत्योदय योजना से जोड़ने का फैसला किया था, जो आज भी लागू नहीं हो पाया है,” ब्रजकिशोर कहते हैं।  

“यह देखने की ज़रूरत है कि पीड़ित लोग किस तरह का रोज़गार कर सकते हैं। क्योंकि विकलांगता और समाज द्वारा बहिष्कार किए जाने की वजह से वे हर तरह का रोज़गार नहीं कर सकते। हां, उन्हें बकरी पालन और मुर्गी पालन जैसे रोज़गार से जोड़ा जा सकता है,” रजनीकांत सिंह ने कहा। 

(पुष्यमित्र, पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं और 101Reporters.com के सदस्य हैं।)

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

पटना: भोला मिस्त्री की उम्र लगभग 60 साल है। वो कुष्ठ रोगी हैं और बिहार की राजधानी पटना के दानापुर स्टेशन से सटी रामनगर कुष्ठ कालोनी में रहते हैं। जब हम भोला मिस्त्री के घर पहुंचे तो उनके घर के दरवाज़े के बाहर कुछ पुरानी पूरियां सूख रही थीं।

  

“आजकल भीख में भी अच्छी चीज़ें कहां मिलती हैं। जब से कोरोना फैला है, लोग बासी चीज़ें ही खाने के लिए देते हैं। पिछले दिनों एक आदमी ने किसी त्योहार में बची हुई ये पूरियां दे दीं। पहले हम लोग ऐसा खाना लेते नहीं थे, कोई ज़बरदस्ती दे भी देता था, तो फेंक देते थे। अब इसको सुखा रहे हैं कि किसी तरह खाने लायक हो जाएं,” भोला मिस्त्री ने इंडियास्पेंड से कहा।

भोला जैसे 70 कुष्ठ रोगी इस मौहल्ले में अपने परिवारों के साथ रेलवे की पटरियों के किनारे बनी झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं। ये लोग मांग कर अपना और अपने परिवार का गुज़ारा करते हैं। मगर जब से कोरोनावायरस महामारी की शुरुआत हुई है इनके लिए अपना और अपने परिवारों का पेट पालना मुश्किल हो गया है। राष्ट्रीय कुष्ठ निवारण कार्यक्रम के अनुसार, बिहार के अलग-अलग 22 ज़िलों में इसी तरह बसी 63 कॉलोनियों में 1500 से अधिक कुष्ठ रोगी रहते हैं। 

31 मार्च 2018 तक बिहार में कुष्ठ रोगियों की संख्या 14,338 थी, जो एक साल बाद, 31 मार्च 2019 तक 20% बढ़कर 17,154 हो गई।

 

कोरोनावायरस से न केवल इनके सामने आजीविका का संकट पैदा हो गया बल्कि इन्हें चिकित्सा सुविधा भी मिलनी बंद हो गई। इनमें से कई परिवार ऐसे हैं जिन्हें बायोमेट्रिक पहचान साबित न हो पाने की वजह से सामान्य परिवारों को मिलने वाला राशन भी नहीं मिल पा रहा है।  इस साल की शुरुआत में राज्य सरकार ने कुष्ठ रोगियों को दी जाने वाली सामाजिक सुरक्षा पेंशन को 1,500 रुपए से बढ़ाकर 3,000 रुपए महीना करने की घोषणा की थी मगर ये बढ़ोत्तरी भी अभी तक लागू नहीं हो पाई है।

कोरोनावायरस और लॉकडाउन ने मुहाल की ज़िंदगी

कुष्ठ कालोनियों में रहने वाले कुष्ठ रोगियों और उनके परिवारों की आजीविका भीख मांगने पर निर्भर है। सरकार की तरफ़ से इन्हें सामाजिक सुरक्षा के लिए विकलांग पेंशन दिए जाने की व्यवस्था है मगर वो इतनी कम है कि उससे इनका गुज़ारा नहीं हो पाता है।

 

बिहार सरकार कुष्ठ की वजह से विकलांग हुए लोगों को बिहार शताब्दी कुष्ठ कल्याण योजना के अंतर्गत हर महीने 1,500 रुपए की पेंशन दी जाती है। इसी साल जनवरी में राज्य सरकार ने इसे 3,000 रुपए महीना करने का ऐलान किया था मगर अभी तक ये बढ़ोत्तरी लागू नहीं हो पाई है। 1,500 रुपए महीना की पेंशन फ़िलहाल 10 हजार लोगों को दी जा रही है जबकि 31 मार्च 2019 तक राज्य में 17,154 कुष्ठ रोगी थे। 

“हर साल राज्य में औसतन 15 हजार नए कुष्ठ रोगी मिलते हैं। इनमें बच्चों की संख्या लगभग 11% होती है। इनमें से सात से आठ फ़ीसदी रोगी हर साल विकलांग हो जाते हैं,” लेप्रा सोसाइटी के समन्वयक रजनीकांत सिंह ने बताया। 

कोरोनावायरस की शुरुआत के बाद से ही इन्होंने मांगने के लिए बाहर जाना बंद कर दिया। इनकी कॉलोनियों में आकर जो लोग मदद करते थे वो भी मिलनी बंद हो गई। जिससे इनके सामने परिवार का पेट पालने की समस्या खड़ी हो गई है।

कुष्ठ रोगियों को नियमित रूप से बैंडेज की ज़रूरत होती है। कोरोनावायरस के दौर में ये भी मिलनी लगभग बंद ही हो गई हैं। कुष्ठ रोगियों के लिए काम करने वाली संस्था, लेप्रा सोसाइटी की तरफ से इन्हें हर छह महीने में माइक्रो सेल्युलर रबड़ की चप्पलें मिलती थीं, वह भी इस अवधि में नहीं मिली हैं। 

बिहार में कुष्ठ रोगियों की मदद के लिए काम करने वाली संस्था समुत्थान के सचिव ब्रजकिशोर कहते हैं, “राज्य की सभी कुष्ठ कालोनियों में रोगियों के सामने खाने-पीने और इलाज की दिक्कतें पैदा हो गई हैं। कुष्ठ रोग की वजह से इनके संक्रमित होने का ख़तरा भी अधिक रहता है।”

ब्रजकिशोर खुद भी कुष्ठ रोगी रहे हैं। उन्होंने इस रोग से निजात पाने के बाद पारा मेडिकल की ट्रेनिंग ली, कई संस्थाओं के साथ काम किया और 2009 में समुत्थान नाम की संस्था का गठन किया, जो आज पूरे बिहार में कुष्ठ रोगियों के लिए काम कर रही है। 

रामनगर कुष्ठ कालोनी में ही हमें मालती मसोमात नामक महिला मिलीं, जिनकी उम्र लगभह 60 है। मालती की एक बेटी (30 साल) भी उनके साथ रहती हैं, जो गंभीर मनोरोगी हैं। मालती ख़ुद कुष्ठ रोग की वजह से कमज़ोर हो चुकी हैं। इन दोनों मां-बेटियों का जीवन अब तक भीख मांग कर चलता था, मगर अब वह बंद है। न मालती का इलाज हो रहा है, न उनकी बेटी का। रोज़ के खान-पान के लिए दोनों अब पड़ोसियों पर निर्भर हैं। 

इस कॉलोनी में हमें कई ऐसे कुष्ठ रोगी भी मिले जिन्हें राशन नहीं मिल पा रहा है। भोला मिस्त्री भी उन लोगों में से हैं। राशन न मिलने की वजह थी बायोमेट्रिक पहचान साबित न हो पाना। दरअसल कुष्ठ रोग की वजह से इनकी ऊंगलियां खराब हो गई हैं, ये अब राशन डीलर के घर पीओएस मशीन पर उंगलियों की निशानदेही नहीं कर सकते। राशन डीलरों के पास आंख की पुतलियों के ज़रिए आधार वेरिफ़िकेशन की सुविधा नहीं है। ऐसे में जिन पीड़ितों के परिवार में कोई ऐसा सदस्य है जो स्वस्थ है, और उसकी उंगलियां निशानदेही के लायक हैं, सिर्फ उन्हें ही राशन मिल रहा है। 

 

“अंगुलियों के निशान पर राशन मिलने की अनिवार्यता में भी इन कुष्ठ रोगियों को छूट मिलनी चाहिए थी। इन्हें जो सामाजिक सुरक्षा पेंशन मिलती है, उसमें भी बढ़ोतरी की जरूरत है,” ब्रजकिशोर ने कहा।

कोरोनावायरस संक्रमण के डर से इन कुष्ठ रोगियों ने खुद ही मांगने के लिए जाना बंद कर दिया था। लॉकडाउन के दौरान तो स्थिति और बुरी हो गई। ये पूरी तरह उन लोगों पर निर्भर हो गए जो इनकी कॉलोनी में आकर खाना देकर जाते थे।  

बेघर होने का ख़तरा

इसी कालोनी में पिछले साल ऐसे 18 कुष्ठ रोगी बसे हैं, जो प्रेम नगर मौहल्ले में रेलवे पटरियों के किनारे रहते थे। 22 अगस्त, 2019 को रेलवे ने अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत इनके घर बहुत शार्ट नोटिस पर तोड़ दिए थे। उसके बाद ये राम नगर कुष्ठ कालोनी के पास बन रहे ओवर ब्रिज के नीचे आकर बस गए और पिछले एक साल यहीं रह रहे हैं। यहां हमारी मुलाक़ात सोना लाल राम और उनकी पत्नी पार्वती देवी से हुई। 

“हमें सोचने का भी मौका नहीं मिला। बस चेतावनी दी गयी और हटा दिया गया। कहां जाएं, कैसे रहें, कुछ नहीं बताया गया,” सोना लाल ने बताया।

“रेलवे की योजना तो हमारी कालोनी को भी उजाड़ने की थी, मगर समय रहते पटना हाई कोर्ट में दायर याचिका की वजह से इस मौहल्ले को हटाने पर रोक लग गई। नहीं तो इस महामारी के दौरान हमें बेघर होना पड़ता,” रामनगर कुष्ठ कालोनी के प्रधान रमेश प्रसाद ने बताया।

 

बिहार राज्य में कई दशक पहले बसी इन कुष्ठ कालोनियों की कहानी बताते हुए ब्रजकिशोर कहते हैं कि पहले कुष्ठ रोग को लेकर लोगों के मन में घृणा का भाव रहता था। वे इन रोगियों को समाज से बाहर कर देते थे। ऐसे में रोगी किसी एक जगह बसने लगते थे। इसी तरह पूरे बिहार में कई कुष्ठ कालोनियां बस गईं। हाल के दिनों में माहौल कुछ बदला है, जिस वजह से अब कई कुष्ठ पीड़ित अपने परिवार के साथ ही रहते हैं। इलाज भी अब आसान हुआ है। पहले पूरी ज़िंदगी इलाज चलता था, अब लोग छह महीने से एक साल की अवधि तक नियमित इलाज कराने से ठीक हो जाते हैं। मगर जो लोग इसका शिकार होकर विकलांग हो गये, उनकी ज़िंदगी मुश्किल भरी होती है। इन कालोनियों में ज्यादातर ऐसे ही लोग रहते हैं।

 

ठीक से लागू नहीं हो रहा कुष्ठ निवारण कार्यक्रम 

बिहार में 1996 से लेकर अब तक 1,694,000 कुष्ठ रोगियों की पहचान हो चुकी है जिनका इलाज किया गया है । 31 मार्च 2020 तक एक्टिव मामलों की संख्या राज्य में 1,832 थी। ऐसे कुष्ठ रोगी जिन पर आश्रित उनके परिवार के सदस्य कुष्ठ बस्तियों में रहते हैं उनकी संख्या 1,474 है, राष्ट्रीय कुष्ठ निवारण कार्यक्रम के बिहार राज्य कार्यक्रम के पदाधिकारी, डॉ. विजय पांडेय ने बताया।

31 मार्च 2018 तक देश में कुष्ठ रोगियों की संख्या 90,709 थी जिसमे सबसे ज़्यादा, 14,338 कुष्ठ रोगी बिहार में थे, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार। उसके बाद उत्तर प्रदेश में 12,583 और महाराष्ट्र में 9,836 कुष्ठ रोगी थे। इसके एक साल बाद 31 मार्च 2019 तक देश में कुल कुष्ठ रोगियों की संख्या बढ़कर 120,334 हो गई और बिहार में ये संख्या बढ़कर 17,154 हो गई। यानी एक साल में बिहार में कुष्ठ रोगियों की संख्या में 20% की बढ़ोत्तरी हुई है। 

इन कुष्ठ रोगियों और पीड़ितों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम लागू किया गया था। बिहार में इस कार्यक्रम के तहत कई काम होने थे। मगर इन कालोनियों की हालत देखकर ऐसा लगता नहीं है कि कुछ काम हुआ है।

“राष्ट्रीय कुष्ठ निवारण कार्यक्रम का मकसद न सिर्फ इन रोगियों का इलाज करना है, बल्कि इस रोग की वजह से जो लोग विकलांग हो जाते हैं उनकी सहायता करना भी है,” रजनीकांत सिंह ने कहा। 

इस कार्यक्रम के तहत यह तय किया गया था कि हर ज़िले में प्रशासन का एक कर्मी तैनात किया जाएगा, जो ऐसी कुष्ठ कालोनियों के संपर्क में रहेगा और इन कुष्ठ रोगियों और उनके परिवार की देख-रेख के लिए ज़िम्मेदार होगा। वह उनकी चिकित्सा और दूसरी ज़रूरतों का समाधान करने की कोशिश करेगा। 

“राज्य के 22 ज़िलों में स्थित 63 कुष्ठ कालोनियों में अधिकारी नियमित रूप से जाते हैं, हेल्थ कैंप लगाते हैं और लोगों के बीच बैंडेज का वितरण करते हैं,” डॉ. विजय पांडेय ने कहा। 

“ऐसा कोई कर्मचारी आज तक न हमारे मौहल्ले में आया है, न ही हम लोगों से किसी ने संपर्क किया है,” रामनगर कालोनी के प्रधान रमेश प्रसाद ने बताया। 

इन्हें सरकार की तरफ से सेल्फ़ केयर किट और माइक्रो सेल्युलर चप्पलें नियमित रूप से दी जानी थी। मगर ये योजनाएं सभी कालोनियों के लिए नियमित रूप से लागू नहीं हो पाईं। जिन कालोनियों में लेप्रा मिशन और ऐसी दूसरी संस्थाओं ने काम करना शुरू किया, वहां रोगियों को ये सुविधाएं मिलती रहीं। हालांकि कोरोनावायरस के बाद से ये भी बंद हैं। 

लेप्रा सोसाइटी के स्टेट कॉर्डिनेटर रजनीकांत सिंह कहते हैं कि कोरोना की वजह से वह काम बाधित ज़रूर बाधित हुआ है, मगर बंद नहीं हुआ है। डॉ विजय पांडेय कहते हैं कि ज़िला लेप्रेसी कार्यालय में ये सामग्रियां उपलब्ध रहती हैं, मगर कुष्ठ रोगी वहां इन्हें लेने पहुंचते ही नहीं।

 

“राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन योजना का ठीक से लागू नहीं हो पाना और इस योजना में लगातार कटौती होना ही इन कुष्ठ रोगियों की बदहाली की मुख्य वजह है। 2011 में ही बिहार सरकार ने इन्हें अंत्योदय योजना से जोड़ने का फैसला किया था, जो आज भी लागू नहीं हो पाया है,” ब्रजकिशोर कहते हैं।  

“यह देखने की ज़रूरत है कि पीड़ित लोग किस तरह का रोज़गार कर सकते हैं। क्योंकि विकलांगता और समाज द्वारा बहिष्कार किए जाने की वजह से वे हर तरह का रोज़गार नहीं कर सकते। हां, उन्हें बकरी पालन और मुर्गी पालन जैसे रोज़गार से जोड़ा जा सकता है,” रजनीकांत सिंह ने कहा। 

(पुष्यमित्र, पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं और 101Reporters.com के सदस्य हैं।)

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