कोरोनावायरस से लड़ाई में पिछड़ रहे हैं उत्तर प्रदेश के गांव और कस्बे

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 120 किमी दूर गोंडा ज़िला 16 अप्रैल तक कोरोनामुक्त था। लेकिन 6 मई तक यहां कोरोनावायरस के नौ मामले सामने आ गए हैं, यह सभी मरीज़ दूसरे राज्यों से आए हैं। फ़ोटो: अंजलि पांडेय

लखनऊः उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले में कोरोनावायरस का पहला मामला 17 अप्रैल को सामने आया। पॉज़िटिव युवक (25 वर्ष) ज़िला मुख्यालय से लगभग 30 किमी दूर कौड़िया क्षेत्र के बिछुड़ी गांव का निवासी है।

 

25 साल का यह युवक दिल्ली से 25 मार्च को लौटा था, जहां वहआज़ादपुर मंडी में काम करता था। यहां आने के बाद उसकी कोई जांच (स्क्रीनिंग) नहीं हुई, जब उसे ख़ुद अपनी तबियत ख़राब लगी तो वह ज़िला अस्पताल गया। जांच के बाद उसे घर भेज दिया गया तो हमें लगा उसे कोरोनावायरस नहीं है, गांव के एक व्यक्ति ने नाम न बताने की शर्त पर कहा। 

 

17 अप्रैल को इस युवक की रिपोर्ट पॉज़िटिव आने पर पूरे ज़िले में हड़कम्प मच गया। मरीज़ को पंडरी कृपाल सीएचसी में क्वारंटाइन के लिए भेजा गया। बिछुड़ी गांव में पुलिस की निगरानी बढ़ा दी गई और वहां पर किसी के भी आने-जाने पर रोक लगा दी गई। इस मामले की जानकारी ज़िला अधिकारी डॉ नितिन बसंल ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल के ज़रिए दी थी।

उत्तर प्रदेश में कोरोनावायरस के 2,998 मामले हो चुके थे, 7 मई की सुबह तक के कोरोनावायरस मॉनीटर के अपडेट के अनुसार। देशव्यापी लॉकडाउन के बाद मार्च 2020 के अंतिम सप्ताह में बड़ी संख्या में प्रवासी कामगार देश के अलग-अलग हिस्सों से उत्तर प्रदेश के अपने गांवों और कस्बों को लौट आए थे। इनमें कई प्रवासी कोरोनावायरस से संक्रमित पाए गए थे। राज्य सरकार ने वापस लौटे प्रवासियों को 14 दिन के लिए क्वारंटाइन करने के निर्देश जारी किए थे। 14 दिन तक लक्षण नज़र नहीं आने पर ही इन्हें घर जाने की इजाज़त थी। लेकिन कई ज़िलों में इन निर्देशों का पूरी तरह से पालन नहीं किया गया, जैसा कि इंडियास्पेंज की 8 अप्रैल की इस रिपोर्ट में कहा गया। 

हमारी रिपोर्ट में पाया गया कि बाहर से आने वाले मज़दूरों की जांच (स्क्रीनिंग) के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी, राज्य में टेस्टिंग लैब्स कम होने की वजह से कम लोगों के सैंपल लिए जा रहे थे, क्वारंटाइन केंद्रों में समुचित व्यवस्था नहीं थी। जिन ग्राम प्रधानों पर क्वारंटाइन केंद्र की ज़िम्मेदारी थी उन्हें भी समुचित निर्देश नहीं दिए गए थे, 2 अप्रैल की इस रिपोर्ट में हमने उत्तर प्रदेश के गांवों में कोरोनावायरस से लड़ने की तैयारियों के बारे में विस्तार से बताया गया था।  

 

गांवों और कस्बों में सक्रीनिंग की समुचित व्यवस्था का अभाव

उत्तर प्रदेश में लगातार कोरोनावायरस को लेकर जागरुकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं और लक्षण दिखते ही जांच के लिए संपर्क करने के लिए टोल फ़्री फ़ोन नंबर दिए गए हैं। बाहर से आने वाले लोगों से क्वांरटाइन होने की अपील की जा रही है। लेकिन राज्य के कस्बों और गांवों में अभी भी यह व्यवस्था सुचारु नहीं हो पा रही है। 

“यह युवक जब दिल्ली से अपने गांव लौटा तो उसकी कोई स्क्रीनिंग नहीं हुई थी, आशा कार्यकर्ता या सीएचसी के किसी भी डॉक्टर ने इसकी कोई सूचना नहीं दी। 15 अप्रैल को युवक ने 10 बजकर 16 मिनट पर ज़िला अस्पताल में ओडीपी का पर्चा बनवाया। इसे बुख़ार की शिकायत थी। पूरे दिन अस्पताल में भटकने के बाद शाम साढे पांच बजे इसका सैंपल लेकर इसे वापस घर भेज दिया गया,” गोंडा ज़िला अस्पताल के एक कर्मचारी ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया।

यह मरीज़ किसी भी स्वास्थ्यकर्मी या एंबुलेंस के साथ नहीं आया था इसलिए उसे गंभीरता से नहीं लिया गया। वह गांव वालों के दबाव में आकर ख़ुद जांच कराने आया था। दो दिन बाद रिपोर्ट पॉज़िटिव आने पर उसे पंडरी कृपाल सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में भेज दिया गया, उस कर्मचारी ने बताया। 

“गोंडा ज़िले में कोरोनावायरस के अब तक नौ मरीज़ मिल चुके हैं। यह सभी अलग-अलग राज्यों से आए हैं। प्रशासन को सख़्त कर दिया गया है कि इन्हें तुरंत क्वारंटाइन कर दिया जाए। पुलिस की टीम पॉज़िटिव रिपोर्ट वाले युवकों के सम्पर्क में आने वालों की तलाश कर रही है, जिससे संक्रमण को फैलने से रोका जा सके। इनके परिवार वालों की रिपोर्ट निगेटिव है। गांवों को सील कर दिया गया है,” ज़िले की मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. मधु गैरोला ने 28 अप्रैल को कहा।

गोंडा जिले के पडरीकृपाल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में इलाज व निगरानी के लिए रखे गए मरीज़ों की जानकारी लेती हुई सीएमओ डॉ मधु गैरोला। फ़ोटो : नंदलाल

उत्तर प्रदेश में टेस्टिंग लैब की स्थिति

उत्तर प्रदेश के कई ज़िले अभी भी ऐसे हैं जहां टेस्टिंग की प्रक्रिया धीमी है--अभी किसी भी अस्पताल या लैब में टेस्टिंग नहीं हो रही है, सिर्फ ज़िला अस्पताल ही एक मात्र सहारा है। यहां से सैंपल लेकर लखनऊ के पीजीआई भेजा जाता है और वहां से रिपोर्ट आने के बाद ही संक्रमण की पुष्टि हो पाती है। कभी रिपोर्ट दो दिन में आ जाती है तो कभी चार से पांच दिन भी लग जाते हैं, गोंडा ज़िला अस्पताल के कर्मचारी ज्ञान तिवारी ने बताया। गोंडा से लखनऊ की दूरी लगभग 120 किलोमीटर है।

  

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 7 अप्रैल को सभी 75 ज़िलों में सैंपल कलेक्शन सेंटर बनाने का आदेश दिया था, पंजाब केसरी की 7 अप्रैल की इस रिपोर्ट के मुताबिक़। 

 

राज्य में कोरोनावायरस के मरीज़ों की बढ़ती संख्या को देखते हुए टेस्टिंग लैब्स की संख्या बढ़ाई गई है। इस समय प्रदेश में कुल 17 लैब्स में कोविड-19 के टेस्ट हो रहे हैं, जिसमें से 21 सरकारी और 3 प्राइवेट लैब्स हैं, इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की रिपोर्ट में बताया गया है। 

सीएम योगी के आदेश के 24 दिनों के बाद भी जिलों में टेस्टिंग लैब को लेकर अभी कोई प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। स्थिति वैसी ही बनी हुई है। 

‘’अभी लैब की अगर स्थिति की बात करें तो यह सिर्फ़ बड़े शहरों तक ही सीमित है। इसलिए गांवों और कस्बों में टेस्ट कराने वालों को दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है,” टेस्टिंग लैब की व्यवस्था के बारे में यूपी लैब ऐसोशिएशन के अध्यक्ष याेगेश कुमार ने 29 अप्रैल को इंडियास्पेंड से कहा। उन्होंने आगे कहा कि लखनऊ राजधानी है तो वहां सारी व्यवस्थाएं हैं। टेस्ट रिपोर्ट आने में भी ज़्यादा समय नहीं लगता है। 

लेकिन बहराइच, गोंडा, रायबरेली, श्रावस्ती जैसे कम मामलों वाले छोटे ज़िलों में गंभीरता नहीं बरती जा रही है। ऐसे में संक्रमण बढ़ने की आशंका भी अधिक है।

 

तेजी से बढ़े मरीज़ लेकिन कमज़ोर प्रबंधन;

उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा मामले आगरा में हैं, यहां 6 मई तक 653 मामले सामने आ चुके हैं। “ज़िले में कोरोनावायरस की ज़्यादा से ज़्यादा टेस्टिंग हो रही है। एसएन मेडिकल कॉलेज और जालमा संस्थान में टेस्ट हो रहे हैं। इसके अलावा एक-दो प्राइवेट लैब्स में भी अब टेस्ट हो रहे हैं।  हॉटस्पॉट वाले इलाकों और गांवों में जाकर सैंपलिंग करने की व्यवस्था की जा रही है,” आगरा के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ मुकेश कुमार ने इंडिस्पेंड से कहा। 

यूपी के प्रमुख सचिव स्वास्थ्य अमित मोहन ने कहा कि सरकार अस्पतालों की क्षमता बढ़ाने और मेडिकल कॉलेजों की व्यवस्था को सुधारने पर काम कर रही है। 

यह भी बताया कि हर ज़िले में क्वांरटाइन सेंटर बनाए गए हैं और अस्पतालों में मास्क व पीपीई किट पहुंचाने के भी निर्देश दिए गए हैं। 

राज्य में वर्तमान में लगभग 18,000 से अधिक आइसोलेशन बेड और 22,000 से अधिक क्वारंटाइन बेड की व्यवस्था की गई है, राज्य के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव अमित मोहन प्रसाद ने एक मई को ट्वीट कर यह जानकारी दी।  मीडिया रिपोर्ट्स यह आंकड़े अलग बताए गए हैं। 29 अप्रैल की न्यूज़ 18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में कुल 5 हजार 470 क्वारंटीन सेंटर हैं, जिनकी क्षमता 4 लाख से ज़्यादा लोगों को रखने की है।

उत्तर प्रदेश में कोरोनावायरस के बढ़ते मामलों को क़ाबू करने की क्या योजना है, इसके लिए हमने यूपी के स्वास्थ्य मंत्री जयप्रताप सिंह से फ़ोन पर संपर्क करने की कोशिश की है लेकिन अभी तक उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है। उनका जवाब आते ही हम इस रिपोर्ट को अपडेट करेंगे। 

घर-घर स्क्रीनिंग का हाल

गाेंडा ज़िले का एक और मामला ज़िला मुख्यालय से लगभग 35 किमी दूर इटियाथोक ब्लॉक का है। यह युवक भी दिल्ली की आज़ादपुर मंडी में ही काम करता था और ब्रेड सप्लाई करने वाली गाड़ी में बैठकर किसी तरह अपने गांव आया था।

रायबरेली ज़िले के लालगंज में स्कूलों को क्वांरटाइन में बदला गया है, बाहर से आने वाले लोगों को यहां 14 दिन के लिए रखा जाता है। फ़ोटो: श्रृंखला पांडे

“जो पहला केस था वह भी दिल्ली की आज़ादपुर मंडी से आया था उसके बाद वहां से आए बाकी लोगों की तलाश शुरू हुई। इटियाथोक का युवक भी 18 अप्रैल को जनता कॉलेज के आइसोलेशन वार्ड में रखा गया और उसके सैंपल लिए गए। 20 अप्रैल को उसकी रिपोर्ट भी पॉज़िटिव आई,” ज़िले के एक स्थानीय  पत्रकार नंदलाल ने कहा। 

इससे पता चलता है कि गांव-गांव में जाकर स्क्रीनिंग और निगरानी के जो दावे किए जा रहे हैं वह ज़मीन पर नज़र नहीं आ रहे। दिल्ली से आने वाले इन युवकों की जानकारी न उनके ग्राम प्रधान ने प्रशासन को दी और न ही सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर इनकी कोई जांच हुई।

गोंडा के कौड़िया के बिछुड़ी गांव में तैनात पुलिसकर्मियों को सख़्त निर्देश दिए गए हैं कि वहां लॉकडाउन का पूरा पालन हो जिससे संक्रमण की कड़ी आगे न बढ़ने पाए। फ़ोटो : अंजलि पांडे

आपको बता दें कि दिल्ली की आज़ादपुर मंडी में उत्तर प्रदेश और बिहार के मज़दूर बड़ी संख्या में काम करते हैं। प्रवासी कामगारों की वापसी के साथ ही यह मज़दूर भी अपने गांवों को लौट गए हैं या फिर लौटने की तैयारी में हैं। यह एशिया की सबसे बड़ी मंडी है जहां से राजधानी दिल्ली में सब्ज़ी और फल की आपूर्ति की जाती है। आज़ादपुर मंडी में हाल ही 15 आढ़ती कोरोनावायरस से संक्रमित पाए गए हैं, जिसमें से एक की मौत हो चुकी है, दैनिक जागरण की 2 मई की इस रिपोर्ट में कहा गया। 

  

क्वारंटाइन केंद्रों में सुविधाओं की कमी

केंद्र सरकार ने दिशानिर्देश जारी करते हुए ये कहा था कि प्रत्येक क्वांरटाइन सेंटर में सभी के लिए अलग-अलग बेड हों जिनके बीच 1 से 2 मीटर की दूरी हो। यहां उनके लिए खाने और शुद्ध पानी की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके अलावा रौशनी और शौचालय की पूरी व्यवस्था हो जिससे क्वांरटाइन में रहने वाले व्यक्तियों को किसी परेशानी का सामना न करना पड़े। सभी क्वारंटाइन लोगों का दिन में दो बार (सुबह और शाम) चेकअप हो। कोरोनावायरस का कोई भी लक्षण (बुखार, खांसी, गले में खराश, सांस फूलना) दिखने पर उसे तुरंत एंबुलेंस से अस्पताल भेजा जाए। लेकिन उत्तर प्रदेश में ज़मीनी हक़ीक़त अलग है।

आगरा के मेयर ने 21 अप्रैल को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर चिंता ज़ाहिर की थी। उन्होंने कई-कई दिनों तक जांच न हो पाने और क्वारंटाइन सेंटर पर खाने-पीने की सही व्यवस्था न होने के बारे में भी लिखा था।

आगरा के मेयर ने 21 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर जिले में बढ़ते कोरोना मरीजों को लेकर चिंता जाहिर की थी।

कुछ दिन पहले आगरा के शारदा ग्रुप के इंजीनियरिंग कॉलेज में बने क्वारंटाइन सेंटर का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें क्वारंटाइन किए गए लोगों को पानी और बिस्किट के पैकेट गेट के बाहर से ही फेंक कर दिए जा रहे थे। जिसे लेने के लिए भीड़ में लोग एक-दूसरे को धक्का देते दिख रहे थे। 

ऐसा ही एक वीडियो प्रयागराज के सीएवी कॉलेज का भी सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हुआ था, जहां मध्य प्रदेश से लाए गए 1,200 प्रवासी मज़दूरों को क्वांरटाइन किया गया है। इसमें क्वारंटाइन किए गए लोगों को सिर्फ़ एक-एक केला दिया जा रहा था।

देवरिया ज़िले के रामगढ़ पंचायत की प्रधान ऊषा सिंह हैं लेकिन कामकाज उनके बेटे प्रशांत सिंह देखते हैं। “अभी तक हमें कोई ऐसा आदेश नहीं मिला था अब डेटा भेजने का आदेश है कि जितने लोग गांव के बाहर हैं उनकी लिस्ट बनाकर दी जाए, उन्हें वापस गांव लाया जाएगा,” प्रशांत सिंह ने कहा। 

“सभी ग्राम प्रधानों को एसडीएम की तरफ से आदेश है कि बाहर से आए सभी मज़दूरों को क्वारंटाइन करने की व्यवस्था करें। समस्या ये है कि उनके खाने-पीने की व्यवस्था से लेकर निगरानी तक की ज़िम्मेदारी निभाना मुश्किल है। स्कूल में भी इतनी जगह भी नहीं है कि हम सभी को वहां रख सकें। मज़दूरों को होम क्वारंटाइन करने का भी एसडीएम का आदेश है, लेकिन यह समझाना बहुत मुश्किल है कि जब वह क्वारंटाइन सेंटर से ही भाग रहे हैं तो अपने घर में इस नियम का सही से पालन कैसे करेंगे,” प्रशांत सिंह ने कहा। 

गांवों में कोरोनावायरस का विस्तार न हो इसके लिए आशा बहुओं को बाहर से आए किसी भी व्यक्ति की पूरी जानकारी सीएचसी केन्द्र पर देने का आदेश है। “बाहर से गांव में आने वाले लोगों के लिए हमें फ़ॉर्म दिए गए थे, हम उन पर नज़र भी रखते हैं, लेकिन इतना समझाने के बाद भी कोई ख़ुद से आगे आने को तैयार नहीं है। लोग रातोरात आकर अपने घर में छिप जाते हैं दो-तीन दिन बाद पता चलता है तो हम जानकारी दे पाते हैं,” बरेली ज़िले के भीरिया गांव की आशा बहू उर्मिला देवी ने कहा।

सीतापुर ज़िले के पीपरी शादीपुर गांव के एक युवक रमेश ने बताया कि शहर से बाहर आए मज़दूरों के लिए स्कूल को आइसोलशन वार्ड में बदला गया था लेकिन मज़दूर बिना क्वांरटाइन का समय पूरे किए अपने घर वापस चले गए। ग्राम प्रधान ने भी कोई सख़्ती नहीं बरती थी। इसके लिए उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई भी की गई है। 

"हमें सीएचसी से आदेश मिला था और एक फॉर्म भी दिया गया है जिसमें हमें हर दिन भरना होता है कि हम कितने घरों में गए हैं वहां कितने लोग बाहर से आए हैं, उनकी पूरी जानकारी भरनी होती है। इसके अलावा क्वारंटाइन सेंटर में जो लोग हैं उनका फॉलोअप करने की ड्यूटी में भी हमें लगाया गया है। कुल मिलाकर दूसरे राज्यों से आए लोगों की निगरानी करना भी हमारा ही काम है। जैसे आज 40 लोग हैं तो 14 दिन तक ये 40 लोग होने ही चाहिए अगर संख्या बढ़ी है तो उसकी जानकारी अलग से देनी होती है,"  सीतापुर ज़िले के बेलामुऊ गांव की आशा बहू पूनम रानी ने कहा। 

प्रवासियों की वापसी का एक और दौर

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दूसरे शहरों में फंसे हुए प्रवासी कामगारों, छात्रों और पर्यटकों की वापसी की इजाज़त दे दी है। रेल मंत्रालय ने इसके लिए विशेष ट्रेनें भी चलाई हैं। दूसरे राज्यों में प्रवासी कामगार और छात्र बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश से हैं। क्या राज्य इतनी बड़ी संख्या आने वाले लोगों की जांच और उनके क्वारंटाइन की सुविधा के लिए तैयार है? पिछली बार लौटे प्रवासी कामगारों में से कई लोग प्रशासन की नज़रों से बच गए थे। सरकार ने इस बार सभी ग्राम प्रधानों और पार्षदों से कहा है कि अगर कोई चोरी-छिपे, बिना जानकारी दिए उनके क्षेत्र में आ गया है तो ऐसे लोगों की सूचना तत्काल संबंधित प्रशासन को दी जाए, राज्य सरकार के एक मई के ट्वीट में बताया गया।

केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश से पहले ही राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दूसरे राज्यों में फंसे प्रवासी मज़दूरों को वापस लाने का फ़ैसला कर चुके थे।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन मज़दूरों के लिए प्रदेश के सभी 75 ज़िलों में 15 लाख क्वांरटाइन सेंटर तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इससे पहले भी स्कूलों, कॉलेजों को क्वांरटाइन सेंटर बनाया गया था। 

इसी बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने दूसरे राज्यों में फंसे उत्तर प्रदेश के प्रवासियों और उत्तर प्रदेश में फंसे दूसरे राज्यों के प्रवासियों के रजिस्ट्रेशन के लिए एक पोर्टल बनाया है। जिससे फंसे हुए प्रवासियों को लाने और राज्य में फंसे हुए प्रवासियों को भेजने की व्यवस्था की जा सके, उत्तर प्रदेश ट्रैफ़िक पुलिस ने 5 मई को एक ट्वीट कर इसकी डिटेल साझा की।

राज्य के कई ज़िलों में दूसरे राज्यों से आए प्रवासियों के संक्रमित होने की ख़बर मिली है। 28 अप्रैल तक सीतापुर ज़िले में 1,214 सैंपलिंग हुई थी जिनमें से 21 लोग पॉज़िटिव मिले हैं। “इलाज के बाद यह मरीज़ ठीक हो गए हैं अब सिर्फ एक सक्रिय मामला है। ज़्यादातर मामलों में बाहर काम करने वाले और दिल्ली के एक कार्यक्रम में शामिल हुए लोग हैं,” सीतापुर के सीएमओ आलोक वर्मा ने बताया।

सीतापुर ज़िले से लगभग 35 किमी दूर पीपरी शादीपुर गांव के प्राथमिक स्कूल में क्वांरटाइन किए गए मज़दूर। इन मज़दूरों ने 14 दिन की अवधि पूरी नहीं की थी। फ़ोटो: श्रृंखला पांडे

उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले के कर्नलगंज ब्लॉक के सरयू आदर्श बालिका इंटर कॉलेज को क्वारंटाइन सेंटर बनाया गया है। इस समय यहां कुल 80 मज़दूर हैं। यह अलग-अलग राज्यों से बस से यहां आए हैं। महाराष्ट्र, पंजाब, बिहार और राज्य के ही सहारनपुर ज़िले से आए मज़दूरों को यहां 14 दिन के लिए रखा गया है, इस सेंटर में तैनात कर्मचारी राहुल शुक्ला ने कहा।

“लक्षणों के आधार पर सैंपल लिए जाते हैं लेकिन परेशानी यह है कि रिपोर्ट आने में चार से पांच दिन लग जाते हैं और उसके बाद जब रिपोर्ट पॉज़िटिव आती है तो बाकी लोगों के भी संक्रमित होने का ख़तरा हो जाता है। यहां ड्यूटी पर तैनात लोगों को पीपीई किट तक नहीं दी गई है,” राहुल ने आगे कहा।

गोंडा के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर तैनात चिकित्सकों की टीम को गांव में बाहर से आने वाले किसी भी व्यक्ति की तुरंत स्क्रीनिंग करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई हैं। फ़ोटो: नंदलाल

टेस्टिंग बढ़ने से मामले भी बढ़े

उत्तर प्रदेश के 19 जिलों में कोरोनावायरस के मरीज़ों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इनमें गौतमबुद्धनगर, कानपुर, लखनऊ, वाराणसी, आगरा, बागपत, बस्ती, बिजनौर, बुलंदशहर, फिरोज़ाबाद, गाज़ियाबाद, हापुड़, अमरोहा, मेरठ, मुरादाबाद, सहारनपुर, शामली, रामपुर और सीतापुर शामिल हैं। 

“कानपुर में टेस्टिंग बढ़ने के बाद अब ज़्यादा मामले सामने आए हैं, इनमें ज़्यादातर बाहर काम करने वाले लोग ही हैं। बीते दिनों में स्वास्थ्य विभाग से कुछ लापरवाही हुई है लेकिन भविष्य में अब ऐसा नहीं होगा,” कानपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ अशोक शुक्ला ने इंडियास्पेंड से कहा।

कानपुर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) सरसौल में 14 अप्रैल को एक मदरसे के छात्र का सैंपल लिया गया और रिपोर्ट का इंतज़ार किए बिना ही उसे घर वापस भेज दिया गया। इस छात्र के साथ औरेया और कन्नौज ज़िले के कुल 21 लोग थे। 20  लोगों की दूसरी जांच रिपोर्ट निगेटिव आने पर उनकी तीसरी जांच की रिपोर्ट आने का इंतजार किए बिना सबको वापस एक साथ घर भेज दिया गया। जिसमें एक मरीज़ की हालत बिगड़ने पर उसे दोबारा अस्पताल में दाखिल किया गया, दैनिक जागरण  की  29 अप्रैल को प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया।  

(श्रृंखला, दिल्ली में स्वतंत्र पत्रकार हैं)

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

लखनऊः उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले में कोरोनावायरस का पहला मामला 17 अप्रैल को सामने आया। पॉज़िटिव युवक (25 वर्ष) ज़िला मुख्यालय से लगभग 30 किमी दूर कौड़िया क्षेत्र के बिछुड़ी गांव का निवासी है।

 

25 साल का यह युवक दिल्ली से 25 मार्च को लौटा था, जहां वहआज़ादपुर मंडी में काम करता था। यहां आने के बाद उसकी कोई जांच (स्क्रीनिंग) नहीं हुई, जब उसे ख़ुद अपनी तबियत ख़राब लगी तो वह ज़िला अस्पताल गया। जांच के बाद उसे घर भेज दिया गया तो हमें लगा उसे कोरोनावायरस नहीं है, गांव के एक व्यक्ति ने नाम न बताने की शर्त पर कहा। 

 

17 अप्रैल को इस युवक की रिपोर्ट पॉज़िटिव आने पर पूरे ज़िले में हड़कम्प मच गया। मरीज़ को पंडरी कृपाल सीएचसी में क्वारंटाइन के लिए भेजा गया। बिछुड़ी गांव में पुलिस की निगरानी बढ़ा दी गई और वहां पर किसी के भी आने-जाने पर रोक लगा दी गई। इस मामले की जानकारी ज़िला अधिकारी डॉ नितिन बसंल ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल के ज़रिए दी थी।

उत्तर प्रदेश में कोरोनावायरस के 2,998 मामले हो चुके थे, 7 मई की सुबह तक के कोरोनावायरस मॉनीटर के अपडेट के अनुसार। देशव्यापी लॉकडाउन के बाद मार्च 2020 के अंतिम सप्ताह में बड़ी संख्या में प्रवासी कामगार देश के अलग-अलग हिस्सों से उत्तर प्रदेश के अपने गांवों और कस्बों को लौट आए थे। इनमें कई प्रवासी कोरोनावायरस से संक्रमित पाए गए थे। राज्य सरकार ने वापस लौटे प्रवासियों को 14 दिन के लिए क्वारंटाइन करने के निर्देश जारी किए थे। 14 दिन तक लक्षण नज़र नहीं आने पर ही इन्हें घर जाने की इजाज़त थी। लेकिन कई ज़िलों में इन निर्देशों का पूरी तरह से पालन नहीं किया गया, जैसा कि इंडियास्पेंज की 8 अप्रैल की इस रिपोर्ट में कहा गया। 

हमारी रिपोर्ट में पाया गया कि बाहर से आने वाले मज़दूरों की जांच (स्क्रीनिंग) के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी, राज्य में टेस्टिंग लैब्स कम होने की वजह से कम लोगों के सैंपल लिए जा रहे थे, क्वारंटाइन केंद्रों में समुचित व्यवस्था नहीं थी। जिन ग्राम प्रधानों पर क्वारंटाइन केंद्र की ज़िम्मेदारी थी उन्हें भी समुचित निर्देश नहीं दिए गए थे, 2 अप्रैल की इस रिपोर्ट में हमने उत्तर प्रदेश के गांवों में कोरोनावायरस से लड़ने की तैयारियों के बारे में विस्तार से बताया गया था।  

 

गांवों और कस्बों में सक्रीनिंग की समुचित व्यवस्था का अभाव

उत्तर प्रदेश में लगातार कोरोनावायरस को लेकर जागरुकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं और लक्षण दिखते ही जांच के लिए संपर्क करने के लिए टोल फ़्री फ़ोन नंबर दिए गए हैं। बाहर से आने वाले लोगों से क्वांरटाइन होने की अपील की जा रही है। लेकिन राज्य के कस्बों और गांवों में अभी भी यह व्यवस्था सुचारु नहीं हो पा रही है। 

“यह युवक जब दिल्ली से अपने गांव लौटा तो उसकी कोई स्क्रीनिंग नहीं हुई थी, आशा कार्यकर्ता या सीएचसी के किसी भी डॉक्टर ने इसकी कोई सूचना नहीं दी। 15 अप्रैल को युवक ने 10 बजकर 16 मिनट पर ज़िला अस्पताल में ओडीपी का पर्चा बनवाया। इसे बुख़ार की शिकायत थी। पूरे दिन अस्पताल में भटकने के बाद शाम साढे पांच बजे इसका सैंपल लेकर इसे वापस घर भेज दिया गया,” गोंडा ज़िला अस्पताल के एक कर्मचारी ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया।

यह मरीज़ किसी भी स्वास्थ्यकर्मी या एंबुलेंस के साथ नहीं आया था इसलिए उसे गंभीरता से नहीं लिया गया। वह गांव वालों के दबाव में आकर ख़ुद जांच कराने आया था। दो दिन बाद रिपोर्ट पॉज़िटिव आने पर उसे पंडरी कृपाल सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में भेज दिया गया, उस कर्मचारी ने बताया। 

“गोंडा ज़िले में कोरोनावायरस के अब तक नौ मरीज़ मिल चुके हैं। यह सभी अलग-अलग राज्यों से आए हैं। प्रशासन को सख़्त कर दिया गया है कि इन्हें तुरंत क्वारंटाइन कर दिया जाए। पुलिस की टीम पॉज़िटिव रिपोर्ट वाले युवकों के सम्पर्क में आने वालों की तलाश कर रही है, जिससे संक्रमण को फैलने से रोका जा सके। इनके परिवार वालों की रिपोर्ट निगेटिव है। गांवों को सील कर दिया गया है,” ज़िले की मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. मधु गैरोला ने 28 अप्रैल को कहा।

गोंडा जिले के पडरीकृपाल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में इलाज व निगरानी के लिए रखे गए मरीज़ों की जानकारी लेती हुई सीएमओ डॉ मधु गैरोला। फ़ोटो : नंदलाल

उत्तर प्रदेश में टेस्टिंग लैब की स्थिति

उत्तर प्रदेश के कई ज़िले अभी भी ऐसे हैं जहां टेस्टिंग की प्रक्रिया धीमी है--अभी किसी भी अस्पताल या लैब में टेस्टिंग नहीं हो रही है, सिर्फ ज़िला अस्पताल ही एक मात्र सहारा है। यहां से सैंपल लेकर लखनऊ के पीजीआई भेजा जाता है और वहां से रिपोर्ट आने के बाद ही संक्रमण की पुष्टि हो पाती है। कभी रिपोर्ट दो दिन में आ जाती है तो कभी चार से पांच दिन भी लग जाते हैं, गोंडा ज़िला अस्पताल के कर्मचारी ज्ञान तिवारी ने बताया। गोंडा से लखनऊ की दूरी लगभग 120 किलोमीटर है।

  

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 7 अप्रैल को सभी 75 ज़िलों में सैंपल कलेक्शन सेंटर बनाने का आदेश दिया था, पंजाब केसरी की 7 अप्रैल की इस रिपोर्ट के मुताबिक़। 

 

राज्य में कोरोनावायरस के मरीज़ों की बढ़ती संख्या को देखते हुए टेस्टिंग लैब्स की संख्या बढ़ाई गई है। इस समय प्रदेश में कुल 17 लैब्स में कोविड-19 के टेस्ट हो रहे हैं, जिसमें से 21 सरकारी और 3 प्राइवेट लैब्स हैं, इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की रिपोर्ट में बताया गया है। 

सीएम योगी के आदेश के 24 दिनों के बाद भी जिलों में टेस्टिंग लैब को लेकर अभी कोई प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। स्थिति वैसी ही बनी हुई है। 

‘’अभी लैब की अगर स्थिति की बात करें तो यह सिर्फ़ बड़े शहरों तक ही सीमित है। इसलिए गांवों और कस्बों में टेस्ट कराने वालों को दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है,” टेस्टिंग लैब की व्यवस्था के बारे में यूपी लैब ऐसोशिएशन के अध्यक्ष याेगेश कुमार ने 29 अप्रैल को इंडियास्पेंड से कहा। उन्होंने आगे कहा कि लखनऊ राजधानी है तो वहां सारी व्यवस्थाएं हैं। टेस्ट रिपोर्ट आने में भी ज़्यादा समय नहीं लगता है। 

लेकिन बहराइच, गोंडा, रायबरेली, श्रावस्ती जैसे कम मामलों वाले छोटे ज़िलों में गंभीरता नहीं बरती जा रही है। ऐसे में संक्रमण बढ़ने की आशंका भी अधिक है।

 

तेजी से बढ़े मरीज़ लेकिन कमज़ोर प्रबंधन;

उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा मामले आगरा में हैं, यहां 6 मई तक 653 मामले सामने आ चुके हैं। “ज़िले में कोरोनावायरस की ज़्यादा से ज़्यादा टेस्टिंग हो रही है। एसएन मेडिकल कॉलेज और जालमा संस्थान में टेस्ट हो रहे हैं। इसके अलावा एक-दो प्राइवेट लैब्स में भी अब टेस्ट हो रहे हैं।  हॉटस्पॉट वाले इलाकों और गांवों में जाकर सैंपलिंग करने की व्यवस्था की जा रही है,” आगरा के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ मुकेश कुमार ने इंडिस्पेंड से कहा। 

यूपी के प्रमुख सचिव स्वास्थ्य अमित मोहन ने कहा कि सरकार अस्पतालों की क्षमता बढ़ाने और मेडिकल कॉलेजों की व्यवस्था को सुधारने पर काम कर रही है। 

यह भी बताया कि हर ज़िले में क्वांरटाइन सेंटर बनाए गए हैं और अस्पतालों में मास्क व पीपीई किट पहुंचाने के भी निर्देश दिए गए हैं। 

राज्य में वर्तमान में लगभग 18,000 से अधिक आइसोलेशन बेड और 22,000 से अधिक क्वारंटाइन बेड की व्यवस्था की गई है, राज्य के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव अमित मोहन प्रसाद ने एक मई को ट्वीट कर यह जानकारी दी।  मीडिया रिपोर्ट्स यह आंकड़े अलग बताए गए हैं। 29 अप्रैल की न्यूज़ 18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में कुल 5 हजार 470 क्वारंटीन सेंटर हैं, जिनकी क्षमता 4 लाख से ज़्यादा लोगों को रखने की है।

उत्तर प्रदेश में कोरोनावायरस के बढ़ते मामलों को क़ाबू करने की क्या योजना है, इसके लिए हमने यूपी के स्वास्थ्य मंत्री जयप्रताप सिंह से फ़ोन पर संपर्क करने की कोशिश की है लेकिन अभी तक उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है। उनका जवाब आते ही हम इस रिपोर्ट को अपडेट करेंगे। 

घर-घर स्क्रीनिंग का हाल

गाेंडा ज़िले का एक और मामला ज़िला मुख्यालय से लगभग 35 किमी दूर इटियाथोक ब्लॉक का है। यह युवक भी दिल्ली की आज़ादपुर मंडी में ही काम करता था और ब्रेड सप्लाई करने वाली गाड़ी में बैठकर किसी तरह अपने गांव आया था।

रायबरेली ज़िले के लालगंज में स्कूलों को क्वांरटाइन में बदला गया है, बाहर से आने वाले लोगों को यहां 14 दिन के लिए रखा जाता है। फ़ोटो: श्रृंखला पांडे

“जो पहला केस था वह भी दिल्ली की आज़ादपुर मंडी से आया था उसके बाद वहां से आए बाकी लोगों की तलाश शुरू हुई। इटियाथोक का युवक भी 18 अप्रैल को जनता कॉलेज के आइसोलेशन वार्ड में रखा गया और उसके सैंपल लिए गए। 20 अप्रैल को उसकी रिपोर्ट भी पॉज़िटिव आई,” ज़िले के एक स्थानीय  पत्रकार नंदलाल ने कहा। 

इससे पता चलता है कि गांव-गांव में जाकर स्क्रीनिंग और निगरानी के जो दावे किए जा रहे हैं वह ज़मीन पर नज़र नहीं आ रहे। दिल्ली से आने वाले इन युवकों की जानकारी न उनके ग्राम प्रधान ने प्रशासन को दी और न ही सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर इनकी कोई जांच हुई।

गोंडा के कौड़िया के बिछुड़ी गांव में तैनात पुलिसकर्मियों को सख़्त निर्देश दिए गए हैं कि वहां लॉकडाउन का पूरा पालन हो जिससे संक्रमण की कड़ी आगे न बढ़ने पाए। फ़ोटो : अंजलि पांडे

आपको बता दें कि दिल्ली की आज़ादपुर मंडी में उत्तर प्रदेश और बिहार के मज़दूर बड़ी संख्या में काम करते हैं। प्रवासी कामगारों की वापसी के साथ ही यह मज़दूर भी अपने गांवों को लौट गए हैं या फिर लौटने की तैयारी में हैं। यह एशिया की सबसे बड़ी मंडी है जहां से राजधानी दिल्ली में सब्ज़ी और फल की आपूर्ति की जाती है। आज़ादपुर मंडी में हाल ही 15 आढ़ती कोरोनावायरस से संक्रमित पाए गए हैं, जिसमें से एक की मौत हो चुकी है, दैनिक जागरण की 2 मई की इस रिपोर्ट में कहा गया। 

  

क्वारंटाइन केंद्रों में सुविधाओं की कमी

केंद्र सरकार ने दिशानिर्देश जारी करते हुए ये कहा था कि प्रत्येक क्वांरटाइन सेंटर में सभी के लिए अलग-अलग बेड हों जिनके बीच 1 से 2 मीटर की दूरी हो। यहां उनके लिए खाने और शुद्ध पानी की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके अलावा रौशनी और शौचालय की पूरी व्यवस्था हो जिससे क्वांरटाइन में रहने वाले व्यक्तियों को किसी परेशानी का सामना न करना पड़े। सभी क्वारंटाइन लोगों का दिन में दो बार (सुबह और शाम) चेकअप हो। कोरोनावायरस का कोई भी लक्षण (बुखार, खांसी, गले में खराश, सांस फूलना) दिखने पर उसे तुरंत एंबुलेंस से अस्पताल भेजा जाए। लेकिन उत्तर प्रदेश में ज़मीनी हक़ीक़त अलग है।

आगरा के मेयर ने 21 अप्रैल को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर चिंता ज़ाहिर की थी। उन्होंने कई-कई दिनों तक जांच न हो पाने और क्वारंटाइन सेंटर पर खाने-पीने की सही व्यवस्था न होने के बारे में भी लिखा था।

आगरा के मेयर ने 21 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर जिले में बढ़ते कोरोना मरीजों को लेकर चिंता जाहिर की थी।

कुछ दिन पहले आगरा के शारदा ग्रुप के इंजीनियरिंग कॉलेज में बने क्वारंटाइन सेंटर का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें क्वारंटाइन किए गए लोगों को पानी और बिस्किट के पैकेट गेट के बाहर से ही फेंक कर दिए जा रहे थे। जिसे लेने के लिए भीड़ में लोग एक-दूसरे को धक्का देते दिख रहे थे। 

ऐसा ही एक वीडियो प्रयागराज के सीएवी कॉलेज का भी सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हुआ था, जहां मध्य प्रदेश से लाए गए 1,200 प्रवासी मज़दूरों को क्वांरटाइन किया गया है। इसमें क्वारंटाइन किए गए लोगों को सिर्फ़ एक-एक केला दिया जा रहा था।

देवरिया ज़िले के रामगढ़ पंचायत की प्रधान ऊषा सिंह हैं लेकिन कामकाज उनके बेटे प्रशांत सिंह देखते हैं। “अभी तक हमें कोई ऐसा आदेश नहीं मिला था अब डेटा भेजने का आदेश है कि जितने लोग गांव के बाहर हैं उनकी लिस्ट बनाकर दी जाए, उन्हें वापस गांव लाया जाएगा,” प्रशांत सिंह ने कहा। 

“सभी ग्राम प्रधानों को एसडीएम की तरफ से आदेश है कि बाहर से आए सभी मज़दूरों को क्वारंटाइन करने की व्यवस्था करें। समस्या ये है कि उनके खाने-पीने की व्यवस्था से लेकर निगरानी तक की ज़िम्मेदारी निभाना मुश्किल है। स्कूल में भी इतनी जगह भी नहीं है कि हम सभी को वहां रख सकें। मज़दूरों को होम क्वारंटाइन करने का भी एसडीएम का आदेश है, लेकिन यह समझाना बहुत मुश्किल है कि जब वह क्वारंटाइन सेंटर से ही भाग रहे हैं तो अपने घर में इस नियम का सही से पालन कैसे करेंगे,” प्रशांत सिंह ने कहा। 

गांवों में कोरोनावायरस का विस्तार न हो इसके लिए आशा बहुओं को बाहर से आए किसी भी व्यक्ति की पूरी जानकारी सीएचसी केन्द्र पर देने का आदेश है। “बाहर से गांव में आने वाले लोगों के लिए हमें फ़ॉर्म दिए गए थे, हम उन पर नज़र भी रखते हैं, लेकिन इतना समझाने के बाद भी कोई ख़ुद से आगे आने को तैयार नहीं है। लोग रातोरात आकर अपने घर में छिप जाते हैं दो-तीन दिन बाद पता चलता है तो हम जानकारी दे पाते हैं,” बरेली ज़िले के भीरिया गांव की आशा बहू उर्मिला देवी ने कहा।

सीतापुर ज़िले के पीपरी शादीपुर गांव के एक युवक रमेश ने बताया कि शहर से बाहर आए मज़दूरों के लिए स्कूल को आइसोलशन वार्ड में बदला गया था लेकिन मज़दूर बिना क्वांरटाइन का समय पूरे किए अपने घर वापस चले गए। ग्राम प्रधान ने भी कोई सख़्ती नहीं बरती थी। इसके लिए उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई भी की गई है। 

"हमें सीएचसी से आदेश मिला था और एक फॉर्म भी दिया गया है जिसमें हमें हर दिन भरना होता है कि हम कितने घरों में गए हैं वहां कितने लोग बाहर से आए हैं, उनकी पूरी जानकारी भरनी होती है। इसके अलावा क्वारंटाइन सेंटर में जो लोग हैं उनका फॉलोअप करने की ड्यूटी में भी हमें लगाया गया है। कुल मिलाकर दूसरे राज्यों से आए लोगों की निगरानी करना भी हमारा ही काम है। जैसे आज 40 लोग हैं तो 14 दिन तक ये 40 लोग होने ही चाहिए अगर संख्या बढ़ी है तो उसकी जानकारी अलग से देनी होती है,"  सीतापुर ज़िले के बेलामुऊ गांव की आशा बहू पूनम रानी ने कहा। 

प्रवासियों की वापसी का एक और दौर

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दूसरे शहरों में फंसे हुए प्रवासी कामगारों, छात्रों और पर्यटकों की वापसी की इजाज़त दे दी है। रेल मंत्रालय ने इसके लिए विशेष ट्रेनें भी चलाई हैं। दूसरे राज्यों में प्रवासी कामगार और छात्र बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश से हैं। क्या राज्य इतनी बड़ी संख्या आने वाले लोगों की जांच और उनके क्वारंटाइन की सुविधा के लिए तैयार है? पिछली बार लौटे प्रवासी कामगारों में से कई लोग प्रशासन की नज़रों से बच गए थे। सरकार ने इस बार सभी ग्राम प्रधानों और पार्षदों से कहा है कि अगर कोई चोरी-छिपे, बिना जानकारी दिए उनके क्षेत्र में आ गया है तो ऐसे लोगों की सूचना तत्काल संबंधित प्रशासन को दी जाए, राज्य सरकार के एक मई के ट्वीट में बताया गया।

केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश से पहले ही राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दूसरे राज्यों में फंसे प्रवासी मज़दूरों को वापस लाने का फ़ैसला कर चुके थे।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन मज़दूरों के लिए प्रदेश के सभी 75 ज़िलों में 15 लाख क्वांरटाइन सेंटर तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इससे पहले भी स्कूलों, कॉलेजों को क्वांरटाइन सेंटर बनाया गया था। 

इसी बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने दूसरे राज्यों में फंसे उत्तर प्रदेश के प्रवासियों और उत्तर प्रदेश में फंसे दूसरे राज्यों के प्रवासियों के रजिस्ट्रेशन के लिए एक पोर्टल बनाया है। जिससे फंसे हुए प्रवासियों को लाने और राज्य में फंसे हुए प्रवासियों को भेजने की व्यवस्था की जा सके, उत्तर प्रदेश ट्रैफ़िक पुलिस ने 5 मई को एक ट्वीट कर इसकी डिटेल साझा की।

राज्य के कई ज़िलों में दूसरे राज्यों से आए प्रवासियों के संक्रमित होने की ख़बर मिली है। 28 अप्रैल तक सीतापुर ज़िले में 1,214 सैंपलिंग हुई थी जिनमें से 21 लोग पॉज़िटिव मिले हैं। “इलाज के बाद यह मरीज़ ठीक हो गए हैं अब सिर्फ एक सक्रिय मामला है। ज़्यादातर मामलों में बाहर काम करने वाले और दिल्ली के एक कार्यक्रम में शामिल हुए लोग हैं,” सीतापुर के सीएमओ आलोक वर्मा ने बताया।

सीतापुर ज़िले से लगभग 35 किमी दूर पीपरी शादीपुर गांव के प्राथमिक स्कूल में क्वांरटाइन किए गए मज़दूर। इन मज़दूरों ने 14 दिन की अवधि पूरी नहीं की थी। फ़ोटो: श्रृंखला पांडे

उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले के कर्नलगंज ब्लॉक के सरयू आदर्श बालिका इंटर कॉलेज को क्वारंटाइन सेंटर बनाया गया है। इस समय यहां कुल 80 मज़दूर हैं। यह अलग-अलग राज्यों से बस से यहां आए हैं। महाराष्ट्र, पंजाब, बिहार और राज्य के ही सहारनपुर ज़िले से आए मज़दूरों को यहां 14 दिन के लिए रखा गया है, इस सेंटर में तैनात कर्मचारी राहुल शुक्ला ने कहा।

“लक्षणों के आधार पर सैंपल लिए जाते हैं लेकिन परेशानी यह है कि रिपोर्ट आने में चार से पांच दिन लग जाते हैं और उसके बाद जब रिपोर्ट पॉज़िटिव आती है तो बाकी लोगों के भी संक्रमित होने का ख़तरा हो जाता है। यहां ड्यूटी पर तैनात लोगों को पीपीई किट तक नहीं दी गई है,” राहुल ने आगे कहा।

गोंडा के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर तैनात चिकित्सकों की टीम को गांव में बाहर से आने वाले किसी भी व्यक्ति की तुरंत स्क्रीनिंग करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई हैं। फ़ोटो: नंदलाल

टेस्टिंग बढ़ने से मामले भी बढ़े

उत्तर प्रदेश के 19 जिलों में कोरोनावायरस के मरीज़ों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इनमें गौतमबुद्धनगर, कानपुर, लखनऊ, वाराणसी, आगरा, बागपत, बस्ती, बिजनौर, बुलंदशहर, फिरोज़ाबाद, गाज़ियाबाद, हापुड़, अमरोहा, मेरठ, मुरादाबाद, सहारनपुर, शामली, रामपुर और सीतापुर शामिल हैं। 

“कानपुर में टेस्टिंग बढ़ने के बाद अब ज़्यादा मामले सामने आए हैं, इनमें ज़्यादातर बाहर काम करने वाले लोग ही हैं। बीते दिनों में स्वास्थ्य विभाग से कुछ लापरवाही हुई है लेकिन भविष्य में अब ऐसा नहीं होगा,” कानपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ अशोक शुक्ला ने इंडियास्पेंड से कहा।

कानपुर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) सरसौल में 14 अप्रैल को एक मदरसे के छात्र का सैंपल लिया गया और रिपोर्ट का इंतज़ार किए बिना ही उसे घर वापस भेज दिया गया। इस छात्र के साथ औरेया और कन्नौज ज़िले के कुल 21 लोग थे। 20  लोगों की दूसरी जांच रिपोर्ट निगेटिव आने पर उनकी तीसरी जांच की रिपोर्ट आने का इंतजार किए बिना सबको वापस एक साथ घर भेज दिया गया। जिसमें एक मरीज़ की हालत बिगड़ने पर उसे दोबारा अस्पताल में दाखिल किया गया, दैनिक जागरण  की  29 अप्रैल को प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया।  

(श्रृंखला, दिल्ली में स्वतंत्र पत्रकार हैं)

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।