कोविड में बढ़़ा टेलीमेडिसिन से इलाज लेकिन जागरूकता की कमी से अभी भी सीमित इस्तेमाल

किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में इलेक्ट्रॉनिक कोविड केयर सपोर्ट में एक्सपर्ट डॉक्टर्स कोविड लेवल 1 व 2 के डॉक्टरों को ऑनलाइन सलाह देते हुए। फ़ोटो: श्रृंखला पाण्डेय

लखनऊ: उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर ज़िले के ददरौल गांव की रहने वाली गायत्री देवी (45 वर्ष) गठिया की मरीज़ हैं। इसी साल फ़रवरी के महीने में गायत्री ने अपनी बीमारी के लिए लखनऊ मेडिकल कॉलेज में दिखाया। डॉक्टर ने कुछ टेस्ट और दवा देकर उन्हें तीन महीने बाद बुलाया। लेकिन इसी बीच देश भर में कोरोनावायरस की वजह से लॉकडाउन घोषित हो गया। लखनऊ आने-जाने का कोई साधन नहीं था और मेडिकल कॉलेज की ओपीडी सेवाएं भी बंद हो चुकी थी।

“मेरी दवाएं खत्म हो गईं थीं और मुझे डॉक्टर से सलाह भी लेनी थी। अस्पताल में संपर्क करने पर पता चला कि डॉक्टर टेलीमेडिसिन की मदद से ऑनलाइन भी मरीज़ देख रहे हैं,” गायत्री देवी ने बताया।

गायत्री देवी ने अपने सभी पुराने पर्चे अपने डॉक्टर को व्हाट्सएप के ज़रिए भेज दिए और उनके दिए गए निश्चित समय पर ऑनलाइन सलाह भी ले ली। इससे पहले कभी गायत्री देवी को टेलीमेडिसिन से इलाज के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

लॉकडाउन ख़त्म हो चुका है लेकिन गायत्री अभी भी टेलीमेडिसिन के सहारे ही अपने डॉक्टर से सलाह लेती हैं। शाहजहांपुर से लखनऊ की दूरी लगभग 175 किलोमीटर है। गायत्री देवी के लिए लखनऊ जाने का मतलब है पूरा एक दिन लगाना और आने-जाने में कम से कम 2,000 रुपए का ख़र्च। उनके पति नहीं हैं और वो अपने बेटे पर निर्भर हैं।

वैसे तो उत्तर प्रदेश समेत देश भर में टेलीमेडिसिन सेवा ई-संजीवनी के नाम से केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने नवंबर 2019 में शुरू की थी। लेकिन तब इसमें ओपीडी की सुविधा नहीं थी। इस योजना को केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना के तहत पहचान किए गए मेडिकल कॉलेज और अस्पतालों के साथ मिलकर दिसंबर 2022 तक 1.55 लाख स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों में लागू किए जाने का लक्ष्य रखा गया। फ़िलहाल, ई-संजीवनी 4,000 स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों में लागू है।

भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) ने कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए 25 मार्च को टेलीमेडिसिन को लेकर गाइडलाइन जारी की थी कि डॉक्टर अपने मरीज़ों को टेलीफोन और वीडियो कॉल पर परामर्श दे सकते हैं, जिससे मरीज़ डॉक्टर के निर्देशों पर दवा खरीद सकते हैं।

कोरोनावायरस महामारी और लॉकडाउन की वजह से जब मरीज़ों का डॉक्टरों तक पहुंचना मुश्किल हो रहा था तब केंद्र सरकार ने 13 अप्रैल 2020 को इसका दूसरा संस्करण लॉन्च किया जिसमें ओपी़डी की सुविधा दी गई थी। ई-संजीवनी-ओपीडी के तहत मरीज़ों को उनके घरों तक ओपीडी सेवाएं उपलब्ध कराई गई।

लॉकडाउन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने इस सेवा का इस्तेमाल किया लेकिन अभी भी यह सेवा ग्रामीण क्षेत्रों तक पूरी तरह से नहीं पहुंच पाई है। इस सेवा का मकसद था कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधा पहुंचाई जाए और डॉक्टराें की सीमित संख्या के बावजूद लोगों को बेहतर इलाज दिया जाए लेकिन जागरूकता की कमी की वजह से यह अपने मकसद को हासिल करने में उतनी सफ़ल नहीं रही है। इस सेवा का इस्तेमाल करने के लिए स्मार्ट फ़ोन या फिर इंटरनेट कनैक्शन होना ज़रूरी है।

उत्तर प्रदेश में कुल 8.4 करोड़ इंटरनेट यूज़र हैं, टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) की इस साल जनवरी में जारी रिपार्ट के अनुसार। राज्य में देश में सबसे ज्यादा 16.5 करोड़ मोबाइल यूजर्स हैं। (Page 40)

उत्तर प्रदेश टेलीपरामर्श सेवाएं देने में आगे

कोरोनावायरस के दौरान देश भर के सात लाख लोगों को ई-संजीवनी के ज़रिए इलाज के लिए परामर्श दिया गया, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की सात नवंबर की प्रेस रिलीज़ के अनुसार। इस सेवा का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल तमिलनाडु में हुआ जहां 231,391 लोगों ने इसका लाभ उठाया। दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश रहा। यूपी में 196,349 लोगों ने ई-संजीवनी के सहारे डॉक्टरों से सलाह ली। उत्तर प्रदेश में टेलीमेडिसिन से 48 अस्पताल जुड़े हैं।

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े आबादी वाले राज्य में जहां डॉक्टरों की भारी कमी है वहां ये सेवा कारगर हो सकती है। इंडियास्पेंड की 19 अगस्त 2020 को प्रकाशित इस रिपोर्ट में ये विस्तार से बताया गया है कि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़़ेशन (डब्ल्यूएचओ) के मानकों के हिसाब से हर 1,000 लोगों पर एक डॉक्टर का अनुपात होना चाहिए। इस हिसाब से यूपी में कम से कम 20 लाख डॉक्टर होने चाहिए लेकिन 30 सितंबर 2019 तक राज्य में केवल 81,348 एलोपैथिक डॉक्टर ही रजिस्टर्ड थे। यानी ज़रूरत के हिसाब से लगभग 60% डॉक्टरों की कमी थी। ऐसे में टेलीमेडिसिन से इलाज एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।

इस सेवा के इस्तेमाल के लिए मरीज़ों को ई-संजीवनी का मोबाइल एप डाउनलोड कर या कंप्यूटर पर https://esanjeevaniopd.in/ पर जाकर रजिस्ट्रेशन कराना होता है। रजिस्ट्रेशन में मरीज़ को अपनी और मर्ज़ की जानकारी और मोबाइल नंबर डालने होते हैं। मोबाइल नंबर पर आए ओटीपी को दर्ज करने के बाद लॉग इन करना होता है। लॉग इन करने के बाद मरीज़ को एक टोकन नंबर मिलता है और उसे अपनी बारी का इंतज़ार करना होता है। मरीज़ को कितना इंतज़ार करना है इसकी जानकारी भी ई-संजीवनी वेबपोर्टल या एप पर लगातार दी जाती है।

मानसिक बीमारियों के इलाज में बेहद कारगर ई-संजीवनी

“मैं पिछले कुछ समय से डिप्रेशन में थी और इसके लिए मेरी काउंसलिंग लखनऊ के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में चल रही थी। लेकिन बार-बार हरदोई से लखनऊ जाना मुश्किल हो रहा था। कोविड में जब टेलीमेडिसिन के जरिए मेरी डॉक्टर से बात हुई तो मुझे लगा ये तरीका बेहतर है,” यूपी के हरदोई ज़िले की रहने वाली राधिका तिवारी, 27 (बदला हुआ नाम) ने बताया।

“टेलीमेडिसिन से कुछ बीमारियों में तो बढ़िया इलाज हो सकता है जिसमें मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियां सबसे पहले हैं। इसमें मरीज़ दूर रहकर अकेले में बैठकर जितने अच्छे तरीके से अपनी समस्या बता सकता है उतना डॉक्टर के सामने बैठकर भी नहीं बता सकता। इसमें मरीज़ का समय, पैसा और मेहनत तीनों ही बचती है,” किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज के टेलीमेडिसिन विभाग के हेड डॉ. संदीप भट्टाचार्य ने बताया।

‘कोरोनावायरस के दौरान पता चला टेलीमेडिसिन का महत्व’

“मेरा न्यूरो का इलाज कईं साल से लखनऊ में ही चल रहा था जब कोरोनावायरस फैला तो समस्या थी कि डॉक्टर को कैसे दिखाएं, अस्पताल बंद थे और इलाज समय पर कराना भी ज़रूरी था। अस्पताल में फ़ोन किया तो पता चला कि डॉक्टर वीडियो कॉल से भी समस्या सुनकर दवाई दे सकते हैं,” बस्ती ज़िले के रहने वाले प्रदीप सिंह (54) ने बताया।

“टेलीमेडिसिन का असली महत्व हमें कोविड-19 के दौरान ही पता चला। मरीज़ों को महामारी के समय में एक सपोर्ट सर्विस मिली, ये बात भी समझ आई कि दूर-दराज़ से जो मरीज फ़ॉलोअप के लिए आते हैं वो घर बैठे भी ये कर सकते हैं। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) में काफी ज़्यादा संख्या में मरीज़ यूपी के सुदूर गांवों और कस्बों से आते हैं कोविड के समय में वो अस्पताल आ नहीं सकते थे ऐसे में ये सेवा वरदान साबित हुई,” डॉ. संदीप भट्टाचार्य ने बताया।

किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज, लखनऊ के टेलीमेडिसिन विभाग के हेड और प्रोफेसर, डॉ. संदीप भट्टाचार्य। फ़ोटो: श्रृंखला पाण्डेय

टेलीमेडिसिन में कुछ सेवाएं पहले से दी रही थीं और कुछ सुविधाएं महामारी के समय में जोड़ी गईं, उन्होंने आगे कहा, ये अभी मुख्यतः तीन तरह से ज़्यादा काम कर रहा है। एक तो डॉक्टर से मरीज़ जिसमें किसी भी गांव-देहात, शहर में बैठा व्यक्ति सीधे डॉक्टर से संपर्क कर सकता है। इसके अलावा डॉक्टर से डॉक्टर यानी वो ज़िले जहां अभी स्पेशलिस्ट डॉक्टर कम हैं या नहीं हैं वहां के डॉक्टर यहां के एक्सपर्ट से सलाह लेते हैं। इसके अलावा एक हॉस्पिटल टू हॉस्पिटल सर्विस भी है जिसमें कोविड के लेवल-1 और लेवल-2 हॉस्पिटल्स को लेवल-3 हॉस्पिटल्स से जोड़ा गया है जिससे अगर वहां कोई इमरजेंसी या क्रिटिकल केस आते हैं तो यहां के एक्सपर्ट उन्हें ऑनलाइन देख सकते हैं, डॉ. भट्टाचार्य ने ई-संजीवनी के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा।

टेलीमेडिसिन की संभावनाएं समझना ज़रूरी

“कोरोनावायरस में हुए लॉकडाउन के बाद पहली बार देश में टेलीमेडिसिन से जुड़ी गाइडलाइंस जारी की गई। स्वास्थ्य मंत्रालय की गाइडलाइंस में कहा गया है कि रजिस्टर्ड डॉक्टर वीडियो के जरिए मरीज़ों को देख सकते हैं। हालांकि ये नया नहीं था लेकिन शायद हमें कभी इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी या हमने इसके महत्व को समझा ही नहीं,” केजीएमयू के पूर्व वाइस चांसलर डॉ. एमएलबी भट्ट ने बताया।

टेलीमेडिसिन की मदद से सुदूर गांवों में भी बेहतर इलाज पहुंचाया जा सकता है। फोटो: कॉमन सर्विस सेंटर संस्था

“अभी भी उत्तर प्रदेश के कई ऐसे ज़िले और कस्बे हैं जहां स्पेशलिस्ट डॉक्टर नहीं है और इसकी वजह से बड़े मेडिकल कॉलेजों पर मरीज़ों का बोझ लगातार बढ़ता है। आप ओपीडी में मरीज़ों की लंबी लाइन देख सकते हैं जबकि टेलीमेडिसिन के सही इस्तेमाल से काफी हद तक इस समस्या से निपटा जा सकता है। यानी इसमें बहुत संभावनाएं हैं लेकिन उसे समझना जरूरी है,” डॉ. भट्ट ने कहा।

लखनऊ के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में टेलीमेडिसिन के ज़रिए इलाज करने वाले डॉ आशीष सिंघल ने इसका एक दूसरा पक्ष सामने रखा। “इलाज के लिए प्रैक्टिकल होना ज़रूरी है, जब तक आपके सामने मरीज़ बैठा नहीं होगा आप ठीक तरह से जांच नहीं कर पाएंगे। या फिर कुछ ऐसी बीमारियां जिनमें मरीज़ का सामने होना ही जरूरी है, इंजेक्शन लगाना है, टांका लगाना है उसमें टेलीमेडिसिन फेल हो जाती है। लेकिन टेलीएजुकेशन और कुछ बीमारियों के इलाज और मरीजों के फ़ॉलोअप में ये बेहतरीन काम कर रही है जिसका अंदाज़ा कोविड के दौरान लगाया जा सकता है,” डॉ आशीष ने कहा।

“अभी भी उत्तर प्रदेश की एक बड़ी आबादी ग़रीब और अशिक्षित है, उनके लिए ये टेक्नोलॉजी किसी काम की नहीं है क्योंकि स्मार्ट फ़ोन से रजिस्ट्रेशन कराना और ऑनलाइन डॉक्टर से बात करना उनके लिए बड़ी चुनौती है। जबकि टेलीमेडिसिन के पीछे मंशा यही थी कि इससे सुदूर गांवों में रहने वाले लोगों को बेहतर इलाज मिल पाए,” डॉ. भट्ट ने बताया।

(श्रृंखला, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर ज़िले के ददरौल गांव की रहने वाली गायत्री देवी (45 वर्ष) गठिया की मरीज़ हैं। इसी साल फ़रवरी के महीने में गायत्री ने अपनी बीमारी के लिए लखनऊ मेडिकल कॉलेज में दिखाया। डॉक्टर ने कुछ टेस्ट और दवा देकर उन्हें तीन महीने बाद बुलाया। लेकिन इसी बीच देश भर में कोरोनावायरस की वजह से लॉकडाउन घोषित हो गया। लखनऊ आने-जाने का कोई साधन नहीं था और मेडिकल कॉलेज की ओपीडी सेवाएं भी बंद हो चुकी थी।

“मेरी दवाएं खत्म हो गईं थीं और मुझे डॉक्टर से सलाह भी लेनी थी। अस्पताल में संपर्क करने पर पता चला कि डॉक्टर टेलीमेडिसिन की मदद से ऑनलाइन भी मरीज़ देख रहे हैं,” गायत्री देवी ने बताया।

गायत्री देवी ने अपने सभी पुराने पर्चे अपने डॉक्टर को व्हाट्सएप के ज़रिए भेज दिए और उनके दिए गए निश्चित समय पर ऑनलाइन सलाह भी ले ली। इससे पहले कभी गायत्री देवी को टेलीमेडिसिन से इलाज के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

लॉकडाउन ख़त्म हो चुका है लेकिन गायत्री अभी भी टेलीमेडिसिन के सहारे ही अपने डॉक्टर से सलाह लेती हैं। शाहजहांपुर से लखनऊ की दूरी लगभग 175 किलोमीटर है। गायत्री देवी के लिए लखनऊ जाने का मतलब है पूरा एक दिन लगाना और आने-जाने में कम से कम 2,000 रुपए का ख़र्च। उनके पति नहीं हैं और वो अपने बेटे पर निर्भर हैं।

वैसे तो उत्तर प्रदेश समेत देश भर में टेलीमेडिसिन सेवा ई-संजीवनी के नाम से केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने नवंबर 2019 में शुरू की थी। लेकिन तब इसमें ओपीडी की सुविधा नहीं थी। इस योजना को केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना के तहत पहचान किए गए मेडिकल कॉलेज और अस्पतालों के साथ मिलकर दिसंबर 2022 तक 1.55 लाख स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों में लागू किए जाने का लक्ष्य रखा गया। फ़िलहाल, ई-संजीवनी 4,000 स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों में लागू है।

भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) ने कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए 25 मार्च को टेलीमेडिसिन को लेकर गाइडलाइन जारी की थी कि डॉक्टर अपने मरीज़ों को टेलीफोन और वीडियो कॉल पर परामर्श दे सकते हैं, जिससे मरीज़ डॉक्टर के निर्देशों पर दवा खरीद सकते हैं।

कोरोनावायरस महामारी और लॉकडाउन की वजह से जब मरीज़ों का डॉक्टरों तक पहुंचना मुश्किल हो रहा था तब केंद्र सरकार ने 13 अप्रैल 2020 को इसका दूसरा संस्करण लॉन्च किया जिसमें ओपी़डी की सुविधा दी गई थी। ई-संजीवनी-ओपीडी के तहत मरीज़ों को उनके घरों तक ओपीडी सेवाएं उपलब्ध कराई गई।

लॉकडाउन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने इस सेवा का इस्तेमाल किया लेकिन अभी भी यह सेवा ग्रामीण क्षेत्रों तक पूरी तरह से नहीं पहुंच पाई है। इस सेवा का मकसद था कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधा पहुंचाई जाए और डॉक्टराें की सीमित संख्या के बावजूद लोगों को बेहतर इलाज दिया जाए लेकिन जागरूकता की कमी की वजह से यह अपने मकसद को हासिल करने में उतनी सफ़ल नहीं रही है। इस सेवा का इस्तेमाल करने के लिए स्मार्ट फ़ोन या फिर इंटरनेट कनैक्शन होना ज़रूरी है।

उत्तर प्रदेश में कुल 8.4 करोड़ इंटरनेट यूज़र हैं, टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) की इस साल जनवरी में जारी रिपार्ट के अनुसार। राज्य में देश में सबसे ज्यादा 16.5 करोड़ मोबाइल यूजर्स हैं। (Page 40)

उत्तर प्रदेश टेलीपरामर्श सेवाएं देने में आगे

कोरोनावायरस के दौरान देश भर के सात लाख लोगों को ई-संजीवनी के ज़रिए इलाज के लिए परामर्श दिया गया, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की सात नवंबर की प्रेस रिलीज़ के अनुसार। इस सेवा का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल तमिलनाडु में हुआ जहां 231,391 लोगों ने इसका लाभ उठाया। दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश रहा। यूपी में 196,349 लोगों ने ई-संजीवनी के सहारे डॉक्टरों से सलाह ली। उत्तर प्रदेश में टेलीमेडिसिन से 48 अस्पताल जुड़े हैं।

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े आबादी वाले राज्य में जहां डॉक्टरों की भारी कमी है वहां ये सेवा कारगर हो सकती है। इंडियास्पेंड की 19 अगस्त 2020 को प्रकाशित इस रिपोर्ट में ये विस्तार से बताया गया है कि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़़ेशन (डब्ल्यूएचओ) के मानकों के हिसाब से हर 1,000 लोगों पर एक डॉक्टर का अनुपात होना चाहिए। इस हिसाब से यूपी में कम से कम 20 लाख डॉक्टर होने चाहिए लेकिन 30 सितंबर 2019 तक राज्य में केवल 81,348 एलोपैथिक डॉक्टर ही रजिस्टर्ड थे। यानी ज़रूरत के हिसाब से लगभग 60% डॉक्टरों की कमी थी। ऐसे में टेलीमेडिसिन से इलाज एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।

इस सेवा के इस्तेमाल के लिए मरीज़ों को ई-संजीवनी का मोबाइल एप डाउनलोड कर या कंप्यूटर पर https://esanjeevaniopd.in/ पर जाकर रजिस्ट्रेशन कराना होता है। रजिस्ट्रेशन में मरीज़ को अपनी और मर्ज़ की जानकारी और मोबाइल नंबर डालने होते हैं। मोबाइल नंबर पर आए ओटीपी को दर्ज करने के बाद लॉग इन करना होता है। लॉग इन करने के बाद मरीज़ को एक टोकन नंबर मिलता है और उसे अपनी बारी का इंतज़ार करना होता है। मरीज़ को कितना इंतज़ार करना है इसकी जानकारी भी ई-संजीवनी वेबपोर्टल या एप पर लगातार दी जाती है।

मानसिक बीमारियों के इलाज में बेहद कारगर ई-संजीवनी

“मैं पिछले कुछ समय से डिप्रेशन में थी और इसके लिए मेरी काउंसलिंग लखनऊ के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में चल रही थी। लेकिन बार-बार हरदोई से लखनऊ जाना मुश्किल हो रहा था। कोविड में जब टेलीमेडिसिन के जरिए मेरी डॉक्टर से बात हुई तो मुझे लगा ये तरीका बेहतर है,” यूपी के हरदोई ज़िले की रहने वाली राधिका तिवारी, 27 (बदला हुआ नाम) ने बताया।

“टेलीमेडिसिन से कुछ बीमारियों में तो बढ़िया इलाज हो सकता है जिसमें मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियां सबसे पहले हैं। इसमें मरीज़ दूर रहकर अकेले में बैठकर जितने अच्छे तरीके से अपनी समस्या बता सकता है उतना डॉक्टर के सामने बैठकर भी नहीं बता सकता। इसमें मरीज़ का समय, पैसा और मेहनत तीनों ही बचती है,” किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज के टेलीमेडिसिन विभाग के हेड डॉ. संदीप भट्टाचार्य ने बताया।

‘कोरोनावायरस के दौरान पता चला टेलीमेडिसिन का महत्व’

“मेरा न्यूरो का इलाज कईं साल से लखनऊ में ही चल रहा था जब कोरोनावायरस फैला तो समस्या थी कि डॉक्टर को कैसे दिखाएं, अस्पताल बंद थे और इलाज समय पर कराना भी ज़रूरी था। अस्पताल में फ़ोन किया तो पता चला कि डॉक्टर वीडियो कॉल से भी समस्या सुनकर दवाई दे सकते हैं,” बस्ती ज़िले के रहने वाले प्रदीप सिंह (54) ने बताया।

“टेलीमेडिसिन का असली महत्व हमें कोविड-19 के दौरान ही पता चला। मरीज़ों को महामारी के समय में एक सपोर्ट सर्विस मिली, ये बात भी समझ आई कि दूर-दराज़ से जो मरीज फ़ॉलोअप के लिए आते हैं वो घर बैठे भी ये कर सकते हैं। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) में काफी ज़्यादा संख्या में मरीज़ यूपी के सुदूर गांवों और कस्बों से आते हैं कोविड के समय में वो अस्पताल आ नहीं सकते थे ऐसे में ये सेवा वरदान साबित हुई,” डॉ. संदीप भट्टाचार्य ने बताया।

किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज, लखनऊ के टेलीमेडिसिन विभाग के हेड और प्रोफेसर, डॉ. संदीप भट्टाचार्य। फ़ोटो: श्रृंखला पाण्डेय

टेलीमेडिसिन में कुछ सेवाएं पहले से दी रही थीं और कुछ सुविधाएं महामारी के समय में जोड़ी गईं, उन्होंने आगे कहा, ये अभी मुख्यतः तीन तरह से ज़्यादा काम कर रहा है। एक तो डॉक्टर से मरीज़ जिसमें किसी भी गांव-देहात, शहर में बैठा व्यक्ति सीधे डॉक्टर से संपर्क कर सकता है। इसके अलावा डॉक्टर से डॉक्टर यानी वो ज़िले जहां अभी स्पेशलिस्ट डॉक्टर कम हैं या नहीं हैं वहां के डॉक्टर यहां के एक्सपर्ट से सलाह लेते हैं। इसके अलावा एक हॉस्पिटल टू हॉस्पिटल सर्विस भी है जिसमें कोविड के लेवल-1 और लेवल-2 हॉस्पिटल्स को लेवल-3 हॉस्पिटल्स से जोड़ा गया है जिससे अगर वहां कोई इमरजेंसी या क्रिटिकल केस आते हैं तो यहां के एक्सपर्ट उन्हें ऑनलाइन देख सकते हैं, डॉ. भट्टाचार्य ने ई-संजीवनी के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा।

टेलीमेडिसिन की संभावनाएं समझना ज़रूरी

“कोरोनावायरस में हुए लॉकडाउन के बाद पहली बार देश में टेलीमेडिसिन से जुड़ी गाइडलाइंस जारी की गई। स्वास्थ्य मंत्रालय की गाइडलाइंस में कहा गया है कि रजिस्टर्ड डॉक्टर वीडियो के जरिए मरीज़ों को देख सकते हैं। हालांकि ये नया नहीं था लेकिन शायद हमें कभी इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी या हमने इसके महत्व को समझा ही नहीं,” केजीएमयू के पूर्व वाइस चांसलर डॉ. एमएलबी भट्ट ने बताया।

टेलीमेडिसिन की मदद से सुदूर गांवों में भी बेहतर इलाज पहुंचाया जा सकता है। फोटो: कॉमन सर्विस सेंटर संस्था

“अभी भी उत्तर प्रदेश के कई ऐसे ज़िले और कस्बे हैं जहां स्पेशलिस्ट डॉक्टर नहीं है और इसकी वजह से बड़े मेडिकल कॉलेजों पर मरीज़ों का बोझ लगातार बढ़ता है। आप ओपीडी में मरीज़ों की लंबी लाइन देख सकते हैं जबकि टेलीमेडिसिन के सही इस्तेमाल से काफी हद तक इस समस्या से निपटा जा सकता है। यानी इसमें बहुत संभावनाएं हैं लेकिन उसे समझना जरूरी है,” डॉ. भट्ट ने कहा।

लखनऊ के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में टेलीमेडिसिन के ज़रिए इलाज करने वाले डॉ आशीष सिंघल ने इसका एक दूसरा पक्ष सामने रखा। “इलाज के लिए प्रैक्टिकल होना ज़रूरी है, जब तक आपके सामने मरीज़ बैठा नहीं होगा आप ठीक तरह से जांच नहीं कर पाएंगे। या फिर कुछ ऐसी बीमारियां जिनमें मरीज़ का सामने होना ही जरूरी है, इंजेक्शन लगाना है, टांका लगाना है उसमें टेलीमेडिसिन फेल हो जाती है। लेकिन टेलीएजुकेशन और कुछ बीमारियों के इलाज और मरीजों के फ़ॉलोअप में ये बेहतरीन काम कर रही है जिसका अंदाज़ा कोविड के दौरान लगाया जा सकता है,” डॉ आशीष ने कहा।

“अभी भी उत्तर प्रदेश की एक बड़ी आबादी ग़रीब और अशिक्षित है, उनके लिए ये टेक्नोलॉजी किसी काम की नहीं है क्योंकि स्मार्ट फ़ोन से रजिस्ट्रेशन कराना और ऑनलाइन डॉक्टर से बात करना उनके लिए बड़ी चुनौती है। जबकि टेलीमेडिसिन के पीछे मंशा यही थी कि इससे सुदूर गांवों में रहने वाले लोगों को बेहतर इलाज मिल पाए,” डॉ. भट्ट ने बताया।

(श्रृंखला, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं)

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।