कोविड-19: बर्थ डिफ़ेक्ट की पहचान के लिए यूपी में बच्चों की स्क्रीनिंग का काम प्रभावित

लखनऊ के हेल्‍थ सिटी हॉस्पिटल में कान्हा के होंठ का ऑपरेशन हुआ था। कान्हा के साथ उसकी मां अंजू। फ़ोटो: रणविजय सिंह

लखनऊ:

“घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें

किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।”

निदा फ़ाज़ली का ये मशहूर शेर विजय और अंजू ने सुना हो कि नहीं, मगर लाख कोशिशों के बावजूद वो पिछले एक साल से अपने बेटे कान्हा के चेहरे पर मुस्कान नहीं देख पाए थे।

पिछले साल 11 अगस्त को जब कान्हा का जन्म हुआ तो पता चला उसका ऊपर का होंठ कटा हुआ था। मेडिकल साइंस में इसे क्लेफ़्ट लिप कहा जाता है। ख़ैर, अच्छी बात ये रही कि इस साल सितंबर के महीने में कान्हा का ऑपरेशन हो गया और अब विजय और अंजू अपने बेटे के होंठों पर वो मुस्कान देख पा रहे हैं जिसका इंतज़ार उन्हें पिछले एक साल से था। कान्हा का ऑपरेशन राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के तहत हुआ है। हालांकि उसका ऑपरेशन इस साल मार्च में होना था लेकिन कोरोनावायरस और लॉकडाउन की वजह से इस ऑपरेशन में छह महीने की देरी हो गई।

"हमारे गांव की आशा बहू ने बताया कि कान्हा का ऑपरेशन फ्री में हो जाएगा। मुझे कान्हा को लेकर ज‍़िले के आरबीएसके ऑफ़िस में बुलाया गया था। वहां से मुझे ऑपरेशन के लिए 15 मार्च की तारीख़ मिली थी, लेकिन तभी लॉकडाउन लग गया और ऑपरेशन छह महीने बाद हो पाया,” कान्हा के पिता विजय सिंह ने बताया। 37 साल के विजय सिंह छोटे किसान हैं और उनकी पत्नी गृहणी हैं। निम्न मध्य वर्गीय आमदनी वाले इस परिवार को जन्म के समय कान्हा के होंठ देखकर जो चिंता थी वो आरबीएसके की वजह दूर हो पाई।

"अगर एक तरफ़ कटा हुआ होंठ है तो हम तीन से छह महीने के अंदर ऑपरेशन कर देते हैं, अच्छे रिज़ल्ट के लिए यही सही वक़्त है। अगर दोनों तरफ़ के होंठ कटे हुए हैं तो उसमें ज़्यादा इंतज़ार नहीं कर सकते," कान्हा का ऑपरेशन करने वाले प्लास्टिक सर्जन वैभव खन्ना ने बताया। हालांकि कान्हा का ऑपरेशन क़रीब 12 महीने से ज़्यादा का वक़्त बीतने के बाद हो पाया है।

भारत में कान्हा की तरह हर साल 17 लाख बच्चे जन्म से ही किसी रोग, दोष या अभाव के साथ पैदा होते हैं। इसे बर्थ डिफ़ेक्ट कहा जाता है। बर्थ डिफ़ेक्‍ट की वजह से नवजात शिशुओं की मौत भी हो जाती है। नवजात शिशुओं की मौत के कुल मामलों में से 9.6% नवजात शिशुओं की मौत बर्थ डिफ़ेक्‍ट से होती है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत के मामलों में से 4% बच्चे जन्म से ही कोई रोग, दोष या अभाव से पीड़ित होते हैं, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की 2019-20 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार।

ऐसे बच्चों की जल्द पहचान कर उनको समय पर इलाज उपलब्ध कराने के लिए आरबीएसके के तहत इन बच्चों की स्क्रीनिंग की जाती है। उत्तर प्रदेश में वित्त वर्ष 2019-20 में अब तक सबसे ज़्यादा, 2.88 करोड़ बच्चों की स्क्रीनिंग की गई थी। चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में लगभग 4 लाख बच्चों की ही स्क्रीनिंग हो पाई है। कोरोनावायरस की वजह से बर्थ डिफ़ेक्ट वाले बच्चों की न केवल स्क्रीनिंग बल्कि उनका इलाज और ऑपरेशन भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम

बर्थ डिफ़ेक्‍ट के मामलों में इलाज जितनी जल्दी मिल जाए उतना ही बेहतर होता है। इसी सोच के साथ भारत सरकार ने साल 2013 में नेशनल हेल्‍थ मिशन के तहत राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) की शुरुआत की। आरबीएसके में 4-डी के तहत 0-18 साल के बच्चों की स्क्रीनिंग होती है। 4-डी का अर्थ है - डिजीज़, डिफ़ेक्ट ऐट बर्थ, डेफ़िशिएंसी, डवेलेपमेन्ट डिले-डिसेबिलिटी (जन्म के समय रोग, दोष, अभाव, व‍िकलांगता सहित व‍िकासात्‍मक विलंब)।

आरबीएसके तहत बच्चों की स्क्रीनिंग और उनके जल्द से जल्द इलाज पर ज़ोर दिया जाता है। बच्चों की स्‍क्रीनिंग 30 हेल्थ कंडीशन को ध्‍यान में रखकर की जाती है। स्क्रीनिंग के लिए हर ब्लॉक में आरबीएसके की अलग से एक टीम होती है। इस टीम में 2 डॉक्टर (महिला/पुरुष), एक नर्स और एक फ़ार्मासिस्‍ट होते हैं। यह टीम आंगनबाड़ी केंद्रों में 0-6 वर्ष के बच्चों की साल में दो बार स्‍क्रीनिंग करती है, जबकि सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पहली से 12वीं कक्षा तक के बच्चों की साल में एक बार स्‍क्रीनिंग की जाती है।

Source: National Health Mission 

कोविड की वजह से यूपी में स्‍क्रीनिंग प्रभावित 

उत्तर प्रदेश में स्‍क्रीनिंग का यह काम इस साल भी बदस्तूर जारी था, लेकिन कोरोनावायरस और लॉकडाउन की वजह से स्क्रीनिंग का काम ठप हो गया। आरबीएसके की टीम को कोरोना की ड्यूटी में लगा दिया गया। साथ ही आंगनबाड़ी सेंटर और स्कूल बंद होने की वजह से भी स्‍क्रीनिंग नहीं हो पा रही। जो थोड़ी बहुत स्‍क्रीनिंग हो पा रही है वह बर्थ सेंटर पर ही हो रही है।

"स्कूल और आंगनबाड़ी बंद होने की वजह से यहां 2020-21 में स्क्रीनिंग नहीं हो सकी है। आरबीएसके के कर्मचारी कोरोना की ड्यूटी में भी लगे हैं। फिलहाल स्क्रीनिंग केवल डिलीवरी पॉइंट्स और आशा के द्वारा एचबीएनसी (Home Based New-born Care) व‍िज़िट में हो पा रही है," उत्तर प्रदेश में आरबीएसके के जनरल मैनेजर डॉ. वेद प्रकाश ने इंडियास्पेंड को बताया।

आरबीएसके की ओर से जो आंकड़े इंडियास्पेंड को उपलब्ध कराए गए हैं उनसे पता चलता है कि कोरोनावायरस की वजह से यूपी में स्‍क्रीनिंग बुरी तरह प्रभावित हुई है। यूपी में वित्त वर्ष 2019-20 में 2.88 करोड़ से ज़्यादा बच्चों की स्क्रीनिंग हुई थी। जबकि इस साल अप्रैल से सितंबर (2020-21) तक सिर्फ 4.08 लाख बच्चों की स्‍क्रीनिंग हो पाई है। साल 2019-20 में स्कूलों में 1.24 करोड़ और आंगनबाड़ी में 1.29 करोड़ बच्चों की स्‍क्रीनिंग हुई थी। चालू वित्त वर्ष की शुरुआत (एक अप्रैल) से ही आंगनबाड़ी और स्कूल बंद हैं इसलिए इस साल यहां एक भी बच्चे की स्‍क्रीनिंग नहीं हुई है।

“कोरोना में आरबीएसके का काम ही नहीं चल रहा है। लखनऊ में ब्लॉक स्तर पर आरबीएसके की 15 यूनिट हैं और इसके 90% कर्मचारी कोरोनावायरस की ड्यूटी में लगे हैं। आरबीएसके का काम तभी शुरू हो पाएगा जब स्कूल खुलेंगे," लखनऊ में आरबीएसके के नोडल अधिकारी डॉ. एके दीक्षित ने कहा।

यूपी में हर साल बढ़ी स्‍कीनिंग 

आरबीएसके से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि अगर कोरोनावायरस न होता तो इस साल की स्‍क्रीनिंग पिछले साल के मुकाबले बेहतर होती। अधिकारियों के इस दावे के पीछे यह तर्क है कि आरबीएसके की शुरुआत से ही यूपी में साल दर साल स्‍क्रीनिंग ज़्यादा होती रही है। वित्त वर्ष 2014-15 में जिन बच्चों की स्क्रीनिंग की गई उनकी संख्या 1.82 करोड़ थी जो पांच साल बाद वित्त वर्ष 2019-20 में बढ़कर 2.88 करोड़ हो गई, 20 मार्च 2020 को लोकसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक। लेकिन इस वित्त वर्ष के शुरुआती छह महीनों (अप्रैल से सितंबर) में केवल 4 लाख बच्चों की ही स्क्रीनिंग हो पाई है।

स्‍क्रीनिंग प्रभावित होने से क्‍या होगा?

आरबीएसके के डीईआईसी मैनेजर डॉ. अवधेश कुमार। फ़ोटो: रणविजय सिंह 

"स्क्रीनिंग इसलिए ज़रूरी है ताकि हम बच्चे की बीमारी की जल्द से जल्द पहचान कर पाएं। बीमारी पता होगी तो इलाज भी तेजी से होगा। जैसे, अगर किसी बच्चे को मोतियाबिंद की शिकायत है तो स्क्रीनिंग के वक़्त यह पता चल जाएगा और हम उसका ऑपरेशन करा सकते हैं। जब स्क्रीनिंग ही नहीं होगी तो बीमारी का पता ही नहीं चलेगा और न ही ऑपरेशन हो पाएगा। ऐसे हाल में उस बच्चे की तकलीफ़ बढ़ती जाएगी," बाराबंकी ज़िले में आरबीएसके के डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर (डीईआईसी) मैनेजर डॉ. अवधेश कुमार सिंह ने कहा।

बाराबंकी के ही देवा ब्लॉक में आरबीएसके टीम की डॉ. निहारिका कुमारी भी मानती हैं कि स्‍क्रीनिंग न होने से बहुत नुकसान है। "हम स्कूलों में स्क्रीनिंग करते हैं तो बहुत से बच्चे विटामिन-ए डेफिशिएंसी के मिलते हैं। पिछले साल हमारे सेंटर पर ही करीब 90 बच्चे मिले थे। अभी स्‍क्रीनिंग नहीं हो रही तो यह बच्चे नहीं मिल रहे। अगर वक़्त रहते विटामिन-ए डेफ़िशिएंसी के बच्चों की पहचान नहीं की गई तो समस्या बढ़ती जाएगी और ऐसे बच्चों की आंखों की रोशनी भी जा सकती है," डॉ. निहारिका ने बताया।

डॉ. निहारिका की ड्यूटी भी अभी कोरोनावायरस में लगी है। उन्हें सैंपलिंग का काम दिया गया है। वो बताती हैं कि अभी उनका पूरा ध्यान कोरोनावायरस के काम पर है। कई ऐसे बच्चे हैं जिनके तालू और होंठ के ऑपरेशन कराने हैं, लेकिन अभी अस्पतालों में आम दिनों की तरह काम नहीं हो रहा है इसलिए ये सब रुका हुआ है।

बाराबंकी में इस साल अप्रैल से सितंबर तक डिलीवरी सेंटर्स पर क़रीब 15 हज़ार बच्चों की स्‍क्रीनिंग की गई है। इसमें से 14 बच्चों में बर्थ डिफ़ेक्‍ट पाया गया है। "पिछले साल के मुकाबले इस साल स्‍क्र‍ीनिंग बहुत कम है। हमारी टीम कोरोना में लगी है और स्कूल और आंगनबाड़ी बंद हैं। जब स्कूल खुलेंगे तो कुछ काम हो पाएगा," अवधेश कुमार ने कहा। फ़िलहाल गृह मंत्रालय की ओर से 15 अक्टूबर से स्कूल खोलने से संबंधित गाइडलाइंस जारी की गई है।

कोरोनावायरस की वजह से आरबीएसके की स्‍क्रीनिंग तो प्रभावित है ही साथ ही ऑपरेशन में भी देरी हो रही है। ऑपरेशन में देरी के पीछे कई वजह हैं, जैसे- मार्च के बाद से ही आउट पेशेंट डिपार्टमेंट (ओपीडी) का काम प्रभावित रहा है। इसके अलावा लोगों में संक्रमण का डर भी है। साथ ही अस्पतालों में सर्जरी भी पहले के मुकाबले कम की जा रही है।

लखनऊ के हेल्थ सिटी हॉस्पिटल के प्लास्टिक सर्जन डॉ. वैभव खन्ना। फ़ोटो: रणविजय सिंह

ऑपरेशन में देरी की वजह से भी बच्चों को कई तरह की परेशानियां उठानी पड़ सकती हैं। आरबीएसके के तहत लखनऊ के हेल्थ सिटी हॉस्पिटल में बच्चों के कटे होंठ, तालू से संबंध‍ित ऑपरेशन होते हैं। बच्चों का ऑपरेशन करने वाले प्लास्टिक सर्जन वैभव खन्ना बताते हैं, "बच्चों के तालू का ऑपरेशन 8 से 9 महीने के अंदर-अंदर होना चाहिए। क्योंकि तालू बच्चे की आवाज़ से जुड़ा हुआ है और बच्चे अक्सर 8 से 9 महीने में आवाज़ निकालने लगते हैं। ऐसे में अगर उसका ऑपरेशन वक्त पर हो जाए तो उसकी स्पीच सही बनेगी, नहीं तो उसे कॉउंसलिंग की ज़रूरत पड़ सकती है, जो कि सब बच्चे नहीं ले पाएंगे। इसलिए वक्त पर स्क्रीनिंग और ऑपरेशन होना बहुत जरूरी है।"

(रणविजय, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

लखनऊ:

“घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें

किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।”

निदा फ़ाज़ली का ये मशहूर शेर विजय और अंजू ने सुना हो कि नहीं, मगर लाख कोशिशों के बावजूद वो पिछले एक साल से अपने बेटे कान्हा के चेहरे पर मुस्कान नहीं देख पाए थे।

पिछले साल 11 अगस्त को जब कान्हा का जन्म हुआ तो पता चला उसका ऊपर का होंठ कटा हुआ था। मेडिकल साइंस में इसे क्लेफ़्ट लिप कहा जाता है। ख़ैर, अच्छी बात ये रही कि इस साल सितंबर के महीने में कान्हा का ऑपरेशन हो गया और अब विजय और अंजू अपने बेटे के होंठों पर वो मुस्कान देख पा रहे हैं जिसका इंतज़ार उन्हें पिछले एक साल से था। कान्हा का ऑपरेशन राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के तहत हुआ है। हालांकि उसका ऑपरेशन इस साल मार्च में होना था लेकिन कोरोनावायरस और लॉकडाउन की वजह से इस ऑपरेशन में छह महीने की देरी हो गई।

"हमारे गांव की आशा बहू ने बताया कि कान्हा का ऑपरेशन फ्री में हो जाएगा। मुझे कान्हा को लेकर ज‍़िले के आरबीएसके ऑफ़िस में बुलाया गया था। वहां से मुझे ऑपरेशन के लिए 15 मार्च की तारीख़ मिली थी, लेकिन तभी लॉकडाउन लग गया और ऑपरेशन छह महीने बाद हो पाया,” कान्हा के पिता विजय सिंह ने बताया। 37 साल के विजय सिंह छोटे किसान हैं और उनकी पत्नी गृहणी हैं। निम्न मध्य वर्गीय आमदनी वाले इस परिवार को जन्म के समय कान्हा के होंठ देखकर जो चिंता थी वो आरबीएसके की वजह दूर हो पाई।

"अगर एक तरफ़ कटा हुआ होंठ है तो हम तीन से छह महीने के अंदर ऑपरेशन कर देते हैं, अच्छे रिज़ल्ट के लिए यही सही वक़्त है। अगर दोनों तरफ़ के होंठ कटे हुए हैं तो उसमें ज़्यादा इंतज़ार नहीं कर सकते," कान्हा का ऑपरेशन करने वाले प्लास्टिक सर्जन वैभव खन्ना ने बताया। हालांकि कान्हा का ऑपरेशन क़रीब 12 महीने से ज़्यादा का वक़्त बीतने के बाद हो पाया है।

भारत में कान्हा की तरह हर साल 17 लाख बच्चे जन्म से ही किसी रोग, दोष या अभाव के साथ पैदा होते हैं। इसे बर्थ डिफ़ेक्ट कहा जाता है। बर्थ डिफ़ेक्‍ट की वजह से नवजात शिशुओं की मौत भी हो जाती है। नवजात शिशुओं की मौत के कुल मामलों में से 9.6% नवजात शिशुओं की मौत बर्थ डिफ़ेक्‍ट से होती है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत के मामलों में से 4% बच्चे जन्म से ही कोई रोग, दोष या अभाव से पीड़ित होते हैं, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की 2019-20 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार।

ऐसे बच्चों की जल्द पहचान कर उनको समय पर इलाज उपलब्ध कराने के लिए आरबीएसके के तहत इन बच्चों की स्क्रीनिंग की जाती है। उत्तर प्रदेश में वित्त वर्ष 2019-20 में अब तक सबसे ज़्यादा, 2.88 करोड़ बच्चों की स्क्रीनिंग की गई थी। चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में लगभग 4 लाख बच्चों की ही स्क्रीनिंग हो पाई है। कोरोनावायरस की वजह से बर्थ डिफ़ेक्ट वाले बच्चों की न केवल स्क्रीनिंग बल्कि उनका इलाज और ऑपरेशन भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम

बर्थ डिफ़ेक्‍ट के मामलों में इलाज जितनी जल्दी मिल जाए उतना ही बेहतर होता है। इसी सोच के साथ भारत सरकार ने साल 2013 में नेशनल हेल्‍थ मिशन के तहत राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) की शुरुआत की। आरबीएसके में 4-डी के तहत 0-18 साल के बच्चों की स्क्रीनिंग होती है। 4-डी का अर्थ है - डिजीज़, डिफ़ेक्ट ऐट बर्थ, डेफ़िशिएंसी, डवेलेपमेन्ट डिले-डिसेबिलिटी (जन्म के समय रोग, दोष, अभाव, व‍िकलांगता सहित व‍िकासात्‍मक विलंब)।

आरबीएसके तहत बच्चों की स्क्रीनिंग और उनके जल्द से जल्द इलाज पर ज़ोर दिया जाता है। बच्चों की स्‍क्रीनिंग 30 हेल्थ कंडीशन को ध्‍यान में रखकर की जाती है। स्क्रीनिंग के लिए हर ब्लॉक में आरबीएसके की अलग से एक टीम होती है। इस टीम में 2 डॉक्टर (महिला/पुरुष), एक नर्स और एक फ़ार्मासिस्‍ट होते हैं। यह टीम आंगनबाड़ी केंद्रों में 0-6 वर्ष के बच्चों की साल में दो बार स्‍क्रीनिंग करती है, जबकि सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पहली से 12वीं कक्षा तक के बच्चों की साल में एक बार स्‍क्रीनिंग की जाती है।

Source: National Health Mission 

कोविड की वजह से यूपी में स्‍क्रीनिंग प्रभावित 

उत्तर प्रदेश में स्‍क्रीनिंग का यह काम इस साल भी बदस्तूर जारी था, लेकिन कोरोनावायरस और लॉकडाउन की वजह से स्क्रीनिंग का काम ठप हो गया। आरबीएसके की टीम को कोरोना की ड्यूटी में लगा दिया गया। साथ ही आंगनबाड़ी सेंटर और स्कूल बंद होने की वजह से भी स्‍क्रीनिंग नहीं हो पा रही। जो थोड़ी बहुत स्‍क्रीनिंग हो पा रही है वह बर्थ सेंटर पर ही हो रही है।

"स्कूल और आंगनबाड़ी बंद होने की वजह से यहां 2020-21 में स्क्रीनिंग नहीं हो सकी है। आरबीएसके के कर्मचारी कोरोना की ड्यूटी में भी लगे हैं। फिलहाल स्क्रीनिंग केवल डिलीवरी पॉइंट्स और आशा के द्वारा एचबीएनसी (Home Based New-born Care) व‍िज़िट में हो पा रही है," उत्तर प्रदेश में आरबीएसके के जनरल मैनेजर डॉ. वेद प्रकाश ने इंडियास्पेंड को बताया।

आरबीएसके की ओर से जो आंकड़े इंडियास्पेंड को उपलब्ध कराए गए हैं उनसे पता चलता है कि कोरोनावायरस की वजह से यूपी में स्‍क्रीनिंग बुरी तरह प्रभावित हुई है। यूपी में वित्त वर्ष 2019-20 में 2.88 करोड़ से ज़्यादा बच्चों की स्क्रीनिंग हुई थी। जबकि इस साल अप्रैल से सितंबर (2020-21) तक सिर्फ 4.08 लाख बच्चों की स्‍क्रीनिंग हो पाई है। साल 2019-20 में स्कूलों में 1.24 करोड़ और आंगनबाड़ी में 1.29 करोड़ बच्चों की स्‍क्रीनिंग हुई थी। चालू वित्त वर्ष की शुरुआत (एक अप्रैल) से ही आंगनबाड़ी और स्कूल बंद हैं इसलिए इस साल यहां एक भी बच्चे की स्‍क्रीनिंग नहीं हुई है।

“कोरोना में आरबीएसके का काम ही नहीं चल रहा है। लखनऊ में ब्लॉक स्तर पर आरबीएसके की 15 यूनिट हैं और इसके 90% कर्मचारी कोरोनावायरस की ड्यूटी में लगे हैं। आरबीएसके का काम तभी शुरू हो पाएगा जब स्कूल खुलेंगे," लखनऊ में आरबीएसके के नोडल अधिकारी डॉ. एके दीक्षित ने कहा।

यूपी में हर साल बढ़ी स्‍कीनिंग 

आरबीएसके से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि अगर कोरोनावायरस न होता तो इस साल की स्‍क्रीनिंग पिछले साल के मुकाबले बेहतर होती। अधिकारियों के इस दावे के पीछे यह तर्क है कि आरबीएसके की शुरुआत से ही यूपी में साल दर साल स्‍क्रीनिंग ज़्यादा होती रही है। वित्त वर्ष 2014-15 में जिन बच्चों की स्क्रीनिंग की गई उनकी संख्या 1.82 करोड़ थी जो पांच साल बाद वित्त वर्ष 2019-20 में बढ़कर 2.88 करोड़ हो गई, 20 मार्च 2020 को लोकसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक। लेकिन इस वित्त वर्ष के शुरुआती छह महीनों (अप्रैल से सितंबर) में केवल 4 लाख बच्चों की ही स्क्रीनिंग हो पाई है।

स्‍क्रीनिंग प्रभावित होने से क्‍या होगा?

आरबीएसके के डीईआईसी मैनेजर डॉ. अवधेश कुमार। फ़ोटो: रणविजय सिंह 

"स्क्रीनिंग इसलिए ज़रूरी है ताकि हम बच्चे की बीमारी की जल्द से जल्द पहचान कर पाएं। बीमारी पता होगी तो इलाज भी तेजी से होगा। जैसे, अगर किसी बच्चे को मोतियाबिंद की शिकायत है तो स्क्रीनिंग के वक़्त यह पता चल जाएगा और हम उसका ऑपरेशन करा सकते हैं। जब स्क्रीनिंग ही नहीं होगी तो बीमारी का पता ही नहीं चलेगा और न ही ऑपरेशन हो पाएगा। ऐसे हाल में उस बच्चे की तकलीफ़ बढ़ती जाएगी," बाराबंकी ज़िले में आरबीएसके के डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर (डीईआईसी) मैनेजर डॉ. अवधेश कुमार सिंह ने कहा।

बाराबंकी के ही देवा ब्लॉक में आरबीएसके टीम की डॉ. निहारिका कुमारी भी मानती हैं कि स्‍क्रीनिंग न होने से बहुत नुकसान है। "हम स्कूलों में स्क्रीनिंग करते हैं तो बहुत से बच्चे विटामिन-ए डेफिशिएंसी के मिलते हैं। पिछले साल हमारे सेंटर पर ही करीब 90 बच्चे मिले थे। अभी स्‍क्रीनिंग नहीं हो रही तो यह बच्चे नहीं मिल रहे। अगर वक़्त रहते विटामिन-ए डेफ़िशिएंसी के बच्चों की पहचान नहीं की गई तो समस्या बढ़ती जाएगी और ऐसे बच्चों की आंखों की रोशनी भी जा सकती है," डॉ. निहारिका ने बताया।

डॉ. निहारिका की ड्यूटी भी अभी कोरोनावायरस में लगी है। उन्हें सैंपलिंग का काम दिया गया है। वो बताती हैं कि अभी उनका पूरा ध्यान कोरोनावायरस के काम पर है। कई ऐसे बच्चे हैं जिनके तालू और होंठ के ऑपरेशन कराने हैं, लेकिन अभी अस्पतालों में आम दिनों की तरह काम नहीं हो रहा है इसलिए ये सब रुका हुआ है।

बाराबंकी में इस साल अप्रैल से सितंबर तक डिलीवरी सेंटर्स पर क़रीब 15 हज़ार बच्चों की स्‍क्रीनिंग की गई है। इसमें से 14 बच्चों में बर्थ डिफ़ेक्‍ट पाया गया है। "पिछले साल के मुकाबले इस साल स्‍क्र‍ीनिंग बहुत कम है। हमारी टीम कोरोना में लगी है और स्कूल और आंगनबाड़ी बंद हैं। जब स्कूल खुलेंगे तो कुछ काम हो पाएगा," अवधेश कुमार ने कहा। फ़िलहाल गृह मंत्रालय की ओर से 15 अक्टूबर से स्कूल खोलने से संबंधित गाइडलाइंस जारी की गई है।

कोरोनावायरस की वजह से आरबीएसके की स्‍क्रीनिंग तो प्रभावित है ही साथ ही ऑपरेशन में भी देरी हो रही है। ऑपरेशन में देरी के पीछे कई वजह हैं, जैसे- मार्च के बाद से ही आउट पेशेंट डिपार्टमेंट (ओपीडी) का काम प्रभावित रहा है। इसके अलावा लोगों में संक्रमण का डर भी है। साथ ही अस्पतालों में सर्जरी भी पहले के मुकाबले कम की जा रही है।

लखनऊ के हेल्थ सिटी हॉस्पिटल के प्लास्टिक सर्जन डॉ. वैभव खन्ना। फ़ोटो: रणविजय सिंह

ऑपरेशन में देरी की वजह से भी बच्चों को कई तरह की परेशानियां उठानी पड़ सकती हैं। आरबीएसके के तहत लखनऊ के हेल्थ सिटी हॉस्पिटल में बच्चों के कटे होंठ, तालू से संबंध‍ित ऑपरेशन होते हैं। बच्चों का ऑपरेशन करने वाले प्लास्टिक सर्जन वैभव खन्ना बताते हैं, "बच्चों के तालू का ऑपरेशन 8 से 9 महीने के अंदर-अंदर होना चाहिए। क्योंकि तालू बच्चे की आवाज़ से जुड़ा हुआ है और बच्चे अक्सर 8 से 9 महीने में आवाज़ निकालने लगते हैं। ऐसे में अगर उसका ऑपरेशन वक्त पर हो जाए तो उसकी स्पीच सही बनेगी, नहीं तो उसे कॉउंसलिंग की ज़रूरत पड़ सकती है, जो कि सब बच्चे नहीं ले पाएंगे। इसलिए वक्त पर स्क्रीनिंग और ऑपरेशन होना बहुत जरूरी है।"

(रणविजय, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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