कोविड-19: होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों पर यूपी सरकार का ध्यान नहीं

गोरखपुर में होम आइसोलेशन में रह रहे एक मरीज़ का घर। फ़ोटोः रणविजय सिंह

लखनऊः उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमतीनगर के रहने वाले 30 साल के कृष्ण‍ा राय के पास 10 अगस्त को ज़िले के मुख्य चिकित्साधिकारी (सीएमओ) के कार्यालय से फोन आया। उन्हें बताया गया कि उनकी कोरोनावायरस की रिपोर्ट पॉज़िटिव आई है। कृष्णा ने अस्पताल में भर्ती होने की बजाय घर पर ही रहकर इलाज कराने (होम आइसोलेशन) का विकल्प चुना। सीएमओ कार्यालय से उनके व्हाट्सएप नंबर पर दवाइयों की एक लिस्ट और हेल्पलाइन नंबर भेज दिया गया। कृष्णा के घर के बाहर लकड़ी की बल्ली गाड़कर एक पोस्टर लगा दिया गया। उसके बाद किसी ने भी कृष्णा की सुध नहीं ली।

"हेल्पलाइन नंबर मिलता ही नहीं था, इसलिए मैं अपने पहचान वाले एक डॉक्टर से सलाह ले रहा था। मैं कोरोना पॉज़िटिव था तभी बल्ली भी हटा ली गई, क्योंकि 10 दिन बाद बिना जांच के डिस्चार्ज करने का नियम है। 22 तारीख़ को बल्ली हटा ली गई जबकि एक दिन पहले ही 21 तारीख़ को मैंने अपनी जांच कराई थी तो मेरी रिपोर्ट फिर से पॉज़िटिव ही आई थी," कृष्णा ने बताया।

कृष्णा की जांच करने कोई टीम नहीं आई उन्होंने ख़ुद सिविल अस्पताल जाकर 21 अगस्त को अपनी जांच कराई। 21 अगस्त वाली रिपोर्ट पॉज़िटिव आने पर फिर से कृष्णा के पास सीएमओ ऑफ़िस से कॉल आई और उनसे कहा गया कि वो अपनी पूरी जानकारी दर्ज करा दें। यह कहने पर क‍ि वो पहले से ही पॉज़िटिव हैं और ये उनकी  दूसरी रिपोर्ट है जो पॉज़िटिव आई है। सीएमओ ऑफ़िस से कहा गया कि आप फिर से जानकारी दर्ज करा दें, क्योंकि अब आपका केस नए सिरे से दर्ज हो रहा है। इसके बाद फिर से फोन पर जानकारी ली जाने लगी और आखिरकार 28 तारीख को कृष्णा की रिपोर्ट निगेटिव आ गई।

कोरोना पॉज़िटिव होने के बाद होम आइसोलेशन में रहकर ठीक हुए कृष्णा राय। फ़ोटोः रणविजय सिंह

उत्तर प्रदेश में होम आइसोलेशन में रह रहे कोरोनावायरस के मरीज़ों में कृष्णा अकेले नहीं हैं जो बदइंताज़ामी का शिकार हैं। राज्य में होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। दिन में दो-तीन बार फ़ोन आते हैं, लेकिन हर बार उनसे एक ही तरह के सवाल पूछे जाते हैं, जैसे- आपका नाम क्‍या है? आप शहरी क्षेत्र में रहते हैं या ग्रामीण क्षेत्र में? आपका पता क्‍या है? इन सवालों के अलावा इनसे इनका हाल तक नहीं पूछा जाता, होम आइसोलेशन में रह रहे कई लोगों ने इंडियास्पेंड को बताया।

राज्य में होम आइसोलेशन की इजाज़त मिले अभी दो महीने भी पूरे नहीं हुए हैं और होम आइसोलेशन का विकल्प चुनने वाले मरीज़ों की संख्या 1.36 लाख से अधिक हो चुकी है। इसमें से एक लाख से अधिक मरीज़ ठीक हो चुके हैं।

होम आइसोलेशन में रह रहे अधिकतर मरीज़ों के पास ज़रूरी किट नहीं है। थर्मामीटर, मास्क और सेनेटाइज़र तो लगभग सभी के पास है लेकिन पल्स ऑक्सीमीटर कई मरीज़ों के पास नहीं है। होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों के पास दिन में कई-कई बार फ़ोन आते हैं मगर ये उनकी तबियत नहीं सिर्फ़ नाम-पता पूछ कर फ़ोन रख देते हैं। होम आइसोलेशन का विकल्प चुन चुके मरीज़ों की एक समस्या ये भी है कि समाज में जागरुकता की कमी की वजह से उन्हें सामाजिक बहिष्कार जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।

आधे से अधिक मरीज़ होम आइसोलेशन में

यूपी में मरीज़ों की बढ़ती संख्या और अस्पतालों में बेड की कमी को देखते हुए राज्य सरकार ने 20 जुलाई को लक्षणरहित मरीज़ों के लिए होम आइसोलेशन की इजाज़त दी थी। इसके बाद से राज्य में बड़ी संख्या में मरीज़ों ने होम आइसोलेशन का विकल्प चुना।  9 सितंबर तक राज्य में 1.36 लाख से भी अधिक मरीज़ होम आइसोलेशन में रहे, जिसमें से लगभग 1.02 लाख से अधिक, यानी लगभग 75% मरीज़ ठीक हुए हैं, राज्य के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव, अमित मोहन प्रसाद ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में यह जानकारी दी।

उत्तर प्रदेश की डिस्चार्ज पॉलिसी के मुताबिक होम आइसोलेशन में रह रहे व्यक्ति में अगर 10 दिन तक कोई लक्षण नहीं मिलते हैं तो उसे डिस्चार्ज मान लिया जाता है। डिस्चार्ज होने के बाद भी मरीज़ को 7 दिन तक क्‍वारंटीन रहना है। यह केंद्र की डिस्चार्ज पॉलिसी के अनुरूप ही है।

राज्य में 9 सितंबर तक 216,901 मरीज़ ठीक हुए हैं। इसमें से 102,569 मरीज़ होम आइसोलेशन में रहते हुए ठीक हुए हैं। यानी क़रीब 47% मरीज़ होम आइसोलेशन में रहकर ठीक हुए हैं। 

"प्रदेश में इस वक़्त 64,028 कोरोना के सक्रिय मामले हैं। इसमें से 33,371 लोग होम आइसोलेशन में हैं। इससे साफ है कि 50% से अधिक मरीज़ होम आइसोलेशन में रह रहे हैं। एक अच्छी बात है कि होम आइसोलेशन में किसी भी मरीज़ की अभी तक मौत नहीं हुई है," यूपी के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक, डॉ. देवेंद्र सिंह नेगी ने इंडियास्पेंड से कहा।

यूपी के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव, अमित मोहन प्रसाद। फ़ोटोः @UPGovt

होम आइसोलेशन में मरीज़ों की बढ़ती संख्या को देखते हुए यूपी के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव, अमित मोहन प्रसाद कुछ ऐसी हिदायतें हर प्रेस कॉन्फ़्रेंस में देते हैं -

"होम आइसोलेशन में रह रहे लोग अपना ध्यान रखें और अपने पास थर्मामीटर और पल्स ऑक्सीमीटर अवश्य रखें। यदि आपका तापमान बढ़ जाए, या ऑक्सीजन का सैचुरेशन लेवल 95 से नीचे आ जाए तो तत्काल डॉक्टर्स की सलाह लीजिए या तत्काल कोविड के कमांड या कंट्रोल सेंटर पर फोन कीजिए अथवा मुख्य चिकित्साधिकारी के कार्यालय में फ़ोन करके परामर्श लीजिए।" 

होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों के पास किट नहीं

सरकार ने होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों के लिए कुछ शर्तें निर्धारित की हैं, जिसमें होम आइसोलेशन में रहने वाले सभी मरीज़ों के लिए एक किट ख़रीदना ज़रूरी है। इस किट में पल्स ऑक्सीमीटर, थर्मामीटर, दवाइयां, मास्क और सेनेटाइज़र होते हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की गाइडलाइंस के मुताबिक़ होम आइसोलेशन का विकल्प चुनने वाले हर मरीज़ के पास इस किट का होना ज़रूरी है। इंडियास्पेंड ने होम आइसोलेशन में रह रहे जिन 8 लोगों से बात की उनमें से किसी के पास भी ये पूरी किट मौजूद नहीं थी। मास्क, सेनेटाइज़र और थर्मामीटर तो लगभग सभी मरीज़ों के पास थे लेकिन पल्स ऑक्सीमीटर किसी के भी पास नहीं था। जबकि इसी के ज़रिए शरीर में ऑक्सीजन का सेचुरेशन लेवल पता चलता है, जिससे ये तय किया जाता है कि मरीज़ को अस्पताल में दाखिल करना है या नहीं। 

"होम आइसोलेशन में रहने वाले लोगों को थर्मामीटर और पल्स ऑक्सीमीटर रखना जरूरी है। हमारी ओर से दवाइयां उपलब्ध कराई जाती हैं। थर्मामीटर और पल्सऑक्सीमीटर मरीज़ को खुद से ख़रीदना है। कई ज़िलों में यह चीजें न्यूनतम मूल्य पर उपलब्ध कराई जा रही हैं," उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य और चिकित्सा सेवाओं के महानिदेशक, देवेंद्र सिंह नेगी ने बताया।

पल्स ऑक्सीमीटर की कीमत करीब 1,200 रुपए होती है, ऐसे में मरीज़ इतना ख़र्चा करने से बच रहे हैं। कई जिलों में यह न्यूनतम मूल्य पर उपलब्ध कराया जा रहा है। जैसे बलिया में 25 मेडिकल स्टोर पर यह 700 रुपए में उपलब्ध है।

"हमने होम आइसोलेशन के मरीज़ों के लिए पल्स ऑक्सीमीटर और अन्य सामानों की न्यूनतम दर तय की है। होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों को यह रखना जरूरी है," बलिया ज़िले के मुख्य चिकित्साधिकारी जितेंद्र पाल ने बताया। 

इस सवाल पर कि क्या सरकार की ओर से भी पल्स ऑक्सीमीटर या थर्मामीटर दिया जा रहा है? जितेंद्र पाल कहते हैं, "ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। पंचायत स्तर पर पहले ऑक्सीमीटर ख़रीदे गए थे। अगर किसी पंचायत में एक मरीज़ है तो वो इसे लेकर इस्तेमाल कर सकता है, बाद में लौटा दे, लेकिन अगर अधिक मरीज़ होंगे तो उन्हें ख़रीदना ही पड़ेगा।"

होम आइसोलेशन का विकल्प चुनने वाले मरीज़ों को न तो सरकार की तरफ़ से ये किट दी जा रही है और न ही ये सुनिश्चित किया जा रहा है कि वो इस किट को ख़रीदें। प्रशासन की तरफ़ से इसके दाम निर्धारित किए जाने के बावजूद भी बाज़ार में ये किट महंगे दाम पर मिल रही है।

होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों की शिकायत है कि उन्हें सरकार की तरफ़ से अगर कुछ मिल रहा है तो सिर्फ़ हिदायतें, वो किस हाल में हैं इसकी परवाह किसी को नहीं है।

कुछ ऐसा ही हाल गोरखपुर ज़िले के पानापार गांव के निर्भय शुक्ला (24 साल) बताते हैं। निर्भय की कोरोनावायरस की रिपोर्ट 2 सितंबर को पॉज़िटिव आती है। अस्पतालों के ख़राब हालात को देखते हुए निर्भय होम आइसोलेशन में रहने का फैसला करते हैं। उनके घर के बाहर एक पतली सी रस्सी लगाकर एक पर्चा चिपका दिया जाता है। तीन दिन बीतने के बाद स्वास्थ्य विभाग से जुड़े दो लोग आते हैं और कुछ दवाएं देकर चले जाते हैं।

इस संवाददाता ने जब न‍िर्भय से फ़ोन पर बात की तो वो पूछने लगे कि उनका होम आइसोलेशन का टाइम कब ख़त्म होगा। न‍िर्भय को पता ही नहीं था कि होम आइसोलेशन में कितने वक़्त तक रहना है। उन्हें इस बात की भी जानकारी नहीं थी कि तबियत बिगड़ने पर क्‍या करना होगा। 

"मैंने अपने मोबाइल नंबर की जगह पापा का नंबर लिखवा दिया था। उनके पास दिन में दो-तीन कॉल आती हैं, लेकिन सब डिटेल नोट करते हैं, कोई यह नहीं बताता कि मुझे करना क्‍या है। सर, मैं ठीक तो हो जाऊंगा?" न‍िर्भय ने इस संवाददाता से पूछा।  

फ़ोन पर तबियत नहीं, सिर्फ़ नाम-पता पूछते हैं

होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ सबसे अधिक फ़ोन कॉल से परेशान हैं। उन्हें दिन में कई बार फोन आते हैं। कभी ज‍़िला स्तर के कोविड कमांड सेंटर से तो कभी राज्य के कंट्रोल सेंटर से फ़ोन आते हैं। ऐसे ही फ़ोन कृष्णा को भी आते थे।

 

"दिन में कई-कई फ़ोन आते हैं और सब एक ही तरह के सवाल करते हैं कि आप कहां रहते हैं?, क्‍या करते हैं? तबियत के बारे में कोई नहीं पूछता। मैं इनसे बहुत परेशान था। एक रोज़ किसी यादव जी का फोन आया तो मुझे गुस्सा आ गया। फिर उन्होंने बताया कि वो भी इस काम से परेशान हैं। वो शिक्षक हैं और उन्हें एडीएम ने तीन लिस्ट भेज दी हैं, जिनमें लोगों को फ़ोन करके जानकारी भरनी है," कृष्णा ने बताया।

फ़ोन कॉल से परेशानी की बात दूसरे मरीज़ भी बताते हैं। लखनऊ के ही 24 साल के सत्यम साहू फोन कॉल से इतने परेशान हुए कि कॉलर से झगड़ा कर बैठे। 

"मैं जानकारी देते-देते परेशान हो गया था। मैंने उनसे कहा, आप लोग मेरा पता, नाम पहले ही फ़ीड कर चुके हैं, वहां यह जानकारी होगी तो रोज़ क्‍यों पूछते हैं? उनका जवाब था कि यह उनका काम है। मैंने फिर फ़ोन स्विच ऑफ कर दिया," सत्यम ने कहा।

होम आइसोलेशन में रहकर ठीक हुए सत्यम साहू। फ़ोटोः रणव‍िजय सिंह 

सत्यम के फ़ोन स्विच ऑफ़ करने जैसी बात होम आइसोलेशन में रह रहे अन्य मरीज़ों के साथ भी देखने को मिली। इंडियास्पेंड की टीम ने जब कई मरीज़ों को फ़ोन किया तो उनमें से अधिकतर का फ़ोन स्विच ऑफ़ मिला। लखनऊ में ऐसे ही एक मरीज़ हैं उपेंद्र मिश्रा जिनका फोन स्विच ऑफ़ था। सुबह से शाम तक प्रयास करने के बाद रात में उपेंद्र का फ़ोन स्विच ऑन हुआ तो उनसे बात हो पाई। 

"मैं फ़ोन कॉल से परेशान हूं, इसलिए फ़ोन स्विच ऑफ़ ही रखता हूं। अगर ऑन हुआ तो दिन भर बस जानकारी देता रहूंगा। एक ही बात बार-बार पूछी जाती है। मैं एक सितंबर से होम आइसोलेशन में हूं, लेकिन कोई पूछने नहीं आया है, बस यह फ़ोन आते रहते हैं," उपेंद्र ने बताया।

हालांकि, जितेंद्र पाल मरीज़ों को दिन में कई बार फोन करने की बात को अच्छा करार देते हैं। "मरीज़ों का दिन में कई बार हाल पूछा जा रहा है। जहां तक बात एक ही तरह की बात पूछने का है तो शुरुआत के दो दिन तक ऐसा होता है कि हर कॉल पर नाम और पता पूछा जाता है। इससे जानकारी क्रॉस चेक हो जाती है तो ग़लती की गुंजाइश कम हो जाती है। इसके बाद से मरीज़ों का हाल चाल ही लिया जाता है, जैसे खून में ऑक्सीजन का लेवल कितना है? कैसा महसूस कर रहे हैं? इस तरह के सवाल पूछे जाते हैं," जितेंद्र पाल ने कहा।

होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों की यह भी शिकायत है कि उनसे स्वास्थ्य विभाग की ओर से कोई मिलने नहीं आता। न कोई डॉक्टर आता है, न ही कोई सलाह देने वाला। प्रतापगढ़ ज‍़िले के भ‍िखनापुर गांव में रोहित सिंह के परिवार में एक सितंबर को पांच सदस्य कोरोनावायरस पॉज़िटिव पाए गए। परिवार के सदस्यों से कोई टीम मिलने नहीं आई। उन्हें वॉट्सएप पर दवाइयों की लिस्ट भेज दी गई। जब इसमें से एक दवा नहीं मिली तो पास के अस्पताल से दो लोग आए और दवा देकर चले गए। 

"परिवार के लोग जबसे पॉज़िटिव पाए गए हैं तबसे एक बार स्वास्थ्य विभाग की टीम आई थी और पैरासिटामॉल की गोली देकर कहा था कि जब बुख़ार हो तो इसे खाना है," रोहित सिंह ने कहा। 

बलिया ज़िले के अखार गांव के प्रधान सुनील सिंह (57 साल) की कोरोनावायरस की रिपोर्ट 26 अगस्त को पॉज़िटिव आई। सुनील सिंह होम आइसोलेशन में रहने लगे। इस बीच उन्हें सीने में तकलीफ़ हुई तो उन्होंने हेल्पलाइन कई बार जगह फ़ोन किए। जब कहीं सुनवाई नहीं हुई तो परेशान होकर ख़ुद ही अस्पताल पहुंच गए ताकि सीने की जांच हो सके। लेकिन अस्पताल में डॉक्टरों ने उन्हें घर वापस जाने को कह दिया। 

समाज‍िक बहिष्‍कार का सामना

होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ सामाजिक बहिष्‍कार का सामना भी कर रहे हैं। प्रतापगढ़ के भिखनापुर गांव के रोहित सिंह के परिवार में पांच लोग कोरोनावायरस से संक्रमित हैं, रोहित संक्रमित नहीं हैं और वो परिवार से अलग रह रहे हैं। 

"मैंने हर वो उपाय किया है जो संक्रमण से बचने के लिए करना चाहिए। अभी कुछ दिन पहले मैं गांव के बाज़ार में सब्ज़ी लेने गया था। जब मैं सब्ज़ी लेकर चला आया तो मेरे मित्र ने मुझे फ़ोन कर कहा कि सब्ज़ी वाला सीधे आपसे नहीं कहना चाहता, लेकिन गांव के लोग उससे कह रहे हैं कि अगर आप उसकी दुकान पर सब्ज़ी लेने आएंगे तो गांव के बाकी लोग उससे सब्जी नहीं लेंगे," रोहित ने बताया। 

रोहित का 2 साल का बेटा भी कोरोना से संक्रमित है। उसके लिए अलग से गाय का दूध आता था। "जो महिला दूध देने आती थी वो बहाना बनाने लगी है। पहले दिन कहा कि गाय ने दूध नहीं दिया। दूसरे दिन कहा कि दूध बाज़ार में बेचने जाना है। मैंने उससे पूछा कि बात क्‍या है, कोई परेशानी है? इसपर उसने कहा कि गांव के लोग कहते हैं कि अगर तुम वहां दूध देने गई तो तुम्हारे घर कोई नहीं आएगा," रोहित बताया 

रोहित का परिवार गांव के संभ्रांत परिवारों में से एक है। इसके बावजूद भी उन्हें सामाजिक बहिष्‍कार जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में ग़रीब और सामाजिक तौर पर पिछड़े लोगों के साथ यह समस्या और भी बड़ी है।

 

अस्पताल जाने से डर रहे हैं मरीज़  

लखनऊ के केजीएमयू का कोरोनावायरस जांच केंद्र। फ़ोटोः सुम‍ित कुमार

एक सवाल यह भी उठता है कि ज़्यादा लोग अस्पतालों में भर्ती होकर इलाज कराने के बजाय होम आइसोलेशन का विकल्प क्यों चुन रहे हैं? इसका जवाब ख़ुद होम आइसोलेशन में रहने वाले मरीज़ देते हैं। 

लखनऊ के सत्यम साहू की कोरोनावायरस की रिपोर्ट 26 अगस्त को पॉज़िटिव आई। उसके बाद वो अस्पताल जाने की बजाय होम आइसोलेट हो गए। "मैंने कोव‍िड अस्पतालों के इतने ख़राब वीडियो देखें हैं कि वहां जाने से डर लगता है। इसलिए घर में ही रहना ठीक समझा," सत्यम ने कहा। 

मरीज़ों की बातों से समझ आता है कि उनके मन में कोविड अस्पतालों को लेकर डर बैठा है। इंडियास्पेंड ने 30 जुलाई की अपनी रिपोर्ट में बताया था कि उत्तर प्रदेश सरकार के एक लाख से अधिक बेड के दावे के बावजूद राज्य में मरीज़ों को वक़्त पर बेड न मिलने की घटनाएं सामने आ रही हैं। जगह-जगह मरीज़ अस्पतालों में भर्ती होने के लिए भटक रहे हैं, एंबुलेंस भी कई-कई घंटे की देरी से पहुंच रही हैं।

"अस्पतालों का हाल बुरा है। हमने कितनी ही ख़बरें देखी हैं जहां लोगों को बेड नहीं मिल रहे। ऐसे में घर पर रहना ही सही है। मैंने जिससे भी पूछा उसने यही सलाह दी," लखनऊ के रहने वाले कृष्णा राय कहते हैं। 

(रणविजय, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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लखनऊः उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमतीनगर के रहने वाले 30 साल के कृष्ण‍ा राय के पास 10 अगस्त को ज़िले के मुख्य चिकित्साधिकारी (सीएमओ) के कार्यालय से फोन आया। उन्हें बताया गया कि उनकी कोरोनावायरस की रिपोर्ट पॉज़िटिव आई है। कृष्णा ने अस्पताल में भर्ती होने की बजाय घर पर ही रहकर इलाज कराने (होम आइसोलेशन) का विकल्प चुना। सीएमओ कार्यालय से उनके व्हाट्सएप नंबर पर दवाइयों की एक लिस्ट और हेल्पलाइन नंबर भेज दिया गया। कृष्णा के घर के बाहर लकड़ी की बल्ली गाड़कर एक पोस्टर लगा दिया गया। उसके बाद किसी ने भी कृष्णा की सुध नहीं ली।

"हेल्पलाइन नंबर मिलता ही नहीं था, इसलिए मैं अपने पहचान वाले एक डॉक्टर से सलाह ले रहा था। मैं कोरोना पॉज़िटिव था तभी बल्ली भी हटा ली गई, क्योंकि 10 दिन बाद बिना जांच के डिस्चार्ज करने का नियम है। 22 तारीख़ को बल्ली हटा ली गई जबकि एक दिन पहले ही 21 तारीख़ को मैंने अपनी जांच कराई थी तो मेरी रिपोर्ट फिर से पॉज़िटिव ही आई थी," कृष्णा ने बताया।

कृष्णा की जांच करने कोई टीम नहीं आई उन्होंने ख़ुद सिविल अस्पताल जाकर 21 अगस्त को अपनी जांच कराई। 21 अगस्त वाली रिपोर्ट पॉज़िटिव आने पर फिर से कृष्णा के पास सीएमओ ऑफ़िस से कॉल आई और उनसे कहा गया कि वो अपनी पूरी जानकारी दर्ज करा दें। यह कहने पर क‍ि वो पहले से ही पॉज़िटिव हैं और ये उनकी  दूसरी रिपोर्ट है जो पॉज़िटिव आई है। सीएमओ ऑफ़िस से कहा गया कि आप फिर से जानकारी दर्ज करा दें, क्योंकि अब आपका केस नए सिरे से दर्ज हो रहा है। इसके बाद फिर से फोन पर जानकारी ली जाने लगी और आखिरकार 28 तारीख को कृष्णा की रिपोर्ट निगेटिव आ गई।

कोरोना पॉज़िटिव होने के बाद होम आइसोलेशन में रहकर ठीक हुए कृष्णा राय। फ़ोटोः रणविजय सिंह

उत्तर प्रदेश में होम आइसोलेशन में रह रहे कोरोनावायरस के मरीज़ों में कृष्णा अकेले नहीं हैं जो बदइंताज़ामी का शिकार हैं। राज्य में होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। दिन में दो-तीन बार फ़ोन आते हैं, लेकिन हर बार उनसे एक ही तरह के सवाल पूछे जाते हैं, जैसे- आपका नाम क्‍या है? आप शहरी क्षेत्र में रहते हैं या ग्रामीण क्षेत्र में? आपका पता क्‍या है? इन सवालों के अलावा इनसे इनका हाल तक नहीं पूछा जाता, होम आइसोलेशन में रह रहे कई लोगों ने इंडियास्पेंड को बताया।

राज्य में होम आइसोलेशन की इजाज़त मिले अभी दो महीने भी पूरे नहीं हुए हैं और होम आइसोलेशन का विकल्प चुनने वाले मरीज़ों की संख्या 1.36 लाख से अधिक हो चुकी है। इसमें से एक लाख से अधिक मरीज़ ठीक हो चुके हैं।

होम आइसोलेशन में रह रहे अधिकतर मरीज़ों के पास ज़रूरी किट नहीं है। थर्मामीटर, मास्क और सेनेटाइज़र तो लगभग सभी के पास है लेकिन पल्स ऑक्सीमीटर कई मरीज़ों के पास नहीं है। होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों के पास दिन में कई-कई बार फ़ोन आते हैं मगर ये उनकी तबियत नहीं सिर्फ़ नाम-पता पूछ कर फ़ोन रख देते हैं। होम आइसोलेशन का विकल्प चुन चुके मरीज़ों की एक समस्या ये भी है कि समाज में जागरुकता की कमी की वजह से उन्हें सामाजिक बहिष्कार जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।

आधे से अधिक मरीज़ होम आइसोलेशन में

यूपी में मरीज़ों की बढ़ती संख्या और अस्पतालों में बेड की कमी को देखते हुए राज्य सरकार ने 20 जुलाई को लक्षणरहित मरीज़ों के लिए होम आइसोलेशन की इजाज़त दी थी। इसके बाद से राज्य में बड़ी संख्या में मरीज़ों ने होम आइसोलेशन का विकल्प चुना।  9 सितंबर तक राज्य में 1.36 लाख से भी अधिक मरीज़ होम आइसोलेशन में रहे, जिसमें से लगभग 1.02 लाख से अधिक, यानी लगभग 75% मरीज़ ठीक हुए हैं, राज्य के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव, अमित मोहन प्रसाद ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में यह जानकारी दी।

उत्तर प्रदेश की डिस्चार्ज पॉलिसी के मुताबिक होम आइसोलेशन में रह रहे व्यक्ति में अगर 10 दिन तक कोई लक्षण नहीं मिलते हैं तो उसे डिस्चार्ज मान लिया जाता है। डिस्चार्ज होने के बाद भी मरीज़ को 7 दिन तक क्‍वारंटीन रहना है। यह केंद्र की डिस्चार्ज पॉलिसी के अनुरूप ही है।

राज्य में 9 सितंबर तक 216,901 मरीज़ ठीक हुए हैं। इसमें से 102,569 मरीज़ होम आइसोलेशन में रहते हुए ठीक हुए हैं। यानी क़रीब 47% मरीज़ होम आइसोलेशन में रहकर ठीक हुए हैं। 

"प्रदेश में इस वक़्त 64,028 कोरोना के सक्रिय मामले हैं। इसमें से 33,371 लोग होम आइसोलेशन में हैं। इससे साफ है कि 50% से अधिक मरीज़ होम आइसोलेशन में रह रहे हैं। एक अच्छी बात है कि होम आइसोलेशन में किसी भी मरीज़ की अभी तक मौत नहीं हुई है," यूपी के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक, डॉ. देवेंद्र सिंह नेगी ने इंडियास्पेंड से कहा।

यूपी के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव, अमित मोहन प्रसाद। फ़ोटोः @UPGovt

होम आइसोलेशन में मरीज़ों की बढ़ती संख्या को देखते हुए यूपी के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव, अमित मोहन प्रसाद कुछ ऐसी हिदायतें हर प्रेस कॉन्फ़्रेंस में देते हैं -

"होम आइसोलेशन में रह रहे लोग अपना ध्यान रखें और अपने पास थर्मामीटर और पल्स ऑक्सीमीटर अवश्य रखें। यदि आपका तापमान बढ़ जाए, या ऑक्सीजन का सैचुरेशन लेवल 95 से नीचे आ जाए तो तत्काल डॉक्टर्स की सलाह लीजिए या तत्काल कोविड के कमांड या कंट्रोल सेंटर पर फोन कीजिए अथवा मुख्य चिकित्साधिकारी के कार्यालय में फ़ोन करके परामर्श लीजिए।" 

होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों के पास किट नहीं

सरकार ने होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों के लिए कुछ शर्तें निर्धारित की हैं, जिसमें होम आइसोलेशन में रहने वाले सभी मरीज़ों के लिए एक किट ख़रीदना ज़रूरी है। इस किट में पल्स ऑक्सीमीटर, थर्मामीटर, दवाइयां, मास्क और सेनेटाइज़र होते हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की गाइडलाइंस के मुताबिक़ होम आइसोलेशन का विकल्प चुनने वाले हर मरीज़ के पास इस किट का होना ज़रूरी है। इंडियास्पेंड ने होम आइसोलेशन में रह रहे जिन 8 लोगों से बात की उनमें से किसी के पास भी ये पूरी किट मौजूद नहीं थी। मास्क, सेनेटाइज़र और थर्मामीटर तो लगभग सभी मरीज़ों के पास थे लेकिन पल्स ऑक्सीमीटर किसी के भी पास नहीं था। जबकि इसी के ज़रिए शरीर में ऑक्सीजन का सेचुरेशन लेवल पता चलता है, जिससे ये तय किया जाता है कि मरीज़ को अस्पताल में दाखिल करना है या नहीं। 

"होम आइसोलेशन में रहने वाले लोगों को थर्मामीटर और पल्स ऑक्सीमीटर रखना जरूरी है। हमारी ओर से दवाइयां उपलब्ध कराई जाती हैं। थर्मामीटर और पल्सऑक्सीमीटर मरीज़ को खुद से ख़रीदना है। कई ज़िलों में यह चीजें न्यूनतम मूल्य पर उपलब्ध कराई जा रही हैं," उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य और चिकित्सा सेवाओं के महानिदेशक, देवेंद्र सिंह नेगी ने बताया।

पल्स ऑक्सीमीटर की कीमत करीब 1,200 रुपए होती है, ऐसे में मरीज़ इतना ख़र्चा करने से बच रहे हैं। कई जिलों में यह न्यूनतम मूल्य पर उपलब्ध कराया जा रहा है। जैसे बलिया में 25 मेडिकल स्टोर पर यह 700 रुपए में उपलब्ध है।

"हमने होम आइसोलेशन के मरीज़ों के लिए पल्स ऑक्सीमीटर और अन्य सामानों की न्यूनतम दर तय की है। होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों को यह रखना जरूरी है," बलिया ज़िले के मुख्य चिकित्साधिकारी जितेंद्र पाल ने बताया। 

इस सवाल पर कि क्या सरकार की ओर से भी पल्स ऑक्सीमीटर या थर्मामीटर दिया जा रहा है? जितेंद्र पाल कहते हैं, "ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। पंचायत स्तर पर पहले ऑक्सीमीटर ख़रीदे गए थे। अगर किसी पंचायत में एक मरीज़ है तो वो इसे लेकर इस्तेमाल कर सकता है, बाद में लौटा दे, लेकिन अगर अधिक मरीज़ होंगे तो उन्हें ख़रीदना ही पड़ेगा।"

होम आइसोलेशन का विकल्प चुनने वाले मरीज़ों को न तो सरकार की तरफ़ से ये किट दी जा रही है और न ही ये सुनिश्चित किया जा रहा है कि वो इस किट को ख़रीदें। प्रशासन की तरफ़ से इसके दाम निर्धारित किए जाने के बावजूद भी बाज़ार में ये किट महंगे दाम पर मिल रही है।

होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों की शिकायत है कि उन्हें सरकार की तरफ़ से अगर कुछ मिल रहा है तो सिर्फ़ हिदायतें, वो किस हाल में हैं इसकी परवाह किसी को नहीं है।

कुछ ऐसा ही हाल गोरखपुर ज़िले के पानापार गांव के निर्भय शुक्ला (24 साल) बताते हैं। निर्भय की कोरोनावायरस की रिपोर्ट 2 सितंबर को पॉज़िटिव आती है। अस्पतालों के ख़राब हालात को देखते हुए निर्भय होम आइसोलेशन में रहने का फैसला करते हैं। उनके घर के बाहर एक पतली सी रस्सी लगाकर एक पर्चा चिपका दिया जाता है। तीन दिन बीतने के बाद स्वास्थ्य विभाग से जुड़े दो लोग आते हैं और कुछ दवाएं देकर चले जाते हैं।

इस संवाददाता ने जब न‍िर्भय से फ़ोन पर बात की तो वो पूछने लगे कि उनका होम आइसोलेशन का टाइम कब ख़त्म होगा। न‍िर्भय को पता ही नहीं था कि होम आइसोलेशन में कितने वक़्त तक रहना है। उन्हें इस बात की भी जानकारी नहीं थी कि तबियत बिगड़ने पर क्‍या करना होगा। 

"मैंने अपने मोबाइल नंबर की जगह पापा का नंबर लिखवा दिया था। उनके पास दिन में दो-तीन कॉल आती हैं, लेकिन सब डिटेल नोट करते हैं, कोई यह नहीं बताता कि मुझे करना क्‍या है। सर, मैं ठीक तो हो जाऊंगा?" न‍िर्भय ने इस संवाददाता से पूछा।  

फ़ोन पर तबियत नहीं, सिर्फ़ नाम-पता पूछते हैं

होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ सबसे अधिक फ़ोन कॉल से परेशान हैं। उन्हें दिन में कई बार फोन आते हैं। कभी ज‍़िला स्तर के कोविड कमांड सेंटर से तो कभी राज्य के कंट्रोल सेंटर से फ़ोन आते हैं। ऐसे ही फ़ोन कृष्णा को भी आते थे।

 

"दिन में कई-कई फ़ोन आते हैं और सब एक ही तरह के सवाल करते हैं कि आप कहां रहते हैं?, क्‍या करते हैं? तबियत के बारे में कोई नहीं पूछता। मैं इनसे बहुत परेशान था। एक रोज़ किसी यादव जी का फोन आया तो मुझे गुस्सा आ गया। फिर उन्होंने बताया कि वो भी इस काम से परेशान हैं। वो शिक्षक हैं और उन्हें एडीएम ने तीन लिस्ट भेज दी हैं, जिनमें लोगों को फ़ोन करके जानकारी भरनी है," कृष्णा ने बताया।

फ़ोन कॉल से परेशानी की बात दूसरे मरीज़ भी बताते हैं। लखनऊ के ही 24 साल के सत्यम साहू फोन कॉल से इतने परेशान हुए कि कॉलर से झगड़ा कर बैठे। 

"मैं जानकारी देते-देते परेशान हो गया था। मैंने उनसे कहा, आप लोग मेरा पता, नाम पहले ही फ़ीड कर चुके हैं, वहां यह जानकारी होगी तो रोज़ क्‍यों पूछते हैं? उनका जवाब था कि यह उनका काम है। मैंने फिर फ़ोन स्विच ऑफ कर दिया," सत्यम ने कहा।

होम आइसोलेशन में रहकर ठीक हुए सत्यम साहू। फ़ोटोः रणव‍िजय सिंह 

सत्यम के फ़ोन स्विच ऑफ़ करने जैसी बात होम आइसोलेशन में रह रहे अन्य मरीज़ों के साथ भी देखने को मिली। इंडियास्पेंड की टीम ने जब कई मरीज़ों को फ़ोन किया तो उनमें से अधिकतर का फ़ोन स्विच ऑफ़ मिला। लखनऊ में ऐसे ही एक मरीज़ हैं उपेंद्र मिश्रा जिनका फोन स्विच ऑफ़ था। सुबह से शाम तक प्रयास करने के बाद रात में उपेंद्र का फ़ोन स्विच ऑन हुआ तो उनसे बात हो पाई। 

"मैं फ़ोन कॉल से परेशान हूं, इसलिए फ़ोन स्विच ऑफ़ ही रखता हूं। अगर ऑन हुआ तो दिन भर बस जानकारी देता रहूंगा। एक ही बात बार-बार पूछी जाती है। मैं एक सितंबर से होम आइसोलेशन में हूं, लेकिन कोई पूछने नहीं आया है, बस यह फ़ोन आते रहते हैं," उपेंद्र ने बताया।

हालांकि, जितेंद्र पाल मरीज़ों को दिन में कई बार फोन करने की बात को अच्छा करार देते हैं। "मरीज़ों का दिन में कई बार हाल पूछा जा रहा है। जहां तक बात एक ही तरह की बात पूछने का है तो शुरुआत के दो दिन तक ऐसा होता है कि हर कॉल पर नाम और पता पूछा जाता है। इससे जानकारी क्रॉस चेक हो जाती है तो ग़लती की गुंजाइश कम हो जाती है। इसके बाद से मरीज़ों का हाल चाल ही लिया जाता है, जैसे खून में ऑक्सीजन का लेवल कितना है? कैसा महसूस कर रहे हैं? इस तरह के सवाल पूछे जाते हैं," जितेंद्र पाल ने कहा।

होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों की यह भी शिकायत है कि उनसे स्वास्थ्य विभाग की ओर से कोई मिलने नहीं आता। न कोई डॉक्टर आता है, न ही कोई सलाह देने वाला। प्रतापगढ़ ज‍़िले के भ‍िखनापुर गांव में रोहित सिंह के परिवार में एक सितंबर को पांच सदस्य कोरोनावायरस पॉज़िटिव पाए गए। परिवार के सदस्यों से कोई टीम मिलने नहीं आई। उन्हें वॉट्सएप पर दवाइयों की लिस्ट भेज दी गई। जब इसमें से एक दवा नहीं मिली तो पास के अस्पताल से दो लोग आए और दवा देकर चले गए। 

"परिवार के लोग जबसे पॉज़िटिव पाए गए हैं तबसे एक बार स्वास्थ्य विभाग की टीम आई थी और पैरासिटामॉल की गोली देकर कहा था कि जब बुख़ार हो तो इसे खाना है," रोहित सिंह ने कहा। 

बलिया ज़िले के अखार गांव के प्रधान सुनील सिंह (57 साल) की कोरोनावायरस की रिपोर्ट 26 अगस्त को पॉज़िटिव आई। सुनील सिंह होम आइसोलेशन में रहने लगे। इस बीच उन्हें सीने में तकलीफ़ हुई तो उन्होंने हेल्पलाइन कई बार जगह फ़ोन किए। जब कहीं सुनवाई नहीं हुई तो परेशान होकर ख़ुद ही अस्पताल पहुंच गए ताकि सीने की जांच हो सके। लेकिन अस्पताल में डॉक्टरों ने उन्हें घर वापस जाने को कह दिया। 

समाज‍िक बहिष्‍कार का सामना

होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ सामाजिक बहिष्‍कार का सामना भी कर रहे हैं। प्रतापगढ़ के भिखनापुर गांव के रोहित सिंह के परिवार में पांच लोग कोरोनावायरस से संक्रमित हैं, रोहित संक्रमित नहीं हैं और वो परिवार से अलग रह रहे हैं। 

"मैंने हर वो उपाय किया है जो संक्रमण से बचने के लिए करना चाहिए। अभी कुछ दिन पहले मैं गांव के बाज़ार में सब्ज़ी लेने गया था। जब मैं सब्ज़ी लेकर चला आया तो मेरे मित्र ने मुझे फ़ोन कर कहा कि सब्ज़ी वाला सीधे आपसे नहीं कहना चाहता, लेकिन गांव के लोग उससे कह रहे हैं कि अगर आप उसकी दुकान पर सब्ज़ी लेने आएंगे तो गांव के बाकी लोग उससे सब्जी नहीं लेंगे," रोहित ने बताया। 

रोहित का 2 साल का बेटा भी कोरोना से संक्रमित है। उसके लिए अलग से गाय का दूध आता था। "जो महिला दूध देने आती थी वो बहाना बनाने लगी है। पहले दिन कहा कि गाय ने दूध नहीं दिया। दूसरे दिन कहा कि दूध बाज़ार में बेचने जाना है। मैंने उससे पूछा कि बात क्‍या है, कोई परेशानी है? इसपर उसने कहा कि गांव के लोग कहते हैं कि अगर तुम वहां दूध देने गई तो तुम्हारे घर कोई नहीं आएगा," रोहित बताया 

रोहित का परिवार गांव के संभ्रांत परिवारों में से एक है। इसके बावजूद भी उन्हें सामाजिक बहिष्‍कार जैसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में ग़रीब और सामाजिक तौर पर पिछड़े लोगों के साथ यह समस्या और भी बड़ी है।

 

अस्पताल जाने से डर रहे हैं मरीज़  

लखनऊ के केजीएमयू का कोरोनावायरस जांच केंद्र। फ़ोटोः सुम‍ित कुमार

एक सवाल यह भी उठता है कि ज़्यादा लोग अस्पतालों में भर्ती होकर इलाज कराने के बजाय होम आइसोलेशन का विकल्प क्यों चुन रहे हैं? इसका जवाब ख़ुद होम आइसोलेशन में रहने वाले मरीज़ देते हैं। 

लखनऊ के सत्यम साहू की कोरोनावायरस की रिपोर्ट 26 अगस्त को पॉज़िटिव आई। उसके बाद वो अस्पताल जाने की बजाय होम आइसोलेट हो गए। "मैंने कोव‍िड अस्पतालों के इतने ख़राब वीडियो देखें हैं कि वहां जाने से डर लगता है। इसलिए घर में ही रहना ठीक समझा," सत्यम ने कहा। 

मरीज़ों की बातों से समझ आता है कि उनके मन में कोविड अस्पतालों को लेकर डर बैठा है। इंडियास्पेंड ने 30 जुलाई की अपनी रिपोर्ट में बताया था कि उत्तर प्रदेश सरकार के एक लाख से अधिक बेड के दावे के बावजूद राज्य में मरीज़ों को वक़्त पर बेड न मिलने की घटनाएं सामने आ रही हैं। जगह-जगह मरीज़ अस्पतालों में भर्ती होने के लिए भटक रहे हैं, एंबुलेंस भी कई-कई घंटे की देरी से पहुंच रही हैं।

"अस्पतालों का हाल बुरा है। हमने कितनी ही ख़बरें देखी हैं जहां लोगों को बेड नहीं मिल रहे। ऐसे में घर पर रहना ही सही है। मैंने जिससे भी पूछा उसने यही सलाह दी," लखनऊ के रहने वाले कृष्णा राय कहते हैं। 

(रणविजय, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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