क्यों बेतहाशा बढ़ रहा है पटना में वायु प्रदूषण

पटना में कचरे के धुंए के बीच से निकलती एक महिला। पटना में इस तरह से कचरा जलाना आम बात है।

पटना: इस साल नवंबर में जब दिल्ली का वायु प्रदूषण सुर्ख़ियों में छाया था, तब बिहार की राजधानी पटना में कम से कम तीन बार ऐसे मौक़े आए जब वायु प्रदूषण के मामले में पटना ने दिल्ली को पीछे छोड़ दिया।

25 नवंबर 2019 को पटना का एयर क्वालिटी इंडेक्स 404 रहा, जो देश के किसी भी शहर, यहां तक कि दिल्ली से भी ज़्यादा था। इसी तरह 27 नवंबर को एयर क्वालिटी इंडेक्स 426 था, जो देश में सबसे ज़्यादा था। इससे पहले 24 नवंबर को वायु प्रदूषण के मामले में पटना का एयर क्वालिटी इंडेक्स कानपुर के बाद (394) देश में दूसरे स्थान (382) पर था।

इसी साल मार्च में ग्रीनपीस ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की फ़ेहरिस्त में 20 लाख की आबादी वाला पटना सातवें पायदान पर था। ये रिपोर्ट साल 2018 के आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई थी। इसमें पटना की आबोहवा में पीएम (पार्टिकुलेट मैटर) 2.5 की औसत मात्रा 119.7 बताई गई थी, जो सेहत के लिहाज़ से खतरनाक थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक, पटना में साल के किसी भी महीने में पीएम 2.5 की मात्रा सामान्य नहीं रही।

एयर क्वालिटी इंडेक्स हवा में आठ तत्वों की मौजूदगी से तय होता है। इनमें पीएम 2.5, पीएम 10, नाइट्रोजन मोनो-ऑक्साइड, सल्फर डाई-ऑक्साइड, ओज़ोन, कार्बन मोनो-ऑक्साइड, अमोनिया और लेड शामिल हैं। इनमें सबसे खतरनाक पीएम 2.5 होता है, जो कि इंसान के बालों से 30 गुना महीन होता है। ये लंग कैंसर, अस्थमा और सांस की दूसरी बीमारियों की वजह बनता है। वायुमंडल में पीएम 2.5 की मात्रा 60 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक होनी चाहिए। 

लेकिन, 24-25, 25-26 और 26-27 नवंबर को पीएम 2.5 की मात्रा सामान्य से चार गुना ज़्यादा थी। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से मिले आंकड़े बताते हैं कि 24-25 नवंबर को पटना में पीएम 2.5 की मात्रा 235 माइक्रोग्राम, 25-26 नवंबर को 263 माइक्रोग्राम और 26-27 नवंबर को 301 माइक्रोग्राम और 27-28 नवंबर को 289 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर थी।

बिहार में भी जलने लगी है पराली

हाल के वर्षों में पटना और इसके आसपास के इलाकों में पराली जलाने की घटनाएं भी सामने आई हैं। ये भी पटना में प्रदूषण बढ़ाने में योगदान दे रहा है। दरअसल, बिहार से हज़ारों लोग पंजाब और हरियाणा में बतौर खेत मज़दूर काम करने जाते हैं। वहां धान की कटाई में हार्वेस्टर का इस्तेमाल होता है। इन खेत मज़दूरों के साथ ही पंजाब और हरियाणा की ये परंपरा बिहार तक चली आई है, जिसमें केवल धान की बालियां काटी जाती हैं और डंठलों को खेत में ही जला दिया जाता है। इसी वजह से नवंबर के पहले हफ्ते में बिहार सरकार ने पराली जलाने पर रोक लगा दी थी और पराली जलाने वाले किसानों को सब्सिडी नहीं देने का ऐलान किया था। लेकिन, इस आदेश के बावजूद पटना के आसपास इस साल बेतहाशा पराली जलाई गई।

कृषि विभाग ने पिछले महीने पराली जलाने वाले 250 किसानों की पहचान की है। ये किसान बक्सर, पटना, नालंदा, गया आदि ज़िलों के बताए जा रहे हैं। इन किसानों को सरकार डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (सब्सिडी) का लाभ नहीं देगी।

पटना में चल रही पुरानी डीज़ल गाड़ियां भी वायु प्रदूषण को बढ़ा रही हैं।

वायु प्रदूषण में गाड़ियों की भागीदारी

इनमें सबसे ज्यादा प्रदूषण गाड़ियों से फैलता है और साल दर साल इसमें इज़ाफा ही हो रहा है। बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों से पता चलता है कि साल 2018 में पटना के वायु प्रदूषण में ट्रांसपोर्ट सेक्टर की भागीदारी 19% थी, जो एक साल में बढ़ कर 32% हो गई। वायु प्रदूषण में ट्रांसपोर्ट सेक्टर की भागीदारी में इज़ाफा बताता है कि पटना में न केवल गाड़ियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है बल्कि पुरानी गाड़ियां भी बड़ी संख्या में शहर की सड़कों पर दौड़ रही हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन राजमार्ग मंत्रालय के मुताबिक़, साल 2001 में पटना में 2,93,000 गाड़ियां थी, जो साल 2015 में बढ़कर 10,19,000 हो गईं।

पटना के वायु प्रदूषण में ट्रांसपोर्ट सेक्टर की भागीदारी एक साल में 19% से बढ़कर 2019 में 32% हो गई है। 

Source: Bihar State Pollution Control Board

बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक़ इस साल के वायु प्रदूषण में अलाव जलाने व कोयले पर खाना बनाने की भागीदारी 16%, ईंट-भट्टे की भागीदारी 4%, कचरा जलाने की भागीदारी 7% और धूल के कणों की भागीदारी 12% रही।

हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने परिवहन व दूसरे विभागों के आला अधिकारियों के साथ बैठक में 15 साल पुरानी कमर्शियल गाड़ियों को हटाने और प्रदूषण फैलाने वाली गाड़ियों को ज़ब्त करने का आदेश दिया था। परिवहन विभाग के सूत्रों ने बताया कि इस अभियान के तहत क़रीब 100 गाड़ियां ज़ब्त हुई हैं।

बढ़ रही हैं सांस की बीमारियां 

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन से जुड़े डॉ. शिवेंद्र कुमार सिन्हा ने बताया, “वायु प्रदूषण के बढ़ने से दमा व सांस की बीमारियों से पीड़ित मरीजों की संख्या में 25 से 30% का इज़ाफा हुआ है।” 5 नवंबर की द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट में एक्सपर्ट्स के हवाले से दावा किया गया था कि पटना में वायु प्रदूषण की वजह से सांस और फेफ़ड़ों की बीमारियों के मामले क़रीब 30% तक बढ़ गए हैं।

बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की बुकलेट के मुताबिक़, साल 2018 में पटना में पीएम 2.5 का उत्सर्जन 20,000 टन था और अगर इससे निपटने के लिए कारगर क़दम नहीं उठाए गए तो साल 2030 तक पीएम 2.5 का उत्सर्जन 28,000 टन हो जाएगा। वायु प्रदूषण फैलाने वाले दूसरे ज़रियों को भी मिला लिया जाए, तो 2030 तक वायु प्रदूषण में 42% तक की बढ़ोतरी हो सकती है।

पटना में वायु प्रदूषण में बेतहाशा इज़ाफे को इस आंकड़े से भी समझा जा सकता है कि साल 2015 में पीएम 2.5 का उत्सर्जन 18,050 टन था, जो 2018 में बढ़ कर 20,000 टन हो गया। वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी की कई वजहें हैं। मसलन शहर के आसपास पराली जलाना, गंगा नदी का जगह बदलना, ईंट-भट्टे, औद्योगिक प्रदूषण, सर्दी के मौसम में अलाव जलाना, जीवाश्म ईंधन से खाना पकाना और गाड़ियों की संख्या में बढ़ोतरी।

बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की बुकलेट में कहा गया है कि पटना के वायु प्रदूषण में, बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन से उड़ने वाली धूल और गंगा के अपनी जगह बदल लेने के कारण उसके सूखे हिस्से की तरफ से आने वाली धूल भरी हवाओं की भागीदारी 12% है। हालांकि जानकारों का कहना है कि सर्दी के मौसम में गंगा की तरफ से पटना की तरफ़ हवा नहीं बहती, इसलिए गंगा को तो कम से कम पटना में प्रदूषण का ज़िम्मेदार नहीं मानना चाहिए। इस संबंध में जब बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन डॉ अशोक घोष से पूछा गया, तो उन्होंने कहा, “सालभर बहने वाली हवाओं के आधार पर प्रदूषण के कारकों की भागीदारी तय की गई है। सर्दी के मौसम में भले ही उस तरफ से हवा न आती हो, लेकिन दूसरे मौसमों में आती है।”

कम होती हरियाली

पटना में लगातार कम हो रही हरियाली का ज़िक्र बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट में नहीं मिलता। 

साल 2015 में यूनिवर्सल जर्नल ऑफ एनवायरमेंटल रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी में छपे एक रिसर्च पेपर के मुताबिक़, साल 1989 में पटना नगर निगम क्षेत्र में 20.04 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में इमारतें थीं, जो साल 2014 में 62.39 वर्ग किलोमीटर में फैल गईं। जबकि शहर में हरियाली साल 1989 में 43.01 वर्ग किलोमीटर में फैली हुई थी, जो साल 2014 में 16.28 वर्ग किलोमीटर रह गई। बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की तरफ से राज्य सरकार को सौंपे गए एयर क्वालिटी एक्शन प्लान में कहा गया है कि पहले पटना शहर और उसके आसपास कृषि क्षेत्र 53.7 वर्ग किलोमीटर से घटकर 19 वर्ग किलोमीटर रह गया है।

ग्रीनपीस के कार्यकर्ता अविनाश चंचल मानते हैं कि हरियाली पर्यावरण संतुलन के लिए ज़रूरी है, लेकिन सिर्फ हरियाली से वायु प्रदूषण कम नहीं हो सकता। उन्होंने कहा, “वायु प्रदूषण को कम करने के लिए इसके सोर्स पर फ़ोकस करना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वो कचरा जलाने का ट्रेंड ख़त्म करे और ट्रांसपोर्ट सिस्टम में कड़े बदलाव लाए।”

बिहार की भौगोलिक स्थिति भी काफी हद तक वायु प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार है। साउथ बिहार सेंट्रल यूनिवर्सिटी के एनवायरमेंटल साइंसेज़ डिपार्टमेंट के प्रो. प्रधान पार्थसारथी कहते हैं, “बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश हिमालय की तलहटी में बसा हुआ है। सर्दी के दिनों में इस क्षेत्र में उच्च दबाव बना रहता है, जो हवा को ऊपर की तरफ जाने से रोकता है, इसलिए प्रदूषक तत्व घूम-फिर कर वायुमंडल के निचले हिस्से में ही रह जाते हैं। पूर्वा या पछुआ हवा चलने पर ये तत्व बिखर जाते हैं, लेकिन ये हवाएं सर्दी में नहीं चलती हैं।”

क्लीन एयर एक्शन प्लान

पटना में वायु प्रदूषण घटाने के लिए पिछले महीने बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नेतृत्व में एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट के सेंटर फॉर एन्वायरमेंट, इनर्जी एंड क्लाइमेट चेंज, सेंटर फॉर स्टडी आफ साइंस, टेक्नोलॉजी एंड पालिसी, ब्लूमबर्ग फिलांथ्रोपीज़, शक्ति सस्टेनेबल इनर्जी फाउंडेशन व अरबन एमिशंस ने पिछले महीने क्लीन एयर एक्शन प्लान तैयार कर बिहार सरकार को सौंपा। 

प्लान जारी करते हुए बिहार के उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि 15 साल पुरानी गाड़ियों पर रोक के अलावा इलेक्ट्रॉनिक गाड़ियों को बढ़ावा देने के लिए रोड टैक्स में कटौती और चार्जिंग स्टेशनों की संख्या बढ़ाई जा रही है।

लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी ख़ुद भी इलेक्ट्रॉनिक गाड़ियों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

क्लीन एयर एक्शन प्लान में प्रदूषण कम करने के लिए छह कदम उठाने की सलाह दी गई है। प्लान में इलेक्ट्रॉनिक/सीएनजी वाली गाड़ियां चलाने, कचरे का प्रबंधन, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देने, कोयले की जगह एलपीजी को बढ़ावा देना आदि शामिल हैं।

पटना में बढ़ते प्रदूषण पर विशेषज्ञों ने भी बिहार सरकार को कई तरह के एहतियाती क़दम उठाने का मशविरा दिया है।

बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन डॉ अशोक घोष ने कहा, “सरकार को चाहिए कि वह डीज़ल और पेट्रोल वाली गाड़ियों की जगह इलेक्ट्रॉनिक व सीएनजी से चलने वाली गाड़ियों पर ज़ोर दे। इसके साथ ही निजी गाड़ियों की जगह पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देना चाहिए”।

उन्होंने आगे कहा, “ईंट-भट्टों में ज़िगज़ैग तकनीक अपनानी चाहिए, इससे चिमनियों से होने वाले प्रदूषण में करीब 34% फीसदी की कमी आएगी। वहीं, कारख़ानों में भी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए।”

(उमेश, पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं और 101Reporters.com के सदस्य हैं।)

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