क्यों, भारत का नया वेज कोड, प्रवासी मजदूरों को और ग़रीब बना देगा?

अहमदाबाद: दक्षिणी राजस्थान के बांसवाड़ा के एक आदिवासी प्रवासी मजदूर, कमलेश को एक दिन काम करने के 300 रुपये मिलते हैं। वह बताता है कि उसके लिए यह सबसे ज़्यादा मज़दूरी है, जो उन्हें मिल सकती है।

कमलेश के लिए सबसे अच्छा काम का मतलब अहमदाबाद के कपड़े की फैक्ट्री में रोजाना, बिना किसी छुट्टी के 12 घंटे की शिफ्ट में काम करना है। गर्म बॉयलर मशीन से राख की सफाई करने के बदले उसे हर महीने 9000 रुपये मिलते हैं।

हालांकि कमलेश एक दशक से अधिक समय से अहमदाबाद में है, लेकिन रहने के लिए कोई घर किराए पर लेने की बजाय, वह  फैक्ट्री की दीवारों के बाहर एक खाली जगह पर रहता है। इससे वह कुछ बचत कर पाता है और बांसवाड़ा में रह रहे अपने परिवार को कुछ पैसे भेज पाता है।

2 अगस्त, 2019 को नया कोड ऑन वेजज बिल पारित किया गया था। इसका प्रभाव कमलेश जैसे हजारों  प्रवासी मैनुअल श्रमिकों के जीवन और उनकी आजीविका पर पड़ेगा।

श्रम कनूनों को आसान बनाने और उनके अनुपालन और कवरेज  को बढ़ाने का दावा करते हुए यह नया कोड ऑन वेजेज एक्ट मजदूरी भुगतान अधिनियम 1936, न्यूनतम मजदूरी कानून 1948, बोनस भुगतान कानून 1965 और समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 की जगह लेगा। लेकिन ट्रेड यूनियनों, श्रमिक संगठनों और विशेषज्ञों का कहना है कि यह नया बिल मजदूरी के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण प्रावधानों की अनदेखी करता है।

केंद्र सरकार ने घोषणा की है कि राष्ट्रीय फ्लोर न्यूनतम मजदूरी (जिसे कोई राज्य सरकार आगे कम नहीं कर सकती) को अधिनियम के तहत 178 रुपये तय की गई है। यह राशि दो साल पहले घोषित मजदूरी से केवल 2 रुपये ज्यादा है। महंगाई को ध्यान में रखते हुए मजदूरी में 1.36% की वृद्धि का मतलब, वास्तविक रूप में मजदूरी में गिरावट है।

हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि क्या वास्तव में राष्ट्रीय फ्लोर वेज 178 रुपये होगा। अधिनियम न तो न्यूनतम वेतन को परिभाषित करता है और न ही इसे निर्धारित करने के लिए किसी एक पद्धति का पालन करता है। मजदूरों के न्यूनतम जीवन-स्तर को बनाए रखने की क्षमता की गारंटी के कानून बनाने की बजाय, यह न्यूनतम मजदूरी तय करने का काम राज्यों के विवेक पर छोड़ता है।

कमलेश, और उनके जैसे कई अन्य लोगों को सर्कुलर प्रवासी श्रमिकों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जो एक साल में किसी भी जगह काम के लिए तीन महीने से लेकर 11 महीने के समय तक रहते हैं, लेकिन वहां बसने में असमर्थ हैं। इससे उन्हें, उनके गांव और एक या अधिक कार्य स्थलों के बीच लगातार घूमते रहना पड़ता है।

2007 में असंगठित क्षेत्र के लिए राष्ट्रीय उद्यम आयोग ने एक रिपोर्ट तैयार की थी। उस रिपोर्ट के सह-लेखक रवि श्रीवास्तव कहते हैं, “राष्ट्रीय स्तर पर, ऐसे श्रमिकों की संख्या 8 करोड़ है और वे देश के श्रमबल का 15 से 20 फीसदी हैं। लेकिन प्रवासी मजदूरों पर लगातार काम और अध्ययन कर रहे  प्रिया देवशींकार जैसे स्कॉलर प्रवासी मजदूरों की संख्या को 10 करोड़ से अधिक बताते हैं।

लगातार भटकने वाले यानी सर्कुलर प्रवासी श्रमिकों की सहायता और सुरक्षा प्रदान करने वाले राजस्थान के एनजीओ, आजीविका ब्यूरो के अनुसार 2014 में, कमलेश के गृह राज्य राजस्थान ने अकेले श्रमबल में 57.9 लाख सर्कुलर श्रमिकों का योगदान दिया है।

भारतीय कार्यबल के सबसे कमजोर वर्गों में आने वाले ऐसे श्रमिकों की जिंदगी दर्शाती है कि वर्तमान न्यूनतम मजदूरी के स्तर पर भी परिणाम विनाशकारी हैं। वे बेहद अभाव में रहते हैं और अक्सर उनकी कमजोरी का फायदा उनके उनको मज़दूरी देने वाले उठाते हैं। शहरी कल्याण योजनाओं तक उनकी पहुंच नहीं होती, क्योंकि उनके पास शहरी पता नहीं होता।

आजीविका ब्यूरो ने 2019 में प्रवासी श्रमिकों पर एक सर्वेक्षण किया था। अध्ययन में राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के 337 मजदूरों को शामिल किया गया और अहमदाबाद में आवास, पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य और भोजन तक उनकी पहुंच के बारे में जानकारी इकट्ठी की गई। सर्वेक्षण में इन वस्तुओं तक पहुंचने में आसानी के साथ-साथ उनकी गुणवत्ता भी देखी गई।

अहमदाबाद में किराए के कमरे, खुली बस्तियों और वर्कसाइट पर बने टूटे-फूटे ढांचे वाले घरों में हुए इस सर्वेक्षण का लक्ष्य इस पहुंच की भौतिक, मानसिक और आर्थिक लागतों को समझना था। बुनियादी वस्तुओं पर श्रमिकों की आय और खर्च की मात्रा निर्धारित करके, हमने एक बुनियादी सवाल पूछा: वर्तमान वेतन स्तरों पर, शहर में सर्कुलर प्रवासी कैसे गुजारा करते हैं?

शोषित होकर भी खुले में रहने वाले

विकास के गुजरात मॉडल के रुप में जाना जाने वाले अहमदाबाद को दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते शहरों में से एक के रूप में पहचाना गया है। यह शहर कई सर्कुलर प्रवासी श्रमिकों के लिए एक मंजिल भी है, जो श्रमबल के तीन क्षेत्रों में प्रमुख रुप से काम करते हैं - निर्माण, कारखाने या फैक्ट्री और होटल और रेस्तरां। इन प्रवासियों की एक बड़ी संख्या उत्तरी गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश और दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी हैं, जो जीनव यापन करने के लिए प्रवास पर निर्भर होते जा रहे हैं।

सर्कुलर प्रवासी विभिन्न क्षेत्रों और पृष्ठभूमि से आते हैं, लेकिन उनमें एक चीज समान है - वे राज्य की किसी भी योजना के दायरे से बाहर ही रहते हैं। अनौपचारिक, आकस्मिक या संविदात्मक नौकरियों में होते हुए वे इन क्षेत्रों के सबसे निचले स्तरों में काम करते हैं  और अक्सर अपंजीकृत इकाइयों में, वे राज्य के नियामक निरीक्षण से दूर रहते हैं और इसका नतीजा होता है कि नियोक्ता श्रमिकों के कल्याण से जुड़ी किसी किस्म की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेते हैं।

श्रम ठेकेदार और नियोक्ता सर्कुलर प्रवासियों को विशेष रुप से पसंद करते हैं, क्योंकि वे सस्ते होते हैं और उनकी परिस्थितियां ऐसी होती हैं कि उन्हें जरूरत के हिसाब से मोड़ा जा सकता है। वे कम पैसे मेैं  काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं। लेकिन शहर में रहते हुए भी, औपचारिक दस्तावेज के बिना, वे सार्वजनिक योजनाओं का उपयोग नहीं कर सकते हैं। ये श्रमिक हर तरफ से फंसे हुए होते हैं, और जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया है, बहुत कम आमदनी पर जीते हैं और सार्वजनिक प्रावधान से बाहर रह जाते हैं।

गांव ही वतन है...

अहमदाबाद के विकास को लगातार सब्सिडी देने के बावजूद, सर्कुलर प्रवासियों का शहर के साथ एक अस्थायी संबंध है। त्योहार या कृषि कार्यों के लिए वे अक्सर शहर छोड़ अपने घर चले जाते हैं।

चंदलोडिया में खुली जगह पर बसेरा करने वाले एक राजस्थानी निर्माण कार्यकर्ता, मुकेशभाई कहता है, “मेरा गांव ही मेरा वतन है। शहर केवल कमाने आता हूं।” अहमदाबाद के रायपुर क्षेत्र में, एक अन्य निर्माण कर्मचारी ने जोर देकर कहा कि 10 साल तक शहर में रहने के बावजूद, वह यहां वोट नहीं देना चाहता। उसने कहा कि वो हमेशा अपने गांव में पंचायत चुनावों के लिए वोट देता है, क्योंकि सरपंच ही है, जो उसके परिवार के विकास के लिए काम करेगा।

फैक्ट्री के भीतर बॉयलर चलाते हुए एक आदिवासी श्रमिक का सवाल था कि शहर में उन लोगों की कौन सुनेगा?

कुछ प्रवासियों ने शहर से अस्थायी संबंध होने का कारण, अपने गांव से घनिष्टता को बताया, वहीं कुछ लोगों को "बाहरी" समझे जाने और किसी भी तरह की सामाजिक पूंजी हासिल ना करने का भी डर था । दोनों समूहों के लिए, शहर मुख्य रूप से मजदूरी का एक स्रोत है, जो गांव में खेती, कर्ज और पारिवार की देखभाल पर खर्च किया जाएगा। आदिवासी परिवार विशेष रुप से शादियों, अंत्येष्टि और उधार प्रथाओं में ज़्यादा पैसे ख़र्च कर अपने गांव और अपने समाज में अपनी मौजूदगी का अहसास कराते हैं।

बिना खिड़की वाले 10x10 वर्ग फुट के कमरे में 15 श्रमिक

वर्तमान में, अहमदाबाद में अकुशल और कुशल श्रमिकों के लिए दैनिक न्यूनतम मजदूरी 312.20 रुपए और 329.20 रुपए हैं। ऐसे में प्रवासी अपने खर्चे में कटौती के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए मजबूर होते हैं। ऐसा करने के लिए, उन्हें आवास, भोजन, पानी और स्वच्छता पर समझौता करना पड़ता है।

शायद किराया खर्च करने का एकमात्र उचित हिस्सा है, जो सर्कुलर प्रवासी बचा सकते हैं। औसतन, अहमदाबाद के अनौपचारिक किराये के बाजार में 10x10 पक्के (स्थायी) कमरे का मासिक किराया एक परिवार के लिए 3,000 रुपए है।  आदिवासी श्रमिक, जिनको शहर के नाके पर रोज़ काम नहीं मिल नहीं पाता  और शायद ही कभी उन्हें ज्यादा पैसे मिलने वाले कुशल श्रमिक का काम मिल पाता है, वे 7,000 रुपये प्रति महीने की औसत कमाई पर पर्याप्त भोजन खरीदने के साथ अच्छे घरों में रहना वहन नहीं कर सकते हैं। नतीजन वे काम करने की जगहों पर, खुले में, या छोटे और खतरनाक रूप से भीड़-भाड़ वाले कमरों में रहकर समझौता करते हैं जो उनके लिए शारीरिक और मानसिक रुप से खतरनाक है।

अहमदाबाद के रायपुर की एक चाली में, करीब 15 श्रमिक ( सारे पुरुष ) 10x10 वर्ग फुट के कमरे में रहते हैं जिसमें  खिड़की भी नहीं है। यहीं वे अपने सामान, पानी के कंटेनर और भोजन के बर्तन भी रखते हैं। राजस्थान के ये आदिवासी निर्माण श्रमिक प्रति माह 500 रुपये का किराया देते हैं। लेकिन ऐसे घरों से ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की चाहत में, मकान-मालिकों ने कमरा साझा करने वाले लोगों की संख्या निर्धारित नहीं की है। नतीजन एक कमरे में कई श्रमिक ठूसे हुए से दिखते हैं। और श्रमिकों को प्रति व्यक्ति 7 वर्ग फुट से ज्यादा जगह नहीं मिलती है। ऐसे में उनमें से ज्यादातर लोग कमरे की बाहरी छत पर या टिन की छत पर सोने के लिए मजबूर होते हैं। इसका मतलब है कि वे केवल अपना सामान रखने के लिए किराया दे रहे हैं।

ऑनसाइट रहने की कीमत मुफ्त

अपने काम करने की जगह पर भी श्रमिक मुख्य रुप से दो कारणों से रहते हैं। या तो वह किराए के रुप में खर्च किए जाने वाला पैसे की बचत करना चाहते हैं या फिर अहमदाबाद के महंगे किराए बाजार को वह वहन नहीं कर सकते हैं।

अंजलि विस्तर क्षेत्र में एक ढाबे पर, रहने वाले श्रमिकों को दो घंटे (सुबह 6 बजे- सुबह 8 बजे) के दौरान न केवल अपने खुद के इस्तेमाल (पीने, स्नान करने, कपड़े धोने) के लिए पर्याप्त पानी भरना होता है साथ ही ढाबे के बर्तन भी धोने होते हैं। 

औसतन, ढाबे के कर्मचारी प्रति दिन केवल 37 लीटर पानी की खपत करते हैं। एक स्वच्छ जीवन जीने के लिए शहरीकरण पर राष्ट्रीय आयोग ने(1988)  न्यूनतम 100 लीटर की सिफिरिश की है। ढाबे पर पानी की खपत की मात्रा, की गई सिफारिश से 63% कम है। जबकि इस संबंध में ‘आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों’ के लिए भारतीय मानक ब्यूरो ने 135 लीटर न्यूनतम की सिफारिश की है। इस सिफारिश से भी यह मात्रा 73% कम है।

निर्माण और फैक्ट्री स्थलों पर, जबकि श्रमिकों की पानी, स्वच्छता, बिजली की पहुंच होती है और कभी-कभी वे वहां ईंधन का उपयोग करते हैं। इसके लिए भी उन्हें ठेकेदारों का सहारा लेना पड़ता है। ठेकेदार श्रमिकों को दिन के किसी भी समय काम करने के लिए कह सकता है। ठेकेदार अक्सर उनसे अवैतनिक ओवरटाइम काम की उम्मीद करता है, और किसी भी छुट्टी से इनकार कर सकता है।

निर्माण  कार्यों और फैक्ट्री की जगहों पर रह कर श्रमिक किराया बचाते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें ठेकेदारों और मकान-मलिकों पर निर्भर रहना पड़ता है। जिसके परिणामस्वरूप अवैतनिक ओवरटाइम काम करना पड़ता है। स्वच्छता, पानी और खाना पकाने के ईंधन के मामलों में उन्हें समझौता करना पड़ता है।

अक्सर, जो सुविधाएं देने का वादा होता है, वे होती नहीं हैं-- कुछ शौचालयों में दरवाजे नहीं होते, जिससे महिलाओं को सुबह 4 बजे उठना पड़ता है ताकि साइट से दूर जा सकें। पूरा कामकाज इतने मनमाने ढंग से होता हैं कि हो सकता कि ईंधन एक सप्ताह के लिए मुफ्त हो और दूसरे हफ्ते इसके लिए पैसे लिए जाएं। किसी अपात स्थिति में किसी को नकद एडवांस चाहिए तो तो यह इस बात पर निर्भर करता है कि ठेकेदार से उसके रिश्ते कैसे हैं। आपात स्थिति मतलब गांवों में श्रमिकों के परिवार के सदस्य की बीमारी, शादी, मृत्यु आदि हो सकती है।

इस तरह से देखें तो  किराया बचाने की लागत कई गुना है। इन बुनियादी साधनों तक ‘मुफ्त’ पहुंच श्रमिकों के वेतन को तो प्रभावित करते ही हैं , कई बार श्रमिकों को अपर्याप्त पानी और स्वच्छता तक अनिश्चत पहुंच का बोझ भी उठाना पड़ता है। 

प्रवासी श्रमिकों के लिए को सभ्य ढंग से  रहने की स्थिति और कल्याणकारी प्रावधान के लिए ठेकेदार और नियोक्ता कानूनी रूप में बाध्य हैं,

लेकिन इन मामलों में निरीक्षण की कमी, ठेकेदार और नियोक्ता पर उनकी निर्भरता बढ़ जाती है। वर्कसाइट पर रहने वाले श्रमिकों की तुलना में घर के किराए में बचत के लिए, खुली जगह में रहने वाले आदिवासी परिवारों का जीवन ज्यादा अनिश्चितता से भरा होता है। उनका हर दिन पानी, उनकी दैनिक जरूरतों के लिए एक सुरक्षित स्थान और ईंधन की खोज में डूबा होता है।

खुले में रहने वाली महिलाओं के लिए, पानी और शौचालय तक पहुंच ज्यादा मुश्किल होती है। रेलवे ट्रैक के पास सार्वजनिक भूमि पर रहने वाली एक प्रवासी आदिवासी महिला, सुमनबेन  बताती है, "अगर थोड़ी देर से यानी हम दिन के उजाले में उठते हैं, और खुले में शौच करने जाते हैं, तो रेलवे अधिकारी हमें पत्थरों से मारते हैं या हमें बड़ी लाठी से पीटते हैं। कभी-कभी रात में चौकीदार होता है। अगर वह वहां होता है तो हम फिर उस दिन शौच नहीं कर पाते।"

शहर में व्यस्त सड़कों के बीच रहने वाली कई अन्य महिलाओं के लिए खुले में शौच असंभव है। पे एंड यूज़ टॉयलेट पर पैसे देकर शौचालय और स्नान करने के लिए उन्हें रोज 15 रुपये खर्च करने पड़ते हैं, यानी हर महीने उनकी दो दिन की मज़दूरी इसी में ख़र्च हो जाती है। पानी की खोज में पास की इमारतों में जाना है और उम्मीद करना कि वहां का सेक्युरिटी गार्ड उसे मना नहीं करेगा। निर्माण स्थल से वापस आते वक्त महिलाएं बेकार कार्ड बोर्ड, छड़ें और प्लास्टिक चुनकर लाती हैं, ताकि वे अपने परिवार के लिए खाना पका सकें। अगर वे ये इक्ट्ठा करने में असफल होती हैं, तो उन्हें बाजार से ईंधन लाने के लिए प्रति दिन 80 रुपये खर्च करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

खुले में नगर निगम के पानी के कनेक्शन का उपयोग करने में असमर्थ, प्रवासी श्रमिक किसी की दया पर निर्भर करते हैं। अक्सर वे आस-पास के निवासियों पर निर्भर रहते हैं ताकि वे अपने परिवारों के लिए पर्याप्त पानी भर सकें।

सड़कों पर रहने के लिए भुगतान

खुले स्थानों में रहने वालों के लिए स्थानीय समूहों, नगरपालिका प्राधिकरण या आस-पास के समाजों की ओर से बेदखली और उत्पीड़न का लगातार खतरा होता है, भले ही प्रवासी श्रमिक वर्षों से एक ही स्थान पर वापस आ रहे हों।

दुर्गानगर में एक खुली बस्ती में रहने वाला एक निर्माण मजदूर कहता है, "हम सात साल से एक ही जगह पर रह रहे थे, लेकिन एक दिन किसी ने हमसे कहा कि हमें जाना होगा, क्योंकि वह यहां घर बनाना चाहता है।" 

शांताबेन कहती हैं, "जब हम यहां आए तो एक स्थानीय शख्स ने एक नक्शा दिखाया और कहा कि यह जमीन उसकी है और हमें उसे रहने के लिए पैसे देने होंगे।" 

शांताबेन को अब भी उस शख्स को 500 रुपये हर महीने देने पड़ते हैं, जिस शख्स का शायद उस जमीन पर कोई मालिकाना हक नहीं है। शांताबेन को पता नहीं कि उसे और उसके परिवार को कब वह जगह खाली करनी पड़ेगी।

खुले में रहने के दौरान, प्रवासी श्रमिकों को पुलिस या नगर निगम की तरफ़ से बेदखली की आशंका होती है। साथ ही आसपास की इमारतों में रहने वाले लोगों से उत्पीड़न का भी ख़तरा बना रहता है।

भीड़भाड़ वाले किराए के कमरों, खुली जगह और ठेकेदारों के साथ वर्कसाइट पर बिना किसी भरोसे वाले नेटवर्क के साथ प्रवासी श्रमिक काम करते हैं। महिलाएं, विशेष रूप से, लंबे समय तक काम करती हैं, असुरक्षित परिस्थितियों में रहती हैं, और रोजमर्रा के अस्तित्व के लिए आवश्यक चीजों के बिना लगातार डिप्रेशन के बोझ में जीने का जोखिम उठाती हैं।

खाने पर सबसे ज्यादा खर्च

प्रवासियों के खर्च में सबसे बड़ा हिस्सा भोजन का है। औसतन, चार सदस्यों के सर्कुलर प्रवासी परिवार का प्रति सप्ताह भोजन राशन पर 2,000 रुपये खर्च होता है।शहर में किराए का भुगतान करने वाले श्रमिकों ने बताया कि उनके मासिक भोजन का का खर्च उनके किराए ये छह गुना ज्यादा है।

अपने परिवारों के साथ खुले स्थानों में रहने वाले निर्माण श्रमिकों ने भोजन और ईंधन पर औसतन उनकी मासिक आय का 53% खर्च करने की बात कही है, जो कि व्यवसाय और आवास प्रकार के सभी श्रमिकों में सबसे ज्यादा है।

यह न केवल सच है क्योंकि उनकी पूर्ण मासिक आय उन लोगों की तुलना में कम है जो किराए के कमरों में रहना पसंद कर सकते हैं, बल्कि इसलिए भी कि खुले में रहने की अतिरिक्त लागत चुकानी पड़ती है। 

खुले स्थानों पर रहने वाले श्रमिक जगह की कमी की वजह से सप्ताह भर के लिए भोजन खरीदने में असमर्थ होते हैं। ये अपने गांव से गेहूं या अन्य अनाज शहर में नहीं ला सकते हैं।

नतीजतन, उन्हें महंगे खुले बाजारों से रोजाना अनाज, सब्जियां और तेल खरीदना पड़ता है, जिससे शहर में राशन पर उनका खर्च काफी बढ़ जाता है। खुले में रहने के दौरान भी, वे अहमदाबाद में बुनियादी सुविधाओं का उपयोग करने के लिए अपनी आय के बड़े हिस्से को खर्च करते हैं।

आदिवासियों पर सबसे भारी बोझ 

यह कोई संयोग नहीं है कि इस तरह के बोझ को उठाने और शहर में सबसे अनिश्चितता और उत्पीड़न का सामना करने के लिए मजबूर होने वाले श्रमिक आदिवासी हैं।  वे पहले से ही हाशिए पर हैं, न्यूनतम मजदूरी दर प्राप्त करते हैं, खतरनाक काम करते हैं और राज्य की सार्वजनिक सुविधाओं से सबसे अधिक वंचित रखे गए हैं।

इस सर्वेक्षण के दौरान 337 श्रमिकों में से, मुख्य रुप से घरेलू कामगार और बोझा ढोने वाले  ‘अन्य पिछड़े वर्गों’और ‘सामान्य जातियों’ के श्रमिक थे, जिनका ध्यान गुणवत्ता, पर्याप्तता और पहुंच 

पर न था, लेकिन वे बुनियादी सुविधाओं को वहन करने में सक्षम थे।

ऐसे श्रमिकों ने शहर में अपेक्षाकृत मजबूत नेटवर्क विकसित किए हैं और इनका उपयोग शहरी दस्तावेज (राशन कार्ड, वोटर आईडी आदि) बनाने के लिए, अपने बच्चों को स्कूलों में भेजने के लिए, और शहर में मजबूती से पैर जमाने के लिए किया जाता है। 

मूल आजीविका के लिए अपने वेतन का उपयोग करते हुए उन्होंने शहर में संपत्ति मेंनिवेश किया है - जिससे उन्हें अपने परिवारों में निवेश करने के लिए अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। 

लेकिन एक मजबूत शहरी आधार, आदिवासी (और दलित) श्रमिकों की पहुंच से बाहर है, और भले ही वे शहर में कई वर्षों से रह रहे हों, लेकिन उनके पास न तो स्किल है और न ही मजदूरी की निरंतरता।

वर्तमान मजदूरी में स्वास्थ्य खर्च शामिल नहीं

उपर बताए गए खर्चों में प्रवासी श्रमिकों के भोजन, किराया, पानी और स्वच्छता पर नियमित मासिक खर्च का उल्लेख किया गया है।

 इसमें प्रवासी श्रमिकों के स्वास्थ्य खर्चों को नहीं जोड़ा गया है। बीमारी और दुर्घटनाएं विशेष रूप से निर्माण और कारखाने क्षेत्रों में होने की संभावना ज्यादा होती है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारतीय निर्माण क्षेत्र में हर दिन औसतन 38 लोगों की मृत्यु होती है। खतरनाक कामकाजी परिस्थितियों और बिना नियोजित नियोक्ता दायित्व और मुआवजा कानूनों के कारण, श्रमिकों के पास गंभीर दुर्घटनाओं और बीमारियों के लिए भी अपनी जेब से खर्च करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। इस तरह के खर्च से परिवार की आमदनी में कमी आ सकती है। उदाहरण के लिए, चंदलोदिया में खुले में रहने वाले एक निर्माण श्रमिक ने निजी अस्पताल में 1.5 लाख रुपये खर्च करने के बारे में बताया,जो वर्तमान में शहर में काम कर रहे उनके परिवार के सात सदस्यों की संयुक्त मासिक मजदूरी का 265% है।

क्या किए जाने की जरुरत?

यह वर्तमान न्यूनतम मजदूरी पर अहमदाबाद की एक तस्वीर है। नई वेतन प्रणाली के तहत, प्रवासियों के लिए

एक बुनियादी जीवनशैली दूर की बात हो जाएगी। शहर में रहने वाले प्रवासी मजदूरों का जीवन, उनके संवैधानिक रूप से अनिवार्य अधिकारों पर नहीं, बल्कि शक्तिशाली ‘स्थानीय’ मध्यस्थों ( ठेकेदार, नियोक्ता, जमींदार ) की दया पर टिका होता है। जो उनका अधिकार है, उसे ठेकेदार और नियोक्ता परोपकार के कामों के रूप में देखते हैं।

यहां अनौपचारिक रूप से मध्यस्थता की गुंजाइश एक अस्थिर विकास मॉडल का लक्षण है, जिसमें प्रवासी मजदूर असुरक्षित हैं और शहर में एक सभ्य जीवन का उपयोग करने के लिए शारीरिक और मानसिक बोझ ढो रहे हैं।

इस समस्या के समाधान के लिए, लोगों की भागीदारी के माध्यम से और पिछले अनुभवों के आधार पर न्यूनतम मजदूरी को पर्याप्त स्तर पर निर्धारित किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, 1992 के रपटकोस

मामले

में भारतीय श्रम सम्मेलन का 1957 का प्रस्ताव और सर्वोच्च न्यायालय ने श्रम को उद्योग के लिए उत्पादन की सस्ती इकाइयों के रूप में नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार के रूप में माना है।

लेकिन अगर श्रम कानून इस पर ध्यान नहीं देता है,जैसा कि कोड ऑन वेजज  में किया गया है, देश की आबादी में पहले से ही हाशिये पर खड़े वे लोग और भी गरीब होते चले जाएंगे।

(* प्रवासी श्रमिकों की पहचान छुपाने के लिए केवल  उनके पहले नाम का इस्तेमाल किया गया)

(जयराम और मेहरोत्रा, आजीविका ब्यूरो से जुड़े हैं।  आजीविका ब्यूरो एक गैर-लाभकारी पहल है, जो ग्रामीण, मौसमी प्रवासी श्रमिकों को सेवाएं, सहायता और सुरक्षा प्रदान करता है।  इस अध्ययन के लिए आंकड़े, जिनसे ये निष्कर्ष निकले हैं, वे आजीविका ब्यूरो के अहमदाबाद स्थित कर्मचारियों द्वारा एकत्र किए गए थे। )

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 17 सितंबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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अहमदाबाद: दक्षिणी राजस्थान के बांसवाड़ा के एक आदिवासी प्रवासी मजदूर, कमलेश को एक दिन काम करने के 300 रुपये मिलते हैं। वह बताता है कि उसके लिए यह सबसे ज़्यादा मज़दूरी है, जो उन्हें मिल सकती है।

कमलेश के लिए सबसे अच्छा काम का मतलब अहमदाबाद के कपड़े की फैक्ट्री में रोजाना, बिना किसी छुट्टी के 12 घंटे की शिफ्ट में काम करना है। गर्म बॉयलर मशीन से राख की सफाई करने के बदले उसे हर महीने 9000 रुपये मिलते हैं।

हालांकि कमलेश एक दशक से अधिक समय से अहमदाबाद में है, लेकिन रहने के लिए कोई घर किराए पर लेने की बजाय, वह  फैक्ट्री की दीवारों के बाहर एक खाली जगह पर रहता है। इससे वह कुछ बचत कर पाता है और बांसवाड़ा में रह रहे अपने परिवार को कुछ पैसे भेज पाता है।

2 अगस्त, 2019 को नया कोड ऑन वेजज बिल पारित किया गया था। इसका प्रभाव कमलेश जैसे हजारों  प्रवासी मैनुअल श्रमिकों के जीवन और उनकी आजीविका पर पड़ेगा।

श्रम कनूनों को आसान बनाने और उनके अनुपालन और कवरेज  को बढ़ाने का दावा करते हुए यह नया कोड ऑन वेजेज एक्ट मजदूरी भुगतान अधिनियम 1936, न्यूनतम मजदूरी कानून 1948, बोनस भुगतान कानून 1965 और समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 की जगह लेगा। लेकिन ट्रेड यूनियनों, श्रमिक संगठनों और विशेषज्ञों का कहना है कि यह नया बिल मजदूरी के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण प्रावधानों की अनदेखी करता है।

केंद्र सरकार ने घोषणा की है कि राष्ट्रीय फ्लोर न्यूनतम मजदूरी (जिसे कोई राज्य सरकार आगे कम नहीं कर सकती) को अधिनियम के तहत 178 रुपये तय की गई है। यह राशि दो साल पहले घोषित मजदूरी से केवल 2 रुपये ज्यादा है। महंगाई को ध्यान में रखते हुए मजदूरी में 1.36% की वृद्धि का मतलब, वास्तविक रूप में मजदूरी में गिरावट है।

हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि क्या वास्तव में राष्ट्रीय फ्लोर वेज 178 रुपये होगा। अधिनियम न तो न्यूनतम वेतन को परिभाषित करता है और न ही इसे निर्धारित करने के लिए किसी एक पद्धति का पालन करता है। मजदूरों के न्यूनतम जीवन-स्तर को बनाए रखने की क्षमता की गारंटी के कानून बनाने की बजाय, यह न्यूनतम मजदूरी तय करने का काम राज्यों के विवेक पर छोड़ता है।

कमलेश, और उनके जैसे कई अन्य लोगों को सर्कुलर प्रवासी श्रमिकों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जो एक साल में किसी भी जगह काम के लिए तीन महीने से लेकर 11 महीने के समय तक रहते हैं, लेकिन वहां बसने में असमर्थ हैं। इससे उन्हें, उनके गांव और एक या अधिक कार्य स्थलों के बीच लगातार घूमते रहना पड़ता है।

2007 में असंगठित क्षेत्र के लिए राष्ट्रीय उद्यम आयोग ने एक रिपोर्ट तैयार की थी। उस रिपोर्ट के सह-लेखक रवि श्रीवास्तव कहते हैं, “राष्ट्रीय स्तर पर, ऐसे श्रमिकों की संख्या 8 करोड़ है और वे देश के श्रमबल का 15 से 20 फीसदी हैं। लेकिन प्रवासी मजदूरों पर लगातार काम और अध्ययन कर रहे  प्रिया देवशींकार जैसे स्कॉलर प्रवासी मजदूरों की संख्या को 10 करोड़ से अधिक बताते हैं।

लगातार भटकने वाले यानी सर्कुलर प्रवासी श्रमिकों की सहायता और सुरक्षा प्रदान करने वाले राजस्थान के एनजीओ, आजीविका ब्यूरो के अनुसार 2014 में, कमलेश के गृह राज्य राजस्थान ने अकेले श्रमबल में 57.9 लाख सर्कुलर श्रमिकों का योगदान दिया है।

भारतीय कार्यबल के सबसे कमजोर वर्गों में आने वाले ऐसे श्रमिकों की जिंदगी दर्शाती है कि वर्तमान न्यूनतम मजदूरी के स्तर पर भी परिणाम विनाशकारी हैं। वे बेहद अभाव में रहते हैं और अक्सर उनकी कमजोरी का फायदा उनके उनको मज़दूरी देने वाले उठाते हैं। शहरी कल्याण योजनाओं तक उनकी पहुंच नहीं होती, क्योंकि उनके पास शहरी पता नहीं होता।

आजीविका ब्यूरो ने 2019 में प्रवासी श्रमिकों पर एक सर्वेक्षण किया था। अध्ययन में राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के 337 मजदूरों को शामिल किया गया और अहमदाबाद में आवास, पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य और भोजन तक उनकी पहुंच के बारे में जानकारी इकट्ठी की गई। सर्वेक्षण में इन वस्तुओं तक पहुंचने में आसानी के साथ-साथ उनकी गुणवत्ता भी देखी गई।

अहमदाबाद में किराए के कमरे, खुली बस्तियों और वर्कसाइट पर बने टूटे-फूटे ढांचे वाले घरों में हुए इस सर्वेक्षण का लक्ष्य इस पहुंच की भौतिक, मानसिक और आर्थिक लागतों को समझना था। बुनियादी वस्तुओं पर श्रमिकों की आय और खर्च की मात्रा निर्धारित करके, हमने एक बुनियादी सवाल पूछा: वर्तमान वेतन स्तरों पर, शहर में सर्कुलर प्रवासी कैसे गुजारा करते हैं?

शोषित होकर भी खुले में रहने वाले

विकास के गुजरात मॉडल के रुप में जाना जाने वाले अहमदाबाद को दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते शहरों में से एक के रूप में पहचाना गया है। यह शहर कई सर्कुलर प्रवासी श्रमिकों के लिए एक मंजिल भी है, जो श्रमबल के तीन क्षेत्रों में प्रमुख रुप से काम करते हैं - निर्माण, कारखाने या फैक्ट्री और होटल और रेस्तरां। इन प्रवासियों की एक बड़ी संख्या उत्तरी गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश और दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी हैं, जो जीनव यापन करने के लिए प्रवास पर निर्भर होते जा रहे हैं।

सर्कुलर प्रवासी विभिन्न क्षेत्रों और पृष्ठभूमि से आते हैं, लेकिन उनमें एक चीज समान है - वे राज्य की किसी भी योजना के दायरे से बाहर ही रहते हैं। अनौपचारिक, आकस्मिक या संविदात्मक नौकरियों में होते हुए वे इन क्षेत्रों के सबसे निचले स्तरों में काम करते हैं  और अक्सर अपंजीकृत इकाइयों में, वे राज्य के नियामक निरीक्षण से दूर रहते हैं और इसका नतीजा होता है कि नियोक्ता श्रमिकों के कल्याण से जुड़ी किसी किस्म की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेते हैं।

श्रम ठेकेदार और नियोक्ता सर्कुलर प्रवासियों को विशेष रुप से पसंद करते हैं, क्योंकि वे सस्ते होते हैं और उनकी परिस्थितियां ऐसी होती हैं कि उन्हें जरूरत के हिसाब से मोड़ा जा सकता है। वे कम पैसे मेैं  काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं। लेकिन शहर में रहते हुए भी, औपचारिक दस्तावेज के बिना, वे सार्वजनिक योजनाओं का उपयोग नहीं कर सकते हैं। ये श्रमिक हर तरफ से फंसे हुए होते हैं, और जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया है, बहुत कम आमदनी पर जीते हैं और सार्वजनिक प्रावधान से बाहर रह जाते हैं।

गांव ही वतन है...

अहमदाबाद के विकास को लगातार सब्सिडी देने के बावजूद, सर्कुलर प्रवासियों का शहर के साथ एक अस्थायी संबंध है। त्योहार या कृषि कार्यों के लिए वे अक्सर शहर छोड़ अपने घर चले जाते हैं।

चंदलोडिया में खुली जगह पर बसेरा करने वाले एक राजस्थानी निर्माण कार्यकर्ता, मुकेशभाई कहता है, “मेरा गांव ही मेरा वतन है। शहर केवल कमाने आता हूं।” अहमदाबाद के रायपुर क्षेत्र में, एक अन्य निर्माण कर्मचारी ने जोर देकर कहा कि 10 साल तक शहर में रहने के बावजूद, वह यहां वोट नहीं देना चाहता। उसने कहा कि वो हमेशा अपने गांव में पंचायत चुनावों के लिए वोट देता है, क्योंकि सरपंच ही है, जो उसके परिवार के विकास के लिए काम करेगा।

फैक्ट्री के भीतर बॉयलर चलाते हुए एक आदिवासी श्रमिक का सवाल था कि शहर में उन लोगों की कौन सुनेगा?

कुछ प्रवासियों ने शहर से अस्थायी संबंध होने का कारण, अपने गांव से घनिष्टता को बताया, वहीं कुछ लोगों को "बाहरी" समझे जाने और किसी भी तरह की सामाजिक पूंजी हासिल ना करने का भी डर था । दोनों समूहों के लिए, शहर मुख्य रूप से मजदूरी का एक स्रोत है, जो गांव में खेती, कर्ज और पारिवार की देखभाल पर खर्च किया जाएगा। आदिवासी परिवार विशेष रुप से शादियों, अंत्येष्टि और उधार प्रथाओं में ज़्यादा पैसे ख़र्च कर अपने गांव और अपने समाज में अपनी मौजूदगी का अहसास कराते हैं।

बिना खिड़की वाले 10x10 वर्ग फुट के कमरे में 15 श्रमिक

वर्तमान में, अहमदाबाद में अकुशल और कुशल श्रमिकों के लिए दैनिक न्यूनतम मजदूरी 312.20 रुपए और 329.20 रुपए हैं। ऐसे में प्रवासी अपने खर्चे में कटौती के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए मजबूर होते हैं। ऐसा करने के लिए, उन्हें आवास, भोजन, पानी और स्वच्छता पर समझौता करना पड़ता है।

शायद किराया खर्च करने का एकमात्र उचित हिस्सा है, जो सर्कुलर प्रवासी बचा सकते हैं। औसतन, अहमदाबाद के अनौपचारिक किराये के बाजार में 10x10 पक्के (स्थायी) कमरे का मासिक किराया एक परिवार के लिए 3,000 रुपए है।  आदिवासी श्रमिक, जिनको शहर के नाके पर रोज़ काम नहीं मिल नहीं पाता  और शायद ही कभी उन्हें ज्यादा पैसे मिलने वाले कुशल श्रमिक का काम मिल पाता है, वे 7,000 रुपये प्रति महीने की औसत कमाई पर पर्याप्त भोजन खरीदने के साथ अच्छे घरों में रहना वहन नहीं कर सकते हैं। नतीजन वे काम करने की जगहों पर, खुले में, या छोटे और खतरनाक रूप से भीड़-भाड़ वाले कमरों में रहकर समझौता करते हैं जो उनके लिए शारीरिक और मानसिक रुप से खतरनाक है।

अहमदाबाद के रायपुर की एक चाली में, करीब 15 श्रमिक ( सारे पुरुष ) 10x10 वर्ग फुट के कमरे में रहते हैं जिसमें  खिड़की भी नहीं है। यहीं वे अपने सामान, पानी के कंटेनर और भोजन के बर्तन भी रखते हैं। राजस्थान के ये आदिवासी निर्माण श्रमिक प्रति माह 500 रुपये का किराया देते हैं। लेकिन ऐसे घरों से ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की चाहत में, मकान-मालिकों ने कमरा साझा करने वाले लोगों की संख्या निर्धारित नहीं की है। नतीजन एक कमरे में कई श्रमिक ठूसे हुए से दिखते हैं। और श्रमिकों को प्रति व्यक्ति 7 वर्ग फुट से ज्यादा जगह नहीं मिलती है। ऐसे में उनमें से ज्यादातर लोग कमरे की बाहरी छत पर या टिन की छत पर सोने के लिए मजबूर होते हैं। इसका मतलब है कि वे केवल अपना सामान रखने के लिए किराया दे रहे हैं।

ऑनसाइट रहने की कीमत मुफ्त

अपने काम करने की जगह पर भी श्रमिक मुख्य रुप से दो कारणों से रहते हैं। या तो वह किराए के रुप में खर्च किए जाने वाला पैसे की बचत करना चाहते हैं या फिर अहमदाबाद के महंगे किराए बाजार को वह वहन नहीं कर सकते हैं।

अंजलि विस्तर क्षेत्र में एक ढाबे पर, रहने वाले श्रमिकों को दो घंटे (सुबह 6 बजे- सुबह 8 बजे) के दौरान न केवल अपने खुद के इस्तेमाल (पीने, स्नान करने, कपड़े धोने) के लिए पर्याप्त पानी भरना होता है साथ ही ढाबे के बर्तन भी धोने होते हैं। 

औसतन, ढाबे के कर्मचारी प्रति दिन केवल 37 लीटर पानी की खपत करते हैं। एक स्वच्छ जीवन जीने के लिए शहरीकरण पर राष्ट्रीय आयोग ने(1988)  न्यूनतम 100 लीटर की सिफिरिश की है। ढाबे पर पानी की खपत की मात्रा, की गई सिफारिश से 63% कम है। जबकि इस संबंध में ‘आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों’ के लिए भारतीय मानक ब्यूरो ने 135 लीटर न्यूनतम की सिफारिश की है। इस सिफारिश से भी यह मात्रा 73% कम है।

निर्माण और फैक्ट्री स्थलों पर, जबकि श्रमिकों की पानी, स्वच्छता, बिजली की पहुंच होती है और कभी-कभी वे वहां ईंधन का उपयोग करते हैं। इसके लिए भी उन्हें ठेकेदारों का सहारा लेना पड़ता है। ठेकेदार श्रमिकों को दिन के किसी भी समय काम करने के लिए कह सकता है। ठेकेदार अक्सर उनसे अवैतनिक ओवरटाइम काम की उम्मीद करता है, और किसी भी छुट्टी से इनकार कर सकता है।

निर्माण  कार्यों और फैक्ट्री की जगहों पर रह कर श्रमिक किराया बचाते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें ठेकेदारों और मकान-मलिकों पर निर्भर रहना पड़ता है। जिसके परिणामस्वरूप अवैतनिक ओवरटाइम काम करना पड़ता है। स्वच्छता, पानी और खाना पकाने के ईंधन के मामलों में उन्हें समझौता करना पड़ता है।

अक्सर, जो सुविधाएं देने का वादा होता है, वे होती नहीं हैं-- कुछ शौचालयों में दरवाजे नहीं होते, जिससे महिलाओं को सुबह 4 बजे उठना पड़ता है ताकि साइट से दूर जा सकें। पूरा कामकाज इतने मनमाने ढंग से होता हैं कि हो सकता कि ईंधन एक सप्ताह के लिए मुफ्त हो और दूसरे हफ्ते इसके लिए पैसे लिए जाएं। किसी अपात स्थिति में किसी को नकद एडवांस चाहिए तो तो यह इस बात पर निर्भर करता है कि ठेकेदार से उसके रिश्ते कैसे हैं। आपात स्थिति मतलब गांवों में श्रमिकों के परिवार के सदस्य की बीमारी, शादी, मृत्यु आदि हो सकती है।

इस तरह से देखें तो  किराया बचाने की लागत कई गुना है। इन बुनियादी साधनों तक ‘मुफ्त’ पहुंच श्रमिकों के वेतन को तो प्रभावित करते ही हैं , कई बार श्रमिकों को अपर्याप्त पानी और स्वच्छता तक अनिश्चत पहुंच का बोझ भी उठाना पड़ता है। 

प्रवासी श्रमिकों के लिए को सभ्य ढंग से  रहने की स्थिति और कल्याणकारी प्रावधान के लिए ठेकेदार और नियोक्ता कानूनी रूप में बाध्य हैं,

लेकिन इन मामलों में निरीक्षण की कमी, ठेकेदार और नियोक्ता पर उनकी निर्भरता बढ़ जाती है। वर्कसाइट पर रहने वाले श्रमिकों की तुलना में घर के किराए में बचत के लिए, खुली जगह में रहने वाले आदिवासी परिवारों का जीवन ज्यादा अनिश्चितता से भरा होता है। उनका हर दिन पानी, उनकी दैनिक जरूरतों के लिए एक सुरक्षित स्थान और ईंधन की खोज में डूबा होता है।

खुले में रहने वाली महिलाओं के लिए, पानी और शौचालय तक पहुंच ज्यादा मुश्किल होती है। रेलवे ट्रैक के पास सार्वजनिक भूमि पर रहने वाली एक प्रवासी आदिवासी महिला, सुमनबेन  बताती है, "अगर थोड़ी देर से यानी हम दिन के उजाले में उठते हैं, और खुले में शौच करने जाते हैं, तो रेलवे अधिकारी हमें पत्थरों से मारते हैं या हमें बड़ी लाठी से पीटते हैं। कभी-कभी रात में चौकीदार होता है। अगर वह वहां होता है तो हम फिर उस दिन शौच नहीं कर पाते।"

शहर में व्यस्त सड़कों के बीच रहने वाली कई अन्य महिलाओं के लिए खुले में शौच असंभव है। पे एंड यूज़ टॉयलेट पर पैसे देकर शौचालय और स्नान करने के लिए उन्हें रोज 15 रुपये खर्च करने पड़ते हैं, यानी हर महीने उनकी दो दिन की मज़दूरी इसी में ख़र्च हो जाती है। पानी की खोज में पास की इमारतों में जाना है और उम्मीद करना कि वहां का सेक्युरिटी गार्ड उसे मना नहीं करेगा। निर्माण स्थल से वापस आते वक्त महिलाएं बेकार कार्ड बोर्ड, छड़ें और प्लास्टिक चुनकर लाती हैं, ताकि वे अपने परिवार के लिए खाना पका सकें। अगर वे ये इक्ट्ठा करने में असफल होती हैं, तो उन्हें बाजार से ईंधन लाने के लिए प्रति दिन 80 रुपये खर्च करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

खुले में नगर निगम के पानी के कनेक्शन का उपयोग करने में असमर्थ, प्रवासी श्रमिक किसी की दया पर निर्भर करते हैं। अक्सर वे आस-पास के निवासियों पर निर्भर रहते हैं ताकि वे अपने परिवारों के लिए पर्याप्त पानी भर सकें।

सड़कों पर रहने के लिए भुगतान

खुले स्थानों में रहने वालों के लिए स्थानीय समूहों, नगरपालिका प्राधिकरण या आस-पास के समाजों की ओर से बेदखली और उत्पीड़न का लगातार खतरा होता है, भले ही प्रवासी श्रमिक वर्षों से एक ही स्थान पर वापस आ रहे हों।

दुर्गानगर में एक खुली बस्ती में रहने वाला एक निर्माण मजदूर कहता है, "हम सात साल से एक ही जगह पर रह रहे थे, लेकिन एक दिन किसी ने हमसे कहा कि हमें जाना होगा, क्योंकि वह यहां घर बनाना चाहता है।" 

शांताबेन कहती हैं, "जब हम यहां आए तो एक स्थानीय शख्स ने एक नक्शा दिखाया और कहा कि यह जमीन उसकी है और हमें उसे रहने के लिए पैसे देने होंगे।" 

शांताबेन को अब भी उस शख्स को 500 रुपये हर महीने देने पड़ते हैं, जिस शख्स का शायद उस जमीन पर कोई मालिकाना हक नहीं है। शांताबेन को पता नहीं कि उसे और उसके परिवार को कब वह जगह खाली करनी पड़ेगी।

खुले में रहने के दौरान, प्रवासी श्रमिकों को पुलिस या नगर निगम की तरफ़ से बेदखली की आशंका होती है। साथ ही आसपास की इमारतों में रहने वाले लोगों से उत्पीड़न का भी ख़तरा बना रहता है।

भीड़भाड़ वाले किराए के कमरों, खुली जगह और ठेकेदारों के साथ वर्कसाइट पर बिना किसी भरोसे वाले नेटवर्क के साथ प्रवासी श्रमिक काम करते हैं। महिलाएं, विशेष रूप से, लंबे समय तक काम करती हैं, असुरक्षित परिस्थितियों में रहती हैं, और रोजमर्रा के अस्तित्व के लिए आवश्यक चीजों के बिना लगातार डिप्रेशन के बोझ में जीने का जोखिम उठाती हैं।

खाने पर सबसे ज्यादा खर्च

प्रवासियों के खर्च में सबसे बड़ा हिस्सा भोजन का है। औसतन, चार सदस्यों के सर्कुलर प्रवासी परिवार का प्रति सप्ताह भोजन राशन पर 2,000 रुपये खर्च होता है।शहर में किराए का भुगतान करने वाले श्रमिकों ने बताया कि उनके मासिक भोजन का का खर्च उनके किराए ये छह गुना ज्यादा है।

अपने परिवारों के साथ खुले स्थानों में रहने वाले निर्माण श्रमिकों ने भोजन और ईंधन पर औसतन उनकी मासिक आय का 53% खर्च करने की बात कही है, जो कि व्यवसाय और आवास प्रकार के सभी श्रमिकों में सबसे ज्यादा है।

यह न केवल सच है क्योंकि उनकी पूर्ण मासिक आय उन लोगों की तुलना में कम है जो किराए के कमरों में रहना पसंद कर सकते हैं, बल्कि इसलिए भी कि खुले में रहने की अतिरिक्त लागत चुकानी पड़ती है। 

खुले स्थानों पर रहने वाले श्रमिक जगह की कमी की वजह से सप्ताह भर के लिए भोजन खरीदने में असमर्थ होते हैं। ये अपने गांव से गेहूं या अन्य अनाज शहर में नहीं ला सकते हैं।

नतीजतन, उन्हें महंगे खुले बाजारों से रोजाना अनाज, सब्जियां और तेल खरीदना पड़ता है, जिससे शहर में राशन पर उनका खर्च काफी बढ़ जाता है। खुले में रहने के दौरान भी, वे अहमदाबाद में बुनियादी सुविधाओं का उपयोग करने के लिए अपनी आय के बड़े हिस्से को खर्च करते हैं।

आदिवासियों पर सबसे भारी बोझ 

यह कोई संयोग नहीं है कि इस तरह के बोझ को उठाने और शहर में सबसे अनिश्चितता और उत्पीड़न का सामना करने के लिए मजबूर होने वाले श्रमिक आदिवासी हैं।  वे पहले से ही हाशिए पर हैं, न्यूनतम मजदूरी दर प्राप्त करते हैं, खतरनाक काम करते हैं और राज्य की सार्वजनिक सुविधाओं से सबसे अधिक वंचित रखे गए हैं।

इस सर्वेक्षण के दौरान 337 श्रमिकों में से, मुख्य रुप से घरेलू कामगार और बोझा ढोने वाले  ‘अन्य पिछड़े वर्गों’और ‘सामान्य जातियों’ के श्रमिक थे, जिनका ध्यान गुणवत्ता, पर्याप्तता और पहुंच 

पर न था, लेकिन वे बुनियादी सुविधाओं को वहन करने में सक्षम थे।

ऐसे श्रमिकों ने शहर में अपेक्षाकृत मजबूत नेटवर्क विकसित किए हैं और इनका उपयोग शहरी दस्तावेज (राशन कार्ड, वोटर आईडी आदि) बनाने के लिए, अपने बच्चों को स्कूलों में भेजने के लिए, और शहर में मजबूती से पैर जमाने के लिए किया जाता है। 

मूल आजीविका के लिए अपने वेतन का उपयोग करते हुए उन्होंने शहर में संपत्ति मेंनिवेश किया है - जिससे उन्हें अपने परिवारों में निवेश करने के लिए अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। 

लेकिन एक मजबूत शहरी आधार, आदिवासी (और दलित) श्रमिकों की पहुंच से बाहर है, और भले ही वे शहर में कई वर्षों से रह रहे हों, लेकिन उनके पास न तो स्किल है और न ही मजदूरी की निरंतरता।

वर्तमान मजदूरी में स्वास्थ्य खर्च शामिल नहीं

उपर बताए गए खर्चों में प्रवासी श्रमिकों के भोजन, किराया, पानी और स्वच्छता पर नियमित मासिक खर्च का उल्लेख किया गया है।

 इसमें प्रवासी श्रमिकों के स्वास्थ्य खर्चों को नहीं जोड़ा गया है। बीमारी और दुर्घटनाएं विशेष रूप से निर्माण और कारखाने क्षेत्रों में होने की संभावना ज्यादा होती है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारतीय निर्माण क्षेत्र में हर दिन औसतन 38 लोगों की मृत्यु होती है। खतरनाक कामकाजी परिस्थितियों और बिना नियोजित नियोक्ता दायित्व और मुआवजा कानूनों के कारण, श्रमिकों के पास गंभीर दुर्घटनाओं और बीमारियों के लिए भी अपनी जेब से खर्च करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। इस तरह के खर्च से परिवार की आमदनी में कमी आ सकती है। उदाहरण के लिए, चंदलोदिया में खुले में रहने वाले एक निर्माण श्रमिक ने निजी अस्पताल में 1.5 लाख रुपये खर्च करने के बारे में बताया,जो वर्तमान में शहर में काम कर रहे उनके परिवार के सात सदस्यों की संयुक्त मासिक मजदूरी का 265% है।

क्या किए जाने की जरुरत?

यह वर्तमान न्यूनतम मजदूरी पर अहमदाबाद की एक तस्वीर है। नई वेतन प्रणाली के तहत, प्रवासियों के लिए

एक बुनियादी जीवनशैली दूर की बात हो जाएगी। शहर में रहने वाले प्रवासी मजदूरों का जीवन, उनके संवैधानिक रूप से अनिवार्य अधिकारों पर नहीं, बल्कि शक्तिशाली ‘स्थानीय’ मध्यस्थों ( ठेकेदार, नियोक्ता, जमींदार ) की दया पर टिका होता है। जो उनका अधिकार है, उसे ठेकेदार और नियोक्ता परोपकार के कामों के रूप में देखते हैं।

यहां अनौपचारिक रूप से मध्यस्थता की गुंजाइश एक अस्थिर विकास मॉडल का लक्षण है, जिसमें प्रवासी मजदूर असुरक्षित हैं और शहर में एक सभ्य जीवन का उपयोग करने के लिए शारीरिक और मानसिक बोझ ढो रहे हैं।

इस समस्या के समाधान के लिए, लोगों की भागीदारी के माध्यम से और पिछले अनुभवों के आधार पर न्यूनतम मजदूरी को पर्याप्त स्तर पर निर्धारित किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, 1992 के रपटकोस

मामले

में भारतीय श्रम सम्मेलन का 1957 का प्रस्ताव और सर्वोच्च न्यायालय ने श्रम को उद्योग के लिए उत्पादन की सस्ती इकाइयों के रूप में नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार के रूप में माना है।

लेकिन अगर श्रम कानून इस पर ध्यान नहीं देता है,जैसा कि कोड ऑन वेजज  में किया गया है, देश की आबादी में पहले से ही हाशिये पर खड़े वे लोग और भी गरीब होते चले जाएंगे।

(* प्रवासी श्रमिकों की पहचान छुपाने के लिए केवल  उनके पहले नाम का इस्तेमाल किया गया)

(जयराम और मेहरोत्रा, आजीविका ब्यूरो से जुड़े हैं।  आजीविका ब्यूरो एक गैर-लाभकारी पहल है, जो ग्रामीण, मौसमी प्रवासी श्रमिकों को सेवाएं, सहायता और सुरक्षा प्रदान करता है।  इस अध्ययन के लिए आंकड़े, जिनसे ये निष्कर्ष निकले हैं, वे आजीविका ब्यूरो के अहमदाबाद स्थित कर्मचारियों द्वारा एकत्र किए गए थे। )

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 17 सितंबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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