खनन और खेती की ज़मीन को शामिल कर बढ़ाया गया वन क्षेत्र

बेंगलुरु: भारत सरकार के रिकाॅर्ड में जंगल के रूप में वर्गीकृत किए गए 29.5% क्षेत्र में वनावरण नहीं है, इंडिया स्टेट ऑफ़ फ़ोरेस्ट रिपोर्ट (आईएसएफआर) 2019 के अनुसार। इसमें से कुछ ज़मीन को सड़क निर्माण और खनन के लिए दे दिया गया है, जबकि कुछ ज़मीन खेती की है।

सरकारी रिकाॅर्ड में दर्ज 767,419 वर्ग किमी वन क्षेत्र में से 226,542 वर्ग किमी क्षेत्र में वन आवरण (फ़ोरेस्ट कवर) नहीं है, 30 दिसंबर 2019 को जारी फ़ॉरेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया (एफ़एसआई) की रिपोर्ट के अनुसार। यह गुमराह करने वाला है क्योंकि जो इलाक़ा वन क्षेत्र में नहीं आता उसे वन क्षेत्र में दिखाया जा रहा है।

वन क्षेत्र का मतलब है एक हेक्टेयर का 10% हिस्सा पेड़ों की छांव से घिरा हो, चाहे उस ज़मीन की क़ानूनी स्थिति कुछ भी हो। एफ़एसआई ने फ़ोरेस्ट एरिया में क़ानूनी रूप से सरकारी रिकाॅर्ड में दर्ज ज़मीन को ही शामिल किया है ना कि उसकी परिभाषा के आधार पर।

“वन विभाग के दस्तावेज़ों में आधिकारिक रूप से दर्ज वन क्षेत्र को ही ‘वन’ कहा जाता है और इसी के अनुसार वन विभाग काम करता है,” नई दिल्ली के सेंटर फ़ॉर पाॅलिसी रिसर्च की सीनियर रिसर्चर कांची कोहली ने बताया। संक्षेप में कहें तो रिकाॅर्ड में दर्ज वन क्षेत्र ही वन विभाग के अधिकार क्षेत्र को दर्शाता है।

उदाहरण के तौर पर देखें तो दर्ज वन क्षेत्र में स्थानीय वन विभाग से संबंधित ज़मीन शामिल हो सकती है, लेकिन इसे सड़क निर्माण और खनन जैसे विकास संबंधी कामों के लिए देने या खेती के उपयोग में होने के कारण यह ज़मीन पर वन आवरण में नहीं है, कांची ने बताया।

Forest Cover and Recorded Forest Area (RFA) as explained by the India State of Forest Report, 2019

वर्गीकृत भूमि कैसे क़ानूनी तौर पर वन भूमि रह सकती है

वन भूमि पर किसी भी तरह के निर्माण के लिए वन विभाग से मंज़ूरी लेनी होती है। मंज़ूरी देने के लिए वन विभाग एक पत्र (कुछ इस तरह का) जारी करता है। पत्र में एक धारा का उल्लेख किया जाता है, जिसके अनुसार जंगल को काटने के बाद भी वन भूमि की स्थिति पर क़ानूनी रूप से कोई बदलाव नहीं आएगा। यानी वो क्षेत्र क़ानूनी तौर पर वन विभाग के अधीन ही रहेगा।

“खनन करने के बाद उस ज़मीन के गड्ढ़ों को भर दिया जाता है और ज़मीन वापस वन विभाग को सौंप दी जाती है। बांध के जलाशयों का इस्तेमाल वन विभाग मछली पकड़ने और पर्यटन के लिए निरंतर करता रहता है,” वर्गीकृत ज़मीन की क़ानूनी स्थिति नहीं बदले जाने के संभावित कारणों को समझाते हुए कांची कोहली ने कहा। 

उन वन आवरण विहीन क्षेत्रों को भी वन क्षेत्रों के रूप में दर्ज किया जा सकता है, जो ज़मीन स्थानांतरित खेती (यानी ज़मीन जब खेती के लायक नहीं रहती तो किसान खेती जगह बदल लेते हैं) के अधीन है, वनों पर जिनके दावे वन अधिकार अधिनियम (एफ़आरए) के तहत लंबित हैं और जहां मूलनिवासी आदिवासी ऐतिहासिक रूप से रहते आए हैं, कांची ने कहा।

‘वन आवरण विहीन वन क्षेत्र के अंतर्गत क्या-क्या आता है’, इस सवाल के जवाब में एफ़एसआई के महानिदेशक सुभाष आशुतोष ने कहा, “यह ऐसे क्षेत्र हैं जो पारिस्थितिक महत्व के हो सकते हैं, लेकिन इनमें रेगिस्तान की तरह वन आवरण नहीं हो सकता। साथ ही अधिक ऊंचाई वाले इलाके जहां पेड़ नहीं उगते, दलदल और घास के मैदान नहीं हो सकते।” 

स्थानांतरित खेती वाला क्षेत्र रिकाॅर्डेड वन क्षेत्र का हिस्सा नहीं है, आशुतोष ने बताया, ग़ौर करने वाली बात है कि पूर्वोत्तर में ज़मीन काफ़ी हद तक समुदायिक नियंत्रण वाली है। स्थानांतरित खेती की ज़मीन पर अगर वन आवरण है, तो यह देश में कुल वन आवरण के रूप में वर्गीकृत हो सकता है, उन्होंने कहा।

“यह वह ज़मीन (स्थानांतरित खेती की ज़मीन) है, जिस पर  समुदाय पीढ़ियों से स्थानांतरित खेती करते आए हैं,” नागालैंड में सतत विकास पर काम करने वाले एनजीओ सस्टेनेबल डवेलेपमेंट फ़ोरम के नीति विश्लेषक अम्बा जमीर ने कहा। आमतौर पर समुदाय बिना वन को नुकसान पहुंचाए खेती के लिए इस ज़मीन का इस्तेमाल करते हैं। 

वर्तमान में इस तरह की कई ज़मीनों को स्थानांतरित खेती के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है और इसे परती भूमि (ऐसी ज़मीन, जिसकी उर्वरता को वापिस लाने के लिए उस पर क़रीब एक साल तक कोई फ़सल नहीं उगाई जाती) के रूप में छोड़ दिया गया है। इस ज़मीन पर अब माध्यमिक जंगल ( जिनके प्राकृतिक परिवेश के साथ प्राकृतिक और अप्राकृतिक तौर पर छेड़छाड़ की गई हो।) उग चुका है। “शायद यही फ़ॉरेस्ट कवर आईएसएफ़आर में दर्ज किया गया है, उन्होंने बताया। स्थानांतरित खेती के तहत आने वाली ज़मीन और जिसका कम से कम 10% हिस्सा पेड़ों की छांव से घिरा हो उसे फ़ॉरेस्ट कवर में शामिल किया जा सकता था।

“स्थानांतरित खेती की ज़मीन का कभी भी सांख्यिकीय सर्वे नहीं किया गया है,” क्या इन ज़मीनों को वन क्षेत्र के हिस्से के रूप में शामिल किया जा सकता है, के जवाब में जमीर ने कहा।  “इसलिए सर्वे के आंकड़ों की कमी के चलते हम निश्चित तौर पर यह नहीं कह सकते कि स्थानांतरित खेती की ज़मीन को सरकारी रिकाॅर्ड में वन क्षेत्र के रूप में शामिल किया गया है।”

वनों के बिना वन क्षेत्र के खतरे

वर्गीकृत ज़मीन को वन क्षेत्र के रूप में दर्ज करने से यह सवाल उठता है कि वनों की कटाई का हिसाब कैसे लगाया जा रहा है।

“जंगल की ज़मीन को विकास कार्यों के लिए देने और बार-बार जंगलों में लगने वाली आग से पहुंचने वाले नुकसान का हिसाब आईएसएफ़आर कैसे लगाता है?” सरकार को वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरणीय मंज़ूरी पर सलाह देने वाले नेशनल बोर्ड फ़ॉर वाइल्ड लाइफ़ के पूर्व सदस्य प्रवीण भार्गव ने पूछा। उन्होंने ये भी पूछा कि वन भूमि पर जब एफ़आरए के दावों को स्वीकार किया गया था, तब कौन-सा तरीक़ा अपनाया गया था। कटाई से जंगलों को नुक़सान हो रहा है, लेकिन इस पर ध्यान न देकर “आईएसएफ़आर देश को क्षति पहुंचा रहा है,“ जो कि वन आवरण के लिए बड़ी चुनौती है, प्रवीण ने कहा। 

“उन क्षेत्रों को भी वन क्षेत्र में शामिल किया गया है, जहां जंगलों को काट दिया गया है और ज़मीन को विकास कार्यों के लिए दे दिया गया है,” आशुतोष ने कहा। यह पूछने पर कि क्या यह जंगलों की कटाई पर नज़र रखने और उसे हतोत्साहित करने की कोशिशों में रुकावट डालेगा,  उन्होंने कहा, “यह देश में एक प्रमुख मुद्दा नहीं है। वन आवरण को होने वाले नुक़सान का यह मुख्य कारण नहीं है।” ज़्यादा बड़ी समस्या वन कटाव है, इसलिए वन संरक्षण अधिनियम के तहत वृक्षारोपण से पेड़ों की कटाई की भरपाई की जाती है, आशुतोष ने बताया।

वन भूमि को जब खनन और सड़क निर्माण कामों के लिए दे दिया जाता है, तब वन संरक्षण अधिनियम ग़ैर वन भूमि या निम्नीकृत भूमि पर वृक्षारोपण के लिए कहता है। हालांकि जंगलों की कटाई और एक ही तरह के पेड़ लगाने को प्रोत्साहित करने के लिए इस नीति की आलोचना की जाती है, जो कि कार्बन को सोखने, भूजल स्तर को बढ़ाने में सहायता करने, वन्यजीवों को आश्रय देने के लिए उपयुक्त नहीं होते। 

बिना वन आवरण वाले कुछ क्षेत्रों को वन क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत करने से दूसरी चिंता यह है कि इससे ऐसी ज़मीन को ख़राब दर्ज करने और स्थानीय इकोसिस्टम की जानकारी के बिना वृक्षारोपण करने का आधार बना सकते हैं।

उदाहरण के तौर पर, यह क्षेत्र घास के मैदान हो सकते हैं, लेकिन वन आवरण के बिना वन भूमि में दर्ज करना इसे ख़तरे में डाल सकता है, विशेषकर जब “यह वन विभाग के अधीन हैं और जिसने ग़ैर-वन जैव क्षेत्र को बे-वक़्त वृक्षारोपण से बर्बाद किया है,” एक स्वतंत्र शोधकर्ता एम डी मधुसूदन समझाते हैं।

उदाहरण के तौर पर, पश्चिमी घाट में शोला के जंगलों में घास के मैदानों को बंजर समझा जाता था, जिसमें से उस दौरान कुछ ज़मीन पर वृक्षारोपण की मूहीम चलाई गई थी। इससे इस क्षेत्र की इकोलॉजी ही बदल गई, साल 2019 में हुई एक स्टडी में इस बात का पता चला।

भले ही यह ज़मीन अपना वन आवरण खो चुकी है, फिर भी वृक्षारोपण इसके लिए नुक़सानदायक हो सकता है। “ऐसे क्षेत्रों में एक जैसी जड़ें होती हैं,” प्रवीण ने कहा। आग, कटाई, चराई आदि से सुरक्षा के साथ प्राकृतिक रूप से दोबारा जंगल उगाना केवल आंकड़ों और इकोसिस्टम की जानकारी के साथ किया जा सकता है।

‘वन आवरण के बिना दर्ज वन क्षेत्र’ ग़लत सोच से की जाने वाली वनीकरण गतिविधियों का आधार बन सकता है और ऐसा पहले भी हो चुका है, आशुतोष ने कहा।  पर्यावरण मंत्रालय के पास अभी बेहतर गाइडलाइन्स हैं, उन्होंने कहा।

(ऋषिका बेंगलुरु में एक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

यह रिपोर्ट मूलत: अंग्रेज़ी में 21 जनवरी 2020 को IndiaSpend पर प्रकाशित हुई है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

बेंगलुरु: भारत सरकार के रिकाॅर्ड में जंगल के रूप में वर्गीकृत किए गए 29.5% क्षेत्र में वनावरण नहीं है, इंडिया स्टेट ऑफ़ फ़ोरेस्ट रिपोर्ट (आईएसएफआर) 2019 के अनुसार। इसमें से कुछ ज़मीन को सड़क निर्माण और खनन के लिए दे दिया गया है, जबकि कुछ ज़मीन खेती की है।

सरकारी रिकाॅर्ड में दर्ज 767,419 वर्ग किमी वन क्षेत्र में से 226,542 वर्ग किमी क्षेत्र में वन आवरण (फ़ोरेस्ट कवर) नहीं है, 30 दिसंबर 2019 को जारी फ़ॉरेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया (एफ़एसआई) की रिपोर्ट के अनुसार। यह गुमराह करने वाला है क्योंकि जो इलाक़ा वन क्षेत्र में नहीं आता उसे वन क्षेत्र में दिखाया जा रहा है।

वन क्षेत्र का मतलब है एक हेक्टेयर का 10% हिस्सा पेड़ों की छांव से घिरा हो, चाहे उस ज़मीन की क़ानूनी स्थिति कुछ भी हो। एफ़एसआई ने फ़ोरेस्ट एरिया में क़ानूनी रूप से सरकारी रिकाॅर्ड में दर्ज ज़मीन को ही शामिल किया है ना कि उसकी परिभाषा के आधार पर।

“वन विभाग के दस्तावेज़ों में आधिकारिक रूप से दर्ज वन क्षेत्र को ही ‘वन’ कहा जाता है और इसी के अनुसार वन विभाग काम करता है,” नई दिल्ली के सेंटर फ़ॉर पाॅलिसी रिसर्च की सीनियर रिसर्चर कांची कोहली ने बताया। संक्षेप में कहें तो रिकाॅर्ड में दर्ज वन क्षेत्र ही वन विभाग के अधिकार क्षेत्र को दर्शाता है।

उदाहरण के तौर पर देखें तो दर्ज वन क्षेत्र में स्थानीय वन विभाग से संबंधित ज़मीन शामिल हो सकती है, लेकिन इसे सड़क निर्माण और खनन जैसे विकास संबंधी कामों के लिए देने या खेती के उपयोग में होने के कारण यह ज़मीन पर वन आवरण में नहीं है, कांची ने बताया।

Forest Cover and Recorded Forest Area (RFA) as explained by the India State of Forest Report, 2019

वर्गीकृत भूमि कैसे क़ानूनी तौर पर वन भूमि रह सकती है

वन भूमि पर किसी भी तरह के निर्माण के लिए वन विभाग से मंज़ूरी लेनी होती है। मंज़ूरी देने के लिए वन विभाग एक पत्र (कुछ इस तरह का) जारी करता है। पत्र में एक धारा का उल्लेख किया जाता है, जिसके अनुसार जंगल को काटने के बाद भी वन भूमि की स्थिति पर क़ानूनी रूप से कोई बदलाव नहीं आएगा। यानी वो क्षेत्र क़ानूनी तौर पर वन विभाग के अधीन ही रहेगा।

“खनन करने के बाद उस ज़मीन के गड्ढ़ों को भर दिया जाता है और ज़मीन वापस वन विभाग को सौंप दी जाती है। बांध के जलाशयों का इस्तेमाल वन विभाग मछली पकड़ने और पर्यटन के लिए निरंतर करता रहता है,” वर्गीकृत ज़मीन की क़ानूनी स्थिति नहीं बदले जाने के संभावित कारणों को समझाते हुए कांची कोहली ने कहा। 

उन वन आवरण विहीन क्षेत्रों को भी वन क्षेत्रों के रूप में दर्ज किया जा सकता है, जो ज़मीन स्थानांतरित खेती (यानी ज़मीन जब खेती के लायक नहीं रहती तो किसान खेती जगह बदल लेते हैं) के अधीन है, वनों पर जिनके दावे वन अधिकार अधिनियम (एफ़आरए) के तहत लंबित हैं और जहां मूलनिवासी आदिवासी ऐतिहासिक रूप से रहते आए हैं, कांची ने कहा।

‘वन आवरण विहीन वन क्षेत्र के अंतर्गत क्या-क्या आता है’, इस सवाल के जवाब में एफ़एसआई के महानिदेशक सुभाष आशुतोष ने कहा, “यह ऐसे क्षेत्र हैं जो पारिस्थितिक महत्व के हो सकते हैं, लेकिन इनमें रेगिस्तान की तरह वन आवरण नहीं हो सकता। साथ ही अधिक ऊंचाई वाले इलाके जहां पेड़ नहीं उगते, दलदल और घास के मैदान नहीं हो सकते।” 

स्थानांतरित खेती वाला क्षेत्र रिकाॅर्डेड वन क्षेत्र का हिस्सा नहीं है, आशुतोष ने बताया, ग़ौर करने वाली बात है कि पूर्वोत्तर में ज़मीन काफ़ी हद तक समुदायिक नियंत्रण वाली है। स्थानांतरित खेती की ज़मीन पर अगर वन आवरण है, तो यह देश में कुल वन आवरण के रूप में वर्गीकृत हो सकता है, उन्होंने कहा।

“यह वह ज़मीन (स्थानांतरित खेती की ज़मीन) है, जिस पर  समुदाय पीढ़ियों से स्थानांतरित खेती करते आए हैं,” नागालैंड में सतत विकास पर काम करने वाले एनजीओ सस्टेनेबल डवेलेपमेंट फ़ोरम के नीति विश्लेषक अम्बा जमीर ने कहा। आमतौर पर समुदाय बिना वन को नुकसान पहुंचाए खेती के लिए इस ज़मीन का इस्तेमाल करते हैं। 

वर्तमान में इस तरह की कई ज़मीनों को स्थानांतरित खेती के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है और इसे परती भूमि (ऐसी ज़मीन, जिसकी उर्वरता को वापिस लाने के लिए उस पर क़रीब एक साल तक कोई फ़सल नहीं उगाई जाती) के रूप में छोड़ दिया गया है। इस ज़मीन पर अब माध्यमिक जंगल ( जिनके प्राकृतिक परिवेश के साथ प्राकृतिक और अप्राकृतिक तौर पर छेड़छाड़ की गई हो।) उग चुका है। “शायद यही फ़ॉरेस्ट कवर आईएसएफ़आर में दर्ज किया गया है, उन्होंने बताया। स्थानांतरित खेती के तहत आने वाली ज़मीन और जिसका कम से कम 10% हिस्सा पेड़ों की छांव से घिरा हो उसे फ़ॉरेस्ट कवर में शामिल किया जा सकता था।

“स्थानांतरित खेती की ज़मीन का कभी भी सांख्यिकीय सर्वे नहीं किया गया है,” क्या इन ज़मीनों को वन क्षेत्र के हिस्से के रूप में शामिल किया जा सकता है, के जवाब में जमीर ने कहा।  “इसलिए सर्वे के आंकड़ों की कमी के चलते हम निश्चित तौर पर यह नहीं कह सकते कि स्थानांतरित खेती की ज़मीन को सरकारी रिकाॅर्ड में वन क्षेत्र के रूप में शामिल किया गया है।”

वनों के बिना वन क्षेत्र के खतरे

वर्गीकृत ज़मीन को वन क्षेत्र के रूप में दर्ज करने से यह सवाल उठता है कि वनों की कटाई का हिसाब कैसे लगाया जा रहा है।

“जंगल की ज़मीन को विकास कार्यों के लिए देने और बार-बार जंगलों में लगने वाली आग से पहुंचने वाले नुकसान का हिसाब आईएसएफ़आर कैसे लगाता है?” सरकार को वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरणीय मंज़ूरी पर सलाह देने वाले नेशनल बोर्ड फ़ॉर वाइल्ड लाइफ़ के पूर्व सदस्य प्रवीण भार्गव ने पूछा। उन्होंने ये भी पूछा कि वन भूमि पर जब एफ़आरए के दावों को स्वीकार किया गया था, तब कौन-सा तरीक़ा अपनाया गया था। कटाई से जंगलों को नुक़सान हो रहा है, लेकिन इस पर ध्यान न देकर “आईएसएफ़आर देश को क्षति पहुंचा रहा है,“ जो कि वन आवरण के लिए बड़ी चुनौती है, प्रवीण ने कहा। 

“उन क्षेत्रों को भी वन क्षेत्र में शामिल किया गया है, जहां जंगलों को काट दिया गया है और ज़मीन को विकास कार्यों के लिए दे दिया गया है,” आशुतोष ने कहा। यह पूछने पर कि क्या यह जंगलों की कटाई पर नज़र रखने और उसे हतोत्साहित करने की कोशिशों में रुकावट डालेगा,  उन्होंने कहा, “यह देश में एक प्रमुख मुद्दा नहीं है। वन आवरण को होने वाले नुक़सान का यह मुख्य कारण नहीं है।” ज़्यादा बड़ी समस्या वन कटाव है, इसलिए वन संरक्षण अधिनियम के तहत वृक्षारोपण से पेड़ों की कटाई की भरपाई की जाती है, आशुतोष ने बताया।

वन भूमि को जब खनन और सड़क निर्माण कामों के लिए दे दिया जाता है, तब वन संरक्षण अधिनियम ग़ैर वन भूमि या निम्नीकृत भूमि पर वृक्षारोपण के लिए कहता है। हालांकि जंगलों की कटाई और एक ही तरह के पेड़ लगाने को प्रोत्साहित करने के लिए इस नीति की आलोचना की जाती है, जो कि कार्बन को सोखने, भूजल स्तर को बढ़ाने में सहायता करने, वन्यजीवों को आश्रय देने के लिए उपयुक्त नहीं होते। 

बिना वन आवरण वाले कुछ क्षेत्रों को वन क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत करने से दूसरी चिंता यह है कि इससे ऐसी ज़मीन को ख़राब दर्ज करने और स्थानीय इकोसिस्टम की जानकारी के बिना वृक्षारोपण करने का आधार बना सकते हैं।

उदाहरण के तौर पर, यह क्षेत्र घास के मैदान हो सकते हैं, लेकिन वन आवरण के बिना वन भूमि में दर्ज करना इसे ख़तरे में डाल सकता है, विशेषकर जब “यह वन विभाग के अधीन हैं और जिसने ग़ैर-वन जैव क्षेत्र को बे-वक़्त वृक्षारोपण से बर्बाद किया है,” एक स्वतंत्र शोधकर्ता एम डी मधुसूदन समझाते हैं।

उदाहरण के तौर पर, पश्चिमी घाट में शोला के जंगलों में घास के मैदानों को बंजर समझा जाता था, जिसमें से उस दौरान कुछ ज़मीन पर वृक्षारोपण की मूहीम चलाई गई थी। इससे इस क्षेत्र की इकोलॉजी ही बदल गई, साल 2019 में हुई एक स्टडी में इस बात का पता चला।

भले ही यह ज़मीन अपना वन आवरण खो चुकी है, फिर भी वृक्षारोपण इसके लिए नुक़सानदायक हो सकता है। “ऐसे क्षेत्रों में एक जैसी जड़ें होती हैं,” प्रवीण ने कहा। आग, कटाई, चराई आदि से सुरक्षा के साथ प्राकृतिक रूप से दोबारा जंगल उगाना केवल आंकड़ों और इकोसिस्टम की जानकारी के साथ किया जा सकता है।

‘वन आवरण के बिना दर्ज वन क्षेत्र’ ग़लत सोच से की जाने वाली वनीकरण गतिविधियों का आधार बन सकता है और ऐसा पहले भी हो चुका है, आशुतोष ने कहा।  पर्यावरण मंत्रालय के पास अभी बेहतर गाइडलाइन्स हैं, उन्होंने कहा।

(ऋषिका बेंगलुरु में एक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

यह रिपोर्ट मूलत: अंग्रेज़ी में 21 जनवरी 2020 को IndiaSpend पर प्रकाशित हुई है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।