घुट रही है बाल संरक्षण गृहों में बच्‍चों की ज़िंदगी

नई दिल्‍ली: यह कहानी 21 साल की भक्ति (काल्‍पनिक नाम) की है। भक्ति का लालन-पालन बाल संरक्षण गृह में हुआ। उसे चार साल की उम्र में यहां लाया गया था। 18 साल की होने के बाद बाल संरक्षण गृह के बाकी बच्चों की तरह बाहर की दुनिया से रूबरू कराने के लिए उसे भी ‘आफ्टरकेयर’ होम में भेज दिया गया।

भक्ति बताती है कि ‘आफ्टरकेयर’ होम में उसकी शादी उसकी मर्ज़ी के खिलाफ़ कर दी गई और जब उसे ससुराल में प्रताड़ित किया जाने लगा तो ‘आफ्टरकेयर’ होम ने उसकी कोई मदद नहीं की। अपने पति के अत्याचारों से बचने के लिए भक्ति को पुलिस की मदद लेनी पड़ी। इस समय वह एक कपड़ा मज़दूर है। उसे मज़दूरी के रूप में 6000 रुपए महीने मिलते हैं और वो कामकाजी महिलाओं के एक होस्टल में रहती है। वह अपने पति से तलाक चाहती है और ब्‍यूटीशियन बनाना  चाहती है। भक्ति चौथी कक्षा तक पढ़ी है लेकिन उसने ब्‍यूटीशियन का कोर्स किया है। 

अगस्‍त 2019 में जारी एक अध्ययन रिपोर्ट, ‘बियॉन्ड 18: लीविंग चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशंस - ए स्टडी ऑफ आफ्टर प्रैक्टिसेज़ इन फाइव स्टेट्स ऑफ इंडिया’के अनुसार भक्ति उन हज़ारों युवाओं में एक है जो ‘आफ्टरकेयर’ होम छोड़ने के बाद अपनी ज़िंदगी को फिर से संवारने के लिए संघर्ष कर रही है। इनमें से आधे से अधिक लोगों को काम नहीं मिलता।

देश भर के बाल संरक्षण गृहों के आंकड़े जुटाने के लिए सरकार द्वारा गठित जेना कमेटी की सितंबर, 2018 में जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि 9,589 बाल संरक्षण गृहों में 370,000 बच्चों को रखा गया था।

उल्‍लेखनीय है कि बाल संरक्षण गृह, अनाथ, छोड़ दिए गए या खुद से ऐसे घरों में आने वाले बच्चों और लापरवाही, दुर्व्यवहार, हिंसा और मानव तस्करी के शिकार बच्चों की देखभाल करते हैं। जब इनकी उम्र 18 साल की हो जाती है, तो उन्हें इन घरों को छोड़ना पड़ता है। लेकिन जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) एक्ट, 2015 (जेजे एक्ट) और इसके 2016 के नियमों और बाल संरक्षण योजना के प्रावधानों के अनुसार, आत्मनिर्भर जीवन जीने और समाज में घुलने मिलने में मदद  के लिए वे "आफ्टरकेयर" के हक़दार होते हैं। 21 साल की उम्र तक ऐसे युवा वयस्कों की ज़िम्‍मेदारी सरकार की होती है और असाधारण परिस्थितियों में, सरकार की ये ज़िम्‍मेदारी दो साल के लिए और बढ़  जाती है। 

रिपेार्ट के लिए सर्वे में भाग लेने वालो में से लगभग एक चौथाई (27%) लोगों ने बताया कि उन्‍हें किसी भी प्रकार की कोई "आफ्टरकेयर" की सुविधा नहीं मिली। ऐसे 44% का कहना था कि उनकी देखभाल और पुनर्वास की योजना बनाते वक्‍त उनसे संपर्क नहीं किया गया। अध्‍ययन में कहा गया है कि मदद न पा सकने वालों की संख्‍या बहुत अधिक हो सकती है क्‍योंकि बाल संरक्षण गृह छोड़ने के बाद वैसे लोगों की संख्‍या बहुत अधिक है, जिनका कोई अता-पता नहीं मिला। ऐसे लोगों की ज़िम्मेदारी अब किसी की नहीं है।

इस अध्ययन में पाया गया कि सरकारी कर्मचारियों के साथ ही साथ कई संभावित लाभार्थी भी "आफ्टरकेयर" से संबंधित कानूनी प्रावधानों के बारे में नहीं जानते। अध्‍ययन करने वाली संस्‍था टाटा ट्रस्‍ट की पॉलिसी और एडवोकेसी की प्रमुख शिरीन वकील ने बताया, “इससे मौजूदा कानूनी प्रावधानों और नीतियों का कार्यान्‍वयन ठीक से नहीं हो पाता।” आफ़टरकेयर होम और उनकी सुविधाओं के बारे में कोई सुुचारु अध्ययन नहीं हुआ है और ना ही देश में इन संस्थाओं की संख्या का कोई आंकड़ा मौजूद है।

जिन नौजवानों पर ये सर्वे किया गया उनके बारे में रिपोर्ट की प्रस्तावना में कहा गया है, “ज़िंदगी के लिए संघर्ष कर रहे युवाओं को समाज से बहिष्‍कृत भी होना पड़ता है, वे मानसिक रूप से बीमार पड़ जाते हैं और उनकी बीमारी का ठीक से इलाज भी नहीं हो पाता। अनिश्चितता और बेरोज़गारी के दौर में वे आत्मनिर्भर नहीं रह पाते और उन्‍हें तब यह भी पता नहीं होता कि वे किस का आसरा करें।”

यह अध्ययन गैर लाभकारी संगठन उदयन केयर ने यूनिसेफ़, टाटा ट्रस्ट और इसमें शामिल राज्यों दिल्ली, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्‍ट्र और राजस्थान की मदद से किया। इस दौरान इन पांच राज्यों के 17-30 वर्ष के आयु वर्ग के आफ़टरकेयर छोड़ने वाले 435 लोगों और 100 बाल संरक्षण विशेषज्ञों और कर्मचारियों से बातचीत की गई। 

उदयन केयर की प्रबंध ट्रस्‍टी किरण मोदी ने बताया, “इन संस्थानों को छोड़ने वाले युवाओं के साथ क्या होता है, इस बारे में ये पहली बड़ी रिपोर्ट है।”

बाल संरक्षण और आफ़टरकेयर

जेना कमेटी की रिपोर्ट में बताया गया है कि देशभर के 9,589 बाल संरक्षण गृहों में से 91% का संचालन गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) करते हैं और बाकी 9%  का संचालन सरकार के पास है। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर, उत्तर प्रदेश के देवरिया और  मध्य प्रदेश के भोपाल में विकलांग महिलाओं के एक होस्टल में दुराचार और लापरवाही का मामला सामने आने के बाद इंडियास्‍पेंड ने खराब निगरानी और नियंत्रण पर ए‍क रिपो्र्ट सितंबर, 2018 में प्रकाशित की थी। 

हालांकि बच्‍चों को आफ्टरकेयर का अधिकार मुहैया कराने वाले जेजे एक्ट के तहत सभी बाल संरक्षण गृहों का पंजीकरण आवश्‍यक है लेकिन बहुत सारे बाल संरक्षण गृह अपंजीकृत पाए गए। उदयन केयर फाउंडेशन की अध्‍ययन रिपेार्ट के अनुसार इन पांच राज्‍यों में 22% से 62% तक बाल संरक्षण गृहों का पंजीकरण नहीं था। जिसकी वजह से ये पता लगाना मुश्किल है कि इनमें कितने बच्‍चे रहते थे। 

जेना समिति की रिपोर्ट में भी आफ्टरकेयर संस्‍थानों के बारे में पर्याप्‍त आंकड़ा नहीं दिया गया है। वर्तमान रिपोर्ट के लेखकों को पांच राज्‍यों में से दिल्‍ली में दो, गुजरात में दो, कर्नाटक में तीन, महाराष्‍ट्र में सात आफ्टरकेयर संस्‍थान मिले जबकि राजस्‍थान में उन्‍हें एक संस्‍थान भी नहीं मिला।

राज्यों ने अभी तक बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों के लिए व्यापक आफ्टरकेयर कार्यक्रम नहीं बनाए हैं, लेकिन कमज़ोर वर्ग के बच्चों के लिए अलग-अलग योजनाएं हैं जो कौशल प्रशिक्षण, नौकरी, छात्रवृत्ति, आवास, स्वास्थ्य सेवा आदि प्रदान करती हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में अनाथ बच्चों के लिए उच्च शिक्षा में आरक्षण है। राजस्थान में पालनहार योजना है जिसके तहत कमज़ोर बच्चों को परिवार या रिश्तेदारों के साथ रहने के लिए कैश दिया जाता है। इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देशों और आसान पहुंच वाली और अधिक योजनाओं की ज़रूरत है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि बाल संरक्षण गृहों में परवरिश की वजह से उनकी शिक्षा, कौशल-प्रशिक्षण और सामाजिक स्थिरता की निरंतरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिससे वे अपने आपको एक वयस्क व्‍यक्ति के रूप में बदलने के लिए तैयार नहीं कर पाते। 

हालांकि बच्चों को बाल संरक्षण गृहों में भोजन और आश्रय तो मिल जाता है, लेकिन उन्हें सही मार्गदर्शन और मानसिक स्वास्थ्य के बारे में सहायता नहीं मिलती है जो कि युवा वयस्क होने के नाते उनके लिए महत्वपूर्ण है। उन्हें अनिश्चितता और अस्थिरता के दौर से गुज़रना पड़ता है - सर्वे में शामिल युवा वयस्कों में, 42%, दो या इससे अधिक बाल संरक्षण गृहों में बच्चों की तरह रहते थे।

उदयन केयर की प्रबंध ट्रस्‍टी किरन मोदी ने बताया, “16 साल की उम्र के बाद अधिकतर बच्‍चों को भविष्य के लिए तैयार करने की ज़रूरत है जिससे उनका कौशल विकास हो सके और वो स्‍वतंत्र रूप से जीवन जीने के लिए तैयार हों, लेकिन ऐसा होता नहीं है।”

आफ्टरकेयर की चुनौतियां : आवास और शिक्षा

अध्ययन में पाया गया कि बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों के लिए स्थायित्व और सुरक्षित आवास पाना एक बड़ी चुनौती है। जिनका सर्वे किया गया उनमे्ं से आधे से भी कम को आवासीय सहायता मिली है जबकि ये कानूनन ज़रूरी है। 

जेजे एक्ट के तहत, एक आफ्टरकेयर प्रोग्राम में छह से आठ व्यक्तियों के लिए ग्रुप हाउसिंग होनी चाहिए। फिर भी, जिन लोगों को आफ्टरकेयर सेवाएं मिली हैं, उनमें से भी 39% को आवासीय सहायता नहीं मिली।

अध्ययन किए गए पांच राज्यों में से राजस्थान में कोई भी आफ्टरकेयर होम नहीं था। अन्य राज्यों में ये होम कुछ ही ज़िलों में थे इस कारण युवा वयस्कों को इन ज़िलों में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिससे उनका अपने साथियों और कर्मचारियों के साथ बना संबंध टूट गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि उन्हें अपने शैक्षणिक संस्थानों और नौकरियों को भी बदलना पड़ा। दिल्ली और महाराष्ट्र के अलावा इन पांच राज्‍यों में किसी में भी लड़कियों के लिए कोई आफ्टरकेयर होम नहीं था। दिल्ली और महाराष्ट्र में लड़कियों के लिए एक- एक आफ़टरकेयर होम है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि लड़कों की तुलना में लड़कियों के लिए बहुत कम ग्रुप होम थे, क्योंकि उन्हें असुरक्षित समझा गया। बाल संरक्षण गृह छोड़ने वाली उन महिलाओं को वर्किंग वूमेन हॉसट्ल भेजा गया जो कमाने लगी थीं। लेकिन जो कमाती नहीं थीं उन्हें सुधार गृह (महिलाओं के आश्रय) और निराश्रित महिलाओं के लिए बनी जगहों पर रहना पड़ा।

जेजे एक्ट के तहत, बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण के दौरान स्टाइपेंड, उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति और उन्‍हें नौकरी मिलने तक वित्तीय सहायता देने का प्रावधान है। राष्ट्रीय कौशल विकास कार्यक्रम और अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से भी इनके कौशल प्रशिक्षण और नौकरी की व्यवस्था होनी चाहिए।

रिपोर्ट में पाया गया कि बाल संरक्षण गृहों में रहने के दौरान और बाद में भी इनको ठीक से शिक्षा नहीं दी गई। इनमें लगभग 40% बीच में ही पढ़ाई छोड़ चुके थे। राजस्थान में केवल 14% और दिल्ली में केवल 13% ने ही स्कूल से आगे की पढ़ाई की थी।

इन राज्यों में बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों में लगभग 21% को वैसी शिक्षा नहीं मिली जैसी वे चाहते थे जबकि 35% को बाल संरक्षण गृह से बाहर जाने के बाद  अपनी शिक्षा जारी रखने में कठिनाई का सामना करना पड़ा था।

कर्नाटक में बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों में 35% ने कॉलेज या उससे आगे की पढ़ाई पूरी की। लेकिन इन राज्यों में, आधे से भी कम को बाल संरक्षण गृहों में एक या एक से अधिक रोजगारपरक कौशल का प्रशिक्षण मिला है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि एनजीओ द्वारा संचालित बाल संरक्षण गृहों को छोड़ने वाले 65% के पास किसी रोज़गार के लिए कौशल था, जबकि सरकार द्वारा संचालित बाल संरक्षण गृहों में ये आंकड़ा 35% था।

नौकरियों के कम अवसर, महिलाओं के लिए तो और भी कम

सर्वे में पाया गया कि शैक्षणिक योग्यता कम होने की वजह से बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों को अच्छी नौकरी नहीं मिल पाती है और उनकी आमदनी न्यूनतम मज़दूरी से भी कम होती है।  

टाटा ट्रस्ट की शिरीन वकील कहती हैं, “बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों के बारे में जूवेनाइल जस्टिस लॉ के अलावा कहीं भी कोई ज़िक्र नहीं है, जिसकी वजह से इनमें बेरोज़गारों की संख्या बहुत ज़्यादा है।” 

इस अध्ययन के दौरान जिन 435 लोगों से बातचीत की गई उनमें से  लगभग आधों (48%) को काम नहीं मिला। बाकी जिनको काम मिला उनमें से 93% नौकरीपेशा थे और 7% का खुद का काम था। इन लोगों की औसत आमदनी 7,500 रुपये से 8,500 रुपये प्रति माह थी। ये स्किल्ड वर्क के लिए महाराष्ट्र में न्यूनतम वेतन (9,559 रुपये) और दिल्ली में (14,000 रुपये) से कम है। 

ज़्यादातर लड़कों की महत्‍वाकांक्षा और शैक्षणिक रूचि को अनदेखा कर, उन्हें  व्यावसायिक कौशल प्रशिक्षण देकर ख़ुद कमाने-खाने के लिए छोड़ दिया जाता है, जिससे उन्हें जो काम मिलता है उसमें तनख़्वाह कम होती है। सर्वेक्षण में एक प्रतिभाशाली युवक का हवाला दिया गया है जिसे बीए आर्किटेक्चर कार्यक्रम में हुए अपने एडमिशन को छोड़ देना पड़ा।

शिरीन ने कहा, “लड़कियों के मामले में पुनर्वास का मतलब है उनकी शादी करा दी जाए और फिर उन्हें भुला दिया जाए।” उन्होंने आगे कहा कि इस तरह के मामलों में अक्सर घरेलू हिंसा और शादियों के टूटने की घटनाएं होती हैं। ऐसी शादियों से पैदा हुए बच्‍चों की स्थिति काफ़ी कमज़ोर होती है और उन्‍हें बाल संरक्षण गृह का सहारा लेना पड़ता है। इस कारण बच्‍चों का बाल संरक्षण गृह में आने का सिलसिला बना हुआ है।    

शिरीन ने बताया, "आगे की शिक्षा या व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए लड़कों की तरह, लड़कियों को भी, उनकी इच्छा के ख़िलाफ़, सिलाई, नर्सिंग और ब्यूटीशियन के काम के लिए प्रेरित किया जाता है। इससे उनकी प्रतिभा ना तो विकसित हो पाती है और ना ही निखर पाती है।" रिपोर्ट में पाया गया है कि आवास की तरह ही नौकरियों में भी पुरुषों की तुलना में महिलाओं की स्थिति काफ़ी बुरी है। समान शैक्षणिक योग्‍यता होने के बावजूद बाल संरक्षण गृह छोड़ने वाले 36% पुरुषों की तुलना में 63% महिलाओं के पास आमदनी का कोई ज़रिया नहीं था। 

70% के पास वित्तीय मामलों की कोई औपचारिक जानकारी नहीं थी और उनमें से आधे से अधिक (53.3%) को इस बारे में कोई सलाह नहीं मिली थी।

सर्वे के दौरान ये भी पाया गया कि बाल संरक्षण गृह छोड़ने वाले हर पांच में से एक युवा का बैंक अकाउंट नहीं था। लड़कियों में ये आंकड़ा 26% और लड़कों में 16% था। इनमें से 87% का इंश्योरेंस नहीं था। लड़कियों में सिर्फ़ 9% और लड़कों में 16% का इंश्योरेंस था।

खराब स्‍वास्‍थ्‍य और भावनात्‍मक संकट

अध्ययन में पाया गया कि बाल संरक्षण गृह को छोड़ने वाले युवा वयस्कों के पास स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं से निपटने के लिए किसी प्रकार की मदद और संसाधन नहीं हैं। सर्वेक्षण के दौरान पाया गया कि एक तिहाई (38%) से ज़्यादा को उनके परिवारों से किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं मिली थी।

बाल संरक्षण गृह  छोड़ने वाले चार (23%) में से एक को बीमारियों के दौरान लम्बे वक्त तक देखभाल करने वाला कोई नहीं था। सर्वेक्षण में शामिल तीन-चौथाई से अधिक (78%) के पास हैल्थ इंश्योरेंस नहीं था जबकि 13% के पास बीमारी के इलाज के लिए पर्याप्त धनराशि नहीं थी।

इसके अलावा, अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर बाल संरक्षण गृह छोड़ने वाले 61% ने भावनात्मक संकट का सामना करने की बात कही और अधिकांश ने कहा कि उन्होंने इसके लिए पेशेवर मदद नहीं ली।

अध्ययन में देखा गया कि बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों के लिए शिक्षा जारी रखने के प्रति अनिच्छा और नौकरी और रिश्तों को बनाए रखना, उनके खराब भावनात्मक स्वास्थ्य और रोगों से लड़ने की सामर्थ्य की कमी से जुड़ा था।

अध्ययन में पाया गया कि संस्थानों को छोड़ने के बाद वे अपने आपको  असुरक्षित महसूस करते हैं। महाराष्ट्र के एक 18 वर्षीय युवक ने बताया, "मुझे हर रोज़ कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। मुझे लगता है, जब कोई व्यक्ति इतने दबाव में होता है, तो वह अकेले झेल पाने में सक्षम नहीं होता और उसे कई स्तरों पर समर्थन की ज़रूरत होती है ।"

सर्वेक्षण में पाया गया कि संस्‍थान छोड़ने वाले लगभग 38% पुरुषों और 28% महिलाओं को अपने सहकर्मियों और शिक्षकों के साथ संबंध बनाए रखने के लिए काफी मशक्‍कत करनी पड़ी। अध्ययन में पाया गया कि इनमें से ज़्यादातर लड़के-लड़कियों को एक दूसरे के सम्पर्क में नहीं आने दिया गया, जिससे उनके रिश्ते नीरस हो गए। संस्‍थान छोड़ने वाले दो-तिहाई पुरुषों और 88% महिलाओं ने रोमांटिक संबंधों को बनाए रखने में असमर्थता की बात कही। उन्‍होंने यह भी बताया कि वो ये महसूस करते थे कि रोमांटिक संबंध उनके लिए नहीं हैं।  

दस्‍तावेज़ों की कमी

सर्वे में शामिल एक-तिहाई ने कहा कि वे आत्मनिर्भर रूप से जीने में अपने आपको सशक्‍त महसूस नहीं करते। उनमें से आधों (49%) को खाना बनाना कभी नहीं सिखाया गया और 44% को घरेलू कामकाज का कोई प्रशिक्षण नहीं दिया गया। हर पांच में से दो ने कहा कि वे ये सब सीखना चाहते हैं।

कई युवा वयस्कों ने कहा कि वे बुनियादी दस्तावेज़ों की कमी से ख़ुद को बंधक महसूस करते हैं। भले ही 96% लोगों के पास आधार कार्ड था लेकिन 64% के पास वोटर कार्ड नहीं था, 62% के पास राशन कार्ड नहीं था और 54% के पास पैन कार्ड नहीं था। रिपोर्ट में एक ऐसे युवक के मामले का ज़िक्र किया गया है जिसे ड्राइविंग लाइसेंस नहीं मिल सका क्योंकि उसके पास आावास प्रमाण नहीं था।

इस मामले में भी महिलाओं की हालत बद्तर है – बाल संरक्षण गृह छोड़ने वाले 41% पुरुषों की तुलना में 70% महिलाओं के पास पैन कार्ड नहीं था। अध्ययन में कहा गया है कि इससे ये पता चलता है कि पुरुषों की तुलना में आर्थिक सेवाओं का लाभ उठाने के मामले में महिलाएं कितनी पिछड़ी हुई हैं।

समान अवसर

रिपोर्ट में आफ्टरकेयर के आठ क्षेत्रों की पहचान की गई है। बाल संरक्षण गृहों को चाहिए कि वो इन्हें आवास, आत्मनिर्भर जीवन जीने की कला, सामाजिक और पारस्परिक कौशल, भावनात्मक सुरक्षा, स्वास्थ्य, शैक्षिक और व्यावसायिक कौशल, आर्थिक आत्मनिर्भरता और कैरियर संबंधी कौशल, पहचान और कानूनी जागरूकता प्रदान करें।  

उदयन फाउंडेशन की किरन मोदी ने कहा, "बाल संरक्षण गृहों के कर्मचारियों को इन विषयों में प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है ताकि वे बच्चों को पूर्ण विकसित इंसान के रूप में विकसित होने का अवसर प्रदान कर सकें।" उन्‍होंने कहा, “उनकी शादी करने या उन्हें कम तनख़्वाह वाली नौकरियों में भेजने की जल्दी क्यों है? हमें उनकी शिक्षा में वैसे ही निवेश करना चाहिए जैसे हम अपने बच्चों के लिए करते हैं।”

समाधान

रिपोर्ट में सुझाए गए कुछ तरीके इस प्रकार हैं:

राज्यों को अपने स्वयं के आफ्टरकेयर के कार्यक्रम विकसित करने चाहिए: प्रत्येक राज्य को अपने ख़ुद के आफ्टरकेयर कार्यक्रम विकसित करने चाहिए जो यह सुनिश्चित करें कि बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों को मदद और सेवाएं मिलें और  इसके लिए एक निगरानी तंत्र हो।

बाहर की दुनिया में उनकी ज़िंदगी कैसी हो, इसके के लिए योजना बनाना अनिवार्य हो : 14 से 16 साल तक की उम्र के बच्चों को बाल संरक्षण गृहों से बाहर जाने के लिए तैयार किया जाना चाहिए। उन्हें उनके अधिकारों और कर्तव्यों, बुनियादी जीवन और समाज से रुबरू होने के तरीकों की जानकारी दी जाए।

सिंगल-विंडो सपोर्ट सेंटर: आफ्टरकेयर प्रोग्राम के दो साल बाद तक किसी भी संकट के समय सम्पर्क की सुविधा होनी चाहिए। इनका एक रियलटाइम डेटाबेस होना चाहिए।

नई दिल्‍ली: यह कहानी 21 साल की भक्ति (काल्‍पनिक नाम) की है। भक्ति का लालन-पालन बाल संरक्षण गृह में हुआ। उसे चार साल की उम्र में यहां लाया गया था। 18 साल की होने के बाद बाल संरक्षण गृह के बाकी बच्चों की तरह बाहर की दुनिया से रूबरू कराने के लिए उसे भी ‘आफ्टरकेयर’ होम में भेज दिया गया।

भक्ति बताती है कि ‘आफ्टरकेयर’ होम में उसकी शादी उसकी मर्ज़ी के खिलाफ़ कर दी गई और जब उसे ससुराल में प्रताड़ित किया जाने लगा तो ‘आफ्टरकेयर’ होम ने उसकी कोई मदद नहीं की। अपने पति के अत्याचारों से बचने के लिए भक्ति को पुलिस की मदद लेनी पड़ी। इस समय वह एक कपड़ा मज़दूर है। उसे मज़दूरी के रूप में 6000 रुपए महीने मिलते हैं और वो कामकाजी महिलाओं के एक होस्टल में रहती है। वह अपने पति से तलाक चाहती है और ब्‍यूटीशियन बनाना  चाहती है। भक्ति चौथी कक्षा तक पढ़ी है लेकिन उसने ब्‍यूटीशियन का कोर्स किया है। 

अगस्‍त 2019 में जारी एक अध्ययन रिपोर्ट, ‘बियॉन्ड 18: लीविंग चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशंस - ए स्टडी ऑफ आफ्टर प्रैक्टिसेज़ इन फाइव स्टेट्स ऑफ इंडिया’के अनुसार भक्ति उन हज़ारों युवाओं में एक है जो ‘आफ्टरकेयर’ होम छोड़ने के बाद अपनी ज़िंदगी को फिर से संवारने के लिए संघर्ष कर रही है। इनमें से आधे से अधिक लोगों को काम नहीं मिलता।

देश भर के बाल संरक्षण गृहों के आंकड़े जुटाने के लिए सरकार द्वारा गठित जेना कमेटी की सितंबर, 2018 में जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि 9,589 बाल संरक्षण गृहों में 370,000 बच्चों को रखा गया था।

उल्‍लेखनीय है कि बाल संरक्षण गृह, अनाथ, छोड़ दिए गए या खुद से ऐसे घरों में आने वाले बच्चों और लापरवाही, दुर्व्यवहार, हिंसा और मानव तस्करी के शिकार बच्चों की देखभाल करते हैं। जब इनकी उम्र 18 साल की हो जाती है, तो उन्हें इन घरों को छोड़ना पड़ता है। लेकिन जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) एक्ट, 2015 (जेजे एक्ट) और इसके 2016 के नियमों और बाल संरक्षण योजना के प्रावधानों के अनुसार, आत्मनिर्भर जीवन जीने और समाज में घुलने मिलने में मदद  के लिए वे "आफ्टरकेयर" के हक़दार होते हैं। 21 साल की उम्र तक ऐसे युवा वयस्कों की ज़िम्‍मेदारी सरकार की होती है और असाधारण परिस्थितियों में, सरकार की ये ज़िम्‍मेदारी दो साल के लिए और बढ़  जाती है। 

रिपेार्ट के लिए सर्वे में भाग लेने वालो में से लगभग एक चौथाई (27%) लोगों ने बताया कि उन्‍हें किसी भी प्रकार की कोई "आफ्टरकेयर" की सुविधा नहीं मिली। ऐसे 44% का कहना था कि उनकी देखभाल और पुनर्वास की योजना बनाते वक्‍त उनसे संपर्क नहीं किया गया। अध्‍ययन में कहा गया है कि मदद न पा सकने वालों की संख्‍या बहुत अधिक हो सकती है क्‍योंकि बाल संरक्षण गृह छोड़ने के बाद वैसे लोगों की संख्‍या बहुत अधिक है, जिनका कोई अता-पता नहीं मिला। ऐसे लोगों की ज़िम्मेदारी अब किसी की नहीं है।

इस अध्ययन में पाया गया कि सरकारी कर्मचारियों के साथ ही साथ कई संभावित लाभार्थी भी "आफ्टरकेयर" से संबंधित कानूनी प्रावधानों के बारे में नहीं जानते। अध्‍ययन करने वाली संस्‍था टाटा ट्रस्‍ट की पॉलिसी और एडवोकेसी की प्रमुख शिरीन वकील ने बताया, “इससे मौजूदा कानूनी प्रावधानों और नीतियों का कार्यान्‍वयन ठीक से नहीं हो पाता।” आफ़टरकेयर होम और उनकी सुविधाओं के बारे में कोई सुुचारु अध्ययन नहीं हुआ है और ना ही देश में इन संस्थाओं की संख्या का कोई आंकड़ा मौजूद है।

जिन नौजवानों पर ये सर्वे किया गया उनके बारे में रिपोर्ट की प्रस्तावना में कहा गया है, “ज़िंदगी के लिए संघर्ष कर रहे युवाओं को समाज से बहिष्‍कृत भी होना पड़ता है, वे मानसिक रूप से बीमार पड़ जाते हैं और उनकी बीमारी का ठीक से इलाज भी नहीं हो पाता। अनिश्चितता और बेरोज़गारी के दौर में वे आत्मनिर्भर नहीं रह पाते और उन्‍हें तब यह भी पता नहीं होता कि वे किस का आसरा करें।”

यह अध्ययन गैर लाभकारी संगठन उदयन केयर ने यूनिसेफ़, टाटा ट्रस्ट और इसमें शामिल राज्यों दिल्ली, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्‍ट्र और राजस्थान की मदद से किया। इस दौरान इन पांच राज्यों के 17-30 वर्ष के आयु वर्ग के आफ़टरकेयर छोड़ने वाले 435 लोगों और 100 बाल संरक्षण विशेषज्ञों और कर्मचारियों से बातचीत की गई। 

उदयन केयर की प्रबंध ट्रस्‍टी किरण मोदी ने बताया, “इन संस्थानों को छोड़ने वाले युवाओं के साथ क्या होता है, इस बारे में ये पहली बड़ी रिपोर्ट है।”

बाल संरक्षण और आफ़टरकेयर

जेना कमेटी की रिपोर्ट में बताया गया है कि देशभर के 9,589 बाल संरक्षण गृहों में से 91% का संचालन गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) करते हैं और बाकी 9%  का संचालन सरकार के पास है। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर, उत्तर प्रदेश के देवरिया और  मध्य प्रदेश के भोपाल में विकलांग महिलाओं के एक होस्टल में दुराचार और लापरवाही का मामला सामने आने के बाद इंडियास्‍पेंड ने खराब निगरानी और नियंत्रण पर ए‍क रिपो्र्ट सितंबर, 2018 में प्रकाशित की थी। 

हालांकि बच्‍चों को आफ्टरकेयर का अधिकार मुहैया कराने वाले जेजे एक्ट के तहत सभी बाल संरक्षण गृहों का पंजीकरण आवश्‍यक है लेकिन बहुत सारे बाल संरक्षण गृह अपंजीकृत पाए गए। उदयन केयर फाउंडेशन की अध्‍ययन रिपेार्ट के अनुसार इन पांच राज्‍यों में 22% से 62% तक बाल संरक्षण गृहों का पंजीकरण नहीं था। जिसकी वजह से ये पता लगाना मुश्किल है कि इनमें कितने बच्‍चे रहते थे। 

जेना समिति की रिपोर्ट में भी आफ्टरकेयर संस्‍थानों के बारे में पर्याप्‍त आंकड़ा नहीं दिया गया है। वर्तमान रिपोर्ट के लेखकों को पांच राज्‍यों में से दिल्‍ली में दो, गुजरात में दो, कर्नाटक में तीन, महाराष्‍ट्र में सात आफ्टरकेयर संस्‍थान मिले जबकि राजस्‍थान में उन्‍हें एक संस्‍थान भी नहीं मिला।

राज्यों ने अभी तक बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों के लिए व्यापक आफ्टरकेयर कार्यक्रम नहीं बनाए हैं, लेकिन कमज़ोर वर्ग के बच्चों के लिए अलग-अलग योजनाएं हैं जो कौशल प्रशिक्षण, नौकरी, छात्रवृत्ति, आवास, स्वास्थ्य सेवा आदि प्रदान करती हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में अनाथ बच्चों के लिए उच्च शिक्षा में आरक्षण है। राजस्थान में पालनहार योजना है जिसके तहत कमज़ोर बच्चों को परिवार या रिश्तेदारों के साथ रहने के लिए कैश दिया जाता है। इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देशों और आसान पहुंच वाली और अधिक योजनाओं की ज़रूरत है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि बाल संरक्षण गृहों में परवरिश की वजह से उनकी शिक्षा, कौशल-प्रशिक्षण और सामाजिक स्थिरता की निरंतरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिससे वे अपने आपको एक वयस्क व्‍यक्ति के रूप में बदलने के लिए तैयार नहीं कर पाते। 

हालांकि बच्चों को बाल संरक्षण गृहों में भोजन और आश्रय तो मिल जाता है, लेकिन उन्हें सही मार्गदर्शन और मानसिक स्वास्थ्य के बारे में सहायता नहीं मिलती है जो कि युवा वयस्क होने के नाते उनके लिए महत्वपूर्ण है। उन्हें अनिश्चितता और अस्थिरता के दौर से गुज़रना पड़ता है - सर्वे में शामिल युवा वयस्कों में, 42%, दो या इससे अधिक बाल संरक्षण गृहों में बच्चों की तरह रहते थे।

उदयन केयर की प्रबंध ट्रस्‍टी किरन मोदी ने बताया, “16 साल की उम्र के बाद अधिकतर बच्‍चों को भविष्य के लिए तैयार करने की ज़रूरत है जिससे उनका कौशल विकास हो सके और वो स्‍वतंत्र रूप से जीवन जीने के लिए तैयार हों, लेकिन ऐसा होता नहीं है।”

आफ्टरकेयर की चुनौतियां : आवास और शिक्षा

अध्ययन में पाया गया कि बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों के लिए स्थायित्व और सुरक्षित आवास पाना एक बड़ी चुनौती है। जिनका सर्वे किया गया उनमे्ं से आधे से भी कम को आवासीय सहायता मिली है जबकि ये कानूनन ज़रूरी है। 

जेजे एक्ट के तहत, एक आफ्टरकेयर प्रोग्राम में छह से आठ व्यक्तियों के लिए ग्रुप हाउसिंग होनी चाहिए। फिर भी, जिन लोगों को आफ्टरकेयर सेवाएं मिली हैं, उनमें से भी 39% को आवासीय सहायता नहीं मिली।

अध्ययन किए गए पांच राज्यों में से राजस्थान में कोई भी आफ्टरकेयर होम नहीं था। अन्य राज्यों में ये होम कुछ ही ज़िलों में थे इस कारण युवा वयस्कों को इन ज़िलों में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिससे उनका अपने साथियों और कर्मचारियों के साथ बना संबंध टूट गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि उन्हें अपने शैक्षणिक संस्थानों और नौकरियों को भी बदलना पड़ा। दिल्ली और महाराष्ट्र के अलावा इन पांच राज्‍यों में किसी में भी लड़कियों के लिए कोई आफ्टरकेयर होम नहीं था। दिल्ली और महाराष्ट्र में लड़कियों के लिए एक- एक आफ़टरकेयर होम है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि लड़कों की तुलना में लड़कियों के लिए बहुत कम ग्रुप होम थे, क्योंकि उन्हें असुरक्षित समझा गया। बाल संरक्षण गृह छोड़ने वाली उन महिलाओं को वर्किंग वूमेन हॉसट्ल भेजा गया जो कमाने लगी थीं। लेकिन जो कमाती नहीं थीं उन्हें सुधार गृह (महिलाओं के आश्रय) और निराश्रित महिलाओं के लिए बनी जगहों पर रहना पड़ा।

जेजे एक्ट के तहत, बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण के दौरान स्टाइपेंड, उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति और उन्‍हें नौकरी मिलने तक वित्तीय सहायता देने का प्रावधान है। राष्ट्रीय कौशल विकास कार्यक्रम और अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से भी इनके कौशल प्रशिक्षण और नौकरी की व्यवस्था होनी चाहिए।

रिपोर्ट में पाया गया कि बाल संरक्षण गृहों में रहने के दौरान और बाद में भी इनको ठीक से शिक्षा नहीं दी गई। इनमें लगभग 40% बीच में ही पढ़ाई छोड़ चुके थे। राजस्थान में केवल 14% और दिल्ली में केवल 13% ने ही स्कूल से आगे की पढ़ाई की थी।

इन राज्यों में बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों में लगभग 21% को वैसी शिक्षा नहीं मिली जैसी वे चाहते थे जबकि 35% को बाल संरक्षण गृह से बाहर जाने के बाद  अपनी शिक्षा जारी रखने में कठिनाई का सामना करना पड़ा था।

कर्नाटक में बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों में 35% ने कॉलेज या उससे आगे की पढ़ाई पूरी की। लेकिन इन राज्यों में, आधे से भी कम को बाल संरक्षण गृहों में एक या एक से अधिक रोजगारपरक कौशल का प्रशिक्षण मिला है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि एनजीओ द्वारा संचालित बाल संरक्षण गृहों को छोड़ने वाले 65% के पास किसी रोज़गार के लिए कौशल था, जबकि सरकार द्वारा संचालित बाल संरक्षण गृहों में ये आंकड़ा 35% था।

नौकरियों के कम अवसर, महिलाओं के लिए तो और भी कम

सर्वे में पाया गया कि शैक्षणिक योग्यता कम होने की वजह से बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों को अच्छी नौकरी नहीं मिल पाती है और उनकी आमदनी न्यूनतम मज़दूरी से भी कम होती है।  

टाटा ट्रस्ट की शिरीन वकील कहती हैं, “बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों के बारे में जूवेनाइल जस्टिस लॉ के अलावा कहीं भी कोई ज़िक्र नहीं है, जिसकी वजह से इनमें बेरोज़गारों की संख्या बहुत ज़्यादा है।” 

इस अध्ययन के दौरान जिन 435 लोगों से बातचीत की गई उनमें से  लगभग आधों (48%) को काम नहीं मिला। बाकी जिनको काम मिला उनमें से 93% नौकरीपेशा थे और 7% का खुद का काम था। इन लोगों की औसत आमदनी 7,500 रुपये से 8,500 रुपये प्रति माह थी। ये स्किल्ड वर्क के लिए महाराष्ट्र में न्यूनतम वेतन (9,559 रुपये) और दिल्ली में (14,000 रुपये) से कम है। 

ज़्यादातर लड़कों की महत्‍वाकांक्षा और शैक्षणिक रूचि को अनदेखा कर, उन्हें  व्यावसायिक कौशल प्रशिक्षण देकर ख़ुद कमाने-खाने के लिए छोड़ दिया जाता है, जिससे उन्हें जो काम मिलता है उसमें तनख़्वाह कम होती है। सर्वेक्षण में एक प्रतिभाशाली युवक का हवाला दिया गया है जिसे बीए आर्किटेक्चर कार्यक्रम में हुए अपने एडमिशन को छोड़ देना पड़ा।

शिरीन ने कहा, “लड़कियों के मामले में पुनर्वास का मतलब है उनकी शादी करा दी जाए और फिर उन्हें भुला दिया जाए।” उन्होंने आगे कहा कि इस तरह के मामलों में अक्सर घरेलू हिंसा और शादियों के टूटने की घटनाएं होती हैं। ऐसी शादियों से पैदा हुए बच्‍चों की स्थिति काफ़ी कमज़ोर होती है और उन्‍हें बाल संरक्षण गृह का सहारा लेना पड़ता है। इस कारण बच्‍चों का बाल संरक्षण गृह में आने का सिलसिला बना हुआ है।    

शिरीन ने बताया, "आगे की शिक्षा या व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए लड़कों की तरह, लड़कियों को भी, उनकी इच्छा के ख़िलाफ़, सिलाई, नर्सिंग और ब्यूटीशियन के काम के लिए प्रेरित किया जाता है। इससे उनकी प्रतिभा ना तो विकसित हो पाती है और ना ही निखर पाती है।" रिपोर्ट में पाया गया है कि आवास की तरह ही नौकरियों में भी पुरुषों की तुलना में महिलाओं की स्थिति काफ़ी बुरी है। समान शैक्षणिक योग्‍यता होने के बावजूद बाल संरक्षण गृह छोड़ने वाले 36% पुरुषों की तुलना में 63% महिलाओं के पास आमदनी का कोई ज़रिया नहीं था। 

70% के पास वित्तीय मामलों की कोई औपचारिक जानकारी नहीं थी और उनमें से आधे से अधिक (53.3%) को इस बारे में कोई सलाह नहीं मिली थी।

सर्वे के दौरान ये भी पाया गया कि बाल संरक्षण गृह छोड़ने वाले हर पांच में से एक युवा का बैंक अकाउंट नहीं था। लड़कियों में ये आंकड़ा 26% और लड़कों में 16% था। इनमें से 87% का इंश्योरेंस नहीं था। लड़कियों में सिर्फ़ 9% और लड़कों में 16% का इंश्योरेंस था।

खराब स्‍वास्‍थ्‍य और भावनात्‍मक संकट

अध्ययन में पाया गया कि बाल संरक्षण गृह को छोड़ने वाले युवा वयस्कों के पास स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं से निपटने के लिए किसी प्रकार की मदद और संसाधन नहीं हैं। सर्वेक्षण के दौरान पाया गया कि एक तिहाई (38%) से ज़्यादा को उनके परिवारों से किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं मिली थी।

बाल संरक्षण गृह  छोड़ने वाले चार (23%) में से एक को बीमारियों के दौरान लम्बे वक्त तक देखभाल करने वाला कोई नहीं था। सर्वेक्षण में शामिल तीन-चौथाई से अधिक (78%) के पास हैल्थ इंश्योरेंस नहीं था जबकि 13% के पास बीमारी के इलाज के लिए पर्याप्त धनराशि नहीं थी।

इसके अलावा, अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर बाल संरक्षण गृह छोड़ने वाले 61% ने भावनात्मक संकट का सामना करने की बात कही और अधिकांश ने कहा कि उन्होंने इसके लिए पेशेवर मदद नहीं ली।

अध्ययन में देखा गया कि बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों के लिए शिक्षा जारी रखने के प्रति अनिच्छा और नौकरी और रिश्तों को बनाए रखना, उनके खराब भावनात्मक स्वास्थ्य और रोगों से लड़ने की सामर्थ्य की कमी से जुड़ा था।

अध्ययन में पाया गया कि संस्थानों को छोड़ने के बाद वे अपने आपको  असुरक्षित महसूस करते हैं। महाराष्ट्र के एक 18 वर्षीय युवक ने बताया, "मुझे हर रोज़ कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। मुझे लगता है, जब कोई व्यक्ति इतने दबाव में होता है, तो वह अकेले झेल पाने में सक्षम नहीं होता और उसे कई स्तरों पर समर्थन की ज़रूरत होती है ।"

सर्वेक्षण में पाया गया कि संस्‍थान छोड़ने वाले लगभग 38% पुरुषों और 28% महिलाओं को अपने सहकर्मियों और शिक्षकों के साथ संबंध बनाए रखने के लिए काफी मशक्‍कत करनी पड़ी। अध्ययन में पाया गया कि इनमें से ज़्यादातर लड़के-लड़कियों को एक दूसरे के सम्पर्क में नहीं आने दिया गया, जिससे उनके रिश्ते नीरस हो गए। संस्‍थान छोड़ने वाले दो-तिहाई पुरुषों और 88% महिलाओं ने रोमांटिक संबंधों को बनाए रखने में असमर्थता की बात कही। उन्‍होंने यह भी बताया कि वो ये महसूस करते थे कि रोमांटिक संबंध उनके लिए नहीं हैं।  

दस्‍तावेज़ों की कमी

सर्वे में शामिल एक-तिहाई ने कहा कि वे आत्मनिर्भर रूप से जीने में अपने आपको सशक्‍त महसूस नहीं करते। उनमें से आधों (49%) को खाना बनाना कभी नहीं सिखाया गया और 44% को घरेलू कामकाज का कोई प्रशिक्षण नहीं दिया गया। हर पांच में से दो ने कहा कि वे ये सब सीखना चाहते हैं।

कई युवा वयस्कों ने कहा कि वे बुनियादी दस्तावेज़ों की कमी से ख़ुद को बंधक महसूस करते हैं। भले ही 96% लोगों के पास आधार कार्ड था लेकिन 64% के पास वोटर कार्ड नहीं था, 62% के पास राशन कार्ड नहीं था और 54% के पास पैन कार्ड नहीं था। रिपोर्ट में एक ऐसे युवक के मामले का ज़िक्र किया गया है जिसे ड्राइविंग लाइसेंस नहीं मिल सका क्योंकि उसके पास आावास प्रमाण नहीं था।

इस मामले में भी महिलाओं की हालत बद्तर है – बाल संरक्षण गृह छोड़ने वाले 41% पुरुषों की तुलना में 70% महिलाओं के पास पैन कार्ड नहीं था। अध्ययन में कहा गया है कि इससे ये पता चलता है कि पुरुषों की तुलना में आर्थिक सेवाओं का लाभ उठाने के मामले में महिलाएं कितनी पिछड़ी हुई हैं।

समान अवसर

रिपोर्ट में आफ्टरकेयर के आठ क्षेत्रों की पहचान की गई है। बाल संरक्षण गृहों को चाहिए कि वो इन्हें आवास, आत्मनिर्भर जीवन जीने की कला, सामाजिक और पारस्परिक कौशल, भावनात्मक सुरक्षा, स्वास्थ्य, शैक्षिक और व्यावसायिक कौशल, आर्थिक आत्मनिर्भरता और कैरियर संबंधी कौशल, पहचान और कानूनी जागरूकता प्रदान करें।  

उदयन फाउंडेशन की किरन मोदी ने कहा, "बाल संरक्षण गृहों के कर्मचारियों को इन विषयों में प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है ताकि वे बच्चों को पूर्ण विकसित इंसान के रूप में विकसित होने का अवसर प्रदान कर सकें।" उन्‍होंने कहा, “उनकी शादी करने या उन्हें कम तनख़्वाह वाली नौकरियों में भेजने की जल्दी क्यों है? हमें उनकी शिक्षा में वैसे ही निवेश करना चाहिए जैसे हम अपने बच्चों के लिए करते हैं।”

समाधान

रिपोर्ट में सुझाए गए कुछ तरीके इस प्रकार हैं:

राज्यों को अपने स्वयं के आफ्टरकेयर के कार्यक्रम विकसित करने चाहिए: प्रत्येक राज्य को अपने ख़ुद के आफ्टरकेयर कार्यक्रम विकसित करने चाहिए जो यह सुनिश्चित करें कि बाल संरक्षण गृह छोड़ने वालों को मदद और सेवाएं मिलें और  इसके लिए एक निगरानी तंत्र हो।

बाहर की दुनिया में उनकी ज़िंदगी कैसी हो, इसके के लिए योजना बनाना अनिवार्य हो : 14 से 16 साल तक की उम्र के बच्चों को बाल संरक्षण गृहों से बाहर जाने के लिए तैयार किया जाना चाहिए। उन्हें उनके अधिकारों और कर्तव्यों, बुनियादी जीवन और समाज से रुबरू होने के तरीकों की जानकारी दी जाए।

सिंगल-विंडो सपोर्ट सेंटर: आफ्टरकेयर प्रोग्राम के दो साल बाद तक किसी भी संकट के समय सम्पर्क की सुविधा होनी चाहिए। इनका एक रियलटाइम डेटाबेस होना चाहिए।


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