जनजातीय क्षेत्रों में सुधर रही है स्वास्थ्य व्यवस्था, देश के औसत की तुलना में बेहतर परिणाम

लखनऊ: सिराज खान, 51, उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले के कर्वी इलाके में पैडल-रिक्शा चलाकर अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं। उनके परिवार में उनकी पत्नी और पांच बच्चे हैं। 

सिराज बताते हैं कि उनकी बेटी फौज़िया सुल्तान, जो कि अब आठ साल की है, जन्म के बाद कुपोषित थी लेकिन सही देखभाल और इलाज की वजह से आज वह एक आम बच्चे की तरह ही स्वस्थ है। 

"जन्म के समय ही फौज़िया का वज़न काफी कम था। हमने बहुत देखभाल की, डॉक्टरों की सलाह मानी और वही किया जो हमसे कहा गया। यह सब हमारे लिए काफ़ी मुश्किल था क्योंकि हम एक पिछड़े इलाक़े से आते हैं जहां जनजातीय लोग ज़्यादा रहते हैं और डॉक्टरों के पास जाने से ज़्यादा देसी इलाज प्रचलन पर भरोसा करते हैं", सिराज बताते हैं, " हालांकि हमारे इलाक़े में स्वास्थ्य केंद्र नहीं था और हमें कुछ ज़्यादा दूरी तय करके डॉक्टर के पास जाना पड़ता था, यही एक कारण है कि हमारी बेटी आज स्वस्थ है नहीं तो हमने अपनी आखों के सामने न जाने कितने बच्चों को जन्म के बाद मरते देखा है।" 

वैसे तो स्वास्थ्य व्यवस्था कई बार कठघरे में नज़र आती है मगर हम जनजातीय क्षेत्रों की बात करें तो वहां से कुछ अच्छे संकेत नज़र आते हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या में से 8.6 फ़ीसदी जनजाति हैं। शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या 2.8 फीसदी थी और ग्रामीण क्षेत्रों में 11.3 फीसदी।  माना जाता है कि जनजातियां विकास के मामले में काफ़ी पीछे रहती हैं और उन्हें वह सुविधाएं मुहैया नहीं हो पाती हैं जो बाकी जनता तक पहुंचती हैं। इसका एक कारण यह भी माना जाता है कि यह जनजातियां उन क्षेत्रों में फैली हुई हैं जो काफ़ी दूर और दुर्गम हैं। दस राज्यों में ऐसे ज़िले घोषित हैं जो जनजातीय ज़िले माने जाते हैं।

पिछले हुए कुछ सर्वेक्षणों (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण और ज़िला परिवार सर्वेक्षण) से पता चलता है कि जनजातियों के स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार आया है। अगर तीसरे और चौथे राष्ट्रीय परिवार सर्वेक्षण की आपस में तुलना करें तो पता चलता है कि जनजातियों में स्वास्थ्य सुधार के नतीजे राष्ट्रीय औसत से बेहतर रहे हैं। 

बाल मृत्यु दर

2005-2006 के सर्वेक्षण में शिशु मृत्यु दर का राष्ट्रीय औसत हर 1000 बच्चों पर 57 था जबकि जनजातीय क्षेत्रों में यह औसत 62.1 था। 2015-2016 के सर्वेक्षण में शिशु मृत्यु दर का राष्ट्रीय औसत 40.7 था जबकि जनजातीय क्षेत्रों में यह दर 44.4 था। जहां जनजातीय क्षेत्रों में यह सुधार हर 1000 बच्चों पर 17.7 बिंदुओं तक देखने को मिला वहीं दूसरी तरफ़ राष्ट्रीय स्तर पर यह सुधार केवल 16.3 बिंदुओं तक रहा। 

पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में जनजातीय क्षेत्रों में और भी ज़्यादा सुधार देखने को मिला। राष्ट्रीय स्तर पर 2005-2006 में यह दर हर एक हज़ार बच्चों पर 74.3 थी और 2015-2016 में यह 49.7 हो गई। जनजातियों की बात करें तो 2005-2006 के सर्वेक्षण के अनुसार यह दर 95.7 थी पर 2015-2016 के सर्वेक्षण में यह दर 57.2 पर आ गई। जनजातीय क्षेत्रों में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में 38.5 बिंदुओं का सुधार आया जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह सुधार केवल 24.6 बिंदू था। यह आंकड़े परिवार एवं स्वास्थ्य कल्याण मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने लोकसभा में भी साझा किए।

बेहतर हुई महिलाओं एवं बच्चों की अवस्था

बच्चों और महिलाओं में अनीमिया चिंता का विषय रहा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार 2005-2006 में देश भर के छह महीने से लेकर के पांच साल की उम्र तक के 69.5% बच्चे अनीमिक थे, जनजातीय क्षेत्रों में यह आंकड़ा 76.8% था।

2015-2016 के सर्वेक्षण के अनुसार जनजातीय क्षेत्रों में ज़्यादा सुधार देखने को मिला। जनजातीय क्षेत्रों में यह सुधार 13.7% का था जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह केवल 11.1% का सुधार हुआ। जनजातीय क्षेत्रों की महिलाओं में भी अनीमिया के सुधार में ज़्यादा तेज़ी पाई गई। जनजातीय महिलाओं में अनीमिया में 8.7% की गिरावट देखने को मिली जबकि राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं में यह गिरावट केवल 2.3% थी।

अनुसूचित जनजातियों में संस्थागत प्रसव का प्रतिशत 2005-06 में 17.7% से बढ़कर 2015-16 में 68% हो गया जबकि सभी श्रेणियों में यह 38.7% से बढ़कर 78.9% पहुंचा है। इसके अलावा, कुशल स्वास्थ्य कर्मियों की निगरानी  में जनजातीय महिलाओं के प्रसव 2005-06 के 25.4% से बढ़कर 2015-16 में 71.5% हो गए हैं। 

चिकित्सा सुविधा केन्द्रों में बढ़ोत्तरी

ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी (2018) के अनुसार, आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं में प्रतिशत वृद्धि 2005 और 2018 के बीच देश के औसत की तुलना में अधिक है। 2005 में, पूरे भारत में सीएचसी, पीएचसी और एससी की कुल संख्या 168,986 थी। 2018 में इसमें 12.30% की वृद्धि हुई और कुल संख्या 189,784 पहुंच गई। अगर हम इसकी तुलना आदिवासी क्षेत्रों से करें तो सीएचसी, पीएचसी और एससी की संख्या में 2005 से 2018 के बीच 63.75% की वृद्धि हुई। 2005 में कुल संख्या 20,200 थी जो 2018 में बढ़कर 33,079 हो गई। जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं स्थापित करने के लिए जनसंख्या के मानदंड में ढील दी गई। जनजातीय क्षेत्रों में क्रमशः एससी, पीएचसी और सीएचसी की स्थापना के लिए 5,000, 30,000 और 120,000 की जनसंख्या के मानदंडों के बजाए यह 3,000, 20,000 और 80,0000 है।

सरकारी मदद

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत कई सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं जिससे जनजातीय ज़िलों में किसी बात की कमी ना रहे। जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत स्त्रियों को मुफ़्त में दवाई, जांच, ख़ून और ख़ुराक़ देने की सुविधा दी जा रही हैं। साथ ही स्त्रियों को अस्पताल तक ले जाने का और वापस लाने का भी प्रबंध किया गया है। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम से भी स्वास्थ्य व्यवस्था में काफ़ी सुधार आया है। यह नवजात और बाल स्वास्थ्य जांच और जन्म के दोषों, बीमारियों, कमी और जीवित रहने की गुणवत्ता में सुधार के लिए बिना देरी के मुफ़्त सेवाएं प्रदान करता है।

इसके अतिरिक्त मातृ स्वास्थ्य, बाल स्वास्थ्य, किशोर स्वास्थ्य, परिवार नियोजन, सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की सहायता से निशुल्क दिया जा रहा है। मोबाइल मेडिकल यूनिट (एमएमयू) को एनएचएम के सहयोग से कार्यान्वित किया जा रहा है, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा में सुधार पहुंचाने के लिए।  अन्य राज्यों में हर ज़िले में 5 एमएमयू के कैपिंग के लिए 10 लाख की आबादी पर मोबाइल मेडिकल यूनिट हो सकते हैं, आदिवासी राज्यों के लिए यह आवश्यकतानुसार किया जा सकता है। एमएमयू के मानदंडों को एक अतिरिक्त एमएमयू के साथ संशोधित किया गया है। 

इसका एक और पक्ष भी है। “हमने गुजरात, राजस्थान और मध्यप्रदेश में काम किया है। मुझे तो कहीं कोई परिवर्तन स्वास्थ्य के क्षेत्र में दिखाई नहीं दिया और जहां तक स्वास्थ्य केंद्रों की बात है तो देश जैसे-जैसे विकास कर रहा है वैसे-वैसे कुछ स्वास्थ्य केंद्र तो ज़रूर बढ़े हैं। बच्चों के जन्म और मृत्यु दर में भी मुझे कोई विशेष परिवर्तन नहीं दिखाई देता है,” अखिल भारतीय विमुक्त एवं घुमन्तु जनजाति वेलफ़ेयर संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कृपा शंकर नट ने दलील दी।

“पिछले कुछ साल में अनुसूचित जनजाति के गांवों में स्वास्थ्य केंद्रों में तो कोई बढोत्तरी नज़र नहीं आ रही है लेकिन एक बदलाव ज़रूर देखने को मिला है कि आशा बहुएं अब गांव-गांव में दिखाई देती हैं। अनुसूचित जनजाति के बच्चों की मृत्यु दर के मामले में मैंने तो यह देखा है कि यह जनजातियां पहले से जागरूक हैं क्योंकि इनके यहां दूध के लिए जानवर और किचन गार्डेन में सब्ज़ियों के साथ साग ज़रूर रहता है। सरकार आकड़ों में जो परिवर्तन दिखा रही है वह किसी विशेष इलाक़ों के हो सकते हैं,” महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के दर्जनों अनुसूचित जनजाति के गांवों में स्वास्थ्य पर काम कर रही समाज सेवी संस्था देहात के निदेशक डॉ जितेन्द्र चतुर्वेदी ने कहा।

(आदित्य और सौरभ, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं और 101Reporters.com के सदस्य हैं।)

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

लखनऊ: सिराज खान, 51, उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले के कर्वी इलाके में पैडल-रिक्शा चलाकर अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं। उनके परिवार में उनकी पत्नी और पांच बच्चे हैं। 

सिराज बताते हैं कि उनकी बेटी फौज़िया सुल्तान, जो कि अब आठ साल की है, जन्म के बाद कुपोषित थी लेकिन सही देखभाल और इलाज की वजह से आज वह एक आम बच्चे की तरह ही स्वस्थ है। 

"जन्म के समय ही फौज़िया का वज़न काफी कम था। हमने बहुत देखभाल की, डॉक्टरों की सलाह मानी और वही किया जो हमसे कहा गया। यह सब हमारे लिए काफ़ी मुश्किल था क्योंकि हम एक पिछड़े इलाक़े से आते हैं जहां जनजातीय लोग ज़्यादा रहते हैं और डॉक्टरों के पास जाने से ज़्यादा देसी इलाज प्रचलन पर भरोसा करते हैं", सिराज बताते हैं, " हालांकि हमारे इलाक़े में स्वास्थ्य केंद्र नहीं था और हमें कुछ ज़्यादा दूरी तय करके डॉक्टर के पास जाना पड़ता था, यही एक कारण है कि हमारी बेटी आज स्वस्थ है नहीं तो हमने अपनी आखों के सामने न जाने कितने बच्चों को जन्म के बाद मरते देखा है।" 

वैसे तो स्वास्थ्य व्यवस्था कई बार कठघरे में नज़र आती है मगर हम जनजातीय क्षेत्रों की बात करें तो वहां से कुछ अच्छे संकेत नज़र आते हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या में से 8.6 फ़ीसदी जनजाति हैं। शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या 2.8 फीसदी थी और ग्रामीण क्षेत्रों में 11.3 फीसदी।  माना जाता है कि जनजातियां विकास के मामले में काफ़ी पीछे रहती हैं और उन्हें वह सुविधाएं मुहैया नहीं हो पाती हैं जो बाकी जनता तक पहुंचती हैं। इसका एक कारण यह भी माना जाता है कि यह जनजातियां उन क्षेत्रों में फैली हुई हैं जो काफ़ी दूर और दुर्गम हैं। दस राज्यों में ऐसे ज़िले घोषित हैं जो जनजातीय ज़िले माने जाते हैं।

पिछले हुए कुछ सर्वेक्षणों (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण और ज़िला परिवार सर्वेक्षण) से पता चलता है कि जनजातियों के स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार आया है। अगर तीसरे और चौथे राष्ट्रीय परिवार सर्वेक्षण की आपस में तुलना करें तो पता चलता है कि जनजातियों में स्वास्थ्य सुधार के नतीजे राष्ट्रीय औसत से बेहतर रहे हैं। 

बाल मृत्यु दर

2005-2006 के सर्वेक्षण में शिशु मृत्यु दर का राष्ट्रीय औसत हर 1000 बच्चों पर 57 था जबकि जनजातीय क्षेत्रों में यह औसत 62.1 था। 2015-2016 के सर्वेक्षण में शिशु मृत्यु दर का राष्ट्रीय औसत 40.7 था जबकि जनजातीय क्षेत्रों में यह दर 44.4 था। जहां जनजातीय क्षेत्रों में यह सुधार हर 1000 बच्चों पर 17.7 बिंदुओं तक देखने को मिला वहीं दूसरी तरफ़ राष्ट्रीय स्तर पर यह सुधार केवल 16.3 बिंदुओं तक रहा। 

पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में जनजातीय क्षेत्रों में और भी ज़्यादा सुधार देखने को मिला। राष्ट्रीय स्तर पर 2005-2006 में यह दर हर एक हज़ार बच्चों पर 74.3 थी और 2015-2016 में यह 49.7 हो गई। जनजातियों की बात करें तो 2005-2006 के सर्वेक्षण के अनुसार यह दर 95.7 थी पर 2015-2016 के सर्वेक्षण में यह दर 57.2 पर आ गई। जनजातीय क्षेत्रों में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में 38.5 बिंदुओं का सुधार आया जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह सुधार केवल 24.6 बिंदू था। यह आंकड़े परिवार एवं स्वास्थ्य कल्याण मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने लोकसभा में भी साझा किए।

बेहतर हुई महिलाओं एवं बच्चों की अवस्था

बच्चों और महिलाओं में अनीमिया चिंता का विषय रहा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार 2005-2006 में देश भर के छह महीने से लेकर के पांच साल की उम्र तक के 69.5% बच्चे अनीमिक थे, जनजातीय क्षेत्रों में यह आंकड़ा 76.8% था।

2015-2016 के सर्वेक्षण के अनुसार जनजातीय क्षेत्रों में ज़्यादा सुधार देखने को मिला। जनजातीय क्षेत्रों में यह सुधार 13.7% का था जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह केवल 11.1% का सुधार हुआ। जनजातीय क्षेत्रों की महिलाओं में भी अनीमिया के सुधार में ज़्यादा तेज़ी पाई गई। जनजातीय महिलाओं में अनीमिया में 8.7% की गिरावट देखने को मिली जबकि राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं में यह गिरावट केवल 2.3% थी।

अनुसूचित जनजातियों में संस्थागत प्रसव का प्रतिशत 2005-06 में 17.7% से बढ़कर 2015-16 में 68% हो गया जबकि सभी श्रेणियों में यह 38.7% से बढ़कर 78.9% पहुंचा है। इसके अलावा, कुशल स्वास्थ्य कर्मियों की निगरानी  में जनजातीय महिलाओं के प्रसव 2005-06 के 25.4% से बढ़कर 2015-16 में 71.5% हो गए हैं। 

चिकित्सा सुविधा केन्द्रों में बढ़ोत्तरी

ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी (2018) के अनुसार, आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं में प्रतिशत वृद्धि 2005 और 2018 के बीच देश के औसत की तुलना में अधिक है। 2005 में, पूरे भारत में सीएचसी, पीएचसी और एससी की कुल संख्या 168,986 थी। 2018 में इसमें 12.30% की वृद्धि हुई और कुल संख्या 189,784 पहुंच गई। अगर हम इसकी तुलना आदिवासी क्षेत्रों से करें तो सीएचसी, पीएचसी और एससी की संख्या में 2005 से 2018 के बीच 63.75% की वृद्धि हुई। 2005 में कुल संख्या 20,200 थी जो 2018 में बढ़कर 33,079 हो गई। जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं स्थापित करने के लिए जनसंख्या के मानदंड में ढील दी गई। जनजातीय क्षेत्रों में क्रमशः एससी, पीएचसी और सीएचसी की स्थापना के लिए 5,000, 30,000 और 120,000 की जनसंख्या के मानदंडों के बजाए यह 3,000, 20,000 और 80,0000 है।

सरकारी मदद

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत कई सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं जिससे जनजातीय ज़िलों में किसी बात की कमी ना रहे। जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत स्त्रियों को मुफ़्त में दवाई, जांच, ख़ून और ख़ुराक़ देने की सुविधा दी जा रही हैं। साथ ही स्त्रियों को अस्पताल तक ले जाने का और वापस लाने का भी प्रबंध किया गया है। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम से भी स्वास्थ्य व्यवस्था में काफ़ी सुधार आया है। यह नवजात और बाल स्वास्थ्य जांच और जन्म के दोषों, बीमारियों, कमी और जीवित रहने की गुणवत्ता में सुधार के लिए बिना देरी के मुफ़्त सेवाएं प्रदान करता है।

इसके अतिरिक्त मातृ स्वास्थ्य, बाल स्वास्थ्य, किशोर स्वास्थ्य, परिवार नियोजन, सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की सहायता से निशुल्क दिया जा रहा है। मोबाइल मेडिकल यूनिट (एमएमयू) को एनएचएम के सहयोग से कार्यान्वित किया जा रहा है, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा में सुधार पहुंचाने के लिए।  अन्य राज्यों में हर ज़िले में 5 एमएमयू के कैपिंग के लिए 10 लाख की आबादी पर मोबाइल मेडिकल यूनिट हो सकते हैं, आदिवासी राज्यों के लिए यह आवश्यकतानुसार किया जा सकता है। एमएमयू के मानदंडों को एक अतिरिक्त एमएमयू के साथ संशोधित किया गया है। 

इसका एक और पक्ष भी है। “हमने गुजरात, राजस्थान और मध्यप्रदेश में काम किया है। मुझे तो कहीं कोई परिवर्तन स्वास्थ्य के क्षेत्र में दिखाई नहीं दिया और जहां तक स्वास्थ्य केंद्रों की बात है तो देश जैसे-जैसे विकास कर रहा है वैसे-वैसे कुछ स्वास्थ्य केंद्र तो ज़रूर बढ़े हैं। बच्चों के जन्म और मृत्यु दर में भी मुझे कोई विशेष परिवर्तन नहीं दिखाई देता है,” अखिल भारतीय विमुक्त एवं घुमन्तु जनजाति वेलफ़ेयर संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कृपा शंकर नट ने दलील दी।

“पिछले कुछ साल में अनुसूचित जनजाति के गांवों में स्वास्थ्य केंद्रों में तो कोई बढोत्तरी नज़र नहीं आ रही है लेकिन एक बदलाव ज़रूर देखने को मिला है कि आशा बहुएं अब गांव-गांव में दिखाई देती हैं। अनुसूचित जनजाति के बच्चों की मृत्यु दर के मामले में मैंने तो यह देखा है कि यह जनजातियां पहले से जागरूक हैं क्योंकि इनके यहां दूध के लिए जानवर और किचन गार्डेन में सब्ज़ियों के साथ साग ज़रूर रहता है। सरकार आकड़ों में जो परिवर्तन दिखा रही है वह किसी विशेष इलाक़ों के हो सकते हैं,” महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के दर्जनों अनुसूचित जनजाति के गांवों में स्वास्थ्य पर काम कर रही समाज सेवी संस्था देहात के निदेशक डॉ जितेन्द्र चतुर्वेदी ने कहा।

(आदित्य और सौरभ, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं और 101Reporters.com के सदस्य हैं।)

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