जम्मू-कश्मीर शटडाउन में, पीएम की स्वास्थ्य योजना में रुकावट, स्वास्थ्य संकट गहराया

एक बेरोजगार शॉल विक्रेता नियाज वानी अब तक प्रधानमंत्री जन स्वास्थ्य योजना के लाभार्थी थे, लेकिन अब प्रति डायलिसिस 2,500 रुपये का भुगतान करना पड़ता है, क्योंकि श्रीनगर में 50 बिस्तरों वाला खैबर अस्पताल पंजीकरण और इंटरनेट पर दावों की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकता, क्योंकि वहां अब सरकार ने 31 दिनों के इंटरनेट सेवाओं पर लिए रोक लगा दी है। अब तक यह नि:शुल्क, मानवीय उपचार प्रदान कर रहा था, लेकिन अब कहता है कि यह संभव नहीं है, क्योंकि केंद्र से रीइम्बर्स्मन्ट का बकाया और मरीजों के बिल 80 लाख रुपये से अधिक हो गए हैं।

श्रीनगर:उनकी आंखें सूजी हुई हुई हैं और वे दिल से दुखी हैं। अस्पताल के बिस्तर पर उनके शरीर से डायलिसिस मशीन का ट्यूब लगा हुआ है, जिससे उनका जहर वाला खून शुद्ध होता है और वापस शरीर के भीतर जाता है। शॉल विक्रेता नियाज वानी ने इस बात पर विचार कर रहे हैं कि वह अपने इलाज को कितने दिनों के लिए जारी रख सकते हैं।

26 अगस्त, 2019 तक, श्रीनगर के प्रमुख निजी चिकित्सा संस्थानों में से एक, 50-बेड खैबर अस्पताल में वानी का डायलिसिस मुफ्त था। वह प्रधान मंत्री की प्रमुख चिकित्सा-लागत प्रतिपूर्ति कार्यक्रम, आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत एक ‘गोल्डन कार्ड’ धारक हैं, जिसने अगस्त 2019 तक, जम्मू और कश्मीर में राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अच्छे उपयोग की सूचना दी है।

सितंबर 2018 में शुरू हुआ, आयुष्मान भारत 10 करोड़ से अधिक भारतीय परिवारों को 5 लाख रुपये (500,000 रुपये) तक की मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करता है जो आधिकारिक गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं। पिछले हफ्ते तक वानी उन्ही लोगों में से एक था। इंटरनेट पर दावों को पंजीकृत और संसाधित करने पर असमर्थ होने पर अब अस्पताल ने मुफ्त इलाज को निलंबित दिया है, जिसे सरकार ने 31 दिनों के लिए बंद कर दिया है।

20-बेड वाले डायलिसिस सेंटर में वानी अकेले नहीं थे। हमने जिन भी लोगों से मुलाकात की, लगभग सभी अन्य मरीज गोल्डन कार्ड धारक थे। रिक्शा चालक, मजदूर और अन्य दैनिक मजदूरी पाने वाले लोग अब डायलिसिस कराने के लिए संघर्ष कर रहे थे क्योंकि आयुष्मान भारत सेवाएं बंद हो गईं है। भले ही उन्हें डायलिसिस की आवश्यकता थी, कुछ रोगियों ने इलाज बंद कर दिया था क्योंकि वे इसे वहन नहीं कर सकते थे।

मानवीय आधार पर, खैबर अस्पताल ने 26 अगस्त, 2019 तक गोल्डन कार्ड धारकों के लिए मुफ्त सेवाओं की अनुमति दी है, यह विश्वास करते हुए कि इंटरनेट बहाल हो जाएगा और वे क्लेम कर पैसे वापस ले पाएंगे। लेकिन केंद्र सरकार से मिलने वाले 22 लाख रुपये और 60 लाख रुपये के मौजूदा अवैतनिक बिलों के साथ, अस्पताल अधिकारियों ने कहा कि अब उन्होंने आयुष्मान भारत के लाभार्थियों का मुफ्त इलाज बंद कर दिया है।

श्रीनगर के खैबर अस्पताल की डायलिसिस यूनिट में मरीज। अधिकांश रोगी प्रधान मंत्री जन आरोग्य योजना के लाभार्थी हैं, और उन्हें मुफ्त उपचार प्राप्त हुआ है। 26 अगस्त, 2019 से, जब बढ़ते बिलों के कारण अस्पताल ने मुफ्त चिकित्सा सेवा बंद कर दी, तो मरीजों को भुगतान करना पड़ा। कुछ मरीज इलाज बंद करा रहे हैं।

वानी ने कहा कि उन्हें अब दवाओं को छोड़कर 2,500 रुपये प्रति डायलिसिस या लगभग 20,000 रुपये प्रति माह का भुगतान करना होगा। उन्होंने बिस्तर पर लेटे हुए इंडियास्पेंड से कहा, " इलाज के लिए मुझे अपनी पत्नी के सोने के कान के छल्ले को बेचना पड़ा। मुझे उस जोड़ी के कानों के छल्ले के लिए सिर्फ 15,000 रुपये मिले। यह 1 तोला (सोने का 10 ग्राम) से अधिक था। ये सुनार बहुत होशियार हैं, वे कर्ज नहीं दे रहे हैं बल्कि हमें (हमारा सोना) बेचने के लिए कह रहे हैं।" 

5 अगस्त, 2019 से, जब भारत की संसद ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 (जिसमें 1949 में भारत में शामिल जम्मू-कश्मीर के लिए कुछ अलग शर्तें थीं।) को निरस्त करने के लिए कानून पारित किया। अतिरिक्त 38,000 सैनिकों को तैनात किया और कश्मीर में टेलीफोन और इंटरनेट सेवाओं को निलंबित कर दिया, घाटी में स्वास्थ्य सेवाओं पर इसका प्रभाव स्पष्ट है।

आयुष्मान भारत के मरीज मुफ्त सेवाओं तक नहीं पहुंच सकते। हम जिन निजी और सरकारी अस्पतालों में गए, वे आधे खाली थे। एमआरआई मशीनों को सॉफ्टवेयर अपडेट नहीं मिल सके। कई दवाएं कम आपूर्ति में थीं, और कूरियर सेवाओं को निलंबित कर दिया गया था, जो उन लोगों को दे सकते थे जो दवाइयां लाने के लिए जम्मू, चंडीगढ़ या दिल्ली की यात्रा कर रहे थे। सर्जरी स्थगित या बंद कर दी गई। डॉक्टर्स खाली बैठे थे। जीवन रक्षक प्रक्रियाओं की जरूरत वाले मरीजों की मृत्यु हो सकती है - लेकिन निरंतर मोबाइल और इंटरनेट ब्लैकआउट के कारण जानने का कोई तरीका नहीं है।

संचार नाकाबंदी के एक महीने बाद 4 सितंबर, 2019 को, श्रीनगर के जिला मजिस्ट्रेट और विकास आयुक्त शाहिद चौधरी ने राज्य के सूचना और जनसंपर्क विभाग के आधिकारिक ट्विटर हैंडल को रीट्वीट किया जिसमें कहा गया था: “100 फीसदी लैंडलाइनज का परिचालन किया जाना है; शेष 19 एक्सचेंज आज रात खोले जा रहे हैं ”। चौधरी ने कहा कि मोबाइलों को धीरे-धीरे बहाल किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अस्पताल में सर्जिकल प्रक्रियाएं सामान्य थीं और दवाएं उपलब्ध थीं।

इस आलेख को 5 सितंबर, 2019 को लिखा गया है और तब तक इनमें से ज्यादा चीजें नहीं हुई थी।

खैबर अस्पताल में, वानी ने हमें बताया कि कैसे उसने पर्यटक सीजन के दौरान प्रति दिन 500 रुपये कमाए और अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और जम्मू-कश्मीर को एक राज्य क्षेत्र से केंद्र शासित प्रदेश में रद्द करने के सरकार के फैसले के विरोध में एक अनौपचारिक नागरिक हड़ताल के रुप में कैसे अगस्त 2019 के बाद से उसे कोई आय नहीं हुई, जब घाटी में दुकानें बंद हो गईं और और व्यवसाय ठप्प हो गए।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और जम्मू-कश्मीर को एक राज्य क्षेत्र से केंद्र शासित प्रदेश में बदलने के केंद्र के फैसले के विरोध में 5 अगस्त, 2019 से नागरिक हड़ताल कारण कश्मीर में व्यवसाय और वाणिज्यिक उद्यम बंद हो गए हैं।

वानी ने कहा, "मेरे तीन बच्चों को अपनी पढ़ाई बंद करनी पड़ेगी। अब चावल या सब्जी खरीदने के लिए भी पैसे नहीं हैं।"

वाणी ने पूछा, "गरीब कश्मीरी लोग आयुष्मान भारत का लाभ क्यों नहीं उठा पा रहे हैं?"

“हम नहीं जानते कि कितने लोग मर गए।” 

5 अगस्त, 2019 से पहले, खैबर अस्पताल ने 30-40 एंजियोप्लास्टी की,’ जो कि हृदय में अवरुद्ध रक्त वाहिकाओं का इलाज करने की प्रक्रिया है। नाम ना बताने की शर्त पर, एक वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट ने कहा, पिछले महीने केवल 10 एंजियोप्लास्टी की गई थीं।

सरकारी अस्पतालों, अस्पताल मालिकों और डॉक्टरों के अधिकांश अधिकारियों ने इंडियास्पेंड को बताया कि उन्हें सरकार द्वारा मीडिया से बात न करने के निर्देश दिए गए थे।

वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ ने कहा, देखें, दिल के दौरे अभी भी होते हैं। वास्तव में, (अतिरिक्त) तनाव के कारण वे अधिक हो रहे हैं।"

“अब क्या हो गया है कि मरीज अस्पताल तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। यह विशेष रूप से क्लैंपडाउन के बाद पहले तीन हफ्तों में हुआ। कई लोग मारे गए होंगे, लेकिन पता करने का कोई तरीका नहीं है। ”

यहां तक ​​कि श्रीनगर के शीर्ष दो सरकारी अस्पतालों में से एक, श्री महाराजा हरि सिंह (एसएमएचएस) अस्पताल में,डॉक्टरों ने कहा कि न तो तय किए गए सर्जरी वाले मरीज अस्पताल पहुंच सकते हैं और न ही अस्पताल प्रशासन उनसे संपर्क कर सकता है।

परिसर से दूर रहने वाले कई अस्पताल कर्मचारी सुरक्षा बाधाओं के कारण काम पर नहीं आ सकते थे। कई सर्जनों ने कहा कि हमने "उच्च-जोखिम वाले मामलों" पर काम नहीं करने का फैसला किया, क्योंकि आपातकालीन स्थिति में वरिष्ठ डॉक्टरों से संपर्क करने के लिए रेजिडेंट डॉक्टरों के पास कोई रास्ता नहीं था।

अस्पतालों ने काम करने के लिए और काम से अस्पताल के कर्मचारियों के लिए एंबुलेंस का उपयोग करना शुरू कर दिया है क्योंकि कुछ क्षेत्रों में निजी वाहनों को आगे बढ़ने की अनुमति नहीं है। रूट पूर्व निर्धारित हैं, लेकिन आपात स्थिति के दौरान, मोबाइल फोन के बिना, डॉक्टरों तक पहुंचना मुश्किल है।

सुरक्षा चिंताओं और सार्वजनिक परिवहन की कमी के कारण कश्मीर में अस्पतालों से डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों को ले जाने के लिए एम्बुलेंस का उपयोग किया जाता है।

सरकार ने दावा किया है कि घाटी के कुछ हिस्सों में, विशेषकर सरकारी कार्यालयों और पुलिस स्टेशनों में लैंडलाइन को बहाल कर दिया गया है। हालांकि, जब इंडियास्पेंड ने 4 सितंबर, 2019 को इलाके दौरा किया, तब एसएमएचएस अस्पताल में ऐसा कोई लैंडलाइन नहीं था, जो काम कर रहा हो, जबकि आधिकारिक रुप से इसे 1 सितंबर, 2019 को बहाल कर दिया गया था।अस्पताल के कर्मचारियों ने कहा कि अस्पताल के प्रमुख ,परवेज अहमद शाह, जो श्रीनगर में चार अन्य अस्पतालों के प्रमुख हैं, का मोबाइल फोन काम कर रहा था।

इंडियास्पेंड ने शाह से उनके ऑफिस में तीन बार मिलने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने हमसे मिलने या कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशालय में, 4 सितंबर, 2019 को कई लैंडलाइन काम नहीं कर रहे थे। केवल स्वास्थ्य निदेशक और जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारियों के मोबाइल फोन बहाल किए गए थे। इंडियास्पेंड ने पाया कि श्रीनगर और अन्य जिला अस्पतालों में अन्य आपातकालीन कर्मचारियों के पास मोबाइल फोन या लैंडलाइन तक पहुंच नहीं है।

रोगियों की सवारी में अड़चन, वाहन लेते हैं उधार

ग्रामीण कश्मीर के ज्यादातर रोगी अपनी स्वास्थ्य आवश्यकताओं के लिए श्रीनगर के तृतीयक अस्पतालों पर निर्भर हैं। संचार सेवाओं के साथ, सिक्योरिटी चेक और कोई सार्वजनिक परिवहन नहीं होने के कारण, ग्रामीण क्षेत्रों के मरीज आसानी से शहर तक नहीं पहुंच सकते हैं। हम उन रोगियों से मिले, जिन्होंने पड़ोसियों और रिश्तेदारों से वाहन उधार लिए, और अस्पतालों तक पहुंचने के लिए बहुत पैसा खर्च किया।

45 साल के अल्ताफ अहमद शेख को श्रीनगर से 60 किलोमीटर दक्षिण में ताहाब-पुलवामा से मोटरसाइकिल पर उनका बेटा एसएमएचएस अस्पताल ले कर आया। अहमद ने कहा, "हम एक बस में आ सकते थे, अगर स्थिति सामान्य होती।" डॉक्टरों ने उन्हें एक सर्जरी के लिए अक्टूबर में अस्पताल में फिर से आने के लिए कहा।

श्रीनगर शहर के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में से एक श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल। 5 अगस्त, 2019 से में अस्पतालों में रोगी संख्या लगभग आधी हो गई है।

एक अन्य मरीज, अब्दुल सुभान लोन, ने कहा कि उसने टेंगरम के पेइपोरा के अपने गांव से राजमार्ग तक के ईंधन के लिए, अपने पड़ोसी को 200 रुपये का भुगतान किया। उन्होंने कहा, "वहां से, मैंने यहां आने के लिए तीन वाहन बदले ।"

श्रीनगर के अस्पतालों के डॉक्टरों ने इंडियास्पेंड को बताया कि वे आपात स्थिति और प्रसव को छोड़कर सर्जरी कर रहे हैं। आउट-रोगी विभाग के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि सेवाएं कैसे प्रभावित हुई हैं।

जब इंडियास्पेंड ने श्रीनगर के एक निजी अस्पताल शेख उल आलम अस्पताल का दौरा किया, तो वहां कोई नहीं था। आउट-मरीज विभाग (ओपीडी) खाली था और एक डिस्प्ले बोर्ड के अनुसार 20- बिस्तर की सुविधा में केवल तीन रोगियों को भर्ती किया गया था। आमतौर पर अस्पताल के ओपीडी में हर दिन 350 रोगी आते हैं, लेकिन 5 अगस्त से प्रत्येक दिन केवल 50 रोगी आ रहे है। हर महीने 300 सर्जरी के बजाय, यह अगस्त में केवल 50 ही किया गया था।

श्रीनगर के शेख उल आलम अस्पताल की लॉबी। अस्पताल हर महीने औसतन 300 सर्जरी करता है। अगस्त 2019 में, इसमें 40 से कम सर्जरी हुई। जब हमने दौरा किया, तो 20-बिस्तर वाले अस्पताल में केवल तीन मरीज भर्ती थे।

ऐसा इसलिए है, क्योंकि अगर मरीज अस्पताल आते हैं, तो इसके डॉक्टर अब मरीजों को एक सरकारी अस्पताल में भेजते हैं, जिसमें हर समय एक एनेस्थेटिस्ट और सर्जन मौजूद होता है।एक फोन के बिना आपात स्थिति के दौरान डॉक्टरों को खोजना एक जोखिम भरा काम है और अस्पताल इस जोखिम से बचना चाहता है।

इंटरनेट बंद होने से चिकित्सा उपकरण प्रभावित होते हैं।

बोन एंड ज्वाइंट हॉस्पिटल, में एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी,शफी डायग्नोस्टिक सेंटर में,एमआरआई मशीन - यहां सरकारी अस्पतालों में तीन में से एक - ग्लिच से ग्रस्त है, लेकिन इसे इसके सॉफ्टवेयर अपडेट नहीं मिल रहे हैं और कंपनी के तकनीशियन यह पता नहीं लगा पाए हैं कि क्या गलत है।

सामान्य परिस्थितियों में जब कोई समस्या स्पष्ट होती है, तो नैदानिक केंद्र व्हाट्सएप के माध्यम से कंपनी को एमआरआई मशीन की स्क्रीन की तस्वीरें भेजता है। समस्या आमतौर पर "तुरंत हल" हो जाती है,डायग्नोस्टिक सेंटर के कर्मचारियों ने कहा।

दवा की कमी, प्रशीतन समस्याएं

54 साल के इशिताक लोन तो खुश थे, जब हम उनसे शहर के एक केमिस्ट शॉप में मिले थे। लेकिन यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें दवाइयां मिल सकती हैं, वह नाराज हो गए।

चिल्लाते हुए उन्होंने कहा, "मैं पिछले एक सप्ताह से इन दवाओं की तलाश कर रहा हूं, मैंने कम से कम 20-25 दुकानों का दौरा किया है।" वह जिन दवाओं की तलाश कर रहे थे, वे आमतौर पर मधुमेह के लिए निर्धारित हैं-ग्लिज्ड, इनोमेट और जनुमेट।

लोन, उनकी मां और उनके पिता मधुमेह रोगी हैं।4 अगस्त, 2019 को खरीदा गया उनका दवा स्टॉक समाप्त हो गया था। अपने मौखिक मधुमेह दवाओं के बिना, वह अपनी बीमारी का प्रबंधन करने के लिए इंसुलिन की खुराक बढ़ा रहा था।

लोन ने कहा, "पहले से ही, हमारे रक्त शर्करा के परीक्षणों में सामान्य स्तर से अधिक दिखाया गया है, मैं इसे दोबारा जांचना नहीं चाहता क्योंकि यह मुझे तनाव देगा," लोन ने कहा, जो इन दवाओं को खरीदने के लिए जम्मू जाने की योजना बना रहा था।

एक केमिस्ट फारूक अहमद ने पुष्टि की कि अभी जिन दवाओं की आवश्यकता है, वे अनुपलब्ध हैं। उन्होंने कहा, "पिछले 10 दिनों से मधुमेह की दवाओं और इंसुलिन की कमी हो गई है।"

डिस्ट्रीब्यूटर अपने मुख्य दवा आपूर्तिकर्ताओं तक नहीं पहुंच सकते हैं और सुरक्षा चिंताओं के कारण ट्रक ड्राइवरों को ड्रग्स को कश्मीर लाने के लिए मनाने में मुश्किल हो रही है।डिस्ट्रीब्यूटर इश्क़ अहमद ने कहा, "मैं आखिरकार चंडीगढ़ से दवाई ले आया, लेकिन मुझे 5,500 रुपये का चालान (जुर्माना) देना पड़ा, क्योंकि इसकी अनुमति नहीं है।" 

मुश्किल से मिलने वाली वे दवाएं हैं, जिन्हें 24 घंटे के भीतर प्रशीतित और वितरित करने की आवश्यकता होती है, जैसे कि टीके, इंसुलिन और कुछ कैंसर फॉर्मुलेशन। जम्मू और कश्मीर केमिस्ट एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स एसोसिएशन के वितरक और पदाधिकारी मुश्ताक अहमद पुख्ता ने कहा, "ऐसा इसलिए है क्योंकि कूरियर कंपनियों ने कश्मीर में काम करने से इनकार कर दिया है।"

अगर मौजूदा स्थिति बनी रहती है, तो इन दवाओं की निश्चित कमी होगी।

“डिस्ट्रीब्यूटरों ने 10 दिन पहले कश्मीर के ड्रग कंट्रोलर से शिकायत की थी”, पुख्ता कहा, “लेकिन अभी तक कुछ भी नहीं किया गया था।”

टीके, कैंसर की दवाएं और इंसुलिन की आपूर्ति कश्मीर में कम है। जम्मू कश्मीर केमिस्ट एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स एसोसिएशन के डिस्ट्रीब्यूटर और पदाधिकारी, मुश्ताक अहमद पुख्ता कहते हैं, अगर मौजूदा स्थिति बनी रही, तो इन दवाओं की निश्चित कमी होगी।

कैंसर के मरीजों को दवाइयों की तलाश 

श्रीनगर के एक निजी अस्पताल में इलाज कराने वाले कीमोथेरेपी के रोगियों की संख्या में कोई बदलाव नहीं हुआ था, जिनके अधिकारियों ने अनुरोध किया था कि उनके नाम का खुलासा ना किए जाए।जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर उरोजा फैयाज ने कहा, "क्योंकि हमारे मरीज इलाज में देरी नहीं कर सकते,"। "अगर वे एक चक्र भी चूक जाते हैं, तो उन्हें पूरी चीज फिर से दोहरानी होगी।"

संचार नाकाबंदी ने उनकी कठिनाइयों में वृद्धि की है। कीमोथेरेपी दवाओं का ऑडर तब दिया जाता है, जब रोगी को उनकी आवश्यकता होती है और इन्हें ढूंढना आसान नहीं होता है। एक मामले में, अस्पताल ने मेडिकल सप्लायर को बुलाकर हस्तक्षेप किया।

फैयाज ने एक कैंसर रोगी के बारे में बात की, जिसे एक इम्यूनोथेरेपी दवा की आवश्यकता थी, जिसे एक रिश्तेदार से दिल्ली से प्राप्त करना पड़ा। एक सप्ताह हो गया।

फैयाज ने कहा,"यह विशेष रूप से दवा को व्यवस्थित करने के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि कोई फोन या इंटरनेट काम नहीं कर रहे हैं।" उसने जोर देकर कहा कि, कुछ दिनों की देरी" बहुत अधिक हो सकती है।

एक सरकारी अस्पताल के एक ऑन्कोलॉजिस्ट ने नाम न छापने की शर्त पर बोलते हुए कहा कि उसने दिल्ली में पैथोलॉजी लैब में बायोप्सी के नमूने भेजे, लेकिन 5 अगस्त, 2019 के बाद उनके नतीजे कभी नहीं आए। उसने उन मरीजों के लिए फिर से बायोप्सी करवाई, जो स्थानीय मेडिकल लैब में लौट आए, लेकिन कई मरीज वापस नहीं आए। जिन रोगियों का निदान नहीं किया गया था और उन्होंने उपचार शुरू नहीं किया था, अब संभवतः दो या तीन महीनों में वापस आ जाएंगे, उस समय के दौरान कैंसर बढ़ सकती है।

सरकारी अस्पताल में ऑन्कोलॉजी विभाग, जो आमतौर पर एक महीने में 200 मरीजों को देखता है, अगस्त 2019 में केवल 50 रोगियों को देखा है।

आयुष्मान भारत को फुल स्टॉप

613,697 परिवार ( जम्मू और कश्मीर में सभी परिवारों के 29 फीसदी) आयुष्मान भारत के लिए पात्र थे। आयुष्मान भारत वेबसाइट के अनुसार, मई 2019 तक, 11 लाख ई-कार्ड बन चुके थे और 8.7 करोड़ रुपये के 13,000 दावे प्रस्तुत किए गए थे।

राज्य में योजना के उपयोग की सबसे अच्छी दर थी।

अस्पतालों ने आयुष्मान भारत वेबसाइट से कार्ड-धारक के विवरण की पुष्टि करके रोगियों को कैशलेस और मुफ्त में इलाज किया, जिसके बाद अस्पताल को चुने गए रोग पैकेज के आधार पर भुगतान किया गया। यह सात दिनों के भीतर किया जाना आवश्यक है। इंटरनेट के बिना, अस्पताल आयुष्मान भारत वेबसाइट पर लॉग इन नहीं कर पाए हैं, इसलिए वे रोगियों को वापस भेज रहे हैं।

28 अगस्त, 2019 को, कश्मीर में इस योजना के लिए नोडल एजेंसी ने एक परिपत्र जारी किया कि "असाधारण परिस्थितियों" के तहत, दस्तावेजों को सात दिन की अवधि के बाद भी अपलोड किया जा सकता है।

28 अगस्त, 2019 को एक सरकारी नोट में, प्रधान मंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना की वेबसाइट पर रोगी के विवरण को अपडेट करने के लिए सात दिनों की समय सीमा को शिथिल करने में "असाधारण परिस्थितियों" का उल्लेख किया गया है। 5 अगस्त, 2019 से कश्मीर के मरीजों को मुफ्त इलाज नहीं मिला, जब सरकार ने इंटरनेट बंद कर दिया।

हालांकि, अस्पताल के अधिकारियों ने हमने कहा कि यह परिपत्र सत्यापन की समस्याओं का समाधान नहीं करता है, और इसलिए उन्होंने अभी भी आयुष्मान भारत के दावे को फिर से शुरू नहीं किया है।

एक सरकारी अस्पताल के एक कर्मचारी ने कहा, "28 अगस्त से, हमने मरीजों के दस्तावेजों की स्कैनिंग शुरू कर दी है और मैनुअल पंजीकरण भी कराया है, लेकिन उन्हें मुफ्त इलाज नहीं मिल रहा है। जब इंटरनेट कनेक्टिविटी फिर से शुरू होगी तो प्रतिपूर्ति की जाएगी। ”

"मैंने अपने बच्चों को नहीं देखा या उनसे बात नहीं की"

200 बेड के लाल डेड मेटरनिटी अस्पताल के अंदर और बाहर मरीजों और परिचारकों की भीड़ थी। प्रवेश द्वार पर एक डेस्क था जिसपर लिखा था -"उद्घोषक"। यह एक सरल उपाय था जिसे अस्पताल द्वारा डॉक्टरों और परिचारकों के संपर्क में लाने के लिए तैयार किया गया था, जो मोबाइल फोन के बिना भीड़ वाले अस्पताल में पहुंचना असंभव है। घोषणाओं ने उपस्थित लोगों को बताया कि यदि उनके रोगी को उनकी आवश्यकता है या यदि डॉक्टरों को रोगी को देखने के लिए जल्दी जाना चाहिए।दूसरी मंजिल की लॉबी में, दुपट्टे से ढके बालों के साथ हल्के हरे रंग की सलवार कमीज पहने सारा बेगम दूसरे मरीज के परिचारक के साथ बातें कर रही थीं। सारा बेगम ने कहा कि वह अपनी भाभी के साथ थीं, जिनका सीजेरियन सेक्शन था, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उन्हें कब छुट्टी दी जाएगी। वे श्रीनगर से 110 किलोमीटर दूर टिकिपुरा लोलाब से थे।

वे अपने निकटतम सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गए थे, जहां से उन्हें एक एम्बुलेंस मिली थी, जिसने उन्हें लाल डेड तक छोड़ा था। उन्होंने सोचा कि वे तीन दिन में लौट आएंगे, लेकिन छह दिन हो गए थे। सारा बेगम उत्सुक थी। उसने कहा "मैंने अपने बच्चों से बात नहीं की। मैं यह बता नहीं सकती कि मैं कितना दुखी हूं।" उसके तीन बच्चों या पति के साथ संवाद करने, या अन्य रिश्तेदारों को बताने और उन्हें राहत देने का कोई तरीका नहीं है।

अब्दुल कयूम और उनकी पत्नी शाइस्ता श्रीनगर के लाल डेड मैटरनिटी हॉस्पिटल के वेटिंग रूम में एक रिश्तेदार के साथ बैठे हैं। परिवार अस्पताल से 8 किमी दूर नोवगाम में रहता है, लेकिन सुरक्षा बाधाओं और निष्क्रिय फोन के कारण, उन्होंने फॉलो-अप के लिए वापस आने के बदले दो दिनों के लिए अस्पताल में ही रहना पसंद किया। कयूम कहते हैं, "यह 8 किमी हमारे लिए 80 किमी की तरह लगता है।"

डॉक्टरों को अपने मरीज को खोजने में लगने वाला वक्त

2 सितंबर, 2019 को संचार नाकाबंदी के 27 दिन बाद, श्रीनगर के सरकारी मेडिकल कॉलेज में 38 वर्षीय मूत्र रोग विशेषज्ञ, उमर सलीम अख्तर एक महीने से नहीं दिख रहे एक मरीज को लेकर चिंतित थे। 85 वर्षीय गुलाम मोहम्मद को कई बीमारियां थीं - उच्च रक्तचाप, मधुमेह, गुर्दे की विफलता और प्रोस्टेट का बढ़ना।

एक महीने पहले तक, मोहम्मद अक्सर अपने परिवार के सदस्यों के साथ अस्पताल आते थे और, अख्तर से सलाह लेते थे। मोहम्मद या उनके परिवार को फोन करने में असमर्थ, अख्तर जानना चाहता था कि क्या रोगी ठीक था।

12 सर्जरी खत्म करने के बाद, अख्तर के पास अभी भी एक घंटे की ड्यूटी बाकी थी। उन्होंने सुरक्षा बाधाओं को पार करते हुए, मोहम्मद के घर को खोजने का प्रयास किया। वह 2 किमी पैदल चलकर फतेह कदल तक पहुंच गए, जो लॉकडाउन के नीचे का इलाका था।

अख्तर ने याद किया कि मोहम्मद ने बताया था कि वह पुल के उस पार रहते हैं, "मैं पुल पार कर गया, बाईं ओर गया और अगले लेन पर चला गया। शुक्र है कि मैंने मोहम्मद के पोते को उसके सायकल पर देखा। उसने पूछा आप यहां क्या कर रहे हैं, डॉक्टर? ’मैंने उन्हें बताया कि मैं उनके दादा को देखने आया था।” 

अंदर जाने के बाद, अख्तर ने पाया कि गुलाम मोहम्मद ठीक थे। वह वापस अपने अस्पताल चले आए।

5 अगस्त, 2019 से सुरक्षा बंद में रक्षा बंकरों और शहर में स्थित हजारों सुरक्षा कर्मियों के साथ, श्रीनगर के शहर में चलना जोखिम से भरा हुआ था, लेकिन इससे अख्तर को कोई नुकसान नहीं हुआ।

अख्तर वह डॉक्टर है जिसका वीडियो वायरल होने के बाद, उसे गिरफ्तार किया गया था - उसे दो घंटे बाद रिहा कर दिया गया था - 26 अगस्त, 2019 को श्रीनगर के प्रेस एन्क्लेव में, जब उसने मीडिया को बताया कि कैसे संचार नाकाबंदी उसके रोगियों को प्रभावित कर रही थी।

"यह एक विरोध नहीं है, यह एक अनुरोध है," उन्होंने एक तख्ती पर लिखा था।उन्होंने कहा कि वह आयुष्मान भारत के दावों को संसाधित करने के लिए अस्पताल की अक्षमता को ध्यान में लाना चाहते थे क्योंकि इंटरनेट नहीं था।

अख्तर ने पहले कहा था, "इंटरनेट और फोन कनेक्टिविटी की कमी के कारण, हम पिछले तीन हफ्तों से (मुफ्त) उपचार देने में असमर्थ हैं। इसलिए, मैंने अपने रोगियों और अन्य रोगियों को अपनी डायलिसिस, कीमोथेरेपी, आदि के लिए अपनी जेब से खर्च करते देखा है।"

अख्तर के प्रयासों के परिणामस्वरूप 28 अगस्त, 2019 को परिपत्र को सात दिन की समय सीमा में छूट दी गई।

डॉक्टरों की जरुरत ज्यादा, लेकिन वे खाली हैं...

संचार क्लैंपडाउन के कारण होने वाला एक असामान्य दृश्य है कि डॉक्टर और सर्जन घंटों तक बेकार रहते हैं। हमने निजी और सरकारी अस्पतालों में चाय के प्याले पर पीडियाट्रिशियन, कार्डियोलॉजिस्ट, ऑर्थोपेडिक्स और जनरल फिजिशियन से बातचीत की।

बहुत कम सर्जरी और कम आउट पेशेंट के साथ, डॉक्टरों के हाथ में समय होता है, ऐसे समय में जब मरीजों को उनकी जरूरत होती है। श्रीनगर के सरकारी अस्पतालों में यूरोलॉजी के प्रमुख ने कहा, "श्रीनगर के सरकारी अस्पतालों में आठ महीने तक पर्याप्त (दवा) स्टॉक हैं। जो गायब है वे मरीज हैं।" वह पीडियाट्रिक्स के प्रमुख के साथ अस्पताल की कैंटीन में बैठे। सस्ते प्लास्टिक कवर के साथ छह टेबल थे, और डॉक्टरों ने अपना दोपहर का भोजन समाप्त कर दिया था।

यूरोलॉजिस्ट ने कहा, "यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि उन मरीजों का क्या हुआ जो फॉलो-अप के लिए आने वाले थे, लेकिन नहीं आए।" दो युवा सलाहकार शामिल हुए, और डॉक्टरों ने चर्चा की कि डायकोटॉमी से कैसे निपटा जाए: अस्पताल में बेकार डॉक्टरों और घर पर मरीजों को अस्पताल पहुंचने का इंतज़ार करते हैं।

बाल रोग विशेषज्ञ ने कहा, "मैंने एक निजी अस्पताल को यह प्रस्ताव दिया है - अगर उन्हें ऐसे मरीज मिलते हैं जिन्हें सर्जरी की आवश्यकता होती है, तो मैं मुफ्त में सर्जरी करूंगा। अगर एक सर्जरी की लागत 40,000 रुपये है, तो हम अपनी फीस को घटा सकते हैं और केवल उपकरण और दवाओं के लिए शुल्क ले सकते हैं, लागत लगभग 6,000 रुपये तक आ सकती है।"

बाल चिकित्सा के प्रमुख ने तब कुछ कागजात दिखाए - वह स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति और यूनाइटेड किंगडम के लिए एक योजना बना रहे थे। उन्होंने वहां प्रशिक्षण लिया था, लेकिन संयुक्त अरब अमीरात में एक प्रस्ताव को ठुकराते हुए कश्मीर लौटने का विकल्प चुना था। 5 अगस्त के बाद, उन्होंने कहा कि वह छोड़ना चाहते थे।

यह तीन आलेखों की श्रृंखला का पहला भाग है। आप यहां दूसरा भाग और तीसरा भाग यहां पढ़ सकते हैं।

(यदवार इंडियास्पेंड में विशेष संवाददाता हैं। परवेज श्रीनगर में स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 06 सितंबर, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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श्रीनगर:उनकी आंखें सूजी हुई हुई हैं और वे दिल से दुखी हैं। अस्पताल के बिस्तर पर उनके शरीर से डायलिसिस मशीन का ट्यूब लगा हुआ है, जिससे उनका जहर वाला खून शुद्ध होता है और वापस शरीर के भीतर जाता है। शॉल विक्रेता नियाज वानी ने इस बात पर विचार कर रहे हैं कि वह अपने इलाज को कितने दिनों के लिए जारी रख सकते हैं।

26 अगस्त, 2019 तक, श्रीनगर के प्रमुख निजी चिकित्सा संस्थानों में से एक, 50-बेड खैबर अस्पताल में वानी का डायलिसिस मुफ्त था। वह प्रधान मंत्री की प्रमुख चिकित्सा-लागत प्रतिपूर्ति कार्यक्रम, आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत एक ‘गोल्डन कार्ड’ धारक हैं, जिसने अगस्त 2019 तक, जम्मू और कश्मीर में राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अच्छे उपयोग की सूचना दी है।

सितंबर 2018 में शुरू हुआ, आयुष्मान भारत 10 करोड़ से अधिक भारतीय परिवारों को 5 लाख रुपये (500,000 रुपये) तक की मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करता है जो आधिकारिक गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं। पिछले हफ्ते तक वानी उन्ही लोगों में से एक था। इंटरनेट पर दावों को पंजीकृत और संसाधित करने पर असमर्थ होने पर अब अस्पताल ने मुफ्त इलाज को निलंबित दिया है, जिसे सरकार ने 31 दिनों के लिए बंद कर दिया है।

20-बेड वाले डायलिसिस सेंटर में वानी अकेले नहीं थे। हमने जिन भी लोगों से मुलाकात की, लगभग सभी अन्य मरीज गोल्डन कार्ड धारक थे। रिक्शा चालक, मजदूर और अन्य दैनिक मजदूरी पाने वाले लोग अब डायलिसिस कराने के लिए संघर्ष कर रहे थे क्योंकि आयुष्मान भारत सेवाएं बंद हो गईं है। भले ही उन्हें डायलिसिस की आवश्यकता थी, कुछ रोगियों ने इलाज बंद कर दिया था क्योंकि वे इसे वहन नहीं कर सकते थे।

मानवीय आधार पर, खैबर अस्पताल ने 26 अगस्त, 2019 तक गोल्डन कार्ड धारकों के लिए मुफ्त सेवाओं की अनुमति दी है, यह विश्वास करते हुए कि इंटरनेट बहाल हो जाएगा और वे क्लेम कर पैसे वापस ले पाएंगे। लेकिन केंद्र सरकार से मिलने वाले 22 लाख रुपये और 60 लाख रुपये के मौजूदा अवैतनिक बिलों के साथ, अस्पताल अधिकारियों ने कहा कि अब उन्होंने आयुष्मान भारत के लाभार्थियों का मुफ्त इलाज बंद कर दिया है।

श्रीनगर के खैबर अस्पताल की डायलिसिस यूनिट में मरीज। अधिकांश रोगी प्रधान मंत्री जन आरोग्य योजना के लाभार्थी हैं, और उन्हें मुफ्त उपचार प्राप्त हुआ है। 26 अगस्त, 2019 से, जब बढ़ते बिलों के कारण अस्पताल ने मुफ्त चिकित्सा सेवा बंद कर दी, तो मरीजों को भुगतान करना पड़ा। कुछ मरीज इलाज बंद करा रहे हैं।

वानी ने कहा कि उन्हें अब दवाओं को छोड़कर 2,500 रुपये प्रति डायलिसिस या लगभग 20,000 रुपये प्रति माह का भुगतान करना होगा। उन्होंने बिस्तर पर लेटे हुए इंडियास्पेंड से कहा, " इलाज के लिए मुझे अपनी पत्नी के सोने के कान के छल्ले को बेचना पड़ा। मुझे उस जोड़ी के कानों के छल्ले के लिए सिर्फ 15,000 रुपये मिले। यह 1 तोला (सोने का 10 ग्राम) से अधिक था। ये सुनार बहुत होशियार हैं, वे कर्ज नहीं दे रहे हैं बल्कि हमें (हमारा सोना) बेचने के लिए कह रहे हैं।" 

5 अगस्त, 2019 से, जब भारत की संसद ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 (जिसमें 1949 में भारत में शामिल जम्मू-कश्मीर के लिए कुछ अलग शर्तें थीं।) को निरस्त करने के लिए कानून पारित किया। अतिरिक्त 38,000 सैनिकों को तैनात किया और कश्मीर में टेलीफोन और इंटरनेट सेवाओं को निलंबित कर दिया, घाटी में स्वास्थ्य सेवाओं पर इसका प्रभाव स्पष्ट है।

आयुष्मान भारत के मरीज मुफ्त सेवाओं तक नहीं पहुंच सकते। हम जिन निजी और सरकारी अस्पतालों में गए, वे आधे खाली थे। एमआरआई मशीनों को सॉफ्टवेयर अपडेट नहीं मिल सके। कई दवाएं कम आपूर्ति में थीं, और कूरियर सेवाओं को निलंबित कर दिया गया था, जो उन लोगों को दे सकते थे जो दवाइयां लाने के लिए जम्मू, चंडीगढ़ या दिल्ली की यात्रा कर रहे थे। सर्जरी स्थगित या बंद कर दी गई। डॉक्टर्स खाली बैठे थे। जीवन रक्षक प्रक्रियाओं की जरूरत वाले मरीजों की मृत्यु हो सकती है - लेकिन निरंतर मोबाइल और इंटरनेट ब्लैकआउट के कारण जानने का कोई तरीका नहीं है।

संचार नाकाबंदी के एक महीने बाद 4 सितंबर, 2019 को, श्रीनगर के जिला मजिस्ट्रेट और विकास आयुक्त शाहिद चौधरी ने राज्य के सूचना और जनसंपर्क विभाग के आधिकारिक ट्विटर हैंडल को रीट्वीट किया जिसमें कहा गया था: “100 फीसदी लैंडलाइनज का परिचालन किया जाना है; शेष 19 एक्सचेंज आज रात खोले जा रहे हैं ”। चौधरी ने कहा कि मोबाइलों को धीरे-धीरे बहाल किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अस्पताल में सर्जिकल प्रक्रियाएं सामान्य थीं और दवाएं उपलब्ध थीं।

इस आलेख को 5 सितंबर, 2019 को लिखा गया है और तब तक इनमें से ज्यादा चीजें नहीं हुई थी।

खैबर अस्पताल में, वानी ने हमें बताया कि कैसे उसने पर्यटक सीजन के दौरान प्रति दिन 500 रुपये कमाए और अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और जम्मू-कश्मीर को एक राज्य क्षेत्र से केंद्र शासित प्रदेश में रद्द करने के सरकार के फैसले के विरोध में एक अनौपचारिक नागरिक हड़ताल के रुप में कैसे अगस्त 2019 के बाद से उसे कोई आय नहीं हुई, जब घाटी में दुकानें बंद हो गईं और और व्यवसाय ठप्प हो गए।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और जम्मू-कश्मीर को एक राज्य क्षेत्र से केंद्र शासित प्रदेश में बदलने के केंद्र के फैसले के विरोध में 5 अगस्त, 2019 से नागरिक हड़ताल कारण कश्मीर में व्यवसाय और वाणिज्यिक उद्यम बंद हो गए हैं।

वानी ने कहा, "मेरे तीन बच्चों को अपनी पढ़ाई बंद करनी पड़ेगी। अब चावल या सब्जी खरीदने के लिए भी पैसे नहीं हैं।"

वाणी ने पूछा, "गरीब कश्मीरी लोग आयुष्मान भारत का लाभ क्यों नहीं उठा पा रहे हैं?"

“हम नहीं जानते कि कितने लोग मर गए।” 

5 अगस्त, 2019 से पहले, खैबर अस्पताल ने 30-40 एंजियोप्लास्टी की,’ जो कि हृदय में अवरुद्ध रक्त वाहिकाओं का इलाज करने की प्रक्रिया है। नाम ना बताने की शर्त पर, एक वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट ने कहा, पिछले महीने केवल 10 एंजियोप्लास्टी की गई थीं।

सरकारी अस्पतालों, अस्पताल मालिकों और डॉक्टरों के अधिकांश अधिकारियों ने

इंडियास्पेंड

को बताया कि उन्हें सरकार द्वारा मीडिया से बात न करने के निर्देश दिए गए थे।

वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ ने कहा, देखें, दिल के दौरे अभी भी होते हैं। वास्तव में, (अतिरिक्त) तनाव के कारण वे अधिक हो रहे हैं।"

“अब क्या हो गया है कि मरीज अस्पताल तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। यह विशेष रूप से क्लैंपडाउन के बाद पहले तीन हफ्तों में हुआ। कई लोग मारे गए होंगे, लेकिन पता करने का कोई तरीका नहीं है। ”

यहां तक ​​कि श्रीनगर के शीर्ष दो सरकारी अस्पतालों में से एक, श्री महाराजा हरि सिंह (एसएमएचएस) अस्पताल में,डॉक्टरों ने कहा कि न तो तय किए गए सर्जरी वाले मरीज अस्पताल पहुंच सकते हैं और न ही अस्पताल प्रशासन उनसे संपर्क कर सकता है।

परिसर से दूर रहने वाले कई अस्पताल कर्मचारी सुरक्षा बाधाओं के कारण काम पर नहीं आ सकते थे। कई सर्जनों ने कहा कि हमने "उच्च-जोखिम वाले मामलों" पर काम नहीं करने का फैसला किया, क्योंकि आपातकालीन स्थिति में वरिष्ठ डॉक्टरों से संपर्क करने के लिए रेजिडेंट डॉक्टरों के पास कोई रास्ता नहीं था।

अस्पतालों ने काम करने के लिए और काम से अस्पताल के कर्मचारियों के लिए एंबुलेंस का उपयोग करना शुरू कर दिया है क्योंकि कुछ क्षेत्रों में निजी वाहनों को आगे बढ़ने की अनुमति नहीं है। रूट पूर्व निर्धारित हैं, लेकिन आपात स्थिति के दौरान, मोबाइल फोन के बिना, डॉक्टरों तक पहुंचना मुश्किल है।

सुरक्षा चिंताओं और सार्वजनिक परिवहन की कमी के कारण कश्मीर में अस्पतालों से डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों को ले जाने के लिए एम्बुलेंस का उपयोग किया जाता है।

सरकार ने दावा किया है कि घाटी के कुछ हिस्सों में, विशेषकर सरकारी कार्यालयों और पुलिस स्टेशनों में लैंडलाइन को बहाल कर दिया गया है। हालांकि, जब इंडियास्पेंड ने 4 सितंबर, 2019 को इलाके दौरा किया, तब एसएमएचएस अस्पताल में ऐसा कोई लैंडलाइन नहीं था, जो काम कर रहा हो, जबकि आधिकारिक रुप से इसे 1 सितंबर, 2019 को बहाल कर दिया गया था।अस्पताल के कर्मचारियों ने कहा कि अस्पताल के प्रमुख ,परवेज अहमद शाह, जो श्रीनगर में चार अन्य अस्पतालों के प्रमुख हैं, का मोबाइल फोन काम कर रहा था।

इंडियास्पेंड ने शाह से उनके ऑफिस में तीन बार मिलने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने हमसे मिलने या कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशालय में, 4 सितंबर, 2019 को कई लैंडलाइन काम नहीं कर रहे थे। केवल स्वास्थ्य निदेशक और जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारियों के मोबाइल फोन बहाल किए गए थे। इंडियास्पेंड ने पाया कि श्रीनगर और अन्य जिला अस्पतालों में अन्य आपातकालीन कर्मचारियों के पास मोबाइल फोन या लैंडलाइन तक पहुंच नहीं है।

रोगियों की सवारी में अड़चन, वाहन लेते हैं उधार

ग्रामीण कश्मीर के ज्यादातर रोगी अपनी स्वास्थ्य आवश्यकताओं के लिए श्रीनगर के तृतीयक अस्पतालों पर निर्भर हैं। संचार सेवाओं के साथ, सिक्योरिटी चेक और कोई सार्वजनिक परिवहन नहीं होने के कारण, ग्रामीण क्षेत्रों के मरीज आसानी से शहर तक नहीं पहुंच सकते हैं। हम उन रोगियों से मिले, जिन्होंने पड़ोसियों और रिश्तेदारों से वाहन उधार लिए, और अस्पतालों तक पहुंचने के लिए बहुत पैसा खर्च किया।

45 साल के अल्ताफ अहमद शेख को श्रीनगर से 60 किलोमीटर दक्षिण में ताहाब-पुलवामा से मोटरसाइकिल पर उनका बेटा एसएमएचएस अस्पताल ले कर आया। अहमद ने कहा, "हम एक बस में आ सकते थे, अगर स्थिति सामान्य होती।" डॉक्टरों ने उन्हें एक सर्जरी के लिए अक्टूबर में अस्पताल में फिर से आने के लिए कहा।

श्रीनगर शहर के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में से एक श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल। 5 अगस्त, 2019 से में अस्पतालों में रोगी संख्या लगभग आधी हो गई है।

एक अन्य मरीज, अब्दुल सुभान लोन, ने कहा कि उसने टेंगरम के पेइपोरा के अपने गांव से राजमार्ग तक के ईंधन के लिए, अपने पड़ोसी को 200 रुपये का भुगतान किया। उन्होंने कहा, "वहां से, मैंने यहां आने के लिए तीन वाहन बदले ।"

श्रीनगर के अस्पतालों के डॉक्टरों ने

इंडियास्पेंड को बताया कि वे आपात स्थिति और प्रसव को छोड़कर सर्जरी कर रहे हैं। आउट-रोगी विभाग के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि सेवाएं कैसे प्रभावित हुई हैं।

जब इंडियास्पेंड ने श्रीनगर के एक निजी अस्पताल शेख उल आलम अस्पताल का दौरा किया, तो वहां कोई नहीं था। आउट-मरीज विभाग (ओपीडी) खाली था और एक डिस्प्ले बोर्ड के अनुसार 20- बिस्तर की सुविधा में केवल तीन रोगियों को भर्ती किया गया था। आमतौर पर अस्पताल के ओपीडी में हर दिन 350 रोगी आते हैं, लेकिन 5 अगस्त से प्रत्येक दिन केवल 50 रोगी आ रहे है। हर महीने 300 सर्जरी के बजाय, यह अगस्त में केवल 50 ही किया गया था।

श्रीनगर के शेख उल आलम अस्पताल की लॉबी। अस्पताल हर महीने औसतन 300 सर्जरी करता है। अगस्त 2019 में, इसमें 40 से कम सर्जरी हुई। जब हमने दौरा किया, तो 20-बिस्तर वाले अस्पताल में केवल तीन मरीज भर्ती थे।

ऐसा इसलिए है, क्योंकि अगर मरीज अस्पताल आते हैं, तो इसके डॉक्टर अब मरीजों को एक सरकारी अस्पताल में भेजते हैं, जिसमें हर समय एक एनेस्थेटिस्ट और सर्जन मौजूद होता है।एक फोन के बिना आपात स्थिति के दौरान डॉक्टरों को खोजना एक जोखिम भरा काम है और अस्पताल इस जोखिम से बचना चाहता है।

इंटरनेट बंद होने से चिकित्सा उपकरण प्रभावित होते हैं।

बोन एंड ज्वाइंट हॉस्पिटल, में एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी,शफी डायग्नोस्टिक सेंटर में,एमआरआई मशीन - यहां सरकारी अस्पतालों में तीन में से एक - ग्लिच से ग्रस्त है, लेकिन इसे इसके सॉफ्टवेयर अपडेट नहीं मिल रहे हैं और कंपनी के तकनीशियन यह पता नहीं लगा पाए हैं कि क्या गलत है।

सामान्य परिस्थितियों में जब कोई समस्या स्पष्ट होती है, तो नैदानिक केंद्र व्हाट्सएप के माध्यम से कंपनी को एमआरआई मशीन की स्क्रीन की तस्वीरें भेजता है। समस्या आमतौर पर "तुरंत हल" हो जाती है,डायग्नोस्टिक सेंटर के कर्मचारियों ने कहा।

दवा की कमी, प्रशीतन समस्याएं

54 साल के इशिताक लोन तो खुश थे, जब हम उनसे शहर के एक केमिस्ट शॉप में मिले थे। लेकिन यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें दवाइयां मिल सकती हैं, वह नाराज हो गए।

चिल्लाते हुए उन्होंने कहा, "मैं पिछले एक सप्ताह से इन दवाओं की तलाश कर रहा हूं, मैंने कम से कम 20-25 दुकानों का दौरा किया है।" वह जिन दवाओं की तलाश कर रहे थे, वे आमतौर पर मधुमेह के लिए निर्धारित हैं-ग्लिज्ड, इनोमेट और जनुमेट।

लोन, उनकी मां और उनके पिता मधुमेह रोगी हैं।4 अगस्त, 2019 को खरीदा गया उनका दवा स्टॉक समाप्त हो गया था। अपने मौखिक मधुमेह दवाओं के बिना, वह अपनी बीमारी का प्रबंधन करने के लिए इंसुलिन की खुराक बढ़ा रहा था।

लोन ने कहा, "पहले से ही, हमारे रक्त शर्करा के परीक्षणों में सामान्य स्तर से अधिक दिखाया गया है, मैं इसे दोबारा जांचना नहीं चाहता क्योंकि यह मुझे तनाव देगा," लोन ने कहा, जो इन दवाओं को खरीदने के लिए जम्मू जाने की योजना बना रहा था।

एक केमिस्ट फारूक अहमद ने पुष्टि की कि अभी जिन दवाओं की आवश्यकता है, वे अनुपलब्ध हैं। उन्होंने कहा, "पिछले 10 दिनों से मधुमेह की दवाओं और इंसुलिन की कमी हो गई है।"

डिस्ट्रीब्यूटर अपने मुख्य दवा आपूर्तिकर्ताओं तक नहीं पहुंच सकते हैं और सुरक्षा चिंताओं के कारण ट्रक ड्राइवरों को ड्रग्स को कश्मीर लाने के लिए मनाने में मुश्किल हो रही है।डिस्ट्रीब्यूटर इश्क़ अहमद ने कहा, "मैं आखिरकार चंडीगढ़ से दवाई ले आया, लेकिन मुझे 5,500 रुपये का चालान (जुर्माना) देना पड़ा, क्योंकि इसकी अनुमति नहीं है।" 

मुश्किल से मिलने वाली वे दवाएं हैं, जिन्हें 24 घंटे के भीतर प्रशीतित और वितरित करने की आवश्यकता होती है, जैसे कि टीके, इंसुलिन और कुछ कैंसर फॉर्मुलेशन। जम्मू और कश्मीर केमिस्ट एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स एसोसिएशन के वितरक और पदाधिकारी मुश्ताक अहमद पुख्ता ने कहा, "ऐसा इसलिए है क्योंकि कूरियर कंपनियों ने कश्मीर में काम करने से इनकार कर दिया है।"

अगर मौजूदा स्थिति बनी रहती है, तो इन दवाओं की निश्चित कमी होगी।

“डिस्ट्रीब्यूटरों ने 10 दिन पहले कश्मीर के ड्रग कंट्रोलर से शिकायत की थी”, पुख्ता कहा, “लेकिन अभी तक कुछ भी नहीं किया गया था।”

टीके, कैंसर की दवाएं और इंसुलिन की आपूर्ति कश्मीर में कम है। जम्मू कश्मीर केमिस्ट एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स एसोसिएशन के डिस्ट्रीब्यूटर और पदाधिकारी, मुश्ताक अहमद पुख्ता कहते हैं, अगर मौजूदा स्थिति बनी रही, तो इन दवाओं की निश्चित कमी होगी।

कैंसर के मरीजों को दवाइयों की तलाश 

श्रीनगर के एक निजी अस्पताल में इलाज कराने वाले कीमोथेरेपी के रोगियों की संख्या में कोई बदलाव नहीं हुआ था, जिनके अधिकारियों ने अनुरोध किया था कि उनके नाम का खुलासा ना किए जाए।जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर उरोजा फैयाज ने कहा, "क्योंकि हमारे मरीज इलाज में देरी नहीं कर सकते,"। "अगर वे एक चक्र भी चूक जाते हैं, तो उन्हें पूरी चीज फिर से दोहरानी होगी।"

संचार नाकाबंदी ने उनकी कठिनाइयों में वृद्धि की है। कीमोथेरेपी दवाओं का ऑडर तब दिया जाता है, जब रोगी को उनकी आवश्यकता होती है और इन्हें ढूंढना आसान नहीं होता है। एक मामले में, अस्पताल ने मेडिकल सप्लायर को बुलाकर हस्तक्षेप किया।

फैयाज ने एक कैंसर रोगी के बारे में बात की, जिसे एक इम्यूनोथेरेपी दवा की आवश्यकता थी, जिसे एक रिश्तेदार से दिल्ली से प्राप्त करना पड़ा। एक सप्ताह हो गया।

फैयाज ने कहा,"यह विशेष रूप से दवा को व्यवस्थित करने के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि कोई फोन या इंटरनेट काम नहीं कर रहे हैं।" उसने जोर देकर कहा कि, कुछ दिनों की देरी" बहुत अधिक हो सकती है।

एक सरकारी अस्पताल के एक ऑन्कोलॉजिस्ट ने नाम न छापने की शर्त पर बोलते हुए कहा कि उसने दिल्ली में पैथोलॉजी लैब में बायोप्सी के नमूने भेजे, लेकिन 5 अगस्त, 2019 के बाद उनके नतीजे कभी नहीं आए। उसने उन मरीजों के लिए फिर से बायोप्सी करवाई, जो स्थानीय मेडिकल लैब में लौट आए, लेकिन कई मरीज वापस नहीं आए। जिन रोगियों का निदान नहीं किया गया था और उन्होंने उपचार शुरू नहीं किया था, अब संभवतः दो या तीन महीनों में वापस आ जाएंगे, उस समय के दौरान कैंसर बढ़ सकती है।

सरकारी अस्पताल में ऑन्कोलॉजी विभाग, जो आमतौर पर एक महीने में 200 मरीजों को देखता है, अगस्त 2019 में केवल 50 रोगियों को देखा है।

आयुष्मान भारत को फुल स्टॉप

613,697 परिवार ( जम्मू और कश्मीर में सभी परिवारों के 29 फीसदी) आयुष्मान भारत के लिए पात्र थे। आयुष्मान भारत

वेबसाइट

के अनुसार, मई 2019 तक, 11 लाख ई-कार्ड बन चुके थे और 8.7 करोड़ रुपये के 13,000 दावे प्रस्तुत किए गए थे।

राज्य में योजना के

उपयोग की सबसे अच्छी दर

थी।

अस्पतालों ने आयुष्मान भारत वेबसाइट से कार्ड-धारक के विवरण की पुष्टि करके रोगियों को कैशलेस और मुफ्त में इलाज किया, जिसके बाद अस्पताल को चुने गए रोग पैकेज के आधार पर भुगतान किया गया। यह सात दिनों के भीतर किया जाना आवश्यक है। इंटरनेट के बिना, अस्पताल आयुष्मान भारत वेबसाइट पर लॉग इन नहीं कर पाए हैं, इसलिए वे रोगियों को वापस भेज रहे हैं।

28 अगस्त, 2019 को, कश्मीर में इस योजना के लिए नोडल एजेंसी ने एक परिपत्र जारी किया कि "असाधारण परिस्थितियों" के तहत, दस्तावेजों को सात दिन की अवधि के बाद भी अपलोड किया जा सकता है।

28 अगस्त, 2019 को एक सरकारी नोट में, प्रधान मंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना की वेबसाइट पर रोगी के विवरण को अपडेट करने के लिए सात दिनों की समय सीमा को शिथिल करने में "असाधारण परिस्थितियों" का उल्लेख किया गया है। 5 अगस्त, 2019 से कश्मीर के मरीजों को मुफ्त इलाज नहीं मिला, जब सरकार ने इंटरनेट बंद कर दिया।

हालांकि, अस्पताल के अधिकारियों ने हमने कहा कि यह परिपत्र सत्यापन की समस्याओं का समाधान नहीं करता है, और इसलिए उन्होंने अभी भी आयुष्मान भारत के दावे को फिर से शुरू नहीं किया है।

एक सरकारी अस्पताल के एक कर्मचारी ने कहा, "28 अगस्त से, हमने मरीजों के दस्तावेजों की स्कैनिंग शुरू कर दी है और मैनुअल पंजीकरण भी कराया है, लेकिन उन्हें मुफ्त इलाज नहीं मिल रहा है। जब इंटरनेट कनेक्टिविटी फिर से शुरू होगी तो प्रतिपूर्ति की जाएगी। ”

"मैंने अपने बच्चों को नहीं देखा या उनसे बात नहीं की"

200 बेड के लाल डेड मेटरनिटी अस्पताल के अंदर और बाहर मरीजों और परिचारकों की भीड़ थी। प्रवेश द्वार पर एक डेस्क था जिसपर लिखा था -"उद्घोषक"। यह एक सरल उपाय था जिसे अस्पताल द्वारा डॉक्टरों और परिचारकों के संपर्क में लाने के लिए तैयार किया गया था, जो मोबाइल फोन के बिना भीड़ वाले अस्पताल में पहुंचना असंभव है। घोषणाओं ने उपस्थित लोगों को बताया कि यदि उनके रोगी को उनकी आवश्यकता है या यदि डॉक्टरों को रोगी को देखने के लिए जल्दी जाना चाहिए।दूसरी मंजिल की लॉबी में, दुपट्टे से ढके बालों के साथ हल्के हरे रंग की सलवार कमीज पहने सारा बेगम दूसरे मरीज के परिचारक के साथ बातें कर रही थीं। सारा बेगम ने कहा कि वह अपनी भाभी के साथ थीं, जिनका सीजेरियन सेक्शन था, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उन्हें कब छुट्टी दी जाएगी। वे श्रीनगर से 110 किलोमीटर दूर टिकिपुरा लोलाब से थे।

वे अपने निकटतम सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गए थे, जहां से उन्हें एक एम्बुलेंस मिली थी, जिसने उन्हें लाल डेड तक छोड़ा था। उन्होंने सोचा कि वे तीन दिन में लौट आएंगे, लेकिन छह दिन हो गए थे। सारा बेगम उत्सुक थी। उसने कहा "मैंने अपने बच्चों से बात नहीं की। मैं यह बता नहीं सकती कि मैं कितना दुखी हूं।" उसके तीन बच्चों या पति के साथ संवाद करने, या अन्य रिश्तेदारों को बताने और उन्हें राहत देने का कोई तरीका नहीं है।

अब्दुल कयूम और उनकी पत्नी शाइस्ता श्रीनगर के लाल डेड मैटरनिटी हॉस्पिटल के वेटिंग रूम में एक रिश्तेदार के साथ बैठे हैं। परिवार अस्पताल से 8 किमी दूर नोवगाम में रहता है, लेकिन सुरक्षा बाधाओं और निष्क्रिय फोन के कारण, उन्होंने फॉलो-अप के लिए वापस आने के बदले दो दिनों के लिए अस्पताल में ही रहना पसंद किया। कयूम कहते हैं, "यह 8 किमी हमारे लिए 80 किमी की तरह लगता है।"

डॉक्टरों को अपने मरीज को खोजने में लगने वाला वक्त

2 सितंबर, 2019 को संचार नाकाबंदी के 27 दिन बाद, श्रीनगर के सरकारी मेडिकल कॉलेज में 38 वर्षीय मूत्र रोग विशेषज्ञ, उमर सलीम अख्तर एक महीने से नहीं दिख रहे एक मरीज को लेकर चिंतित थे। 85 वर्षीय गुलाम मोहम्मद को कई बीमारियां थीं - उच्च रक्तचाप, मधुमेह, गुर्दे की विफलता और प्रोस्टेट का बढ़ना।

एक महीने पहले तक, मोहम्मद अक्सर अपने परिवार के सदस्यों के साथ अस्पताल आते थे और, अख्तर से सलाह लेते थे। मोहम्मद या उनके परिवार को फोन करने में असमर्थ, अख्तर जानना चाहता था कि क्या रोगी ठीक था।

12 सर्जरी खत्म करने के बाद, अख्तर के पास अभी भी एक घंटे की ड्यूटी बाकी थी। उन्होंने सुरक्षा बाधाओं को पार करते हुए, मोहम्मद के घर को खोजने का प्रयास किया। वह 2 किमी पैदल चलकर फतेह कदल तक पहुंच गए, जो लॉकडाउन के नीचे का इलाका था।

अख्तर ने याद किया कि मोहम्मद ने बताया था कि वह पुल के उस पार रहते हैं, "मैं पुल पार कर गया, बाईं ओर गया और अगले लेन पर चला गया। शुक्र है कि मैंने मोहम्मद के पोते को उसके सायकल पर देखा। उसने पूछा आप यहां क्या कर रहे हैं, डॉक्टर? ’मैंने उन्हें बताया कि मैं उनके दादा को देखने आया था।” 

अंदर जाने के बाद, अख्तर ने पाया कि गुलाम मोहम्मद ठीक थे। वह वापस अपने अस्पताल चले आए।

5 अगस्त, 2019 से सुरक्षा बंद में रक्षा बंकरों और शहर में स्थित हजारों सुरक्षा कर्मियों के साथ, श्रीनगर के शहर में चलना जोखिम से भरा हुआ था, लेकिन इससे अख्तर को कोई नुकसान नहीं हुआ।

अख्तर वह डॉक्टर है जिसका

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वायरल होने के बाद, उसे गिरफ्तार किया गया था - उसे दो घंटे बाद रिहा कर दिया गया था - 26 अगस्त, 2019 को श्रीनगर के प्रेस एन्क्लेव में, जब उसने मीडिया को बताया कि कैसे संचार नाकाबंदी उसके रोगियों को प्रभावित कर रही थी।

"यह एक विरोध नहीं है, यह एक अनुरोध है," उन्होंने एक तख्ती पर लिखा था।उन्होंने कहा कि वह आयुष्मान भारत के दावों को संसाधित करने के लिए अस्पताल की अक्षमता को ध्यान में लाना चाहते थे क्योंकि इंटरनेट नहीं था।

अख्तर ने पहले कहा था, "इंटरनेट और फोन कनेक्टिविटी की कमी के कारण, हम पिछले तीन हफ्तों से (मुफ्त) उपचार देने में असमर्थ हैं। इसलिए, मैंने अपने रोगियों और अन्य रोगियों को अपनी डायलिसिस, कीमोथेरेपी, आदि के लिए अपनी जेब से खर्च करते देखा है।"

अख्तर के प्रयासों के परिणामस्वरूप 28 अगस्त, 2019 को परिपत्र को सात दिन की समय सीमा में छूट दी गई।

डॉक्टरों की जरुरत ज्यादा, लेकिन वे खाली हैं...

संचार क्लैंपडाउन के कारण होने वाला एक असामान्य दृश्य है कि डॉक्टर और सर्जन घंटों तक बेकार रहते हैं। हमने निजी और सरकारी अस्पतालों में चाय के प्याले पर पीडियाट्रिशियन, कार्डियोलॉजिस्ट, ऑर्थोपेडिक्स और जनरल फिजिशियन से बातचीत की।

बहुत कम सर्जरी और कम आउट पेशेंट के साथ, डॉक्टरों के हाथ में समय होता है, ऐसे समय में जब मरीजों को उनकी जरूरत होती है। श्रीनगर के सरकारी अस्पतालों में यूरोलॉजी के प्रमुख ने कहा, "श्रीनगर के सरकारी अस्पतालों में आठ महीने तक पर्याप्त (दवा) स्टॉक हैं। जो गायब है वे मरीज हैं।" वह पीडियाट्रिक्स के प्रमुख के साथ अस्पताल की कैंटीन में बैठे। सस्ते प्लास्टिक कवर के साथ छह टेबल थे, और डॉक्टरों ने अपना दोपहर का भोजन समाप्त कर दिया था।

यूरोलॉजिस्ट ने कहा, "यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि उन मरीजों का क्या हुआ जो फॉलो-अप के लिए आने वाले थे, लेकिन नहीं आए।" दो युवा सलाहकार शामिल हुए, और डॉक्टरों ने चर्चा की कि डायकोटॉमी से कैसे निपटा जाए: अस्पताल में बेकार डॉक्टरों और घर पर मरीजों को अस्पताल पहुंचने का इंतज़ार करते हैं।

बाल रोग विशेषज्ञ ने कहा, "मैंने एक निजी अस्पताल को यह प्रस्ताव दिया है - अगर उन्हें ऐसे मरीज मिलते हैं जिन्हें सर्जरी की आवश्यकता होती है, तो मैं मुफ्त में सर्जरी करूंगा। अगर एक सर्जरी की लागत 40,000 रुपये है, तो हम अपनी फीस को घटा सकते हैं और केवल उपकरण और दवाओं के लिए शुल्क ले सकते हैं, लागत लगभग 6,000 रुपये तक आ सकती है।"

बाल चिकित्सा के प्रमुख ने तब कुछ कागजात दिखाए - वह स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति और यूनाइटेड किंगडम के लिए एक योजना बना रहे थे। उन्होंने वहां प्रशिक्षण लिया था, लेकिन संयुक्त अरब अमीरात में एक प्रस्ताव को ठुकराते हुए कश्मीर लौटने का विकल्प चुना था। 5 अगस्त के बाद, उन्होंने कहा कि वह छोड़ना चाहते थे।

यह तीन आलेखों की श्रृंखला का पहला भाग है। आप यहां दूसरा भाग और तीसरा भाग यहां पढ़ सकते हैं।

(यदवार इंडियास्पेंड में विशेष संवाददाता हैं। परवेज श्रीनगर में स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 06 सितंबर, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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