टीबी के खिलाफ भारत की लड़ाई में फार्मेसी कर सकते हैं मदद

मुंबई: टीबी स्क्रीनिंग में प्रशिक्षित फार्मेसियों और डॉक्टरों द्वारा सही जगह पर निर्दिष्ट करना करने से

भारत में टीबी बीमारी का पता लगाने और निदान में काफी सुधार किया जा सकता है। यह जानकारी एक हालिया अध्ययन में सामने आई है।

अप्रशिक्षित फार्मेसी तक पहुचने की तुलना में जब टीबी के लक्षणों वाले रोगी ऐसे फार्मेसियों तक पहुंचे, जहां के कर्मचारी प्रशिक्षित थे, तब टीबी स्क्रीनिंग और डॉक्टर रेफरल में आठ गुना वृद्धि हुई। टीबी के लिए माइक्रोबायोलॉजिकल पुष्टिकरण लगभग सात गुना बढ़ गया और टीबी पंजीकरण 62 गुना अधिक हो गया। यह निष्कर्ष गैर-संचारी रोगों में पर केंद्रित पत्रिका, ‘बीएमजे ग्लोबल हेल्थ’ द्वारा किए गए अध्ययन में कहा गया है।

वैश्विक आबादी के 18 फीसदी के साथ, भारत वर्तमान में दुनिया में टीबी मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा है-23 फीसदी या लगभग सभी मामलों का एक चौथाई।

यह अध्ययन पूर्वी राज्य बिहार की राजधानी पटना में आयोजित एक हस्तक्षेप पर आधारित था, जहां 105 प्रशिक्षित फार्मेसियों ने 255 टीबी के मामलों का सफलतापूर्वक निदान किया था। यह नियंत्रण समूह में 699 अप्रशिक्षित फार्मेसियों द्वारा टीबी के लक्षणों के साथ पहचाने जाने वाले रोगियों (83) की तीन गुना संख्या थी।

रिटेल फार्मेसीज़ ( देश भर में लगभग 750,000 ) अक्सर संभावित रोगियों के लिए चिकित्सा संपर्क का पहला बिंदु प्रदान करती हैं। यह देखते हुए कि टीबी के लिए उपचार, जो ठीक होने योग्य बीमारी है, लगभग 59 फीसदी रोगियों तक पहुंचती है, टीबी के खिलाफ भारत की लड़ाई में फार्मेसी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने मार्च 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

अध्ययन के लेखकों में से एक, अमृता दफ्तरी ने कहा, "संभावित रोगियों की मदद करने में फार्मासिस्टों की ‘गेटकीपर्स’ की तरह भूमिका है। वे आम तौर पर कई लोगों के लिए संपर्क का पहला बिंदु होते हैं। जब वे किसी चिकित्सा स्थिति का विकास करते हैं तो लोग उनके पास जाते हैं।"

जिन रोगियों को प्रशिक्षित फार्मासिस्ट द्वारा संदर्भित किया गया था, उन्होंने सामान्य की तुलना में 42 फीसदी ज्यादा बार डॉक्टरों तक पहुंचे, जैसा कि अध्ययन में बताया गया है और 2012 के सरकारी निर्देश के बाद निजी चिकित्सा सेवा प्रदाताओं के लिए अनिवार्य टीबी पंजीकरण, हस्तक्षेप समूह द्वारा संदर्भित लोगों के बीच 62 गुना अधिक था।

छाती एक्स-रे, थूक स्मीयर और जीनएक्सपर्ट परीक्षण के लिए पूर्णता दर ( टीबी निदान में तीन महत्वपूर्ण चरण ) उन लोगों के लिए अधिक थे, जिन्हें क्रमशः 37 फीसदी, 13 फीसदी और 23 फीसदी के मार्जिन से प्रशिक्षित फार्मासिस्टों से रेफरल मिला था।

निजी क्षेत्र की भागीदारी क्यों?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में अनुमानित 28 लाख पुष्टि हुए मामलों के साथ टीबी भारत की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में से एक है। माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस बैक्टीरिया के कारण, इसका संचरण वायुजनित होता है और तब होता है जब कोई संक्रमित व्यक्ति खांसता या छींकता है।

भारत का टीबी बोझ दुनिया में सबसे अधिक है, जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया है, इसके बाद इंडोनेशिया (10 फीसदी) और चीन (10 फीसदी) का स्थान है।

मार्च, 2017 में लॉन्च किए गए ‘नेशनल स्ट्रेटेजिक प्लान फॉर ट्यूबरकुलोसिस एलिमिनेशन’ ने भारत में टीबी के उन्मूलन में निजी क्षेत्र की भूमिका को विशेष महत्व दिया। स्क्रीनिंग और रेफरल हस्तक्षेप निजी खुदरा फार्मेसियों को शामिल करते हुए इस योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सार्वजनिक-स्वास्थ्य सुविधाएं, जिनके पास भारत में टीबी के मामलों की विशेषज्ञता, स्थिति को बदलने के लिए कम राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ पहले से ही प्रभावित हैं, नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन द्वारा 2011 के एक अध्ययन में कहा गया है।

2011 के अध्ययन में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बीमारी का इलाज करने के लिए खराब चिकित्सा बुनियादी ढांचा है और निजी स्वास्थ्य सेवा इकाइयां अनियंत्रित रहती हैं । साथ ही यह भी कहा गया है कि भारत में टीबी देखभाल के साथ पहली पंक्ति और दूसरी पंक्ति की एंटी-टीबी दवाओं का ‘अराजक’ उपयोग दूसरी समस्या थी।

पटना में टीबी दर उप-सहारा अफ्रीका से अधिक

स्वास्थ्य, आय और साक्षरता की औसत से कम दर के साथ, पटना प्रति 100,000 जनसंख्या पर 326 टीबी की घटना की रिपोर्ट करता है। यह उप-सहारा अफ्रीका (237) की घटना दर और 204 के भारतीय औसत से अधिक है। इसने शहर को परियोजना के लिए एक वाजिब कारण दिया।

यह हस्तक्षेप पटना में चल रहे "पब्लिक-प्राइवेट मिक्स प्रोग्राम" के भीतर किया गया। "पीपीएम पर पिग्गीबैकिंग ने पटना में निजी फार्मेसी प्रदाताओं की एक बड़ी संख्या तक पहुंच प्रदान की," जैसा कि दफ्तरी कहती हैं।

कार्यक्रम में शामिल किए गए 804 निजी फार्मेसियों में से, 105 के एक यादृच्छिक नमूने ने पायलट इवेंट में भाग लिया। उन्हें चरणों में भर्ती किया गया था: 30 फार्मासिस्टों का पहला सेट दिसंबर 2015 में, दूसरा फरवरी 2016 में प्रशिक्षित किया गया था, और मई 2016 में 45 फार्मासिस्टों का अंतिम सेट।

उनके प्रशिक्षण में पांच घटक शामिल थे:(i) संकेत लक्षण के माध्यम से टीबी की पहचान करना,स्क्रीनिंग और नैदानिक परीक्षण, और एंटीबायोटिक दवाओं का प्रबंधन, (II) डॉक्टर के परामर्श और छाती के एक्स-रे के लिए,संभावित टीबी रोगियों का रेफरल, (iii) हर पूर्ण डॉक्टर के रेफरल और चेस्ट टेस्ट के लिए 50 रुपये का वित्तीय प्रोत्साहन देने की पेशकश,(iv) सकारात्मक निदान मामलों के लिए 200 रुपये का प्रोत्साहन जोड़ा गया, और (v) फार्मासिस्ट के प्रशिक्षण और स्क्रीनिंग प्रक्रिया को सुदृढ़ करने के लिए एसएमएस रिमाइंडर्स के साथ फील्ड सपोर्ट।

समानांतर में, रेफरल दरों के लिए 804 में से 699 फार्मेसियों, जिन्होंने प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया था,उन्हें देखे गए थे।

प्रशिक्षित समूह में 725 फीसदी ज्यादा मामले

हस्तक्षेप समूह में 81 फीसदी या 84 फार्मेसियों ने टीबी स्क्रीनिंग के लिए कम से कम एक ग्राहक का संदर्भित किया, इसके बाद दो में से एक मार्ग के लिए कहा गया:छाती का एक्स-रे और एक चिकित्सा परामर्श, या एक प्रत्यक्ष चिकित्सक परामर्श।

कुल मिलाकर, प्रशिक्षित समूह ने लक्षणों के आधार पर 1,674 संभावित टीबी रोगियों की पहचान की, जबकि अप्रशिक्षित फार्मासिस्ट केवल 203 (725 फीसदी से कम) की पहचान कर सके, जैसा कि अध्ययन में कहा गया है। पहचान किए गए लोगों में से हस्तक्षेप समूह द्वारा निर्दिष्ट 255 मामले और नियंत्रण समूह से 83 मामले, टीबी सूचनाओं की पुष्टि के रूप में पंजीकृत किए गए थे।

एक टीबी अधिसूचना तब बनाई जाती है जब चिकित्सक या निदानकर्ता किसी व्यक्ति को राष्ट्रीय टीबी निगरानी प्रणाली और फिर डब्ल्यूएचओ में लक्षणों के साथ पंजीकृत करता है।

टीबी के निदान के अंतिम चरण में माइक्रोबायोलोजिकल टेस्ट (एमबी) शामिल हैं - हस्तक्षेप समूह ने 24 फीसदी एमबी पॉजिटिव मामलों (61) की सूचना दी, जबकि नियंत्रण समूह ने 11 फीसदी एमबी पॉजिटिव मामलों (9) की सूचना दी है।

हस्तक्षेप का नतीजा

अध्ययन में पाया गया है कि समय-समय पर समूह चर्चा और निजी साक्षात्कार ने फार्मासिस्टों के लिए हस्तक्षेप कार्यक्रम को बेहतर बनाने में मदद की है। स्क्रीनिंग टेस्ट में ‘वितरित’ करने की नई अधिग्रहीत क्षमता ने प्रशिक्षित फार्मासिस्टों को टीबी रोगियों के प्रति पेशेवर जिम्मेदारी का एक बड़ा एहसास दिया।

अध्ययन में उद्धृत एक अनाम फार्मासिस्ट ने कहा, "मुझे अच्छा लगता है कि मैं अपने समाज की सेवा करने में सक्षम हूं। लोग लाभान्वित हो रहे हैं। हम देखभाल करने में सक्षम हैं और लोग बेहतर हो रहे हैं।”

शहर के अपेक्षाकृत गरीब वर्गों में ग्राहकों को कवर करने वाले प्रदाताओं ने रोगियों के साथ बढ़ते संबंध की सूचना दी, जो कि अक्सर दोहराए यात्राओं के माध्यम से हुआ है।

सफल फार्मासिस्ट रेफरल को प्रशिक्षित फार्मासिस्टों के लिए ग्राहकों के बीच विश्वास की भावना के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था।

नि: शुल्क टीबी स्क्रीनिंग ने छाती के एक्स-रे रेफरल को बढ़ाया और और इनसे सकारात्मक परिणाम आए, बदले में, डॉक्टर रेफरल को बढ़ाया।

इन पहलों को फार्मासिस्टों के बीच 81 फीसदी रेफरल दर हासिल करने के लिए प्रमुख सुविधा के रूप में देखा गया, विशेष रूप से 2003, 2014, 2016 और 2018 में इसी तरह के अध्ययनों की तुलना में, जिसमें लगभग 30-40 फीसदी की रेफरल दर देखी गई थी।

दफ्तरी ने समझाया कि "यह एक व्यावहारिक प्रक्रिया थी, जो चल रहे पीपीएम कार्यक्रम में निहित है, डॉक्टरों और परीक्षण प्रयोगशालाओं की उनकी सूची तक पहुंच प्रदान करती है। निजी फार्मेसी क्षेत्र को टैप करने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन महत्वपूर्ण थे। सफल चिकित्सक रेफरल और निदान पर अपडेट के साथ फार्मासिस्टों के लिए व्यक्तिगत प्रतिक्रिया प्रणाली ने भी मदद की।"

कार्यक्रम में बदलाव की क्या- क्या जरूरत है?

अध्ययन समूह के फार्मासिस्टों ने कभी-कभी उन रोगियों को रेफरल देने में देरी की, जिन्होंने निरंतर उपचार के बजाय अल्पकालिक एंटीबायोटिक कोर्स की मांग की थी। दफ्तरी कहती हैं, इस का एक समाधान "रोगाणुरोधी प्रबंधन और दवा प्रतिरोध के खतरे के बारे में आम जनता की जागरूकता का निर्माण" हो सकता है।

एक अन्य बाधा प्रलेखन प्रक्रिया थी। डॉक्टर परामर्श के लिए मरीजों को मौखिक रूप से संदर्भित करने के लिए कई फार्मेसियों में यह मानक अभ्यास था। इन मामलों को प्रोग्राम टैली में अपना रास्ता नहीं मिला।

कुछ ग्राहकों को अनुबंधित चिकित्सक या प्रयोगशाला का दौरा करने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी। अध्ययन में उद्धृत एक फार्मासिस्ट ने कहा, "अगर मैं यहां से [दूर] भेजता हूं, तो मरीज कहेंगे कि वे परीक्षण पर पैसा बचा सकते हैं, लेकिन परिवहन से उन्हें अधिक खर्च होगा। इसलिए वे पास की लैब में जांच करवाना बेहतर समझते हैं।"

पहचाने गए कुछ अन्य बाधाओं में फार्मेसियों के लिए कार्य बोझ में वृद्धि, पहचान योग्य लक्षणों की अनुपस्थिति, डॉक्टर के परामर्श शुल्क और जहां संदर्भित किया गया है, वहां अज्ञात चिकित्सक या प्रयोगशाला के साथ ग्राहक की असुविधा शामिल है, जैसा कि अध्ययन में पाया गया है।

दफ्तरी कहती हैं, "सरकार को लोगों द्वारा भरोसा करने वाले फार्मेसियों और केमिस्टों पर ध्यान देना चाहिए। टीबी रोगियों की जांच और उन्हें सक्षम करने के लिए फार्मेसी प्रशिक्षण में अधिक निवेश होना चाहिए।"

यह लेख पहली बार यहां HealthCheck पर प्रकाशित हुआ है।

(साहा, पुणे के ‘सिम्बायोसिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स’ में एमएससी के छात्र हैं और इंडियास्पेंड में इंटर्न हैं।)

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

मुंबई: टीबी स्क्रीनिंग में प्रशिक्षित फार्मेसियों और डॉक्टरों द्वारा सही जगह पर निर्दिष्ट करना करने से

भारत में टीबी बीमारी का पता लगाने और निदान में काफी सुधार किया जा सकता है। यह जानकारी एक हालिया अध्ययन में सामने आई है।

अप्रशिक्षित फार्मेसी तक पहुचने की तुलना में जब टीबी के लक्षणों वाले रोगी ऐसे फार्मेसियों तक पहुंचे, जहां के कर्मचारी प्रशिक्षित थे, तब टीबी स्क्रीनिंग और डॉक्टर रेफरल में आठ गुना वृद्धि हुई। टीबी के लिए माइक्रोबायोलॉजिकल पुष्टिकरण लगभग सात गुना बढ़ गया और टीबी पंजीकरण 62 गुना अधिक हो गया। यह निष्कर्ष गैर-संचारी रोगों में पर केंद्रित पत्रिका, ‘बीएमजे ग्लोबल हेल्थ’ द्वारा किए गए अध्ययन में कहा गया है।

वैश्विक आबादी के 18 फीसदी के साथ, भारत वर्तमान में दुनिया में टीबी मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा है-23 फीसदी या लगभग सभी मामलों का एक चौथाई।

यह अध्ययन पूर्वी राज्य बिहार की राजधानी पटना में आयोजित एक हस्तक्षेप पर आधारित था, जहां 105 प्रशिक्षित फार्मेसियों ने 255 टीबी के मामलों का सफलतापूर्वक निदान किया था। यह नियंत्रण समूह में 699 अप्रशिक्षित फार्मेसियों द्वारा टीबी के लक्षणों के साथ पहचाने जाने वाले रोगियों (83) की तीन गुना संख्या थी।

रिटेल फार्मेसीज़ ( देश भर में लगभग 750,000 ) अक्सर संभावित रोगियों के लिए चिकित्सा संपर्क का पहला बिंदु प्रदान करती हैं। यह देखते हुए कि टीबी के लिए उपचार, जो ठीक होने योग्य बीमारी है, लगभग 59 फीसदी रोगियों तक पहुंचती है, टीबी के खिलाफ भारत की लड़ाई में फार्मेसी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने मार्च 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

अध्ययन के लेखकों में से एक, अमृता दफ्तरी ने कहा, "संभावित रोगियों की मदद करने में फार्मासिस्टों की ‘गेटकीपर्स’ की तरह भूमिका है। वे आम तौर पर कई लोगों के लिए संपर्क का पहला बिंदु होते हैं। जब वे किसी चिकित्सा स्थिति का विकास करते हैं तो लोग उनके पास जाते हैं।"

जिन रोगियों को प्रशिक्षित फार्मासिस्ट द्वारा संदर्भित किया गया था, उन्होंने सामान्य की तुलना में 42 फीसदी ज्यादा बार डॉक्टरों तक पहुंचे, जैसा कि अध्ययन में बताया गया है और 2012 के सरकारी निर्देश के बाद निजी चिकित्सा सेवा प्रदाताओं के लिए अनिवार्य टीबी पंजीकरण, हस्तक्षेप समूह द्वारा संदर्भित लोगों के बीच 62 गुना अधिक था।

छाती एक्स-रे, थूक स्मीयर और जीनएक्सपर्ट परीक्षण के लिए पूर्णता दर ( टीबी निदान में तीन महत्वपूर्ण चरण ) उन लोगों के लिए अधिक थे, जिन्हें क्रमशः 37 फीसदी, 13 फीसदी और 23 फीसदी के मार्जिन से प्रशिक्षित फार्मासिस्टों से रेफरल मिला था।

निजी क्षेत्र की भागीदारी क्यों?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में अनुमानित 28 लाख पुष्टि हुए मामलों के साथ टीबी भारत की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में से एक है। माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस बैक्टीरिया के कारण, इसका संचरण वायुजनित होता है और तब होता है जब कोई संक्रमित व्यक्ति खांसता या छींकता है।

भारत का टीबी बोझ दुनिया में सबसे अधिक है, जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया है, इसके बाद इंडोनेशिया (10 फीसदी) और चीन (10 फीसदी) का स्थान है।

मार्च, 2017 में लॉन्च किए गए ‘नेशनल स्ट्रेटेजिक प्लान फॉर ट्यूबरकुलोसिस एलिमिनेशन’ ने भारत में टीबी के उन्मूलन में निजी क्षेत्र की भूमिका को विशेष महत्व दिया। स्क्रीनिंग और रेफरल हस्तक्षेप निजी खुदरा फार्मेसियों को शामिल करते हुए इस योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सार्वजनिक-स्वास्थ्य सुविधाएं, जिनके पास भारत में टीबी के मामलों की विशेषज्ञता, स्थिति को बदलने के लिए कम राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ पहले से ही प्रभावित हैं, नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन द्वारा 2011 के एक अध्ययन में कहा गया है।

2011 के अध्ययन में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बीमारी का इलाज करने के लिए खराब चिकित्सा बुनियादी ढांचा है और निजी स्वास्थ्य सेवा इकाइयां अनियंत्रित रहती हैं । साथ ही यह भी कहा गया है कि भारत में टीबी देखभाल के साथ पहली पंक्ति और दूसरी पंक्ति की एंटी-टीबी दवाओं का ‘अराजक’ उपयोग दूसरी समस्या थी।

पटना में टीबी दर उप-सहारा अफ्रीका से अधिक

स्वास्थ्य, आय और साक्षरता की औसत से कम दर के साथ, पटना प्रति 100,000 जनसंख्या पर 326 टीबी की घटना की रिपोर्ट करता है। यह उप-सहारा अफ्रीका (237) की घटना दर और 204 के भारतीय औसत से अधिक है। इसने शहर को परियोजना के लिए एक वाजिब कारण दिया।

यह हस्तक्षेप पटना में चल रहे "पब्लिक-प्राइवेट मिक्स प्रोग्राम" के भीतर किया गया। "पीपीएम पर पिग्गीबैकिंग ने पटना में निजी फार्मेसी प्रदाताओं की एक बड़ी संख्या तक पहुंच प्रदान की," जैसा कि दफ्तरी कहती हैं।

कार्यक्रम में शामिल किए गए 804 निजी फार्मेसियों में से, 105 के एक यादृच्छिक नमूने ने पायलट इवेंट में भाग लिया। उन्हें चरणों में भर्ती किया गया था: 30 फार्मासिस्टों का पहला सेट दिसंबर 2015 में, दूसरा फरवरी 2016 में प्रशिक्षित किया गया था, और मई 2016 में 45 फार्मासिस्टों का अंतिम सेट।

उनके प्रशिक्षण में पांच घटक शामिल थे:(i) संकेत लक्षण के माध्यम से टीबी की पहचान करना,स्क्रीनिंग और नैदानिक परीक्षण, और एंटीबायोटिक दवाओं का प्रबंधन, (II) डॉक्टर के परामर्श और छाती के एक्स-रे के लिए,संभावित टीबी रोगियों का रेफरल, (iii) हर पूर्ण डॉक्टर के रेफरल और चेस्ट टेस्ट के लिए 50 रुपये का वित्तीय प्रोत्साहन देने की पेशकश,(iv) सकारात्मक निदान मामलों के लिए 200 रुपये का प्रोत्साहन जोड़ा गया, और (v) फार्मासिस्ट के प्रशिक्षण और स्क्रीनिंग प्रक्रिया को सुदृढ़ करने के लिए एसएमएस रिमाइंडर्स के साथ फील्ड सपोर्ट।

समानांतर में, रेफरल दरों के लिए 804 में से 699 फार्मेसियों, जिन्होंने प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया था,उन्हें देखे गए थे।

प्रशिक्षित समूह में 725 फीसदी ज्यादा मामले

हस्तक्षेप समूह में 81 फीसदी या 84 फार्मेसियों ने टीबी स्क्रीनिंग के लिए कम से कम एक ग्राहक का संदर्भित किया, इसके बाद दो में से एक मार्ग के लिए कहा गया:छाती का एक्स-रे और एक चिकित्सा परामर्श, या एक प्रत्यक्ष चिकित्सक परामर्श।

कुल मिलाकर, प्रशिक्षित समूह ने लक्षणों के आधार पर 1,674 संभावित टीबी रोगियों की पहचान की, जबकि अप्रशिक्षित फार्मासिस्ट केवल 203 (725 फीसदी से कम) की पहचान कर सके, जैसा कि अध्ययन में कहा गया है। पहचान किए गए लोगों में से हस्तक्षेप समूह द्वारा निर्दिष्ट 255 मामले और नियंत्रण समूह से 83 मामले, टीबी सूचनाओं की पुष्टि के रूप में पंजीकृत किए गए थे।

एक टीबी अधिसूचना तब बनाई जाती है जब चिकित्सक या निदानकर्ता किसी व्यक्ति को राष्ट्रीय टीबी निगरानी प्रणाली और फिर डब्ल्यूएचओ में लक्षणों के साथ पंजीकृत करता है।

टीबी के निदान के अंतिम चरण में माइक्रोबायोलोजिकल टेस्ट (एमबी) शामिल हैं - हस्तक्षेप समूह ने 24 फीसदी एमबी पॉजिटिव मामलों (61) की सूचना दी, जबकि नियंत्रण समूह ने 11 फीसदी एमबी पॉजिटिव मामलों (9) की सूचना दी है।

हस्तक्षेप का नतीजा

अध्ययन में पाया गया है कि समय-समय पर समूह चर्चा और निजी साक्षात्कार ने फार्मासिस्टों के लिए हस्तक्षेप कार्यक्रम को बेहतर बनाने में मदद की है। स्क्रीनिंग टेस्ट में ‘वितरित’ करने की नई अधिग्रहीत क्षमता ने प्रशिक्षित फार्मासिस्टों को टीबी रोगियों के प्रति पेशेवर जिम्मेदारी का एक बड़ा एहसास दिया।

अध्ययन में उद्धृत एक अनाम फार्मासिस्ट ने कहा, "मुझे अच्छा लगता है कि मैं अपने समाज की सेवा करने में सक्षम हूं। लोग लाभान्वित हो रहे हैं। हम देखभाल करने में सक्षम हैं और लोग बेहतर हो रहे हैं।”

शहर के अपेक्षाकृत गरीब वर्गों में ग्राहकों को कवर करने वाले प्रदाताओं ने रोगियों के साथ बढ़ते संबंध की सूचना दी, जो कि अक्सर दोहराए यात्राओं के माध्यम से हुआ है।

सफल फार्मासिस्ट रेफरल को प्रशिक्षित फार्मासिस्टों के लिए ग्राहकों के बीच विश्वास की भावना के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था।

नि: शुल्क टीबी स्क्रीनिंग ने छाती के एक्स-रे रेफरल को बढ़ाया और और इनसे सकारात्मक परिणाम आए, बदले में, डॉक्टर रेफरल को बढ़ाया।

इन पहलों को फार्मासिस्टों के बीच 81 फीसदी रेफरल दर हासिल करने के लिए प्रमुख सुविधा के रूप में देखा गया, विशेष रूप से 2003, 2014, 2016 और 2018 में इसी तरह के अध्ययनों की तुलना में, जिसमें लगभग 30-40 फीसदी की रेफरल दर देखी गई थी।

दफ्तरी ने समझाया कि "यह एक व्यावहारिक प्रक्रिया थी, जो चल रहे पीपीएम कार्यक्रम में निहित है, डॉक्टरों और परीक्षण प्रयोगशालाओं की उनकी सूची तक पहुंच प्रदान करती है। निजी फार्मेसी क्षेत्र को टैप करने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन महत्वपूर्ण थे। सफल चिकित्सक रेफरल और निदान पर अपडेट के साथ फार्मासिस्टों के लिए व्यक्तिगत प्रतिक्रिया प्रणाली ने भी मदद की।"

कार्यक्रम में बदलाव की क्या- क्या जरूरत है?

अध्ययन समूह के फार्मासिस्टों ने कभी-कभी उन रोगियों को रेफरल देने में देरी की, जिन्होंने निरंतर उपचार के बजाय अल्पकालिक एंटीबायोटिक कोर्स की मांग की थी। दफ्तरी कहती हैं, इस का एक समाधान "रोगाणुरोधी प्रबंधन और दवा प्रतिरोध के खतरे के बारे में आम जनता की जागरूकता का निर्माण" हो सकता है।

एक अन्य बाधा प्रलेखन प्रक्रिया थी। डॉक्टर परामर्श के लिए मरीजों को मौखिक रूप से संदर्भित करने के लिए कई फार्मेसियों में यह मानक अभ्यास था। इन मामलों को प्रोग्राम टैली में अपना रास्ता नहीं मिला।

कुछ ग्राहकों को अनुबंधित चिकित्सक या प्रयोगशाला का दौरा करने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी। अध्ययन में उद्धृत एक फार्मासिस्ट ने कहा, "अगर मैं यहां से [दूर] भेजता हूं, तो मरीज कहेंगे कि वे परीक्षण पर पैसा बचा सकते हैं, लेकिन परिवहन से उन्हें अधिक खर्च होगा। इसलिए वे पास की लैब में जांच करवाना बेहतर समझते हैं।"

पहचाने गए कुछ अन्य बाधाओं में फार्मेसियों के लिए कार्य बोझ में वृद्धि, पहचान योग्य लक्षणों की अनुपस्थिति, डॉक्टर के परामर्श शुल्क और जहां संदर्भित किया गया है, वहां अज्ञात चिकित्सक या प्रयोगशाला के साथ ग्राहक की असुविधा शामिल है, जैसा कि अध्ययन में पाया गया है।

दफ्तरी कहती हैं, "सरकार को लोगों द्वारा भरोसा करने वाले फार्मेसियों और केमिस्टों पर ध्यान देना चाहिए। टीबी रोगियों की जांच और उन्हें सक्षम करने के लिए फार्मेसी प्रशिक्षण में अधिक निवेश होना चाहिए।"

यह लेख पहली बार यहां HealthCheck पर प्रकाशित हुआ है।

(साहा, पुणे के ‘सिम्बायोसिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स’ में एमएससी के छात्र हैं और इंडियास्पेंड में इंटर्न हैं।)

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।