टीबी को मात देने वाले लोग चाहते हैं बीमारी की पहचान की बेहतर तकनीकि, बेहतर दावाएं और सम्मान

30 अक्टूबर, 2019 को हैदराबाद में, पहले सर्वाइवर सम्मेलन, 50वी यूनियन वर्ल्ड कांफ्रेंस ऑन द लंग हेल्थ के दौरान बयान देती 29 वर्षीय, नंदिता वेंकटेशन। नंदिता एक वकील और पत्रकार और टीबी सर्वाइवर हैं।

हैदराबाद: 29 वर्षीय नंदिता वेंकटेशन एक वकील और पत्रकार और टीबी सर्वाइवर हैं। नंदिता कहती हैं,  “हम इस बीमारी से लड़े हैं और हमने इसे मात दी है। हमारी आवाज़, हमारे अनुभव और हमारी कहानियां महत्वपूर्ण हैं। हमें सुना जाना चाहिए।” हैदराबाद में, आयोजित पहले सर्वाइवर सम्मेलन, 50वी यूनियन वर्ल्ड कांफ्रेंस ऑन द लंग हेल्थ के दौरान नंदिता ने ये बात कही। 

टीबी, एक संक्रामक बीमारी जो हवा के ज़रिये फैलता है और फेफड़ों को प्रभावित करता है। टीबी से हर साल 1 करोड़ लोग प्रभावित होते हैं। 2018 में टीबी से 12 लाख लोगों की मौत हो गई थी। यह आंकड़े एचआईवी और मलेरिया से होने वाले मौतों की संयुक्त संख्या से ज्यादा है। यह एक साइलेंट महामारी रही है, जिसकी वजह से लोगों में कोई आक्रोश नहीं है। 

लेकिन अब, टीबी को मात देने वाले लोग तेजी से मुखर हो रहे हैं और दिखाई दे रहे हैं। वे बीमारी की पहचान के लिए बेहतर सुविधाएँ, नई दवाइयां, कम अवधि का इलाज और रोगी-केंद्रित देखभाल में सुधार चाहते हैं।

पहली बार, टीबी को मात देने वाले लोगों ने केंद्रीय विश्व सम्मेलन में सक्रिय भाग लिया जो कि टीबी और अन्य फेफड़ों के रोगों पर सबसे महत्वपूर्ण सम्मेलनों में से एक माना जाता है। वेंकटेशन का भाषण सम्मेलन की पूर्व संध्या पर 29 अक्टूबर, 2019 को आयोजित पहले सर्वाइवर शिखर सम्मेलन में दिया गया बयान था।

उद्घाटन से चंद मिनट पहले, उन्होंने भरतनाट्यम में एक शिव रुद्रम की प्रस्तुति दी थी। वेंकटेशन ने टीबी को दो बार मात दी है, पहली बार 17 साल की उम्र में और दूसरी बार 23 साल की उम्र में। दूसरी बार, उसने दवा केनामाइसिन के साइड-इफेक्ट के कारण अपनी सुनने की क्षमता खो दी है। इस दवा का इस्तेमाल मल्टीड्रग-रेज़िज़्टेंट टीबी (एमडीआर-टीबी) के इलाज के लिए किया गया था।

वेंकटेशन संगीत की आवाज़ नहीं सुन सकती थी, इसलिए उन्होंने नंबर काउंट्स के ज़रिए नृत्य पेश किया। दुनिया भर के वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, डॉक्टरों और दवा निर्माताओं के  4,000 से अधिक प्रतिनिधियों की भीड़ ने खड़े होकर उनकी सराहना की।

नंदिता ने कहा, "हम मामले नहीं हैं, हम बोझ नहीं हैं, और हम सिर्फ रोगी भी नहीं हैं, हम इन्सान हैं।" उन्होंने अपने बयान में टीबी के उपचार और नीति पर चर्चा में सर्वाइवर्स को शामिल किए जाने पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि, इन फै़सलों से सर्वाइवर सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, और वो इस बीमारी को जानते हैं।

टीबी पर काम करने वाली एक गैर-लाभकारी संस्था, रीच की डिप्टी डायरेक्टर, अनुपमा श्रीनिवासन कहती हैं, "मैं 2012 से इस सम्मेलन में आ रही हूं, यूनियन कांफ्रेंस में सर्वाइवर की इतनी संख्या कभी नहीं रही है।"

मैकगिल यूनिवर्सिटी में मैकगिल ग्लोबल हेल्थ प्रोग्राम्स के डॉयरेक्टर, मधुकर पाई ने बताया, "यह बहुत महत्वपूर्ण है कि सम्मेलनों में रोगी और सर्वाइवर्स की आवाज़ें शामिल हैं।"

पाई ने इस बात पर प्रकाश डाला था कि यूनियन सम्मेलन से सर्वाइवर्स ग़ायब थे और ग्लोबल पत्रिका, नेचर रिसर्च की वेबसाइट पर प्रकाशित एक ब्लॉग में कहा था कि कम और मध्यम आय वाले देशों में जहां, टीबी के मामलों की संख्या अधिक हैं वहां ऐसे सम्मेलन आयोजित किया जाए।

भारत में टीबी के मरीज़ों की संख्या सबसे ज्यादा है। दुनियाभर में 1 करोड़ में से 26 लाख से ज्यादा टीबी के मरीज़ भारत में हैं। भारत में यह सम्मेलन पहली बार आयोजित किया गया था।

बीमारी की पहचान की बेहतर तकनीकि

भारत में टीबी के इलाज की गुणवत्ता खराब है। इंडियास्पेंड ने फरवरी 2018 में बताया था कि नवंबर 2014 से अगस्त 2015 के बीच, प्राइवेट हैल्थ सेक्टर में मुंबई और पटना में केवल 35% टीबी के मामलों की सही पहचान और इलाज किया गया था।

ज्यादातर मरीज़ों में इसकी पहचान दो महीने के बाद ही हो पाती है क्योंकि प्राइमरी केयर फिजिशिअन एंटीबायोटिक के जरिए इलाज की कोशिश करते हैं और शायद ही कभी ऐसी जांच और टेस्ट करते हैं जिससे टीबी का जल्द पता लगाया जा सके।

एक अनुमान के मुताबिक, 2018 में करीब 5 लाख लोग ड्रग-रेसिसटेंट टीबी (डीआर-टीबी) से पीड़ित थे। टीबी का यह प्रकार ज्यादा कठिन होता है और इसका इलाज भी मुश्किल है। 2019 ग्लोबल टीबी रिपोर्ट के अनुसार, तीन में से दो मरीज़ों का इलाज शुरू नहीं हो पाया था।

डीआर-टीबी के इलाज के आंकड़े बेहद कम हैं: रिपोर्ट में कहा गया है कि 56% लोगों ने एमडीआर-टीबी और 39% लोगों ने ड्रग रेसिसटेंट टीबी (एक्सडीआर-टीबी) को सफलतापूर्वक मात दी है। एक्सडीआर-टीबी में, टीबी के कीटाणु दूसरे स्तर के इलाज और फ़्लोरोक्वायनोलोन्स दवाई के प्रतिरोधी हो जाते हैं। फ़्लोरोक्वायनोलोन्स, एमडीआर-टीबी के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाई है।

2018 में, सभी नए टीबी रोगियों में से आधे का रिफ़ेम्पिसिन प्रतिरोध के लिए परीक्षण नहीं किया गया था, जो कि टीबी का इलाज करने वाली प्राथमिक दवाओं में से एक है, हालांकि भारत सभी टीबी रोगियों के लिए दवा संवेदनशीलता परीक्षण के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि दवा प्रतिरोधी झुकावों का जल्द पता लगाया जा सके।

इंडियास्पेंड ने अक्टूबर, 2019 में बताया था कि भारत में मौजूद ड्रग रेसिसटेंट टीबी के आधे से अधिक (56%) मामलों का पता नहीं लगाया जा सका है।

मरीज़ के हिसाब से उसका इलाज

केवल बीमारी की पहचान में देरी नहीं, टीबी रोगियों को अक्सर शिकायत होती है कि पब्लिक हेल्थ सिस्टम में उनका इलाज ठीक से नहीं होता है। पाई ने कहा कि ऐसा इसलिए है क्योंकि ज्यादातर प्रणालियां अभी भी इलाज की क्वालिटी में सुधार पर ध्यान नहीं दे रही हैं। उन्होंने कहा, “एक भी राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम नियमित रूप से मरीज़ के अनुभव इकट्ठा नहीं कर रहा है। अगर आप इस बारे में पूछते हैं, तो आपको एक डरावनी कहानी मिलती है क्योंकि यही सच्चाई हैै। एक के बाद एक डरावनी कहानी।”

सितंबर 2018 में ही पहली बार संयुक्त राष्ट्र ने टीबी पर अपनी पहली उच्चस्तरीय बैठक की, जिसमें देशों के नेताओं को 2022 तक टीबी को खत्म करने के लिए कहा गया। 

मई 2019 में टीबी सर्वाइवर के एक नेटवर्क, टीबीपीपुल ने टीबी से प्रभावित लोगों के अधिकारों की घोषणा इकट्ठी की,  टीबी से पीड़ित लोगों के अधिकारों को दोहराया और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी बताई।

सम्मेलन के दौरान एक बातचीत में पाई ने कहा, “हालांकि, हम इस तरह के दस्तावेज़ के बिना पिछले एक दशक से आ रहे हैं। यह शुरुआत से ही एक मार्गदर्शक होना चाहिए था लेकिन हम इसे 2019 में प्रकाशित कर रहे हैं। इसका मतलब है कि हम मरीज़ों को इलाज के केंद्र में नहीं ला रहे हैं।”

सर्वाइवर्स भी टीबी दवाओं और उपचार में रोगी-केंद्रित रिसर्च की मांग कर रहे हैं।

टीबी के इलाज और देखभाल के अधिकार पर बातचीत के दौरान वेंकटेशन ने कहा, "हम में से बहुत से सर्वाइवर अधिकार मांग रहे हैं। हम चाहते हैं कि वैज्ञानिक, शोधकर्ता हमें दवाओं के परीक्षण के लिए परीक्षण प्रतिभागियों के रूप में न देखें, बल्कि हमें अनुसंधान में सक्रिय भागीदार के रूप में देखें। हम आपके लिए बहुत सारी जानकारियां जुटा सकते हैं।"

सर्वाइवर्स दवाएं सस्ती करने की मांग करते हैं

30 अक्टूबर, 2019 को हैदराबाद में, पहले सर्वाइवर सम्मेलन, 50वी यूनियन वर्ल्ड कांफ्रेंस ऑन द लंग हेल्थ के उद्घाटन समारोह में रुकावट डालते टीबी एक्टिविस्ट। वे मंच पर तख्तियों के साथ आए और उन्होंने टीबी ड्रग्स बेडाकुलाइन, डेलामेनिड और नए-खोजी गई प्रेटोमेनिड के लिए कम कीमतों की मांग की।

पत्रकार विद्या कृष्णन ने अगस्त 2019 में जर्नल ऑफ क्लिनिकल ट्यूबरकुलोसिस एंड अदर माइकोबैक्टीरियल डिज़ीज़ में लिखा, एचआईवी एक्टिविस्ट के विपरीत, टीबी समूह खुद को व्यवस्थित करने और सरकार का ध्यान आकर्षित करने में सक्षम नहीं हैं। जबकि एचआईवी एक्टीविस्ट बेहतर संगठित थे और रणनीतिक विरोध के ज़रिये ध्यान खींचने में कामयाब रहे

कनाडा में मकगिल विश्वविद्यालय के पाई कहते हैं, यह तब तक नहीं हुआ, जब तक कि एचआईवी पीड़ितों ने खुद को शिक्षित और संगठित नहीं कर लिया और फिर उन्हें एंटीरेट्रोवाइरल दवाएं सुलभ और उपलब्ध हो गईं।

यह आंशिक रूप से वेंकटेशन जैसे सर्वाइवर्स के प्रयासों के कारण था, जिन्होंने बताया कि कैसे एमडीआर-टीबी दवाओं ने उनकी सुनने की क्षमता को ख़त्म कर दिया था और दक्षिण अफ्रीका के एमडीआर-टीबी इलाज के रूप में इंजेक्शन के उपयोग को बंद करने के निर्णय के बारे में बताया जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अपने दिशानिर्देशों में अपडेट किया है। अब डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देश के मुताबिक, एमडीआर-टीबी रोगियों का इलाज पूरी तरह से खाने वाली दवाओं के कोर्स के साथ किया जाता है, जिसमें बेडाकुलाइन और डेलामेनिड शामिल हैं, जो 40 वर्षों में खोजी गई पहली नई टीबी दवाएं हैं।

लेकिन जिन लोगों में डीआर-टीबी की पहचान की गई है, उन्हें अभी भी ऐसी दवाएं मिलती हैं जो नुकसान पहुंचाती हैं- जैसे केनामाइसिन इंजेक्शन, जिससे सुनने की क्षमता को नुकसान पहुंच सकता है। सितंबर 2019 तक, भारत में डीआर-टीबी के मरीज़ों में से 5% से कम को बेडाकुलाइन मिली था और और 200 से कम मरीज़ों को डेलामेनिड मिली थी।

2016 में, एक्सआरडी-टीबी से पीड़ित, 18 साल की श्रेया त्रिपाठी को बेडाकुलाइन के इस्तेमाल के लिए सुप्रीम कोर्ट का सहारा लेना पड़ा। हालांकि, उसे दवा मिली, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी - त्रिपाठी का 2018 में निधन हो गया, क्योंकि इलाज में देरी के कारण फेफड़ों ने काम करना बंद कर दिया था।

सर्वाइवर्स और एक्टिविस्ट ने कई सम्मेलन पैनलों में रुकावट डाली है। इनमें Médecins Sans Frontières (MSF) यानी डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स के लोग भी शामिल थे, जो नई दवाओं बेडाकुलाइन, डेलामेनिड और नई-खोजे प्रेटोमेनिड के लिए कम कीमतों की मांग कर रहे थे। एमएसएफ ने एक बयान में कहा, 'डीआर-टीबी वाले 20% लोगों को ही इन नई दवाओं की जरूरत होती है।'

नई दवाओं की यह आंशिक रुप से उच्च लागत है, जिससे उनकी पहुंच मुश्किल हुई है। उदाहरण के लिए, 2014 में मंज़ूर की गई दवाई डेलामेनिड को छह महीने तक $1,700 (120,241 रुपये) में बेचा गया, अब तक दुनिया भर में केवल 2,904 मरीज़ो तक ही दवाई  पहुंच पाई है।

फ़िलहाल, डीआर-टीबी के इलाज के कोर्स की कीमत $1,040 से $11,680, (रु 173,530 से 825,805) तक है, जो  इलाज में लगने वाला समय और आवश्यक दवाओं की ज़रूरत पर निर्भर करता है। एमएसएफ की मांग है कि डीआर-टीबी के इलाज की लागत किसी भी सूरत में $500 प्रति व्यक्ति (35,351 रुपये) से अधिक नहीं होनी चाहिए ताकि ये सभी मरीज़ों तक पहुंच सके।

सर्वाइवर्स की संवेदनाओं की अनदेखी की गई

एचआईवी और टीबी एक्टिविस्ट गणेश आचार्य कहते हैं सर्वाइवर्स के साथ अधिक सार्थक रूप से जुड़ने के लिए सम्मेलन आयोजित किये जा सकते थे। उन्होंने कहा कि, "जब हमारे सम्मेलन को पश्चिमी देशों में आयोजित किया गया था तो हमारे वीज़ा को अस्वीकार कर दिया गया था [क्योंकि टीबी के रोगियों को वीज़ा से वंचित किया गया था], इसलिए हमने सोचा कि यह एक बड़ा अवसर होगा कि सम्मेलन भारत में आयोजित किया जाए, लेकिन जिस तरह से हमारे साथ व्यवहार किया गया, हम निराश हैं। ”

उन्होंने कहा कि कुछ सर्वाइवर्स को  स्वतंत्र रूप से पंजीकरण करने और शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए पैसे जमा करने के लिए कहा गया।

द हिंदू बिज़नेस लाइन ने 1 नवंबर, 2019 को बताया कि भारतीय सर्वाइवर्स और अन्य शिक्षाविदों ने सम्मेलन के लिए पंजीकरण शुल्क - 27,000 रुपये और 65,000 रुपये के बीच पाया, जो बहुत अधिक था।

सर्वाइवर्स ने कहा, 'कम्युनिटी कनेक्ट' स्पेस, जहां अधिकांश सिविल सोसाइटी की अगुवाई वाली गतिविधियां आयोजित की गईं, सर्वाइवर्स को वहां से दूर रखा और वहां वॉशरूम और खाने की भी सुविधाएं नहीं थीं।

एक बड़े टेंट में दो कमरे और एक फोटो प्रदर्शनी हॉल वाली ये जगह, सम्मेलन स्थल हैदराबाद इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर (HICC) के मुख्य भवन के बाहर थी।

ईमेल पर यूनियन के प्रवक्ता मेघन डारनेक ने कहा, ’ कम्युनिटी कनेक्ट 'के लिए हमारा लक्ष्य इसे यथासंभव बड़ी जगह बनाना है, जबकि अभी भी इसे सभी के लिए सुलभ बनाना है, भले ही उनके पास सम्मेलन बैज हो या नहीं हो।"

डारनेक ने कहा, “एचआईसीसी में उपलब्ध स्थान को देखते हुए, और एचआईसीसी में पिछले सम्मेलन में उपयोग किए गए समान सेटअप को देखते हुए, यह तय किया गया था कि एचआईसीसी के मुख्य द्वार के ठीक बाहर एक बड़ा, बाहरी स्थान होना, स्पेस के सभी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सबसे अच्छा उपलब्ध विकल्प था। यदि यहएचआईसीसी के भीतर होता, तो उपलब्ध स्थान बहुत छोटा और कम संवादात्मक होता।"

शिखर सम्मेलन में सर्वाइवर्स की कम उपस्थिति

आधिकारिक सम्मेलन से एक दिन पहले आयोजित पहली सर्वाइवर्स सम्मिट में लगभग 30 सर्वाइवर्स ने हिस्सा लिया। कई समूहों ने कहा कि संख्या कम थी क्योंकि सम्मेलन के लिए आवेदन की शुरुआत 25 सितंबर, 2019 को सम्मेलन से ठीक एक महीने पहले की गई थी, जिसमें यात्रा और अन्य व्यवस्थाएं करने के लिए बहुत कम समय बचा था।

एमडीआर-टीबी सर्वाइवर और वकील मीरा यादव ने कहा, "हम सर्वाइवर्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेते, लेकिन सम्मेलन शुरू होने से 3-4 दिन पहले ही मुझे इसका पता चला।"

डारनेक ने कहा, घोषणा 25 सितंबर के बाद ही की जा सकती थी क्योंकि तब तक इसके लिए कोई फंडिंग नहीं थी।

आचार्य ने कहा, "सर्वाइवर्स सम्मिट को बहुत ही खामोशी से रखा गया था, किसी को नहीं पता था कि एजेंडा क्या है या इसे कौन आयोजित कर रहा है।"

यूनियन ने सिफारिश की कि टीबी सर्वाइवर्स का नेटवर्क, टीबीपिपुल शिखर बैठक का एजेंडा तय करने के लिए एक सामुदायिक समन्वय समिति का गठन करेगी।

डारनेक ने कहा, "यूनियन ने शिखर सम्मेलन के लिए लॉजिस्टिक का नेतृत्व किया, लेकिन सामग्री समिति की ज़िम्मेदारी थी।"

श्रीनिवासन कहते हैं कि यह समझ में आता है कि सर्वाइवर्स बेताब होते हैं, जैसा कि सर्वाइवर्स और समुदाय को लाने के प्रयासों में वृद्धि हो रही है।

“हमने ज़बरदस्त बदलाव देखा है। क्या यह पर्यापत् है? क्या हमें इसको तेज़ करने के लिए ज़ोर देना चाहिए? बेशक, हमें ये करना चाहिए।”

(स्वागता विशेष संवाददाता हैं और हेल्थचेक के साथ जुड़ी हैं। )

यह आलेख पहले हेल्थचेक पर यहां प्रकाशित हुआ है।

हैदराबाद: 29 वर्षीय नंदिता वेंकटेशन एक वकील और पत्रकार और टीबी सर्वाइवर हैं। नंदिता कहती हैं,  “हम इस बीमारी से लड़े हैं और हमने इसे मात दी है। हमारी आवाज़, हमारे अनुभव और हमारी कहानियां महत्वपूर्ण हैं। हमें सुना जाना चाहिए।” हैदराबाद में, आयोजित पहले सर्वाइवर सम्मेलन, 50वी यूनियन वर्ल्ड कांफ्रेंस ऑन द लंग हेल्थ के दौरान नंदिता ने ये बात कही। 

टीबी, एक संक्रामक बीमारी जो हवा के ज़रिये फैलता है और फेफड़ों को प्रभावित करता है। टीबी से हर साल 1 करोड़ लोग प्रभावित होते हैं। 2018 में टीबी से 12 लाख लोगों की मौत हो गई थी। यह आंकड़े एचआईवी और मलेरिया से होने वाले मौतों की संयुक्त संख्या से ज्यादा है। यह एक साइलेंट महामारी रही है, जिसकी वजह से लोगों में कोई आक्रोश नहीं है। 

लेकिन अब, टीबी को मात देने वाले लोग तेजी से मुखर हो रहे हैं और दिखाई दे रहे हैं। वे बीमारी की पहचान के लिए बेहतर सुविधाएँ, नई दवाइयां, कम अवधि का इलाज और रोगी-केंद्रित देखभाल में सुधार चाहते हैं।

पहली बार, टीबी को मात देने वाले लोगों ने केंद्रीय विश्व सम्मेलन में सक्रिय भाग लिया जो कि टीबी और अन्य फेफड़ों के रोगों पर सबसे महत्वपूर्ण सम्मेलनों में से एक माना जाता है। वेंकटेशन का भाषण सम्मेलन की पूर्व संध्या पर 29 अक्टूबर, 2019 को आयोजित पहले सर्वाइवर शिखर सम्मेलन में दिया गया बयान था।

उद्घाटन से चंद मिनट पहले, उन्होंने भरतनाट्यम में एक शिव रुद्रम की प्रस्तुति दी थी। वेंकटेशन ने टीबी को दो बार मात दी है, पहली बार 17 साल की उम्र में और दूसरी बार 23 साल की उम्र में। दूसरी बार, उसने दवा केनामाइसिन के साइड-इफेक्ट के कारण अपनी सुनने की क्षमता खो दी है। इस दवा का इस्तेमाल मल्टीड्रग-रेज़िज़्टेंट टीबी (एमडीआर-टीबी) के इलाज के लिए किया गया था।

वेंकटेशन संगीत की आवाज़ नहीं सुन सकती थी, इसलिए उन्होंने नंबर काउंट्स के ज़रिए नृत्य पेश किया। दुनिया भर के वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, डॉक्टरों और दवा निर्माताओं के  4,000 से अधिक प्रतिनिधियों की भीड़ ने खड़े होकर उनकी सराहना की।

नंदिता ने कहा, "हम मामले नहीं हैं, हम बोझ नहीं हैं, और हम सिर्फ रोगी भी नहीं हैं, हम इन्सान हैं।" उन्होंने अपने बयान में टीबी के उपचार और नीति पर चर्चा में सर्वाइवर्स को शामिल किए जाने पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि, इन फै़सलों से सर्वाइवर सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, और वो इस बीमारी को जानते हैं।

टीबी पर काम करने वाली एक गैर-लाभकारी संस्था, रीच की डिप्टी डायरेक्टर, अनुपमा श्रीनिवासन कहती हैं, "मैं 2012 से इस सम्मेलन में आ रही हूं, यूनियन कांफ्रेंस में सर्वाइवर की इतनी संख्या कभी नहीं रही है।"

मैकगिल यूनिवर्सिटी में मैकगिल ग्लोबल हेल्थ प्रोग्राम्स के डॉयरेक्टर, मधुकर पाई ने बताया, "यह बहुत महत्वपूर्ण है कि सम्मेलनों में रोगी और सर्वाइवर्स की आवाज़ें शामिल हैं।"

पाई ने इस बात पर प्रकाश डाला था कि यूनियन सम्मेलन से सर्वाइवर्स ग़ायब थे और ग्लोबल पत्रिका, नेचर रिसर्च की वेबसाइट पर प्रकाशित एक ब्लॉग में कहा था कि कम और मध्यम आय वाले देशों में जहां, टीबी के मामलों की संख्या अधिक हैं वहां ऐसे सम्मेलन आयोजित किया जाए।

भारत में टीबी के मरीज़ों की संख्या सबसे ज्यादा है। दुनियाभर में 1 करोड़ में से 26 लाख से ज्यादा टीबी के मरीज़ भारत में हैं। भारत में यह सम्मेलन पहली बार आयोजित किया गया था।

बीमारी की पहचान की बेहतर तकनीकि

भारत में टीबी के इलाज की गुणवत्ता खराब है। इंडियास्पेंड ने फरवरी 2018 में बताया था कि नवंबर 2014 से अगस्त 2015 के बीच, प्राइवेट हैल्थ सेक्टर में मुंबई और पटना में केवल 35% टीबी के मामलों की सही पहचान और इलाज किया गया था।

ज्यादातर मरीज़ों में इसकी पहचान दो महीने के बाद ही हो पाती है क्योंकि प्राइमरी केयर फिजिशिअन एंटीबायोटिक के जरिए इलाज की कोशिश करते हैं और शायद ही कभी ऐसी जांच और टेस्ट करते हैं जिससे टीबी का जल्द पता लगाया जा सके।

एक अनुमान के मुताबिक, 2018 में करीब 5 लाख लोग ड्रग-रेसिसटेंट टीबी (डीआर-टीबी) से पीड़ित थे। टीबी का यह प्रकार ज्यादा कठिन होता है और इसका इलाज भी मुश्किल है। 2019 ग्लोबल टीबी रिपोर्ट के अनुसार, तीन में से दो मरीज़ों का इलाज शुरू नहीं हो पाया था।

डीआर-टीबी के इलाज के आंकड़े बेहद कम हैं: रिपोर्ट में कहा गया है कि 56% लोगों ने एमडीआर-टीबी और 39% लोगों ने ड्रग रेसिसटेंट टीबी (एक्सडीआर-टीबी) को सफलतापूर्वक मात दी है। एक्सडीआर-टीबी में, टीबी के कीटाणु दूसरे स्तर के इलाज और फ़्लोरोक्वायनोलोन्स दवाई के प्रतिरोधी हो जाते हैं। फ़्लोरोक्वायनोलोन्स, एमडीआर-टीबी के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाई है।

2018 में, सभी नए टीबी रोगियों में से आधे का रिफ़ेम्पिसिन प्रतिरोध के लिए परीक्षण नहीं किया गया था, जो कि टीबी का इलाज करने वाली प्राथमिक दवाओं में से एक है, हालांकि भारत सभी टीबी रोगियों के लिए दवा संवेदनशीलता परीक्षण के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि दवा प्रतिरोधी झुकावों का जल्द पता लगाया जा सके।

इंडियास्पेंड ने अक्टूबर, 2019 में बताया था कि भारत में मौजूद ड्रग रेसिसटेंट टीबी के आधे से अधिक (56%) मामलों का पता नहीं लगाया जा सका है।

मरीज़ के हिसाब से उसका इलाज

केवल बीमारी की पहचान में देरी नहीं, टीबी रोगियों को अक्सर शिकायत होती है कि पब्लिक हेल्थ सिस्टम में उनका इलाज ठीक से नहीं होता है। पाई ने कहा कि ऐसा इसलिए है क्योंकि ज्यादातर प्रणालियां अभी भी इलाज की क्वालिटी में सुधार पर ध्यान नहीं दे रही हैं। उन्होंने कहा, “एक भी राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम नियमित रूप से मरीज़ के अनुभव इकट्ठा नहीं कर रहा है। अगर आप इस बारे में पूछते हैं, तो आपको एक डरावनी कहानी मिलती है क्योंकि यही सच्चाई हैै। एक के बाद एक डरावनी कहानी।”

सितंबर 2018 में ही पहली बार संयुक्त राष्ट्र ने टीबी पर अपनी पहली उच्चस्तरीय बैठक की, जिसमें देशों के नेताओं को 2022 तक टीबी को खत्म करने के लिए कहा गया। 

मई 2019 में टीबी सर्वाइवर के एक नेटवर्क, टीबीपीपुल ने टीबी से प्रभावित लोगों के अधिकारों की घोषणा इकट्ठी की,  टीबी से पीड़ित लोगों के अधिकारों को दोहराया और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी बताई।

सम्मेलन के दौरान एक बातचीत में पाई ने कहा, “हालांकि, हम इस तरह के दस्तावेज़ के बिना पिछले एक दशक से आ रहे हैं। यह शुरुआत से ही एक मार्गदर्शक होना चाहिए था लेकिन हम इसे 2019 में प्रकाशित कर रहे हैं। इसका मतलब है कि हम मरीज़ों को इलाज के केंद्र में नहीं ला रहे हैं।”

सर्वाइवर्स भी टीबी दवाओं और उपचार में रोगी-केंद्रित रिसर्च की मांग कर रहे हैं।

टीबी के इलाज और देखभाल के अधिकार पर बातचीत के दौरान वेंकटेशन ने कहा, "हम में से बहुत से सर्वाइवर अधिकार मांग रहे हैं। हम चाहते हैं कि वैज्ञानिक, शोधकर्ता हमें दवाओं के परीक्षण के लिए परीक्षण प्रतिभागियों के रूप में न देखें, बल्कि हमें अनुसंधान में सक्रिय भागीदार के रूप में देखें। हम आपके लिए बहुत सारी जानकारियां जुटा सकते हैं।"

सर्वाइवर्स दवाएं सस्ती करने की मांग करते हैं

30 अक्टूबर, 2019 को हैदराबाद में, पहले सर्वाइवर सम्मेलन, 50वी यूनियन वर्ल्ड कांफ्रेंस ऑन द लंग हेल्थ के उद्घाटन समारोह में रुकावट डालते टीबी एक्टिविस्ट। वे मंच पर तख्तियों के साथ आए और उन्होंने टीबी ड्रग्स बेडाकुलाइन, डेलामेनिड और नए-खोजी गई प्रेटोमेनिड के लिए कम कीमतों की मांग की।

पत्रकार विद्या कृष्णन ने अगस्त 2019 में जर्नल ऑफ क्लिनिकल ट्यूबरकुलोसिस एंड अदर माइकोबैक्टीरियल डिज़ीज़ में लिखा, एचआईवी एक्टिविस्ट के विपरीत, टीबी समूह खुद को व्यवस्थित करने और सरकार का ध्यान आकर्षित करने में सक्षम नहीं हैं। जबकि एचआईवी एक्टीविस्ट बेहतर संगठित थे और रणनीतिक विरोध के ज़रिये ध्यान खींचने में कामयाब रहे

कनाडा में मकगिल विश्वविद्यालय के पाई कहते हैं, यह तब तक नहीं हुआ, जब तक कि एचआईवी पीड़ितों ने खुद को शिक्षित और संगठित नहीं कर लिया और फिर उन्हें एंटीरेट्रोवाइरल दवाएं सुलभ और उपलब्ध हो गईं।

यह आंशिक रूप से वेंकटेशन जैसे सर्वाइवर्स के प्रयासों के कारण था, जिन्होंने बताया कि कैसे एमडीआर-टीबी दवाओं ने उनकी सुनने की क्षमता को ख़त्म कर दिया था और दक्षिण अफ्रीका के एमडीआर-टीबी इलाज के रूप में इंजेक्शन के उपयोग को बंद करने के निर्णय के बारे में बताया जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अपने दिशानिर्देशों में अपडेट किया है। अब डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देश के मुताबिक, एमडीआर-टीबी रोगियों का इलाज पूरी तरह से खाने वाली दवाओं के कोर्स के साथ किया जाता है, जिसमें बेडाकुलाइन और डेलामेनिड शामिल हैं, जो 40 वर्षों में खोजी गई पहली नई टीबी दवाएं हैं।

लेकिन जिन लोगों में डीआर-टीबी की पहचान की गई है, उन्हें अभी भी ऐसी दवाएं मिलती हैं जो नुकसान पहुंचाती हैं- जैसे केनामाइसिन इंजेक्शन, जिससे सुनने की क्षमता को नुकसान पहुंच सकता है। सितंबर 2019 तक, भारत में डीआर-टीबी के मरीज़ों में से 5% से कम को बेडाकुलाइन मिली था और और 200 से कम मरीज़ों को डेलामेनिड मिली थी।

2016 में, एक्सआरडी-टीबी से पीड़ित, 18 साल की श्रेया त्रिपाठी को बेडाकुलाइन के इस्तेमाल के लिए सुप्रीम कोर्ट का सहारा लेना पड़ा। हालांकि, उसे दवा मिली, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी - त्रिपाठी का 2018 में निधन हो गया, क्योंकि इलाज में देरी के कारण फेफड़ों ने काम करना बंद कर दिया था।

सर्वाइवर्स और एक्टिविस्ट ने कई सम्मेलन पैनलों में रुकावट डाली है। इनमें Médecins Sans Frontières (MSF) यानी डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स के लोग भी शामिल थे, जो नई दवाओं बेडाकुलाइन, डेलामेनिड और नई-खोजे प्रेटोमेनिड के लिए कम कीमतों की मांग कर रहे थे। एमएसएफ ने एक बयान में कहा, 'डीआर-टीबी वाले 20% लोगों को ही इन नई दवाओं की जरूरत होती है।'

नई दवाओं की यह आंशिक रुप से उच्च लागत है, जिससे उनकी पहुंच मुश्किल हुई है। उदाहरण के लिए, 2014 में मंज़ूर की गई दवाई डेलामेनिड को छह महीने तक $1,700 (120,241 रुपये) में बेचा गया, अब तक दुनिया भर में केवल 2,904 मरीज़ो तक ही दवाई  पहुंच पाई है।

फ़िलहाल, डीआर-टीबी के इलाज के कोर्स की कीमत $1,040 से $11,680, (रु 173,530 से 825,805) तक है, जो  इलाज में लगने वाला समय और आवश्यक दवाओं की ज़रूरत पर निर्भर करता है। एमएसएफ की मांग है कि डीआर-टीबी के इलाज की लागत किसी भी सूरत में $500 प्रति व्यक्ति (35,351 रुपये) से अधिक नहीं होनी चाहिए ताकि ये सभी मरीज़ों तक पहुंच सके।

सर्वाइवर्स की संवेदनाओं की अनदेखी की गई

एचआईवी और टीबी एक्टिविस्ट गणेश आचार्य कहते हैं सर्वाइवर्स के साथ अधिक सार्थक रूप से जुड़ने के लिए सम्मेलन आयोजित किये जा सकते थे। उन्होंने कहा कि, "जब हमारे सम्मेलन को पश्चिमी देशों में आयोजित किया गया था तो हमारे वीज़ा को अस्वीकार कर दिया गया था [क्योंकि टीबी के रोगियों को वीज़ा से वंचित किया गया था], इसलिए हमने सोचा कि यह एक बड़ा अवसर होगा कि सम्मेलन भारत में आयोजित किया जाए, लेकिन जिस तरह से हमारे साथ व्यवहार किया गया, हम निराश हैं। ”

उन्होंने कहा कि कुछ सर्वाइवर्स को  स्वतंत्र रूप से पंजीकरण करने और शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए पैसे जमा करने के लिए कहा गया।

द हिंदू बिज़नेस लाइन ने 1 नवंबर, 2019 को बताया कि भारतीय सर्वाइवर्स और अन्य शिक्षाविदों ने सम्मेलन के लिए पंजीकरण शुल्क - 27,000 रुपये और 65,000 रुपये के बीच पाया, जो बहुत अधिक था।

सर्वाइवर्स ने कहा, 'कम्युनिटी कनेक्ट' स्पेस, जहां अधिकांश सिविल सोसाइटी की अगुवाई वाली गतिविधियां आयोजित की गईं, सर्वाइवर्स को वहां से दूर रखा और वहां वॉशरूम और खाने की भी सुविधाएं नहीं थीं।

एक बड़े टेंट में दो कमरे और एक फोटो प्रदर्शनी हॉल वाली ये जगह, सम्मेलन स्थल हैदराबाद इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर (HICC) के मुख्य भवन के बाहर थी।

ईमेल पर यूनियन के प्रवक्ता मेघन डारनेक ने कहा, ’ कम्युनिटी कनेक्ट 'के लिए हमारा लक्ष्य इसे यथासंभव बड़ी जगह बनाना है, जबकि अभी भी इसे सभी के लिए सुलभ बनाना है, भले ही उनके पास सम्मेलन बैज हो या नहीं हो।"

डारनेक ने कहा, “एचआईसीसी में उपलब्ध स्थान को देखते हुए, और एचआईसीसी में पिछले सम्मेलन में उपयोग किए गए समान सेटअप को देखते हुए, यह तय किया गया था कि एचआईसीसी के मुख्य द्वार के ठीक बाहर एक बड़ा, बाहरी स्थान होना, स्पेस के सभी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सबसे अच्छा उपलब्ध विकल्प था। यदि यहएचआईसीसी के भीतर होता, तो उपलब्ध स्थान बहुत छोटा और कम संवादात्मक होता।"

शिखर सम्मेलन में सर्वाइवर्स की कम उपस्थिति

आधिकारिक सम्मेलन से एक दिन पहले आयोजित पहली सर्वाइवर्स सम्मिट में लगभग 30 सर्वाइवर्स ने हिस्सा लिया। कई समूहों ने कहा कि संख्या कम थी क्योंकि सम्मेलन के लिए आवेदन की शुरुआत 25 सितंबर, 2019 को सम्मेलन से ठीक एक महीने पहले की गई थी, जिसमें यात्रा और अन्य व्यवस्थाएं करने के लिए बहुत कम समय बचा था।

एमडीआर-टीबी सर्वाइवर और वकील मीरा यादव ने कहा, "हम सर्वाइवर्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेते, लेकिन सम्मेलन शुरू होने से 3-4 दिन पहले ही मुझे इसका पता चला।"

डारनेक ने कहा, घोषणा 25 सितंबर के बाद ही की जा सकती थी क्योंकि तब तक इसके लिए कोई फंडिंग नहीं थी।

आचार्य ने कहा, "सर्वाइवर्स सम्मिट को बहुत ही खामोशी से रखा गया था, किसी को नहीं पता था कि एजेंडा क्या है या इसे कौन आयोजित कर रहा है।"

यूनियन ने सिफारिश की कि टीबी सर्वाइवर्स का नेटवर्क, टीबीपिपुल शिखर बैठक का एजेंडा तय करने के लिए एक सामुदायिक समन्वय समिति का गठन करेगी।

डारनेक ने कहा, "यूनियन ने शिखर सम्मेलन के लिए लॉजिस्टिक का नेतृत्व किया, लेकिन सामग्री समिति की ज़िम्मेदारी थी।"

श्रीनिवासन कहते हैं कि यह समझ में आता है कि सर्वाइवर्स बेताब होते हैं, जैसा कि सर्वाइवर्स और समुदाय को लाने के प्रयासों में वृद्धि हो रही है।

“हमने ज़बरदस्त बदलाव देखा है। क्या यह पर्यापत् है? क्या हमें इसको तेज़ करने के लिए ज़ोर देना चाहिए? बेशक, हमें ये करना चाहिए।”

(स्वागता विशेष संवाददाता हैं और हेल्थचेक के साथ जुड़ी हैं। )

यह आलेख पहले हेल्थचेक पर यहां प्रकाशित हुआ है।


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