दिन में 14 घंटे काम, बाहरी दबाव और मानसिक तनाव से जूझती भारतीय पुलिस फ़ोर्स

मुंबई: पूर्वी मुंबई के एक पुलिस स्टेशन थाना इंचार्ज (एसएचओ) बताते हैं कि वो पुलिस की वर्दी के दीवाने थे। उनकी इसी दीवानगी ने उन्हें पुलिस में भर्ती होने के लिए प्रेरित किया। सितंबर के महीने का वह दोपहर का समय था। एसएचओ 12 फुट की एक डेस्क पर अपने सहयोगियों, शिकायतकर्ताओं और पत्रकारों से घिरे हुए थे। वे सबकी बातों का जवाब दे रहे थे।

उन्होंने एक बेहद लोकप्रिय फिल्म, सिंघम का ज़िक्र करते हुए कहा कि, “पुलिस में ‘सिंघम’ फ़िल्म की तरह कुछ नहीं होता है। पुलिस फ़ोर्स में काम करना, फिल्मों की कहानियों से बहुत अलग होता है। हमें बहुत ज्यादा काम करना पड़ता है। हम बेहद तनाव में रहते हैं और हमें कई तरह के बाहरी दबावों का सामना करना पड़ता है।”

बहुत कम वीकली या मन्थली ऑफ के साथ काम करने के लंबे घंटे, भारतीय पुलिस फ़ोर्स के जीवन का हिस्सा है।  27 अगस्त, 2019 को जारी, स्टेटस ऑफ पोलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट 2019 में कहा गया है कि, भारत में लगभग 24% पुलिसकर्मी, औसतन 16 घंटे से ज्यादा काम करते हैं और 44% 12 घंटे से ज्यादा काम करते हैं। औसतन एक दिन में  उन्हें 14 घंटे काम करना पड़ता है।

इस संबंध में नई दिल्ली स्थित एक गैर-लाभकारी संस्था  कॉमन कॉज और विचार मंच  लोकनीति - सेंटर फॉर द स्टडी डेवल्पिंग सोसाईटीज ने एक अध्ययन किया है। अध्ययन के दौरान 73% पुलिसकर्मियों ने बताया कि उनके काम के बोझ का गंभीर असर उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। करीब 84% ने कहा कि वे अपने काम की वजह से अपने परिवार को समय नहीं दे पाते हैं।

“हम अपने बच्चों को पुलिस फ़ोर्स में शामिल नहीं होने देंगे!”

मुंबई में एक कांस्टेबल ने रिपोर्टर से बताया कि वे अपने बच्चों को पुलिस बल में शामिल नहीं होने देंगे। उन्होंने कहा, "अगर आप पुलिस में काम करते हैं तो आपको कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। काम पर आप कितना समय दे रहें हैं, इसका कोई मतलब नहीं रहता। चाहे 12 घंटे काम करें या 15 घंटे या 24 घंटे, पैसे तो आपको उतने ही मिलते हैं।" 

पांच में से चार पुलिस कर्मियों ने कहा कि उन्हें ओवरटाइम का पैसा नहीं मिलता है। इस अध्ययन में कहा गया है कि सभी कर्मियों को कम से कम एक साप्ताहिक अवकाश या वीकली ऑफ देने वाला एकमात्र राज्य महाराष्ट्र है।

महीने में कांस्टेबल को कितनी छुट्टियां मिलती है? इस सवाल के जवाब में वह हंसा और कहा, “कहां साहेब, 2-3 महीने में मुश्किल से एक छुट्टी मिलती है।”

एक सब-इंस्पेक्टर ने कहा, " हमारे बच्चे जहां भी चाहें, काम कर सकते हैं, लेकिन मैं उन्हें पुलिस में शामिल नहीं होने दूंगा। अगर मुझे इस तरह की कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है, तो मैं क्यों चाहूंगा कि मेरे बच्चे भी इन मुश्किलों का सामना करें? मैं इस बारे में सोच भी नहीं सकता हूं।”

उस सब-इंस्पेक्टर ने अपने दर्द को कुछ यूं बयान किया, "जब बाल ठाकरे की मृत्यु हुई थी, तो वीआईपी बंदोबस्त में, हम तीन-चार दिनों के लिए घर भी नहीं गए थे। हम थाने में कुर्सी पर बैठ कर ही झपकी ले सकते थे।"

आप कहीं घूमने या लंबी छुट्टी पर कितनी बार जाते हैं? सब-इंस्पेक्टर ने बताया, “मैं तो परसों की भी योजना नहीं बना सकता। मैं कैसे कहीं छुट्टी पर घूमने जा सकता हूं?"

एक एसएचओ ने हमें बताया, कि कागज पर उन्हें केवल 12 घंटे काम करने की जरूरत है, लेकिन वह रोजाना 14-15 घंटे काम करते हैं। उन्होंने कहा, "हमें हर हफ्ते एक छुट्टी मिलती है, लेकिन यह भी निश्चित नहीं है।" काम पर पहुंचने और घर वापस जाने में लगने वाले समय को गिनते हुए उन्होंने बताया कि वह हर रोज करीब 17 घंटे काम करते हैं।

उसने अपनी सगाई वाले दिन की घटना बताई, "मैंने रात 11 बजे की ट्रेन ली, सुबह 5.30-6 बजे के आसपास पहुंच गया, उस दिन सगाई हो गई, और अगले दिन वापस आ गया।" शिवाजी नगर पुलिस स्टेशन में एक सब-इंस्पेक्टर का दर्द भी कुछ ऐसा ही था।

एचएचओ ने बताया, "मेरे पास परिवार के साथ बिताने के लिए समय नहीं है। मेरा एक 18 महीने का बेटा है। जब मैं सुबह काम के लिए निकलता हूं, तो वह सो रहा होता है और जब मैं काम से लौटता हूं, तो वह भी सो रहा होता है।''   एसएचओ से ज्यादा बुजुर्ग अन्य सब-इंस्पेक्टरों के पास बताने के लिए ऐसी ही कई कहानियां थीं। साकी नाका के सब-इंस्पेक्टर ने कहा, "हमारे बच्चे वास्तव में यह जाने बिना बड़े हो गए कि उनके पिता कौन हैं, क्या करते हैं।" 

एक दूसरे सब-इंस्पेक्टर ने बताया, "जब मैंने काम शुरू किया तब मैं अपने परिवार के साथ समय नहीं बिता सकता था, और अब भी मैं उनको समय नहीं दे पाता हूं।"

एक अन्य सब-इंस्पेक्टर ने कहा, "यह ब्रिटिश जमाने से चल रहा है। अगर मैं त्योहार के अवसरों पर परिवार के साथ समय नहीं बिता सकता, तो सोचिए कि वे कैसा महसूस करते होंगे?"

हर राज्य में कमोवेश यही स्थिति है।

21 राज्यों में पुलिस कर्मचारी औसतन 11-18 घंटे काम करते हैं। सर्वेक्षण के परिणामों के अनुसार, ओडिशा में औसत काम के घंटे सबसे अधिक हैं, एक दिन में करीब 18 घंटे। नागालैंड में, पुलिस वाले औसतन 8 घंटे काम करते हैं।

हर 5 में से एक पद खाली है

ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट (बीपीआरडी) के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2017 तक पुलिस बल में कम से कम 22% पोस्ट भरे जाने थे। यह जनवरी 2016 से जनवरी 2017 के बीच फ़ोर्स में 11% वृद्धि के बावजूद है।

आंकड़े बताते हैं कि, 2011 से 2016 के बीच, भारतीय पुलिस फ़ोर्स में ख़ाली पदों की संख्या 25.4% से गिरकर 21.8% जरूर हुई  है, फिर भी, जनवरी 2017 तक, भारत का पुलिस-जनसंख्या अनुपात हर 100,000 लोगों पर 148 पुलिसकर्मी का था। यह आंकड़े संयुक्त राष्ट्र की सिफारिश  222 की संख्या का दो-तिहाई है।

एक कांस्टेबल ने कहा, "इस स्टेशन में भी कई पोस्ट खाली हैं। इसका मतलब यह है कि अगर मुझे कभी छुट्टी चाहिए, तो मुझे नहीं मिलेगी। यदि हमारे पास पर्याप्त लोग हैं, तो हम बारी-बारी से छुट्टी ले सकते हैं और सभी काम पूरा कर सकते हैं। लेकिन अगर मैं छुट्टी ले लेता हूं, तो काम अधूरा रह जाएगा। "

एसएचओ ने इस समस्या पर विस्तार से बातें की, "एक व्यक्ति को दस लोगों का काम करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, हमें इस क्षेत्र में कम से कम तीन से चार पुलिस स्टेशनों की आवश्यकता है, लेकिन केवल एक है।"

एक दूसरे एसएचओ का सवाल था, "हम हर किसी को कैसे सेवा दे सकते हैं? हमें उन लोगों की समस्याओं से निपटना होता जो अमीर और संपन्न हैं और दूसरी तरफ वे जो गरीब हैं और उद्योगिक, रिहायशी इलाकों और मलिन बस्तियों में रहते हैं।" 

4 में से 3 पुलिसकर्मियो को लगता है कि काम की स्थिति उनके स्वास्थ्य को प्रभावित करती है

राष्ट्रीय स्तर पर, 74% पुलिस स्टेशन स्टाफ और 76.3% एसएचओ ने महसूस किया है कि वर्तमान में काम करने की स्थिति उनके स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। बीपीआरडी की 2014 की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने हाई बीपी, मानसिक तनाव, नींद न आने, थकान, सांस की समस्या, गैस्ट्रिक परेशानी और शरीर में दर्द जैसी स्वास्थ्य समस्याओं की शिकायत  बताई है।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के हर दूसरे पुलिसकर्मी ने अपनी सेहत से जुड़ी शिकायत बताई है, लेकिन शिकायत करने वालों में से लगभग आधे (47%) लोगों ने ही किसी भी तरह के इलाज की मांग की, जैसा कि 2018 में इंडियन जर्नल ऑफ़ ऑक्यूपेशनल एंड एनवायरमेंटल मेडिसिन में प्रकाशित एक अध्ययन  बताया गया है। सबसे आम स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे मेटाबोलिक और हृदय  रोग (36.2%), मस्कुलोस्केलेटल (31.5%) और आंखों से सम्बंधित (28.1%) थे।

लगभग 16-17 घंटे काम करने और हर दिन काम के लिए यात्रा करने वाले एक सब-इंस्पेक्टर ने महसूस किया कि काम के बोझ के कारण उनकी यादाशत कमजोर हो रही है। एक और सब-इंस्पेक्टर, जिनसे हमने बात की, उन्होंने बताया कि अनिश्चित काम के घंटे और अनियमित खान-पान के कारण उन्हें एसिडिटी जैसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है।

एसिडिटी जैसी स्वास्थ्य समस्याएं पुलिस के स्वास्थ्य बीमा में शामिल नहीं हैं।

समूह बीमा योजना का जिक्र करते हुए एक सब-इंस्पेक्टर ने बताया, "केवल प्रमुख समस्याएं जैसे हृदय संबंधी समस्याएं, कैंसर, लीवर की समस्याएं आदि हमारे मेडिक्लेम में शामिल हैं। स्वास्थ्य की समस्याओं का हम हर दिन सामना करते हैं, लेकिन खांसी और जुकाम, मलेरिया, डेंगू, टाइफाइड, आदि को बीमे में कवर नहीं किया जाता है। हमें वास्तव में इसकी जरूरत है। इसके अलावा, लागतें तभी कवर की जाती हैं जब हम खुद को अस्पताल में भर्ती करवाते हैं। "

उनके एक सहयोगी ने कहा, '' यदि कोई आपात स्थिति है, तो हमें केवल सरकार द्वारा अनुमोदित अस्पताल में जाने पर ही लागत को कवर किया जाता है। लेकिन अगर कोई आपात स्थिति है तो कोई भी तो नजदीक के ही अस्पताल में ही जाएगा।"

कमरे के दूसरे छोर पर बैठे एक व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए, उन्होंने बताया, “इन साहब को शुगर की समस्या है और नजदीक के ही एक डॉक्टर के पास जाना पड़ा, क्योंकि समस्या काफी गंभीर हो गई थी। अब उन्हें अपनी जेब से हर चीज का भुगतान करना होगा।” उन्होंने आगे बताया,  “इस क्षेत्र में सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त एक ही अस्पताल है।”

एक अधिकारी ने याद करते हुए बताया कि नौकरी में तनाव न झेल पाने के कारण कैसे उनके कुछ सहयोगियों ने आत्महत्या कर ली थी। एक अन्य कर्मी ने बताया कि हाल ही में 35 वर्षीय पुलिसकर्मी की दिल का दौरा पड़ जाने से मौत हो गई थी।

हमने बीमा कवरेज के बारे में एक पुलिस स्टेशन में एक सब-इंस्पेक्टर से पूछा। बेहद आश्चर्य के साथ उन्होंने अपने सहयोगी से पूछा, "क्या हमारे पास मेडिक्लेम है?"

हर 5 में से 4 पुलिसकर्मियों को ओवरटाम के पैसे नहीं मिलते

सीएसडीएस-लोकनीति की रिपोर्ट में पाया गया कि पांच कर्मियों में से चार को ओवरटाइम के पैसे नहीं मिलते हैं।

बीपीआरडी की रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकांश राज्यों’ ने रिपोर्ट किया है कि पुलिसकर्मियों को सालाना एक महीने के वेतन का मुआवजा उनके ओवरटाइम काम के लिए दिया जाता है। रिपोर्ट में आगे जोड़ा गया है कि, एक साल के ओवरटाइम काम के लिए “इसे शायद ही पर्याप्त मुआवजा कहा जा सकता है।”

असम, गुजरात, कर्नाटक, मिज़ोरम और त्रिपुरा में, मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं पाया गया।

किसी ने भी ओवरटाइम के लिए पैसे मिलने की बात नहीं कही और सभी ने कहा कि उनके वेतन का एक बड़ा हिस्सा घर का किराया देने में खर्च हो जाता है, क्योंकि वे रहने के लिए सरकारी क्वार्टर हासिल करने में सक्षम नहीं हैं।

जैसा कि इंडियास्पेंड ने 7 अक्टूबर, 2019 की रिपोर्ट में बताया है, 2017 तक केवल 29.7% सिविल और सशस्त्र कर्मचारी आधिकारिक पुलिस आवास पाने में सक्षम थे। इसके अलावा, आवास पाने वाले 4 में से केवल तीन ही इससे संतुष्ट थे। अपने फील्ड वर्क में हमने पाया कि मौजूदा क्वार्टर असुरक्षित और अपर्याप्त थे।

एक कांस्टेबल ने बताया कि 25 साल पहले जब उन्होंने काम शुरु किया था तब उनकी तनख्वाह 12,000 रुपये महीने थी। अब यह बढ़ कर  60,000 रुपये महीने हुई है। उन्होंने कहा, "मैं बहुत बचत नहीं करता। लेकिन अपने परिवार का ध्यान रख पाता हूं। कम से कम मुझे अपने बच्चों की शिक्षा के लिए कर्ज लेने की आवश्यकता नहीं है। "

घाटकोपर के एक सब-इंस्पेक्टर इस बात को लेकर खुश थे कि गांव में रहने वाले उनके परिवार को खेती से कुछ अतिरिक्त आमदनी हो जाती है। उन्होंने बताया, "जिनके पास ऐसा कोई साधन नहीं है, उन्होंने अपने करियर के अंत तक कुछ भी नहीं बचाया है। यहां प्रतिदिन 17 घंटे खर्च करने के बजाय, मैं अपना खुद का बिजनेस कर सकता हूं और इससे ज्यादा कमा सकता हूं।" 

मानव अधिकारों, श्रम अधिकारों और संवैधानिक अधिकारों से वंचित

यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट का अनुच्छेद 23 कहता है कि सभी को ‘काम के लिए उचित और अनुकूल परिस्थितियों’ का अधिकार है। इसके अलावा,अनुच्छेद 24 के अनुसार ‘आराम और विश्राम’, ‘काम के घंटे की सीमा’, और ‘भुगतान’, ‘समय-समय पर छुट्टियां’ एक मानव अधिकार है।

संयुक्त राष्ट्र के एक सदस्य के रूप में (जिन्होंने नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय करार पर हस्ताक्षर किए और दोनों की पुष्टि की) भारत अपनी पुलिस फ़ोर्स सहित अपने सभी नागरिकों के मानव अधिकारों को बनाए रखने के लिए बाध्य है।

इसी तरह, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 42 के तहत, सरकार के लिए ये ज़रूरी है कि वो ‘काम की उचित और मानवीय स्थिति’ प्रदान प्रदान करे।

1935 में, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने सप्ताह में 40 घंटे के प्रस्ताव को स्वीकार किया था, जिसके अनुसार, देशों को जीवन स्तर में कमी लाए बिना लोगों के लिए सप्ताह में काम के चालीस घंटे निर्धाति करने थे। जो भारत में आज तक लागू नहीं हुआ।

कैसे पुलिस बल में चीजें बदली हैं, इस बात पर चर्चा करते हुए एक सब-इंस्पेक्टर ने रिपोर्टर से ही पूछा, “हमारे जीवन पर फैसला करते हुए क्या आपको लगता है कि हम तटस्थ हैं? क्योंकि हर दो या तीन दिन में आपके जैसा कोई व्यक्ति आता है और हमारे साथ बात करता है, लेकिन कुछ भी नहीं बदलता है। क्यों नहीं बदलती चीजें?”

(मेहता, शिकागो विश्वविद्यालय में  ग्रैजुएशन में द्वितीय वर्ष के छात्र हैं और इंडियास्पेंड में इंटर्न हैं।)

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 23 अक्टूबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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मुंबई: पूर्वी मुंबई के एक पुलिस स्टेशन थाना इंचार्ज (एसएचओ) बताते हैं कि वो पुलिस की वर्दी के दीवाने थे। उनकी इसी दीवानगी ने उन्हें पुलिस में भर्ती होने के लिए प्रेरित किया। सितंबर के महीने का वह दोपहर का समय था। एसएचओ 12 फुट की एक डेस्क पर अपने सहयोगियों, शिकायतकर्ताओं और पत्रकारों से घिरे हुए थे। वे सबकी बातों का जवाब दे रहे थे।

उन्होंने एक बेहद लोकप्रिय फिल्म, सिंघम का ज़िक्र करते हुए कहा कि, “पुलिस में ‘सिंघम’ फ़िल्म की तरह कुछ नहीं होता है। पुलिस फ़ोर्स में काम करना, फिल्मों की कहानियों से बहुत अलग होता है। हमें बहुत ज्यादा काम करना पड़ता है। हम बेहद तनाव में रहते हैं और हमें कई तरह के बाहरी दबावों का सामना करना पड़ता है।”

बहुत कम वीकली या मन्थली ऑफ के साथ काम करने के लंबे घंटे, भारतीय पुलिस फ़ोर्स के जीवन का हिस्सा है।  27 अगस्त, 2019 को जारी, स्टेटस ऑफ पोलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट 2019 में कहा गया है कि, भारत में लगभग 24% पुलिसकर्मी, औसतन 16 घंटे से ज्यादा काम करते हैं और 44% 12 घंटे से ज्यादा काम करते हैं। औसतन एक दिन में  उन्हें 14 घंटे काम करना पड़ता है।

इस संबंध में नई दिल्ली स्थित एक गैर-लाभकारी संस्था  कॉमन कॉज और विचार मंच  लोकनीति - सेंटर फॉर द स्टडी डेवल्पिंग सोसाईटीज ने एक अध्ययन किया है। अध्ययन के दौरान 73% पुलिसकर्मियों ने बताया कि उनके काम के बोझ का गंभीर असर उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। करीब 84% ने कहा कि वे अपने काम की वजह से अपने परिवार को समय नहीं दे पाते हैं।

“हम अपने बच्चों को पुलिस फ़ोर्स में शामिल नहीं होने देंगे!”

मुंबई में एक कांस्टेबल ने रिपोर्टर से बताया कि वे अपने बच्चों को पुलिस बल में शामिल नहीं होने देंगे। उन्होंने कहा, "अगर आप पुलिस में काम करते हैं तो आपको कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। काम पर आप कितना समय दे रहें हैं, इसका कोई मतलब नहीं रहता। चाहे 12 घंटे काम करें या 15 घंटे या 24 घंटे, पैसे तो आपको उतने ही मिलते हैं।" 

पांच में से चार पुलिस कर्मियों ने कहा कि उन्हें ओवरटाइम का पैसा नहीं मिलता है। इस अध्ययन में कहा गया है कि सभी कर्मियों को कम से कम एक साप्ताहिक अवकाश या वीकली ऑफ देने वाला एकमात्र राज्य महाराष्ट्र है।

महीने में कांस्टेबल को कितनी छुट्टियां मिलती है? इस सवाल के जवाब में वह हंसा और कहा, “कहां साहेब, 2-3 महीने में मुश्किल से एक छुट्टी मिलती है।”

एक सब-इंस्पेक्टर ने कहा, " हमारे बच्चे जहां भी चाहें, काम कर सकते हैं, लेकिन मैं उन्हें पुलिस में शामिल नहीं होने दूंगा। अगर मुझे इस तरह की कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है, तो मैं क्यों चाहूंगा कि मेरे बच्चे भी इन मुश्किलों का सामना करें? मैं इस बारे में सोच भी नहीं सकता हूं।”

उस सब-इंस्पेक्टर ने अपने दर्द को कुछ यूं बयान किया, "जब बाल ठाकरे की मृत्यु हुई थी, तो वीआईपी बंदोबस्त में, हम तीन-चार दिनों के लिए घर भी नहीं गए थे। हम थाने में कुर्सी पर बैठ कर ही झपकी ले सकते थे।"

आप कहीं घूमने या लंबी छुट्टी पर कितनी बार जाते हैं? सब-इंस्पेक्टर ने बताया, “मैं तो परसों की भी योजना नहीं बना सकता। मैं कैसे कहीं छुट्टी पर घूमने जा सकता हूं?"

एक एसएचओ ने हमें बताया, कि कागज पर उन्हें केवल 12 घंटे काम करने की जरूरत है, लेकिन वह रोजाना 14-15 घंटे काम करते हैं। उन्होंने कहा, "हमें हर हफ्ते एक छुट्टी मिलती है, लेकिन यह भी निश्चित नहीं है।" काम पर पहुंचने और घर वापस जाने में लगने वाले समय को गिनते हुए उन्होंने बताया कि वह हर रोज करीब 17 घंटे काम करते हैं।

उसने अपनी सगाई वाले दिन की घटना बताई, "मैंने रात 11 बजे की ट्रेन ली, सुबह 5.30-6 बजे के आसपास पहुंच गया, उस दिन सगाई हो गई, और अगले दिन वापस आ गया।" शिवाजी नगर पुलिस स्टेशन में एक सब-इंस्पेक्टर का दर्द भी कुछ ऐसा ही था।

एचएचओ ने बताया, "मेरे पास परिवार के साथ बिताने के लिए समय नहीं है। मेरा एक 18 महीने का बेटा है। जब मैं सुबह काम के लिए निकलता हूं, तो वह सो रहा होता है और जब मैं काम से लौटता हूं, तो वह भी सो रहा होता है।''   एसएचओ से ज्यादा बुजुर्ग अन्य सब-इंस्पेक्टरों के पास बताने के लिए ऐसी ही कई कहानियां थीं। साकी नाका के सब-इंस्पेक्टर ने कहा, "हमारे बच्चे वास्तव में यह जाने बिना बड़े हो गए कि उनके पिता कौन हैं, क्या करते हैं।" 

एक दूसरे सब-इंस्पेक्टर ने बताया, "जब मैंने काम शुरू किया तब मैं अपने परिवार के साथ समय नहीं बिता सकता था, और अब भी मैं उनको समय नहीं दे पाता हूं।"

एक अन्य सब-इंस्पेक्टर ने कहा, "यह ब्रिटिश जमाने से चल रहा है। अगर मैं त्योहार के अवसरों पर परिवार के साथ समय नहीं बिता सकता, तो सोचिए कि वे कैसा महसूस करते होंगे?"

हर राज्य में कमोवेश यही स्थिति है।

21 राज्यों में पुलिस कर्मचारी औसतन 11-18 घंटे काम करते हैं। सर्वेक्षण के परिणामों के अनुसार, ओडिशा में औसत काम के घंटे सबसे अधिक हैं, एक दिन में करीब 18 घंटे। नागालैंड में, पुलिस वाले औसतन 8 घंटे काम करते हैं।

हर 5 में से एक पद खाली है

ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट (बीपीआरडी) के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2017 तक पुलिस बल में कम से कम 22% पोस्ट भरे जाने थे। यह जनवरी 2016 से जनवरी 2017 के बीच फ़ोर्स में 11% वृद्धि के बावजूद है।

आंकड़े बताते हैं कि, 2011 से 2016 के बीच, भारतीय पुलिस फ़ोर्स में ख़ाली पदों की संख्या 25.4% से गिरकर 21.8% जरूर हुई  है, फिर भी, जनवरी 2017 तक, भारत का पुलिस-जनसंख्या अनुपात हर 100,000 लोगों पर 148 पुलिसकर्मी का था। यह आंकड़े संयुक्त राष्ट्र की सिफारिश  222 की संख्या का दो-तिहाई है।

एक कांस्टेबल ने कहा, "इस स्टेशन में भी कई पोस्ट खाली हैं। इसका मतलब यह है कि अगर मुझे कभी छुट्टी चाहिए, तो मुझे नहीं मिलेगी। यदि हमारे पास पर्याप्त लोग हैं, तो हम बारी-बारी से छुट्टी ले सकते हैं और सभी काम पूरा कर सकते हैं। लेकिन अगर मैं छुट्टी ले लेता हूं, तो काम अधूरा रह जाएगा। "

एसएचओ ने इस समस्या पर विस्तार से बातें की, "एक व्यक्ति को दस लोगों का काम करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, हमें इस क्षेत्र में कम से कम तीन से चार पुलिस स्टेशनों की आवश्यकता है, लेकिन केवल एक है।"

एक दूसरे एसएचओ का सवाल था, "हम हर किसी को कैसे सेवा दे सकते हैं? हमें उन लोगों की समस्याओं से निपटना होता जो अमीर और संपन्न हैं और दूसरी तरफ वे जो गरीब हैं और उद्योगिक, रिहायशी इलाकों और मलिन बस्तियों में रहते हैं।" 

4 में से 3 पुलिसकर्मियो को लगता है कि काम की स्थिति उनके स्वास्थ्य को प्रभावित करती है

राष्ट्रीय स्तर पर, 74% पुलिस स्टेशन स्टाफ और 76.3% एसएचओ ने महसूस किया है कि वर्तमान में काम करने की स्थिति उनके स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। बीपीआरडी की 2014 की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने हाई बीपी, मानसिक तनाव, नींद न आने, थकान, सांस की समस्या, गैस्ट्रिक परेशानी और शरीर में दर्द जैसी स्वास्थ्य समस्याओं की शिकायत  बताई है।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के हर दूसरे पुलिसकर्मी ने अपनी सेहत से जुड़ी शिकायत बताई है, लेकिन शिकायत करने वालों में से लगभग आधे (47%) लोगों ने ही किसी भी तरह के इलाज की मांग की, जैसा कि 2018 में इंडियन जर्नल ऑफ़ ऑक्यूपेशनल एंड एनवायरमेंटल मेडिसिन में प्रकाशित एक अध्ययन  बताया गया है। सबसे आम स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे मेटाबोलिक और हृदय  रोग (36.2%), मस्कुलोस्केलेटल (31.5%) और आंखों से सम्बंधित (28.1%) थे।

लगभग 16-17 घंटे काम करने और हर दिन काम के लिए यात्रा करने वाले एक सब-इंस्पेक्टर ने महसूस किया कि काम के बोझ के कारण उनकी यादाशत कमजोर हो रही है। एक और सब-इंस्पेक्टर, जिनसे हमने बात की, उन्होंने बताया कि अनिश्चित काम के घंटे और अनियमित खान-पान के कारण उन्हें एसिडिटी जैसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है।

एसिडिटी जैसी स्वास्थ्य समस्याएं पुलिस के स्वास्थ्य बीमा में शामिल नहीं हैं।

समूह बीमा योजना का जिक्र करते हुए एक सब-इंस्पेक्टर ने बताया, "केवल प्रमुख समस्याएं जैसे हृदय संबंधी समस्याएं, कैंसर, लीवर की समस्याएं आदि हमारे मेडिक्लेम में शामिल हैं। स्वास्थ्य की समस्याओं का हम हर दिन सामना करते हैं, लेकिन खांसी और जुकाम, मलेरिया, डेंगू, टाइफाइड, आदि को बीमे में कवर नहीं किया जाता है। हमें वास्तव में इसकी जरूरत है। इसके अलावा, लागतें तभी कवर की जाती हैं जब हम खुद को अस्पताल में भर्ती करवाते हैं। "

उनके एक सहयोगी ने कहा, '' यदि कोई आपात स्थिति है, तो हमें केवल सरकार द्वारा अनुमोदित अस्पताल में जाने पर ही लागत को कवर किया जाता है। लेकिन अगर कोई आपात स्थिति है तो कोई भी तो नजदीक के ही अस्पताल में ही जाएगा।"

कमरे के दूसरे छोर पर बैठे एक व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए, उन्होंने बताया, “इन साहब को शुगर की समस्या है और नजदीक के ही एक डॉक्टर के पास जाना पड़ा, क्योंकि समस्या काफी गंभीर हो गई थी। अब उन्हें अपनी जेब से हर चीज का भुगतान करना होगा।” उन्होंने आगे बताया,  “इस क्षेत्र में सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त एक ही अस्पताल है।”

एक अधिकारी ने याद करते हुए बताया कि नौकरी में तनाव न झेल पाने के कारण कैसे उनके कुछ सहयोगियों ने आत्महत्या कर ली थी। एक अन्य कर्मी ने बताया कि हाल ही में 35 वर्षीय पुलिसकर्मी की दिल का दौरा पड़ जाने से मौत हो गई थी।

हमने बीमा कवरेज के बारे में एक पुलिस स्टेशन में एक सब-इंस्पेक्टर से पूछा। बेहद आश्चर्य के साथ उन्होंने अपने सहयोगी से पूछा, "क्या हमारे पास मेडिक्लेम है?"

हर 5 में से 4 पुलिसकर्मियों को ओवरटाम के पैसे नहीं मिलते

सीएसडीएस-लोकनीति की रिपोर्ट में पाया गया कि पांच कर्मियों में से चार को ओवरटाइम के पैसे नहीं मिलते हैं।

बीपीआरडी की रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकांश राज्यों’ ने रिपोर्ट किया है कि पुलिसकर्मियों को सालाना एक महीने के वेतन का मुआवजा उनके ओवरटाइम काम के लिए दिया जाता है। रिपोर्ट में आगे जोड़ा गया है कि, एक साल के ओवरटाइम काम के लिए “इसे शायद ही पर्याप्त मुआवजा कहा जा सकता है।”

असम, गुजरात, कर्नाटक, मिज़ोरम और त्रिपुरा में, मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं पाया गया।

किसी ने भी ओवरटाइम के लिए पैसे मिलने की बात नहीं कही और सभी ने कहा कि उनके वेतन का एक बड़ा हिस्सा घर का किराया देने में खर्च हो जाता है, क्योंकि वे रहने के लिए सरकारी क्वार्टर हासिल करने में सक्षम नहीं हैं।

जैसा कि इंडियास्पेंड ने 7 अक्टूबर, 2019 की रिपोर्ट में बताया है, 2017 तक केवल 29.7% सिविल और सशस्त्र कर्मचारी आधिकारिक पुलिस आवास पाने में सक्षम थे। इसके अलावा, आवास पाने वाले 4 में से केवल तीन ही इससे संतुष्ट थे। अपने फील्ड वर्क में हमने पाया कि मौजूदा क्वार्टर असुरक्षित और अपर्याप्त थे।

एक कांस्टेबल ने बताया कि 25 साल पहले जब उन्होंने काम शुरु किया था तब उनकी तनख्वाह 12,000 रुपये महीने थी। अब यह बढ़ कर  60,000 रुपये महीने हुई है। उन्होंने कहा, "मैं बहुत बचत नहीं करता। लेकिन अपने परिवार का ध्यान रख पाता हूं। कम से कम मुझे अपने बच्चों की शिक्षा के लिए कर्ज लेने की आवश्यकता नहीं है। "

घाटकोपर के एक सब-इंस्पेक्टर इस बात को लेकर खुश थे कि गांव में रहने वाले उनके परिवार को खेती से कुछ अतिरिक्त आमदनी हो जाती है। उन्होंने बताया, "जिनके पास ऐसा कोई साधन नहीं है, उन्होंने अपने करियर के अंत तक कुछ भी नहीं बचाया है। यहां प्रतिदिन 17 घंटे खर्च करने के बजाय, मैं अपना खुद का बिजनेस कर सकता हूं और इससे ज्यादा कमा सकता हूं।" 

मानव अधिकारों, श्रम अधिकारों और संवैधानिक अधिकारों से वंचित

यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट का अनुच्छेद 23 कहता है कि सभी को ‘काम के लिए उचित और अनुकूल परिस्थितियों’ का अधिकार है। इसके अलावा,अनुच्छेद 24 के अनुसार ‘आराम और विश्राम’, ‘काम के घंटे की सीमा’, और ‘भुगतान’, ‘समय-समय पर छुट्टियां’ एक मानव अधिकार है।

संयुक्त राष्ट्र के एक सदस्य के रूप में (जिन्होंने नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय करार पर हस्ताक्षर किए और दोनों की पुष्टि की) भारत अपनी पुलिस फ़ोर्स सहित अपने सभी नागरिकों के मानव अधिकारों को बनाए रखने के लिए बाध्य है।

इसी तरह, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 42 के तहत, सरकार के लिए ये ज़रूरी है कि वो ‘काम की उचित और मानवीय स्थिति’ प्रदान प्रदान करे।

1935 में, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने सप्ताह में 40 घंटे के प्रस्ताव को स्वीकार किया था, जिसके अनुसार, देशों को जीवन स्तर में कमी लाए बिना लोगों के लिए सप्ताह में काम के चालीस घंटे निर्धाति करने थे। जो भारत में आज तक लागू नहीं हुआ।

कैसे पुलिस बल में चीजें बदली हैं, इस बात पर चर्चा करते हुए एक सब-इंस्पेक्टर ने रिपोर्टर से ही पूछा, “हमारे जीवन पर फैसला करते हुए क्या आपको लगता है कि हम तटस्थ हैं? क्योंकि हर दो या तीन दिन में आपके जैसा कोई व्यक्ति आता है और हमारे साथ बात करता है, लेकिन कुछ भी नहीं बदलता है। क्यों नहीं बदलती चीजें?”

(मेहता, शिकागो विश्वविद्यालय में  ग्रैजुएशन में द्वितीय वर्ष के छात्र हैं और इंडियास्पेंड में इंटर्न हैं।)

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 23 अक्टूबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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