दूध पिलाने वाली माताएं और कुपोषण से लड़ाई: पूर्व गोदावरी जिले का अनुभव

अपने तीन महीने के बेटे और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता टी. विजया के साथ उषाश्री। जन्म के समय उषाश्री का पहला बेटा 2.5 किलो का था, जबकि उसका छोटा बेटा 3 किलो का था, जाहिर तौर पर उसका वजन ज्यादा था, क्योंकि उसे बेहतर आहार दिया गया था।

राजामुंदरी (पूर्वी गोदावरी जिला), आंध्र प्रदेश: उषाश्री के दो बेटों के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर (दोनों के जन्म में वैसे सात साल का अंतर था) उनके वजन में था।

पहले बच्चे का वजन 2.5 किलोग्राम था, जो निम्न जन्म-भार वर्ग के ठीक ऊपर था,जो कि दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिमों से जुड़ा हुआ है, जैसा कि पांच में से एक भारतीय बच्चा ऐसे जोखिम का सामना करता है,और आंध्र प्रदेश (एपी) में ये आंकड़े 17.6 फीसदी हैं। विजयवाड़ा से 150 किमी उत्तर में तीन महीने पहले पैदा हुए उषाश्री के दूसरे बच्चे का वजन 3 किलोग्राम है।

उसकी दो गर्भावस्थाओं के दौरान जो परिवर्तन आया, वह एपी सरकार के एक कार्यक्रम की वजह से हुआ है, जो 2013 में 102 में ‘उच्च जोखिम’ वाले इलाकों के बाद से 2017 में सभी 676 ब्लॉकों के लिए शुरू हुआ है। इसके तहत स्थानीय आंगनवाड़ियों या सरकारी डे-केयर केंद्रों परलगभग 600,000 गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को चावल, सांभर, दूध और अंडे का एक गर्म, पका हुआ भोजन प्रदान किया जाता है।

कार्यक्रम से पहले, वाईएसआर अमृता हस्तम ( जिसे पहले अन्ना अमृथा हस्तम और इंदिरम्मा अमृता हस्तम के रूप में जाना जाता था ) राज्य ने गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को कच्चे चावल, दाल, वनस्पति तेल और चार अंडे घर पर उपलब्ध कराए थे।

गुलाबी कुर्ता और सलवार पहने उषाश्री ने राजमुंदरी उपनगर के आर्यपुरम में अपने घर पर एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और चार आगंतुकों से बात करते हुए कहा, "अब, मैं आंगनवाड़ी में (पकाया हुआ भोजन) खाती हूं।"

"भोजन देने के दोनों तरीके ठीक हैं, लेकिन यह बेहतर है," उषाश्री ने कहा, जो एक ग्रैजुएट हैं और घर पर ट्यूशन क्लास लेती हैं। उनके पति एक निजी कंपनी में काम करते हैं और उनकी मासिक आय 6,000 रुपये है, जो कि पूर्ववर्ती अविभाजित एपी की शहरी गरीबी रेखा से 1,809 रुपये अधिक है। उनकी एकमात्र शिकायत यह है कि उसके लिए अंडा खाना मुश्किल है, क्योंकि वह शाकाहारी है। जबकि आंगनवाड़ी में, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने बताया कि अंडा उनके लिए अच्छा है।

उषाश्री ने कहा, " मैं चावल और दूध लेती हूं,, लेकिन अंडा थोड़ा मुश्किल है।"

वाईएसआर अमृता हस्थम के कई स्वतंत्र मूल्यांकन नहीं हुए हैं, और इस तरह के भोजन वाले कार्यक्रमों के लाभ विवादास्पद हैं ( जिसपर हम बाद में बात करेंगे ) लेकिन संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) द्वारा सीमित 2019 के मूल्यांकन में पाया गया कि इसने माताओं को संतुष्ट किया है, उनकी आहार विविधता को 57-59 फीसदी तक बढ़ाया, अंडा और दूध की खपत 74-96 फीसदी बढ़ी और गोलियों के माध्यम से कैल्शियम का सेवन 87 फीसदी तक बढ़ा है।

एपी कार्यक्रम की हमारी जांच ने कुछ लाभों की पुष्टि की और अवैतनिक आंगनवाड़ी किराए और कर्मचारियों के वेतन और स्टाफ की कमी से संबंधित कई कमियों को पाया। लेकिन यूनिसेफ के मूल्यांकन के आंकड़ों में एपी और भारत के भविष्य के लिए निहितार्थ हैं।

कुपोषित बच्चे: भारत के लिए खोया हुआ अवसर

4.8 करोड़ से अधिक बच्चों के कुपोषित होने और हर पांच भारतीय बच्चों में से दो स्टंड या आयु की तुलना में कम कद होने के कारण, भारत में दुनिया में कुपोषित बच्चों की संख्या सबसे अधिक है। 

ऐसे बच्चों में से अधिकांश के लिए, समस्या उनके जन्म से पहले ही शुरू हो जाती है।

जर्नल ऑफ न्यूट्रिशन में जनवरी 2018 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार जिन बच्चों को सरकार द्वारा संचालित कार्यक्रमों के माध्यम से अतिरिक्त पोषण- -मां के गर्भ से लेकर तीन साल की आयु तक- प्राप्त हुआ, उनकी तीन से छह साल के बीच पोषण प्राप्त करने वाले बच्चों की तुलना में ग्रैजुएशन की डिग्री प्राप्त करने की संभावना 11 फीसदी ज्यादा थी।

आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले के कोथलंका आंगनवाड़ी केंद्र में बच्चे गर्म भोजन पाते हैं।

अध्ययन ने निर्णायक सबूत पेश की है नकि अजन्मे शिशुओं और शिशुओं के लिए पर्याप्त पोषण बाद में जीवन में उनकी शिक्षा और रोजगार की संभावनाओं को बढ़ाने वाले लाभ पैदा करता है।

प्रारंभिक जीवन पोषण के शिक्षा लाभ के साथ कॉलेज में विस्तार करते हुए, शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि इस तरह के दैनिक एक्सपोजर से देश के 20 से 24 आयु वर्ग के 7.38 करोड़ लोगों में 7.5 फीसदी ग्रैजुएट की संख्या 11.8 फीसदी तक बढ़ सकती है। कॉलेज ग्राजुएट दर में वृद्धि, बदले में, उच्च मजदूरी से आर्थिक लाभ प्रदान करेगी।

यह एक देश के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक उपलब्धि होगी, जिसमें दुनिया के 15.6 करोड़ में से तीन में से एक में पांच से कम उम्र के बच्चे स्टंड हैं। 2016 में, यह अनुमान लगाया गया था कि भविष्य में, खोई हुई स्कूली शिक्षा और आर्थिक उत्पादकता के माध्यम से, भारत के पांच साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चों के बीच $ 37.9 बिलियन का खर्च होगा, यानी 27,240 करोड़ रुपए या राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लिए भारत के 2019-20 के बजट के बराबर।

वाईएसआर अमृता हस्तम पांच राज्य कार्यक्रमों में से एक है, जिसका उद्देश्य वर्तमान पोषण प्रवृत्तियों को उलट देना है। भारत के जनसांख्यिकी लाभांश का लाभ उठाने के लिए स्वस्थ बच्चे एक पूर्वापेक्षा हैं, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कामकाजी आबादी के आर्थिक लाभ, जो अब खतरे में हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अगस्त 2019 में बताया था।

शिशु के लिए सबसे अच्छा क्या है, ये जानना जरूरी

उषाश्री ने कहा, "मैंने जन्म के एक घंटे के भीतर अपने बेटे को स्तनपान कराया। आंगनवाड़ी में, उन्होंने मुझे समझाया कि मुझे छह महीने तक स्तनपान करना है। इसलिए, मैं उसे कुछ और नहीं दे रहा हूं - जैसे पानी या अन्य तरह का दूध।”

ताजा, पौष्टिक भोजन का परिणाम यह रहा कि उषाश्री ने अपनी दूसरी गर्भावस्था के दौरान 12 किलो वजन बढ़ाया और उनका दूसरा बेटा स्वस्थ है।

अधिकांश भारतीय माताएं गरीब पोषण के साथ गर्भावस्था में प्रवेश करती हैं: 23 फीसदी प्रजनन-आयु की महिलाएं अपनी ऊंचाई के हिसाब से बहुत दुबली-पतली होती हैं और 58 फीसदी गर्भवती महिलाएं एनीमिक होती हैं, जिससे उनके और उनके बच्चों की मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015-16) के अनुसार 8 फीसदी गर्भवती महिलाएं ( लगभग 45 लाख ) किशोर वय की हैं।

यही कारण है कि माताओं की पोषण की स्थिति में सुधार करना महत्वपूर्ण है।

मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के लिए भारत की प्रमुख 44 वर्षीय योजना, इन्टग्रेटिड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विस (आईसीडीएस) जो दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा प्रयास है, उसके तहत केवल 46 फीसदी गर्भवती महिलाएं और 51 फीसदी स्तनपान कराने वाली माताओं को राष्ट्रव्यापी आंगनवाड़ी केंद्रों से पूरक पोषण सेवाएं प्राप्त हुईं हैं।

जिन बच्चों की मां वाईएसआर अमृता हस्तम में नामंकन लेती हैं उनका औसत जन्म-भार 2019 में 2.9 किग्रा था। 2.5 किग्रा से ऊपर के बच्चों को सामान्य वज़न वाले बच्चे कहा जाता है।वित्तीय वर्ष 2019-20 में लगभग 300,000 गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को नामांकित किया गया था।

एपी में कार्यक्रम आईसीडीएस और पूरक पोषण कार्यक्रम के तहत चलता है, 2,219 करोड़ रुपये के बजट के साथ, राज्य सरकार 17.75 रुपये में केंद्र सरकार के प्रत्येक भोजन के लिए 4.75 रुपये की हिस्सेदारी के साथ डालती है।

वाईएसआर अमृता हस्तम भोजन की लागत क्या है?

भारत में पांच राज्य कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र अपनी आंगनवाड़ी केंद्रों में माताओं को गर्म पका भोजन का कोई न कोई रूप प्रदान करते हैं। दो राज्यों, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश ने कार्यक्रम बंद कर दिया है, और ओडिशा कार्यक्रम शुरू करने वाला है।

चूंकि हॉट-कुक-मील-फॉर-मदर्स प्रोग्राम ने टेक-होम राशन (टीएचआर) को बदल दिया था ( छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों और घरेलू उपयोग के लिए गर्भवती माताओं के लिए पूरक पोषण ) जो पारंपरिक रूप से एपी सरकार द्वारा वितरित किया जाता था, विशेषज्ञों ने कहा कि टीएचआर के बदले गर्म-पका-भोजन कार्यक्रम के प्रदर्शन का आकलन करना महत्वपूर्ण है।

अगस्त 2019 की शुरुआत में, हमने एपी के पूर्वी गोदावरी जिले के शहरी, ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों की यात्रा की और गर्म-पका हुआ भोजन कार्यक्रम और लाभार्थियों के बीच संतुष्टि की व्यापक स्वीकृति पाई। हमने यह भी पाया कि योजना को लागू करने वाली आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को सरकार से अधिक समर्थन और बेहतर बुनियादी ढांचे की आवश्यकता थी।

अधिक आहार विविधता, सीमित वजन बढ़ना

जबकि पूरक पोषण कार्यक्रम ने पहले से ही माताओं को कच्चे राशन की आपूर्ति की है, आंगनवाड़ी में गर्म भोजन के पीछे तर्क यह है कि मां भोजन (और घर पर किसी और का नहीं) का सेवन सुनिश्चित करती है, प्रसवकालीन सेवाएं और अन्य पोषण सहायता प्राप्त करती है, जैसे लोहा और फोलिक सप्लीमेंट, कैल्शियम की गोलियां और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी।

आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले के कोथलंका आंगनवाड़ी केंद्र में गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को गर्म पकाया भोजन परोसा जाता है।

एपी के वाईएसआर अमृता हस्तम में, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को गर्म, पका हुआ भोजन सप्ताह में छह दिन सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे के बीच परोसा जाता है। भोजन आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा तैयार किया जाता है, जो इसे वहां आने वाले बच्चों के लिए भी तैयार करतेी हैं। पूरक पोषण कार्यक्रम के तहत घर पर प्रदान किए जाने के अलावा, राज्य ने हर दिन एक अंडे और 200 मिलीलीटर दूध पर जोड़ा है।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे एक मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से, कार्यक्रम में नामांकित महिलाओं, उन्हें प्राप्त सेवाओं, गर्भावस्था के दौरान प्राप्त वजन और शिशुओं के जन्म के समय के हिसाब से रिकॉर्ड रखेंगी। 2019 यूनिसेफ के मूल्यांकन का हमने उल्लेख किया है, वह 360 गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं के साक्षात्कार और राज्य सरकार की प्रबंधन सूचना प्रणाली के आंकड़ों की समीक्षा के आधार पर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में किया गया था। यह भी पाया गया:

  • जबकि आयरन फोलिक एसिड गोलियों की ऑन-द-स्पॉट खपत ‘खराब’ (22.6%) थी, क्योंकि अधिकांश उत्तरदाताओं ने घर पर गोलियां (77%) लीं, 87% माताओं ने कैल्शियम लिया और 56% ने डॉर्मॉर्मिंग टैबलेट।
  • अधिकांश लाभार्थियों ने महीने में 25 दिनों में से 21 पर भोजन का सेवन किया।
  • गर्भावस्था के दूसरे और नौवें महीने के बीच अनुमानित औसत वजन बढ़ोतरी 8.3 से 9.7 किलोग्राम तक था।
  • मूल्यांकन के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में आदिवासी क्षेत्रों में महिलाओं में कुपोषण अधिक था: ग्रामीण क्षेत्रों में 12 फीसदी की तुलना में 19 फीसदी वेस्टेड थी और अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में 89 फीसदी की तुलना में कार्यक्रम का उपयोग करने वाली 79 फीसदी आदिवासी महिलाओं की न्यूनतम पोषण विविधता थी।

गर्भावस्था के दौरान माताओं द्वारा वजन बढ़ना: अप्रैल-जून, 2019

राज्य सरकार द्वारा प्रदान किए गए नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, अधिकांश उत्तरदाताओं ने भोजन को स्वादिष्ट और मूल्यांकन में पर्याप्त मात्रा में पाया, जबकि अधिकांश नामांकित माताओं ने वजन में वृद्धि 6 किलो से कम की, जबकि केवल 6.8 फीसदी ने वजन में 9 किलोग्राम से अधिक वृद्धि की।

यह भारत के औसत मातृ वजन के 5.1 किलोग्राम से 8.3 किलोग्राम के अनुरूप है, लेकिन वैश्विक औसत 8.3 किलोग्राम से 15.3 किलोग्राम से नीचे है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, नामांकित महिलाओं के लिए पैदा हुए बच्चे का औसत वजन (जनवरी और जुलाई 2019 के बीच) 2.9 किलोग्राम था, जो भारत में औसत जन्म-भार (2.8 से 3 किलोग्राम) के भीतर है।

पिछड़े आदिवासी क्षेत्रों में, सबसे अधिक उत्साह

वर्दांत पहाड़ियों और धान के खेतों से घिरा, देवरपल्ले पूर्वी गोदावरी जिले के मरुदुमिलि मंडल में एक छोटा सा आदिवासी गांव है। देवरपल्ले का आंगनवाड़ी केंद्र बाढ़ में नष्ट हो गया और एक सामुदायिक केंद्र में कक्षाएं आयोजित की जाती हैं। शौचालय या रसोई घर नहीं है।

एक सहायक की जगह कई वर्षों से नहीं भरी गई है और 29 वर्षीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता गंगा भवरी खाना पकाने का काम भी करती हैं। उन्होंने कहा, "कोई आंगनवाड़ी इमारत नहीं है, कोई परिसर नहीं है, कोई बिजली और पानी की आपूर्ति नहीं है।" एक गैर-लाभार्थी शिक्षण सहायक, जो बच्चों के साथ काम करता है, भावरी की मदद करता है।

21 साल की लोमेश्वरी, दो बच्चों की मां है, एक बच्चा तीन साल का है और दूसरी सात महीने की। लोहेश्वरी कहती हैं, “आंगनवाड़ी में वह जो खाना खाती थी, वह अमूल्य था, जिसमें अंडा, दूध, सांबर और चावल मिलता था।हम हर दिन एक अंडा खाना वहन नहीं कर सकते हैं।"

देवरपल्ले आंगनवाड़ी में, हम 21 साल लोमोंश्वरी से तुलाकाल की, जो दो बच्चों की मां है, एक तीन साल और दूसरी सात महीने की।वह दिखने में काफी युवा लगती है, क्योंकि वह दुबली-पतली और छोटी थी। उसका वजन लगभग 42 किलोग्राम है, और गर्भावस्था के दौरान हर दिन आंगनवाड़ी में आई है और जब तक उसका दूसरा बच्चा छह महीने का नहीं हो गया, तब तक आती रही है।

“आंगनवाड़ी में उसने जो खाना खाया, वह अमूल्य था”, लोधेश्वरी कहती हैं, "हम हर दिन अंडा नहीं खा सकते । आदिवासी समुदाय अपनी गायों का दूध नहीं पीते हैं, इसलिए माताओं की प्रोटीन तक सीमित पहुंच है।

यहां महिलाओं के लिए जीवन कठिन है। जिनके तीन से पांच बच्चे हैं, वे गर्भावस्था में भी काम करती हैं और वे प्रसव के लिए अपने मायके नहीं जाते हैं - जैसा कि भारत के कई हिस्सों में होता है, इसलिए माताएं जन्म के तुरंत बाद घर के कामों में लग जाती हैं।

आदिवासी क्षेत्रों में महिलाओं और बच्चों के लिए दो अतिरिक्त कार्यक्रम हैं: आंगनवाड़ी केंद्र राज्यव्यापी स्तर पर तीन से छह वर्ष की आयु के बच्चों को खिलाते हैं, जबकि आदिवासी क्षेत्रों में छह महीने बाद बच्चों को खिलाते हैं। स्तनपान कराने वाली माताओं के पोषण में सुधार के लिए खजूर, गुड़ और मूंगफली की चिक्की - एक प्रकार की कैंडी - और रागी माल्ट का अतिरिक्त पैकेट दिया जाता है।

26 वर्षीय कदवला सुगुनवती ने कहा, "मेरे दो बच्चे केंद्र में आते हैं, जो भोजन मिलता है, उसे वे पसंद करते हैं। यहां जब से उन्होंने भोजन करना शुरु किया है, वे कम बीमार पड़ते हैं।"

देवरपल्ले आंगनवाड़ी में पंजीकृत पांच गर्भवती महिलाएं, तीन स्तनपान कराने वाली माताएं और सात महीने से सात साल की उम्र के 33 बच्चे हैं। लगभग सभी दैनिक भोजन के लिए आते हैं।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता गंगा भवरी ने कहा, "कुछ महिलाएं सुबह काम पर निकलती हैं, इसलिए अंडे और दूध के लिए सुबह आती हैं, बाकी चावल और सांबर के लिए दोपहर में आती हैं।"

 यह उत्साह हमारे द्वारा देखे गए अन्य ग्रामीण केंद्रों में स्पष्ट था, लेकिन यह शहरी आंगनवाड़ियों में नहीं था। 

शहरी क्षेत्रों में अधिक पकड़

आर्यपुरम में लिशबरपेटा नगरपालिका प्राथमिक विद्यालय में, दो आंगनवाड़ी केंद्रों को मिला दिया गया है। कक्षा में छह से कम उम्र के 30 से अधिक बच्चे पढ़ रहे थे, और दो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और दो सहायक भोजन पका रही थी। हालांकि, यहां पंजीकृत छह गर्भवती और चार स्तनपान कराने वाली माताओं में से, केवल दो या तीन ही हर दिन केंद्र में आती हैं।

आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले में राजामुंदरी के लिशबरपेटा म्यूनिसिपल स्कूल में बाल विकास परियोजना अधिकारी सी एच वी नरसम्मा द्वारा गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं की काउंसलिंग की गई।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता विजया ने कहा, " वे बताते हैं कि यहां तक पहुंचने की यात्रा मुश्किल है ऊपर और नीचे जाने के लिए सीढ़ियों का इस्तेमाल करना पड़ता है, जो उन्हें मुश्किल लगता है।कई माताएं अपने परिवार के सदस्यों द्वारा पैक किए गए और उनके लिए लाए जाने वाले भोजन को पसंद करती हैं जो वे घर पर खाती हैं।"

एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के अनुरोध पर उस दिन भोजन करने के लिए आई एक मां ने कहा, "मुझे भोजन करने में पूरा एक घंटा लगता है और मेरे घर में एक छोटा बच्चा है और एक अन्य बच्चा भी है।"

पूर्वी गोदावरी जिले के आईसीडीएस के परियोजना निदेशक डी. सुखजीवन बाबू ने कहा, "लाभार्थियों को लगता है कि यह मुफ्त भोजन है, [आंगनवाड़ी] केंद्र में क्यों जाना और खाना है।" उन्होंने कहा कि कम से कम 10-20 फीसदी महिलाएं भोजन के लिए नहीं आती हैं।

बाबू ने कहा, "घर ले जाने वाले राशन और गर्म भोजन के बीच माताओं के लिए एक फ्लेक्सबिलटी होनी चाहिए।"

गर्म, पके भोजन के लिए क्या सबूत हैं?

हर कोई "स्पॉट-फीडिंग कार्यक्रमों", जैसे कि वाईएसआर अमृता हस्तम के लाभों के बारे में आश्वस्त नहीं है।

जबकि मातृ कुपोषण ( एक मां की ऊंचाई, बॉडी मास इंडेक्स और एनीमिया ) गरीब बच्चे के परिणामों के लिए एक जोखिम कारक है। बच्चे के स्वास्थ्य पर एक गर्म पकाया दैनिक भोजन या मातृ आहार पर अन्य पूरक खाद्य पदार्थों का प्रभाव स्पष्ट नहीं है, जैसा कि इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ रिसर्च फेलो, पूर्णिमा मेनन कहती हैं।

मेनन ने कहा, " मैं समझता हूं कि इन कार्यक्रमों में भोजन के समय अतिरिक्त इनपुट भी शामिल होते हैं-आयरन की गोलियां और व्यवहार में बदलाव । यह अच्छा है, लेकिन यह भोजन के प्रभाव को अन्य घटकों की पेशकश के साथ प्रति सेगमेंट को असंगत करने के लिए भी चुनौतीपूर्ण बनाता है।"

मेनन के दो अन्य रेजर्वैशन थे: 

  • जबकि वाईएसआर अमृता हस्तम जैसे कार्यक्रमों में भाग लेने वाली माताओं को लाभ हो सकता है, साक्ष्य ने दिखाया कि केंद्र-आधारित फीडिंग प्रोग्राम उन लोगों को बाहर कर देते हैं जो हर दिन उपस्थित नहीं हो सकते हैं।
  • गर्भवती माताओं के लिए दूध पिलाने के कार्यक्रम, जो पहले से ही कैलोरी-पर्याप्त हैं, गर्भावस्था के बाद अतिरिक्त वजन बढ़ने और प्रतिधारण का कारण बन सकते हैं, जो दक्षिणी राज्यों के लिए चिंता का विषय है।

अन्य विशेषज्ञों ने कहा है कि स्पॉट-फीडिंग कार्यक्रमों का समर्थन करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं।

कई अध्ययनों की 2015 की समीक्षा के अनुसार, संतुलित ऊर्जा और प्रोटीन पूरकता प्रदान करने वाली महिलाओं के लिए स्टिलबोर्न ( मृत बच्चे) शिशुओं का जोखिम काफी कम हो गया था। अन्य समीक्षाओं और अध्ययनों (यहां, यहां और यहां) में नवजात शिशुओं के जन्म-वजन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिनकी माताओं को गर्भावस्था के दौरान पोषण की खुराक प्रदान की गई थी, जैसा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य शोधकर्ता और कार्यकर्ता और ओडिसा के केजोनहर में एक गैर-लाभकारी संस्था, एकजुट के संस्थापक, प्रशान्त त्रिपाठी ने एक ई-मेल के जवाब में कहा है।

त्रिपाठी ने कहा कि जन्म के पहले 1,000 दिनों में सरकार को कुपोषण के अंतरजनपदीय चक्र को संबोधित करने के लिए निवेश करना चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्यों को ‘खाद्य-असुरक्षित क्षेत्रों’ का नक्शा बनाना चाहिए और उन्हें न केवल पूरक पोषण के साथ बल्कि कुपोषण के अन्य निर्धारकों के लिए भी लक्षित करना चाहिए, जैसे कि पीने का पानी।

28 साल की वेंकट लक्ष्मी, अपने सात महीने के बेटे के साथ, जो जन्म के समय स्वस्थ था और वजन 3 किलो था।वह आंध्र प्रदेश सरकार के गर्म, पकाए गए भोजन कार्यक्रम की लाभार्थी है, जो महीने में 25 दिन यह भोजन प्रदान करता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि, पर्याप्त मानव संसाधन और बुनियादी ढांचे के बिना, यहां तक ​​कि सबसे अच्छी योजनाएं अपनी क्षमता तक नहीं पहुंच सकती हैं। जबकि एपी सरकार वाईएसआर अमृता हस्तम को चलाने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन वेतन, किराए और स्टाफ की कमी से जुड़ी कुछ स्पष्ट कमियां हैं।

जिन आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से हमने बात की, उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें दो-चार महीने देरी से वेतन मिलता है। चूंकि कई आंगनवाड़ी केंद्र सरकारी भवनों में नहीं हैं, इसलिए कुछ केंद्रों का किराया पिछले छह महीनों से नहीं चुकाया गया था। कई आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने अपनी जेब से केंद्र चलाने की लागत की बात कही। हर स्तर पर रिक्तियां कार्यक्रम की दक्षता को प्रभावित करती हैं: देवरपल्ले में आंगनवाड़ी में एक आंगनवाड़ी सहायक नहीं थी; आंगनवाड़ी सहायकों में 8 फीसदी पद खाली हैं। जिले में पर्यवेक्षकों में 23 फीसदी रिक्तियां हैं, जैसा कि सरकारी रिकॉर्ड से पता चलता है।

सुपरवाइजर के रिक्ति पद प्रभावी निगरानी को प्रभावित करते हैं। कई केंद्रों पर तौल कांटे थे जो काम नहीं कर रहे थे।

यूनिसेफ के मूल्यांकन में कहा गया है कि बड़े मोर्चे पर इस बात की चिंता है कि सबसे कमजोर माताएं योजना से बाहर रह गई हैं, क्योंकि खाद्य-असुरक्षित लाभार्थियों का प्रतिशत उम्मीद से काफी कम था।

(यदवार विशेष संवाददाता है और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

इस रिपोर्टिंग के लिए ‘रोशनी-सेंटर ऑफ वुमन क्लेक्टिवस लेड सोशल एक्शन’ की ओर से समर्थन मिला था।

 यह रिपोर्ट यहां पहली बार Healthcheck पर प्रकाशित हुई थी।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

राजामुंदरी (पूर्वी गोदावरी जिला), आंध्र प्रदेश: उषाश्री के दो बेटों के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर (दोनों के जन्म में वैसे सात साल का अंतर था) उनके वजन में था।

पहले बच्चे का वजन 2.5 किलोग्राम था, जो निम्न जन्म-भार वर्ग के ठीक ऊपर था,जो कि दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिमों से जुड़ा हुआ है, जैसा कि पांच में से एक भारतीय बच्चा ऐसे जोखिम का सामना करता है,और आंध्र प्रदेश (एपी) में ये आंकड़े 17.6 फीसदी हैं। विजयवाड़ा से 150 किमी उत्तर में तीन महीने पहले पैदा हुए उषाश्री के दूसरे बच्चे का वजन 3 किलोग्राम है।

उसकी दो गर्भावस्थाओं के दौरान जो परिवर्तन आया, वह एपी सरकार के एक कार्यक्रम की वजह से हुआ है, जो 2013 में 102 में ‘उच्च जोखिम’ वाले इलाकों के बाद से 2017 में सभी 676 ब्लॉकों के लिए शुरू हुआ है। इसके तहत स्थानीय आंगनवाड़ियों या सरकारी डे-केयर केंद्रों परलगभग 600,000 गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को चावल, सांभर, दूध और अंडे का एक गर्म, पका हुआ भोजन प्रदान किया जाता है।

कार्यक्रम से पहले, वाईएसआर अमृता हस्तम ( जिसे पहले अन्ना अमृथा हस्तम और इंदिरम्मा अमृता हस्तम के रूप में जाना जाता था ) राज्य ने गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को कच्चे चावल, दाल, वनस्पति तेल और चार अंडे घर पर उपलब्ध कराए थे।

गुलाबी कुर्ता और सलवार पहने उषाश्री ने राजमुंदरी उपनगर के आर्यपुरम में अपने घर पर एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और चार आगंतुकों से बात करते हुए कहा, "अब, मैं आंगनवाड़ी में (पकाया हुआ भोजन) खाती हूं।"

"भोजन देने के दोनों तरीके ठीक हैं, लेकिन यह बेहतर है," उषाश्री ने कहा, जो एक ग्रैजुएट हैं और घर पर ट्यूशन क्लास लेती हैं। उनके पति एक निजी कंपनी में काम करते हैं और उनकी मासिक आय 6,000 रुपये है, जो कि पूर्ववर्ती अविभाजित एपी की शहरी गरीबी रेखा से 1,809 रुपये अधिक है। उनकी एकमात्र शिकायत यह है कि उसके लिए अंडा खाना मुश्किल है, क्योंकि वह शाकाहारी है। जबकि आंगनवाड़ी में, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने बताया कि अंडा उनके लिए अच्छा है।

उषाश्री ने कहा, " मैं चावल और दूध लेती हूं,, लेकिन अंडा थोड़ा मुश्किल है।"

वाईएसआर अमृता हस्थम के कई स्वतंत्र मूल्यांकन नहीं हुए हैं, और इस तरह के भोजन वाले कार्यक्रमों के लाभ विवादास्पद हैं ( जिसपर हम बाद में बात करेंगे ) लेकिन संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) द्वारा सीमित 2019 के मूल्यांकन में पाया गया कि इसने माताओं को संतुष्ट किया है, उनकी आहार विविधता को 57-59 फीसदी तक बढ़ाया, अंडा और दूध की खपत 74-96 फीसदी बढ़ी और गोलियों के माध्यम से कैल्शियम का सेवन 87 फीसदी तक बढ़ा है।

एपी कार्यक्रम की हमारी जांच ने कुछ लाभों की पुष्टि की और अवैतनिक आंगनवाड़ी किराए और कर्मचारियों के वेतन और स्टाफ की कमी से संबंधित कई कमियों को पाया। लेकिन यूनिसेफ के मूल्यांकन के आंकड़ों में एपी और भारत के भविष्य के लिए निहितार्थ हैं।

कुपोषित बच्चे: भारत के लिए खोया हुआ अवसर

4.8 करोड़ से अधिक बच्चों के कुपोषित होने और हर पांच भारतीय बच्चों में से दो स्टंड या आयु की तुलना में कम कद होने के कारण, भारत में दुनिया में कुपोषित बच्चों की संख्या सबसे अधिक है। 

ऐसे बच्चों में से अधिकांश के लिए, समस्या उनके जन्म से पहले ही शुरू हो जाती है।

जर्नल ऑफ न्यूट्रिशन में जनवरी 2018 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार जिन बच्चों को सरकार द्वारा संचालित कार्यक्रमों के माध्यम से अतिरिक्त पोषण- -मां के गर्भ से लेकर तीन साल की आयु तक- प्राप्त हुआ, उनकी तीन से छह साल के बीच पोषण प्राप्त करने वाले बच्चों की तुलना में ग्रैजुएशन की डिग्री प्राप्त करने की संभावना 11 फीसदी ज्यादा थी।

आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले के कोथलंका आंगनवाड़ी केंद्र में बच्चे गर्म भोजन पाते हैं।

अध्ययन ने निर्णायक सबूत पेश की है नकि अजन्मे शिशुओं और शिशुओं के लिए पर्याप्त पोषण बाद में जीवन में उनकी शिक्षा और रोजगार की संभावनाओं को बढ़ाने वाले लाभ पैदा करता है।

प्रारंभिक जीवन पोषण के शिक्षा लाभ के साथ कॉलेज में विस्तार करते हुए, शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि इस तरह के दैनिक एक्सपोजर से देश के 20 से 24 आयु वर्ग के 7.38 करोड़ लोगों में 7.5 फीसदी ग्रैजुएट की संख्या 11.8 फीसदी तक बढ़ सकती है। कॉलेज ग्राजुएट दर में वृद्धि, बदले में, उच्च मजदूरी से आर्थिक लाभ प्रदान करेगी।

यह एक देश के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक उपलब्धि होगी, जिसमें दुनिया के 15.6 करोड़ में से तीन में से एक में पांच से कम उम्र के बच्चे स्टंड हैं। 2016 में, यह अनुमान लगाया गया था कि भविष्य में, खोई हुई स्कूली शिक्षा और आर्थिक उत्पादकता के माध्यम से, भारत के पांच साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चों के बीच $ 37.9 बिलियन का खर्च होगा, यानी 27,240 करोड़ रुपए या राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लिए भारत के 2019-20 के बजट के बराबर।

वाईएसआर अमृता हस्तम पांच राज्य कार्यक्रमों में से एक है, जिसका उद्देश्य वर्तमान पोषण प्रवृत्तियों को उलट देना है। भारत के जनसांख्यिकी लाभांश का लाभ उठाने के लिए स्वस्थ बच्चे एक पूर्वापेक्षा हैं, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कामकाजी आबादी के आर्थिक लाभ, जो अब खतरे में हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अगस्त 2019 में बताया था।

शिशु के लिए सबसे अच्छा क्या है, ये जानना जरूरी

उषाश्री ने कहा, "मैंने जन्म के एक घंटे के भीतर अपने बेटे को स्तनपान कराया। आंगनवाड़ी में, उन्होंने मुझे समझाया कि मुझे छह महीने तक स्तनपान करना है। इसलिए, मैं उसे कुछ और नहीं दे रहा हूं - जैसे पानी या अन्य तरह का दूध।”

ताजा, पौष्टिक भोजन का परिणाम यह रहा कि उषाश्री ने अपनी दूसरी गर्भावस्था के दौरान 12 किलो वजन बढ़ाया और उनका दूसरा बेटा स्वस्थ है।

अधिकांश भारतीय माताएं गरीब पोषण के साथ गर्भावस्था में प्रवेश करती हैं: 23 फीसदी प्रजनन-आयु की महिलाएं अपनी ऊंचाई के हिसाब से बहुत दुबली-पतली होती हैं और 58 फीसदी गर्भवती महिलाएं एनीमिक होती हैं, जिससे उनके और उनके बच्चों की मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015-16) के अनुसार 8 फीसदी गर्भवती महिलाएं (लगभग 45 लाख) किशोर वय की हैं।

यही कारण है कि माताओं की पोषण की स्थिति में सुधार करना महत्वपूर्ण है।

मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के लिए भारत की प्रमुख 44 वर्षीय योजना, इन्टग्रेटिड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विस (आईसीडीएस) जो दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा प्रयास है, उसके तहत केवल 46 फीसदी गर्भवती महिलाएं और 51 फीसदी स्तनपान कराने वाली माताओं को राष्ट्रव्यापी आंगनवाड़ी केंद्रों से पूरक पोषण सेवाएं प्राप्त हुईं हैं।

जिन बच्चों की मां वाईएसआर अमृता हस्तम में नामंकन लेती हैं उनका औसत जन्म-भार 2019 में 2.9 किग्रा था। 2.5 किग्रा से ऊपर के बच्चों को सामान्य वज़न वाले बच्चे कहा जाता है।वित्तीय वर्ष 2019-20 में लगभग 300,000 गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को नामांकित किया गया था।

एपी में कार्यक्रम आईसीडीएस और पूरक पोषण कार्यक्रम के तहत चलता है, 2,219 करोड़ रुपये के बजट के साथ, राज्य सरकार 17.75 रुपये में केंद्र सरकार के प्रत्येक भोजन के लिए 4.75 रुपये की हिस्सेदारी के साथ डालती है।

वाईएसआर अमृता हस्तम भोजन की लागत क्या है?

भारत में पांच राज्य कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र अपनी आंगनवाड़ी केंद्रों में माताओं को गर्म पका भोजन का कोई न कोई रूप प्रदान करते हैं। दो राज्यों, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश ने कार्यक्रम बंद कर दिया है, और ओडिशा कार्यक्रम शुरू करने वाला है।

चूंकि हॉट-कुक-मील-फॉर-मदर्स प्रोग्राम ने टेक-होम राशन (टीएचआर) को बदल दिया था ( छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों और घरेलू उपयोग के लिए गर्भवती माताओं के लिए पूरक पोषण ) जो पारंपरिक रूप से एपी सरकार द्वारा वितरित किया जाता था, विशेषज्ञों ने कहा कि टीएचआर के बदले गर्म-पका-भोजन कार्यक्रम के प्रदर्शन का आकलन करना महत्वपूर्ण है।

अगस्त 2019 की शुरुआत में, हमने एपी के पूर्वी गोदावरी जिले के शहरी, ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों की यात्रा की और गर्म-पका हुआ भोजन कार्यक्रम और लाभार्थियों के बीच संतुष्टि की व्यापक स्वीकृति पाई। हमने यह भी पाया कि योजना को लागू करने वाली आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को सरकार से अधिक समर्थन और बेहतर बुनियादी ढांचे की आवश्यकता थी।

अधिक आहार विविधता, सीमित वजन बढ़ना

जबकि पूरक पोषण कार्यक्रम ने पहले से ही माताओं को कच्चे राशन की आपूर्ति की है, आंगनवाड़ी में गर्म भोजन के पीछे तर्क यह है कि मां भोजन (और घर पर किसी और का नहीं) का सेवन सुनिश्चित करती है, प्रसवकालीन सेवाएं और अन्य पोषण सहायता प्राप्त करती है, जैसे लोहा और फोलिक सप्लीमेंट, कैल्शियम की गोलियां और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी।

आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले के कोथलंका आंगनवाड़ी केंद्र में गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को गर्म पकाया भोजन परोसा जाता है।

एपी के वाईएसआर अमृता हस्तम में, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को गर्म, पका हुआ भोजन सप्ताह में छह दिन सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे के बीच परोसा जाता है। भोजन आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा तैयार किया जाता है, जो इसे वहां आने वाले बच्चों के लिए भी तैयार करतेी हैं। पूरक पोषण कार्यक्रम के तहत घर पर प्रदान किए जाने के अलावा, राज्य ने हर दिन एक अंडे और 200 मिलीलीटर दूध पर जोड़ा है।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे एक मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से, कार्यक्रम में नामांकित महिलाओं, उन्हें प्राप्त सेवाओं, गर्भावस्था के दौरान प्राप्त वजन और शिशुओं के जन्म के समय के हिसाब से रिकॉर्ड रखेंगी। 2019 यूनिसेफ के मूल्यांकन का हमने उल्लेख किया है, वह 360 गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं के साक्षात्कार और राज्य सरकार की प्रबंधन सूचना प्रणाली के आंकड़ों की समीक्षा के आधार पर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में किया गया था। यह भी पाया गया:

  • जबकि आयरन फोलिक एसिड गोलियों की ऑन-द-स्पॉट खपत ‘खराब’ (22.6%) थी, क्योंकि अधिकांश उत्तरदाताओं ने घर पर गोलियां (77%) लीं, 87% माताओं ने कैल्शियम लिया और 56% ने डॉर्मॉर्मिंग टैबलेट।
  • अधिकांश लाभार्थियों ने महीने में 25 दिनों में से 21 पर भोजन का सेवन किया।
  • गर्भावस्था के दूसरे और नौवें महीने के बीच अनुमानित औसत वजन बढ़ोतरी 8.3 से 9.7 किलोग्राम तक था।
  • मूल्यांकन के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में आदिवासी क्षेत्रों में महिलाओं में कुपोषण अधिक था: ग्रामीण क्षेत्रों में 12 फीसदी की तुलना में 19 फीसदी वेस्टेड थी और अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में 89 फीसदी की तुलना में कार्यक्रम का उपयोग करने वाली 79 फीसदी आदिवासी महिलाओं की न्यूनतम पोषण विविधता थी।

गर्भावस्था के दौरान माताओं द्वारा वजन बढ़ना: अप्रैल-जून, 2019

राज्य सरकार द्वारा प्रदान किए गए नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, अधिकांश उत्तरदाताओं ने भोजन को स्वादिष्ट और मूल्यांकन में पर्याप्त मात्रा में पाया, जबकि अधिकांश नामांकित माताओं ने वजन में वृद्धि 6 किलो से कम की, जबकि केवल 6.8 फीसदी ने वजन में 9 किलोग्राम से अधिक वृद्धि की।

यह भारत के औसत मातृ वजन के 5.1 किलोग्राम से 8.3 किलोग्राम के अनुरूप है, लेकिन वैश्विक औसत 8.3 किलोग्राम से 15.3 किलोग्राम से नीचे है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, नामांकित महिलाओं के लिए पैदा हुए बच्चे का औसत वजन (जनवरी और जुलाई 2019 के बीच) 2.9 किलोग्राम था, जो भारत में औसत जन्म-भार (2.8 से 3 किलोग्राम) के भीतर है।

पिछड़े आदिवासी क्षेत्रों में, सबसे अधिक उत्साह

वर्दांत पहाड़ियों और धान के खेतों से घिरा, देवरपल्ले पूर्वी गोदावरी जिले के मरुदुमिलि मंडल में एक छोटा सा आदिवासी गांव है। देवरपल्ले का आंगनवाड़ी केंद्र बाढ़ में नष्ट हो गया और एक सामुदायिक केंद्र में कक्षाएं आयोजित की जाती हैं। शौचालय या रसोई घर नहीं है।

एक सहायक की जगह कई वर्षों से नहीं भरी गई है और 29 वर्षीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता गंगा भवरी खाना पकाने का काम भी करती हैं। उन्होंने कहा, "कोई आंगनवाड़ी इमारत नहीं है, कोई परिसर नहीं है, कोई बिजली और पानी की आपूर्ति नहीं है।" एक गैर-लाभार्थी शिक्षण सहायक, जो बच्चों के साथ काम करता है, भावरी की मदद करता है।

21 साल की लोमेश्वरी, दो बच्चों की मां है, एक बच्चा तीन साल का है और दूसरी सात महीने की। लोहेश्वरी कहती हैं, “आंगनवाड़ी में वह जो खाना खाती थी, वह अमूल्य था, जिसमें अंडा, दूध, सांबर और चावल मिलता था।हम हर दिन एक अंडा खाना वहन नहीं कर सकते हैं।"

देवरपल्ले आंगनवाड़ी में, हम 21 साल लोमोंश्वरी से तुलाकाल की, जो दो बच्चों की मां है, एक तीन साल और दूसरी सात महीने की।वह दिखने में काफी युवा लगती है, क्योंकि वह दुबली-पतली और छोटी थी। उसका वजन लगभग 42 किलोग्राम है, और गर्भावस्था के दौरान हर दिन आंगनवाड़ी में आई है और जब तक उसका दूसरा बच्चा छह महीने का नहीं हो गया, तब तक आती रही है।

“आंगनवाड़ी में उसने जो खाना खाया, वह अमूल्य था”, लोधेश्वरी कहती हैं, "हम हर दिन अंडा नहीं खा सकते । आदिवासी समुदाय अपनी गायों का दूध नहीं पीते हैं, इसलिए माताओं की प्रोटीन तक सीमित पहुंच है।

यहां महिलाओं के लिए जीवन कठिन है। जिनके तीन से पांच बच्चे हैं, वे गर्भावस्था में भी काम करती हैं और वे प्रसव के लिए अपने मायके नहीं जाते हैं - जैसा कि भारत के कई हिस्सों में होता है, इसलिए माताएं जन्म के तुरंत बाद घर के कामों में लग जाती हैं।

आदिवासी क्षेत्रों में महिलाओं और बच्चों के लिए दो अतिरिक्त कार्यक्रम हैं: आंगनवाड़ी केंद्र राज्यव्यापी स्तर पर तीन से छह वर्ष की आयु के बच्चों को खिलाते हैं, जबकि आदिवासी क्षेत्रों में छह महीने बाद बच्चों को खिलाते हैं। स्तनपान कराने वाली माताओं के पोषण में सुधार के लिए खजूर, गुड़ और मूंगफली की चिक्की - एक प्रकार की कैंडी - और रागी माल्ट का अतिरिक्त पैकेट दिया जाता है।

26 वर्षीय कदवला सुगुनवती ने कहा, "मेरे दो बच्चे केंद्र में आते हैं, जो भोजन मिलता है, उसे वे पसंद करते हैं। यहां जब से उन्होंने भोजन करना शुरु किया है, वे कम बीमार पड़ते हैं।"

देवरपल्ले आंगनवाड़ी में पंजीकृत पांच गर्भवती महिलाएं, तीन स्तनपान कराने वाली माताएं और सात महीने से सात साल की उम्र के 33 बच्चे हैं। लगभग सभी दैनिक भोजन के लिए आते हैं।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता गंगा भवरी ने कहा, "कुछ महिलाएं सुबह काम पर निकलती हैं, इसलिए अंडे और दूध के लिए सुबह आती हैं, बाकी चावल और सांबर के लिए दोपहर में आती हैं।"

 यह उत्साह हमारे द्वारा देखे गए अन्य ग्रामीण केंद्रों में स्पष्ट था, लेकिन यह शहरी आंगनवाड़ियों में नहीं था। 

शहरी क्षेत्रों में अधिक पकड़

आर्यपुरम में लिशबरपेटा नगरपालिका प्राथमिक विद्यालय में, दो आंगनवाड़ी केंद्रों को मिला दिया गया है। कक्षा में छह से कम उम्र के 30 से अधिक बच्चे पढ़ रहे थे, और दो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और दो सहायक भोजन पका रही थी। हालांकि, यहां पंजीकृत छह गर्भवती और चार स्तनपान कराने वाली माताओं में से, केवल दो या तीन ही हर दिन केंद्र में आती हैं।

आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले में राजामुंदरी के लिशबरपेटा म्यूनिसिपल स्कूल में बाल विकास परियोजना अधिकारी सी एच वी नरसम्मा द्वारा गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं की काउंसलिंग की गई।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता विजया ने कहा, " वे बताते हैं कि यहां तक पहुंचने की यात्रा मुश्किल है ऊपर और नीचे जाने के लिए सीढ़ियों का इस्तेमाल करना पड़ता है, जो उन्हें मुश्किल लगता है।कई माताएं अपने परिवार के सदस्यों द्वारा पैक किए गए और उनके लिए लाए जाने वाले भोजन को पसंद करती हैं जो वे घर पर खाती हैं।"

एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के अनुरोध पर उस दिन भोजन करने के लिए आई एक मां ने कहा, "मुझे भोजन करने में पूरा एक घंटा लगता है और मेरे घर में एक छोटा बच्चा है और एक अन्य बच्चा भी है।"

पूर्वी गोदावरी जिले के आईसीडीएस के परियोजना निदेशक डी. सुखजीवन बाबू ने कहा, "लाभार्थियों को लगता है कि यह मुफ्त भोजन है, [आंगनवाड़ी] केंद्र में क्यों जाना और खाना है।" उन्होंने कहा कि कम से कम 10-20 फीसदी महिलाएं भोजन के लिए नहीं आती हैं।

बाबू ने कहा, "घर ले जाने वाले राशन और गर्म भोजन के बीच माताओं के लिए एक फ्लेक्सबिलटी होनी चाहिए।"

गर्म, पके भोजन के लिए क्या सबूत हैं?

हर कोई "स्पॉट-फीडिंग कार्यक्रमों", जैसे कि वाईएसआर अमृता हस्तम के लाभों के बारे में आश्वस्त नहीं है।

जबकि मातृ कुपोषण ( एक मां की ऊंचाई, बॉडी मास इंडेक्स और एनीमिया ) गरीब बच्चे के परिणामों के लिए एक जोखिम कारक है। बच्चे के स्वास्थ्य पर एक गर्म पकाया दैनिक भोजन या मातृ आहार पर अन्य पूरक खाद्य पदार्थों का प्रभाव स्पष्ट नहीं है, जैसा कि इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ रिसर्च फेलो, पूर्णिमा मेनन कहती हैं।

मेनन ने कहा, " मैं समझता हूं कि इन कार्यक्रमों में भोजन के समय अतिरिक्त इनपुट भी शामिल होते हैं-आयरन की गोलियां और व्यवहार में बदलाव । यह अच्छा है, लेकिन यह भोजन के प्रभाव को अन्य घटकों की पेशकश के साथ प्रति सेगमेंट को असंगत करने के लिए भी चुनौतीपूर्ण बनाता है।"

मेनन के दो अन्य रेजर्वैशन थे: 

  • जबकि वाईएसआर अमृता हस्तम जैसे कार्यक्रमों में भाग लेने वाली माताओं को लाभ हो सकता है, साक्ष्य ने दिखाया कि केंद्र-आधारित फीडिंग प्रोग्राम उन लोगों को बाहर कर देते हैं जो हर दिन उपस्थित नहीं हो सकते हैं।
  • गर्भवती माताओं के लिए दूध पिलाने के कार्यक्रम, जो पहले से ही कैलोरी-पर्याप्त हैं, गर्भावस्था के बाद अतिरिक्त वजन बढ़ने और प्रतिधारण का कारण बन सकते हैं, जो दक्षिणी राज्यों के लिए चिंता का विषय है।

अन्य विशेषज्ञों ने कहा है कि स्पॉट-फीडिंग कार्यक्रमों का समर्थन करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं।

कई अध्ययनों की 2015 की समीक्षा के अनुसार, संतुलित ऊर्जा और प्रोटीन पूरकता प्रदान करने वाली महिलाओं के लिए स्टिलबोर्न ( मृत बच्चे) शिशुओं का जोखिम काफी कम हो गया था। अन्य समीक्षाओं और अध्ययनों (यहां, यहां और यहां) में नवजात शिशुओं के जन्म-वजन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिनकी माताओं को गर्भावस्था के दौरान पोषण की खुराक प्रदान की गई थी, जैसा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य शोधकर्ता और कार्यकर्ता और ओडिसा के केजोनहर में एक गैर-लाभकारी संस्था, एकजुट के संस्थापक, प्रशान्त त्रिपाठी ने एक ई-मेल के जवाब में कहा है।

त्रिपाठी ने कहा कि जन्म के पहले 1,000 दिनों में सरकार को कुपोषण के अंतरजनपदीय चक्र को संबोधित करने के लिए निवेश करना चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्यों को ‘खाद्य-असुरक्षित क्षेत्रों’ का नक्शा बनाना चाहिए और उन्हें न केवल पूरक पोषण के साथ बल्कि कुपोषण के अन्य निर्धारकों के लिए भी लक्षित करना चाहिए, जैसे कि पीने का पानी।

28 साल की वेंकट लक्ष्मी, अपने सात महीने के बेटे के साथ, जो जन्म के समय स्वस्थ था और वजन 3 किलो था।वह आंध्र प्रदेश सरकार के गर्म, पकाए गए भोजन कार्यक्रम की लाभार्थी है, जो महीने में 25 दिन यह भोजन प्रदान करता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि, पर्याप्त मानव संसाधन और बुनियादी ढांचे के बिना, यहां तक ​​कि सबसे अच्छी योजनाएं अपनी क्षमता तक नहीं पहुंच सकती हैं। जबकि एपी सरकार वाईएसआर अमृता हस्तम को चलाने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन वेतन, किराए और स्टाफ की कमी से जुड़ी कुछ स्पष्ट कमियां हैं।

जिन आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से हमने बात की, उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें दो-चार महीने देरी से वेतन मिलता है। चूंकि कई आंगनवाड़ी केंद्र सरकारी भवनों में नहीं हैं, इसलिए कुछ केंद्रों का किराया पिछले छह महीनों से नहीं चुकाया गया था। कई आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने अपनी जेब से केंद्र चलाने की लागत की बात कही। हर स्तर पर रिक्तियां कार्यक्रम की दक्षता को प्रभावित करती हैं: देवरपल्ले में आंगनवाड़ी में एक आंगनवाड़ी सहायक नहीं थी; आंगनवाड़ी सहायकों में 8 फीसदी पद खाली हैं। जिले में पर्यवेक्षकों में 23 फीसदी रिक्तियां हैं, जैसा कि सरकारी रिकॉर्ड से पता चलता है।

सुपरवाइजर के रिक्ति पद प्रभावी निगरानी को प्रभावित करते हैं। कई केंद्रों पर तौल कांटे थे जो काम नहीं कर रहे थे।

यूनिसेफ के मूल्यांकन में कहा गया है कि बड़े मोर्चे पर इस बात की चिंता है कि सबसे कमजोर माताएं योजना से बाहर रह गई हैं, क्योंकि खाद्य-असुरक्षित लाभार्थियों का प्रतिशत उम्मीद से काफी कम था।

(यदवार विशेष संवाददाता है और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

इस रिपोर्टिंग के लिए ‘रोशनी-सेंटर ऑफ वुमन क्लेक्टिवस लेड सोशल एक्शन’ की ओर से समर्थन मिला था।

 यह रिपोर्ट यहां पहली बार Healthcheck पर प्रकाशित हुई थी।

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