दोहरी हिंसा का शिकार यूपी की दलित महिलाएं

नई दिल्ली/लखनऊ: मीरा सिंह (35) पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाथरस ज़िले के उसी बुलगढ़ी गांव में रहती हैं जहां 19 साल की एक दलित लड़की के साथ ठाकुर समुदाय के चार लोगों ने कथित गैंग रेप किया। ये मामला पिछले दिनों सुर्ख़ियों में रहा। मीरा को विश्वास ही नहीं होता कि उसके गांव में इस तरह की घटना घट सकती है।

“हमारा गांव हमेशा से सुरक्षित गांव रहा है, यह पहली बार हुआ है जब इस तरह की घटना हुई है,” अपने खेतों में मवेशियों की देखरेख कर रही मीरा ने कहा।

 

गांव के जिस हिस्से में दलित रहते हैं, वहां की महिलाओं के मुताबिक यौन उत्पीड़न की घटनाएं आम बात हैं। गांव में क़रीब 250 घर हैं और इनमें महज़ चार घर ही दलितों के हैं। “हम अपनी बेटियों को अकेले बाहर नहीं निकलने देते हैं,” गांव की एक दलित महिला ने बताया। “वैसे तो ठाकुर हमें छूते भी नहीं हैं लेकिन रेप के लिए वो हमारी बेटियां उठाकर ले जाते हैं,” सदियों से चली आ रही छुआछूत ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा। 

पश्चिमी, मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश के पांच ज़िलों- हाथरस, श्रावस्ती, उन्नाव, जौनपुर और लखनऊ में पीड़ितों और दलित सामाजिक कार्यकर्ताओं से इंटरव्यू के दौरान हमने पाया कि दलित महिलाओं के साथ यौन हिंसा केवल बुलगढ़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे उत्तर प्रदेश में आम बात है। हमने यह भी पाया कि महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकार को लेकर राज्य में चलने वाले सरकारी कार्यक्रम -- प्रोजेक्ट, आश्रय घर और हेल्पलाइन -- पिछले कुछ साल से निष्क्रिय अवस्था में हैं, उनकी उपेक्षा हो रही है, फ़ंड की कमी है या सीधे उन्हें बंद किया जा चुका है। इसके बारे में हम विस्तार से आगे बताएंगे।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि 2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से राज्य में स्थिति बदतर हुई है। “2017 के बाद से राज्य का राजनीतिक वातावरण सभी तरह के महिला अधिकारों के ख़िलाफ़ बन गया है,” उत्तर प्रदेश सरकार की योजना महिला सामख्या की प्रमुख, स्मृति सिंह ने कहा। हिंसा की शिकार दलित महिलाओं की संस्थागत मदद और सहायता 2017 से लगातार कम हुई है और पिछले दो साल में लगभग बंद हो गई है।”

उत्तर प्रदेश में 2016 से 2019 के दौरान महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों में सबसे ज़्यादा 66.7% बढ़ोत्तरी हुई। इसी दौरान अनुसूचित जाति की महिलाओं के साथ रेप के मामलों में बढ़ोत्तरी के हिसाब से उत्तर प्रदेश 20.67% के साथ दूसरे पायदान पर है। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर इसमें 37%  की बढ़ोत्तरी देखने को मिली है। देश भर में अनुसूचित जाति की महिलाओं के साथ रेप के मामलों में 37% और उनके ख़िलाफ़ हिंसा के मामलो में 20% की बढ़ोत्तरी हुई है, क्राइम इन इंडिया-2019 के आंकड़ों के इंडियास्पेंड के विश्लेषण के मुताबिक़। यह तो पंजीकृत हुए अपराध हैं लेकिन भारत में 2009 से 2018 के दौरान अनुसूचित जातियों के ख़िलाफ़ करीब 32.5% अपराध अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निषेध) अधिनियम, 1989 के तहत दर्ज नहीं हुए हैं।

“सभी महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध बढ़ रहे हैं लेकिन दलित महिलाओं को लिंगभेद और जाति को लेकर दोहरा भेदभाव झेलना पड़ रहा है। पुरुषों की आपसी लड़ाई का बदला भी इन महिलाओं से लिया जाता है,” लखनऊ की महिला अधिकार कार्यकर्ता ताहिरा हसन ने कहा।

 

साल 2019 में देश में जितनी महिलाओं के साथ रेप हुआ उनमें 11% महिलाएं अनुसूचित जाति से हैं -- औसतन एक दिन में 10, क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट के मुताबिक़। 

“पिछले पांच साल (2014 से 2018) में, मौजूदा सरकार के कार्यकाल के दौरान ही दलितों के ख़िलाफ़ अत्याचार के मामले में उत्तर प्रदेश पहले, बिहार दूसरे, राजस्थान तीसरे और मध्यप्रदेश चौथे स्थान पर है,” अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निषेध) अधिनियम 1989 और नियम 1995 के अनुपालन को लेकर  सितंबर 2020 में जारी नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स (एनसीडीएचआर) की स्टेट्स रिपोर्ट के मुताबिक़। 

बेमानी हों चुके हैं सरकारी सहायता नेटवर्क 

जैसा कि हमने पहले बताया कि उत्तर प्रदेश में महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा संबंधी योजनाएं और कार्यक्रम या तो बंद हो चुके हैं या फिर वे केवल काग़ज़ों तक सीमित रह गए हैं, यह अनुदान बंद करने या कम करने का परिणाम है, विशेषज्ञों ने हमें बताया। 

उदाहरण के लिए महिला सामख्या को ले सकते हैं। महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के मामलों में उन्हें क़ानूनी ढंग से अपने अधिकार दिलाने में मदद करने वाला यह कार्यक्रम राज्य के 19 ज़िलों और 78 ब्लॉक में काम कर रहा था।

इस प्रोजेक्ट के तहत विभिन्न ज़िलों में क़रीब 250,000 महिलाओं को मदद मिली और 650 महिलाओं को रोज़गार मिला हुआ था। “आकलन के नाम पर, पिछले दो साल से हमारी फ़ंडिंग बंद थी. इस साल मार्च में हमें एक पत्र मिला जिसमें कहा गया कि इस प्रोजेक्ट को किसी अन्य प्रोजेक्ट के साथ मिला दिया गया है,” प्रोजेक्ट की प्रमुख स्मृति सिंह ने बताया। “हमारे पास अन्य प्रोजेक्ट के साथ सम्मिलित करने के बारे में कोई डिटेल्स नहीं है। इस प्रोजेक्ट के साथ काम कर रही महिलाओं को पैसे मिलने बंद हो चुके हैं, बिना पैसों के वह क्यों काम करेंगी? धीरे-धीरे टीम बिखर गई है, इससे जुड़ी महिलाओं को अधर में लटका दिया गया है। यह हमारे लिए किसी झटके से कम नहीं था क्योंकि ऑडिट टीम हमारे काम से संतुष्ट थी -- हमारे पास दिखाने के लिए वास्तविक परिणाम मौजूद हैं,” स्मृति सिंह ने आगे कहा।

हिंसा, दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का सामना करने वाली महिलाओं की मदद के लिए बनी 181 हेल्पलाइन भी फ़ंड के अभाव में बंद हो चुकी है। “हेल्पलाइन में काम कर रही महिलाओं को पिछले नौ महीने से तनख़्वाह नहीं मिली है,” 181 हेल्पलाइन की प्रमुख अर्चना सिंह ने बताया।

यौन हिंसा, रेप, एसिड अटैक का सामना करने वाली महिलाओं को मेडिकल और क़ानूनी सहायता देने के लिए केंद्र सरकार ने 2015 में वन स्टॉप सेंटर्स की शुरु किए थे। उत्तर प्रदेश के 11 ज़िलों में ऐसे सेंटर बनाए गए थे जहां पीड़ित महिलाओं के रहने की सुविधाएं थीं। उन्हें भोजन मुहैया कराया जाता था और रोज़गार संबंधी दक्षता हासिल करने के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था भी होनी थी। सेंटर में काम करने वाली एक सरकारी महिला कर्मचारी के मुताबिक प्रशिक्षण देने के लिए मशीन कभी मिल ही नहीं पाई। 

“अब महिलाओं को यह सब सुविधाएं नहीं मिलती. कर्मचारियों की संख्या कम हो गई है और मेरी तनख़्वाह भी नहीं मिली है,” महिला कर्मचारी ने बताया। इस कर्मचारी के दावे के मुताबिक सेंटर्स को बंद नहीं किया गया है लेकिन अब यहां कोई नहीं रहता -- ख़ाली कमरे. कोई फ़र्नीचर नहीं है, कोई बेड नहीं। जो महिलाएं शेल्टर में आती हैं, उन्हें ऑनलाइन एफ़आईआर दर्ज कराने में मदद की जाती है और फिर उन्हें वापस घर भेज दिया जाता है।

इन सेंटर्स में आने वाली ज़्यादातर महिलाएं ना तो अपने घर और ना ही आस पड़ोस में जा सकती हैं, क्योंकि वे इन जगहों पर होने वाली हिंसा से भी बचना चाहती हैं -- रेप या एसिड अटैक का सामना करने वाली महिलाओं को घरेलू दुर्व्यवहार के अलावा परिवार या समाज की ओर से उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। इन सेंटर्स के पूरी तरह बंद होेने के बाद कोई नहीं है जो इन महिलाओं की जानकारी रख सके कि वो कहां हैं और कैसी हैं।

देश भर की महिलाओं की सुरक्षा और बचाव के लिए केंद्र सरकार ने 2013 में निर्भया फ़ंड की स्थापना की थी।  FactChecker.in ने 7 दिसंबर, 2019 की अपनी इस रिपोर्ट में बताया था कि इस फ़ंड का पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं हो रहा है। उत्तर प्रदेश को निर्भया फ़ंड से 324.88 करोड़ रुपए मिले लेकिन राज्य ने इसमें से केवल 66.7% राशि का का इस्तेमाल किया।

इस उपेक्षा की झलक राज्य में अलग-अलग जगहों पर पीड़ित महिलाओं से इंटरव्यू के दौरान भी मिली।

‘अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए उसे लखनऊ भेजा’

राज्य की राजधानी से लखनऊ से महज़ 45 किलोमीटर दूर मलिहाबाद ब्लॉक के एक गांव की 14 साल की दलित लड़की के साथ आठ सितंबर, 2020 को कथित तौर पर गैंगरेप किया गया। नज़दीकी पुलिस स्टेशन ने रिपोर्ट दर्ज करने की बजाय पीड़ित को चेतावनी दी कि मामले को उछालना “मुसीबतों को न्यौता” देना होगा, लड़की की मां ने बताया।

“दो लोगों ने मुझे रेप किया. मैं काफ़ी दर्द में थी और चिल्ला भी नहीं पाई क्योंकि उन्होंने मेरा मुंह बंद किया हुआ था,” 14 साल की पीड़ित ने बताया।  “उन्होंने धमकी दी थी कि अगर किसी से कुछ कहा तो और भी बुरा अंजाम होगा. इसलिए मैं घर चली आई थी, मुझे खून बह रहा था।”

इस गांव में करीब चार हज़ार परिवार रहते हैं और अधिकांश घर दलित और समाज में निचली समझे जाने वाली जातियों के हैं। पड़ोस के गांव में राजनैतिक तौर पर सशक्त ठाकुर, यादव और मौर्य जातियों का दबदबा है।

 

“ये वही लोग थे जो मेरी बड़ी बेटी के साथ यौन दुर्व्यवहार कर रहे थे, जब भी वह घर से बाहर निकलती, उसके साथ यौन दुर्व्यवहार करते,” पीड़ित की मां ने बताया। “हम जानते थे कि ऐसा कुछ होगा इसलिए हमने उसे घरेलू मदद के काम के लिए लखनऊ भेज दिया था।”

परिवार ने अपनी दो दूसरी बेटियों की चिंता में पुलिस के पास शिकायत की। “हमारे पास ताक़त नहीं है तो भी उन लोगों के सामने हम अपनी बेटियों की कुर्बानी नहीं दे सकते,” पीड़ित के पिता ने कहा। 

कई बार कोशिशों के बाद पुलिस रिपोर्ट दर्ज करने को तैयार हुई। केवल एक शख़्स के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया। उस शख़्स की उम्र 22 साल थी लेकिन रिपोर्ट में उसे 17 साल का नाबालिग बताया गया, पीड़ित के परिवार वालों ने आरोप लगाया।

पीड़ित का कहना था कि पुलिस, फ़ॉरेंसिक टीम और आस पड़ोस के लोगों का सामना करने से उसे आघात पहुंचा है। “मैंने पुलिस के सामने उस भयानक हादसे को कम से कम 50 बार दोहराया। हर बार वे मुझसे एक जैसे सवाल पूछते,” पीड़ित ने कहा। “हम तीन बार लखनऊ गए तब वे लखनऊ के बलरामपुर हॉस्पिटल में मेरा मेडिकल कराने को तैयार हुए जो यहां से 50 किलोमीटर दूर है।”

ये मेडिकल परीक्षण भी बिना किसी काउंसलिंग के हुए जो पीड़ित के लिए किसी डराने वाले अनुभव से कम नहीं था। “मेरे बाल और नाखून कतरे गए. उन्होंने मेरे मुंह और निजी अंग में कुछ (स्वैब) डाला. मैं डर से काफ़ी भयभीत और जड़ हो चुकी थी।”

इस घटना को एक महीना हो चुका है। परिवार पुलिस स्टेशन, अस्पताल और अदालत के चक्कर लगाते लगाते थक चुका है और उसकी जमा पूंजी भी ख़त्म होने को है। “स्थानीय पुलिस से हमें लगातार धमकियां मिल रही है, हमारी छोटी बेटियां लगातार डर में जी रही हैं. आख़िर कब तक हम ऐसे रहेंगे?” पीड़ित के पिता ने कहा।

पीड़ित परिवार गांव से छह किलोमीटर दूर पड़ोस के गांव में हुई एक अन्य वारदात के बारे में भी बताता है, जिसमें छह साल की एक दलित लड़की के साथ स्कूल के शौचालय में 2011 में रेप हुआ था, वहां वह नग्नावस्था में ख़ून में लथपथ मिली थी। उस मामले में रिपोर्ट तो दर्ज हुई लेकिन राजनीतिक रसूख के चलते अभियुक्त कभी गिरफ़्तार नहीं किए गए, उन्होंने बताया।

रिपोर्ट दर्ज कराने से हतोत्साहित करते हैं

समाज के हाशिए पर रह रही इन जातियों की शिकायत है कि रेप के मामलों में रिपोर्ट दर्ज कराना बेहद मुश्किल होता है। “ पीड़ित दलित महिलाएं आमतौर पर ग़रीब होती हैं और उन्हें पुलिस की मदद नहीं मिल पाती है। आमतौर पर रिपोर्ट दर्ज करने से पहले पुलिस जो रिश्वत मांगती है वह देने के लिए इनके पास पैसा नहीं होता है,” नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट में कहा गया है।

 

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद लंबी न्यायिक प्रक्रिया का ख़र्च उठा पाना भी ग़रीब परिवारों के बस की बात नहीं होती -- क़ानूनी शुल्क का भी भुगतान करना होता है, दिहाड़ी बंद हो जाती है, आने-जाने में ख़र्च भी होता है। हमें ऐसा एक भी परिवार नहीं मिला जो मुकद्दमा लड़ने के लिए काम छोड़ चुका हो। “अपराध करने वाले सवर्णों के पास पैसा है, राजनीतिक पहुंच है. इसलिए वे खुले घूमते रहते हैं,” पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर ज़िले की दलित कार्यकर्ता शोभना ने कहा। 

2019 के अंत तक महिलाओं के ख़िलाफ़ हुए 33.8% अपराधों की जांच लंबित है जबकि भारतीय दंड संहिता के तहत दर्ज किए दूसरे ऐसे अपराधों में 29.3% मामलों में जांच लंबित हैं। महिलाओं के साथ हुए अपराध में केवल 7.6% मामलों में सुनवाई पूरी हई है जबकि अनुसूचित जाति के साथ हुए अपराधों में महज 6.1% मामलों में सुनवाई पूरी हो सकी है इनमें से 60% से अधिक मामलों में अभियुक्त बरी कर दिए गए, इंडियास्पेंड की 9 अक्टूबर, 2020 की इस रिपोर्ट के मुताबिक।

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निषेध) अधिनियम 1989 और नियम 1995 के तहत 2009 से 20018 के बीच सुनवाई पूरी होने के बाद औसतन 25.2% मामलों में सजा हुई है जबकि अभियुक्तों के औसतन बरी किए जाने के मामले 62.5% रहे हैं, नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स (एनसीडीएचआर) की रिपोर्ट के मुताबिक।  हालांकि 2019 में अनुसूचित जातियों के ख़िलाफ़ अपराध में सज़ा की दर 66% थी।

 

“ज़्यादातर मामलों में पुलिस पर रिपोर्ट दर्ज नहीं करने का दबाव होता है,” इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील और कई पीड़ित दलित महिलाओं की पैरवी करने वाले, अभिषेक द्विवेदी ने कहा। “कायदे से यौन हिंसा के मामलों में पूरी प्रक्रिया चार महीने में पूरी करनी होती है लेकिन ऐसा कभी होता नहीं है। इस दौरान पीड़ित परिवारों पर अदालत से बाहर समझौता करने या बयान बदलने का दबाव होताहै। यह पूरी प्रक्रिया ग़रीब दलितों के पक्ष में नहीं है क्योंकि ना तो उसके पास पैसा होता है और ना ही रसूख।”

मलिहाबाद की नाबालिग रेप पीड़ित के 45 साल के पिता दिहाड़ी मज़दूर हैं और वे सवर्णों के खेतों में 200 से 250 रूपए की दिहाड़ी पर काम करते हैं। उनका कहना था कि उनके जैसे परिवारों के सामने दो ही विकल्प होते हैं: परिवार का पेट भरें या मुक़दमा लड़ें। “जिनके पास पैसा है, ताक़त है वहीं मुक़दमा लड़ सकता है,” उन्होंने कहा।

ज़मीनी और राजनैतिक विवाद का शिकार

देश भर में 2015 से 2019 के बीच अनुसूचित जाति के ख़िलाफ़ अपराध 18.8% बढ़े हैं, क्राइम इन इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक। उत्तर प्रदेश में ये बढ़ोत्तरी 21% थी, ये राजस्थान के बाद दूसरी सबसे अधिक बढ़ोत्तरी थी। 

“उत्तर प्रदेश की सरकारी मशीनरी जातीय भेदभाव कर रही है, हाथरस मामले में हमने देखा कि सरकार और पुलिस किस तरह से सवर्णों का बचाव कर रही थी,” ऑल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच (एआईडीएमएएम) की कार्यकर्ता शोभना स्मृति ने कहा। “राजनैतिक इच्छाशक्ति सवर्ण अपराधियों को बचाने और दलितों को दबाने में उनकी मदद करने की है। मॉब लिंचिंग, समुदायों पर हमला, किशोरियों के साथ रेप और उनकी हत्या अब आम बात हो चुकी है। दलितों को महसूस होने लगा है कि सिस्टम उनके ख़िलाफ़ है। वे न्याय पाने की कोशिश तो करते हैं लेकिन उन्हें न्याय मिलेगा इसकी उम्मीद अब वो नहीं करते हैं।”

साल 2009 से 2018 के बीच उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों पर अत्याचार के सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए -- PoA Act के तहत 22.38% मामले दर्ज किए गए। इसके बाद बिहार में 19.58% और  राजस्थान में 10.26%  मामले दर्ज हुए, एनसीडीएचआर की रिपोर्ट के मुताबिक। साल 2009 से 2018 के बीच जिन दस राज्यों में अनुसूचित जातियों के ख़िलाफ़ सबसे ज़्यादा अपराध हुए, उनमें से सात राज्यों में अधिकांश समय तक बीजेपी/एनडीए का शासन रहा है, रिपोर्ट में कहा गया।

इन जातीय संघर्ष में, दलित महिलाओं को आसान निशाने के तौर पर देखा जा रहा है। “चाहे वह ज़मीनी विवाद हो या राजनैतिक विवाद. बदले के लिए ही नहीं बल्कि ताक़त दिखाने के लिए भी महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है। हमने कई ऐसे मामले देखे हैं जिसमें किसी महिला के साथ महज़ इसलिए रेप किया गया ताकि पूरे गांव और समुदाय पर दबदबा स्थापित किया जा सके,” ताहिरा हसन ने बताया।

दो अक्टूबर, 2020 को मलिहाबाद प्रखंड में ही 65 साल की एक दलित महिला को उस वक्त बुरी तरह पीटा गया जब उन्होंने अपनी बहू को पड़ोस के गांव के ब्राह्मण शख़्स की छेड़छाड़ से बचाने की कोशिश की थी। दलित परिवार का आरोप है कि अभियुक्त उनके परिवार की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करना चाहते हैं और दबाब बनाने की नीयत उनका उत्पीड़न किया जा रहा है।

साल 2014 से 2018 के बीच दलितों पर अत्याचार के जितने भी मामले PoA Act के तहत दर्ज हुए उनमें 14.86% अपराध दलित महिलाओं के ख़िलाफ़ हुए हैं। इनमें से 95% अपराध रेप, शील भंग करने की कोशिश, अपहरण और शादी के लिए ज़बरन बाध्य करने से संबंधित हैं, एनसीडीएचआर की रिपोर्ट के मुताबिक।

  

दलित महिलाएं भारतीय समाज की सबसे कमज़ोर और अंतिम कड़ी हैं -- उनके पास कोई ताक़त नहीं है, कोई आमदनी नहीं है, कोई संपत्ति या संसाधन नहीं है। इन महिलाओं पर होने वाले अपराधों के केंद्र में संसाधनों पर स्वामित्व का नहीं होना है.’ शोभना स्मृति ने कहा। 

देश के क़रीब 56.5% दलित परिवारों के पास अपनी कोई ज़मीन नहीं है; इनमें से 35.5% आदिवासी और 37.8% गैर दलितो/आदिवासी हैं। देश में अनुसूचित जाति के महज़ 9.23%  लोगों के पास ज़मीन का मालिकाना हक है, नेशनल सैंपल सर्वे ऑफ़िस (एनएसएसओ) के ज़मीन और मवेशियों को लेकर किए गए सर्वे के 70वें राउंड के मुताबिक। जिन दलित परिवारों के पास ज़मीन है, उनमें महिलाओं का नियंत्रण बेहद कम है।

अपने घरों में भी दलित महिलाओं के अधिकार बेहद कम हैं। अनुसूचित जाति की क़रीब 60% महिलाओं का घर में ख़र्च होने वाले पैसों के मामले में कोई दखल नहीं है, 46% महिलाओं के पास अपना बैंक खाता नहीं है, 46% महिलाएं अकेले बाज़ार नहीं जा सकती, 49% महिलाएं अपने आप स्वास्थ्य केंद्र नहीं जा सकती और 35.7% महिलाओं को 15 साल से कम उम्र में ही घर के अंदर किसी ना किसी तरह की शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ा है, नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे- 2015-16 के मुताबिक।  

(साधिका, इंडियास्पेंड में प्रिंसिपल कॉरोसपॉंडेंट हैं, श्रृंखला, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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नई दिल्ली/लखनऊ: मीरा सिंह (35) पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाथरस ज़िले के उसी बुलगढ़ी गांव में रहती हैं जहां 19 साल की एक दलित लड़की के साथ ठाकुर समुदाय के चार लोगों ने कथित गैंग रेप किया। ये मामला पिछले दिनों सुर्ख़ियों में रहा। मीरा को विश्वास ही नहीं होता कि उसके गांव में इस तरह की घटना घट सकती है।

“हमारा गांव हमेशा से सुरक्षित गांव रहा है, यह पहली बार हुआ है जब इस तरह की घटना हुई है,” अपने खेतों में मवेशियों की देखरेख कर रही मीरा ने कहा।

 

गांव के जिस हिस्से में दलित रहते हैं, वहां की महिलाओं के मुताबिक यौन उत्पीड़न की घटनाएं आम बात हैं। गांव में क़रीब 250 घर हैं और इनमें महज़ चार घर ही दलितों के हैं। “हम अपनी बेटियों को अकेले बाहर नहीं निकलने देते हैं,” गांव की एक दलित महिला ने बताया। “वैसे तो ठाकुर हमें छूते भी नहीं हैं लेकिन रेप के लिए वो हमारी बेटियां उठाकर ले जाते हैं,” सदियों से चली आ रही छुआछूत ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा। 

पश्चिमी, मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश के पांच ज़िलों- हाथरस, श्रावस्ती, उन्नाव, जौनपुर और लखनऊ में पीड़ितों और दलित सामाजिक कार्यकर्ताओं से इंटरव्यू के दौरान हमने पाया कि दलित महिलाओं के साथ यौन हिंसा केवल बुलगढ़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे उत्तर प्रदेश में आम बात है। हमने यह भी पाया कि महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकार को लेकर राज्य में चलने वाले सरकारी कार्यक्रम -- प्रोजेक्ट, आश्रय घर और हेल्पलाइन -- पिछले कुछ साल से निष्क्रिय अवस्था में हैं, उनकी उपेक्षा हो रही है, फ़ंड की कमी है या सीधे उन्हें बंद किया जा चुका है। इसके बारे में हम विस्तार से आगे बताएंगे।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि 2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से राज्य में स्थिति बदतर हुई है। “2017 के बाद से राज्य का राजनीतिक वातावरण सभी तरह के महिला अधिकारों के ख़िलाफ़ बन गया है,” उत्तर प्रदेश सरकार की योजना महिला सामख्या की प्रमुख, स्मृति सिंह ने कहा। हिंसा की शिकार दलित महिलाओं की संस्थागत मदद और सहायता 2017 से लगातार कम हुई है और पिछले दो साल में लगभग बंद हो गई है।”

उत्तर प्रदेश में 2016 से 2019 के दौरान महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों में सबसे ज़्यादा 66.7% बढ़ोत्तरी हुई। इसी दौरान अनुसूचित जाति की महिलाओं के साथ रेप के मामलों में बढ़ोत्तरी के हिसाब से उत्तर प्रदेश 20.67% के साथ दूसरे पायदान पर है। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर इसमें 37%  की बढ़ोत्तरी देखने को मिली है। देश भर में अनुसूचित जाति की महिलाओं के साथ रेप के मामलों में 37% और उनके ख़िलाफ़ हिंसा के मामलो में 20% की बढ़ोत्तरी हुई है, क्राइम इन इंडिया-2019 के आंकड़ों के इंडियास्पेंड के विश्लेषण के मुताबिक़। यह तो पंजीकृत हुए अपराध हैं लेकिन भारत में 2009 से 2018 के दौरान अनुसूचित जातियों के ख़िलाफ़ करीब 32.5% अपराध अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निषेध) अधिनियम, 1989 के तहत दर्ज नहीं हुए हैं।

“सभी महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध बढ़ रहे हैं लेकिन दलित महिलाओं को लिंगभेद और जाति को लेकर दोहरा भेदभाव झेलना पड़ रहा है। पुरुषों की आपसी लड़ाई का बदला भी इन महिलाओं से लिया जाता है,” लखनऊ की महिला अधिकार कार्यकर्ता ताहिरा हसन ने कहा।

 

साल 2019 में देश में जितनी महिलाओं के साथ रेप हुआ उनमें 11% महिलाएं अनुसूचित जाति से हैं -- औसतन एक दिन में 10, क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट के मुताबिक़। 

“पिछले पांच साल (2014 से 2018) में, मौजूदा सरकार के कार्यकाल के दौरान ही दलितों के ख़िलाफ़ अत्याचार के मामले में उत्तर प्रदेश पहले, बिहार दूसरे, राजस्थान तीसरे और मध्यप्रदेश चौथे स्थान पर है,” अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निषेध) अधिनियम 1989 और नियम 1995 के अनुपालन को लेकर  सितंबर 2020 में जारी नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स (एनसीडीएचआर) की स्टेट्स रिपोर्ट के मुताबिक़। 

बेमानी हों चुके हैं सरकारी सहायता नेटवर्क 

जैसा कि हमने पहले बताया कि उत्तर प्रदेश में महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा संबंधी योजनाएं और कार्यक्रम या तो बंद हो चुके हैं या फिर वे केवल काग़ज़ों तक सीमित रह गए हैं, यह अनुदान बंद करने या कम करने का परिणाम है, विशेषज्ञों ने हमें बताया। 

उदाहरण के लिए महिला सामख्या को ले सकते हैं। महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के मामलों में उन्हें क़ानूनी ढंग से अपने अधिकार दिलाने में मदद करने वाला यह कार्यक्रम राज्य के 19 ज़िलों और 78 ब्लॉक में काम कर रहा था।

इस प्रोजेक्ट के तहत विभिन्न ज़िलों में क़रीब 250,000 महिलाओं को मदद मिली और 650 महिलाओं को रोज़गार मिला हुआ था। “आकलन के नाम पर, पिछले दो साल से हमारी फ़ंडिंग बंद थी. इस साल मार्च में हमें एक पत्र मिला जिसमें कहा गया कि इस प्रोजेक्ट को किसी अन्य प्रोजेक्ट के साथ मिला दिया गया है,” प्रोजेक्ट की प्रमुख स्मृति सिंह ने बताया। “हमारे पास अन्य प्रोजेक्ट के साथ सम्मिलित करने के बारे में कोई डिटेल्स नहीं है। इस प्रोजेक्ट के साथ काम कर रही महिलाओं को पैसे मिलने बंद हो चुके हैं, बिना पैसों के वह क्यों काम करेंगी? धीरे-धीरे टीम बिखर गई है, इससे जुड़ी महिलाओं को अधर में लटका दिया गया है। यह हमारे लिए किसी झटके से कम नहीं था क्योंकि ऑडिट टीम हमारे काम से संतुष्ट थी -- हमारे पास दिखाने के लिए वास्तविक परिणाम मौजूद हैं,” स्मृति सिंह ने आगे कहा।

हिंसा, दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का सामना करने वाली महिलाओं की मदद के लिए बनी 181 हेल्पलाइन भी फ़ंड के अभाव में बंद हो चुकी है। “हेल्पलाइन में काम कर रही महिलाओं को पिछले नौ महीने से तनख़्वाह नहीं मिली है,” 181 हेल्पलाइन की प्रमुख अर्चना सिंह ने बताया।

यौन हिंसा, रेप, एसिड अटैक का सामना करने वाली महिलाओं को मेडिकल और क़ानूनी सहायता देने के लिए केंद्र सरकार ने 2015 में वन स्टॉप सेंटर्स की शुरु किए थे। उत्तर प्रदेश के 11 ज़िलों में ऐसे सेंटर बनाए गए थे जहां पीड़ित महिलाओं के रहने की सुविधाएं थीं। उन्हें भोजन मुहैया कराया जाता था और रोज़गार संबंधी दक्षता हासिल करने के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था भी होनी थी। सेंटर में काम करने वाली एक सरकारी महिला कर्मचारी के मुताबिक प्रशिक्षण देने के लिए मशीन कभी मिल ही नहीं पाई। 

“अब महिलाओं को यह सब सुविधाएं नहीं मिलती. कर्मचारियों की संख्या कम हो गई है और मेरी तनख़्वाह भी नहीं मिली है,” महिला कर्मचारी ने बताया। इस कर्मचारी के दावे के मुताबिक सेंटर्स को बंद नहीं किया गया है लेकिन अब यहां कोई नहीं रहता -- ख़ाली कमरे. कोई फ़र्नीचर नहीं है, कोई बेड नहीं। जो महिलाएं शेल्टर में आती हैं, उन्हें ऑनलाइन एफ़आईआर दर्ज कराने में मदद की जाती है और फिर उन्हें वापस घर भेज दिया जाता है।

इन सेंटर्स में आने वाली ज़्यादातर महिलाएं ना तो अपने घर और ना ही आस पड़ोस में जा सकती हैं, क्योंकि वे इन जगहों पर होने वाली हिंसा से भी बचना चाहती हैं -- रेप या एसिड अटैक का सामना करने वाली महिलाओं को घरेलू दुर्व्यवहार के अलावा परिवार या समाज की ओर से उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। इन सेंटर्स के पूरी तरह बंद होेने के बाद कोई नहीं है जो इन महिलाओं की जानकारी रख सके कि वो कहां हैं और कैसी हैं।

देश भर की महिलाओं की सुरक्षा और बचाव के लिए केंद्र सरकार ने 2013 में निर्भया फ़ंड की स्थापना की थी।  FactChecker.in ने 7 दिसंबर, 2019 की अपनी इस रिपोर्ट में बताया था कि इस फ़ंड का पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं हो रहा है। उत्तर प्रदेश को निर्भया फ़ंड से 324.88 करोड़ रुपए मिले लेकिन राज्य ने इसमें से केवल 66.7% राशि का का इस्तेमाल किया।

इस उपेक्षा की झलक राज्य में अलग-अलग जगहों पर पीड़ित महिलाओं से इंटरव्यू के दौरान भी मिली।

‘अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए उसे लखनऊ भेजा’

राज्य की राजधानी से लखनऊ से महज़ 45 किलोमीटर दूर मलिहाबाद ब्लॉक के एक गांव की 14 साल की दलित लड़की के साथ आठ सितंबर, 2020 को कथित तौर पर गैंगरेप किया गया। नज़दीकी पुलिस स्टेशन ने रिपोर्ट दर्ज करने की बजाय पीड़ित को चेतावनी दी कि मामले को उछालना “मुसीबतों को न्यौता” देना होगा, लड़की की मां ने बताया।

“दो लोगों ने मुझे रेप किया. मैं काफ़ी दर्द में थी और चिल्ला भी नहीं पाई क्योंकि उन्होंने मेरा मुंह बंद किया हुआ था,” 14 साल की पीड़ित ने बताया।  “उन्होंने धमकी दी थी कि अगर किसी से कुछ कहा तो और भी बुरा अंजाम होगा. इसलिए मैं घर चली आई थी, मुझे खून बह रहा था।”

इस गांव में करीब चार हज़ार परिवार रहते हैं और अधिकांश घर दलित और समाज में निचली समझे जाने वाली जातियों के हैं। पड़ोस के गांव में राजनैतिक तौर पर सशक्त ठाकुर, यादव और मौर्य जातियों का दबदबा है।

 

“ये वही लोग थे जो मेरी बड़ी बेटी के साथ यौन दुर्व्यवहार कर रहे थे, जब भी वह घर से बाहर निकलती, उसके साथ यौन दुर्व्यवहार करते,” पीड़ित की मां ने बताया। “हम जानते थे कि ऐसा कुछ होगा इसलिए हमने उसे घरेलू मदद के काम के लिए लखनऊ भेज दिया था।”

परिवार ने अपनी दो दूसरी बेटियों की चिंता में पुलिस के पास शिकायत की। “हमारे पास ताक़त नहीं है तो भी उन लोगों के सामने हम अपनी बेटियों की कुर्बानी नहीं दे सकते,” पीड़ित के पिता ने कहा। 

कई बार कोशिशों के बाद पुलिस रिपोर्ट दर्ज करने को तैयार हुई। केवल एक शख़्स के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया। उस शख़्स की उम्र 22 साल थी लेकिन रिपोर्ट में उसे 17 साल का नाबालिग बताया गया, पीड़ित के परिवार वालों ने आरोप लगाया।

पीड़ित का कहना था कि पुलिस, फ़ॉरेंसिक टीम और आस पड़ोस के लोगों का सामना करने से उसे आघात पहुंचा है। “मैंने पुलिस के सामने उस भयानक हादसे को कम से कम 50 बार दोहराया। हर बार वे मुझसे एक जैसे सवाल पूछते,” पीड़ित ने कहा। “हम तीन बार लखनऊ गए तब वे लखनऊ के बलरामपुर हॉस्पिटल में मेरा मेडिकल कराने को तैयार हुए जो यहां से 50 किलोमीटर दूर है।”

ये मेडिकल परीक्षण भी बिना किसी काउंसलिंग के हुए जो पीड़ित के लिए किसी डराने वाले अनुभव से कम नहीं था। “मेरे बाल और नाखून कतरे गए. उन्होंने मेरे मुंह और निजी अंग में कुछ (स्वैब) डाला. मैं डर से काफ़ी भयभीत और जड़ हो चुकी थी।”

इस घटना को एक महीना हो चुका है। परिवार पुलिस स्टेशन, अस्पताल और अदालत के चक्कर लगाते लगाते थक चुका है और उसकी जमा पूंजी भी ख़त्म होने को है। “स्थानीय पुलिस से हमें लगातार धमकियां मिल रही है, हमारी छोटी बेटियां लगातार डर में जी रही हैं. आख़िर कब तक हम ऐसे रहेंगे?” पीड़ित के पिता ने कहा।

पीड़ित परिवार गांव से छह किलोमीटर दूर पड़ोस के गांव में हुई एक अन्य वारदात के बारे में भी बताता है, जिसमें छह साल की एक दलित लड़की के साथ स्कूल के शौचालय में 2011 में रेप हुआ था, वहां वह नग्नावस्था में ख़ून में लथपथ मिली थी। उस मामले में रिपोर्ट तो दर्ज हुई लेकिन राजनीतिक रसूख के चलते अभियुक्त कभी गिरफ़्तार नहीं किए गए, उन्होंने बताया।

रिपोर्ट दर्ज कराने से हतोत्साहित करते हैं

समाज के हाशिए पर रह रही इन जातियों की शिकायत है कि रेप के मामलों में रिपोर्ट दर्ज कराना बेहद मुश्किल होता है। “ पीड़ित दलित महिलाएं आमतौर पर ग़रीब होती हैं और उन्हें पुलिस की मदद नहीं मिल पाती है। आमतौर पर रिपोर्ट दर्ज करने से पहले पुलिस जो रिश्वत मांगती है वह देने के लिए इनके पास पैसा नहीं होता है,” नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट में कहा गया है।

 

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद लंबी न्यायिक प्रक्रिया का ख़र्च उठा पाना भी ग़रीब परिवारों के बस की बात नहीं होती -- क़ानूनी शुल्क का भी भुगतान करना होता है, दिहाड़ी बंद हो जाती है, आने-जाने में ख़र्च भी होता है। हमें ऐसा एक भी परिवार नहीं मिला जो मुकद्दमा लड़ने के लिए काम छोड़ चुका हो। “अपराध करने वाले सवर्णों के पास पैसा है, राजनीतिक पहुंच है. इसलिए वे खुले घूमते रहते हैं,” पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर ज़िले की दलित कार्यकर्ता शोभना ने कहा। 

2019 के अंत तक महिलाओं के ख़िलाफ़ हुए 33.8% अपराधों की जांच लंबित है जबकि भारतीय दंड संहिता के तहत दर्ज किए दूसरे ऐसे अपराधों में 29.3% मामलों में जांच लंबित हैं। महिलाओं के साथ हुए अपराध में केवल 7.6% मामलों में सुनवाई पूरी हई है जबकि अनुसूचित जाति के साथ हुए अपराधों में महज 6.1% मामलों में सुनवाई पूरी हो सकी है इनमें से 60% से अधिक मामलों में अभियुक्त बरी कर दिए गए, इंडियास्पेंड की 9 अक्टूबर, 2020 की इस रिपोर्ट के मुताबिक।

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निषेध) अधिनियम 1989 और नियम 1995 के तहत 2009 से 20018 के बीच सुनवाई पूरी होने के बाद औसतन 25.2% मामलों में सजा हुई है जबकि अभियुक्तों के औसतन बरी किए जाने के मामले 62.5% रहे हैं, नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स (एनसीडीएचआर) की रिपोर्ट के मुताबिक।  हालांकि 2019 में अनुसूचित जातियों के ख़िलाफ़ अपराध में सज़ा की दर 66% थी।

 

“ज़्यादातर मामलों में पुलिस पर रिपोर्ट दर्ज नहीं करने का दबाव होता है,” इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील और कई पीड़ित दलित महिलाओं की पैरवी करने वाले, अभिषेक द्विवेदी ने कहा। “कायदे से यौन हिंसा के मामलों में पूरी प्रक्रिया चार महीने में पूरी करनी होती है लेकिन ऐसा कभी होता नहीं है। इस दौरान पीड़ित परिवारों पर अदालत से बाहर समझौता करने या बयान बदलने का दबाव होताहै। यह पूरी प्रक्रिया ग़रीब दलितों के पक्ष में नहीं है क्योंकि ना तो उसके पास पैसा होता है और ना ही रसूख।”

मलिहाबाद की नाबालिग रेप पीड़ित के 45 साल के पिता दिहाड़ी मज़दूर हैं और वे सवर्णों के खेतों में 200 से 250 रूपए की दिहाड़ी पर काम करते हैं। उनका कहना था कि उनके जैसे परिवारों के सामने दो ही विकल्प होते हैं: परिवार का पेट भरें या मुक़दमा लड़ें। “जिनके पास पैसा है, ताक़त है वहीं मुक़दमा लड़ सकता है,” उन्होंने कहा।

ज़मीनी और राजनैतिक विवाद का शिकार

देश भर में 2015 से 2019 के बीच अनुसूचित जाति के ख़िलाफ़ अपराध 18.8% बढ़े हैं, क्राइम इन इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक। उत्तर प्रदेश में ये बढ़ोत्तरी 21% थी, ये राजस्थान के बाद दूसरी सबसे अधिक बढ़ोत्तरी थी। 

“उत्तर प्रदेश की सरकारी मशीनरी जातीय भेदभाव कर रही है, हाथरस मामले में हमने देखा कि सरकार और पुलिस किस तरह से सवर्णों का बचाव कर रही थी,” ऑल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच (एआईडीएमएएम) की कार्यकर्ता शोभना स्मृति ने कहा। “राजनैतिक इच्छाशक्ति सवर्ण अपराधियों को बचाने और दलितों को दबाने में उनकी मदद करने की है। मॉब लिंचिंग, समुदायों पर हमला, किशोरियों के साथ रेप और उनकी हत्या अब आम बात हो चुकी है। दलितों को महसूस होने लगा है कि सिस्टम उनके ख़िलाफ़ है। वे न्याय पाने की कोशिश तो करते हैं लेकिन उन्हें न्याय मिलेगा इसकी उम्मीद अब वो नहीं करते हैं।”

साल 2009 से 2018 के बीच उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों पर अत्याचार के सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए -- PoA Act के तहत 22.38% मामले दर्ज किए गए। इसके बाद बिहार में 19.58% और  राजस्थान में 10.26%  मामले दर्ज हुए, एनसीडीएचआर की रिपोर्ट के मुताबिक। साल 2009 से 2018 के बीच जिन दस राज्यों में अनुसूचित जातियों के ख़िलाफ़ सबसे ज़्यादा अपराध हुए, उनमें से सात राज्यों में अधिकांश समय तक बीजेपी/एनडीए का शासन रहा है, रिपोर्ट में कहा गया।

इन जातीय संघर्ष में, दलित महिलाओं को आसान निशाने के तौर पर देखा जा रहा है। “चाहे वह ज़मीनी विवाद हो या राजनैतिक विवाद. बदले के लिए ही नहीं बल्कि ताक़त दिखाने के लिए भी महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है। हमने कई ऐसे मामले देखे हैं जिसमें किसी महिला के साथ महज़ इसलिए रेप किया गया ताकि पूरे गांव और समुदाय पर दबदबा स्थापित किया जा सके,” ताहिरा हसन ने बताया।

दो अक्टूबर, 2020 को मलिहाबाद प्रखंड में ही 65 साल की एक दलित महिला को उस वक्त बुरी तरह पीटा गया जब उन्होंने अपनी बहू को पड़ोस के गांव के ब्राह्मण शख़्स की छेड़छाड़ से बचाने की कोशिश की थी। दलित परिवार का आरोप है कि अभियुक्त उनके परिवार की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करना चाहते हैं और दबाब बनाने की नीयत उनका उत्पीड़न किया जा रहा है।

साल 2014 से 2018 के बीच दलितों पर अत्याचार के जितने भी मामले PoA Act के तहत दर्ज हुए उनमें 14.86% अपराध दलित महिलाओं के ख़िलाफ़ हुए हैं। इनमें से 95% अपराध रेप, शील भंग करने की कोशिश, अपहरण और शादी के लिए ज़बरन बाध्य करने से संबंधित हैं, एनसीडीएचआर की रिपोर्ट के मुताबिक।

  

दलित महिलाएं भारतीय समाज की सबसे कमज़ोर और अंतिम कड़ी हैं -- उनके पास कोई ताक़त नहीं है, कोई आमदनी नहीं है, कोई संपत्ति या संसाधन नहीं है। इन महिलाओं पर होने वाले अपराधों के केंद्र में संसाधनों पर स्वामित्व का नहीं होना है.’ शोभना स्मृति ने कहा। 

देश के क़रीब 56.5% दलित परिवारों के पास अपनी कोई ज़मीन नहीं है; इनमें से 35.5% आदिवासी और 37.8% गैर दलितो/आदिवासी हैं। देश में अनुसूचित जाति के महज़ 9.23%  लोगों के पास ज़मीन का मालिकाना हक है, नेशनल सैंपल सर्वे ऑफ़िस (एनएसएसओ) के ज़मीन और मवेशियों को लेकर किए गए सर्वे के 70वें राउंड के मुताबिक। जिन दलित परिवारों के पास ज़मीन है, उनमें महिलाओं का नियंत्रण बेहद कम है।

अपने घरों में भी दलित महिलाओं के अधिकार बेहद कम हैं। अनुसूचित जाति की क़रीब 60% महिलाओं का घर में ख़र्च होने वाले पैसों के मामले में कोई दखल नहीं है, 46% महिलाओं के पास अपना बैंक खाता नहीं है, 46% महिलाएं अकेले बाज़ार नहीं जा सकती, 49% महिलाएं अपने आप स्वास्थ्य केंद्र नहीं जा सकती और 35.7% महिलाओं को 15 साल से कम उम्र में ही घर के अंदर किसी ना किसी तरह की शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ा है, नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे- 2015-16 के मुताबिक।  

(साधिका, इंडियास्पेंड में प्रिंसिपल कॉरोसपॉंडेंट हैं, श्रृंखला, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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