पॉल्ट्री उद्योग पर लॉकडाउन और अफ़वाहों की दोहरी मार

कुछ किसानों ने लॉकडाउन खुलने तक के इंतजार में मुर्गे रखे थे लेकिन अब चारा न मिलने से समस्या और बढ़ गई है। फ़ोटो- इब्ने अली

लखनऊ/चंडीगढ़ः उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से क़रीब 28 किलोमीटर दूर मलीहाबाद के इरशाद अली ने बैंक से कर्ज़ लेकर पॉल्ट्री फ़ार्म शुरु किया था लेकिन कोरोनावायरस की वजह से उनका पूरा कामकाज चौपट हो गया है। “एक तरफ पूरा कारोबार ठप्प हो गया, चिकन 10 रुपए-5 रुपए में भी बड़ी मुश्किल से गया है, लागत भी नहीं निकल पाई। अब इस लॉकडाउन में जहां एक ओर घर का ख़र्च चलाने की समस्या है वहीं दूसरी बड़ी समस्या बैंक का पैसा चुकाने की है,” इरशाद ने कहा।

भले सरकार कह रही है तीन महीने तक कोई ईएमआई नहीं देनी है लेकिन जब पूरा पॉल्ट्री बाजार ही बर्बाद हो गया है तो तीन महीने बाद भी कहां से पैसा दे पाएंगे, उन्होंने आगे कहा। इरशाद ने यह भी कहा कि फ़रवरी तक तो फिर भी किसी तरह काम चला लेकिन मार्च आते-आते दाम इतने गिर गए कि पूरी लागत भी डूब गई।

यह हाल सिर्फ़ उत्तर प्रदेश का ही नहीं है बल्कि बाकी राज्यों-- महाराष्ट्र, हरियाणा और छत्तीसगढ़-- के भी अलग-अलग ज़िलों के किसानों का है। पहले अफ़वाहों ने और बाद में लॉकडाउन ने पॉल्ट्री फ़ार्मिंग करने वाले किसानों की कमर तोड़ दी। किसान औने-पौने दामों पर किसी तरह चिकन बेचने पर मजबूर हैं। सोशल मीडिया पर चिकन से कोरोनावायरस होने की अफ़वाह फैलाने के आरोप में दो लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया, 18 मार्च की नवभारत टाइम्स की इस रिपोर्ट में बताया गया।

अफ़वाह देश भर में इतनी तेज़ी से फैली कि हैदराबाद में हुए एक सार्वजनिक कार्यक्रम में तेलंगाना सरकार के मंत्रियों ने चिकन और अंडे खाकर इस अफ़वाह का खंडन किया, जैसा कि दैनिक जागरण की 29 फ़रवरी की इस वीडियो रिपोर्ट में दिखाया गया है।

“नुकसान के बारे में यही कहेंगे कि कुछ बचा ही नहीं है, पूरा का पूरा पैसा डूब गया है। हम तो ब्रॉयलर रखते थे, लेयर रखने वाले तो फिर भी ठीक थे लेकिन लोगों के दिमाग में चिकन को लेकर ऐसा डर बैठ गया कि कोई खरीदने तो दूर मुफ़्त में भी ले जाने काे तैयार नहीं है,” हरियाणा के पॉल्ट्री फ़़ार्मर असलम ने बताया।

हालांकि लॉकडाउन की घोषणा के वक़्त गृह मंत्रालय ने जिन आवश्यक वस्तुओं की बिक्री में छूट दी थी उसमें मीट और मछली भी शामिल थी, लेकिन ज़्यादातर जगहों पर यह दुकानें बंद ही हैं। सप्लाई में रुकावट, ट्रांसपोर्ट और प्रशासनिक समस्याएं इसकी वजह हैं। 

अफ़वाहों ने किसानों को बर्बाद किया

पॉल्ट्री फ़ार्म जो कभी मुर्गों और चूज़ों से भरे होते थे वह अब ख़ाली हो गए हैं। फ़ोटो- इब्ने अली

कोरोनावायरस के भारत में कदम रखते ही अफ़वाहों ने पॉल्ट्री बाज़ार पर गहरा असर डाला। फ़ेक न्यूज़ और व्हाट्सऐप मैसेज के ज़रिए यह अफ़वाह तेज़ी से फैली कि चिकन खाने से भी कोरोनावायरस का संक्रमण हो सकता है। इस डर से लोगों ने चिकन ख़रीदना बंद कर दिया और दुकानदारों को भी मजबूरन इसके दाम गिराने पड़े। 

“हमारे यहां 4,000 मुर्गे थे और मैंने 10 रुपए किलो तक में चिकन बेचा है फिर भी आलम यह था कि कोई ले जाने को तैयार नहीं था। ऐसे में इन मुर्गों का क्या किया जाता इसे तैयार होने के बाद ज़्यादा दिन तक रखा भी तो नहीं जा सकता था। इसलिए जो बिका सो बिका बाकी गाड़ी में भरकर जंगल में छोड़़ आए,” रायबरेली के पॉल्ट्री फ़ार्मर योगेश ने बताया। आमतौर पर पॉल्ट्री फ़ार्म से चिकन 150 से 180 रुपए किलो के हिसाब से बिकता है।

सारा पैसा डूब गया अब तो दोबारा हिम्मत नहीं होगी मुर्गे लाने की। कोई भी बीमारी फैलती है तो सबसे पहले चिकन के बाज़ार पर ही संकट आता है, योगेश ने आगे कहा। 

हरियाणा के दिलबाग मलिक कई ज़िलों में मुर्गी पालकों का समूह चलाते हैं। “मेरे साथ लगभग 300 किसान जुड़े हैं लेकिन सबकी हालत इस समय एक जैसी ही है। जिन लोगों ने भी पॉल्ट्री में पैसा लगाया था वह 90% नुक़सान में चल रहे हैं। इसके अलावा ब्रीडिंग फ़ार्म तो पूरा का पूरा नुकसान में है,’’ उन्होंने बताया।

बड़ी कंपनियों ने मुंह मोड़ा

लखनऊ के पास मलीहाबाद में बड़े स्तर पॉल्ट्री फ़ार्मिंग होती है यह तस्वीर कोरोनावायरस के कहर से पहले की है लेकिन अब यह व्यवसाय पूरी तरह बंद है।फ़ोटो- विनय गुप्ता

ज्यादातर पॉल्ट्री फ़ार्मिंग में बड़ी-बड़ी कंपनियां किसानों के साथ मिलकर काम करती हैं। चारा, दवाई आदि कंपनी का होता है, किसान को सिर्फ़ पालना होता है। इसमें 60% पैसा कंपनी का होता है और 40% किसान का। अब जब चिकन बिकना बंद हो गया तो कपंनियों ने भी हाथ खड़े कर दिए कि वह दवाई और चारे का पैसा नहीं दे पाएंगी।

केंद्रीय पशुपालन, डेयरी व मत्स्य पालन मंत्री गिरिराज सिंह ने कोरोनावायरस को लेकर चल रही अफ़वाहों से लोगों को बचने की सलाह भी दी है। उन्होंने कहा कि चिकन, मछली और अंडे खाने से कोरोनावायरस नहीं फैलता है, जिसे खाना है ख़ूब खाए। यह शरीर में प्रोटीन की कमी पूरी करते हैं।

पशु मंत्री का ट्वीट

10 करोड़ से ज़्यादा किसानों के सामने संकट

देश में 10 करोड़ से भी ज़्यादा किसान मुर्गी पालन से जुड़े हुए हैं। पॉल्ट्री क्षेत्र देश में प्रति दिन 25 करोड़ अंडे और 1.3 करोड़ पक्षियों का उत्पादन करता है और देश की जीडीपी में 1.2 लाख करोड़ रुपए से ज़्यादा का योगदान देता है, मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के आंकड़ों में बताया गया है।

साल 2019 की पशुधन संगणना (पशुओं की गिनती) में पॉल्ट्री की आबादी 85.18 करोड़ थी, जो पिछली पशुधन संगणना (2012) के मुक़ाबले 17% ज़्यादा थी।

भारत चिकन के उत्पादन में पूरी दुनिया में छठे और अंडों के उत्पादन में तीसरे नंबर पर है। पॉल्ट्री मीट के उत्पादन के मामले हरियाणा, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश देश के टॉप तीन राज्य हैं, मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय की एक रिपार्ट में बताया गया है।

दो महीने में 22,000 करोड़ से ज़्यादा का नुक़सान

पॉल्ट्री एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के सचिव हरपाल ढांडा ने पॉल्ट्री इंडस्ट्री के नुकसान के बारे में विस्तार से बताया। “बाक़ी चीज़ों के साथ क्या है कि मैन्यूफ़ैक्चरिंग बंद हो गई है तो कुछ ही दिक्कतें हैं। फ़ैक्ट्री बंद है, लेबर की सैलरी नहीं दे पा रहे, लेकिन पॉल्ट्री उद्योग का तो पूरा कैपिटल ही ख़त्म होने के कगार पर है। एक बर्ड पर 150 रुपए की लागत आती है और वह 2 रुपए, 5 रुपए किलो तक में बिक रहा है। अभी सात-आठ दिन पहले तक 7 रुपए में बर्ड बिके हैं तो टोटल लॉस है,” उन्होंने कहा। 

पूरे देश में हर महीने तक़रीबन 37 करोड़ चिकन का उत्पादन होता है। एक चिकन 2 किलो वज़न तक का होता है यानी 70 करोड़ किलो चिकन हर महीने बाज़ार में जाता है, हरपाल ने आगे बताया। एक किलो की लागत 80 रुपए तक आती है। अंडे का भी यही हाल है, पूरे देश में क़रीब 27 करोड़ का उत्पादन है। एक अंडे की कीमत 4 रुपए आती है लेकिन वह एक रुपए तक में बिका है। ब्रॉयलर, लेयर रखने वाले किसानों और कंपनियों को मिलाकर अगर पूरे पॉल्ट्री फ़ार्म उद्योग का नुक़सान देखा जाए तो फ़रवरी से लेकर मार्च अंत तक यह राशि 22,000 से 25,000 करोड़ रुपए तक बैठती है। यह राशि केंद्र सरकार के पेयजल और स्वच्छता विभाग के चालू वित्त वर्ष के बजट से भी ज़्यादा है।

लॉकडाउन ने इंडस्ट्री की कमर तोड़ी

“पॉल्ट्री का हमारे यहां चार सीज़न मुख्य होता है। नया साल, दिवाली, होली और ईद। किसान यही सोचता है कि इस समय अच्छे दाम पर मुर्गा चला जाएगा तो लोग इससे पहले मुर्गे पालते हैं। नए साल तक ठीक था लेकिन होली के लिए लोगों ने ज्यादा तादाद में चिकन पाले और फ़रवरी आते-आते ऐसा माहौल बन गया कि चिकन की बिक्री पर असर पड़ने लगा,” पॉल्ट्री फ़ार्मिंग के जानकार इब्ने अली ने बताया। 

भारत में चिकन की सबसे ज़्यादा सप्लाई होटल्स और रेस्टोरेंट्स में होती है। चिकन की दूसरी सबसे ज़्यादा मांग चिकन फ़्राई की दुकानों और ठेलों पर होती है। लॉकडाउन के बाद जब यह बंद हो गए तो मांग कम होने की वजह से चिकन सस्ते में बिकने लगा। दूसरा, सारी शादियां भी टल गईं तो वह ज़रिया भी बंद हो गया। इन सब वजहों से चिकन बाज़ार पूरी तरह से बर्बाद हो गया, उन्होंने आगे यह कहा।

चारा न पहुंचने से भी नुक़सान हुआ

जहां एक तरफ पालक अपने चिकन न बिकने से परेशान थे वहीं चारे की सप्लाई रूकने से इनकी परेशानियां और बढ़ गईं। “पिछले मानसून और कुछ कारणों से मक्का की फ़सल को काफ़ी नुक़सान हुआ और इसके दाम भी इस साल बढ़ गए। जो मक्का 2018 में 12-13 रुपए में बिका था वह इस साल 22-23 रुपए तक में बिका। इसका मुर्गियों के दानों पर सीधा असर पड़ा, यूपी पॉल्ट्री के हेड अकबर अली ने बताया। 

किसान यह नुकसान भी किसी तरह झेल लेते लेकिन होली के बाद सप्लाई चेन पूरी तरह बंद हो गई। फ़ार्मों तक चारा पहुंचना बंद हो गया और मुर्गे को अगर एक दिन भी चारा न मिले तो इसका असर उस पर दिखने लगता है, उसका वज़न तेज़ी से गिरने लगता है। दूसरी बात यह कि यह ऐसी कॉमोडिटी है जो एक बार तैयार हो जाती है तो इसे आप रख नहीं सकते। इसे किसी भी हाल में बेचना पड़ता है।

हैचरी चलाने वालों को चूज़े दफ़नाने पड़े 

10 हज़ार मुर्गों की हैचरी (हैचरी में मशीनों के ज़रिए अलग-अलग नस्ल की मुर्गियों के चूज़े तैयार किए जाते हैं) लगाने के लिए कम से कम दो से ढाई करोड़ रुपए लगते हैं। लोग इसके लिए बैंकों से कर्ज़ लेते हैं। अब जब हालत यह हो गई हैं कि पूरी इंडस्ट्री ही नुकसान में है तो हैचरी वालों की हालत भी ख़राब है। उन्हें तो बैंकों का पैसा वापस करना ही है, बैँक कब तक ईएमआई नहीं लेंगे, इब्ने अली ने कहा।

“लोग अब चूज़े नहीं पाल रहे हैं क्योंकि बिक्री नहीं रही, लेकिन मुर्गी तो अंडे देगी ही। अब उन चूज़ों का क्या किया जाए जब कोई ले ही नहीं रहा। ऐसे में उन्हें दफनाना पड़ रहा है, मजबूरी है क्योंकि और कोई विकल्प नहीं है,” बिहार के एक हैचरी के मालिक सुनील सिंह ने कहा।

 

सरकार से रियायत की मांग

बर्बादी के कगार पर पहुंच चुके पॉल्ट्री फ़ार्मर अब सरकार से कुछ छूट चाहते हैं। “लॉकडाउन के बाद सप्लाई बंद होने से चारा आना भी रूक गया है। ड्राइवर पुलिस के डर से जाने को नहीं तैयार होते। ज़्यादातर फ़ीड (चारा) सोयाबीन वगैरह मध्य प्रदेश से आता है लेकिन कोरोनावायरस और पुलिस के डर से कोई भी वहां जाने को तैयार नहीं है। माल नहीं आ पा रहा है। ऐसे में सरकार अगर कोई पॉलिसी बनाकर यह व्यवस्था करा दे तो कुछ हद तक तो किसानों की समस्या दूर हो जाएगी,” पॉल्ट्री फ़ेडरेशन ऑफ इंडिया के रमेश चंद्र ने कहा।

“पॉल्ट्री एक ऐसा बिज़नेस है जिसे सपोर्ट की ज़रूरत नही है यह ख़ुद को वापस खड़ा कर लेगा लेकिन अभी कम से कम चारा लाने वाली गाड़ियों के साथ सख़्ती न हो, उन्हें मारा-पीटा न जाए,” पॉल्ट्री फ़ार्मिंग के जानकार इब्ने अली ने कहा। उन्होंने यह भी कहा कि चिकन और अंडा दोनो ही प्रोटीन के सबसे अच्छे साधन हैं और अगर ऐसा ही हाल रहा तो जब भी यह लॉकडाउन हटेगा तो इनके दाम बहुत तेज़ी से बढ़ भी जाएंगे।

 

(श्रृंखला, दिल्ली में स्वतंत्र पत्रकार हैं)

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

लखनऊ/चंडीगढ़ः उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से क़रीब 28 किलोमीटर दूर मलीहाबाद के इरशाद अली ने बैंक से कर्ज़ लेकर पॉल्ट्री फ़ार्म शुरु किया था लेकिन कोरोनावायरस की वजह से उनका पूरा कामकाज चौपट हो गया है। “एक तरफ पूरा कारोबार ठप्प हो गया, चिकन 10 रुपए-5 रुपए में भी बड़ी मुश्किल से गया है, लागत भी नहीं निकल पाई। अब इस लॉकडाउन में जहां एक ओर घर का ख़र्च चलाने की समस्या है वहीं दूसरी बड़ी समस्या बैंक का पैसा चुकाने की है,” इरशाद ने कहा।

भले सरकार कह रही है तीन महीने तक कोई ईएमआई नहीं देनी है लेकिन जब पूरा पॉल्ट्री बाजार ही बर्बाद हो गया है तो तीन महीने बाद भी कहां से पैसा दे पाएंगे, उन्होंने आगे कहा। इरशाद ने यह भी कहा कि फ़रवरी तक तो फिर भी किसी तरह काम चला लेकिन मार्च आते-आते दाम इतने गिर गए कि पूरी लागत भी डूब गई।

यह हाल सिर्फ़ उत्तर प्रदेश का ही नहीं है बल्कि बाकी राज्यों-- महाराष्ट्र, हरियाणा और छत्तीसगढ़-- के भी अलग-अलग ज़िलों के किसानों का है। पहले अफ़वाहों ने और बाद में लॉकडाउन ने पॉल्ट्री फ़ार्मिंग करने वाले किसानों की कमर तोड़ दी। किसान औने-पौने दामों पर किसी तरह चिकन बेचने पर मजबूर हैं। सोशल मीडिया पर चिकन से कोरोनावायरस होने की अफ़वाह फैलाने के आरोप में दो लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया, 18 मार्च की नवभारत टाइम्स की इस रिपोर्ट में बताया गया।

अफ़वाह देश भर में इतनी तेज़ी से फैली कि हैदराबाद में हुए एक सार्वजनिक कार्यक्रम में तेलंगाना सरकार के मंत्रियों ने चिकन और अंडे खाकर इस अफ़वाह का खंडन किया, जैसा कि दैनिक जागरण की 29 फ़रवरी की इस वीडियो रिपोर्ट में दिखाया गया है।

“नुकसान के बारे में यही कहेंगे कि कुछ बचा ही नहीं है, पूरा का पूरा पैसा डूब गया है। हम तो ब्रॉयलर रखते थे, लेयर रखने वाले तो फिर भी ठीक थे लेकिन लोगों के दिमाग में चिकन को लेकर ऐसा डर बैठ गया कि कोई खरीदने तो दूर मुफ़्त में भी ले जाने काे तैयार नहीं है,” हरियाणा के पॉल्ट्री फ़़ार्मर असलम ने बताया।

हालांकि लॉकडाउन की घोषणा के वक़्त गृह मंत्रालय ने जिन आवश्यक वस्तुओं की बिक्री में छूट दी थी उसमें मीट और मछली भी शामिल थी, लेकिन ज़्यादातर जगहों पर यह दुकानें बंद ही हैं। सप्लाई में रुकावट, ट्रांसपोर्ट और प्रशासनिक समस्याएं इसकी वजह हैं। 

अफ़वाहों ने किसानों को बर्बाद किया

पॉल्ट्री फ़ार्म जो कभी मुर्गों और चूज़ों से भरे होते थे वह अब ख़ाली हो गए हैं। फ़ोटो- इब्ने अली

कोरोनावायरस के भारत में कदम रखते ही अफ़वाहों ने पॉल्ट्री बाज़ार पर गहरा असर डाला। फ़ेक न्यूज़ और व्हाट्सऐप मैसेज के ज़रिए यह अफ़वाह तेज़ी से फैली कि चिकन खाने से भी कोरोनावायरस का संक्रमण हो सकता है। इस डर से लोगों ने चिकन ख़रीदना बंद कर दिया और दुकानदारों को भी मजबूरन इसके दाम गिराने पड़े। 

“हमारे यहां 4,000 मुर्गे थे और मैंने 10 रुपए किलो तक में चिकन बेचा है फिर भी आलम यह था कि कोई ले जाने को तैयार नहीं था। ऐसे में इन मुर्गों का क्या किया जाता इसे तैयार होने के बाद ज़्यादा दिन तक रखा भी तो नहीं जा सकता था। इसलिए जो बिका सो बिका बाकी गाड़ी में भरकर जंगल में छोड़़ आए,” रायबरेली के पॉल्ट्री फ़ार्मर योगेश ने बताया। आमतौर पर पॉल्ट्री फ़ार्म से चिकन 150 से 180 रुपए किलो के हिसाब से बिकता है।

सारा पैसा डूब गया अब तो दोबारा हिम्मत नहीं होगी मुर्गे लाने की। कोई भी बीमारी फैलती है तो सबसे पहले चिकन के बाज़ार पर ही संकट आता है, योगेश ने आगे कहा। 

हरियाणा के दिलबाग मलिक कई ज़िलों में मुर्गी पालकों का समूह चलाते हैं। “मेरे साथ लगभग 300 किसान जुड़े हैं लेकिन सबकी हालत इस समय एक जैसी ही है। जिन लोगों ने भी पॉल्ट्री में पैसा लगाया था वह 90% नुक़सान में चल रहे हैं। इसके अलावा ब्रीडिंग फ़ार्म तो पूरा का पूरा नुकसान में है,’’ उन्होंने बताया।

बड़ी कंपनियों ने मुंह मोड़ा

लखनऊ के पास मलीहाबाद में बड़े स्तर पॉल्ट्री फ़ार्मिंग होती है यह तस्वीर कोरोनावायरस के कहर से पहले की है लेकिन अब यह व्यवसाय पूरी तरह बंद है।फ़ोटो- विनय गुप्ता

ज्यादातर पॉल्ट्री फ़ार्मिंग में बड़ी-बड़ी कंपनियां किसानों के साथ मिलकर काम करती हैं। चारा, दवाई आदि कंपनी का होता है, किसान को सिर्फ़ पालना होता है। इसमें 60% पैसा कंपनी का होता है और 40% किसान का। अब जब चिकन बिकना बंद हो गया तो कपंनियों ने भी हाथ खड़े कर दिए कि वह दवाई और चारे का पैसा नहीं दे पाएंगी।

केंद्रीय पशुपालन, डेयरी व मत्स्य पालन मंत्री गिरिराज सिंह ने कोरोनावायरस को लेकर चल रही अफ़वाहों से लोगों को बचने की सलाह भी दी है। उन्होंने कहा कि चिकन, मछली और अंडे खाने से कोरोनावायरस नहीं फैलता है, जिसे खाना है ख़ूब खाए। यह शरीर में प्रोटीन की कमी पूरी करते हैं।

पशु मंत्री का ट्वीट

10 करोड़ से ज़्यादा किसानों के सामने संकट

देश में 10 करोड़ से भी ज़्यादा किसान मुर्गी पालन से जुड़े हुए हैं। पॉल्ट्री क्षेत्र देश में प्रति दिन 25 करोड़ अंडे और 1.3 करोड़ पक्षियों का उत्पादन करता है और देश की जीडीपी में 1.2 लाख करोड़ रुपए से ज़्यादा का योगदान देता है, मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के आंकड़ों में बताया गया है।

साल 2019 की पशुधन संगणना (पशुओं की गिनती) में पॉल्ट्री की आबादी 85.18 करोड़ थी, जो पिछली पशुधन संगणना (2012) के मुक़ाबले 17% ज़्यादा थी।

भारत चिकन के उत्पादन में पूरी दुनिया में छठे और अंडों के उत्पादन में तीसरे नंबर पर है। पॉल्ट्री मीट के उत्पादन के मामले हरियाणा, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश देश के टॉप तीन राज्य हैं, मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय की एक रिपार्ट में बताया गया है।

दो महीने में 22,000 करोड़ से ज़्यादा का नुक़सान

पॉल्ट्री एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के सचिव हरपाल ढांडा ने पॉल्ट्री इंडस्ट्री के नुकसान के बारे में विस्तार से बताया। “बाक़ी चीज़ों के साथ क्या है कि मैन्यूफ़ैक्चरिंग बंद हो गई है तो कुछ ही दिक्कतें हैं। फ़ैक्ट्री बंद है, लेबर की सैलरी नहीं दे पा रहे, लेकिन पॉल्ट्री उद्योग का तो पूरा कैपिटल ही ख़त्म होने के कगार पर है। एक बर्ड पर 150 रुपए की लागत आती है और वह 2 रुपए, 5 रुपए किलो तक में बिक रहा है। अभी सात-आठ दिन पहले तक 7 रुपए में बर्ड बिके हैं तो टोटल लॉस है,” उन्होंने कहा। 

पूरे देश में हर महीने तक़रीबन 37 करोड़ चिकन का उत्पादन होता है। एक चिकन 2 किलो वज़न तक का होता है यानी 70 करोड़ किलो चिकन हर महीने बाज़ार में जाता है, हरपाल ने आगे बताया। एक किलो की लागत 80 रुपए तक आती है। अंडे का भी यही हाल है, पूरे देश में क़रीब 27 करोड़ का उत्पादन है। एक अंडे की कीमत 4 रुपए आती है लेकिन वह एक रुपए तक में बिका है। ब्रॉयलर, लेयर रखने वाले किसानों और कंपनियों को मिलाकर अगर पूरे पॉल्ट्री फ़ार्म उद्योग का नुक़सान देखा जाए तो फ़रवरी से लेकर मार्च अंत तक यह राशि 22,000 से 25,000 करोड़ रुपए तक बैठती है। यह राशि केंद्र सरकार के पेयजल और स्वच्छता विभाग के चालू वित्त वर्ष के बजट से भी ज़्यादा है।

लॉकडाउन ने इंडस्ट्री की कमर तोड़ी

“पॉल्ट्री का हमारे यहां चार सीज़न मुख्य होता है। नया साल, दिवाली, होली और ईद। किसान यही सोचता है कि इस समय अच्छे दाम पर मुर्गा चला जाएगा तो लोग इससे पहले मुर्गे पालते हैं। नए साल तक ठीक था लेकिन होली के लिए लोगों ने ज्यादा तादाद में चिकन पाले और फ़रवरी आते-आते ऐसा माहौल बन गया कि चिकन की बिक्री पर असर पड़ने लगा,” पॉल्ट्री फ़ार्मिंग के जानकार इब्ने अली ने बताया। 

भारत में चिकन की सबसे ज़्यादा सप्लाई होटल्स और रेस्टोरेंट्स में होती है। चिकन की दूसरी सबसे ज़्यादा मांग चिकन फ़्राई की दुकानों और ठेलों पर होती है। लॉकडाउन के बाद जब यह बंद हो गए तो मांग कम होने की वजह से चिकन सस्ते में बिकने लगा। दूसरा, सारी शादियां भी टल गईं तो वह ज़रिया भी बंद हो गया। इन सब वजहों से चिकन बाज़ार पूरी तरह से बर्बाद हो गया, उन्होंने आगे यह कहा।

चारा न पहुंचने से भी नुक़सान हुआ

जहां एक तरफ पालक अपने चिकन न बिकने से परेशान थे वहीं चारे की सप्लाई रूकने से इनकी परेशानियां और बढ़ गईं। “पिछले मानसून और कुछ कारणों से मक्का की फ़सल को काफ़ी नुक़सान हुआ और इसके दाम भी इस साल बढ़ गए। जो मक्का 2018 में 12-13 रुपए में बिका था वह इस साल 22-23 रुपए तक में बिका। इसका मुर्गियों के दानों पर सीधा असर पड़ा, यूपी पॉल्ट्री के हेड अकबर अली ने बताया। 

किसान यह नुकसान भी किसी तरह झेल लेते लेकिन होली के बाद सप्लाई चेन पूरी तरह बंद हो गई। फ़ार्मों तक चारा पहुंचना बंद हो गया और मुर्गे को अगर एक दिन भी चारा न मिले तो इसका असर उस पर दिखने लगता है, उसका वज़न तेज़ी से गिरने लगता है। दूसरी बात यह कि यह ऐसी कॉमोडिटी है जो एक बार तैयार हो जाती है तो इसे आप रख नहीं सकते। इसे किसी भी हाल में बेचना पड़ता है।

हैचरी चलाने वालों को चूज़े दफ़नाने पड़े 

10 हज़ार मुर्गों की हैचरी (हैचरी में मशीनों के ज़रिए अलग-अलग नस्ल की मुर्गियों के चूज़े तैयार किए जाते हैं) लगाने के लिए कम से कम दो से ढाई करोड़ रुपए लगते हैं। लोग इसके लिए बैंकों से कर्ज़ लेते हैं। अब जब हालत यह हो गई हैं कि पूरी इंडस्ट्री ही नुकसान में है तो हैचरी वालों की हालत भी ख़राब है। उन्हें तो बैंकों का पैसा वापस करना ही है, बैँक कब तक ईएमआई नहीं लेंगे, इब्ने अली ने कहा।

“लोग अब चूज़े नहीं पाल रहे हैं क्योंकि बिक्री नहीं रही, लेकिन मुर्गी तो अंडे देगी ही। अब उन चूज़ों का क्या किया जाए जब कोई ले ही नहीं रहा। ऐसे में उन्हें दफनाना पड़ रहा है, मजबूरी है क्योंकि और कोई विकल्प नहीं है,” बिहार के एक हैचरी के मालिक सुनील सिंह ने कहा।

 

सरकार से रियायत की मांग

बर्बादी के कगार पर पहुंच चुके पॉल्ट्री फ़ार्मर अब सरकार से कुछ छूट चाहते हैं। “लॉकडाउन के बाद सप्लाई बंद होने से चारा आना भी रूक गया है। ड्राइवर पुलिस के डर से जाने को नहीं तैयार होते। ज़्यादातर फ़ीड (चारा) सोयाबीन वगैरह मध्य प्रदेश से आता है लेकिन कोरोनावायरस और पुलिस के डर से कोई भी वहां जाने को तैयार नहीं है। माल नहीं आ पा रहा है। ऐसे में सरकार अगर कोई पॉलिसी बनाकर यह व्यवस्था करा दे तो कुछ हद तक तो किसानों की समस्या दूर हो जाएगी,” पॉल्ट्री फ़ेडरेशन ऑफ इंडिया के रमेश चंद्र ने कहा।

“पॉल्ट्री एक ऐसा बिज़नेस है जिसे सपोर्ट की ज़रूरत नही है यह ख़ुद को वापस खड़ा कर लेगा लेकिन अभी कम से कम चारा लाने वाली गाड़ियों के साथ सख़्ती न हो, उन्हें मारा-पीटा न जाए,” पॉल्ट्री फ़ार्मिंग के जानकार इब्ने अली ने कहा। उन्होंने यह भी कहा कि चिकन और अंडा दोनो ही प्रोटीन के सबसे अच्छे साधन हैं और अगर ऐसा ही हाल रहा तो जब भी यह लॉकडाउन हटेगा तो इनके दाम बहुत तेज़ी से बढ़ भी जाएंगे।

 

(श्रृंखला, दिल्ली में स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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