पोकसो के तहत मौत की सजा यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चों के लिए खतरनाक

नई दिल्ली: विधेयकों में संशोधन का उदेश्य मूल कानून में खामियों को ठीक करना होना चाहिए, लेकिन 2019 के  प्रोटक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शूअल अफेन्स (पोकसो) अधिनियम में ऐसा नहीं हुआ है। बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इसमें जो संशोधन हुआ, उससे 2012 के मूल विधेयक में सुधार नहीं हुआ है। पोक्‍सो अधिनियम- 2012, बच्‍चों को यौन अपराधों, यौन शोषण और अश्‍लील सामग्री से सुरक्षा प्रदान करने के लिए लाया गया था।

‘हक:सेंटर फॉर चाइल्ड राइट्स’ नाम की संस्था के सह-संस्थापक और वकील शैलभ कुमार कहते हैं कि 2019 का द प्रोटक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शूअल अफेन्स (अमेन्ड्मन्ट)  विधेयक वास्तव में पोकसो अधिनियम को कमजोर करता है। अधिनियम में संशोधन के तहत दंड के रुप में मौत की सजा को भी शामिल किया गया है। इससे

ऐसे मामलों की रिपोर्ट की संख्या में कमी आ सकती है। इसके साथ ही यह संशोधन पीड़ित की हत्या की आशंका को भी बढ़ाता है। इसके अलावा, ना तो पीड़ितों के मुआवजे के लिए कोई संशोधन किया गया है और ना ही लंबित मामलों को कम करने के लिए कोई ठोस समाधान सुझाए गए हैं।

हालांकि राजनीतिक दलों के अधिकांश नेताओं ने संशोधनों का स्वागत किया है और मामले पर संसद में चार घंटे बहस भी चली थी, लेकिन यह बिल संसद की स्थायी समिति को भेजे बिना पारित कर दिया गया। लोकसभा के इस मानसून सत्र में, 34 अन्य विधेयक भी पारित किए गए थे। हर बिल पर सांसदों का ध्यान कम ही गया था। यह ऐसे बिलों पर हमारी सीरीज़ का ये  चौथा आलेख है। इन आलेखों में महत्वपूर्ण बिलों पर विश्लेषण किया गया है।

पोक्सो अधिनियम में पांच नई धाराएं शामिल की गईं। ताजा संशोधन के तहत 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न के लिए 10 से 20 साल तक की सजा हो सकती है । इसमें अपनी ताकत और सत्ता का इस्तेमाल कर किसी व्यक्ति द्वारा किए गए गंभीर यौन अपराध के लिए मौत की सज़ा की मंजूरी दी गई है। इनमें पुलिस अधिकारी, सशस्त्र बलों के सदस्य और लोक सेवक शामिल हैं। इसमें ऐसे मामले भी शामिल हैं, जहां अपराध करने वाला पीड़ित बच्चे का रिश्तेदार है या फिर हमले में बच्चे के यौन अंग घायल हुए हैं।

यदि बाल शोषण से बच्चे की मृत्यु हो जाती है या प्राकृतिक आपदा या हिंसा की स्थिति में बाल यौन शोषण किया जाता है तो इसकी अधिकतम सजा भी मृत्युदंड है। संशोधन में मूल बिल में मौजूद 'सांप्रदायिक या सांप्रदायिक हिंसा' जैसे शब्दों को बदला गया है।

बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि, कुछ खास प्रकार के अपराधों के लिए जेल की सजा की अवधि में बदलाव किए गए हैं, जिससे बच्चों के खिलाफ अपराध की दर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

मौत की सज़ा से समाधान नहीं

शैलभ कुमार का कहना है कि मौत की सज़ा का प्रावधान और कुछ नहीं बल्कि लोगों को लुभाने वाला एक क़दम है।

बाल अधिकार कार्यकर्ता चिंतित हैं। उनका मानना है कि मृत्युदंड शामिल होने से बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराध पर लोग रिपोर्ट दर्ज कराने से कतराएंगे और रिपोर्ट की संख्या में गिरावट हो सकती है। दिल्ली में एक महिला अधिकार संगठन ‘ब्रेकथ्रू’ में सेफगार्डिंग पॉलिसी मैनेजर मोहम्मद इकराम कहते हैं, "बाल यौन शोषण के मामलों में 94% मामलों में आरोपी पीड़ितों के जान-पहचान वाले होते हैं। अगर ज्यादातर आरोपी, पीड़ित या उनके परिवार के पहचान वाले होंगे, तो  उनको मौत की सज़़ा की आशंका के बाद पीड़ितों की ओर से शिकायत दर्ज कराने के मामलों में कमी आ सकती है।" इकराम ने इस बात की भी आशंका जताई कि सज़ा से बचने के लिए आरोपी बलात्कार या यौन हमले के बाद पीड़ित की हत्या भी कर सकता है।

इसके अलावा, ये भी साबित नहीं होता है कि उम्रकैद की तुलना में मौत की सज़ा से अपराध कम होते हों। मृत्युदंड पर विधि आयोग की 2015 की रिपोर्ट में इस बात पर चर्चा की गई है। रिपोर्ट में आतंकवाद को छोड़कर सभी मामलों में मृत्युदंड को समाप्त करने का सुझाव दिया गया है।

28.9% ऐसे मामले हैं, जहां ट्रायल कोर्ट से मौत की सजा मिलने के बाद ऊपरी अदालतों ने आरोपी को दोषी नहीं पाया।  रिपोर्ट के अनुसार, मौत की सजा केवल 4.3% मामलों में ही दी गई थी, 95.7% मामलों में ट्रायल कोर्ट का मौत की सज़ा सुनाना ग़लत था। 

शैलभ कुमार कहते हैं, “अगर हम घटनाक्रम पर नजर डालें तो उन्नाव और कठुआ बलात्कार के मामलों के बाद जनता में भारी गुस्से की वजह से 2018 के शुरु में मौत की सजा का अध्यादेश लाया गया ।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विश्व व्यापार संगठन की बैठक में गए थे, जहां महिलाओं और बाल सुरक्षा पर नीति को लेकर भारत की आलोचना हुई थी और इसके फौरन बाद ये अध्यादेश लाया गया।”

जनवरी 2018 में जम्मू-कश्मीर के कठुआ के पास आठ साल की बच्ची का उसके गांव से अपहरण किया गया था। बच्ची के साथ बलात्कार हुआ, फिर उसकी हत्या कर दी गई थी। इस मामले में अदालत ने सात में से छह अभियुक्तो को दोषी ठहराया था, जिनमें से तीन को आजीवन कारावास और तीन को पांच-पांच साल की जेल की सजा सुनाई गई थी।

उन्नाव में, 17 वर्षीय एक लड़की के साथ अप्रैल 2017 में सामूहिक बलात्कार किया गया था। इस मामले में अभियुक्त उन्नाव से बीजेपी विधायक है। ये मुकदमा अभी भी चल रहा है।

कुमार कहते हैं, इसमें जल्दबाजी करने की बजाय सरकार को अध्ययन करना चाहिए था कि बदलाव पर लोगों की किस तरह की प्रतिक्रिया होगी और उससे अधिनियम को लागू करने के रास्ते में आने वाली समस्याओं को समझा और परखा जा सकता था।

इकराम संशोधन को नाकाफी मानते हैं, " आरोपी के शक्तिशाली होने की स्थिति में पीड़ित और उनके परिवार की सुरक्षा के संबंध में कोई बात नहीं कही गई है। केवल यौन उत्पीड़न के लिए सजा बढ़ाना पर्याप्त नहीं है।"

ज्यादातर मामलों में ट्रायल लंबित

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 में पुलिस ने बच्चों के खिलाफ अपराध के एक लाख 6 हज़ार 958 मामले दर्ज किए थे। इनमें से 36 हज़ार 22 मामले पोक्सो एक्ट के तहत दर्ज किए गए थे। लेकिन 2016 में दर्ज किए गए 89% मामलों के ट्रायल लंबित थे। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2014 और 2015 में दर्ज 90% से अधिक मामलों के ट्रायल भी लंबित थे। 2016 में, कोर्ट ने केवल 29.6% मामलों में ही  अभियुक्तों को दोषी ठहराया।

जनवरी से जून, 2019 तक, पोक्सो के तहत बाल यौन उत्पीड़न या दुर्व्यवहार के 24 हज़ार 212 मामले दर्ज किए गए। इनमें से 27% मामलों में मुकदमा चला। अधिनियम के संशोधन पर संसदीय बहस में भी इस बारे में चर्चा हुई थी। इनमें से मात्र 4% का ट्रायल ही पूरा हो पाया।

सुप्रीम कोर्ट ने पोक्सो अधिनियम के तहत 100 से अधिक लंबित मामलों वाले जिलों को 60 दिन में फास्ट-ट्रैक कोर्ट शुरु करने के निर्देश दिए। राज्यसभा में विधेयक पेश करने वाली महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने बताया कि पोक्सो के तहत मामलों के लिए 1 हज़ार 23 फास्ट-ट्रैक विशेष अदालतें स्थापित की जाएंगी। लेकिन इस मामले में कुमार की राय कुछ अलग है, “ जरूरी नहीं कि विशेष अदालतों की संख्या बढ़ने से लंबित मामलो की संख्या में कमी होगी ही।”

उदाहरण के लिए, फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट से अदालतों में जजों के ख़ाली पदों की समस्या हल नहीं होगी। पोक्सो एक्ट के तहत गठित विशेष अदालतों में सेशन जज की रैंक से नीचे के जज नहीं होंगे और उनकी नियुक्ति मौजूदा जजों के बीच से ही की जाएगी। ज़िला और अधीनस्थ अदालतों में 2 करोड़ 87 लाख मामले लंबित हैं। 2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार इन अदालतों में 22 हज़ार 750 जजों की ज़रूरत है ,जबकि अभी केवल 17 हज़ार 891 जज ही हैं। देश के हाई कोर्ट्स में 40 लाख से अधिक मामले लंबित हैं, और इतने मामलों से निपटने के लिए 8 हज़ार 152 और जजं की ज़रूरत है। आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक हाई कोर्ट में जजों की संख्या कुल स्वीकृत जजों की संख्या 62% ही है। याी 1,079 में से केवल 671 पद ही भरे हुए हैं।

बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि अदालतों में बच्चों के लिए उपयुक्त वातावरण बनाना महत्वपूर्ण है, जिससे न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया के दौरान उन्हें मानसिक आघात ना लगे। अदालतों का माहौल बच्चों की परेशानियों को और बढ़ा देने का कारण ना बने। कुमार कहते हैं, “जजों और सरकारी वकीलों, दोनों को संवेदनशील मामलों पर और ट्रेनिंग की ज़रूरत है।”  उदाहरण के तौर पर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड का प्रमुख प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट होता है, जो केवल बच्चों से संबंधित मामलों की सुनवाई करता है। इससे वह मामलों को लेकर अधिक संवेदनशील होता है और वे अपना सारा समय ऐसे मामलों में देता है।

इसके अलावा, इस तरह के मामलों में पुलिस जांच में सुधार करने के लिए  बिल में नियम बनाने की कोशिश होनी चाहिए थी। उदाहरण के लिए, बाल बलात्कार की घटनाओं की धीमी जांच और लैब रिपोर्ट में लगने वाले समय को देखते हुए, एक जनहित याचिका के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने पोक्सो एक्ट के लिए देश के हर जिले में फोरेंसिक लैबोरेटरी का सुझाव दिया है।

वन-स्टॉप सेंटर 

संशोधित पोक्सो एक्ट में वन-स्टॉप सेंटर की स्थापना का प्रावधान है, जहां बाल पीड़ितों को एक ही छत के नीचे आश्रय, चिकित्सा सहायता, परामर्श और कानूनी सहायता मिल सकती है। कार्यकर्ताओं ने इस प्रावधान का स्वागत किया है।

हालांकि, इन आश्रय घरों की भी निगरानी करने की आवश्यकता होगी। टाइम्स ऑफ इंडिया मे 6 जून, 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, एक कार्यकर्ता, एसेम ताकियार को आरटीआई के तहत मिले जवाब में बताया गया कि हरियाणा के एक वन-स्टॉप सेंटर में बाल यौन शोषण की 100 शिकायतों की सूचना मिली थी। 

कार्यकर्ताओं का कहना है कि, ट्रायल के दौरान, बाल सहायता प्रणाली को और मजबूत किया जाना चाहिए और पीड़ितों को उनके मानसिक और शारीरिक कल्याण के लिए परामर्श और मुआवजा दिया जाना चाहिए।

मुआवज़े के लिए प्रक्रिया का अभाव

बलात्कार के पीड़ितों के लिए द नेशनल लीगल सर्विस ऑथिरिटी ( एनएएलएसए) की काम्पन्सेशन स्कीम

मुआवजा देने के लिए विशेष अदालतों के लिए एक दिशा-निर्देश के रूप में काम कर सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में एक फ़ैसले में सरकार से पोक्सो एक्ट के तहत मुआवज़े के नियम बनाने के लिए कहा था।

लेकिन संशोधन के बाद भी महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने कोई नियम नहीं बनाए गए हैं। इसके अलावा, बिल में यह भी साफ़ नहीं है कि पिड़ित की मौत के हालात में मुआवजा किसे मिलेगा?

काम्पन्सेशन स्कीम को लागू करने में समानता नहीं है। 3 फरवरी, 2019 की द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ एक एनजीओ को आरटीआई के तहत मिले जवाब में बताया गया कि, 2013 से 2018 तक, तमिलनाडु के 25 जिलों में पोक्सो के तहत 3 हज़ार 153 मामले दर्ज किए गए। इनमें से केवल 95 मामलों में ही पीड़ित को अंतरिम मुआवजा दिया गया। 

सहमति से बनाये गए यौन संबंध पर पुराना नज़रिया 

युवा वयस्कों के बीच सहमति से सेक्स के संबंध में ये कानून में पुराना रुढ़िवादी नज़रिया अपनाता है। पोक्सो एक्ट 16-18 वर्ष की आयु के किशोरों को ऐसे वयस्क के रूप में नहीं मानता है, जो सहमति से यौन सम्बंध बना सकते हों। वह अक्सर सहमति से संबंध और यौन शोषण के बीच अंतर नहीं समझते हैं।  अंतरजातीय विवाह के मामलों और घर छोड़कर जाने के मामलों में अक्सर परिवार इसका दुरुपयोग करते है।

हाल के एक मामले में, मद्रास हाई कोर्ट ने सुझाव दिया कि एक बच्चे को परिभाषित करने वाली आयु को 18 से घटाकर 16 किया जाना चाहिए। कोर्ट ने इस पर भी गौर किया कि पोक्सो अधिनियम में किशोरों के यौन संबंधों और यौन शोषण के बीच अंतर करने के लिए अभियुक्त और पीड़ित के बीच के उम्र-अंतर को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। 

(अली इंडियास्पेंड में रिपोर्टिंग फेलो हैं।)

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 14 अक्टूबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

नई दिल्ली: विधेयकों में संशोधन का उदेश्य मूल कानून में खामियों को ठीक करना होना चाहिए, लेकिन 2019 के  प्रोटक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शूअल अफेन्स (पोकसो) अधिनियम में ऐसा नहीं हुआ है। बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इसमें जो संशोधन हुआ, उससे 2012 के मूल विधेयक में सुधार नहीं हुआ है। पोक्‍सो अधिनियम- 2012, बच्‍चों को यौन अपराधों, यौन शोषण और अश्‍लील सामग्री से सुरक्षा प्रदान करने के लिए लाया गया था।

‘हक:सेंटर फॉर चाइल्ड राइट्स’ नाम की संस्था के सह-संस्थापक और वकील शैलभ कुमार कहते हैं कि 2019 का द प्रोटक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शूअल अफेन्स (अमेन्ड्मन्ट)  विधेयक वास्तव में पोकसो अधिनियम को कमजोर करता है। अधिनियम में संशोधन के तहत दंड के रुप में मौत की सजा को भी शामिल किया गया है। इससे

ऐसे मामलों की रिपोर्ट की संख्या में कमी आ सकती है। इसके साथ ही यह संशोधन पीड़ित की हत्या की आशंका को भी बढ़ाता है। इसके अलावा, ना तो पीड़ितों के मुआवजे के लिए कोई संशोधन किया गया है और ना ही लंबित मामलों को कम करने के लिए कोई ठोस समाधान सुझाए गए हैं।

हालांकि राजनीतिक दलों के अधिकांश नेताओं ने संशोधनों का स्वागत किया है और मामले पर संसद में चार घंटे बहस भी चली थी, लेकिन यह बिल संसद की स्थायी समिति को भेजे बिना पारित कर दिया गया। लोकसभा के इस मानसून सत्र में, 34 अन्य विधेयक भी पारित किए गए थे। हर बिल पर सांसदों का ध्यान कम ही गया था। यह ऐसे बिलों पर हमारी सीरीज़ का ये  चौथा आलेख है। इन आलेखों में महत्वपूर्ण बिलों पर विश्लेषण किया गया है।

पोक्सो अधिनियम में पांच नई धाराएं शामिल की गईं। ताजा संशोधन के तहत 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न के लिए 10 से 20 साल तक की सजा हो सकती है । इसमें अपनी ताकत और सत्ता का इस्तेमाल कर किसी व्यक्ति द्वारा किए गए गंभीर यौन अपराध के लिए मौत की सज़ा की मंजूरी दी गई है। इनमें पुलिस अधिकारी, सशस्त्र बलों के सदस्य और लोक सेवक शामिल हैं। इसमें ऐसे मामले भी शामिल हैं, जहां अपराध करने वाला पीड़ित बच्चे का रिश्तेदार है या फिर हमले में बच्चे के यौन अंग घायल हुए हैं।

यदि बाल शोषण से बच्चे की मृत्यु हो जाती है या प्राकृतिक आपदा या हिंसा की स्थिति में बाल यौन शोषण किया जाता है तो इसकी अधिकतम सजा भी मृत्युदंड है। संशोधन में मूल बिल में मौजूद 'सांप्रदायिक या सांप्रदायिक हिंसा' जैसे शब्दों को बदला गया है।

बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि, कुछ खास प्रकार के अपराधों के लिए जेल की सजा की अवधि में बदलाव किए गए हैं, जिससे बच्चों के खिलाफ अपराध की दर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

मौत की सज़ा से समाधान नहीं

शैलभ कुमार का कहना है कि मौत की सज़ा का प्रावधान और कुछ नहीं बल्कि लोगों को लुभाने वाला एक क़दम है।

बाल अधिकार कार्यकर्ता चिंतित हैं। उनका मानना है कि मृत्युदंड शामिल होने से बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराध पर लोग रिपोर्ट दर्ज कराने से कतराएंगे और रिपोर्ट की संख्या में गिरावट हो सकती है। दिल्ली में एक महिला अधिकार संगठन ‘ब्रेकथ्रू’ में सेफगार्डिंग पॉलिसी मैनेजर मोहम्मद इकराम कहते हैं, "बाल यौन शोषण के मामलों में 94% मामलों में आरोपी पीड़ितों के जान-पहचान वाले होते हैं। अगर ज्यादातर आरोपी, पीड़ित या उनके परिवार के पहचान वाले होंगे, तो  उनको मौत की सज़़ा की आशंका के बाद पीड़ितों की ओर से शिकायत दर्ज कराने के मामलों में कमी आ सकती है।" इकराम ने इस बात की भी आशंका जताई कि सज़ा से बचने के लिए आरोपी बलात्कार या यौन हमले के बाद पीड़ित की हत्या भी कर सकता है।

इसके अलावा, ये भी साबित नहीं होता है कि उम्रकैद की तुलना में मौत की सज़ा से अपराध कम होते हों। मृत्युदंड पर विधि आयोग की 2015 की रिपोर्ट में इस बात पर चर्चा की गई है। रिपोर्ट में आतंकवाद को छोड़कर सभी मामलों में मृत्युदंड को समाप्त करने का सुझाव दिया गया है।

28.9% ऐसे मामले हैं, जहां ट्रायल कोर्ट से मौत की सजा मिलने के बाद ऊपरी अदालतों ने आरोपी को दोषी नहीं पाया।  रिपोर्ट के अनुसार, मौत की सजा केवल 4.3% मामलों में ही दी गई थी, 95.7% मामलों में ट्रायल कोर्ट का मौत की सज़ा सुनाना ग़लत था। 

शैलभ कुमार कहते हैं, “अगर हम घटनाक्रम पर नजर डालें तो उन्नाव और कठुआ बलात्कार के मामलों के बाद जनता में भारी गुस्से की वजह से 2018 के शुरु में मौत की सजा का अध्यादेश लाया गया ।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विश्व व्यापार संगठन की बैठक में गए थे, जहां महिलाओं और बाल सुरक्षा पर नीति को लेकर भारत की आलोचना हुई थी और इसके फौरन बाद ये अध्यादेश लाया गया।”

जनवरी 2018 में जम्मू-कश्मीर के कठुआ के पास आठ साल की बच्ची का उसके गांव से अपहरण किया गया था। बच्ची के साथ बलात्कार हुआ, फिर उसकी हत्या कर दी गई थी। इस मामले में अदालत ने सात में से छह अभियुक्तो को दोषी ठहराया था, जिनमें से तीन को आजीवन कारावास और तीन को पांच-पांच साल की जेल की सजा सुनाई गई थी।

उन्नाव में, 17 वर्षीय एक लड़की के साथ अप्रैल 2017 में सामूहिक बलात्कार किया गया था। इस मामले में अभियुक्त उन्नाव से बीजेपी विधायक है। ये मुकदमा अभी भी चल रहा है।

कुमार कहते हैं, इसमें जल्दबाजी करने की बजाय सरकार को अध्ययन करना चाहिए था कि बदलाव पर लोगों की किस तरह की प्रतिक्रिया होगी और उससे अधिनियम को लागू करने के रास्ते में आने वाली समस्याओं को समझा और परखा जा सकता था।

इकराम संशोधन को नाकाफी मानते हैं, " आरोपी के शक्तिशाली होने की स्थिति में पीड़ित और उनके परिवार की सुरक्षा के संबंध में कोई बात नहीं कही गई है। केवल यौन उत्पीड़न के लिए सजा बढ़ाना पर्याप्त नहीं है।"

ज्यादातर मामलों में ट्रायल लंबित

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 में पुलिस ने बच्चों के खिलाफ अपराध के एक लाख 6 हज़ार 958 मामले दर्ज किए थे। इनमें से 36 हज़ार 22 मामले पोक्सो एक्ट के तहत दर्ज किए गए थे। लेकिन 2016 में दर्ज किए गए 89% मामलों के ट्रायल लंबित थे। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2014 और 2015 में दर्ज 90% से अधिक मामलों के ट्रायल भी लंबित थे। 2016 में, कोर्ट ने केवल 29.6% मामलों में ही  अभियुक्तों को दोषी ठहराया।

जनवरी से जून, 2019 तक, पोक्सो के तहत बाल यौन उत्पीड़न या दुर्व्यवहार के 24 हज़ार 212 मामले दर्ज किए गए। इनमें से 27% मामलों में मुकदमा चला। अधिनियम के संशोधन पर संसदीय बहस में भी इस बारे में चर्चा हुई थी। इनमें से मात्र 4% का ट्रायल ही पूरा हो पाया।

सुप्रीम कोर्ट ने पोक्सो अधिनियम के तहत 100 से अधिक लंबित मामलों वाले जिलों को 60 दिन में फास्ट-ट्रैक कोर्ट शुरु करने के निर्देश दिए। राज्यसभा में विधेयक पेश करने वाली महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने बताया कि पोक्सो के तहत मामलों के लिए 1 हज़ार 23 फास्ट-ट्रैक विशेष अदालतें स्थापित की जाएंगी। लेकिन इस मामले में कुमार की राय कुछ अलग है, “ जरूरी नहीं कि विशेष अदालतों की संख्या बढ़ने से लंबित मामलो की संख्या में कमी होगी ही।”

उदाहरण के लिए, फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट से अदालतों में जजों के ख़ाली पदों की समस्या हल नहीं होगी। पोक्सो एक्ट के तहत गठित विशेष अदालतों में सेशन जज की रैंक से नीचे के जज नहीं होंगे और उनकी नियुक्ति मौजूदा जजों के बीच से ही की जाएगी। ज़िला और अधीनस्थ अदालतों में 2 करोड़ 87 लाख मामले लंबित हैं। 2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार इन अदालतों में 22 हज़ार 750 जजों की ज़रूरत है ,जबकि अभी केवल 17 हज़ार 891 जज ही हैं। देश के हाई कोर्ट्स में 40 लाख से अधिक मामले लंबित हैं, और इतने मामलों से निपटने के लिए 8 हज़ार 152 और जजं की ज़रूरत है। आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक हाई कोर्ट में जजों की संख्या कुल स्वीकृत जजों की संख्या 62% ही है। याी 1,079 में से केवल 671 पद ही भरे हुए हैं।

बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि अदालतों में बच्चों के लिए उपयुक्त वातावरण बनाना महत्वपूर्ण है, जिससे न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया के दौरान उन्हें मानसिक आघात ना लगे। अदालतों का माहौल बच्चों की परेशानियों को और बढ़ा देने का कारण ना बने। कुमार कहते हैं, “जजों और सरकारी वकीलों, दोनों को संवेदनशील मामलों पर और ट्रेनिंग की ज़रूरत है।”  उदाहरण के तौर पर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड का प्रमुख प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट होता है, जो केवल बच्चों से संबंधित मामलों की सुनवाई करता है। इससे वह मामलों को लेकर अधिक संवेदनशील होता है और वे अपना सारा समय ऐसे मामलों में देता है।

इसके अलावा, इस तरह के मामलों में पुलिस जांच में सुधार करने के लिए  बिल में नियम बनाने की कोशिश होनी चाहिए थी। उदाहरण के लिए, बाल बलात्कार की घटनाओं की धीमी जांच और लैब रिपोर्ट में लगने वाले समय को देखते हुए, एक जनहित याचिका के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने पोक्सो एक्ट के लिए देश के हर जिले में फोरेंसिक लैबोरेटरी का सुझाव दिया है।

वन-स्टॉप सेंटर 

संशोधित पोक्सो एक्ट में वन-स्टॉप सेंटर की स्थापना का प्रावधान है, जहां बाल पीड़ितों को एक ही छत के नीचे आश्रय, चिकित्सा सहायता, परामर्श और कानूनी सहायता मिल सकती है। कार्यकर्ताओं ने इस प्रावधान का स्वागत किया है।

हालांकि, इन आश्रय घरों की भी निगरानी करने की आवश्यकता होगी। टाइम्स ऑफ इंडिया मे 6 जून, 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, एक कार्यकर्ता, एसेम ताकियार को आरटीआई के तहत मिले जवाब में बताया गया कि हरियाणा के एक वन-स्टॉप सेंटर में बाल यौन शोषण की 100 शिकायतों की सूचना मिली थी। 

कार्यकर्ताओं का कहना है कि, ट्रायल के दौरान, बाल सहायता प्रणाली को और मजबूत किया जाना चाहिए और पीड़ितों को उनके मानसिक और शारीरिक कल्याण के लिए परामर्श और मुआवजा दिया जाना चाहिए।

मुआवज़े के लिए प्रक्रिया का अभाव

बलात्कार के पीड़ितों के लिए द नेशनल लीगल सर्विस ऑथिरिटी ( एनएएलएसए) की काम्पन्सेशन स्कीम

मुआवजा देने के लिए विशेष अदालतों के लिए एक दिशा-निर्देश के रूप में काम कर सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में एक फ़ैसले में सरकार से पोक्सो एक्ट के तहत मुआवज़े के नियम बनाने के लिए कहा था।

लेकिन संशोधन के बाद भी महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने कोई नियम नहीं बनाए गए हैं। इसके अलावा, बिल में यह भी साफ़ नहीं है कि पिड़ित की मौत के हालात में मुआवजा किसे मिलेगा?

काम्पन्सेशन स्कीम को लागू करने में समानता नहीं है। 3 फरवरी, 2019 की द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ एक एनजीओ को आरटीआई के तहत मिले जवाब में बताया गया कि, 2013 से 2018 तक, तमिलनाडु के 25 जिलों में पोक्सो के तहत 3 हज़ार 153 मामले दर्ज किए गए। इनमें से केवल 95 मामलों में ही पीड़ित को अंतरिम मुआवजा दिया गया। 

सहमति से बनाये गए यौन संबंध पर पुराना नज़रिया 

युवा वयस्कों के बीच सहमति से सेक्स के संबंध में ये कानून में पुराना रुढ़िवादी नज़रिया अपनाता है। पोक्सो एक्ट 16-18 वर्ष की आयु के किशोरों को ऐसे वयस्क के रूप में नहीं मानता है, जो सहमति से यौन सम्बंध बना सकते हों। वह अक्सर सहमति से संबंध और यौन शोषण के बीच अंतर नहीं समझते हैं।  अंतरजातीय विवाह के मामलों और घर छोड़कर जाने के मामलों में अक्सर परिवार इसका दुरुपयोग करते है।

हाल के एक मामले में, मद्रास हाई कोर्ट ने सुझाव दिया कि एक बच्चे को परिभाषित करने वाली आयु को 18 से घटाकर 16 किया जाना चाहिए। कोर्ट ने इस पर भी गौर किया कि पोक्सो अधिनियम में किशोरों के यौन संबंधों और यौन शोषण के बीच अंतर करने के लिए अभियुक्त और पीड़ित के बीच के उम्र-अंतर को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। 

(अली इंडियास्पेंड में रिपोर्टिंग फेलो हैं।)

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 14 अक्टूबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।