बिहार के डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग अभियान में क्यों कम दर्ज हो सकती है कोविड- 19 के मामलों की संख्या

पटना: दिशा निर्देशों का ठीक से पालन ना किए जाने की वजह से बिहार सरकार की तरफ़ से कोविड-19 आंकड़ों के संग्रह के लिए शुरु किए गए डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग अभियान में ख़ामियां हैं, इंडियास्पेंड ने बिहार के 4 ज़िलों में अपनी जांच में पाया। हमारी टीम ने पाया कि स्क्रीनिंग करने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ता पूरे घर को छोड़ रहे हैं और अपूर्ण, लापरवाही से लोगों से बात कर रहे हैं। 

बिहार में कोविड -19 के मामलों में अचानक वृद्धि नज़र आ रही है। 1 मई को राज्य में 466 पॉज़िटिव मामले थे और 19 मई को मामलों की संख्या 1,391 हो गई। इस बढ़ोत्तरी के लिए प्रवासी कामगारों की वापसी को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। राज्य के सामने अब एक ही रास्ता है कि वह टेस्टिंग और स्क्रीनिंग व्यापक स्तर पर करे।

बिहार सरकार ने 16 अप्रैल को चार शहरों - नालंदा, नवादा, सीवान और बेगूसराय में डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग शुरू की थी। पांच दिन बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस अभियान को पूरे राज्य में शुरु करने का ऐलान किया। 

राज्य सरकार ने 2 मई तक बिहार के 38 में से सात ज़िलों - सीवान, बेगूसराय, गया, मुंगेर, नालंदा, नवादा और शेखपुरा - में सक्रीनिंग पूरी कर लेने का दावा किया। हमारी टीम ने स्क्रीनिंग प्रक्रिया के बारे में जानने के लिए चार जिलों - सीवान, पटना, रोहतास और पूर्वी चंपारण - में लोगों से बात की। 

उदाहरण के लिए, सीवान में, 16 दिन में 516,160 घरों के 31 लाख लोगों की स्क्रीनिंग की गई, आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार। हालांकि, सीवान में इंडियास्पेंड की जांच में व्यापक परीक्षण के कम सबूत मिले। ऐसी शिकायतें भी थीं कि यात्रा और स्वास्थ्य इतिहास के बारे में अनिवार्य प्रश्न छोड़ दिए गए थे; और परिवारों से उनके उन पड़ोसियों के बारे में सवाल पूछे गए, जो कभी स्क्रीनिंग के लिए नहीं गए थे।

"मेरे गांव में लगभग 100 घर हैं, लेकिन इनमें से मेरे परिवार समेत किसी की भी स्क्रीनिंग नहीं हुई," सीवान ज़िले के पचरुखी ब्लॉक के बरियारपुर गांव के किसान प्रताप सिंह ने बताया। बरियारपुर के एक और निवासी बिट्टू कुमार ने भी महामारी के लिए स्क्रीनिंग होने की बात से इनकार किया। "अब तक यहां डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग के लिए कोई नहीं आया है," बिट्टू कुमार ने कहा।

ज़िले के मसार गांव की 50 वर्षीय शीला देवी ने कहा कि स्वास्थ्य कर्मियों ने केवल परिवार के सदस्यों का नाम लिखा। "उन्होंने यह भी नहीं पूछा कि क्या हममें से किसी ने कोई यात्रा की थी या खांसी और बुख़ार जैसे लक्षण दिखाई दिए," उसने कहा। "उन्होंने मुझसे गांव में मेरे क़रीबी रिश्तेदारों के बारे में भी जानकारी मांगी, लेकिन वह उनसे मिलने नहीं गए।"

जिन अधिकारियों से हमने बात की उन्होंने इन आरोपों से इनकार किया। पचरुखी के खंड विकास अधिकारी (बीडीओ), इस्माइल अंसारी ने कहा कि स्क्रीनिंग में एक भी घर नहीं छोड़ा गया। "हमने अपने ब्लॉक में हर घर की स्क्रीनिंग एक सप्ताह पहले पूरी कर ली है," उन्होंने कहा।

सीवान के आधिकारिक आंकड़े वास्तविक हैं, सीवान के सिविल सर्जन यदुवंशी कुमार शर्मा ने कहा। ज़िले से जांच के लिए भेजे गए 49 सैंपल में से 43 निगेटिव हैं और छह संदिग्ध मामलों को क्वारंटाइन में भेजा गया था, उन्होंने बताया।

कोविड ​​-19 की नोडल ऑफ़िसर और राज्य की महामारी विशेषज्ञ रागिनी मिश्रा ने इंडियास्पेंड को बताया कि पूरी तरह से प्रोटोकॉल का पालन किया जा रहा है। "डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग के तहत, संक्रमण के लक्षण वाले लोगों के ब्लड सैंपल टेस्ट के लिए लैब में भेजे गए हैं," उसने कहा।

खराब स्क्रीनिंग के कारण कई हो सकते हैं, विशेषज्ञों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने कहा। हो सकता है कि स्क्रीनिंग के काम में लगे लोगों को पर्याप्त ट्रेनिंग नहीं दी गई हो और उन्हें यह नहीं पता हो कि इसके नतीजे राज्य में महामारी को रोकने के लिए कितने महत्वपूर्ण होंगे। इंडियास्पेंड की जांच में यह भी पता चला कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, जिनमें से कई को पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के बिना स्क्रीनिंग के लिए भेजा गया, को ख़ुद के संक्रमित होने का डर हो और उन्होंने शॉर्ट-कट अपनाया हो।

"डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग महत्वपूर्ण है और अगर कोई भी घर इससे छूट जाता है तो वह इसके कम्युनिटी ट्रांसमिशन का कारण हो सकता है," इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (बिहार चैप्टर) के सीनियर वाइस प्रेसीडेंट अजय कुमार ने कहा।

 

बिहार में हाल के सप्ताहों में इन मामलों में भारी उछाल देखा गया है। राज्य में कोविड-19 के मामलों की संख्या 2 मई तक 476 थी। मुंगेर ज़िले में 95 मामले दर्ज किए गए थे, इसके बाद रोहतास और बक्सर में 52-52 मामले दर्ज किए गए, जबकि राज्य की राजधानी पटना में 44 मामले थे। मोटे तौर पर 76.68% (365) मामले पिछले आठ दिन में सामने आए, राज्य के स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार। 

हमारी टीम ने राज्य के प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) संजय कुमार दो बार बात करने की कोशिश की। उनकी प्रतिक्रिया मिलने के बाद हम इस रिपोर्ट को अपडेट करेंगे।

'लक्षणों के बारे में नहीं पूछा'

स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग का काम दिया गया, उन्हें दिए गए क्षेत्र में हर घर का दौरा करने और कोविड-19 लक्षणों से संबंधित सवाल पूछने थे। मसलन, खांसी, बुख़ार या सांस लेने में तक़लीफ़ तो नहीं है साथ ही उनसे हर तरह की यात्रा की जानकारी लेनी थी। यह काम नाम, उम्र और लिंग के बारे में बुनियादी जानकारी पूछने के अलावा है।

किसी भी घर से मिली यात्रा के इतिहास की जानकारी को एक सफ़ेद चाक के साथ चिह्नित किया जाता है और इसका विवरण एक रजिस्टर में दर्ज कर उसे सदर (ज़िला) अस्पताल में जमा कराना होता है। डॉक्टर इसका अध्ययन करते हैं और फिर ब्लॉक प्रभारी को उन संवेदनशील व्यक्तियों के बारे में सूचित करते हैं जिन्हें अपना सैंपल देने के लिए अस्पताल जाने की ज़रूरत होती है। 

हालांकि, हमें कई शिकायतें मिलीं कि स्वास्थ्य कर्मियों ने "उचित" सवाल नहीं पूछे। "उन्होंने मेरे परिवार के सदस्यों के नाम और उम्र लिखी और पूछा कि क्या मेरे परिवार में कोई भी राज्य या देश के बाहर से आया है," अररिया ज़िले के फोर्ब्सगंज ब्लॉक की साहिबगंज पंचायत के एक छोटे किसान ब्रह्मदेव राम ने कहा। "उन्होंने यह नहीं पूछा कि क्या मेरे परिवार के सदस्यों को खांसी, बुख़ार या अन्य लक्षण हैं।" 

रोहतास ज़िले में भी, लोगों की शिकायत थी कि उनसे की गई पूछताछ अधूरी थी। 21 अप्रैल को पहले मामले का पता चलने के बाद पिछले दो हफ़्ते में रोहतास ज़िले में कोरोनोवायरस मामलों में तेज़ी देखी है। अब यह ज़िला कोविड​​-19 के 91 पॉज़िटिव मामलों के साथ रेड ज़ोन में आता है।

"सेविका [आंगनवाड़ी कार्यकर्ता] घर आई और मेरे परिवार के सदस्यों के नाम और उनकी उम्र के बारे में पूछा," रोहतास ज़िले के वरुण गांव के नारायण गिरि ने बताया। "उन्होंने ना तो कोविड -19 लक्षणों के बारे में पूछा और ना ही यात्रा के बारे में।" स्वास्थ्य कर्मियों ने उनसे पड़ोसियों के बारे में भी पूछा लेकिन वह उनसे मिलने नहीं गई, उन्होंने आरोप लगाया।

स्क्रीनिंग में ख़ामियां क्यों हैं

स्क्रीनिंग कार्यक्रम में शामिल स्वास्थ्य कर्मी आशा, जीविका कार्यकर्ता (राज्य के आजीविका मिशन के लिए काम करने वाले) और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं। उन्हें केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की महामारी का प्रसार स्थानीय स्तर पर रोकने के लिए बने दिशा-निर्देशों के तहत काम करने के लिए कहा गया था।

स्क्रीनिंग ड्यूटी पर जाने वाले स्वास्थ्य कर्मियों को दो मास्क के सेट दिए जाने चाहिए - एक ख़ुद के लिए और दूसरा उन लोगों के लिए जिनके संक्रमित होने का शक है, दिशा-निर्देशों के अनुसार। लेकिन स्वास्थ्य कर्मियों की शिकायत है कि उनमें से सभी को अपने लिए मास्क नहीं मिला और न ही उन लोगों के लिए जिनके अंदर लक्षण थे।

उचित रक्षात्मक उपकरण के बिना, आशा बहुओं को “कोरोनावायरस के संपर्क में आने का डर है”, बिहार के पूर्वी चंपारण ज़िले के केसरिया कस्बे की आशा कार्यकर्ता चुन्नी कुमारी ने कहा। "उनमें से बहुत कम को लक्षण वाले लोगों को बांटने के लिए मास्क दिए गए हैं," उन्होंने कहा। 

लगभग 20% आशा कार्यकर्ताओं को ही उनकी सुरक्षा के लिए मास्क और दस्ताने दिए गए हैं, बिहार आशा वर्कर्स संघ की पदाधिकारी शशि यादव ने बताया। हमें बुख़ार की जांच के लिए इंफ़्रारेड थर्मामीटर गन नहीं दी गई है, चुन्नी कुमारी ने कहा। "इसलिए, हम लोगों से सिर्फ़ यह पूछते हैं कि क्या उन्होंने कोई यात्रा की है या उन्हें सर्दी, खांसी या सांस की तकलीफ़ है," चुन्नी कुमारी ने बताया। 

प्रवासियों की वापसी

राज्य सरकार ने कोरोनावायरस के मामलों में आई तेज़ी के लिए प्रवासी कामगारों को ज़िम्मेदार ठहराया है जो तमिलनाडु, दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों से वापस आए हैं। अब तक, अन्य राज्यों से लौटे 332 प्रवासी मज़दूरों के सैंपल कोरोनावायरस से संक्रमित पाए गए हैं।

मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, 11 मई तक, 115 ट्रेनों से विभिन्न राज्यों में फंसे 137,000 मज़दूरों और श्रमिकों को लाया जा चुका था। राज्य में आने वाले दिनों में 427,000 और प्रवासियों की वापसी हो सकती है। गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश से 115 ट्रेनें बिहार आ चुकी हैं।  

राज्य में सकारात्मक मामलों की संख्या 29 अप्रैल, 2020 तक आठ दिन में ही 113 से बढ़कर 403 हो गई और प्रभावित ज़िलों की संख्या दोगुनी होकर 29 हो गई, डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार। प्रवासियों में से कुछ छिपकर आए थे। 29 अप्रैल को केंद्र ने प्रवासियों को घर लौटने की इजाज़त दे दी। 

 

"हमने हर ब्लॉक में 2,000-बेड की क्षमता वाले क्वारंटाइन सेंटर बनाए हैं," महामारी विशेषज्ञ रागिनी मिश्रा ने बताया। “जो प्रवासी दूसरे राज्यों से लौट रहे हैं, उनकी स्क्रीनिंग की जाएगी और उन्हें 21 दिन के लिए क्वारंटाइन सेंटर में रखा जाएगा।"

बिहार के 27 लाख से भी ज़्यादा प्रवासी कामगार दूसरे राज्यों में फंसे हैं, राज्य के उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के एक बयान के अनुसार। उनमें से अकेले, दिल्ली से 500,000, महाराष्ट्र से 268,000, कर्नाटक से 100,000, गुजरात से 200,000 और अन्य राज्यों से हजारों ने वापसी का आवेदन किया है,” उन्होंने बताया। 2 मई को, 1,174 यात्रियों के साथ पहली ट्रेन दानापुर स्टेशन पर आई।

"जब वह अपनी यात्रा का विवरण देते हैं तो एक मेडिकल टीम उनसे मिलने जाती है," मुज़फ़्फ़रपुर के सिविल सर्जन शैलेश प्रसाद सिंह ने बताया। “डॉक्टर उनकी जांच करते हैं और जिन लोगों में लक्षण होते हैं उनके ब्लड सैंपल लेकर टेस्टिंग के लिए भेजे जाते हैं," उन्होंने बताया। “अगर किसी व्यक्ति में लक्षण नहीं दिखाई देते हैं तो  उसे 21 दिन के लिए क्वारंटाइन सेंटर में रहना होता है। 21 दिन के बाद उनकी फिर से जांच की जाती है और फिर उन्हें घर भेज दिया जाता है।”

एक प्रतिशत से भी कम परीक्षण

देश में कोरोनावायरस का पहला मामला सामने आने के पांच सप्ताह बाद बिहार में कोविड -19 की पहली लैब 7 मार्च को शुरु हुई। इस समय राज्य में छह लैब काम कर रही हैं - पटना में चार और मुज़फ़्फ़रपुर और दरभंगा में एक-एक। केंद्र सरकार के राजेंद्र मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ में सबसे अधिक (19 मई तक) 25,659 सैंपल टेस्ट किए गए।

सभी छह लैब्स में 19 मई तक 50,443 सैंपल टेस्ट किए गए, जो कि बिहार की कुल जनसंख्या का सिर्फ़ 0.048% है (2011 की जनगणना के अनुसार बिहार की जनसंख्या 10.4 करोड़ है)।

बिहार में कोविड ​​-19 का पहला मामला 22 मार्च को सामने आया था, जब राज्य में दो पॉज़िटिव मामले मिले थे, जिनमें से एक 38 वर्षीय व्यक्ति ने पटना के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में बीमारी के कारण दम तोड़ दिया। पूरे देश में लॉकडाउन से तीन दिन पहले, 22 मार्च तक बिहार में केवल एक लैब और सैंपल कलेक्शन सेटंर थे। 

अब यहां कोविड-19 मामलों के लिए तीन अस्पताल हैं, पटना में नालंदा मेडिकल कॉलेज और अस्पताल, गया में मगध मेडिकल कॉलेज और भागलपुर में जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में 2,344 आइसोलेशन बेड हैं। वर्तमान में, 75 COVID-19 रोगियों को तीन अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जबकि 290 मरीज़ों का इलाज ज़िला-स्तरीय आइसोलेशन सेंटर्स में किया जा रहा है।

(उमेश, पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं और 101Reporters.com के सदस्य हैं।)

यह रिपोर्ट 16 मई को IndiaSpend पर प्रकाशित हुई जिसका 19 मई को अपडेट के साथ अनुवाद किया गया। 

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

पटना: दिशा निर्देशों का ठीक से पालन ना किए जाने की वजह से बिहार सरकार की तरफ़ से कोविड-19 आंकड़ों के संग्रह के लिए शुरु किए गए डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग अभियान में ख़ामियां हैं, इंडियास्पेंड ने बिहार के 4 ज़िलों में अपनी जांच में पाया। हमारी टीम ने पाया कि स्क्रीनिंग करने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ता पूरे घर को छोड़ रहे हैं और अपूर्ण, लापरवाही से लोगों से बात कर रहे हैं। 

बिहार में कोविड -19 के मामलों में अचानक वृद्धि नज़र आ रही है। 1 मई को राज्य में 466 पॉज़िटिव मामले थे और 19 मई को मामलों की संख्या 1,391 हो गई। इस बढ़ोत्तरी के लिए प्रवासी कामगारों की वापसी को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। राज्य के सामने अब एक ही रास्ता है कि वह टेस्टिंग और स्क्रीनिंग व्यापक स्तर पर करे।

बिहार सरकार ने 16 अप्रैल को चार शहरों - नालंदा, नवादा, सीवान और बेगूसराय में डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग शुरू की थी। पांच दिन बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस अभियान को पूरे राज्य में शुरु करने का ऐलान किया। 

राज्य सरकार ने 2 मई तक बिहार के 38 में से सात ज़िलों - सीवान, बेगूसराय, गया, मुंगेर, नालंदा, नवादा और शेखपुरा - में सक्रीनिंग पूरी कर लेने का दावा किया। हमारी टीम ने स्क्रीनिंग प्रक्रिया के बारे में जानने के लिए चार जिलों - सीवान, पटना, रोहतास और पूर्वी चंपारण - में लोगों से बात की। 

उदाहरण के लिए, सीवान में, 16 दिन में 516,160 घरों के 31 लाख लोगों की स्क्रीनिंग की गई, आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार। हालांकि, सीवान में इंडियास्पेंड की जांच में व्यापक परीक्षण के कम सबूत मिले। ऐसी शिकायतें भी थीं कि यात्रा और स्वास्थ्य इतिहास के बारे में अनिवार्य प्रश्न छोड़ दिए गए थे; और परिवारों से उनके उन पड़ोसियों के बारे में सवाल पूछे गए, जो कभी स्क्रीनिंग के लिए नहीं गए थे।

"मेरे गांव में लगभग 100 घर हैं, लेकिन इनमें से मेरे परिवार समेत किसी की भी स्क्रीनिंग नहीं हुई," सीवान ज़िले के पचरुखी ब्लॉक के बरियारपुर गांव के किसान प्रताप सिंह ने बताया। बरियारपुर के एक और निवासी बिट्टू कुमार ने भी महामारी के लिए स्क्रीनिंग होने की बात से इनकार किया। "अब तक यहां डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग के लिए कोई नहीं आया है," बिट्टू कुमार ने कहा।

ज़िले के मसार गांव की 50 वर्षीय शीला देवी ने कहा कि स्वास्थ्य कर्मियों ने केवल परिवार के सदस्यों का नाम लिखा। "उन्होंने यह भी नहीं पूछा कि क्या हममें से किसी ने कोई यात्रा की थी या खांसी और बुख़ार जैसे लक्षण दिखाई दिए," उसने कहा। "उन्होंने मुझसे गांव में मेरे क़रीबी रिश्तेदारों के बारे में भी जानकारी मांगी, लेकिन वह उनसे मिलने नहीं गए।"

जिन अधिकारियों से हमने बात की उन्होंने इन आरोपों से इनकार किया। पचरुखी के खंड विकास अधिकारी (बीडीओ), इस्माइल अंसारी ने कहा कि स्क्रीनिंग में एक भी घर नहीं छोड़ा गया। "हमने अपने ब्लॉक में हर घर की स्क्रीनिंग एक सप्ताह पहले पूरी कर ली है," उन्होंने कहा।

सीवान के आधिकारिक आंकड़े वास्तविक हैं, सीवान के सिविल सर्जन यदुवंशी कुमार शर्मा ने कहा। ज़िले से जांच के लिए भेजे गए 49 सैंपल में से 43 निगेटिव हैं और छह संदिग्ध मामलों को क्वारंटाइन में भेजा गया था, उन्होंने बताया।

कोविड ​​-19 की नोडल ऑफ़िसर और राज्य की महामारी विशेषज्ञ रागिनी मिश्रा ने इंडियास्पेंड को बताया कि पूरी तरह से प्रोटोकॉल का पालन किया जा रहा है। "डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग के तहत, संक्रमण के लक्षण वाले लोगों के ब्लड सैंपल टेस्ट के लिए लैब में भेजे गए हैं," उसने कहा।

खराब स्क्रीनिंग के कारण कई हो सकते हैं, विशेषज्ञों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने कहा। हो सकता है कि स्क्रीनिंग के काम में लगे लोगों को पर्याप्त ट्रेनिंग नहीं दी गई हो और उन्हें यह नहीं पता हो कि इसके नतीजे राज्य में महामारी को रोकने के लिए कितने महत्वपूर्ण होंगे। इंडियास्पेंड की जांच में यह भी पता चला कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, जिनमें से कई को पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के बिना स्क्रीनिंग के लिए भेजा गया, को ख़ुद के संक्रमित होने का डर हो और उन्होंने शॉर्ट-कट अपनाया हो।

"डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग महत्वपूर्ण है और अगर कोई भी घर इससे छूट जाता है तो वह इसके कम्युनिटी ट्रांसमिशन का कारण हो सकता है," इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (बिहार चैप्टर) के सीनियर वाइस प्रेसीडेंट अजय कुमार ने कहा।

 

बिहार में हाल के सप्ताहों में इन मामलों में भारी उछाल देखा गया है। राज्य में कोविड-19 के मामलों की संख्या 2 मई तक 476 थी। मुंगेर ज़िले में 95 मामले दर्ज किए गए थे, इसके बाद रोहतास और बक्सर में 52-52 मामले दर्ज किए गए, जबकि राज्य की राजधानी पटना में 44 मामले थे। मोटे तौर पर 76.68% (365) मामले पिछले आठ दिन में सामने आए, राज्य के स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार। 

हमारी टीम ने राज्य के प्रमुख सचिव (स्वास्थ्य) संजय कुमार दो बार बात करने की कोशिश की। उनकी प्रतिक्रिया मिलने के बाद हम इस रिपोर्ट को अपडेट करेंगे।

'लक्षणों के बारे में नहीं पूछा'

स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग का काम दिया गया, उन्हें दिए गए क्षेत्र में हर घर का दौरा करने और कोविड-19 लक्षणों से संबंधित सवाल पूछने थे। मसलन, खांसी, बुख़ार या सांस लेने में तक़लीफ़ तो नहीं है साथ ही उनसे हर तरह की यात्रा की जानकारी लेनी थी। यह काम नाम, उम्र और लिंग के बारे में बुनियादी जानकारी पूछने के अलावा है।

किसी भी घर से मिली यात्रा के इतिहास की जानकारी को एक सफ़ेद चाक के साथ चिह्नित किया जाता है और इसका विवरण एक रजिस्टर में दर्ज कर उसे सदर (ज़िला) अस्पताल में जमा कराना होता है। डॉक्टर इसका अध्ययन करते हैं और फिर ब्लॉक प्रभारी को उन संवेदनशील व्यक्तियों के बारे में सूचित करते हैं जिन्हें अपना सैंपल देने के लिए अस्पताल जाने की ज़रूरत होती है। 

हालांकि, हमें कई शिकायतें मिलीं कि स्वास्थ्य कर्मियों ने "उचित" सवाल नहीं पूछे। "उन्होंने मेरे परिवार के सदस्यों के नाम और उम्र लिखी और पूछा कि क्या मेरे परिवार में कोई भी राज्य या देश के बाहर से आया है," अररिया ज़िले के फोर्ब्सगंज ब्लॉक की साहिबगंज पंचायत के एक छोटे किसान ब्रह्मदेव राम ने कहा। "उन्होंने यह नहीं पूछा कि क्या मेरे परिवार के सदस्यों को खांसी, बुख़ार या अन्य लक्षण हैं।" 

रोहतास ज़िले में भी, लोगों की शिकायत थी कि उनसे की गई पूछताछ अधूरी थी। 21 अप्रैल को पहले मामले का पता चलने के बाद पिछले दो हफ़्ते में रोहतास ज़िले में कोरोनोवायरस मामलों में तेज़ी देखी है। अब यह ज़िला कोविड​​-19 के 91 पॉज़िटिव मामलों के साथ रेड ज़ोन में आता है।

"सेविका [आंगनवाड़ी कार्यकर्ता] घर आई और मेरे परिवार के सदस्यों के नाम और उनकी उम्र के बारे में पूछा," रोहतास ज़िले के वरुण गांव के नारायण गिरि ने बताया। "उन्होंने ना तो कोविड -19 लक्षणों के बारे में पूछा और ना ही यात्रा के बारे में।" स्वास्थ्य कर्मियों ने उनसे पड़ोसियों के बारे में भी पूछा लेकिन वह उनसे मिलने नहीं गई, उन्होंने आरोप लगाया।

स्क्रीनिंग में ख़ामियां क्यों हैं

स्क्रीनिंग कार्यक्रम में शामिल स्वास्थ्य कर्मी आशा, जीविका कार्यकर्ता (राज्य के आजीविका मिशन के लिए काम करने वाले) और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं। उन्हें केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की महामारी का प्रसार स्थानीय स्तर पर रोकने के लिए बने दिशा-निर्देशों के तहत काम करने के लिए कहा गया था।

स्क्रीनिंग ड्यूटी पर जाने वाले स्वास्थ्य कर्मियों को दो मास्क के सेट दिए जाने चाहिए - एक ख़ुद के लिए और दूसरा उन लोगों के लिए जिनके संक्रमित होने का शक है, दिशा-निर्देशों के अनुसार। लेकिन स्वास्थ्य कर्मियों की शिकायत है कि उनमें से सभी को अपने लिए मास्क नहीं मिला और न ही उन लोगों के लिए जिनके अंदर लक्षण थे।

उचित रक्षात्मक उपकरण के बिना, आशा बहुओं को “कोरोनावायरस के संपर्क में आने का डर है”, बिहार के पूर्वी चंपारण ज़िले के केसरिया कस्बे की आशा कार्यकर्ता चुन्नी कुमारी ने कहा। "उनमें से बहुत कम को लक्षण वाले लोगों को बांटने के लिए मास्क दिए गए हैं," उन्होंने कहा। 

लगभग 20% आशा कार्यकर्ताओं को ही उनकी सुरक्षा के लिए मास्क और दस्ताने दिए गए हैं, बिहार आशा वर्कर्स संघ की पदाधिकारी शशि यादव ने बताया। हमें बुख़ार की जांच के लिए इंफ़्रारेड थर्मामीटर गन नहीं दी गई है, चुन्नी कुमारी ने कहा। "इसलिए, हम लोगों से सिर्फ़ यह पूछते हैं कि क्या उन्होंने कोई यात्रा की है या उन्हें सर्दी, खांसी या सांस की तकलीफ़ है," चुन्नी कुमारी ने बताया। 

प्रवासियों की वापसी

राज्य सरकार ने कोरोनावायरस के मामलों में आई तेज़ी के लिए प्रवासी कामगारों को ज़िम्मेदार ठहराया है जो तमिलनाडु, दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों से वापस आए हैं। अब तक, अन्य राज्यों से लौटे 332 प्रवासी मज़दूरों के सैंपल कोरोनावायरस से संक्रमित पाए गए हैं।

मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, 11 मई तक, 115 ट्रेनों से विभिन्न राज्यों में फंसे 137,000 मज़दूरों और श्रमिकों को लाया जा चुका था। राज्य में आने वाले दिनों में 427,000 और प्रवासियों की वापसी हो सकती है। गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश से 115 ट्रेनें बिहार आ चुकी हैं।  

राज्य में सकारात्मक मामलों की संख्या 29 अप्रैल, 2020 तक आठ दिन में ही 113 से बढ़कर 403 हो गई और प्रभावित ज़िलों की संख्या दोगुनी होकर 29 हो गई, डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार। प्रवासियों में से कुछ छिपकर आए थे। 29 अप्रैल को केंद्र ने प्रवासियों को घर लौटने की इजाज़त दे दी। 

 

"हमने हर ब्लॉक में 2,000-बेड की क्षमता वाले क्वारंटाइन सेंटर बनाए हैं," महामारी विशेषज्ञ रागिनी मिश्रा ने बताया। “जो प्रवासी दूसरे राज्यों से लौट रहे हैं, उनकी स्क्रीनिंग की जाएगी और उन्हें 21 दिन के लिए क्वारंटाइन सेंटर में रखा जाएगा।"

बिहार के 27 लाख से भी ज़्यादा प्रवासी कामगार दूसरे राज्यों में फंसे हैं, राज्य के उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के एक बयान के अनुसार। उनमें से अकेले, दिल्ली से 500,000, महाराष्ट्र से 268,000, कर्नाटक से 100,000, गुजरात से 200,000 और अन्य राज्यों से हजारों ने वापसी का आवेदन किया है,” उन्होंने बताया। 2 मई को, 1,174 यात्रियों के साथ पहली ट्रेन दानापुर स्टेशन पर आई।

"जब वह अपनी यात्रा का विवरण देते हैं तो एक मेडिकल टीम उनसे मिलने जाती है," मुज़फ़्फ़रपुर के सिविल सर्जन शैलेश प्रसाद सिंह ने बताया। “डॉक्टर उनकी जांच करते हैं और जिन लोगों में लक्षण होते हैं उनके ब्लड सैंपल लेकर टेस्टिंग के लिए भेजे जाते हैं," उन्होंने बताया। “अगर किसी व्यक्ति में लक्षण नहीं दिखाई देते हैं तो  उसे 21 दिन के लिए क्वारंटाइन सेंटर में रहना होता है। 21 दिन के बाद उनकी फिर से जांच की जाती है और फिर उन्हें घर भेज दिया जाता है।”

एक प्रतिशत से भी कम परीक्षण

देश में कोरोनावायरस का पहला मामला सामने आने के पांच सप्ताह बाद बिहार में कोविड -19 की पहली लैब 7 मार्च को शुरु हुई। इस समय राज्य में छह लैब काम कर रही हैं - पटना में चार और मुज़फ़्फ़रपुर और दरभंगा में एक-एक। केंद्र सरकार के राजेंद्र मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ में सबसे अधिक (19 मई तक) 25,659 सैंपल टेस्ट किए गए।

सभी छह लैब्स में 19 मई तक 50,443 सैंपल टेस्ट किए गए, जो कि बिहार की कुल जनसंख्या का सिर्फ़ 0.048% है (2011 की जनगणना के अनुसार बिहार की जनसंख्या 10.4 करोड़ है)।

बिहार में कोविड ​​-19 का पहला मामला 22 मार्च को सामने आया था, जब राज्य में दो पॉज़िटिव मामले मिले थे, जिनमें से एक 38 वर्षीय व्यक्ति ने पटना के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में बीमारी के कारण दम तोड़ दिया। पूरे देश में लॉकडाउन से तीन दिन पहले, 22 मार्च तक बिहार में केवल एक लैब और सैंपल कलेक्शन सेटंर थे। 

अब यहां कोविड-19 मामलों के लिए तीन अस्पताल हैं, पटना में नालंदा मेडिकल कॉलेज और अस्पताल, गया में मगध मेडिकल कॉलेज और भागलपुर में जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में 2,344 आइसोलेशन बेड हैं। वर्तमान में, 75 COVID-19 रोगियों को तीन अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जबकि 290 मरीज़ों का इलाज ज़िला-स्तरीय आइसोलेशन सेंटर्स में किया जा रहा है।

(उमेश, पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं और 101Reporters.com के सदस्य हैं।)

यह रिपोर्ट 16 मई को IndiaSpend पर प्रकाशित हुई जिसका 19 मई को अपडेट के साथ अनुवाद किया गया। 

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