बिहार में प्लाज़्मा थेरेपी के नतीजे उत्साहवर्द्धक नहीं, प्लाज़्मा डोनेशन से कतरा रहे हैं लोग

ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ के ब्लड बैंक के बाहर प्लाज़्मा डोनर। फ़ोटोः पुष्यमित्र

पटना: बिहार की राजधानी पटना के रहने वाले दीपक कुमार (32 साल) राज्य के पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने कोरोनावायरस से ठीक होने के बाद अपना प्लाज़्मा डोनेट करने का फ़ैसला लिया। जब बिहार में प्लाज़्मा थेरेपी से कोरोनावायरस के मरीज़ों का इलाज करने की इजाज़त मिली तो दीपक सबसे पहले सामने आए। दीपक दो बार अपना प्लाज़्मा डोनेट कर चुके हैं। जिन दो मरीज़ों को दीपक ने प्लाज़्मा डोनेट किया था, वो पूरी तरह स्वस्थ हो चुके हैं। लेकिन दीपक ने जब उनसे अपने एक रिश्तेदार के लिए प्लाज़्मा डोनेट करने के लिए संपर्क किया तो उन्होंने कोई रेस्पांस नहीं दिया।

“मेरे पास रोज़ाना कम से कम सात-आठ मरीज़ों के परिजनों के फ़ोन आते हैं। मगर मेरी मजबूरी है कि मैं अधिकतम दो बार प्लाज़्मा डोनेट कर चुका हूं। जिन मरीज़ों को प्लाज़्मा की जरूरत होती है उनके परिजन डोनेशन के लिए फोन करते रहते हैं। वे इतनी बुरी तरह गिड़गिड़ाते हैं, कि दया आ जाती है। इसके बावजूद लोग प्लाज़्मा नहीं दे रहे हैं,” दीपक ने बताया।

 

कोरोनावायरस के मरीज़ों के इलाज में प्लाज़्मा प्रभावी होने के बहुत कम प्रमाण मिले हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भी हाल ही में दुनिया के देशों को प्लाज़्मा थेरेपी के बारे में आगाह कर चुका है। हाल ही में एम्स. नई दिल्ली में हुए एक ट्रायल में भी कोरोनावायरस के मरीज़ों के इलाज में इस थेरेपी के कारगर होने के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले हैं। लेकिन इसके बावजूद देश के लगभग सभी राज्यों में कोरोनावायरस के मरीज़ों के इलाज के लिए प्लाज़्मा थेरेपी का इस्तेमाल किया जा रहा है। केवल तेलंगाना ही एक ऐसा राज्य है जिसने प्लाज़्मा थेरेपी के इस्तेमाल को सीमित कर दिया है। 

बिहार में भी प्लाज़्मा थेरेपी से ठीक होने वाले मरीज़ों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। राज्य में 12 अगस्त तक 58 मरीज़ों को प्लाज़्मा थेरेपी दी गई, जिसमें से 34 मरीज़ों (लगभग 58%) की ही जान बचाई जा सकी। 

इसके बावजूद बिहार सरकार ने प्लाज़्मा डोनेट करने वालों को पांच हज़ार रुपए का इनाम देने का ऐलान किया है। फिर भी राज्य में ठीक हो चुके मरीज़ डोनेशन के लिए सामने नहीं आ रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि लोग दोबारा अस्पताल नहीं जाना चाहते हैं। ऐसे लोग भी प्लाज़्मा डोनेट करने में आनाकानी कर रहे हैं जो ख़ुद किसी और से प्लाज़्मा डोनेशन ले चुके हैं। प्लाज़्मा थेरेपी के रिज़ल्ट जानने के बावजूद भी कोरोनावायरस मरीज़ों के परिजन प्लाज़्मा डोनर की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं। 

क्या है प्लाज़्मा थेरेपी

प्लाज़्मा थेरेपी में किसी संक्रमित व्यक्ति का इलाज करने के लिए एक ऐसे व्यक्ति के शरीर में से एंटीबॉडीज़ निकाली जाती हैं जो उस संक्रमण से ठीक हो चुका हो। ठीक हो चुके व्यक्ति के शरीर में वायरस को मारने वाली एंटीबॉडीज़ विकसित हो जाती हैं। 

ठीक हो चुके व्यक्ति के शरीर से ये एंटीबॉडीज़ निकालकर संक्रमित मरीज़ के शरीर में डाल दी जाती हैं। प्लाज़्मा थेरेपी के पक्ष में दलील देने वालों के अनुसार, इस प्रक्रिया से मरीज़ के अंदर रोग प्रतिरोधक क्षमता को तेज़ी से मज़बूत करने में मदद मिलती है और उसकी रिकवरी में तेज़ी आ जाती है। यह थेरेपी भारत समेत दुनिया के कई देशों में कोरोनावायरस से संक्रमित लोगों के इलाज में अपनाई जा रही है। इबोला वायरस के दौरान भी इस थेरेपी का इस्तेमाल किया गया था।

कितना सफ़ल है प्लाज़्मा थेरेपी से इलाज

अलग-अलग देशों में प्लाज़्मा थेरेपी से कोरोनावायरस के इलाज को लेकर बढ़ते हुए उत्साह के मद्देनज़र विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 24 अगस्त को दुनिया के देशों इस बारे में आगाह किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि प्लाज़्मा थेरेपी को अभी एक प्रयोग के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। अभी तक जो परिणाम मिले हैं उससे इस थेरेपी के बारे में किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता है। इस थेरेपी को लेकर अभी तक बहुत छोटे स्तर पर अध्ययन हुए हैं जिनमें बहुत निचले स्तर के साक्ष्य मिले हैं, डब्ल्यूएचओ की मुख्य वैज्ञानिक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में एक सवाल के जवाब में कहा। डब्ल्यूएचओ का यह भी कहना है कि इस थेरेपी के कई दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं, जिसमें मामूली बुख़ार और सर्दी से लेकर फेफड़ों तक की बीमारी हो सकती है इसलिए इस थेरेपी के इस्तेमाल को लेकर सचेत रहने की ज़रूरत है।

“यह (प्लाज़्मा) थेरेपी भी अभी ‘ट्रायल एंड एरर’ की प्रक्रिया से गुज़र रही है, इसलिए दावे के साथ इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। वैसे भी प्लाज़्मा थेरेपी मॉडरेट मरीज़ों के लिए ही मददगार मानी जाती है। गंभीर मरीज़ों पर यह संभवतः उतनी कारगर नहीं है,” बिहार के जनस्वास्थ्य अभियान से जुड़े डॉ. शकील ने कहा।

बिहार में प्लाज़्मा थेरेपी के इस्तेमाल और इसके कारगर होने के बहुत कम प्रमाण होने के बावजूद बिहार सरकार द्वारा इसको प्रोत्साहित किए जाने के बारे में हमने बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति के एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर मनोज कुमार को 20 अगस्त को एक ईमेल भेजा। उनका जवाब मिलने के बाद हम इस रिपोर्ट को अपडेट करेंगें। 

इसी बीच एम्स, नई दिल्ली में कोरोनावायरस के संक्रमितों के इलाज में प्लाज़्मा थेरेपी का असर जानने के लिए एक ट्रायल किया गया। जिसमें संक्रमितों को दो ग्रुपों में बांटा गया। पहले ग्रुप को प्लाज़्मा थेरेपी के साथ कोरोनावायरस का इलाज दिया गया जबकि दूसरे ग्रुप को केवल स्टैंडर्ड इलाज दिया गया। इलाज के दौरान दोनों ही ग्रुपों में मरने वाले मरीज़ों की संख्या सामान्य थी, एम्स, नई दिल्ली के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया के हवाले से नवभारत टाइम्स में 10 अगस्त को छपी इस रिपोर्ट के मुताबिक़। इसी रिपोर्ट में डॉ. रणदीप कहते हैं कि इस दिशा में पुख़्ता प्रमाण के लिए बड़े मूल्यांकन की ज़रूरत है। 

“प्लाज़्मा थेरेपी कितनी सफ़ल है, इसको लेकर आइसीएमआर का रिसर्च चल रहा है, हमने भी उस रिसर्च में अपने आंकड़े दिए हैं, जब तक उस रिसर्च का रिज़ल्ट नहीं आ जाता, हम लोगों का कुछ भी कहना उचित नहीं है,” एम्स, पटना के ब्लड बैंक की हेड, डॉ नेहा सिंह ने कहा। 

“मैंने अब तक 80 मरीज़ों के लिए प्लाज़्मा डोनेशन का अभियान चलाया, मगर मैं सिर्फ़ 18 लोगों के लिए ही प्लाज़्मा का इंतज़ाम कर पाया, उनमें से भी सिर्फ़ 4 या 5 मरीज़ों को ही बचाया जा सका,” बिहार में प्लाज़्मा डोनेशन के लिए अभियान चलाने वाले मुकेश हिसारिया ने बताया।

बिहार में प्लाज़्मा थेरेपी की सफलता के बारे में अभी कोई ताज़ा जानकारी तो नहीं मिली, मगर एम्स, पटना के ब्लड बैंक की प्रभारी नेहा सिंह ने 60 से 70% मामलों में इसके सफ़ल होने का दावा किया है। उधर, पारस अस्पताल के ब्लड बैंक के प्रभारी डॉ. शांतनु ने तो इसके 90% मामलों में सफ़ल होने का दावा किया है।

इंडियास्पेंड ने जब नेहा सिंह से पूछा कि जिन मरीज़ों को प्लाज़्मा थेरेपी दी जा रही है, उन्हें इसके साथ क्या किसी और तरह का इलाज भी दिया जा रहा है? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।

“हम आइसीएमआर के प्रोटोकॉल के हिसाब से ही सिर्फ उन्हीं मरीज़ों को प्लाज़्मा थेरेपी देते हैं, जिनका ऑक्सीजन सेचुरेशन लेवल 93% होता है, रेस्पेरेटरी लेवल 25 से अधिक होता है और मरीज़ की उम्र 18 से 65 साल के बीच होती है,” डॉ नेहा ने इस थेरेपी के इस्तेमाल के बारे में बताते हुए कहा।

बिहार में 12 अगस्त तक जिन मरीज़ों को प्लाज़्मा थेरेपी दी गई है उनसे कोई बहुत उत्साहवर्द्धक नतीजे नहीं मिले। एम्स में 58 मरीज़ों को प्लाज़्मा थेरेपी दी गई थी उनमें से 34 मरीज़ों के ही ठीक होने की ख़बर है। 

बिहार में कम हो रहे हैं प्लाज़्मा डोनेशन

बिहार में 31 अगस्त तक 1.36 लाख से ज़्यादा लोग कोरोनावायरस से संक्रमित हो चुके थे, जिसमें से लगभग 1.20 लाख मरीज़ पूरी तरह से ठीक हो चुके हैं, राज्य के स्वास्थ्य विभाग के अपडेट के मुताबिक़।

राज्य में इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस, पटना और महावीर कैंसर संस्थान, पटना में प्लाज़्मा बैंक काम कर रहे हैं। इनके अलावा पांच अस्पतालों- ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ (पटना), पारस अस्पताल (पटना), पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (पटना), नालंदा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (पटना) और जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (भागलपुर)- को प्लाज़्मा थेरेपी से इलाज की इजाज़त मिली है।

इनमें पीएमसीएच और एनएमसीएच को छोड़ कर सभी जगह प्लाज़्मा रिसीव करने की व्यवस्था है, जेएलएनएमसीएच में अभी इसकी ट्रेनिंग चल रही है। महावीर कैंसर अस्पताल को कोई डोनर नहीं मिला है।

31 अगस्त तक एम्स, पटना में 235, पारस अस्पताल में 15 और आईजीआईएमएस में 13 प्लाज़्मा डोनेट हुए हैं।

राज्य में 31 अगस्त तक कुल 263 बार ही प्लाज़्मा डोनेट किए गए थे (एक डोनर अधिकतम दो बार ही प्लाज़्मा डोनेट कर सकता है), जबकि इस दिन तक बिहार में कोरोनावायरस के लगभग 1.20 लाख मरीज़ ठीक हो चुके थे। 

“अस्पताल प्रशासन और मरीज़ों के परिजन बहुत मुश्किल से प्लाज़्मा डोनेशन के लिए लोगों को तैयार कर पाते हैं,” डॉ नेहा सिंह ने कहा।

डॉ शकील ने ख़ुद भी अपने एक परिचित की प्लाज़्मा थेरेपी एम्स में कराई है। “डोनर तलाशना काफ़ी मुश्किल काम होता है। लोग पहले से ही काफी डरे होते हैं, वे एम्स जाने के नाम से भी डरते हैं,” डॉ. शकील ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा। 

 

बिहार में प्लाज़्मा डोनेशन में दूसरी बड़ी समस्या है कि राज्य में कोरोनावायरस से ठीक हुए ज़्यादातर मरीज़ों के पास ठीक होने के बाद कराए गए आरटी-पीसीआर टेस्ट की निगेटिव रिपोर्ट नहीं है।

 

“जिन लोगों की कोरोनावायरस से ठीक होने के बाद आरटी-पीसीआर रिपोर्ट नहीं होती है, हम आइसीएमआर के प्रोटोकॉल के हिसाब से उनके प्लाज़्मा का इस्तेमाल नहीं कर सकते। प्रोटोकॉल के हिसाब से सिर्फ़ उन्हीं से प्लाज़्मा लिया जा सकता है, जिनका स्वस्थ और कोरोना मुक्त होने के बाद आरटी-पीसीआर टेस्ट हुआ हो और उसकी रिपोर्ट उनके पास उपलब्ध हो,” डॉ. नेहा सिंह ने बताया।

लेकिन बिहार में जन स्वास्थ्य अभियान से जुड़े वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. शकील की राय डॉ. नेहा से अलग थी। 

“आरटी-पीसीआर की रिपोर्ट नहीं होने पर एंटी बॉडी-एंटीजन टेस्ट करा कर भी प्लाज़्मा डोनेट किया जा सकता है। आइसीएमआर की नई गाइडलाइंस ही यही हैं कि अगर मरीज़ कोरोना संक्रमित होने के 28 दिन बाद तक सामान्य है तो उसे संक्रमण मुक्त मान लिया जाए। बिहार के पास आरटी-पीसीआर किट की कमी है, इसलिए हर ठीक हो रहे मरीज़ का आरटी-पीसीआर टेस्ट कराना भी मुमकिन नहीं है। हां, जिन्हें कोरोना मुक्त होने के सर्टिफ़िकेट की ज़रूरत होती है, वे प्राइवेट से टेस्ट कराते हैं,” डॉ. शकील ने कहा। 

बिहार में शुरुआती दिनों में, जब मरीज़ काफी कम थे, केंद्र की गाइडलाइंस के हिसाब से ठीक होने वाले मरीज़ों का दो बार आरटी-पीसीआर टेस्ट किया जाता था। तब सिर्फ आरटी-पीसीआर टेस्ट ही होते थे और स्वस्थ होने वाले व्यक्ति को अस्पताल से छुट्टी मिलने पर टेस्ट की निगेटिव रिपोर्ट, बतौर प्रमाण-पत्र मिलती थी।

केंद्र ने 8 मई को जारी नई डिस्चार्ज पॉलिसी में अस्पताल से छुट्टी के समय होने वाले टेस्ट को हटा दिया हालांकि बिहार ने तब भी कोरोना के मामलों पर लगाम लगाए रखने के लिए 14 मई को जारी अपनी नई डिस्चार्ज पॉलिसी में एक निगेटिव टेस्ट को जारी रखा।

मगर उसके कुछ दिन बाद ही 10 जून को राज्य ने डिस्चार्ज पॉलिसी में बदलाव किया जिसमें हल्के लक्षण वाले मरीज़ों को दस दिन के होम आइसोलेशन के दौरान लगातार तीन दिन तक बुख़ार न होने पर बिना निगेटिव टेस्ट के ही स्वस्थ घोषित कर दिया जाने लगा।

 

बिहार में कोरोनावायरस के लक्षण वाले मरीज़ों का भी आरटी-पीसीआर टेस्ट नहीं हो पा रहा है। राज्य में हर रोज़ होने वाले लगभग एक लाख टेस्ट में 90% से अधिक रैपिड एंटीजन टेस्ट हो रहे हैं। पॉज़िटिव मामलों में तो एंटीजन टेस्ट 99.3% से लेकर 100% तक सटीक है लेकिन निगेटिव मामलों में यह टेस्ट 50.6% से लेकर 84% तक ही सटीक है, इंडियास्पेंड की पांच अगस्त 2020 की इस रिपोर्ट के अनुसार।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी 11 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई वीडियो कांफ़्रेंसिंग में बताया था कि राज्य में हर रोज़ सिर्फ 6100 आरटी-पीसीआर टेस्ट हो पा रहे हैं। उन्होंने इसके लिए केंद्र से दो कोवास-8800 मशीन की मांग की थी। 

(पुष्यमित्र, पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं और 101Reporters.com के सदस्य हैं।)

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पटना: बिहार की राजधानी पटना के रहने वाले दीपक कुमार (32 साल) राज्य के पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने कोरोनावायरस से ठीक होने के बाद अपना प्लाज़्मा डोनेट करने का फ़ैसला लिया। जब बिहार में प्लाज़्मा थेरेपी से कोरोनावायरस के मरीज़ों का इलाज करने की इजाज़त मिली तो दीपक सबसे पहले सामने आए। दीपक दो बार अपना प्लाज़्मा डोनेट कर चुके हैं। जिन दो मरीज़ों को दीपक ने प्लाज़्मा डोनेट किया था, वो पूरी तरह स्वस्थ हो चुके हैं। लेकिन दीपक ने जब उनसे अपने एक रिश्तेदार के लिए प्लाज़्मा डोनेट करने के लिए संपर्क किया तो उन्होंने कोई रेस्पांस नहीं दिया।

“मेरे पास रोज़ाना कम से कम सात-आठ मरीज़ों के परिजनों के फ़ोन आते हैं। मगर मेरी मजबूरी है कि मैं अधिकतम दो बार प्लाज़्मा डोनेट कर चुका हूं। जिन मरीज़ों को प्लाज़्मा की जरूरत होती है उनके परिजन डोनेशन के लिए फोन करते रहते हैं। वे इतनी बुरी तरह गिड़गिड़ाते हैं, कि दया आ जाती है। इसके बावजूद लोग प्लाज़्मा नहीं दे रहे हैं,” दीपक ने बताया।

 

कोरोनावायरस के मरीज़ों के इलाज में प्लाज़्मा प्रभावी होने के बहुत कम प्रमाण मिले हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भी हाल ही में दुनिया के देशों को प्लाज़्मा थेरेपी के बारे में आगाह कर चुका है। हाल ही में एम्स. नई दिल्ली में हुए एक ट्रायल में भी कोरोनावायरस के मरीज़ों के इलाज में इस थेरेपी के कारगर होने के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले हैं। लेकिन इसके बावजूद देश के लगभग सभी राज्यों में कोरोनावायरस के मरीज़ों के इलाज के लिए प्लाज़्मा थेरेपी का इस्तेमाल किया जा रहा है। केवल तेलंगाना ही एक ऐसा राज्य है जिसने प्लाज़्मा थेरेपी के इस्तेमाल को सीमित कर दिया है। 

बिहार में भी प्लाज़्मा थेरेपी से ठीक होने वाले मरीज़ों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। राज्य में 12 अगस्त तक 58 मरीज़ों को प्लाज़्मा थेरेपी दी गई, जिसमें से 34 मरीज़ों (लगभग 58%) की ही जान बचाई जा सकी। 

इसके बावजूद बिहार सरकार ने प्लाज़्मा डोनेट करने वालों को पांच हज़ार रुपए का इनाम देने का ऐलान किया है। फिर भी राज्य में ठीक हो चुके मरीज़ डोनेशन के लिए सामने नहीं आ रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि लोग दोबारा अस्पताल नहीं जाना चाहते हैं। ऐसे लोग भी प्लाज़्मा डोनेट करने में आनाकानी कर रहे हैं जो ख़ुद किसी और से प्लाज़्मा डोनेशन ले चुके हैं। प्लाज़्मा थेरेपी के रिज़ल्ट जानने के बावजूद भी कोरोनावायरस मरीज़ों के परिजन प्लाज़्मा डोनर की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं। 

क्या है प्लाज़्मा थेरेपी

प्लाज़्मा थेरेपी में किसी संक्रमित व्यक्ति का इलाज करने के लिए एक ऐसे व्यक्ति के शरीर में से एंटीबॉडीज़ निकाली जाती हैं जो उस संक्रमण से ठीक हो चुका हो। ठीक हो चुके व्यक्ति के शरीर में वायरस को मारने वाली एंटीबॉडीज़ विकसित हो जाती हैं। 

ठीक हो चुके व्यक्ति के शरीर से ये एंटीबॉडीज़ निकालकर संक्रमित मरीज़ के शरीर में डाल दी जाती हैं। प्लाज़्मा थेरेपी के पक्ष में दलील देने वालों के अनुसार, इस प्रक्रिया से मरीज़ के अंदर रोग प्रतिरोधक क्षमता को तेज़ी से मज़बूत करने में मदद मिलती है और उसकी रिकवरी में तेज़ी आ जाती है। यह थेरेपी भारत समेत दुनिया के कई देशों में कोरोनावायरस से संक्रमित लोगों के इलाज में अपनाई जा रही है। इबोला वायरस के दौरान भी इस थेरेपी का इस्तेमाल किया गया था।

कितना सफ़ल है प्लाज़्मा थेरेपी से इलाज

अलग-अलग देशों में प्लाज़्मा थेरेपी से कोरोनावायरस के इलाज को लेकर बढ़ते हुए उत्साह के मद्देनज़र विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 24 अगस्त को दुनिया के देशों इस बारे में आगाह किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि प्लाज़्मा थेरेपी को अभी एक प्रयोग के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। अभी तक जो परिणाम मिले हैं उससे इस थेरेपी के बारे में किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता है। इस थेरेपी को लेकर अभी तक बहुत छोटे स्तर पर अध्ययन हुए हैं जिनमें बहुत निचले स्तर के साक्ष्य मिले हैं, डब्ल्यूएचओ की मुख्य वैज्ञानिक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में एक सवाल के जवाब में कहा। डब्ल्यूएचओ का यह भी कहना है कि इस थेरेपी के कई दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं, जिसमें मामूली बुख़ार और सर्दी से लेकर फेफड़ों तक की बीमारी हो सकती है इसलिए इस थेरेपी के इस्तेमाल को लेकर सचेत रहने की ज़रूरत है।

“यह (प्लाज़्मा) थेरेपी भी अभी ‘ट्रायल एंड एरर’ की प्रक्रिया से गुज़र रही है, इसलिए दावे के साथ इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। वैसे भी प्लाज़्मा थेरेपी मॉडरेट मरीज़ों के लिए ही मददगार मानी जाती है। गंभीर मरीज़ों पर यह संभवतः उतनी कारगर नहीं है,” बिहार के जनस्वास्थ्य अभियान से जुड़े डॉ. शकील ने कहा।

बिहार में प्लाज़्मा थेरेपी के इस्तेमाल और इसके कारगर होने के बहुत कम प्रमाण होने के बावजूद बिहार सरकार द्वारा इसको प्रोत्साहित किए जाने के बारे में हमने बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति के एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर मनोज कुमार को 20 अगस्त को एक ईमेल भेजा। उनका जवाब मिलने के बाद हम इस रिपोर्ट को अपडेट करेंगें। 

इसी बीच एम्स, नई दिल्ली में कोरोनावायरस के संक्रमितों के इलाज में प्लाज़्मा थेरेपी का असर जानने के लिए एक ट्रायल किया गया। जिसमें संक्रमितों को दो ग्रुपों में बांटा गया। पहले ग्रुप को प्लाज़्मा थेरेपी के साथ कोरोनावायरस का इलाज दिया गया जबकि दूसरे ग्रुप को केवल स्टैंडर्ड इलाज दिया गया। इलाज के दौरान दोनों ही ग्रुपों में मरने वाले मरीज़ों की संख्या सामान्य थी, एम्स, नई दिल्ली के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया के हवाले से नवभारत टाइम्स में 10 अगस्त को छपी इस रिपोर्ट के मुताबिक़। इसी रिपोर्ट में डॉ. रणदीप कहते हैं कि इस दिशा में पुख़्ता प्रमाण के लिए बड़े मूल्यांकन की ज़रूरत है। 

“प्लाज़्मा थेरेपी कितनी सफ़ल है, इसको लेकर आइसीएमआर का रिसर्च चल रहा है, हमने भी उस रिसर्च में अपने आंकड़े दिए हैं, जब तक उस रिसर्च का रिज़ल्ट नहीं आ जाता, हम लोगों का कुछ भी कहना उचित नहीं है,” एम्स, पटना के ब्लड बैंक की हेड, डॉ नेहा सिंह ने कहा। 

“मैंने अब तक 80 मरीज़ों के लिए प्लाज़्मा डोनेशन का अभियान चलाया, मगर मैं सिर्फ़ 18 लोगों के लिए ही प्लाज़्मा का इंतज़ाम कर पाया, उनमें से भी सिर्फ़ 4 या 5 मरीज़ों को ही बचाया जा सका,” बिहार में प्लाज़्मा डोनेशन के लिए अभियान चलाने वाले मुकेश हिसारिया ने बताया।

बिहार में प्लाज़्मा थेरेपी की सफलता के बारे में अभी कोई ताज़ा जानकारी तो नहीं मिली, मगर एम्स, पटना के ब्लड बैंक की प्रभारी नेहा सिंह ने 60 से 70% मामलों में इसके सफ़ल होने का दावा किया है। उधर, पारस अस्पताल के ब्लड बैंक के प्रभारी डॉ. शांतनु ने तो इसके 90% मामलों में सफ़ल होने का दावा किया है।

इंडियास्पेंड ने जब नेहा सिंह से पूछा कि जिन मरीज़ों को प्लाज़्मा थेरेपी दी जा रही है, उन्हें इसके साथ क्या किसी और तरह का इलाज भी दिया जा रहा है? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।

“हम आइसीएमआर के प्रोटोकॉल के हिसाब से ही सिर्फ उन्हीं मरीज़ों को प्लाज़्मा थेरेपी देते हैं, जिनका ऑक्सीजन सेचुरेशन लेवल 93% होता है, रेस्पेरेटरी लेवल 25 से अधिक होता है और मरीज़ की उम्र 18 से 65 साल के बीच होती है,” डॉ नेहा ने इस थेरेपी के इस्तेमाल के बारे में बताते हुए कहा।

बिहार में 12 अगस्त तक जिन मरीज़ों को प्लाज़्मा थेरेपी दी गई है उनसे कोई बहुत उत्साहवर्द्धक नतीजे नहीं मिले। एम्स में 58 मरीज़ों को प्लाज़्मा थेरेपी दी गई थी उनमें से 34 मरीज़ों के ही ठीक होने की ख़बर है। 

बिहार में कम हो रहे हैं प्लाज़्मा डोनेशन

बिहार में 31 अगस्त तक 1.36 लाख से ज़्यादा लोग कोरोनावायरस से संक्रमित हो चुके थे, जिसमें से लगभग 1.20 लाख मरीज़ पूरी तरह से ठीक हो चुके हैं, राज्य के स्वास्थ्य विभाग के अपडेट के मुताबिक़।

राज्य में इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस, पटना और महावीर कैंसर संस्थान, पटना में प्लाज़्मा बैंक काम कर रहे हैं। इनके अलावा पांच अस्पतालों- ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ (पटना), पारस अस्पताल (पटना), पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (पटना), नालंदा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (पटना) और जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (भागलपुर)- को प्लाज़्मा थेरेपी से इलाज की इजाज़त मिली है।

इनमें पीएमसीएच और एनएमसीएच को छोड़ कर सभी जगह प्लाज़्मा रिसीव करने की व्यवस्था है, जेएलएनएमसीएच में अभी इसकी ट्रेनिंग चल रही है। महावीर कैंसर अस्पताल को कोई डोनर नहीं मिला है।

31 अगस्त तक एम्स, पटना में 235, पारस अस्पताल में 15 और आईजीआईएमएस में 13 प्लाज़्मा डोनेट हुए हैं।

राज्य में 31 अगस्त तक कुल 263 बार ही प्लाज़्मा डोनेट किए गए थे (एक डोनर अधिकतम दो बार ही प्लाज़्मा डोनेट कर सकता है), जबकि इस दिन तक बिहार में कोरोनावायरस के लगभग 1.20 लाख मरीज़ ठीक हो चुके थे। 

“अस्पताल प्रशासन और मरीज़ों के परिजन बहुत मुश्किल से प्लाज़्मा डोनेशन के लिए लोगों को तैयार कर पाते हैं,” डॉ नेहा सिंह ने कहा।

डॉ शकील ने ख़ुद भी अपने एक परिचित की प्लाज़्मा थेरेपी एम्स में कराई है। “डोनर तलाशना काफ़ी मुश्किल काम होता है। लोग पहले से ही काफी डरे होते हैं, वे एम्स जाने के नाम से भी डरते हैं,” डॉ. शकील ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा। 

 

बिहार में प्लाज़्मा डोनेशन में दूसरी बड़ी समस्या है कि राज्य में कोरोनावायरस से ठीक हुए ज़्यादातर मरीज़ों के पास ठीक होने के बाद कराए गए आरटी-पीसीआर टेस्ट की निगेटिव रिपोर्ट नहीं है।

 

“जिन लोगों की कोरोनावायरस से ठीक होने के बाद आरटी-पीसीआर रिपोर्ट नहीं होती है, हम आइसीएमआर के प्रोटोकॉल के हिसाब से उनके प्लाज़्मा का इस्तेमाल नहीं कर सकते। प्रोटोकॉल के हिसाब से सिर्फ़ उन्हीं से प्लाज़्मा लिया जा सकता है, जिनका स्वस्थ और कोरोना मुक्त होने के बाद आरटी-पीसीआर टेस्ट हुआ हो और उसकी रिपोर्ट उनके पास उपलब्ध हो,” डॉ. नेहा सिंह ने बताया।

लेकिन बिहार में जन स्वास्थ्य अभियान से जुड़े वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. शकील की राय डॉ. नेहा से अलग थी। 

“आरटी-पीसीआर की रिपोर्ट नहीं होने पर एंटी बॉडी-एंटीजन टेस्ट करा कर भी प्लाज़्मा डोनेट किया जा सकता है। आइसीएमआर की नई गाइडलाइंस ही यही हैं कि अगर मरीज़ कोरोना संक्रमित होने के 28 दिन बाद तक सामान्य है तो उसे संक्रमण मुक्त मान लिया जाए। बिहार के पास आरटी-पीसीआर किट की कमी है, इसलिए हर ठीक हो रहे मरीज़ का आरटी-पीसीआर टेस्ट कराना भी मुमकिन नहीं है। हां, जिन्हें कोरोना मुक्त होने के सर्टिफ़िकेट की ज़रूरत होती है, वे प्राइवेट से टेस्ट कराते हैं,” डॉ. शकील ने कहा। 

बिहार में शुरुआती दिनों में, जब मरीज़ काफी कम थे, केंद्र की गाइडलाइंस के हिसाब से ठीक होने वाले मरीज़ों का दो बार आरटी-पीसीआर टेस्ट किया जाता था। तब सिर्फ आरटी-पीसीआर टेस्ट ही होते थे और स्वस्थ होने वाले व्यक्ति को अस्पताल से छुट्टी मिलने पर टेस्ट की निगेटिव रिपोर्ट, बतौर प्रमाण-पत्र मिलती थी।

केंद्र ने 8 मई को जारी नई डिस्चार्ज पॉलिसी में अस्पताल से छुट्टी के समय होने वाले टेस्ट को हटा दिया हालांकि बिहार ने तब भी कोरोना के मामलों पर लगाम लगाए रखने के लिए 14 मई को जारी अपनी नई डिस्चार्ज पॉलिसी में एक निगेटिव टेस्ट को जारी रखा।

मगर उसके कुछ दिन बाद ही 10 जून को राज्य ने डिस्चार्ज पॉलिसी में बदलाव किया जिसमें हल्के लक्षण वाले मरीज़ों को दस दिन के होम आइसोलेशन के दौरान लगातार तीन दिन तक बुख़ार न होने पर बिना निगेटिव टेस्ट के ही स्वस्थ घोषित कर दिया जाने लगा।

 

बिहार में कोरोनावायरस के लक्षण वाले मरीज़ों का भी आरटी-पीसीआर टेस्ट नहीं हो पा रहा है। राज्य में हर रोज़ होने वाले लगभग एक लाख टेस्ट में 90% से अधिक रैपिड एंटीजन टेस्ट हो रहे हैं। पॉज़िटिव मामलों में तो एंटीजन टेस्ट 99.3% से लेकर 100% तक सटीक है लेकिन निगेटिव मामलों में यह टेस्ट 50.6% से लेकर 84% तक ही सटीक है, इंडियास्पेंड की पांच अगस्त 2020 की इस रिपोर्ट के अनुसार।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी 11 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई वीडियो कांफ़्रेंसिंग में बताया था कि राज्य में हर रोज़ सिर्फ 6100 आरटी-पीसीआर टेस्ट हो पा रहे हैं। उन्होंने इसके लिए केंद्र से दो कोवास-8800 मशीन की मांग की थी। 

(पुष्यमित्र, पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं और 101Reporters.com के सदस्य हैं।)

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