भारतीय वोटरों के लिए विकास, सुशासन से भी ऊपर रहा राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा

मुंबई: 542 में से 304 सीटों पर बढ़त हासिल करने के बाद ( 2014 में हासिल किए गए 282 से 22 ज्यादा ) भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 2019 का लोकसभा चुनाव जीत लिया है।

भाजपा 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सभी सीटों पर आगे थी: गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, उत्तराखंड, दिल्ली, दमन और दीव, दादरा और नगर हवेली, चंडीगढ़, और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और 24 मई 2019, सुबह 11.45 तक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और ओडिशा में अपना मार्ग मजबूत बनाया।

2014 में, भाजपा ने नौ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सभी सीटें जीती थीं: गुजरात, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, दमन और दीव, दादरा और नगर हवेली, चंडीगढ़, और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह।

लाइन ऑफ कंट्रोल (भारत और पाकिस्तान के बीच वास्तविक सीमा) पर बालाकोट, पाकिस्तान में फरवरी 2019 के सर्जिकल स्ट्राइक के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर भाजपा के जोर ने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की छवि एक सशक्त नेता के रुप में और मजबूत बनाया और साथ ही प्रतीत होता है कि पार्टी की विकास योजनाओं पर वर्णन के नियंत्रण से भाजपा की ऐतिहासिक जीत हुई है, जैसा कि विश्लेषकों ने इंडियास्पेंड को बताया है।

सर्जिकल स्ट्राइक ने भाजपा के अभियान में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रुप में चिन्हित किया और इसे चर्चा का एक मुद्दा बनाया और आर्थिक, सामाजिक और सुशासन के मोर्चे पर दिखाई जा रही पार्टी की कमी पर ध्यान केंद्रित करने के विपक्ष के प्रयासों को पीछे कर दिया, जैसा कि चुनाव पूर्व पोल जैसे कि सीएसडीएस- लोकनीति-द हिंदू-तिरंगा टीवी-दैनिक भास्कर के सर्वे 2019 से स्पष्ट होता है।

जैसा कि मोदी रिपोर्ट कार्ड श्रृंखला में सरकार के प्रमुख कार्यक्रमों के फैक्टरकैचर के मूल्यांकन से पता चलता है, कई महत्वाकांक्षी कार्यक्रम ( अन्य बातों के अलावा, सभी के लिए आवास, वित्तीय समावेशन, गरीब परिवारों को मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन, बेहतर स्वच्छता और ग्रामीण विद्युतीकरण तक पहुंच ) की व्यापक पहुंच हुई, लेकिन कार्यान्वयन में कमियां थीं।

परिणाम

भौगोलिक रूप से, देश के उत्तर-पश्चिम में भाजपा की पकड़ मजबूत होती दिख रही है।

उत्तर प्रदेश में, 2014 में जीती गई 71 की तुलना में भाजपा ने 9 कम सीटें (62) जीती हैं। यह सीटें समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के खेमें में चली गई हैं। फिर भी इसने बहुमत बनाए रखा है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में गवर्नेंस के प्रोफेसर नारायण ए. ने इंडियास्पेंड को बताया, “मुझे नहीं लगता कि सपा-बसपा या कांग्रेस पार्टी ने एक दुर्जेय विकल्प प्रस्तुत किया है। कांग्रेस की एक धर्मनिरपेक्ष सरकार की पुरानी कहानी और जो मोदी वादों पर खरी नहीं उतरेगी, लगता है कि कमजोर थी। यूपी में, महागठबंधन जातिगत गणनाओं पर बहुत अधिक भरोसा कर रहा था, जो मतदाता को समझाने के लिए कम हो गया है। ”

पूर्व में, एक लंबे समय से बीजू जनता दल (बीजद) का गढ़ रहे, ओडिशा में पार्टी ने नए सिरे से सेंध लगाया है। 24 मई 2019, सुबह 11.45 तक भाजपा ने सात सीटों पर जीत हासिल की थी और एक पर आगे चल रही थी; इसने 2014 में एक सीट जीती थी।

24 मई, 2019 को सुबह 11.15 तक 98 सीटों पर जीत हासिल और 14 सीटों पर आगे चलने के साथ बीजद राज्य विधानसभा में सत्ता में वापसी के लिए तैयार है, जिसके लिए मतों की गणना एक साथ की जा रही है। राज्य में 146 सदस्यीय विधानसभा है।

तीन अन्य राज्यों में एक साथ राज्य और आम चुनाव हुए। 55 सदस्यीय अरुणाचल प्रदेश विधानसभा में, भाजपा ने 33 पर जीत दर्ज की और 1 सीट पर बढ़त बना ली है, जबकि कांग्रेस ने 4 पर जीत दर्ज की है।

सिक्किम में, राज्य का सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा, जिसने 2019 के चुनावों से पहले भाजपा के साथ गठबंधन को ठुकरा दिया, उसने 32 में से 17 सीटें जीतीं।

24 मई को दोपहर 12.55 बजे तक,आंध्र प्रदेश में, युवजन श्रमिका रायथू कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी) ने 150 सीटों पर जीत हासिल करके और 1 सीट पर आगे बढ़कर 175 सदस्यीय विधानसभा में प्रवेश किया है।

पश्चिम बंगाल में, भाजपा पहली बार सीटों की महत्वपूर्ण संख्या पर कब्जा किया है - 42 में से 18। राज्य में चुनाव प्रचार में भाजपा और अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस जो राज्य स्तर पर सत्ता में है, के बीच कई हिंसक झड़पें (जैसे यहां और यहां) हुई हैं, । तृणमूल ने 2014 में 34 में से 22 सीटें जीती थी।

नारायण ने कहा, "ऐसा प्रतीत होता है कि, पश्चिम बंगाल में वामपंथी पार्टी [भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)] का वोट भाजपा को गया है। ओडिशा में, एंटी-इंकम्बेंसी हो सकती है - यहां तक ​​कि नवीन पटनायक के मामले में, जो एक मजबूत क्षेत्रीय नेता हैं - मतदाता अभी भी बदलाव चाहते हैं। मोदी के लिए भी अगले चुनावों में यही हो सकता है।"

पिछले चुनाव में, ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके), जिसने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) बनाने के लिए भाजपा के साथ गठबंधन किया था, उसने तमिलनाडु में 37 सीटें जीती थीं। हालांकि, दक्षिण भारतीय क्षेत्रीय दल ने मृतक पार्टी नेता जे. जयललिता की अनुपस्थिति को महसूस किया, जैसा कि शाम 5.45 तक यह केवल एक सीट पर कब्जा कर सकी थी।

राज्य की 38 सीटों में से अधिकांश , प्रतिद्वंद्वी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के पास गई, जिसने 23 सीटें सुरक्षित की है। अप्रैल 2019 में चुनावों से पहले धन की जब्ती के बाद वेल्लोर में चुनाव टाल दिया गया था।

संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में भाजपा की उपस्थिति

जम्मू और कश्मीर (J & K) में, पार्टी ने 2014 में जीती गई तीन सीटों को बरकरार रखा है।

2014 में जम्मू-कश्मीर में, भाजपा ने पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ गठबंधन किया था, जिसने एनडीए को राज्य का दावा करने की अनुमति देने के लिए शेष तीन सीटें जीती थीं। जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस ने इस बार पीडीपी को पछाड़ते हुए जीत हासिल की है।

उग्रवाद प्रभावित छत्तीसगढ़ में भाजपा ने नौ सीटें जीती हैं, जबकि 2014 में 10 सीटें जीती थी। छत्तीसगढ़ के दक्षिण में बस्तर निर्वाचन क्षेत्र, जिसमें बस्तर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर और बीजापुर जैसे माओवाद प्रभावित क्षेत्र शामिल हैं, ने इस बार कांग्रेस को 38382 वोटों के अंतर से वोट दिया है। 2014 में भाजपा ने 124,359 मतों के अंतर से यह सीट जीती थी।

पूर्वोत्तर क्षेत्र के सात बहन राज्यों के लिए जारी रुझान में, भाजपा 15 सीटें जीतने में कामयाब रही है - 2014 में हासिल की गई आठ से सात ज्यादा ऐतिहासिक रूप से, उत्तर पूर्व क्षेत्र, केंद्र सरकार चलाने वाली पार्टी को वोट देने के लिए इच्छुक होती है। इसका मुख्य कारण केंद्रीय अनुदान और धन पर उनकी भारी निर्भरता है। लेकिन इस बार 1999 और 2014 के बीच केंद्र में भाजपा ने अपने पूर्ण कार्यकाल के दौरान जो आनंद उठाया है, उसकी तुलना में 2014 के चुनाव के बाद भाजपा और पीएम मोदी की जीत का समर्थन बहुत अधिक रहा है, जैसा कि मिंट की 17 मार्च 2019 की इस रिपोर्ट से पता चलता है।

माकपा के एक पूर्व गढ़, त्रिपुरा में भाजपा ने 1972 में राज्य बनने के बाद पहली बार दोनों सीटें जीतीं।

2018 में, विधानसभा चुनावों में दो सीटें जीतने वाली भाजपा ने राज्य में स्वदेशी पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा के साथ गठबंधन के माध्यम से सरकार बनाई।

सर्जिकल स्ट्राइक

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के मनोज जोशी ने इंडियास्पेंड को बताया, "भाजपा ने अनिवार्य रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय दिखाया है और इसने चुनाव में उनके लिए काम किया है। यद दिखाने के बाद कि देश खतरे में है, मोदी को देश को सुरक्षित करने में एक निर्णायक, मजबूत नेता दिखाया गया।"

जोशी ने कहा कि भाजपा कुछ इस तरह के "ट्रान्सेंडैंटल मुद्दे" की तलाश में थी, जैसा कि 1990 में राम मंदिर मुद्दा था और उसने इसे सर्जिकल स्ट्राइक में पाया। जोशी ने कहा, जब पुलवामा आतंकी हमला हुआ, तो बालाकोट हमलों के माध्यम से भाजपा की मौकापरस्त प्रतिक्रिया उनका केंद्रीय अभियान बन गई और इसने काम किया, विशेष रूप से हिंदी हृदयभूमि में - जो भी इस स्ट्राइक के बारे में सुन रहा है, उसने मतदाताओं की कल्पना पर कब्जा कर लिया है - सुदूर ग्रामीण इलाकों में भी।“

यह समझना महत्वपूर्ण है कि बालाकोट पाकिस्तान के साथ एक द्विपक्षीय मुद्दा था, जबकि पुलवामा राष्ट्रीय मुद्दा था, जैसा कि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज में अंतर्राष्ट्रीय सामरिक और सुरक्षा अध्ययन के प्रोफेसर सूबा चंद्रा ने इंडियास्पेंड को बताया। उन्होंने कहा, "बालाकोट न केवल भारत में बल्कि पाकिस्तान में भी कहानी को बदलता है। इस तरह की कहानी के साथ समस्या यह है कि अगर [एक और ऐसी] घटना घटित होती, तो सरकार पर सैन्य प्रतिक्रिया देने का दबाव होता है।-- हमें अभी भी नहीं पता है कि यह हमारे रणनीतिक हित में है या नहीं। ”

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के नारायण ने इंडियास्पेंड को बताया, "[द] बालाकोट [सर्जिकल स्ट्राइक] ने भाजपा को वोट को मजबूत करने में मदद की हो सकती है," लेकिन रुझान बताते हैं कि करीबी मुकाबले के आधार पर भाजपा को समर्थन मिल रहा है। हमने गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में देखा है। ”

नारायण ने कहा, "इससे पहले, भाजपा ने अपने आख्यान में मुसलमानों की बात की थी, लेकिन इस बार मुस्लिम, पाकिस्तान, आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा ने मिलकर एक शक्तिशाली चुनावी आख्यान बनाया।" इसलिए भाजपा ने मतदाताओं को कुछ योजनाओं जैसे कि प्रधान मंत्री आवास योजना और उज्ज्वला के आस-पास संघटित किया, भले ही वे अन्य वादों को पूरा नहीं कर सके। यह एक ऐसी भावना प्रदान करता प्रतीत होता है कि भाजपा ने काम किया है।

मुंबई विश्वविद्यालय की नागरिक शास्त्र और राजनीति विभाग की प्रोफेसर और प्रमुख, उत्तरा सहस्रबुद्धे कहती हैं, “दुनिया भर में जो हो रहा है,उसके साथ भारत में भाजपा का उदय लगातार हो रहा है। वह मोदी हो या [अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, ये नेता संरक्षणवादी उपायों की दिशा में अधिक काम कर रहे हैं।”

ये नए नेता, मुक्त व्यापार को राष्ट्रीय संप्रभुता और संप्रभुता की अभिव्यक्ति के रूप में संरक्षणवादी नीतियों में लाने का अधिकार के रूप में चित्रित करके, राष्ट्रवाद का इस्तेमाल संरक्षणवादी व्यापार नीतियों को बढ़ावा देने के लिए कर रहे हैं। वह कहती हैं, "मेक इन इंडिया संरक्षणवाद के बारे में है, तो एक तरह से [भाजपा की मजबूत स्थिति] उस प्रवृत्ति के अनुरूप रही है जिसे बाहर देखा गया है। यूरोप और अमेरिका में, वे प्रवास-विरोधी हैं - भारत का नागरिकता पंजीकरण बिल एक समान प्रवासी-विरोधी नीति है। "

कृषि संकट

2014 में भाजपा ने जिन 282 निर्वाचन क्षेत्रों में जीत दर्ज की, उनमें से इंडियास्पेंड ने 206 की पहचान कृषि संकट के साथ की, इनमें से भाजपा को 25 में हार का सामना करना पड़ा और 181 को बरकरार रखा।

कृषि संकट विपक्षी दलों के अभियानों में प्रमुखता से दिखाई दिया, जिसमें कृषि उत्पादों की गिरती कीमतों, सरकार की असमर्थता जैसे कि खरीद के पर्याप्त मूल्य, पानी की कमी और किसान ऋणग्रस्तता और आत्महत्या जैसे मुद्दों पर प्रकाश डाला गया।

Note: Based on leads and results as of 11:15 am on May 24, 2019

बढ़ते कृषि संकट के बीच, देश भर के लगभग 200 संगठनों के हजारों किसानों ने नवंबर 2018 में दिल्ली तक मार्च किया था ताकि इन मुद्दों को सुलझाने के लिए संसद के विशेष सत्र और कुल कृषि ऋण माफी की मांग की जा सके।

पिछले 12 वर्षों से 2016-17 तक, भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का हिस्सा 5 प्रतिशत अंक से 12.2 फीसदी तक गिरा है। इस संबंध में 3 दिसंबर, 2018 को लाइवमिंट ने रिपोर्ट किया है। फिर भी, अधिकांश उपायों के द्वारा, कृषि और संबंधित गतिविधियां 50 फीसदी से अधिक भारतीयों को आजीविका प्रदान करती हैं।

उत्तर प्रदेश में, जहां भाजपा 62 सीटों पर जीत दर्ज की है, 12 मार्च, 2019 तक राज्य के पश्चिमी हिस्से में बकाया गन्ने का मूल्य 11,845 करोड़ रुपये था, जैसा कि द हिंदू बिज़नेसलाइन ने 20 मार्च, 2019 की रिपोर्ट में बताया है। इसमें से लगभग 52 फीसदी या 6,168 करोड़ रुपये शामली (कैराना निर्वाचन क्षेत्र), सहारनपुर, मुज़फ्फरनगर, गाज़ियाबाद, मेरठ, भागपत और बुलंदशहर में खेती करने वालों के कारण थे। सहारनपुर को छोड़कर इन सभी में भाजपा को जीत हासिल हुई है।

भारत का लगभग 42 फीसदी भू-भाग सूखे का सामना कर रहा है, जिसमें से 6 पीसदी असाधारण रूप से सूखा है - पिछले साल सूखे की चार गुना, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 3 अप्रैल, 2019 की रिपोर्ट में बताया है। दक्षिणी यूपी में बुंदेलखंड के सूखा प्रभावित इलाकों में भाजपा ने सभी सीटों पर जीत दर्ज की है, ये क्षेत्र हमीरपुर, बांदा, झांसी और जालौन के संसदीय क्षेत्रों को कवर करता है - जिनमें से तीन को 2018 में सूखा प्रभावित के रूप में सूचीबद्ध किया गया था, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 29 अप्रैल, 2019 को बताया था।

मध्य प्रदेश में, जहां 29 में से 23 निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान कृषि संकट के रुप में की गई थी, उनमें से सभी 23 पर भाजपा ने जीत दर्ज की है। लगभग पांच महीने पहले, तीन कार्यकाल से सत्ता में रही भाजपा को 2018 के राज्य विधानसभा चुनावों में कांग्रेस से हार मिली थी, जिसका कथित तौर पर कारण किसानों की नाराजगी थी।

मंदसौर में, जहां पुलिस फायरिंग ने जून 2017 में छह किसानों की जान ले ली, भाजपा ने न केवल अपनी पकड़ बनाए रखी है, बल्कि अपने जीत के अंतर को 376,734 वोटों से बढ़ाया है।

महाराष्ट्र में, भाजपा ने 48 में से 23 सीटें जीती हैं, और उसकी सहयोगी शिवसेना, 18. कर्नाटक में, भाजपा ने 28 में से 25 सीटें जीती हैं। 1980 में पार्टी के गठन के बाद से यह दो राज्यों में इसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। महाराष्ट्र ने 2016 में सबसे अधिक किसान / कृषक आत्महत्या (2,550, या सात दिन) की सूचना दी, इसके बाद कर्नाटक (1,212) का स्थान रहा है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 21 मार्च, 2019 की रिपोर्ट में बताया है।

महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त मराठवाड़ा क्षेत्र बीड में, जिसे 2015 में सदी के सबसे खराब सूखे का सामना करना पड़ा, भाजपा ने 168,368 मतों के अंतर से जीत दर्ज करते हुए अपनी सीट बरकरार रखी है।

अर्थशास्त्री जयति घोष ने इंडियास्पेंड को बताया, "मुझे लगता है कि कुछ क्षेत्रों में पीएम-किसान जैसे हैंडआउट का प्रभाव था। यह संभव है कि भाजपा ने यह सब कहानी आख्याान मजबूत करने के लिए किया हो। ”

दुनिया का सबसे बड़ा नौकरी-गारंटी कार्यक्रम, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, का जिक्र करते हुए नारायण ने इंडियास्पेंड को बताया, 'सभी सरकारों के पास योजनाएं थीं, लेकिन उनके पास योजनाओं के इर्दगिर्द जुटाने की भाजपा जैसी प्रक्रिया नहीं थी। उदाहरण के लिए, कांग्रेस ने मनरेगा के इर्द-गिर्द एक कहानी नहीं बुनी।”

सांप्रदायिक हिंसा

2014 और 2019 के बीच गाय से संबंधित घृणा की रिपोर्टिंग के लिए इंडियास्पेंड ने जिन 83 निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान की, भाजपा उनमें से भाजपा ने 63 पर जीत हासिल की है। 2014 में, उसने इनमें से 60 सीटें जीती थीं। ( 24 मई, 2019 को सुबह 11.15 तक लीड और परिणाम पर आधारित )

Note: Based on leads and results as of 11:15 am on May 24, 2019

घोष ने कहा, "परिणाम हमारे भारतीय समाज में एक प्रमुख बदलाव को दर्शाते हैं।" “भाजपा द्वारा अभियान खुले तौर पर सांप्रदायिक, परिवर्तन एजेंडे पर चलाया गया था। उन्होंने एक मजबूत स्थिति का वादा किया, जो हिंदू राष्ट्र की दृष्टि को लागू करेगा।यह चिंताजनक है कि मतदाताओं के एक महत्वपूर्ण हिस्से ने आर्थिक मोर्चे पर विफल होने और संस्थानों के विनाश के बावजूद भाजपा को वोट देने का फैसला किया है। ”

मार्च 2019 के पेपर में थॉमस पिकेट्टी और अमोरी गेथिन के साथ अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने कहा, "मतदाता सांप्रदायिक हितों और सांस्कृतिक प्राथमिकताओं की तुलना में सीधे आर्थिक हितों से कम संचालित होते है।"

बनर्जी ने इंडियास्पेंड को 15 मई, 2019 को एक साक्षात्कार में बताया था, “ अगर मतदाता मानने लगे कि र राज्य आर्थिक लाभ के मामले में कुछ भी उपयोगी नहीं दे सकता है, तो वे सांप्रदायिक दावों के प्रति उत्तरदायी होंगे। यदि लोग केवल सांप्रदायिक मुद्दों के बारे में परवाह करना शुरू करते हैं, तो पार्टियों को इसे बढ़ावा देने के लिए एक प्रोत्साहन है और फिर हम पूरी तरह से खंडित राजनीति में समाप्त हो जाएंगे। ”

बनर्जी ने कहा था, "आर्थिक हितों के आधार पर अधिक राजनीति होनी चाहिए क्योंकि वे पहलू हैं जो हम सामाजिक विभाजन पैदा किए बिना वितरित कर सकते हैं ... उन्हें अक्सर संबोधित किया जा सकता है, जबकि सांप्रदायिक हितों को यह कहने के अलावा अन्य संबोधित नहीं किया जा सकता है कि हम उन अन्य लोगों को चोट पहुंचाएंगे, जो भयावह हैं।”

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज के चंद्रा ने कहा, भारत को अलगाव में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "देशों में दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद का उदय हुआ है। उदार लोकतंत्रों में एक गंभीर संकट है जहां वे प्रवास और हिंसा के मुद्दों को संबोधित करने में असमर्थ हैं। आदर्श रूप से वामपंथियों को इसमें कदम रखना चाहिए था, लेकिन यह विफल रहा। ऐसी परिस्थितियों में, दक्षिण पक्ष शून्य को भर रहा है। ”

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 23 मई, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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मुंबई: 542 में से 304 सीटों पर बढ़त हासिल करने के बाद ( 2014 में हासिल किए गए 282 से 22 ज्यादा ) भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 2019 का लोकसभा चुनाव जीत लिया है।

भाजपा 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सभी सीटों पर आगे थी: गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, उत्तराखंड, दिल्ली, दमन और दीव, दादरा और नगर हवेली, चंडीगढ़, और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और 24 मई 2019, सुबह 11.45 तक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और ओडिशा में अपना मार्ग मजबूत बनाया।

2014 में, भाजपा ने नौ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सभी सीटें जीती थीं: गुजरात, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, दमन और दीव, दादरा और नगर हवेली, चंडीगढ़, और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह।

लाइन ऑफ कंट्रोल (भारत और पाकिस्तान के बीच वास्तविक सीमा) पर बालाकोट, पाकिस्तान में फरवरी 2019 के सर्जिकल स्ट्राइक के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर भाजपा के जोर ने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की छवि एक सशक्त नेता के रुप में और मजबूत बनाया और साथ ही प्रतीत होता है कि पार्टी की विकास योजनाओं पर वर्णन के नियंत्रण से भाजपा की ऐतिहासिक जीत हुई है, जैसा कि विश्लेषकों ने इंडियास्पेंड को बताया है।

सर्जिकल स्ट्राइक ने भाजपा के अभियान में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रुप में चिन्हित किया और इसे चर्चा का एक मुद्दा बनाया और आर्थिक, सामाजिक और सुशासन के मोर्चे पर दिखाई जा रही पार्टी की कमी पर ध्यान केंद्रित करने के विपक्ष के प्रयासों को पीछे कर दिया, जैसा कि चुनाव पूर्व पोल जैसे कि सीएसडीएस- लोकनीति-द हिंदू-तिरंगा टीवी-दैनिक भास्कर के सर्वे 2019 से स्पष्ट होता है।

जैसा कि मोदी रिपोर्ट कार्ड श्रृंखला में सरकार के प्रमुख कार्यक्रमों के फैक्टरकैचर के मूल्यांकन से पता चलता है, कई महत्वाकांक्षी कार्यक्रम ( अन्य बातों के अलावा, सभी के लिए आवास, वित्तीय समावेशन, गरीब परिवारों को मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन, बेहतर स्वच्छता और ग्रामीण विद्युतीकरण तक पहुंच ) की व्यापक पहुंच हुई, लेकिन कार्यान्वयन में कमियां थीं।

परिणाम

भौगोलिक रूप से, देश के उत्तर-पश्चिम में भाजपा की पकड़ मजबूत होती दिख रही है।

उत्तर प्रदेश में, 2014 में जीती गई 71 की तुलना में भाजपा ने 9 कम सीटें (62) जीती हैं। यह सीटें समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के खेमें में चली गई हैं। फिर भी इसने बहुमत बनाए रखा है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में गवर्नेंस के प्रोफेसर नारायण ए. ने इंडियास्पेंड को बताया, “मुझे नहीं लगता कि सपा-बसपा या कांग्रेस पार्टी ने एक दुर्जेय विकल्प प्रस्तुत किया है। कांग्रेस की एक धर्मनिरपेक्ष सरकार की पुरानी कहानी और जो मोदी वादों पर खरी नहीं उतरेगी, लगता है कि कमजोर थी। यूपी में, महागठबंधन जातिगत गणनाओं पर बहुत अधिक भरोसा कर रहा था, जो मतदाता को समझाने के लिए कम हो गया है। ”

पूर्व में, एक लंबे समय से बीजू जनता दल (बीजद) का गढ़ रहे, ओडिशा में पार्टी ने नए सिरे से सेंध लगाया है। 24 मई 2019, सुबह 11.45 तक भाजपा ने सात सीटों पर जीत हासिल की थी और एक पर आगे चल रही थी; इसने 2014 में एक सीट जीती थी।

24 मई, 2019 को सुबह 11.15 तक 98 सीटों पर जीत हासिल और 14 सीटों पर आगे चलने के साथ बीजद राज्य विधानसभा में सत्ता में वापसी के लिए तैयार है, जिसके लिए मतों की गणना एक साथ की जा रही है। राज्य में 146 सदस्यीय विधानसभा है।

तीन अन्य राज्यों में एक साथ राज्य और आम चुनाव हुए। 55 सदस्यीय अरुणाचल प्रदेश विधानसभा में, भाजपा ने 33 पर जीत दर्ज की और 1 सीट पर बढ़त बना ली है, जबकि कांग्रेस ने 4 पर जीत दर्ज की है।

सिक्किम में, राज्य का सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा, जिसने 2019 के चुनावों से पहले भाजपा के साथ गठबंधन को ठुकरा दिया, उसने 32 में से 17 सीटें जीतीं।

24 मई को दोपहर 12.55 बजे तक,आंध्र प्रदेश में, युवजन श्रमिका रायथू कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी) ने 150 सीटों पर जीत हासिल करके और 1 सीट पर आगे बढ़कर 175 सदस्यीय विधानसभा में प्रवेश किया है।

पश्चिम बंगाल में, भाजपा पहली बार सीटों की महत्वपूर्ण संख्या पर कब्जा किया है - 42 में से 18। राज्य में चुनाव प्रचार में भाजपा और अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस जो राज्य स्तर पर सत्ता में है, के बीच कई हिंसक झड़पें (जैसे यहां और यहां) हुई हैं, । तृणमूल ने 2014 में 34 में से 22 सीटें जीती थी।

नारायण ने कहा, "ऐसा प्रतीत होता है कि, पश्चिम बंगाल में वामपंथी पार्टी [भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)] का वोट भाजपा को गया है। ओडिशा में, एंटी-इंकम्बेंसी हो सकती है - यहां तक ​​कि नवीन पटनायक के मामले में, जो एक मजबूत क्षेत्रीय नेता हैं - मतदाता अभी भी बदलाव चाहते हैं। मोदी के लिए भी अगले चुनावों में यही हो सकता है।"

पिछले चुनाव में, ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके), जिसने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) बनाने के लिए भाजपा के साथ गठबंधन किया था, उसने तमिलनाडु में 37 सीटें जीती थीं। हालांकि, दक्षिण भारतीय क्षेत्रीय दल ने मृतक पार्टी नेता जे. जयललिता की अनुपस्थिति को महसूस किया, जैसा कि शाम 5.45 तक यह केवल एक सीट पर कब्जा कर सकी थी।

राज्य की 38 सीटों में से अधिकांश , प्रतिद्वंद्वी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के पास गई, जिसने 23 सीटें सुरक्षित की है। अप्रैल 2019 में चुनावों से पहले धन की जब्ती के बाद वेल्लोर में चुनाव टाल दिया गया था।

संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में भाजपा की उपस्थिति

जम्मू और कश्मीर (J & K) में, पार्टी ने 2014 में जीती गई तीन सीटों को बरकरार रखा है।

2014 में जम्मू-कश्मीर में, भाजपा ने पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ गठबंधन किया था, जिसने एनडीए को राज्य का दावा करने की अनुमति देने के लिए शेष तीन सीटें जीती थीं। जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस ने इस बार पीडीपी को पछाड़ते हुए जीत हासिल की है।

उग्रवाद प्रभावित छत्तीसगढ़ में भाजपा ने नौ सीटें जीती हैं, जबकि 2014 में 10 सीटें जीती थी। छत्तीसगढ़ के दक्षिण में बस्तर निर्वाचन क्षेत्र, जिसमें बस्तर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर और बीजापुर जैसे माओवाद प्रभावित क्षेत्र शामिल हैं, ने इस बार कांग्रेस को 38382 वोटों के अंतर से वोट दिया है। 2014 में भाजपा ने 124,359 मतों के अंतर से यह सीट जीती थी।

पूर्वोत्तर क्षेत्र के सात बहन राज्यों के लिए जारी रुझान में, भाजपा 15 सीटें जीतने में कामयाब रही है - 2014 में हासिल की गई आठ से सात ज्यादा ऐतिहासिक रूप से, उत्तर पूर्व क्षेत्र, केंद्र सरकार चलाने वाली पार्टी को वोट देने के लिए इच्छुक होती है। इसका मुख्य कारण केंद्रीय अनुदान और धन पर उनकी भारी निर्भरता है। लेकिन इस बार 1999 और 2014 के बीच केंद्र में भाजपा ने अपने पूर्ण कार्यकाल के दौरान जो आनंद उठाया है, उसकी तुलना में 2014 के चुनाव के बाद भाजपा और पीएम मोदी की जीत का समर्थन बहुत अधिक रहा है, जैसा कि मिंट की 17 मार्च 2019 की इस रिपोर्ट से पता चलता है।

माकपा के एक पूर्व गढ़, त्रिपुरा में भाजपा ने 1972 में राज्य बनने के बाद पहली बार दोनों सीटें जीतीं।

2018 में, विधानसभा चुनावों में दो सीटें जीतने वाली भाजपा ने राज्य में स्वदेशी पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा के साथ गठबंधन के माध्यम से सरकार बनाई।

सर्जिकल स्ट्राइक

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के मनोज जोशी ने इंडियास्पेंड को बताया, "भाजपा ने अनिवार्य रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय दिखाया है और इसने चुनाव में उनके लिए काम किया है। यद दिखाने के बाद कि देश खतरे में है, मोदी को देश को सुरक्षित करने में एक निर्णायक, मजबूत नेता दिखाया गया।"

जोशी ने कहा कि भाजपा कुछ इस तरह के "ट्रान्सेंडैंटल मुद्दे" की तलाश में थी, जैसा कि 1990 में राम मंदिर मुद्दा था और उसने इसे सर्जिकल स्ट्राइक में पाया। जोशी ने कहा, जब पुलवामा आतंकी हमला हुआ, तो बालाकोट हमलों के माध्यम से भाजपा की मौकापरस्त प्रतिक्रिया उनका केंद्रीय अभियान बन गई और इसने काम किया, विशेष रूप से हिंदी हृदयभूमि में - जो भी इस स्ट्राइक के बारे में सुन रहा है, उसने मतदाताओं की कल्पना पर कब्जा कर लिया है - सुदूर ग्रामीण इलाकों में भी।“

यह समझना महत्वपूर्ण है कि बालाकोट पाकिस्तान के साथ एक द्विपक्षीय मुद्दा था, जबकि पुलवामा राष्ट्रीय मुद्दा था, जैसा कि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज में अंतर्राष्ट्रीय सामरिक और सुरक्षा अध्ययन के प्रोफेसर सूबा चंद्रा ने इंडियास्पेंड को बताया। उन्होंने कहा, "बालाकोट न केवल भारत में बल्कि पाकिस्तान में भी कहानी को बदलता है। इस तरह की कहानी के साथ समस्या यह है कि अगर [एक और ऐसी] घटना घटित होती, तो सरकार पर सैन्य प्रतिक्रिया देने का दबाव होता है।-- हमें अभी भी नहीं पता है कि यह हमारे रणनीतिक हित में है या नहीं। ”

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के नारायण ने इंडियास्पेंड को बताया, "[द] बालाकोट [सर्जिकल स्ट्राइक] ने भाजपा को वोट को मजबूत करने में मदद की हो सकती है," लेकिन रुझान बताते हैं कि करीबी मुकाबले के आधार पर भाजपा को समर्थन मिल रहा है। हमने गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में देखा है। ”

नारायण ने कहा, "इससे पहले, भाजपा ने अपने आख्यान में मुसलमानों की बात की थी, लेकिन इस बार मुस्लिम, पाकिस्तान, आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा ने मिलकर एक शक्तिशाली चुनावी आख्यान बनाया।" इसलिए भाजपा ने मतदाताओं को कुछ योजनाओं जैसे कि प्रधान मंत्री आवास योजना और उज्ज्वला के आस-पास संघटित किया, भले ही वे अन्य वादों को पूरा नहीं कर सके। यह एक ऐसी भावना प्रदान करता प्रतीत होता है कि भाजपा ने काम किया है।

मुंबई विश्वविद्यालय की नागरिक शास्त्र और राजनीति विभाग की प्रोफेसर और प्रमुख, उत्तरा सहस्रबुद्धे कहती हैं, “दुनिया भर में जो हो रहा है,उसके साथ भारत में भाजपा का उदय लगातार हो रहा है। वह मोदी हो या [अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, ये नेता संरक्षणवादी उपायों की दिशा में अधिक काम कर रहे हैं।”

ये नए नेता, मुक्त व्यापार को राष्ट्रीय संप्रभुता और संप्रभुता की अभिव्यक्ति के रूप में संरक्षणवादी नीतियों में लाने का अधिकार के रूप में चित्रित करके, राष्ट्रवाद का इस्तेमाल संरक्षणवादी व्यापार नीतियों को बढ़ावा देने के लिए कर रहे हैं। वह कहती हैं, "मेक इन इंडिया संरक्षणवाद के बारे में है, तो एक तरह से [भाजपा की मजबूत स्थिति] उस प्रवृत्ति के अनुरूप रही है जिसे बाहर देखा गया है। यूरोप और अमेरिका में, वे प्रवास-विरोधी हैं - भारत का नागरिकता पंजीकरण बिल एक समान प्रवासी-विरोधी नीति है। "

कृषि संकट

2014 में भाजपा ने जिन 282 निर्वाचन क्षेत्रों में जीत दर्ज की, उनमें से इंडियास्पेंड ने 206 की पहचान कृषि संकट के साथ की, इनमें से भाजपा को 25 में हार का सामना करना पड़ा और 181 को बरकरार रखा।

कृषि संकट विपक्षी दलों के अभियानों में प्रमुखता से दिखाई दिया, जिसमें कृषि उत्पादों की गिरती कीमतों, सरकार की असमर्थता जैसे कि खरीद के पर्याप्त मूल्य, पानी की कमी और किसान ऋणग्रस्तता और आत्महत्या जैसे मुद्दों पर प्रकाश डाला गया।

Note: Based on leads and results as of 11:15 am on May 24, 2019

बढ़ते कृषि संकट के बीच, देश भर के लगभग 200 संगठनों के हजारों किसानों ने नवंबर 2018 में दिल्ली तक मार्च किया था ताकि इन मुद्दों को सुलझाने के लिए संसद के विशेष सत्र और कुल कृषि ऋण माफी की मांग की जा सके।

पिछले 12 वर्षों से 2016-17 तक, भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का हिस्सा 5 प्रतिशत अंक से 12.2 फीसदी तक गिरा है। इस संबंध में 3 दिसंबर, 2018 को लाइवमिंट ने रिपोर्ट किया है। फिर भी, अधिकांश उपायों के द्वारा, कृषि और संबंधित गतिविधियां 50 फीसदी से अधिक भारतीयों को आजीविका प्रदान करती हैं।

उत्तर प्रदेश में, जहां भाजपा 62 सीटों पर जीत दर्ज की है, 12 मार्च, 2019 तक राज्य के पश्चिमी हिस्से में बकाया गन्ने का मूल्य 11,845 करोड़ रुपये था, जैसा कि द हिंदू बिज़नेसलाइन ने 20 मार्च, 2019 की रिपोर्ट में बताया है। इसमें से लगभग 52 फीसदी या 6,168 करोड़ रुपये शामली (कैराना निर्वाचन क्षेत्र), सहारनपुर, मुज़फ्फरनगर, गाज़ियाबाद, मेरठ, भागपत और बुलंदशहर में खेती करने वालों के कारण थे। सहारनपुर को छोड़कर इन सभी में भाजपा को जीत हासिल हुई है।

भारत का लगभग 42 फीसदी भू-भाग सूखे का सामना कर रहा है, जिसमें से 6 पीसदी असाधारण रूप से सूखा है - पिछले साल सूखे की चार गुना, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 3 अप्रैल, 2019 की रिपोर्ट में बताया है। दक्षिणी यूपी में बुंदेलखंड के सूखा प्रभावित इलाकों में भाजपा ने सभी सीटों पर जीत दर्ज की है, ये क्षेत्र हमीरपुर, बांदा, झांसी और जालौन के संसदीय क्षेत्रों को कवर करता है - जिनमें से तीन को 2018 में सूखा प्रभावित के रूप में सूचीबद्ध किया गया था, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 29 अप्रैल, 2019 को बताया था।

मध्य प्रदेश में, जहां 29 में से 23 निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान कृषि संकट के रुप में की गई थी, उनमें से सभी 23 पर भाजपा ने जीत दर्ज की है। लगभग पांच महीने पहले, तीन कार्यकाल से सत्ता में रही भाजपा को 2018 के राज्य विधानसभा चुनावों में कांग्रेस से हार मिली थी, जिसका कथित तौर पर कारण किसानों की नाराजगी थी।

मंदसौर में, जहां पुलिस फायरिंग ने जून 2017 में छह किसानों की जान ले ली, भाजपा ने न केवल अपनी पकड़ बनाए रखी है, बल्कि अपने जीत के अंतर को 376,734 वोटों से बढ़ाया है।

महाराष्ट्र में, भाजपा ने 48 में से 23 सीटें जीती हैं, और उसकी सहयोगी शिवसेना, 18. कर्नाटक में, भाजपा ने 28 में से 25 सीटें जीती हैं। 1980 में पार्टी के गठन के बाद से यह दो राज्यों में इसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। महाराष्ट्र ने 2016 में सबसे अधिक किसान / कृषक आत्महत्या (2,550, या सात दिन) की सूचना दी, इसके बाद कर्नाटक (1,212) का स्थान रहा है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 21 मार्च, 2019 की रिपोर्ट में बताया है।

महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त मराठवाड़ा क्षेत्र बीड में, जिसे 2015 में सदी के सबसे खराब सूखे का सामना करना पड़ा, भाजपा ने 168,368 मतों के अंतर से जीत दर्ज करते हुए अपनी सीट बरकरार रखी है।

अर्थशास्त्री जयति घोष ने इंडियास्पेंड को बताया, "मुझे लगता है कि कुछ क्षेत्रों में पीएम-किसान जैसे हैंडआउट का प्रभाव था। यह संभव है कि भाजपा ने यह सब कहानी आख्याान मजबूत करने के लिए किया हो। ”

दुनिया का सबसे बड़ा नौकरी-गारंटी कार्यक्रम, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, का जिक्र करते हुए नारायण ने इंडियास्पेंड को बताया, 'सभी सरकारों के पास योजनाएं थीं, लेकिन उनके पास योजनाओं के इर्दगिर्द जुटाने की भाजपा जैसी प्रक्रिया नहीं थी। उदाहरण के लिए, कांग्रेस ने मनरेगा के इर्द-गिर्द एक कहानी नहीं बुनी।”

सांप्रदायिक हिंसा

2014 और 2019 के बीच गाय से संबंधित घृणा की रिपोर्टिंग के लिए इंडियास्पेंड ने जिन 83 निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान की, भाजपा उनमें से भाजपा ने 63 पर जीत हासिल की है। 2014 में, उसने इनमें से 60 सीटें जीती थीं। ( 24 मई, 2019 को सुबह 11.15 तक लीड और परिणाम पर आधारित )

Note: Based on leads and results as of 11:15 am on May 24, 2019

घोष ने कहा, "परिणाम हमारे भारतीय समाज में एक प्रमुख बदलाव को दर्शाते हैं।" “भाजपा द्वारा अभियान खुले तौर पर सांप्रदायिक, परिवर्तन एजेंडे पर चलाया गया था। उन्होंने एक मजबूत स्थिति का वादा किया, जो हिंदू राष्ट्र की दृष्टि को लागू करेगा।यह चिंताजनक है कि मतदाताओं के एक महत्वपूर्ण हिस्से ने आर्थिक मोर्चे पर विफल होने और संस्थानों के विनाश के बावजूद भाजपा को वोट देने का फैसला किया है। ”

मार्च 2019 के पेपर में थॉमस पिकेट्टी और अमोरी गेथिन के साथ अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने कहा, "मतदाता सांप्रदायिक हितों और सांस्कृतिक प्राथमिकताओं की तुलना में सीधे आर्थिक हितों से कम संचालित होते है।"

बनर्जी ने इंडियास्पेंड को 15 मई, 2019 को एक साक्षात्कार में बताया था, “ अगर मतदाता मानने लगे कि र राज्य आर्थिक लाभ के मामले में कुछ भी उपयोगी नहीं दे सकता है, तो वे सांप्रदायिक दावों के प्रति उत्तरदायी होंगे। यदि लोग केवल सांप्रदायिक मुद्दों के बारे में परवाह करना शुरू करते हैं, तो पार्टियों को इसे बढ़ावा देने के लिए एक प्रोत्साहन है और फिर हम पूरी तरह से खंडित राजनीति में समाप्त हो जाएंगे। ”

बनर्जी ने कहा था, "आर्थिक हितों के आधार पर अधिक राजनीति होनी चाहिए क्योंकि वे पहलू हैं जो हम सामाजिक विभाजन पैदा किए बिना वितरित कर सकते हैं ... उन्हें अक्सर संबोधित किया जा सकता है, जबकि सांप्रदायिक हितों को यह कहने के अलावा अन्य संबोधित नहीं किया जा सकता है कि हम उन अन्य लोगों को चोट पहुंचाएंगे, जो भयावह हैं।”

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज के चंद्रा ने कहा, भारत को अलगाव में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "देशों में दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद का उदय हुआ है। उदार लोकतंत्रों में एक गंभीर संकट है जहां वे प्रवास और हिंसा के मुद्दों को संबोधित करने में असमर्थ हैं। आदर्श रूप से वामपंथियों को इसमें कदम रखना चाहिए था, लेकिन यह विफल रहा। ऐसी परिस्थितियों में, दक्षिण पक्ष शून्य को भर रहा है। ”

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 23 मई, 2019 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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