भारत की राजधानी में कम नौकरियां,बेरोजगार श्रमिकों की संख्या बहुत ज्यादा

39 वर्षीय राजू प्रजापति ने 2016 में नोटबंदी से पहले एक महीने 3,000 रुपये तक बचाए हैं। वह अपनी पत्नी, दो बच्चों और माता-पिता के साथ रहते थे। उस समय को वह ‘अच्छे दिन’ कहते हैं। आज वह कोई बचत नहीं कर पाते हैं। एक बदबूदार कमरे में रहते हैं, जिसे वह एक अन्य श्रमिक के साथ साझा करते हैं।अपनी पत्नी और बच्चों को उन्होंने अपने गृह नगर भेज दिया है, जहां वह महीने में एक बार उनसे मिलने जाते हैं।

हरोला (दिल्ली): दिन चढ़ने के साथ, दोपहर तापमान 42 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया तो कई निर्माण श्रमिक खड़े हो गए या फुटपाथ पर बैठ गए, जहां वे हर दिन इकट्ठा होते थे और संभावित नियोक्ताओं द्वारा अलग-अलग तरह की नौकरियों का इंतजार करते हैं। श्रमिकों का अंतिम जत्था ढाई घंटे पहले, सुबह 10 बजे उठाया गया था, और उसके बाद फिर कोई भी नियोक्ता साथ नहीं आया। 

फिर भी, पूर्वी दिल्ली में हरौला आने के बाद उन्होंने छह घंटे इंतजार किया। किस्मत वालों को सुबह 7 बजे उठा लिया गया, बाकि लोगों को बाद में उठाया गया। जिनकी किस्मत ठीक नहीं थी, वह वहीं खड़े रहे जब तक कि उनकी उम्मीद नहीं टूटी और बाद में अपने घर के ओर गए।हरौला में पीछे छूट गए 32 वर्षीय दिहाड़ी मजदूर, राम कृपाल कहते हैं, "यह यहां की एक दिनचर्या है।" जावेद इब्राहिम कहते हैं, “नोटबंदी ( नवंबर 2016 में भारत की 86 फीसदी मुद्रा अमान्य घोषित ) के बाद, नौकरी पाने से बच जाने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि हुई है। 2,000 से 3,000 दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी, उस साल यहां हर रोज रोज़गार पाते थे, आज उनमें से 1,000 से कम को ही काम मिलता है।”

नोएडा के सेक्टर 5 में हरोला लेबर हब, दिल्ली की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में दिहाड़ी मजदूरी के काम की तलाश करने वालों के लिए एक प्रमुख संपर्क स्थल है।

धूल, धुएं और धुंध के बीच एक दिन के काम मांगने वाले सैकड़ों लोग ऊंची-ऊंची, क्रोम-और कांच की इमारतों और टावरों से घिरी सड़कों पर इक्ट्ठा होते हैं। फटे, सने हुए कपड़े और पसीने से तर-ब-तर शरीर में पुरुष और महिलाएं इंतजार कर रहे होते हैं और अन्य लोग नई कारों में, सूट, चमकदार जूते और ब्रीफकेस के साथ काम के लिए जा रहे होते हैं।

दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर - भारत के 46 मिलियन लोगों के साथ सबसे बड़ा शहरी समूह )में हरोलाऔर अन्य श्रमिक केंद्रों में वे कोई भी काम अपने हाथ ले लेते हैं जिनकी उन्हें पेशकश की जाती है - ईंट भट्टों पर, निर्माण स्थलों पर, घरों में, माल ढोने का काम आदि। श्रम हब में श्रमिकों की संख्या में वृद्धि होने के कारण ये नौकरियां कम हो रही हैं, जैसा कि हम रिपोर्ट में बताएंगे।

पूर्वी दिल्ली के हरौला लेबर हब में श्रमिक कभी-कभी कड़ी धूप में छह घंटे तक इंतजार करते हैं, ताकि काम कराने वाले उन्हें ले जाएं। बदकिस्मत लोगों को सामान बांध घर वापस जाना पड़ता है। औसतन, लगभग 1,000 श्रमिकों को हर दिन रोजगार नहीं मिलता है और वे खाली हाथ घर लौटते हैं।

भारत की राजधानी और इसकी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में नोटबंदी तब आया था, जब बिना लाइसेंस के आवासीय क्षेत्रों में काम करने वाले औद्योगिक केंद्रों को जो पूर्वी दिल्ली को दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक बना रहे थे, बंद किए जा रहे थे। माल और सेवा कर (जीएसटी) के जुलाई 2017 के कार्यान्वयन से स्थिति और बद्तर हुई।

यह 11-आलेखों की श्रृंखला का अंतिम आलेख है (आप यहां पहला आलेख को पढ़ सकते हैं, दूसरा यहां, तीसरा यहां, चौथायहां, पांचवा यहां, छठा यहां,सातवां यहां, आठवां यहां और नौवां और दसवां यहां), जो भारत के अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार पर नजर रखने के लिए, राष्ट्रीय स्तर पर श्रम केंद्रों से रिपोर्ट की गई है ( ऐसी जगह, जहां अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिक अनुबंध की नौकरी पाने के लिए इकट्ठा होते हैं।) अनौपचारिक क्षेत्र देश के निरक्षर, अर्ध-शिक्षित और योग्य-लेकिन-बेरोजगार लोगों के बड़े पैमाने पर रोजगार देता है, भारत के 52.7 करोड़ कार्यबल में से 92 फीसदी को रोजगार देता है, जैसा कि सरकारी आंकड़ों के आधार पर 2016 के अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अध्ययन से पता चलता है।

अनौपचारिक श्रमिकों के जीवन और आशाओं को ध्यान में रखते हुए, यह श्रृंखला नोटबंदी और जीएसटी के बाद नौकरी के नुकसान के बारे में चल रहे राष्ट्रीय विवादों को एक कथित परिप्रेक्ष्य प्रदान करती है। अखिल भारतीय निर्माता संगठन के एक सर्वेक्षण के अनुसार,जिसकी 300,000 सदस्य-इकाइयों में से 34,700 लोगों ने मतदान किया, पिछले चार वर्षों से 2018 तक, नौकरियों की संख्या में एक-तिहाई की गिरावट हुई है।

कंसल्टेंसी सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों के मुताबिक, 2018 में अकेले 1.1 करोड़ नौकरियां खो गईं। नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) के तहत पिडियोडिक लेबर फोर्स सर्वे द्वारा जारी किए गए नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2017-18 की बेरोजगारी दर 6.1 फीसदी है, जो कि 45 साल में सबसे ज्यादा है। इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि असंगठित क्षेत्र में 71.1 फीसदी वेतनभोगी श्रमिकों ( कृषि क्षेत्र को छोड़कर ) के पास कोई आधिकारिक या लिखित नौकरी अनुबंध नहीं है।

‘अच्छे दिनों ’ का अंत

खुले बटन की हाफ शर्ट और मुड़े पेंट पहले 39 वर्षीय राजू प्रजाप्रति ने उन अच्छे दिनों को याद किया जब वह पूर्वी दिल्ली के गोकलपुरी में अपनी पत्नी, बच्चों और माता-पिता के साथ रहता था।

 

पढ़ाई में रुचि न होने के कारण राजू ने नौंवी कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी और 2008 तक कई तरह की नौकरियां करते रहे। दैनिक निर्माण कार्य पाने के लिए उन्होंने उत्तर में लगभग 28 किमी दूर - हरोला और बरारी के श्रम हब तक लगातार आना शुरु कर दिया। उन्होंने महीने में लगभग 25 दिन काम पाया, हर महीने लगभग 12,000 रुपये कमाए, जो भोजन और रहने के लिए पर्याप्त था।

8 नवंबर 2016 को, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 रुपये और 1,000 रुपये के नोटों की वैधता को रद्द करने का फैसला किया, तो प्रजापति जैसे लोगों के लिए सब कुछ बदल गया।

राजू ने कहा कि उन्होंने एक निर्माण स्थल पर नोटबंदी के सात महीने बाद ही काम पाया।

अपने बेटे की ही तरह निर्माण श्रमिक, 67 वर्षीय गणेश प्रजापति ने कहा ने कहा, "नोटबंदी हमारे लिए एक काला दिन था। केवल हम ही जानते हैं कि उन दिनों हम कैसे जीवित रहे हैं।" 

गणेश की आय 12,000-15,000 रुपये से लगभग 8,000 रुपये हो गई है। राजू ने कहा कि वह प्रति माह 6,000 -7,000 रुपये कमाने और महीने में लगभग 16 दिन काम करने के लिए संघर्ष करता है।

नौकरी का संकट बढ़ने के कारण, राजू ने जुलाई 2017 में अपने परिवार को गोकलपुरी में छोड़ दिया और हरोला गांव के अंदरूनी हिस्सों में चले गए, ताकि वे लेबर हब के करीब रह सके।

वह एक साथी के साथ एक बदबूदार, साझा कमरे में रहते हैं और उसे हर दिन पीने का पानी लाने के लिए 1.5 किमी की यात्रा करनी पड़ती है। अन्य किरायेदारों की तरह, उन्हें भी समय पर 1,100 रुपये के मासिक किराए का भुगतान करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, इसलिए मकान मालिक रामशकील से रहने की स्थिति के बारे में शिकायत करने की हिम्मत नहीं होती। 

राजू की पत्नी एनसीआर के भीतर अपने माता-पिता के घर वापस चली गई है और अब वह महीने में केवल एक बार उससे मिलने जाता है।

नोटबंदी से पहले, राजू हर महीने 3,000 रुपये तक बचा सकता था। अब, वह कुछ भी नहीं बचाता है।

हमने एनसीआर के अन्य श्रम केंद्रों में प्रजापति की कहानी के विभिन्न संस्करण देखे। हर जगह अलग-अलग परिस्थितियों के साथ कोई न कोई प्रजापति दिखे।

अलग-अलग लेबर हब, वही कहर

दिल्ली का 17 वीं शताब्दी का चांदनी चौक शहर के सबसे व्यस्त बाजारों में से एक है। इसकी गलियों में हर दिन 5 लाख लोग आते हैं और इसकी संकरी गलियां छोटी-छोटी औद्योगिक इकाइयों और थोक बाजारों से भरी हुई हैं।

नोटबंदी के बाद, चांदनी चौक के व्यवसाय ने अपने कारोबार का लगभग 70 फीसदी खो दिया है, जैसा कि बिजनेस स्टैंडर्ड ने मई 2019 की रिपोर्ट में बताया है।

इन लघु उद्योगों और बाजारों में से अधिकांश ने अनौपचारिक अनुबंधों पर श्रमिकों को नियोजित किया था, और जब अर्थव्यवस्था में गिरावट आई, तो ये श्रमिक सड़कों पर उन लोगों से जुड़ गए, जो पहले से ही बड़ी संख्या में थे।

दिल्ली के सबसे बड़े श्रमिक केंद्रों में से एक और चांदनी चौक क्षेत्र का एक हिस्सा, चावड़ी बाजार में एक दिहाड़ी मजदूर, 29 साल के जाकिर मलिक ने कहा, "मजदूरों में असुरक्षा और चिंता की भावना है। मजदूरी का काम यहां और अन्य श्रमिक केन्द्रों जैसे बुड़ारी और महिपालपुर में दिन-प्रतिदिन कम हो रहा है।"

दक्षिणी दिल्ली में महिपालपुर लेबर हब ( शहर के सबसे समृद्ध क्षेत्रों में से एक ) संकीर्ण सड़कों, अराजक यातायात, टूटे फुटपाथ और अस्वीकृत श्रमिकों से पहचाना जा सकता है।

नोटबंदी के बाद, महिपालपुर श्रम केंद्र में भीड़ कम हो गई, क्योंकि श्रमिक या तो अपने मूल क्षेत्रों में वापस चले गए या नोएडा जैसे क्षेत्रों में चले गए ।

महिपालपुर लेबर हब अब मुख्य रूप से रिक्शा चालकों के लिए एक पार्किंग क्षेत्र है। एक पूर्व श्रमिक ठेकेदार 46 वर्षीय सुभाष चंद मिश्रा ने कहा, "दिल्ली में तीन प्रमुख श्रमिक केंद्र थे: महिपालपुर, चावड़ी बाजार और बुराड़ी।वर्तमान में, ये सभी रिक्शा चालकों के स्टैंड के रूप में काम करते हैं।"

30 साल का सोनू कुमार दिहाड़ी मजदूर था, लेकिन नौकरी के इंतजार और मजदूर ठेकेदारों पर आश्रित रहते-रहते थक गया।

वह अब दक्षिणी दिल्ली के महिपालपुर लेबर हब में एक साइकिल-रिक्शा चालक है। नौकरियों में कमी के साथ, क्षेत्र साइकिल रिक्शा के लिए एक पार्किंग क्षेत्र बन गया है।

मंदी ने न केवल मजदूरों बल्कि ठेकेदारों को भी प्रभावित किया है। मिश्रा ने कहा, "सच कहूं तो दिल्ली-एनसीआर में एक लेबर-कॉन्ट्रैक्टिंग की नौकरी वाकई ठीक थी। लेकिन नोटबंदी के बाद, मजदूर और लेबर कॉन्ट्रैक्टर्स, दोनों बर्बाद हो गए हैं। "

आज, महिपालपुर लेबर हब पर, सुबह 7 से 10 बजे के बीच मजदूरों को ढूंढना दुर्लभ है।"अब, हर कोई नोएडा की ओर देखता है।" हालांकि आवासीय-और कार्यालय-टॉवर निर्माण स्थलों के लिए, जैसा कि हमने पहले कहा था, पर्याप्त काम नहीं हैं।

मिश्रा की कहानी से पता चलता है कि कैसे नोटबंदी के बाद भी सापेक्ष समृद्धि कम हो गई और अब तक वापस नहीं लौटी है।

उत्तर प्रदेश में अपने गृह शहर लखनऊ में ग्रैजुएशन की डिग्री प्राप्त करने के बाद, मिश्रा ने एक किराने की दुकान शुरू की थी, लेकिन बाद में इसे बंद कर दिया। बेहतर संभावनाओं की उम्मीद में उन्होंने 2007 में दिल्ली में एक श्रमिक ठेकेदार का काम शुरु किया।

मिश्रा ने दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों के बड़े समूहों को श्रमिक केंद्रों से काम पर रखा और उन्हें दक्षिणी दिल्ली के ओखला औद्योगिक क्षेत्र में नौकरी पर भेजा। नोटबंदी से पहले, मिश्रा ने हर महीने 30,000 रुपये से 40,000 रुपये कमाए और उत्तरी दिल्ली के आदर्श नगर में एक फ्लैट किराए पर लिया, जहां वह अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रहते थे।

अब, मिश्रा दक्षिणी दिल्ली में संगम विहार के पास एक कमरे में रहते हैं, अपने फ्लैट से बाहर निकलने के बाद वे एक बार इकट्ठा हुए मजदूरों को पर्याप्त काम नहीं दे पाए। वह अब उबर ड्राइवर हैं और प्रति माह लगभग 40,000 रुपये कमाते हैं। लेकिन खर्च बढ़ता गया और मिश्रा का परिवार पैसे बचाने के लिए वापस लखनऊ चला गया।

मिश्रा की तरह, श्रृंखला में शामिल अन्य लोगों ने आगे बढ़ने की कोशिश की, जैसे कि 30 वर्षीय सोनू कुमार, बिहार का एक प्रवासी जो हर दिन एक श्रम हब की प्रतीक्षा करने और एक ठेकेदार के अधीन रहने की तुलना में रिक्शा चलाने को एक बेहतर नौकरी समझता है।

मिश्रा और कुमार की नौकरी की कम संभावनाएं, उन मुश्किलों का प्रतिबिंब है जो दिल्ली के औद्योगिक क्षेत्रों में न केवल नोटबंदी के बाद आईं बल्कि जीएसटी और कोर्ट के रिहायशी इलाकों और प्रदूषण का कारण बनने वाले व्यवसायों को बंद करने का आदेश के बाद भी आई है।

जीएसटी, सीलिंग, प्रदूषण

पश्चिमी दिल्ली में मायापुरी चरण- II, छोटे व्यापारियों, सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए भारत का सबसे बड़ा लौह-व्यापारिक केंद्र है, जिसमें स्क्रैप डीलर से लेकर वाहन कार्यशालाएं हैं, जहां अकुशल और कुशल श्रमिक काम खोजने आते हैं।

जबकि विमुद्रीकरण के कारण कई लघु उद्योग बंद हो गए और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक बेरोजगार हो गए, जीएसटी ने वित्तीय तनाव को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

एक लोहे के व्यापारी 52 वर्षीय जतिन शर्मा ने कहा, "जीएसटी की फाइलिंग प्रणाली बहुत जटिल है, इसमें ड्रॉप-डाउन मेनू, इनवॉइस अपलोड, खरीद को अपलोड करने और कई अन्य कार्य शामिल हैं।" “ये सभी गतिविधियाँ छोटे व्यापारियों के समय और धन को प्रभावित करती हैं। हम इन सभी चीजों की देखभाल करने के लिए पेशेवरों का खर्च नहीं उठा सकते हैं।”

मायापुरी इंडस्ट्रियल वेलफेयर एसोसिएशन के कार्यकारी समिति के सदस्य 46 वर्षीय दिनेश माकोल ने बताया कि नई दिल्ली में कई लघु उद्योग मालिकों ने अपने व्यवसाय को चलाने के लिए व्यक्तिगत बचत का निवेश किया था। माकोल ने कहा कि नोटबंदी और जीएसटी ने लोहे के वितरण को रोक दिया, मालिकों का जीवन बर्बाद हो गया और सैकड़ों नौकरियां चली गईं।

जीएसटी के तहत व्यापार और करों से नकदी लेन-देन की समाप्ति 2 फीसदी से बढ़कर 18 फीसदी हो गई।

मायापुरी के एक विक्रेता 29 वर्षीय गणेश तंवर ने कहा, "मायापुरी में महीनों से लोहे की बड़ी कमी हो गई थी और सभी इकाइयों ने कुछ समय के लिए काम करना बंद कर दिया था।" मकोल ने कहा, "कई ने स्थाई रूप से काम बंद कर दिया है।"

37 वर्षीय ऋषभ शाह ने कहा कि बाजार लगभग तीन महीने से बंद था और मजदूर अपने मूल स्थानों पर वापस चले गए।

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति द्वारा संचालित आवासीय क्षेत्रों में अनधिकृत व्यवसायों को बंद करने के दिल्ली सरकार के अभियान से स्थिति बदतर हो गई थी। 31 जनवरी, 2017 तक, दुकानों, रेस्तरां, बार और बेकरी सहित कम से कम 10,533 वाणिज्यिक इकाइयां बंद कर दी गईं।

2016 में, नोटबंदी से पहले, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने प्रदूषण को रोकने के लिए पूर्वी दिल्ली में अनधिकृत औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का आदेश दिया। इसके आधार पर, दिल्ली राज्य औद्योगिक और अवसंरचना विकास निगम ने 51,837 इकाइयों की पहचान की, जिन्हें स्थानांतरित या बंद करने की आवश्यकता थी। सबसे बड़ा प्रभाव अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक पर पड़ा। इन औद्योगिक इकाइयों में काम करते समय जहरीले वायु प्रदूषकों के संपर्क में आने का खतरा जरूर था, लेकिन उनकी मासिक आय स्थिर थी।

 सीलिंग ड्राइव से सबसे अधिक प्रभावित मायापुरी थी और 2018 में कई बार व्यापारियों ने विरोध में सड़कों पर उतरे। अप्रैल 2019 में एक संवाददाता सम्मेलन में, आम आदमी पार्टी (आप) के व्यापार विंग के प्रमुख बृजेश गोयल ने व्यापारियों को आश्वासन दिया कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उनके सीलिंग आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की योजना बनाई है।

इस बीच, मायापुरी की सड़कों पर, श्रमिक अपने दिन ताश खेलने में बिताते हैं, कारखाने के मालिकों द्वार काम के लिए उठाए जाने की प्रतीक्षा करते हैं।

नोटबंदी से पहले के बद्तर दिन

कुछ मजदूरों से जिनसे हमने बात की, हमने अपेक्षा की थी कि वे सरकार से रोज़गार प्रदान की बात करेगें, लेकिन उन्होंने वेटिंग शेड, पीने के पानी की सुविधा और एक मजदूर संघ की इच्छा व्यक्त की, जो दिल्ली के न्यूनतम वेतन के लिए संघर्ष कर सके: अकुशल श्रम के लिए 399 रुपये और कुशल श्रम के लिए 485 रुपये।

2016 में लगभग 13 लाख बेरोजगार लोगों के साथ, दिल्ली के बेरोजगारी दर में 2015 से 6 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई है, जैसा कि दिल्ली के आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 नवीनतम उपलब्ध स्थानीय डेटा, से पता चलता है।

नोटबंदी, जीएसटी, सीलिंग और प्रदूषण-विरोधी उपायों ने नौकरी पाने की संभावनाओं को बिगाड़ दिया, लेकिन विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसे अवसर पहले से ही एक उचित शिक्षा के बिना उन लोगों के लिए दुर्लभ थे।

एक संस्था, सेंटर फॉर एजुकेशन एंड कम्युनिकेशन के जे.जॉन ने कहा, "लोगों के भीतर एक धारणा है कि दिल्ली में मजदूरों के लिए कई अवसर हैं। हालांकि, यह वास्तविक परिदृश्य नहीं है। नोटबंदी से पहले, यह औसत था और नोटबंदी के बाद यह बदतर हो गया था।"

ईंट-भट्ठा कार्यकर्ता और बिहार से प्रवासी, 29 वर्षीय, पार्वती कुमारी, ने कहा कि पिछले पांच वर्षों में एनसीआर में मजदूरों के लिए "कुछ भी नहीं बदला है"। 10 कक्षा ड्रॉपआउट, वह अपने पति, जो एक कैब ड्राइवर है, के साथ रहती है और दिन के लिए काम पाने के लिए निश्चित नहीं है। नोटबंदी के बाद से उसकी आय 8,000 रुपये से घटकर 7,000 रुपये हो गई है।

उन्होंने कहा, "हम पर्याप्त भोजन के लिए संघर्ष करते थे और हम अभी भी संघर्ष कर रहे हैं।"

हालांकि, बेरोजगारी पर नज़र रखना भारत की राजधानी में मुश्किल है क्योंकि डेटा अविश्वसनीय प्रतीत होता है। 

दिल्ली का डेटा

दिल्ली के श्रमिक केंद्रों और औद्योगिक क्षेत्रों की स्थिति से, यह स्पष्ट है कि दैनिक मजदूरी श्रमिकों के बीच बेरोजगारी व्यापक है।

उदाहरण के लिए, नोटबंदी के बाद, संगम विहार के कपड़ा कारखानों में सैकड़ों खोए हुए रोजगार और व्यवसाय बंद हो गए, जिन्हें एशिया के सबसे बड़े अनधिकृत पड़ोस में से एक माना जाता है, जैसा कि जॉन ने कहा। 10 लाख से अधिक घर, संगम विहार के लोग ज्यादातर गरीब प्रवासी हैं।

उन्होंने कहा, कि बाकी दिल्ली में, खोई और प्राप्त की गई नौकरियों पर नजर रखना मुश्किल है क्योंकि कोई स्पष्ट डेटा नहीं है।

2016 में, दिल्ली की औसत बेरोजगारी दर 10.31 फीसदी थी, जो मई 2016 में, नोटबंदी से पहले 17.3 फीसदी तक थी - जैसा कि सीएमआईई के बेरोजगारी आंकड़ों से पता चलता है।

बेरोजगारी जून 2017 से अप्रैल 2018 के बीच 3.6 फीसदी के औसत पर सबसे कम थी, जो फरवरी 2018 में घटकर 1.6 फीसदी रह गई। मई 2018 में बेरोजगारी दर बढ़कर 8.8 फीसदी हो गई और तब से बढ़ी हुई है। 2019 के पहले चार महीनों में बेरोजगारी की दर औसतन 11.32 फीसदी रही है। 

विशेषज्ञों ने कहा कि इनका विश्लेषण करना कठिन है, क्योंकि रोजगार धीरे-धीरे बढ़ता है और धीरे-धीरे गिरता है।

दिल्ली स्थित सामाजिक-प्रभाव सलाहकार, उत्कर्ष भारद्वाज ने कहा,"जबकि बेरोजगारी के आंकड़े चिंता का विषय हैं और आगे के विश्लेषण की आवश्यकता है, यह उजागर करना महत्वपूर्ण है कि वास्तविक समय की बेरोजगारी के आंकड़ों पर कब्जा करने के लिए एक स्वतंत्र और वैश्विक रूप से गठबंधन प्रणाली की आवश्यकता है।"

विश्वसनीय आंकड़ों और एक रणनीति के बिना, बेरोजगारी और बेरोजगारी कार्यक्रमों के लिए सरकारी समाज-कल्याण कार्यक्रम अंधेरे में उठाए गए कदम प्रतीत होते हैं।

भारद्वाज ने कहा, “जबकि दिल्ली सरकार और पीएमकेवीवाई (प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना) द्वारा शुरू किए गए कौशल मिशन, केंद्र सरकार द्वारा शुरू किए गए कुछ प्रचलित मुद्दों को संबोधित करने के लिए उल्लेखनीय प्रयास हैं, उन्हें मौजूदा वित्तीय आदान-प्रदान पर ध्यान केंद्रित करने और उन्हें विकसित करने की आवश्यकता है कौशल, रोजगार और बाजार में उपलब्ध अवसरों पर वास्तविक समय के आंकड़ों को इकट्ठा करने और बनाए रखने के लिए वन-स्टॉप प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि रोजगार की तलाश करने वालों के लिए व्यवहार्य नौकरी के विकल्प पेश करने के लिए शिक्षा और उद्योगों के साथ सहयोग करते हैं।”

रोजगार के अवसर केवल तभी बेहतर हो सकते हैं, जब व्यवसाय चलाना आसान हो, जो कि वर्तमान में दिल्ली में नहीं दिखता है।

व्यापार करना मुश्किल

मार्च 2019 में, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भारतीय राज्यों में व्यापार करने में आसानी पर डेटा जारी किया। पिछले तीन वर्षों में रैंकिंग के आधार पर, दिल्ली सबसे नीचे है, 2015 में 15 वें स्थान से गिरकर 2017 में 23 वें स्थान पर पर आया है। (आंध्र प्रदेश शीर्ष स्थान पर, तेलंगाना दूसरे और दिल्ली के पड़ोसी, हरियाणा तीसरे स्थान पर है)।

चमड़े के सामान बनाने वाली कंपनी, वी एंड एम एक्सपोर्ट्स के प्रोपराइटर सुमन चावला ने कहा, "औद्योगिक भूमि की बहुत अधिक लागत युवा उद्यमियों को शुरुआती निवेश करने और दिल्ली-एनसीआर के एमएसएमई (सूक्ष्म, मध्यम और छोटे उद्यमों) बाजार में बने रहने के लिए असंभव बना देती है।"

रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन के अनुसार, भूमि की 15-20 फीसदी तक महंगा होने की संभावना है लेकिन भले ही ऐसा नहीं हो, कुशल श्रमिकों की कमी एक समस्या है जो दृश्यमान बेरोजगारी और कई सरकारी कार्यक्रमों के बीच जारी है।

उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय कौशल विकास एजेंसी, राष्ट्रीय कौशल विकास निगम और प्रशिक्षण महानिदेशालय के प्रयासों को समन्वित करने के लिए जुलाई 2015 में राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन शुरू किया गया था, लेकिन श्रम केंद्रों में, श्रमिकों ने हमें बताया कि वे नौकरी-प्रशिक्षण कार्यक्रमों से अनजान थे और उन्होंने कभी किसी के लिए पंजीकरण नहीं किया था।

राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन के तहत, प्रधान मंत्री कौशल विकास योजना 2016 में शुरू की गई, जिसमें 12,000 करोड़ रुपये के बजट के साथ, 2020 तक लगभग 1 करोड़ ऐसे लोग जिन्होंने स्कूल-कॉलेज छोड़ दिया या बेरोजगारों को सॉफ्ट स्किल, उद्यमिता और वित्तीय और डिजिटल साक्षरता का मुफ्त प्रशिक्षण देने का वादा किया गया। हालांकि, जनवरी 2019 तक उस लक्ष्य का एक तिहाई से अधिक हासिल नहीं किया गया था, जैसा कि अल जज़ीरा की मई 2019 की रिपोर्ट में बताया गया है।

क्या हैं कल्याणकारी योजनाएं?

फरवरी 2019 के अंतरिम बजट के दौरान, मोदी सरकार ने असंगठित-क्षेत्र के श्रमिकों के लिए एक कार्यक्रम पेश किया, जिसे प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन कहा जाता है, जो उन श्रमिकों को, 60 साल की हो जाने के बाद प्रति माह 15,000 रुपये से कम मासिक पेंशन प्राप्त करने की अनुमति देता है।

पंजीकरण के पात्र लोगों में स्ट्रीट वेंडर, लोडर, ईंट-भट्ठा मजदूर, भूमिहीन मजदूर और 18 से 40 वर्ष की आयु के घरेलू श्रमिक हैं।कार्यक्रम की वेबसाइट के अनुसार, योजना के शुभारंभ के बाद से, 26 मई, 2019 तक 5,966 श्रमिकों ने दिल्ली में पंजीकरण किया।

2017-18 के एनएसएसओ सर्वेक्षण में कहा गया है कि असंगठित क्षेत्र में नियमित वेतन वाले श्रमिकों में ( कृषि क्षेत्र को छोड़कर ) 54.2 फीसदी पेडलीव के लिए पात्र नहीं थे, जबकि 49.6 फीसदी किसी भी सामाजिक सुरक्षा लाभ के लिए पात्र नहीं थे।

52 वर्षीय सुरेश कोली एक सरकारी पेंशन कार्यक्रम के लिए पात्र हैं, लेकिन उनका कहना है कि उन्हें ऐसी किसी भी योजना की जानकारी नहीं है। हमने जिन श्रमिकों से बात की उनमें से लगभग किसी के पास ऐसी जानकारी नहीं थी।

जिस भी कार्यकर्ता से हमने बात की, उसे किसी भी सरकारी कार्यक्रम की जानकारी नहीं थी। 52 वर्षीय, सुरेश कोली, जो पेशे से एक बढ़ई हैं, ने कहा " मैंने इसके बारे में कभी नहीं सुना। मुझे पता है कि मुझे रात में भोजन करने के लिए हर दिन एक लड़ाई लड़ने की जरूरत है।"

आम सहमति: सरकारी कार्यक्रम उन अधिकारियों के लिए हैं, जो उन्हें चलाते हैं। दिल्ली के सत्तारूढ़ आप ने जनवरी 2019 में असंगठित क्षेत्र से वोट मांगने के लिए आठ श्रमिक संगठन बनाए हैं।

इन श्रमिक संगठनों का उद्देश्य परिवहन, जल, थोक बाजार, निर्माण, स्वास्थ्य, रेलवे और बिजली बोर्डों में श्रमिकों को शामिल करना था। लगभग सभी मजदूरों से, जिनसे हमने संगम विहार या महिपालपुर में बात की, उन्होनें इन श्रम निकायों के बारे में सुना था और सरकार पर संदेह व्यक्त किया था।

महिपालपुर के एक निर्माण श्रमिक 43 वर्षीय अरुण झा ने अपने 14 वर्षों में उन्होंने कभी भी मजदूरों के लिए एक संगठन के बारे में नहीं सुना था। आप के प्रयास के बारे में बताने पर उन्होंने कहा: "यह सिर्फ चुनावों के लिए है, और कुछ नहीं।"

आखिर में जब हरोला में राजू से हमने भारतीय जनता पार्टी की नई सरकार से अपेक्षाओं के बारे में पूछा, तो उसने मोदी के 2014 के बेहतर दिनों के वादे का जिक्र किया और कहा: “हम अच्छे दिन तलाश में हैं। "

यह 11 आलेखों की श्रृंखला में से यह 1ावां आलेख है। यहां इंदौर, जयपुर, केरल, अहमदाबाद, कोलकाता, लखनऊ, बेंगलुरु,बठिंडा और हरियाणा , पुणे से पिछले आलेख पढ़ें। 

(तिवारी दिल्ली के एक फ्रीलांस लेखक और 101Reporters.com के सदस्य हैं, जो जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों का एक अखिल भारतीय नेटवर्क है।)

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 10 जुलाई 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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हरोला (दिल्ली): दिन चढ़ने के साथ, दोपहर तापमान 42 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया तो कई निर्माण श्रमिक खड़े हो गए या फुटपाथ पर बैठ गए, जहां वे हर दिन इकट्ठा होते थे और संभावित नियोक्ताओं द्वारा अलग-अलग तरह की नौकरियों का इंतजार करते हैं। श्रमिकों का अंतिम जत्था ढाई घंटे पहले, सुबह 10 बजे उठाया गया था, और उसके बाद फिर कोई भी नियोक्ता साथ नहीं आया। 

फिर भी, पूर्वी दिल्ली में हरौला आने के बाद उन्होंने छह घंटे इंतजार किया। किस्मत वालों को सुबह 7 बजे उठा लिया गया, बाकि लोगों को बाद में उठाया गया। जिनकी किस्मत ठीक नहीं थी, वह वहीं खड़े रहे जब तक कि उनकी उम्मीद नहीं टूटी और बाद में अपने घर के ओर गए।हरौला में पीछे छूट गए 32 वर्षीय दिहाड़ी मजदूर, राम कृपाल कहते हैं, "यह यहां की एक दिनचर्या है।" जावेद इब्राहिम कहते हैं, “नोटबंदी ( नवंबर 2016 में भारत की 86 फीसदी मुद्रा अमान्य घोषित ) के बाद, नौकरी पाने से बच जाने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि हुई है। 2,000 से 3,000 दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी, उस साल यहां हर रोज रोज़गार पाते थे, आज उनमें से 1,000 से कम को ही काम मिलता है।”

नोएडा के सेक्टर 5 में हरोला लेबर हब, दिल्ली की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में दिहाड़ी मजदूरी के काम की तलाश करने वालों के लिए एक प्रमुख संपर्क स्थल है।

धूल, धुएं और धुंध के बीच एक दिन के काम मांगने वाले सैकड़ों लोग ऊंची-ऊंची, क्रोम-और कांच की इमारतों और टावरों से घिरी सड़कों पर इक्ट्ठा होते हैं। फटे, सने हुए कपड़े और पसीने से तर-ब-तर शरीर में पुरुष और महिलाएं इंतजार कर रहे होते हैं और अन्य लोग नई कारों में, सूट, चमकदार जूते और ब्रीफकेस के साथ काम के लिए जा रहे होते हैं।

दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर - भारत के 46 मिलियन लोगों के साथ सबसे बड़ा शहरी समूह )में हरोलाऔर अन्य श्रमिक केंद्रों में वे कोई भी काम अपने हाथ ले लेते हैं जिनकी उन्हें पेशकश की जाती है - ईंट भट्टों पर, निर्माण स्थलों पर, घरों में, माल ढोने का काम आदि। श्रम हब में श्रमिकों की संख्या में वृद्धि होने के कारण ये नौकरियां कम हो रही हैं, जैसा कि हम रिपोर्ट में बताएंगे।

पूर्वी दिल्ली के हरौला लेबर हब में श्रमिक कभी-कभी कड़ी धूप में छह घंटे तक इंतजार करते हैं, ताकि काम कराने वाले उन्हें ले जाएं। बदकिस्मत लोगों को सामान बांध घर वापस जाना पड़ता है। औसतन, लगभग 1,000 श्रमिकों को हर दिन रोजगार नहीं मिलता है और वे खाली हाथ घर लौटते हैं।

भारत की राजधानी और इसकी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में नोटबंदी तब आया था, जब बिना लाइसेंस के आवासीय क्षेत्रों में काम करने वाले औद्योगिक केंद्रों को जो पूर्वी दिल्ली को दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक बना रहे थे, बंद किए जा रहे थे। माल और सेवा कर (जीएसटी) के जुलाई 2017 के कार्यान्वयन से स्थिति और बद्तर हुई।

यह 11-आलेखों की श्रृंखला का अंतिम आलेख है (आप यहां पहला आलेख को पढ़ सकते हैं, दूसरा यहां, तीसरा यहां, चौथायहां, पांचवा यहां, छठा यहां,सातवां यहां, आठवां यहां और नौवां और दसवां यहां), जो भारत के अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार पर नजर रखने के लिए, राष्ट्रीय स्तर पर श्रम केंद्रों से रिपोर्ट की गई है ( ऐसी जगह, जहां अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिक अनुबंध की नौकरी पाने के लिए इकट्ठा होते हैं।) अनौपचारिक क्षेत्र देश के निरक्षर, अर्ध-शिक्षित और योग्य-लेकिन-बेरोजगार लोगों के बड़े पैमाने पर रोजगार देता है, भारत के 52.7 करोड़ कार्यबल में से 92 फीसदी को रोजगार देता है, जैसा कि सरकारी आंकड़ों के आधार पर 2016 के अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अध्ययन से पता चलता है।

अनौपचारिक श्रमिकों के जीवन और आशाओं को ध्यान में रखते हुए, यह श्रृंखला नोटबंदी और जीएसटी के बाद नौकरी के नुकसान के बारे में चल रहे राष्ट्रीय विवादों को एक कथित परिप्रेक्ष्य प्रदान करती है। अखिल भारतीय निर्माता संगठन के एक सर्वेक्षण के अनुसार,जिसकी 300,000 सदस्य-इकाइयों में से 34,700 लोगों ने मतदान किया, पिछले चार वर्षों से 2018 तक, नौकरियों की संख्या में एक-तिहाई की गिरावट हुई है।

कंसल्टेंसी सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों के मुताबिक, 2018 में अकेले 1.1 करोड़ नौकरियां खो गईं। नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) के तहत पिडियोडिक लेबर फोर्स सर्वे द्वारा जारी किए गए नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2017-18 की बेरोजगारी दर 6.1 फीसदी है, जो कि 45 साल में सबसे ज्यादा है। इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि असंगठित क्षेत्र में 71.1 फीसदी वेतनभोगी श्रमिकों ( कृषि क्षेत्र को छोड़कर ) के पास कोई आधिकारिक या लिखित नौकरी अनुबंध नहीं है।

‘अच्छे दिनों ’ का अंत

खुले बटन की हाफ शर्ट और मुड़े पेंट पहले 39 वर्षीय राजू प्रजाप्रति ने उन अच्छे दिनों को याद किया जब वह पूर्वी दिल्ली के गोकलपुरी में अपनी पत्नी, बच्चों और माता-पिता के साथ रहता था।

 

पढ़ाई में रुचि न होने के कारण राजू ने नौंवी कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी और 2008 तक कई तरह की नौकरियां करते रहे। दैनिक निर्माण कार्य पाने के लिए उन्होंने उत्तर में लगभग 28 किमी दूर - हरोला और बरारी के श्रम हब तक लगातार आना शुरु कर दिया। उन्होंने महीने में लगभग 25 दिन काम पाया, हर महीने लगभग 12,000 रुपये कमाए, जो भोजन और रहने के लिए पर्याप्त था।

8 नवंबर 2016 को, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 रुपये और 1,000 रुपये के नोटों की वैधता को रद्द करने का फैसला किया, तो प्रजापति जैसे लोगों के लिए सब कुछ बदल गया।

राजू ने कहा कि उन्होंने एक निर्माण स्थल पर नोटबंदी के सात महीने बाद ही काम पाया।

अपने बेटे की ही तरह निर्माण श्रमिक, 67 वर्षीय गणेश प्रजापति ने कहा ने कहा, "नोटबंदी हमारे लिए एक काला दिन था। केवल हम ही जानते हैं कि उन दिनों हम कैसे जीवित रहे हैं।" 

गणेश की आय 12,000-15,000 रुपये से लगभग 8,000 रुपये हो गई है। राजू ने कहा कि वह प्रति माह 6,000 -7,000 रुपये कमाने और महीने में लगभग 16 दिन काम करने के लिए संघर्ष करता है।

नौकरी का संकट बढ़ने के कारण, राजू ने जुलाई 2017 में अपने परिवार को गोकलपुरी में छोड़ दिया और हरोला गांव के अंदरूनी हिस्सों में चले गए, ताकि वे लेबर हब के करीब रह सके।

वह एक साथी के साथ एक बदबूदार, साझा कमरे में रहते हैं और उसे हर दिन पीने का पानी लाने के लिए 1.5 किमी की यात्रा करनी पड़ती है। अन्य किरायेदारों की तरह, उन्हें भी समय पर 1,100 रुपये के मासिक किराए का भुगतान करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, इसलिए मकान मालिक रामशकील से रहने की स्थिति के बारे में शिकायत करने की हिम्मत नहीं होती। 

राजू की पत्नी एनसीआर के भीतर अपने माता-पिता के घर वापस चली गई है और अब वह महीने में केवल एक बार उससे मिलने जाता है।

नोटबंदी से पहले, राजू हर महीने 3,000 रुपये तक बचा सकता था। अब, वह कुछ भी नहीं बचाता है।

हमने एनसीआर के अन्य श्रम केंद्रों में प्रजापति की कहानी के विभिन्न संस्करण देखे। हर जगह अलग-अलग परिस्थितियों के साथ कोई न कोई प्रजापति दिखे।

अलग-अलग लेबर हब, वही कहर

दिल्ली का 17 वीं शताब्दी का चांदनी चौक शहर के सबसे व्यस्त बाजारों में से एक है। इसकी गलियों में हर दिन 5 लाख लोग आते हैं और इसकी संकरी गलियां छोटी-छोटी औद्योगिक इकाइयों और थोक बाजारों से भरी हुई हैं।

नोटबंदी के बाद, चांदनी चौक के व्यवसाय ने अपने कारोबार का लगभग 70 फीसदी खो दिया है, जैसा कि बिजनेस स्टैंडर्ड ने मई 2019 की रिपोर्ट में बताया है।

इन लघु उद्योगों और बाजारों में से अधिकांश ने अनौपचारिक अनुबंधों पर श्रमिकों को नियोजित किया था, और जब अर्थव्यवस्था में गिरावट आई, तो ये श्रमिक सड़कों पर उन लोगों से जुड़ गए, जो पहले से ही बड़ी संख्या में थे।

दिल्ली के सबसे बड़े श्रमिक केंद्रों में से एक और चांदनी चौक क्षेत्र का एक हिस्सा, चावड़ी बाजार में एक दिहाड़ी मजदूर, 29 साल के जाकिर मलिक ने कहा, "मजदूरों में असुरक्षा और चिंता की भावना है। मजदूरी का काम यहां और अन्य श्रमिक केन्द्रों जैसे बुड़ारी और महिपालपुर में दिन-प्रतिदिन कम हो रहा है।"

दक्षिणी दिल्ली में महिपालपुर लेबर हब ( शहर के सबसे समृद्ध क्षेत्रों में से एक ) संकीर्ण सड़कों, अराजक यातायात, टूटे फुटपाथ और अस्वीकृत श्रमिकों से पहचाना जा सकता है।

नोटबंदी के बाद, महिपालपुर श्रम केंद्र में भीड़ कम हो गई, क्योंकि श्रमिक या तो अपने मूल क्षेत्रों में वापस चले गए या नोएडा जैसे क्षेत्रों में चले गए ।

महिपालपुर लेबर हब अब मुख्य रूप से रिक्शा चालकों के लिए एक पार्किंग क्षेत्र है। एक पूर्व श्रमिक ठेकेदार 46 वर्षीय सुभाष चंद मिश्रा ने कहा, "दिल्ली में तीन प्रमुख श्रमिक केंद्र थे: महिपालपुर, चावड़ी बाजार और बुराड़ी।वर्तमान में, ये सभी रिक्शा चालकों के स्टैंड के रूप में काम करते हैं।"

30 साल का सोनू कुमार दिहाड़ी मजदूर था, लेकिन नौकरी के इंतजार और मजदूर ठेकेदारों पर आश्रित रहते-रहते थक गया।

वह अब दक्षिणी दिल्ली के महिपालपुर लेबर हब में एक साइकिल-रिक्शा चालक है। नौकरियों में कमी के साथ, क्षेत्र साइकिल रिक्शा के लिए एक पार्किंग क्षेत्र बन गया है।

मंदी ने न केवल मजदूरों बल्कि ठेकेदारों को भी प्रभावित किया है। मिश्रा ने कहा, "सच कहूं तो दिल्ली-एनसीआर में एक लेबर-कॉन्ट्रैक्टिंग की नौकरी वाकई ठीक थी। लेकिन नोटबंदी के बाद, मजदूर और लेबर कॉन्ट्रैक्टर्स, दोनों बर्बाद हो गए हैं। "

आज, महिपालपुर लेबर हब पर, सुबह 7 से 10 बजे के बीच मजदूरों को ढूंढना दुर्लभ है।"अब, हर कोई नोएडा की ओर देखता है।" हालांकि आवासीय-और कार्यालय-टॉवर निर्माण स्थलों के लिए, जैसा कि हमने पहले कहा था, पर्याप्त काम नहीं हैं।

मिश्रा की कहानी से पता चलता है कि कैसे नोटबंदी के बाद भी सापेक्ष समृद्धि कम हो गई और अब तक वापस नहीं लौटी है।

उत्तर प्रदेश में अपने गृह शहर लखनऊ में ग्रैजुएशन की डिग्री प्राप्त करने के बाद, मिश्रा ने एक किराने की दुकान शुरू की थी, लेकिन बाद में इसे बंद कर दिया। बेहतर संभावनाओं की उम्मीद में उन्होंने 2007 में दिल्ली में एक श्रमिक ठेकेदार का काम शुरु किया।

मिश्रा ने दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों के बड़े समूहों को श्रमिक केंद्रों से काम पर रखा और उन्हें दक्षिणी दिल्ली के ओखला औद्योगिक क्षेत्र में नौकरी पर भेजा। नोटबंदी से पहले, मिश्रा ने हर महीने 30,000 रुपये से 40,000 रुपये कमाए और उत्तरी दिल्ली के आदर्श नगर में एक फ्लैट किराए पर लिया, जहां वह अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रहते थे।

अब, मिश्रा दक्षिणी दिल्ली में संगम विहार के पास एक कमरे में रहते हैं, अपने फ्लैट से बाहर निकलने के बाद वे एक बार इकट्ठा हुए मजदूरों को पर्याप्त काम नहीं दे पाए। वह अब उबर ड्राइवर हैं और प्रति माह लगभग 40,000 रुपये कमाते हैं। लेकिन खर्च बढ़ता गया और मिश्रा का परिवार पैसे बचाने के लिए वापस लखनऊ चला गया।

मिश्रा की तरह, श्रृंखला में शामिल अन्य लोगों ने आगे बढ़ने की कोशिश की, जैसे कि 30 वर्षीय सोनू कुमार, बिहार का एक प्रवासी जो हर दिन एक श्रम हब की प्रतीक्षा करने और एक ठेकेदार के अधीन रहने की तुलना में रिक्शा चलाने को एक बेहतर नौकरी समझता है।

मिश्रा और कुमार की नौकरी की कम संभावनाएं, उन मुश्किलों का प्रतिबिंब है जो दिल्ली के औद्योगिक क्षेत्रों में न केवल नोटबंदी के बाद आईं बल्कि जीएसटी और कोर्ट के रिहायशी इलाकों और प्रदूषण का कारण बनने वाले व्यवसायों को बंद करने का आदेश के बाद भी आई है।

जीएसटी, सीलिंग, प्रदूषण

पश्चिमी दिल्ली में मायापुरी चरण- II, छोटे व्यापारियों, सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए भारत का सबसे बड़ा लौह-व्यापारिक केंद्र है, जिसमें स्क्रैप डीलर से लेकर वाहन कार्यशालाएं हैं, जहां अकुशल और कुशल श्रमिक काम खोजने आते हैं।

जबकि विमुद्रीकरण के कारण कई लघु उद्योग बंद हो गए और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक बेरोजगार हो गए, जीएसटी ने वित्तीय तनाव को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

एक लोहे के व्यापारी 52 वर्षीय जतिन शर्मा ने कहा, "जीएसटी की फाइलिंग प्रणाली बहुत जटिल है, इसमें ड्रॉप-डाउन मेनू, इनवॉइस अपलोड, खरीद को अपलोड करने और कई अन्य कार्य शामिल हैं।" “ये सभी गतिविधियाँ छोटे व्यापारियों के समय और धन को प्रभावित करती हैं। हम इन सभी चीजों की देखभाल करने के लिए पेशेवरों का खर्च नहीं उठा सकते हैं।”

मायापुरी इंडस्ट्रियल वेलफेयर एसोसिएशन के कार्यकारी समिति के सदस्य 46 वर्षीय दिनेश माकोल ने बताया कि नई दिल्ली में कई लघु उद्योग मालिकों ने अपने व्यवसाय को चलाने के लिए व्यक्तिगत बचत का निवेश किया था। माकोल ने कहा कि नोटबंदी और जीएसटी ने लोहे के वितरण को रोक दिया, मालिकों का जीवन बर्बाद हो गया और सैकड़ों नौकरियां चली गईं।

जीएसटी के तहत व्यापार और करों से नकदी लेन-देन की समाप्ति 2 फीसदी से बढ़कर 18 फीसदी हो गई।

मायापुरी के एक विक्रेता 29 वर्षीय गणेश तंवर ने कहा, "मायापुरी में महीनों से लोहे की बड़ी कमी हो गई थी और सभी इकाइयों ने कुछ समय के लिए काम करना बंद कर दिया था।" मकोल ने कहा, "कई ने स्थाई रूप से काम बंद कर दिया है।"

37 वर्षीय ऋषभ शाह ने कहा कि बाजार लगभग तीन महीने से बंद था और मजदूर अपने मूल स्थानों पर वापस चले गए।

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति द्वारा संचालित आवासीय क्षेत्रों में अनधिकृत व्यवसायों को बंद करने के दिल्ली सरकार के अभियान से स्थिति बदतर हो गई थी। 31 जनवरी, 2017 तक, दुकानों, रेस्तरां, बार और बेकरी सहित कम से कम 10,533 वाणिज्यिक इकाइयां बंद कर दी गईं।

2016 में, नोटबंदी से पहले, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने प्रदूषण को रोकने के लिए पूर्वी दिल्ली में अनधिकृत औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का आदेश दिया। इसके आधार पर, दिल्ली राज्य औद्योगिक और अवसंरचना विकास निगम ने 51,837 इकाइयों की पहचान की, जिन्हें स्थानांतरित या बंद करने की आवश्यकता थी। सबसे बड़ा प्रभाव अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक पर पड़ा। इन औद्योगिक इकाइयों में काम करते समय जहरीले वायु प्रदूषकों के संपर्क में आने का खतरा जरूर था, लेकिन उनकी मासिक आय स्थिर थी।

 सीलिंग ड्राइव से सबसे अधिक प्रभावित मायापुरी थी और 2018 में कई बार व्यापारियों ने विरोध में सड़कों पर उतरे। अप्रैल 2019 में एक संवाददाता सम्मेलन में, आम आदमी पार्टी (आप) के व्यापार विंग के प्रमुख बृजेश गोयल ने व्यापारियों को आश्वासन दिया कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उनके सीलिंग आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की योजना बनाई है।

इस बीच, मायापुरी की सड़कों पर, श्रमिक अपने दिन ताश खेलने में बिताते हैं, कारखाने के मालिकों द्वार काम के लिए उठाए जाने की प्रतीक्षा करते हैं।

नोटबंदी से पहले के बद्तर दिन

कुछ मजदूरों से जिनसे हमने बात की, हमने अपेक्षा की थी कि वे सरकार से रोज़गार प्रदान की बात करेगें, लेकिन उन्होंने वेटिंग शेड, पीने के पानी की सुविधा और एक मजदूर संघ की इच्छा व्यक्त की, जो दिल्ली के न्यूनतम वेतन के लिए संघर्ष कर सके: अकुशल श्रम के लिए 399 रुपये और कुशल श्रम के लिए 485 रुपये।

2016 में लगभग 13 लाख बेरोजगार लोगों के साथ, दिल्ली के बेरोजगारी दर में 2015 से 6 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई है, जैसा कि दिल्ली के आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 नवीनतम उपलब्ध स्थानीय डेटा, से पता चलता है।

नोटबंदी, जीएसटी, सीलिंग और प्रदूषण-विरोधी उपायों ने नौकरी पाने की संभावनाओं को बिगाड़ दिया, लेकिन विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसे अवसर पहले से ही एक उचित शिक्षा के बिना उन लोगों के लिए दुर्लभ थे।

एक संस्था, सेंटर फॉर एजुकेशन एंड कम्युनिकेशन के जे.जॉन ने कहा, "लोगों के भीतर एक धारणा है कि दिल्ली में मजदूरों के लिए कई अवसर हैं। हालांकि, यह वास्तविक परिदृश्य नहीं है। नोटबंदी से पहले, यह औसत था और नोटबंदी के बाद यह बदतर हो गया था।"

ईंट-भट्ठा कार्यकर्ता और बिहार से प्रवासी, 29 वर्षीय, पार्वती कुमारी, ने कहा कि पिछले पांच वर्षों में एनसीआर में मजदूरों के लिए "कुछ भी नहीं बदला है"। 10 कक्षा ड्रॉपआउट, वह अपने पति, जो एक कैब ड्राइवर है, के साथ रहती है और दिन के लिए काम पाने के लिए निश्चित नहीं है। नोटबंदी के बाद से उसकी आय 8,000 रुपये से घटकर 7,000 रुपये हो गई है।

उन्होंने कहा, "हम पर्याप्त भोजन के लिए संघर्ष करते थे और हम अभी भी संघर्ष कर रहे हैं।"

हालांकि, बेरोजगारी पर नज़र रखना भारत की राजधानी में मुश्किल है क्योंकि डेटा अविश्वसनीय प्रतीत होता है। 

दिल्ली का डेटा

दिल्ली के श्रमिक केंद्रों और औद्योगिक क्षेत्रों की स्थिति से, यह स्पष्ट है कि दैनिक मजदूरी श्रमिकों के बीच बेरोजगारी व्यापक है।

उदाहरण के लिए, नोटबंदी के बाद, संगम विहार के कपड़ा कारखानों में सैकड़ों खोए हुए रोजगार और व्यवसाय बंद हो गए, जिन्हें एशिया के सबसे बड़े अनधिकृत पड़ोस में से एक माना जाता है, जैसा कि जॉन ने कहा। 10 लाख से अधिक घर, संगम विहार के लोग ज्यादातर गरीब प्रवासी हैं।

उन्होंने कहा, कि बाकी दिल्ली में, खोई और प्राप्त की गई नौकरियों पर नजर रखना मुश्किल है क्योंकि कोई स्पष्ट डेटा नहीं है।

2016 में, दिल्ली की औसत बेरोजगारी दर 10.31 फीसदी थी, जो मई 2016 में, नोटबंदी से पहले 17.3 फीसदी तक थी - जैसा कि सीएमआईई के बेरोजगारी आंकड़ों से पता चलता है।

बेरोजगारी जून 2017 से अप्रैल 2018 के बीच 3.6 फीसदी के औसत पर सबसे कम थी, जो फरवरी 2018 में घटकर 1.6 फीसदी रह गई। मई 2018 में बेरोजगारी दर बढ़कर 8.8 फीसदी हो गई और तब से बढ़ी हुई है। 2019 के पहले चार महीनों में बेरोजगारी की दर औसतन 11.32 फीसदी रही है। 

विशेषज्ञों ने कहा कि इनका विश्लेषण करना कठिन है, क्योंकि रोजगार धीरे-धीरे बढ़ता है और धीरे-धीरे गिरता है।

दिल्ली स्थित सामाजिक-प्रभाव सलाहकार, उत्कर्ष भारद्वाज ने कहा,"जबकि बेरोजगारी के आंकड़े चिंता का विषय हैं और आगे के विश्लेषण की आवश्यकता है, यह उजागर करना महत्वपूर्ण है कि वास्तविक समय की बेरोजगारी के आंकड़ों पर कब्जा करने के लिए एक स्वतंत्र और वैश्विक रूप से गठबंधन प्रणाली की आवश्यकता है।"

विश्वसनीय आंकड़ों और एक रणनीति के बिना, बेरोजगारी और बेरोजगारी कार्यक्रमों के लिए सरकारी समाज-कल्याण कार्यक्रम अंधेरे में उठाए गए कदम प्रतीत होते हैं।

भारद्वाज ने कहा, “जबकि दिल्ली सरकार और पीएमकेवीवाई (प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना) द्वारा शुरू किए गए कौशल मिशन, केंद्र सरकार द्वारा शुरू किए गए कुछ प्रचलित मुद्दों को संबोधित करने के लिए उल्लेखनीय प्रयास हैं, उन्हें मौजूदा वित्तीय आदान-प्रदान पर ध्यान केंद्रित करने और उन्हें विकसित करने की आवश्यकता है कौशल, रोजगार और बाजार में उपलब्ध अवसरों पर वास्तविक समय के आंकड़ों को इकट्ठा करने और बनाए रखने के लिए वन-स्टॉप प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि रोजगार की तलाश करने वालों के लिए व्यवहार्य नौकरी के विकल्प पेश करने के लिए शिक्षा और उद्योगों के साथ सहयोग करते हैं।”

रोजगार के अवसर केवल तभी बेहतर हो सकते हैं, जब व्यवसाय चलाना आसान हो, जो कि वर्तमान में दिल्ली में नहीं दिखता है।

व्यापार करना मुश्किल

मार्च 2019 में, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भारतीय राज्यों में व्यापार करने में आसानी पर डेटा जारी किया। पिछले तीन वर्षों में रैंकिंग के आधार पर, दिल्ली सबसे नीचे है, 2015 में 15 वें स्थान से गिरकर 2017 में 23 वें स्थान पर पर आया है। (आंध्र प्रदेश शीर्ष स्थान पर, तेलंगाना दूसरे और दिल्ली के पड़ोसी, हरियाणा तीसरे स्थान पर है)।

चमड़े के सामान बनाने वाली कंपनी, वी एंड एम एक्सपोर्ट्स के प्रोपराइटर सुमन चावला ने कहा, "औद्योगिक भूमि की बहुत अधिक लागत युवा उद्यमियों को शुरुआती निवेश करने और दिल्ली-एनसीआर के एमएसएमई (सूक्ष्म, मध्यम और छोटे उद्यमों) बाजार में बने रहने के लिए असंभव बना देती है।"

रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन के अनुसार, भूमि की 15-20 फीसदी तक महंगा होने की संभावना है लेकिन भले ही ऐसा नहीं हो, कुशल श्रमिकों की कमी एक समस्या है जो दृश्यमान बेरोजगारी और कई सरकारी कार्यक्रमों के बीच जारी है।

उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय कौशल विकास एजेंसी, राष्ट्रीय कौशल विकास निगम और प्रशिक्षण महानिदेशालय के प्रयासों को समन्वित करने के लिए जुलाई 2015 में राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन शुरू किया गया था, लेकिन श्रम केंद्रों में, श्रमिकों ने हमें बताया कि वे नौकरी-प्रशिक्षण कार्यक्रमों से अनजान थे और उन्होंने कभी किसी के लिए पंजीकरण नहीं किया था।

राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन के तहत, प्रधान मंत्री कौशल विकास योजना 2016 में शुरू की गई, जिसमें 12,000 करोड़ रुपये के बजट के साथ, 2020 तक लगभग 1 करोड़ ऐसे लोग जिन्होंने स्कूल-कॉलेज छोड़ दिया या बेरोजगारों को सॉफ्ट स्किल, उद्यमिता और वित्तीय और डिजिटल साक्षरता का मुफ्त प्रशिक्षण देने का वादा किया गया। हालांकि, जनवरी 2019 तक उस लक्ष्य का एक तिहाई से अधिक हासिल नहीं किया गया था, जैसा कि अल जज़ीरा की मई 2019 की रिपोर्ट में बताया गया है।

क्या हैं कल्याणकारी योजनाएं?

फरवरी 2019 के अंतरिम बजट के दौरान, मोदी सरकार ने असंगठित-क्षेत्र के श्रमिकों के लिए एक कार्यक्रम पेश किया, जिसे प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन कहा जाता है, जो उन श्रमिकों को, 60 साल की हो जाने के बाद प्रति माह 15,000 रुपये से कम मासिक पेंशन प्राप्त करने की अनुमति देता है।

पंजीकरण के पात्र लोगों में स्ट्रीट वेंडर, लोडर, ईंट-भट्ठा मजदूर, भूमिहीन मजदूर और 18 से 40 वर्ष की आयु के घरेलू श्रमिक हैं।कार्यक्रम की वेबसाइट के अनुसार, योजना के शुभारंभ के बाद से, 26 मई, 2019 तक 5,966 श्रमिकों ने दिल्ली में पंजीकरण किया।

2017-18 के एनएसएसओ सर्वेक्षण में कहा गया है कि असंगठित क्षेत्र में नियमित वेतन वाले श्रमिकों में ( कृषि क्षेत्र को छोड़कर ) 54.2 फीसदी पेडलीव के लिए पात्र नहीं थे, जबकि 49.6 फीसदी किसी भी सामाजिक सुरक्षा लाभ के लिए पात्र नहीं थे।

52 वर्षीय सुरेश कोली एक सरकारी पेंशन कार्यक्रम के लिए पात्र हैं, लेकिन उनका कहना है कि उन्हें ऐसी किसी भी योजना की जानकारी नहीं है। हमने जिन श्रमिकों से बात की उनमें से लगभग किसी के पास ऐसी जानकारी नहीं थी।

जिस भी कार्यकर्ता से हमने बात की, उसे किसी भी सरकारी कार्यक्रम की जानकारी नहीं थी। 52 वर्षीय, सुरेश कोली, जो पेशे से एक बढ़ई हैं, ने कहा " मैंने इसके बारे में कभी नहीं सुना। मुझे पता है कि मुझे रात में भोजन करने के लिए हर दिन एक लड़ाई लड़ने की जरूरत है।"

आम सहमति: सरकारी कार्यक्रम उन अधिकारियों के लिए हैं, जो उन्हें चलाते हैं। दिल्ली के सत्तारूढ़ आप ने जनवरी 2019 में असंगठित क्षेत्र से वोट मांगने के लिए आठ श्रमिक संगठन बनाए हैं।

इन श्रमिक संगठनों का उद्देश्य परिवहन, जल, थोक बाजार, निर्माण, स्वास्थ्य, रेलवे और बिजली बोर्डों में श्रमिकों को शामिल करना था। लगभग सभी मजदूरों से, जिनसे हमने संगम विहार या महिपालपुर में बात की, उन्होनें इन श्रम निकायों के बारे में सुना था और सरकार पर संदेह व्यक्त किया था।

महिपालपुर के एक निर्माण श्रमिक 43 वर्षीय अरुण झा ने अपने 14 वर्षों में उन्होंने कभी भी मजदूरों के लिए एक संगठन के बारे में नहीं सुना था। आप के प्रयास के बारे में बताने पर उन्होंने कहा: "यह सिर्फ चुनावों के लिए है, और कुछ नहीं।"

आखिर में जब हरोला में राजू से हमने भारतीय जनता पार्टी की नई सरकार से अपेक्षाओं के बारे में पूछा, तो उसने मोदी के 2014 के बेहतर दिनों के वादे का जिक्र किया और कहा: “हम अच्छे दिन तलाश में हैं। "

यह 11 आलेखों की श्रृंखला में से यह 1ावां आलेख है। यहां इंदौर, जयपुर, केरल, अहमदाबाद, कोलकाता, लखनऊ, बेंगलुरु,बठिंडा और हरियाणा , पुणे से पिछले आलेख पढ़ें। 

(तिवारी दिल्ली के एक फ्रीलांस लेखक और 101Reporters.com के सदस्य हैं, जो जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों का एक अखिल भारतीय नेटवर्क है।)

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 10 जुलाई 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।