भारत के सबसे गरीब राज्यों में स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रदर्शन में सबसे बड़ी गिरावट: नीति इंडेक्स

नई दिल्ली: भारत के 21 बड़े राज्यों में से नौ ने अपने स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रदर्शन में गिरावट देखी है और इनमें से पांच देश के सबसे गरीब राज्य में से हैं। यह जानकारी एक नई रिपोर्ट में सामने आई है। बिहार में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई, जबकि हरियाणा में सबसे ज्यादा सुधार हुआ है।

ये निष्कर्ष सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग द्वारा 25 जून, 2019 को जारी किए गए हेल्दी स्टेट प्रोग्रेसिव इंडिया रिपोर्ट के दूसरे संस्करण से थे, जिसमें 2015-16 और 2017-18 के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र में राज्यों के प्रदर्शन की तुलना की गई थी। नीति आयोग ने लिखा है, रिपोर्ट "बहु-आयामी हस्तक्षेप करने के लिए राज्यों को प्रेरित करने के लिए एक वार्षिक व्यवस्थित उपकरण है, जो बेहतर स्वास्थ्य परिणाम लाएगा।"

रिपोर्ट में तीन श्रेणियों के तहत आने वाले 23 स्वास्थ्य संकेतकों के आधार पर प्रत्येक राज्य के लिए एक स्वास्थ्य सूचकांक प्राप्त किया गया है: स्वास्थ्य परिणाम, शासन और सूचना, और प्रमुख इनपुट और प्रक्रियाएं।

‘स्वास्थ्य परिणामों’ में नवजात और कम उम्र की मृत्यु दर, संस्थागत प्रसव, जन्म के समय लिंग अनुपात जैसे संकेतक शामिल थे। ‘शासन और सूचना ’ में डेटा अखंडता माप शामिल है यानी कि राज्य और जिला स्तर पर प्रमुख पदों पर अधिकारियों के दखल, सर्वेक्षण डेटा के साथ रिपोर्ट किए गए डेटा का प्रतिशत विचलन। जबकि ‘प्रमुख इनपुट और प्रक्रिया’ में खाली स्वास्थ्य सेवा प्रदाता पदों का अनुपात और आईटी-सक्षम मानव संसाधन प्रबंधन प्रणालियों के अनुपात को देखा गया है।

केरल का सर्वश्रेष्ठ सूचकांक स्कोर (74.01) था, इसके बाद आंध्र प्रदेश (65.13) और महाराष्ट्र (63.99) का स्थान रहा। उत्तर प्रदेश का सबसे कम (28.61), उसके बाद बिहार (32.11) और ओडिशा (35.97) का स्थान रहा।

सात राज्यों में स्कोर में सुधार देखा गया, जबकि नौ राज्यों में गिरावट देखी गई। इनमें से पांच - बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा और मध्य प्रदेश - जैसा कि हमने कहा, भारत के सबसे गरीब राज्यों में से हैं। राजस्थान, झारखंड और छत्तीसगढ़ के साथ, जिन्होंने अपने स्वास्थ्य सूचकांक के अंकों में सुधार किया, ये राज्य एम्पावर्ड एक्शन ग्रूप (ईएजी) बनाते हैं।

2017-18 में हरियाणा ने अपने सूचकांक में सबसे अधिक सुधार देखा, जबकि बिहार में सबसे अधिक गिरावट देखी गई।

आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र ने रैंकिंग में सबसे अधिक सुधार देखा, क्रमशः छठे और चौथे स्थान पर, जबकि तमिलनाडु में सबसे अधिक गिरावट देखी गई, तीसरे स्थान से 2017-18 में नौवें स्थान पर गिर गया।

2015-16 और 2017-18 के बड़े राज्यों की स्वास्थ्य इंडेक्स रैंकिंग

Source: NITI Aayog

आठ छोटे राज्यों में, मिजोरम पहले (73.70) जबकि नागालैंड अंतिम (37.38) स्थान पर था। त्रिपुरा और मणिपुर ने स्वास्थ्य स्कोर में सबसे अधिक सुधार दिखाया। आठ छोटे राज्यों में से चार में समग्र स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रदर्शन में गिरावट देखी गई।

केंद्र शासित प्रदेशों में, चंडीगढ़ ने समग्र प्रदर्शन (63.62) में पहला स्थान प्राप्त किया, जबकि दमन और दीव ने सबसे खराब (41.66) प्रदर्शन किया। दादर और नगर हवेली में सबसे अधिक सुधार देखा गया।

क्यों ईएजी राज्यों का लड़खड़ाना जारी है

आठ ईएजी राज्यों में से पांच में, जैसा कि हमने कहा था, आधार वर्ष 2015-16 की तुलना में 2017-18 में उनके समग्र स्वास्थ्य सूचकांक स्कोर में गिरावट देखी गई है। बिहार में सबसे ज्यादा गिरावट (-6.35) देखी गई है, उसके बाद उत्तर प्रदेश (-5.08), उत्तराखंड (-5.02), ओडिशा (-3.46) और मध्य प्रदेश (-1.70) का स्थान रहा है।

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार सभी तीन श्रेणियों के तहत, 2015-16 की तुलना में 2017-18 में संकेतकों में खराब प्रदर्शन के कारण बिहार के प्रदर्शन में गिरावट आई थी। राज्य की कुल प्रजनन दर ( एक महिला से जन्म लेने वाले बच्चों की औसत संख्या ) 2015-16 में 3.2 से बढ़कर 2017-18 में 3.3 हो गई। जन्म के समय कम वजन का प्रसार 2015-16 में 7.2 फीसदी से बढ़कर 2017-18 में 9.2 फीसदी हो गया। जन्म के समय इसका लिंग अनुपात 2015-16 में प्रति 1,000 पुरुषों पर 916 महिलाओं की तुलना में घटकर 2017-18 में 908 हो गया और 2017-18 में इसका तपेदिक उपचार सफलता दर 71.9 फीसदी था, यानी 2015-16 में 89.7 फीसदी के आंकड़ों से नीचे।

बिहार ने 2017-18 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के धन को राज्य के खजाने से विभागों या समाजों को हस्तांतरित करने में भी 191 दिन का समय लिया, जबकि 2014-15 में 40 दिनों का समय लिया गया था। 

बिहार में, 2017-18 में गुणवत्ता मान्यता प्रमाण पत्र के साथ एक भी जिला या उप जिला अस्पताल नहीं है, यह 2015-16 से 27.16 प्रतिशत अंकों की गिरावट है।

उत्तर प्रदेश में गिरावट का कारण जन्म के समय कम वजन का उच्च प्रसार, कम टीबी उपचार सफलता दर, राज्य और जिला स्तर (18.98 महीने) पर प्रमुख पदों का खराब औसत कार्यकाल, और कम जन्म पंजीकरण (60.7 फीसदी) है। टीबी के उपचार की सफलता दर 87.5 फीसदी से 64 फीसदी तक गिर गई, जबकि जन्म के समय बच्चों के कम वजन का प्रतिशत 9.6 फीसदी से बढ़कर 11.8 फीसदी हो गया। जन्म पंजीकरण 68.3 फीसदी से गिरकर 60.7 फीसदी हो गया है।

स्वास्थ्य इंडेक्स परिवर्तन और बड़े भारतीय राज्यों के लिए रैंक, 2017-18

Source: NITI Aayog

उत्तराखंड में, नवजात शिशुओं और पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों के बीच उच्च मृत्यु दर, जिला स्तरों पर प्रमुख प्रशासनिक पदों की कम स्थिरता,प्रति वर्ष सी-वर्गों की निर्दिष्ट संख्या का प्रदर्शन करने वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की कार्यक्षमता में 30 प्रतिशत की कमी और एनएचएम फंड ट्रांसफर में देरी स्वास्थ्य प्रदर्शन में गिरावट का कारण रहे हैं। राज्य की नवजात मृत्यु दर प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 28 मौतों से बढ़कर 30 हो गई, और पांच साल से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर 38 से बढ़कर 41 हो गई है।

जबकि पांच-वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर और नवजात मृत्यु दर के ‘तत्काल परिणामों’ में सुधार हुआ है, ईएजी राज्यों (उत्तराखंड को छोड़कर) में, अधिकांश ‘मध्यवर्ती परिणाम’ जैसे पूर्ण टीकाकरण कवरेज, संस्थागत प्रसव और टीबी उपचार सफलता दर नहीं है और ‘महत्वपूर्ण सुधार’ की आवश्यकता है, जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है।

राजस्थान, झारखंड और छत्तीसगढ़ में सुधार के सूत्र

ईएजी राज्यों में, राजस्थान (+6.30), झारखंड (+5.99) और छत्तीसगढ़ (+1.34) ने अपने सूचकांक अंकों में सुधार देखा है। राजस्थान की नवजात मृत्यु दर प्रति 1,000 जन्मों पर 30 मौतों से घटकर 28 हो गई; इसकी अंडर-फाइव मृत्यु दर 50 से घटकर 45 हो गई। इसने जन्म के समय कम वजन को 25.5 फीसदी से 14 फीसदी तक कम कर दिया, और डिवीजनल अस्पतालों में विशेषज्ञ पदों पर वैकेंसी को 47.7 फीसदी से 18.4 फीसदी तक कम किया।

झारखंड ने 2015-16 से 2017-18 तक स्वास्थ्य परिणामों में समग्र सुधार दिखाया: नवजात मृत्यु दर (23 से 21 तक), पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर (39 से 33), कुल प्रजनन दर (2.7 से 2.6), जन्म के समय लिंग अनुपात (प्रति 1,000 लड़कों पर 902 से 918 लड़कियां), पूर्ण टीकाकरण (88.1 फीसदी से 100 फीसदी), संस्थागत प्रसव (67.4 फीसदी से 88.2 फीसदी) और टीबी के उपचार की सफलता दर (90.9 फीसदी से 91.7 फीसदी)।

छत्तीसगढ़ का सुधार ‘प्रमुख प्रक्रियाओं’ पर बेहतर प्रदर्शन के कारण था: इसने 24 घंटे के कार्यात्मक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को 40.3 फीसदी से 111.3 फीसदी (यानी लक्षित संख्या से अधिक), पहले त्रैमासिक प्रसवपूर्व पंजीकरण 74.6 फीसदी से 89.4 फीसदी और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र 47.7 फीसदी से 67 फीसदी सुधार किया।

आगे की पंक्ति के राज्यों के प्रदर्शन में भी गिरावट

उच्च रैंकिंग वाले राज्यों, जिन्हें "फ्रंट-रनर" कहा जाता है ( शीर्ष एक तिहाई में स्कोरिंग ) ने भी उनके प्रदर्शन में गिरावट दिखाई। इनमें से, तमिलनाडु (-2.99) में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई, इसके बाद केरल (-2.55) और पंजाब (-2.20) है।

नई दिल्ली में रिपोर्ट लॉन्च करने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान नीति आयोग के सदस्य, वीके पॉल कहते हैं, "जो राज्य पहले से ही अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे, उनमें इतना बड़ा बदलाव नहीं दिखा, जबकि जो पहले खराब प्रदर्शन वाले थे और जिनमें सुधार की गुंजाइश ज्यादा थी, उनमें सुधार देखा गया है।" 

आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र एकमात्र दो राज्य थे जो समग्र प्रदर्शन के साथ-साथ प्रदर्शन में सुधार के मामले में शीर्ष एक तिहाई राज्यों में से थे। बड़े राज्यों में, आंध्र प्रदेश के संकेतक (63 फीसदी) का उच्चतम अनुपात था जो ‘सबसे बेहतर’ या ‘सुधार’ की श्रेणी में आते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है, "अपेक्षाकृत अच्छे प्रदर्शन के बावजूद, यहां तक ​​कि फ्रंट-रनर भी कुछ संकेतकों में सुधार का लाभ उठा सकते हैं, जैसा कि 74.01 का उच्चतम अवलोकन सूचकांक स्कोर 100 से नीचे है।"

रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि स्वास्थ्य सूचकांक के अंकों और राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के आर्थिक विकास के स्तर के बीच एक सामान्य सकारात्मक संबंध था, जो प्रति व्यक्ति शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद द्वारा मापा गया।

हालांकि, रिपोर्ट में पाया गया है, कुछ राज्यों जैसे कि जम्मू और कश्मीर, मणिपुर, मिजोरम, आंध्र प्रदेश और पंजाब में , अपेक्षाकृत कम स्तर के आर्थिक विकास के साथ वाले राज्यों ने स्वास्थ्य सूचकांक में अच्छा प्रदर्शन किया है।

रिपोर्ट में कहा गया है, "इन राज्यों के सबक आर्थिक विकास के समान स्तर वाले राज्यों में स्वास्थ्य सूचकांक के स्कोर को बेहतर बनाने के बारे में कुछ जानकारी प्रदान कर सकते हैं। दूसरी ओर, कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में उच्च स्तर के आर्थिक विकास के साथ-साथ स्वास्थ्य सूचकांक स्कोर जैसे गोवा, दिल्ली और सिक्किम में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया गया।"

यह लेख पहली बार यहां HealthCheck पर प्रकाशित हुई थी।

( यदवार विशेष संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। )

यह लेख अंग्रेजी में 29 जून 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

नई दिल्ली: भारत के 21 बड़े राज्यों में से नौ ने अपने स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रदर्शन में गिरावट देखी है और इनमें से पांच देश के सबसे गरीब राज्य में से हैं। यह जानकारी एक नई रिपोर्ट में सामने आई है। बिहार में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई, जबकि हरियाणा में सबसे ज्यादा सुधार हुआ है।

ये निष्कर्ष सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग द्वारा 25 जून, 2019 को जारी किए गए हेल्दी स्टेट प्रोग्रेसिव इंडिया रिपोर्ट के दूसरे संस्करण से थे, जिसमें 2015-16 और 2017-18 के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र में राज्यों के प्रदर्शन की तुलना की गई थी। नीति आयोग ने लिखा है, रिपोर्ट "बहु-आयामी हस्तक्षेप करने के लिए राज्यों को प्रेरित करने के लिए एक वार्षिक व्यवस्थित उपकरण है, जो बेहतर स्वास्थ्य परिणाम लाएगा।"

रिपोर्ट में तीन श्रेणियों के तहत आने वाले 23 स्वास्थ्य संकेतकों के आधार पर प्रत्येक राज्य के लिए एक स्वास्थ्य सूचकांक प्राप्त किया गया है: स्वास्थ्य परिणाम, शासन और सूचना, और प्रमुख इनपुट और प्रक्रियाएं।

‘स्वास्थ्य परिणामों’ में नवजात और कम उम्र की मृत्यु दर, संस्थागत प्रसव, जन्म के समय लिंग अनुपात जैसे संकेतक शामिल थे। ‘शासन और सूचना ’ में डेटा अखंडता माप शामिल है यानी कि राज्य और जिला स्तर पर प्रमुख पदों पर अधिकारियों के दखल, सर्वेक्षण डेटा के साथ रिपोर्ट किए गए डेटा का प्रतिशत विचलन। जबकि ‘प्रमुख इनपुट और प्रक्रिया’ में खाली स्वास्थ्य सेवा प्रदाता पदों का अनुपात और आईटी-सक्षम मानव संसाधन प्रबंधन प्रणालियों के अनुपात को देखा गया है।

केरल का सर्वश्रेष्ठ सूचकांक स्कोर (74.01) था, इसके बाद आंध्र प्रदेश (65.13) और महाराष्ट्र (63.99) का स्थान रहा। उत्तर प्रदेश का सबसे कम (28.61), उसके बाद बिहार (32.11) और ओडिशा (35.97) का स्थान रहा।

सात राज्यों में स्कोर में सुधार देखा गया, जबकि नौ राज्यों में गिरावट देखी गई। इनमें से पांच - बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा और मध्य प्रदेश - जैसा कि हमने कहा, भारत के सबसे गरीब राज्यों में से हैं। राजस्थान, झारखंड और छत्तीसगढ़ के साथ, जिन्होंने अपने स्वास्थ्य सूचकांक के अंकों में सुधार किया, ये राज्य एम्पावर्ड एक्शन ग्रूप (ईएजी) बनाते हैं।

2017-18 में हरियाणा ने अपने सूचकांक में सबसे अधिक सुधार देखा, जबकि बिहार में सबसे अधिक गिरावट देखी गई।

आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र ने रैंकिंग में सबसे अधिक सुधार देखा, क्रमशः छठे और चौथे स्थान पर, जबकि तमिलनाडु में सबसे अधिक गिरावट देखी गई, तीसरे स्थान से 2017-18 में नौवें स्थान पर गिर गया।

2015-16 और 2017-18 के बड़े राज्यों की स्वास्थ्य इंडेक्स रैंकिंग

Source: NITI Aayog

आठ छोटे राज्यों में, मिजोरम पहले (73.70) जबकि नागालैंड अंतिम (37.38) स्थान पर था। त्रिपुरा और मणिपुर ने स्वास्थ्य स्कोर में सबसे अधिक सुधार दिखाया। आठ छोटे राज्यों में से चार में समग्र स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रदर्शन में गिरावट देखी गई।

केंद्र शासित प्रदेशों में, चंडीगढ़ ने समग्र प्रदर्शन (63.62) में पहला स्थान प्राप्त किया, जबकि दमन और दीव ने सबसे खराब (41.66) प्रदर्शन किया। दादर और नगर हवेली में सबसे अधिक सुधार देखा गया।

क्यों ईएजी राज्यों का लड़खड़ाना जारी है

आठ ईएजी राज्यों में से पांच में, जैसा कि हमने कहा था, आधार वर्ष 2015-16 की तुलना में 2017-18 में उनके समग्र स्वास्थ्य सूचकांक स्कोर में गिरावट देखी गई है। बिहार में सबसे ज्यादा गिरावट (-6.35) देखी गई है, उसके बाद उत्तर प्रदेश (-5.08), उत्तराखंड (-5.02), ओडिशा (-3.46) और मध्य प्रदेश (-1.70) का स्थान रहा है।

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार सभी तीन श्रेणियों के तहत, 2015-16 की तुलना में 2017-18 में संकेतकों में खराब प्रदर्शन के कारण बिहार के प्रदर्शन में गिरावट आई थी। राज्य की कुल प्रजनन दर ( एक महिला से जन्म लेने वाले बच्चों की औसत संख्या ) 2015-16 में 3.2 से बढ़कर 2017-18 में 3.3 हो गई। जन्म के समय कम वजन का प्रसार 2015-16 में 7.2 फीसदी से बढ़कर 2017-18 में 9.2 फीसदी हो गया। जन्म के समय इसका लिंग अनुपात 2015-16 में प्रति 1,000 पुरुषों पर 916 महिलाओं की तुलना में घटकर 2017-18 में 908 हो गया और 2017-18 में इसका तपेदिक उपचार सफलता दर 71.9 फीसदी था, यानी 2015-16 में 89.7 फीसदी के आंकड़ों से नीचे।

बिहार ने 2017-18 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के धन को राज्य के खजाने से विभागों या समाजों को हस्तांतरित करने में भी 191 दिन का समय लिया, जबकि 2014-15 में 40 दिनों का समय लिया गया था। 

बिहार में, 2017-18 में गुणवत्ता मान्यता प्रमाण पत्र के साथ एक भी जिला या उप जिला अस्पताल नहीं है, यह 2015-16 से 27.16 प्रतिशत अंकों की गिरावट है।

उत्तर प्रदेश में गिरावट का कारण जन्म के समय कम वजन का उच्च प्रसार, कम टीबी उपचार सफलता दर, राज्य और जिला स्तर (18.98 महीने) पर प्रमुख पदों का खराब औसत कार्यकाल, और कम जन्म पंजीकरण (60.7 फीसदी) है। टीबी के उपचार की सफलता दर 87.5 फीसदी से 64 फीसदी तक गिर गई, जबकि जन्म के समय बच्चों के कम वजन का प्रतिशत 9.6 फीसदी से बढ़कर 11.8 फीसदी हो गया। जन्म पंजीकरण 68.3 फीसदी से गिरकर 60.7 फीसदी हो गया है।

स्वास्थ्य इंडेक्स परिवर्तन और बड़े भारतीय राज्यों के लिए रैंक, 2017-18

Source: NITI Aayog

उत्तराखंड में, नवजात शिशुओं और पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों के बीच उच्च मृत्यु दर, जिला स्तरों पर प्रमुख प्रशासनिक पदों की कम स्थिरता,प्रति वर्ष सी-वर्गों की निर्दिष्ट संख्या का प्रदर्शन करने वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की कार्यक्षमता में 30 प्रतिशत की कमी और एनएचएम फंड ट्रांसफर में देरी स्वास्थ्य प्रदर्शन में गिरावट का कारण रहे हैं। राज्य की नवजात मृत्यु दर प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 28 मौतों से बढ़कर 30 हो गई, और पांच साल से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर 38 से बढ़कर 41 हो गई है।

जबकि पांच-वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर और नवजात मृत्यु दर के ‘तत्काल परिणामों’ में सुधार हुआ है, ईएजी राज्यों (उत्तराखंड को छोड़कर) में, अधिकांश ‘मध्यवर्ती परिणाम’ जैसे पूर्ण टीकाकरण कवरेज, संस्थागत प्रसव और टीबी उपचार सफलता दर नहीं है और ‘महत्वपूर्ण सुधार’ की आवश्यकता है, जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है।

राजस्थान, झारखंड और छत्तीसगढ़ में सुधार के सूत्र

ईएजी राज्यों में, राजस्थान (+6.30), झारखंड (+5.99) और छत्तीसगढ़ (+1.34) ने अपने सूचकांक अंकों में सुधार देखा है। राजस्थान की नवजात मृत्यु दर प्रति 1,000 जन्मों पर 30 मौतों से घटकर 28 हो गई; इसकी अंडर-फाइव मृत्यु दर 50 से घटकर 45 हो गई। इसने जन्म के समय कम वजन को 25.5 फीसदी से 14 फीसदी तक कम कर दिया, और डिवीजनल अस्पतालों में विशेषज्ञ पदों पर वैकेंसी को 47.7 फीसदी से 18.4 फीसदी तक कम किया।

झारखंड ने 2015-16 से 2017-18 तक स्वास्थ्य परिणामों में समग्र सुधार दिखाया: नवजात मृत्यु दर (23 से 21 तक), पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर (39 से 33), कुल प्रजनन दर (2.7 से 2.6), जन्म के समय लिंग अनुपात (प्रति 1,000 लड़कों पर 902 से 918 लड़कियां), पूर्ण टीकाकरण (88.1 फीसदी से 100 फीसदी), संस्थागत प्रसव (67.4 फीसदी से 88.2 फीसदी) और टीबी के उपचार की सफलता दर (90.9 फीसदी से 91.7 फीसदी)।

छत्तीसगढ़ का सुधार ‘प्रमुख प्रक्रियाओं’ पर बेहतर प्रदर्शन के कारण था: इसने 24 घंटे के कार्यात्मक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को 40.3 फीसदी से 111.3 फीसदी (यानी लक्षित संख्या से अधिक), पहले त्रैमासिक प्रसवपूर्व पंजीकरण 74.6 फीसदी से 89.4 फीसदी और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र 47.7 फीसदी से 67 फीसदी सुधार किया।

आगे की पंक्ति के राज्यों के प्रदर्शन में भी गिरावट

उच्च रैंकिंग वाले राज्यों, जिन्हें "फ्रंट-रनर" कहा जाता है ( शीर्ष एक तिहाई में स्कोरिंग ) ने भी उनके प्रदर्शन में गिरावट दिखाई। इनमें से, तमिलनाडु (-2.99) में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई, इसके बाद केरल (-2.55) और पंजाब (-2.20) है।

नई दिल्ली में रिपोर्ट लॉन्च करने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान नीति आयोग के सदस्य, वीके पॉल कहते हैं, "जो राज्य पहले से ही अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे, उनमें इतना बड़ा बदलाव नहीं दिखा, जबकि जो पहले खराब प्रदर्शन वाले थे और जिनमें सुधार की गुंजाइश ज्यादा थी, उनमें सुधार देखा गया है।" 

आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र एकमात्र दो राज्य थे जो समग्र प्रदर्शन के साथ-साथ प्रदर्शन में सुधार के मामले में शीर्ष एक तिहाई राज्यों में से थे। बड़े राज्यों में, आंध्र प्रदेश के संकेतक (63 फीसदी) का उच्चतम अनुपात था जो ‘सबसे बेहतर’ या ‘सुधार’ की श्रेणी में आते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है, "अपेक्षाकृत अच्छे प्रदर्शन के बावजूद, यहां तक ​​कि फ्रंट-रनर भी कुछ संकेतकों में सुधार का लाभ उठा सकते हैं, जैसा कि 74.01 का उच्चतम अवलोकन सूचकांक स्कोर 100 से नीचे है।"

रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि स्वास्थ्य सूचकांक के अंकों और राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के आर्थिक विकास के स्तर के बीच एक सामान्य सकारात्मक संबंध था, जो प्रति व्यक्ति शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद द्वारा मापा गया।

हालांकि, रिपोर्ट में पाया गया है, कुछ राज्यों जैसे कि जम्मू और कश्मीर, मणिपुर, मिजोरम, आंध्र प्रदेश और पंजाब में , अपेक्षाकृत कम स्तर के आर्थिक विकास के साथ वाले राज्यों ने स्वास्थ्य सूचकांक में अच्छा प्रदर्शन किया है।

रिपोर्ट में कहा गया है, "इन राज्यों के सबक आर्थिक विकास के समान स्तर वाले राज्यों में स्वास्थ्य सूचकांक के स्कोर को बेहतर बनाने के बारे में कुछ जानकारी प्रदान कर सकते हैं। दूसरी ओर, कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में उच्च स्तर के आर्थिक विकास के साथ-साथ स्वास्थ्य सूचकांक स्कोर जैसे गोवा, दिल्ली और सिक्किम में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया गया।"

यह लेख पहली बार यहां HealthCheck पर प्रकाशित हुई थी।

( यदवार विशेष संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। )

यह लेख अंग्रेजी में 29 जून 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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