भारत में 2 में से 1 डायबटीज के मरीज अपनी स्थिति से अनजान – एक अध्ययन

बेंगलुरु: डायबटीज वाले हर दो भारतीयों (47 फीसदी) में से एक अपनी स्थिति से अनजान है, और लगभग एक चौथाई (24 फीसदी) इसे नियंत्रण में रख पाते हैं। यह जानकारी 2019 के मई में एक अध्ययन के निष्कर्ष के रूप में सामने आई है। अन्य समूहों की तुलना में कम घरेलू संपत्ति और कम शिक्षा स्तर के वाले ग्रामीण पुरुषों के समूह में ऐसी बातें ज्यादा सच हैं।

‘वैरिएशन इन हेल्थ सिस्टम परफॉर्मेंस फॉर मैनेजिंग डायबटीज एमॉंग स्ट्टेस इन इंडिया: ए क्रॉस सेक्शन्ल स्टडी ऑफ इंडिविजुअल्स एज्ड 15 टू 49 इयर्स’ नामक अध्ययन अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआई), चेन्नई के मद्रास डायबिटीज रिसर्च फाउंडेशन (एमडीआरएफ), और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ द्वारा आयोजित की गई थी। विश्लेषण के लिए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 2015-16 से माध्यमिक डेटा का उपयोग किया। इसमें 15 और 49 वर्ष की आयु के बीच 647,451 महिलाएं और 101,668 पुरुष शामिल थे, और सांख्यिकीय विधियों और सर्वेक्षण डिजाइन विश्लेषण का उपयोग करके पुरुष और महिला की संतुलित भागीदारी है।

पीएचएफआई में सहायक प्रोफेसर और अध्ययन के सह-लेखक, जिसे मेडिकल जर्नल बीएमसी मेडिसिन में प्रकाशित किया गया था, आशीष अवस्थी ने कहा,"भारत जैसे विकासशील देशों में हमें मातृ और बाल स्वास्थ्य से ध्यान हटाकर गैर-संचारी रोगों के बढ़ते बोझ पर ध्यान केंद्रित करना होगा। विकसित देशों की तरह, हमें भी अपने रक्त-शर्करा स्तर की निगरानी के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच की आवश्यकता है। यहां, हम केवल एक चेक-अप से गुजरते हैं वह भी तब जब हम एक नए संस्थान में शामिल होते हैं और वे एक स्वास्थ्य प्रमाण पत्र मांगते हैं।"

इंटरनेश्नल डायबटीज फेडरेशन की ओर से डायबटीज एटलस-2017 के अनुसार, 2017 तक, भारत में 7.29 करोड़ डायबटीज रोगी थे। चीन (11.43 करोड़) के बाद दूसरे स्थान पर है। भारत अगले पांच वर्षों में अपने पड़ोसी को पछाड़कर दुनिया के लिए डायबटीज राजधानी बन सकता है, जैसा कि अध्ययन के सह-लेखक और डॉ. मोहनस की डायबिटीज स्पेशलिस्ट सेंटर में डायबिटीज के प्रमुख विश्वनाथन मोहन कहते हैं। यह इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन द्वारा लगाए गए अनुमान की तरह ही है कि भारत में 2045 तक डायबिटीज के 13.43 करोड़ रोगी होंगे।

मोहन ने कहा, " डायबटीज के एक तिहाई मामलों में किडनी की बीमारी हो जाती है, जिसके लिए या तो प्रत्यारोपण या डायलिसिस की आवश्यकता होती है। कम से कम 3-4 करोड़ लोग इससे पीड़ित हैं। हमारे पास प्रत्यारोपण के लिए पर्याप्त दाता नहीं हैं, और डायलिसिस की लागत प्रति वर्ष कम से कम 3 लाख रुपये है। यह एक ऐसी लागत है कि हमारे देश में ज्यादातर लोग वहन नहीं कर सकते हैं।"

ग्रामीण पुरुष डायबटीज के प्रति अतिसंवेदनशील

अध्ययन में पाया गया कि निम्न शिक्षा स्तर और कम घरेलू संपत्ति वाले ग्रामीण पुरुषोंमें उच्च प्रसार था। महिलाओं की स्थिति बेहतर थी। संभवतः इसका कारण यह था कि प्रसवपूर्व देखभाल के दौरान गर्भकालीन डायबटीज के लिए नियमित जांच है।

लिंग, आयु-समूह और घरेलू धन के अनुसार डायबटीज का प्रसार

Source: BMC Medicine

अध्ययन में कहा गया है कि ग्रामीण गरीबों के लिए यह प्रवृत्ति चिंता पैदा करती है, क्योंकि उनके पास डायबटीज से उत्पन्न जटिलताओं के लिए उच्च-गुणवत्ता की देखभाल तक सबसे कम पहुंच है और उनके लिए भारी चिकित्सा बिल एक बोझ बन जाने की तरह है। चूंकि इनमें से कई व्यक्ति किसान हैं, इसलिए उनकी आजीविका के लिए अपने शारीरिक स्वास्थ्य बहुत मायने रखता है।

आउट-ऑफ-पॉकेट (ओओपी) स्वास्थ्य खर्च ने 5.5 करोड़ भारतीयों ( दक्षिण कोरिया, स्पेन या केन्या की आबादी से अधिक) को 2011-12 में गरीबी में धकेला है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 19 जुलाई, 2018 को बताया था।

47 फीसदी रोगियों की जान ‘देखभाल नहीं हो पाने’ और कई की फॉलोअप की कमी के कारण गई

अध्ययन ने ‘कैसकेड ऑफ केयर’ मॉडल के माध्यम से भारत में डायबटीज के प्रसार का विश्लेषण किया। इससे पहले कि वे स्थिति का सफल नियंत्रण हासिल कर सकें, क्रॉनिक स्थितियों के साथ मरीजों को कई देखभाल के चरणों में संक्रमण होता है - स्क्रीनिंग, निदान, उपचार। यह दृष्टिकोण उन कदमों को स्थापित करने में मदद करता है जिन पर एक स्वास्थ्य प्रणाली में मरीज उनके रोग के प्रबंधन से हार जाते हैं।

सर्वेक्षण में शामिल 729,829 प्रतिभागियों में से 3.3 फीसदी (19,453) डायबटीज से पीड़ित थे। इनमें से, 52.5 फीसदी (10,213) जानते थे कि उन्हें डायबटीज था, जबकि 40.5 फीसदी ने इसके लिए उपचार की मांग की थी और केवल 24.8 फीसदी ने इसे नियंत्रण में रखा था। शेष 75.2 फीसदी रोगी तक "देखभाल की पहुंच" नहीं हैं।

जैसा कि नीचे दिखाया गया है, 47 फीसदी मरीजों में कम जागरूकता स्तर, 11 फीसदी मरीजों के लिए उपचार के स्तर के कारण देखभाल तक पहुंच नहीं और 7 फीसदी देखभाल प्राप्त करने के बावजूद नियंत्रण हासिल करने में विफल रहते हैं।

डायबटीज केयर कैसकेड

Source: BMC Medicine

मोहन ने कहा, "अगर 47 फीसदी लोग अपने डायबटीज के बारे में नहीं जानते हैं, तो डायबटीज के हर ज्ञात मामले में कम से कम एक अज्ञात है। यह एक मूक रोग है, इसलिए लोग नहीं जानते कि वे इससे पीड़ित हैं।"

डायबटीज का पता चलने पर भी कुछ रोगी उपचार की तलाश नहीं करते हैं, मोहन ने कहा कि इसके लिए नैदानिक ​​जड़ता जिम्मेदार है, जिसका उन्होंने जर्नल ऑफ डायबेटोलोजी में नवंबर 2018 के संपादकीय के लिए अध्ययन किया था।

 

मोहन ने कहा, “कभी-कभी किसी रोगी में शर्करा का स्तर अधिक हो सकता है और हम उन्हें इंसुलिन लेना शुरू करने का सुझाव दे सकते हैं। वे परिवार में शादी जैसा बहाने देते हैं जिसके कारण बहुत अधिक मिठाई का सेवन किया जाता है। वे स्तरों को नीचे लाने के लिए कुछ महीनों का समय मांगते हैं लेकिन कम से कम एक साल तक वापस नहीं आते, तब तक बहुत देर हो जाती है।”

मोहन ने कहा कि व्हाट्सएप फर्जी खबरें फैलाना भी एक कारण है जो मरीजों को गुमराह करने में सहायक होता है।

गोवा में सबसे ज्यादा प्रसार, केरल के लोग सबसे ज्यादा जागरूक

अध्ययन का मूल्यांकन करने वाले 15 से 49 वर्ष के आयु वर्ग में, गोवा में डायबटीज (8.6 फीसदी) का सबसे अधिक प्रचलन था, उसके बाद अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (8.3 फीसदी) और केरल (7.5 फीसदी) का स्थान था।

दक्षिणी राज्यों में अधिक प्रचलन इस प्रकार देखा गया: आंध्र प्रदेश (6.6 फीसदी), कर्नाटक (4.6 फीसदी), तमिलनाडु (6.8 फीसदी) और तेलंगाना (4.8 फीसदी)। इसकी तुलना में उत्तर प्रदेश में 2.4 फीसदी, राजस्थान में 1.8 फीसदी और बिहार में 3 फीसदी का आंकड़ा था।

Source: BMC Medicine

मोहन कहते हैं कि यह दक्षिणी राज्यों के उच्च सकल राज्य घरेलू उत्पाद के कारण हो सकता है-“उनके भोजन में अधिक कैलोरी, कार्बोहाइड्रेट और चीनी होती है। वे कार और स्कूटर खरीद सकते हैं। वे अधिक खाते हैं, लेकिन व्यायाम कम करते हैं।

केरल में स्थिति के बारे में सबसे ज्यादा जागरूकता है - यानी 10 में से सात मरीज अपनी स्थिति से अवगत थे। फिर भी, यह गोवा और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के बाद डायबटीज के प्रसार में तीसरे स्थान पर है।

Source: BMC Medicine

तिरुवनंतपुरम के डायबेटोलॉजिस्ट ज्योतिदेव केसवदेव ने कहा, "खाने और व्यायाम की आदतों में अचानक बदलाव ने इसे जन्म दिया है। दुबई या अन्य खाड़ी देशों में काम करने वाले कई गरीबों पर मध्य पूर्व के मजबूत प्रभाव के कारण केरल में ग्रामीण-शहरी विभाजन भी नहीं है। सभी 'गरीब' रेड मीट और कार्बोहाइड्रेट से भरे खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं।" 

हालांकि, लगभग आधे मरीज जो जागरूक हैं, वे अपने डायबटीज को नियंत्रण में लाने में असमर्थ थे। केसवदेव कहते हैं, "रोगी वैकल्पिक दवाओं की तलाश करते रहते हैं या फिर मामला बहुत जटिल हो जाने के बाद ही आधुनिक चिकित्सा तक पहुंचते हैं, इसलिए ऐसा होता है।"

उन्होंने कहा, "राज्य में 100 फीसदी साक्षरता के बावजूद, पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की गहरी जड़ें हैं। यहां तक ​​कि (राज्य) सरकार डायबटीज प्रबंधन के लिए असुरक्षित आयुर्वेदिक उपचारों को बढ़ावा देती है। लोगों का मानना ​​है कि आधुनिक दवाओं के दुष्प्रभाव होते हैं और अन्य के नहीं होते हैं।" 

अध्ययन के अनुसार, पड़ोसी राज्य तमिलनाडु में, 22 लाख लोग डायबटीज के साथ जी रहे थे और राज्य में 6.8 फीसदी का प्रसार था।

चेन्नई के प्रशांत हॉस्पिटल के डायबेटोलॉजिस्ट एस नल्लापेरुमल कहते हैं, '' पॉलिश किए हुए चावल का अधिक सेवन होता है, जिसमें फाइबर की मात्रा कम होती है। यह इंसुलिन स्राव को प्रभावित करता है। समय के साथ, यह अग्न्याशय को कमजोर करता है। इसके अलावा मैदे के अधिक सेवन से भोजन का पश्चिमीकरण हो रहा है।"

अध्ययन में पाया गया कि कम प्रसार वाले राज्यों में खराब देखभाल संकेतक हैं। उदाहरण के लिए, मिजोरम में डायबटीज का 3 फीसदी प्रसार है, लेकिन राज्य में केवल 40 फीसदी रोगियों को उनकी स्थिति के बारे में पता था, 30 फीसदी ने उपचार की मांग की और 12.6 फीसदी ने अपने स्तर को नियंत्रण में रखा।

अध्ययन में कहा गया है कि इनमें से कई राज्यों में, अक्सर कम समृद्ध, स्वास्थ्य प्रणालियां काफी हद तक संचारी रोगों और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करती हैं।

अध्ययन में पाया गया कि मेघालय में सबसे अधिक प्रतिशत रोगियों की देखभाल (61.4 फीसदी) होती है।

Source: BMC Medicine

मेघालय में भी ब्लड शुगर के स्तर के रोगियों का प्रतिशत (53.8 फीसदी) सबसे अधिक था।

Source: BMC Medicine

प्रदूषण संबंध - और अन्य कारण 

इस अध्ययन में भारतीयों में डायबटीज के प्रसार में तेजी से वृद्धि के लिए एक प्रमुख कारक के रूप में वायु प्रदूषण को माना गया है। अवस्थी ने कहा, "हाल के शोध से पता चला है कि वायु प्रदूषण डायबटीज के बढ़ने में भी योगदान दे सकता है क्योंकि यह आनुवांशिक और चयापचय संबंधी परिवर्तन करता है जो रोग को प्रेरित कर सकता है।"

स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर-2019 की रिपोर्ट के अनुसार,उच्च ब्लड शुगर और अत्यधिक शरीर के वजन के बाद, 2017 में टाइप 2 डायबिटीज से होने वाली मौतों के लिए पार्टिकुलेट मैटर (पीएम 2.5) तीसरा प्रमुख जोखिम कारक था।

अध्ययन में कहा गया है कि गतिहीन कार्य वातावरण, भारतीय शहरों में शारीरिक व्यायाम के हरे-भरे स्थानों की कमी, बदलते आहार पैटर्न, बढ़ती उम्र और जन्म के समय कम वजन के कारण भी भारतीयों में जीवनशैली बीमारी होने की आशंका है।

 

नल्लापेरुमल कहते हैं, “दक्षिण भारतीयों के बीच डायबटीज की अधिक घटना एक आनुवंशिक कारक के कारण भी हो सकती है। अध्ययनों से पता चला है कि यूके में रहने वाले दक्षिण भारतीयों में भी ब्लड शुगर का स्तर अधिक होता है, इसलिए यह जीन के कारण हो सकता है। दुनिया के इस हिस्से को भोजन की कमी की लंबी अवधि का सामना करना पड़ा, इसलिए हमारे जीन कम खाद्य संसाधनों के लिए बदल गए हैं। लेकिन अब हम बहुत अधिक उपभोग कर रहे हैं। ”

अधिक स्क्रीनिंग की आवश्यकता

अध्ययन में कहा गया है कि बीमारी का मुकाबला करने के लिए, डायबटीज का पता लगाने के लिए बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग कार्यक्रम की जरुरत है। अध्ययन में कहा गया है कि पांच साल का उदय कार्यक्रम ( प्रोजेक्ट होप द्वारा एक पहल, जो स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को डायबटीज और उच्च रक्तचाप को रोकने और प्रबंधित करने के लिए प्रशिक्षण प्रदान करती है ) से आंध्र प्रदेश और हरियाणा में स्क्रीनिंग में सुधार हुआ है।

एक और चिंता यह है कि क्या भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली डायबटीज की देखभाल की मांग में वृद्धि का प्रभावी ढंग से सामना कर पाएगी।

अवस्थी कहते हैं, “उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में 20 करोड़ की आबादी के साथ, केवल 17 सरकारी मेडिकल कॉलेज और एक तृतीयक देखभाल रेफरल केंद्र हैं। यहां तक ​​कि निदान और उपचार के लिए, अस्पताल पूरे क्षेत्र में दूर और बिखरे हुए हैं। यदि जागरूकता बढ़ती है, तो लाभ सीमित होगा यदि लोगों को उपचार के लिए लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता है। बेहतर इलाज और इसे नियंत्रण में लाने के लिए बुनियादी ढांचे की जरूरत है। ”

कोलकाता में डॉ मोहन क्लिनिक में सलाहकार चिकित्सक और डायबटीज विशेषज्ञ,सुप्रिया दत्ता कहती हैं, “पश्चिम बंगाल में, जहां डायबटीज का प्रसार 4.2 फीसदी था, राष्ट्रीय औसत से अधिक / कम, चिकित्सा सुविधाएं जिला मुख्यालय और राजधानी में केंद्रित हैं। यह लोगों की पहुंच को सीमित करता है। हमें अच्छे डॉक्टरों के साथ और अधिक केंद्रों की आवश्यकता है। अभी, हम कई डॉक्टरों को उन क्षेत्रों को छोड़ते हुए देखते हैं क्योंकि वहां का प्रशासन अच्छा नहीं है। ”

यह लेख पहली बार यहां HealthCheck पर प्रकाशित हुई थी।

(चाको, पत्रकारिता में पोस्टग्रैजुएट हैं। वह बेंगलुरु के माउंट कार्मेल कॉलेज में पत्रकारिता विभाग में सहायक प्रोफेसर और इंडियास्पेंड में इंटर्न हैं।)

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बेंगलुरु: डायबटीज वाले हर दो भारतीयों (47 फीसदी) में से एक अपनी स्थिति से अनजान है, और लगभग एक चौथाई (24 फीसदी) इसे नियंत्रण में रख पाते हैं। यह जानकारी 2019 के मई में एक अध्ययन के निष्कर्ष के रूप में सामने आई है। अन्य समूहों की तुलना में कम घरेलू संपत्ति और कम शिक्षा स्तर के वाले ग्रामीण पुरुषों के समूह में ऐसी बातें ज्यादा सच हैं।

‘वैरिएशन इन हेल्थ सिस्टम परफॉर्मेंस फॉर मैनेजिंग डायबटीज एमॉंग स्ट्टेस इन इंडिया: ए क्रॉस सेक्शन्ल स्टडी ऑफ इंडिविजुअल्स एज्ड 15 टू 49 इयर्स’ नामक अध्ययन अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआई), चेन्नई के मद्रास डायबिटीज रिसर्च फाउंडेशन (एमडीआरएफ), और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ द्वारा आयोजित की गई थी। विश्लेषण के लिए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 2015-16 से माध्यमिक डेटा का उपयोग किया। इसमें 15 और 49 वर्ष की आयु के बीच 647,451 महिलाएं और 101,668 पुरुष शामिल थे, और सांख्यिकीय विधियों और सर्वेक्षण डिजाइन विश्लेषण का उपयोग करके पुरुष और महिला की संतुलित भागीदारी है।

पीएचएफआई में सहायक प्रोफेसर और अध्ययन के सह-लेखक, जिसे मेडिकल जर्नल बीएमसी मेडिसिन में प्रकाशित किया गया था, आशीष अवस्थी ने कहा,"भारत जैसे विकासशील देशों में हमें मातृ और बाल स्वास्थ्य से ध्यान हटाकर गैर-संचारी रोगों के बढ़ते बोझ पर ध्यान केंद्रित करना होगा। विकसित देशों की तरह, हमें भी अपने रक्त-शर्करा स्तर की निगरानी के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच की आवश्यकता है। यहां, हम केवल एक चेक-अप से गुजरते हैं वह भी तब जब हम एक नए संस्थान में शामिल होते हैं और वे एक स्वास्थ्य प्रमाण पत्र मांगते हैं।"

इंटरनेश्नल डायबटीज फेडरेशन की ओर से डायबटीज एटलस-2017 के अनुसार, 2017 तक, भारत में 7.29 करोड़ डायबटीज रोगी थे। चीन (11.43 करोड़) के बाद दूसरे स्थान पर है। भारत अगले पांच वर्षों में अपने पड़ोसी को पछाड़कर दुनिया के लिए डायबटीज राजधानी बन सकता है, जैसा कि अध्ययन के सह-लेखक और डॉ. मोहनस की डायबिटीज स्पेशलिस्ट सेंटर में डायबिटीज के प्रमुख विश्वनाथन मोहन कहते हैं। यह इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन द्वारा लगाए गए अनुमान की तरह ही है कि भारत में 2045 तक डायबिटीज के 13.43 करोड़ रोगी होंगे।

मोहन ने कहा, " डायबटीज के एक तिहाई मामलों में किडनी की बीमारी हो जाती है, जिसके लिए या तो प्रत्यारोपण या डायलिसिस की आवश्यकता होती है। कम से कम 3-4 करोड़ लोग इससे पीड़ित हैं। हमारे पास प्रत्यारोपण के लिए पर्याप्त दाता नहीं हैं, और डायलिसिस की लागत प्रति वर्ष कम से कम 3 लाख रुपये है। यह एक ऐसी लागत है कि हमारे देश में ज्यादातर लोग वहन नहीं कर सकते हैं।"

ग्रामीण पुरुष डायबटीज के प्रति अतिसंवेदनशील

अध्ययन में पाया गया कि निम्न शिक्षा स्तर और कम घरेलू संपत्ति वाले ग्रामीण पुरुषोंमें उच्च प्रसार था। महिलाओं की स्थिति बेहतर थी। संभवतः इसका कारण यह था कि प्रसवपूर्व देखभाल के दौरान गर्भकालीन डायबटीज के लिए नियमित जांच है।

लिंग, आयु-समूह और घरेलू धन के अनुसार डायबटीज का प्रसार

Source: BMC Medicine

अध्ययन में कहा गया है कि ग्रामीण गरीबों के लिए यह प्रवृत्ति चिंता पैदा करती है, क्योंकि उनके पास डायबटीज से उत्पन्न जटिलताओं के लिए उच्च-गुणवत्ता की देखभाल तक सबसे कम पहुंच है और उनके लिए भारी चिकित्सा बिल एक बोझ बन जाने की तरह है। चूंकि इनमें से कई व्यक्ति किसान हैं, इसलिए उनकी आजीविका के लिए अपने शारीरिक स्वास्थ्य बहुत मायने रखता है।

आउट-ऑफ-पॉकेट (ओओपी) स्वास्थ्य खर्च ने 5.5 करोड़ भारतीयों ( दक्षिण कोरिया, स्पेन या केन्या की आबादी से अधिक) को 2011-12 में गरीबी में धकेला है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 19 जुलाई, 2018 को बताया था।

47 फीसदी रोगियों की जान ‘देखभाल नहीं हो पाने’ और कई की फॉलोअप की कमी के कारण गई

अध्ययन ने ‘कैसकेड ऑफ केयर’ मॉडल के माध्यम से भारत में डायबटीज के प्रसार का विश्लेषण किया। इससे पहले कि वे स्थिति का सफल नियंत्रण हासिल कर सकें, क्रॉनिक स्थितियों के साथ मरीजों को कई देखभाल के चरणों में संक्रमण होता है - स्क्रीनिंग, निदान, उपचार। यह दृष्टिकोण उन कदमों को स्थापित करने में मदद करता है जिन पर एक स्वास्थ्य प्रणाली में मरीज उनके रोग के प्रबंधन से हार जाते हैं।

सर्वेक्षण में शामिल 729,829 प्रतिभागियों में से 3.3 फीसदी (19,453) डायबटीज से पीड़ित थे। इनमें से, 52.5 फीसदी (10,213) जानते थे कि उन्हें डायबटीज था, जबकि 40.5 फीसदी ने इसके लिए उपचार की मांग की थी और केवल 24.8 फीसदी ने इसे नियंत्रण में रखा था। शेष 75.2 फीसदी रोगी तक "देखभाल की पहुंच" नहीं हैं।

जैसा कि नीचे दिखाया गया है, 47 फीसदी मरीजों में कम जागरूकता स्तर, 11 फीसदी मरीजों के लिए उपचार के स्तर के कारण देखभाल तक पहुंच नहीं और 7 फीसदी देखभाल प्राप्त करने के बावजूद नियंत्रण हासिल करने में विफल रहते हैं।

डायबटीज केयर कैसकेड

Source: BMC Medicine

मोहन ने कहा, "अगर 47 फीसदी लोग अपने डायबटीज के बारे में नहीं जानते हैं, तो डायबटीज के हर ज्ञात मामले में कम से कम एक अज्ञात है। यह एक मूक रोग है, इसलिए लोग नहीं जानते कि वे इससे पीड़ित हैं।"

डायबटीज का पता चलने पर भी कुछ रोगी उपचार की तलाश नहीं करते हैं, मोहन ने कहा कि इसके लिए नैदानिक ​​जड़ता जिम्मेदार है, जिसका उन्होंने जर्नल ऑफ डायबेटोलोजी में नवंबर 2018 के संपादकीय के लिए अध्ययन किया था।

 

मोहन ने कहा, “कभी-कभी किसी रोगी में शर्करा का स्तर अधिक हो सकता है और हम उन्हें इंसुलिन लेना शुरू करने का सुझाव दे सकते हैं। वे परिवार में शादी जैसा बहाने देते हैं जिसके कारण बहुत अधिक मिठाई का सेवन किया जाता है। वे स्तरों को नीचे लाने के लिए कुछ महीनों का समय मांगते हैं लेकिन कम से कम एक साल तक वापस नहीं आते, तब तक बहुत देर हो जाती है।”

मोहन ने कहा कि व्हाट्सएप फर्जी खबरें फैलाना भी एक कारण है जो मरीजों को गुमराह करने में सहायक होता है।

गोवा में सबसे ज्यादा प्रसार, केरल के लोग सबसे ज्यादा जागरूक

अध्ययन का मूल्यांकन करने वाले 15 से 49 वर्ष के आयु वर्ग में, गोवा में डायबटीज (8.6 फीसदी) का सबसे अधिक प्रचलन था, उसके बाद अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (8.3 फीसदी) और केरल (7.5 फीसदी) का स्थान था।

दक्षिणी राज्यों में अधिक प्रचलन इस प्रकार देखा गया: आंध्र प्रदेश (6.6 फीसदी), कर्नाटक (4.6 फीसदी), तमिलनाडु (6.8 फीसदी) और तेलंगाना (4.8 फीसदी)। इसकी तुलना में उत्तर प्रदेश में 2.4 फीसदी, राजस्थान में 1.8 फीसदी और बिहार में 3 फीसदी का आंकड़ा था।

Source: BMC Medicine

मोहन कहते हैं कि यह दक्षिणी राज्यों के उच्च सकल राज्य घरेलू उत्पाद के कारण हो सकता है-“उनके भोजन में अधिक कैलोरी, कार्बोहाइड्रेट और चीनी होती है। वे कार और स्कूटर खरीद सकते हैं। वे अधिक खाते हैं, लेकिन व्यायाम कम करते हैं।

केरल में स्थिति के बारे में सबसे ज्यादा जागरूकता है - यानी 10 में से सात मरीज अपनी स्थिति से अवगत थे। फिर भी, यह गोवा और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के बाद डायबटीज के प्रसार में तीसरे स्थान पर है।

Source: BMC Medicine

तिरुवनंतपुरम के डायबेटोलॉजिस्ट ज्योतिदेव केसवदेव ने कहा, "खाने और व्यायाम की आदतों में अचानक बदलाव ने इसे जन्म दिया है। दुबई या अन्य खाड़ी देशों में काम करने वाले कई गरीबों पर मध्य पूर्व के मजबूत प्रभाव के कारण केरल में ग्रामीण-शहरी विभाजन भी नहीं है। सभी 'गरीब' रेड मीट और कार्बोहाइड्रेट से भरे खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं।" 

हालांकि, लगभग आधे मरीज जो जागरूक हैं, वे अपने डायबटीज को नियंत्रण में लाने में असमर्थ थे। केसवदेव कहते हैं, "रोगी वैकल्पिक दवाओं की तलाश करते रहते हैं या फिर मामला बहुत जटिल हो जाने के बाद ही आधुनिक चिकित्सा तक पहुंचते हैं, इसलिए ऐसा होता है।"

उन्होंने कहा, "राज्य में 100 फीसदी साक्षरता के बावजूद, पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की गहरी जड़ें हैं। यहां तक ​​कि (राज्य) सरकार डायबटीज प्रबंधन के लिए असुरक्षित आयुर्वेदिक उपचारों को बढ़ावा देती है। लोगों का मानना ​​है कि आधुनिक दवाओं के दुष्प्रभाव होते हैं और अन्य के नहीं होते हैं।" 

अध्ययन के अनुसार, पड़ोसी राज्य तमिलनाडु में, 22 लाख लोग डायबटीज के साथ जी रहे थे और राज्य में 6.8 फीसदी का प्रसार था।

चेन्नई के प्रशांत हॉस्पिटल के डायबेटोलॉजिस्ट एस नल्लापेरुमल कहते हैं, '' पॉलिश किए हुए चावल का अधिक सेवन होता है, जिसमें फाइबर की मात्रा कम होती है। यह इंसुलिन स्राव को प्रभावित करता है। समय के साथ, यह अग्न्याशय को कमजोर करता है। इसके अलावा मैदे के अधिक सेवन से भोजन का पश्चिमीकरण हो रहा है।"

अध्ययन में पाया गया कि कम प्रसार वाले राज्यों में खराब देखभाल संकेतक हैं। उदाहरण के लिए, मिजोरम में डायबटीज का 3 फीसदी प्रसार है, लेकिन राज्य में केवल 40 फीसदी रोगियों को उनकी स्थिति के बारे में पता था, 30 फीसदी ने उपचार की मांग की और 12.6 फीसदी ने अपने स्तर को नियंत्रण में रखा।

अध्ययन में कहा गया है कि इनमें से कई राज्यों में, अक्सर कम समृद्ध, स्वास्थ्य प्रणालियां काफी हद तक संचारी रोगों और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करती हैं।

अध्ययन में पाया गया कि मेघालय में सबसे अधिक प्रतिशत रोगियों की देखभाल (61.4 फीसदी) होती है।

Source: BMC Medicine

मेघालय में भी ब्लड शुगर के स्तर के रोगियों का प्रतिशत (53.8 फीसदी) सबसे अधिक था।

Source: BMC Medicine 

प्रदूषण संबंध - और अन्य कारण 

इस अध्ययन में भारतीयों में डायबटीज के प्रसार में तेजी से वृद्धि के लिए एक प्रमुख कारक के रूप में वायु प्रदूषण को माना गया है। अवस्थी ने कहा, "हाल के शोध से पता चला है कि वायु प्रदूषण डायबटीज के बढ़ने में भी योगदान दे सकता है क्योंकि यह आनुवांशिक और चयापचय संबंधी परिवर्तन करता है जो रोग को प्रेरित कर सकता है।"

स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर-2019 की रिपोर्ट के अनुसार,उच्च ब्लड शुगर और अत्यधिक शरीर के वजन के बाद, 2017 में टाइप 2 डायबिटीज से होने वाली मौतों के लिए पार्टिकुलेट मैटर (पीएम 2.5) तीसरा प्रमुख जोखिम कारक था।

अध्ययन में कहा गया है कि गतिहीन कार्य वातावरण, भारतीय शहरों में शारीरिक व्यायाम के हरे-भरे स्थानों की कमी, बदलते आहार पैटर्न, बढ़ती उम्र और जन्म के समय कम वजन के कारण भी भारतीयों में जीवनशैली बीमारी होने की आशंका है।

 

नल्लापेरुमल कहते हैं, “दक्षिण भारतीयों के बीच डायबटीज की अधिक घटना एक आनुवंशिक कारक के कारण भी हो सकती है। अध्ययनों से पता चला है कि यूके में रहने वाले दक्षिण भारतीयों में भी ब्लड शुगर का स्तर अधिक होता है, इसलिए यह जीन के कारण हो सकता है। दुनिया के इस हिस्से को भोजन की कमी की लंबी अवधि का सामना करना पड़ा, इसलिए हमारे जीन कम खाद्य संसाधनों के लिए बदल गए हैं। लेकिन अब हम बहुत अधिक उपभोग कर रहे हैं। ”

अधिक स्क्रीनिंग की आवश्यकता

अध्ययन में कहा गया है कि बीमारी का मुकाबला करने के लिए, डायबटीज का पता लगाने के लिए बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग कार्यक्रम की जरुरत है। अध्ययन में कहा गया है कि पांच साल का उदय कार्यक्रम ( प्रोजेक्ट होप द्वारा एक पहल, जो स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को डायबटीज और उच्च रक्तचाप को रोकने और प्रबंधित करने के लिए प्रशिक्षण प्रदान करती है ) से आंध्र प्रदेश और हरियाणा में स्क्रीनिंग में सुधार हुआ है।

एक और चिंता यह है कि क्या भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली डायबटीज की देखभाल की मांग में वृद्धि का प्रभावी ढंग से सामना कर पाएगी।

अवस्थी कहते हैं, “उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में 20 करोड़ की आबादी के साथ, केवल 17 सरकारी मेडिकल कॉलेज और एक तृतीयक देखभाल रेफरल केंद्र हैं। यहां तक ​​कि निदान और उपचार के लिए, अस्पताल पूरे क्षेत्र में दूर और बिखरे हुए हैं। यदि जागरूकता बढ़ती है, तो लाभ सीमित होगा यदि लोगों को उपचार के लिए लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता है। बेहतर इलाज और इसे नियंत्रण में लाने के लिए बुनियादी ढांचे की जरूरत है। ”

कोलकाता में डॉ मोहन क्लिनिक में सलाहकार चिकित्सक और डायबटीज विशेषज्ञ,सुप्रिया दत्ता कहती हैं, “पश्चिम बंगाल में, जहां डायबटीज का प्रसार 4.2 फीसदी था, राष्ट्रीय औसत से अधिक / कम, चिकित्सा सुविधाएं जिला मुख्यालय और राजधानी में केंद्रित हैं। यह लोगों की पहुंच को सीमित करता है। हमें अच्छे डॉक्टरों के साथ और अधिक केंद्रों की आवश्यकता है। अभी, हम कई डॉक्टरों को उन क्षेत्रों को छोड़ते हुए देखते हैं क्योंकि वहां का प्रशासन अच्छा नहीं है। ”

यह लेख पहली बार यहां HealthCheck पर प्रकाशित हुई थी।

(चाको, पत्रकारिता में पोस्टग्रैजुएट हैं। वह बेंगलुरु के माउंट कार्मेल कॉलेज में पत्रकारिता विभाग में सहायक प्रोफेसर और इंडियास्पेंड में इंटर्न हैं।)

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