मंत्री कहते हैं कि यूनिवर्सल हेल्थकेयर सरकार की प्राथमिकता, लेकिन स्वास्थ्य प्रणाली में कम स्टाफ

नई दिल्ली: जहां भारत सरकार ने बेहतर और सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा का वादा किया है, वहीं एक नए अध्ययन में बताया गया है कि देश की स्वास्थ्य प्रणाली के साथ काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या इतनी कम है कि घनत्व के लिए वैश्विक मानकों को पूरा नहीं करती है और ग्रामीण स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी हद तक अक्षम है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने 3 जून, 2019 को राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा कार्यक्रम, प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएमजेएवाई) का जिक्र करते हुए मीडिया को बताया, "हम आयुष्मान भारत-पीएमजेएवाई और स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों को जन आंदोलन का रूप देंगे।"

सितंबर 2018 में शुरू की गई राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना- पीएमजेएवाई स्वास्थ्य पर होने वाले ‘भयावह खर्च’ को कम करने के लिए दस करोड़ गरीब परिवारों को 5 लाख रुपये तक का बीमा प्रदान करती है और भारत को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की ओर ले जाने का लक्ष्य रखती है।

हालांकि, 27 मई, 2019 को, एक ओपन-एक्सेस मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन,बीएमजे ओपन में बताई गई कमियों को देखते हुए लगता है कि इन लक्ष्यों को हासिल करना मुश्किल हो सकता है। 2016 में प्रति 10,000 आबादी पर डॉक्टरों, नर्सों और दाइयों का घनत्व 20.6 था। यह आंकड़ा 2011-12 के 19 के आंकड़े से ज्यादा था। ये आंकड़े राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) डेटा पर आधारित थे। अध्ययन में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, इंडियन एसोसिएशन ऑफ फिजियोथेरेपिस्ट, इंडियन नर्सिंग काउंसिल और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय जैसे संगठनों से मिले डेटा का भी उपयोग किया गया।

नए मेडिकल, नर्सिंग और पैरामेडिकल तकनीकी शिक्षा संस्थानों की संख्या 2016 तक के दशक में बढ़े हैं, और इसी वजह से इन संख्या में बढ़ोतरी हुई है। दिल्ली स्थित संस्था, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआई) द्वारा संचालित ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ’ में अडिशनल प्रोफेसर, अनूप करण कहते हैं, "हालांकि, यह वृद्धि अभी भी डब्ल्यूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) द्वारा निर्धारित न्यूनतम मानकों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है, जहां प्रति 10,000 जनसंख्या पर 22.8 स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं। इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए लगभग 250,000 स्वास्थ्य कर्मचारियों की आवश्यकता है।"

यह साबित करने के लिए कि भारत के कई स्वास्थ्य संकटों के लिए स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में कर्मचारियों की पर्याप्त संख्या होना जरूरी है,कुछ देश से जुड़े तथ्यों पर ध्यान देना भी आवश्यक है-विश्व भर में 17 फीसदी मातृ मृत्यु, गैर-संचारी रोगों के बढ़ते मामले, जो 2016 में 61 फीसदी मौतों के लिए जिम्मेदार थे; और कुष्ठ और मलेरिया जैसे संचारी रोगों को नियंत्रित करने के लिए एक सतत संघर्ष। चूंकि अधिकांश भारतीय स्वास्थ्य खर्चों के लिए अपनी जेब से भुगतान करते हैं इसलिए स्वास्थ्य खर्चों को वहन न कर पाने के कारण हर साल लाखों लोग गरीबी में चले जाते हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जुलाई 2018 की रिपोर्ट में बताया है। 

हेल्थकेयर कार्यबल: सबसे गंभीर संकट

जैसा कि हमने पहले भी कहा है, 2006 के डब्ल्यूएचओ मानदंडों के अनुसार, 10 डॉक्टरों सहित - प्रति 10,000 जनसंख्या पर न्यूनतम 22.8 स्वास्थ्य कार्यकर्ता होने चाहिए। भारत में प्रति 10,000 आबादी पर 20.6 डॉक्टर, नर्स और दाइयां हैं, और 5.9 से अधिक ऐलोपैथिक डॉक्टर नहीं हैं, जैसा कि एनएसएसओ के आंकड़ों से पता चलता है।

स्वास्थ्य कार्यबल की कमी के संकट को दूर करने के लिए ग्लोबल हेल्थ वर्कफोर्स एलायंस बनाया गया है, और डब्ल्यूएचओ ने 2006 में 57 देशों के बीच, भारत को स्वास्थ्य सेवा में मानव संसाधनों को लेकर ‘सबसे गंभीर संकट’ का सामना करने वाले देश के रुप में वर्गीकृत किया है।

दस साल बाद, 2016 में, डब्लूएचओ ने सतत विकास लक्ष्यों और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज को प्राप्त करने के लिए प्रति 10,000 आबादी पर 44.5 स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए अपने मानदंडों को संशोधित किया। यह भारत के मौजूदा स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों की संख्या से लगभग दोगुना है।

2016 में, भारत में नर्सों, मिड वाइव्स, डॉक्टरों, पैरामेडिकल पेशेवरों, स्वास्थ्य सहायकों और गैर-चिकित्सा कर्मियों जैसे प्रशासनिक और हाउसकीपिंग स्टाफ सहित 3.8 मिलियन का स्वास्थ्य सेवा कार्यबल था। ग्रामीण भारत और पूर्वी राज्यों में घनत्व भी कम(औसतन17)था।

हालांकि, इन अनुमानों में 790,000 सहायक नर्स मिडवाइव्स (एएनएम), ग्राम-स्तरीय महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता शामिल नहीं हैं, जो भारत की प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण हैं। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ के करण कहते हैं, "ऐसा इसलिए है, क्योंकि एएनएम को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार नर्स के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है।"

फरवरी 2019 में इंडियास्पेंड ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि एएनएम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रशिक्षण और लाइसेंस देने के लिए प्रारंभिक कदम तेलंगाना में चल रहे हैं, और इसे देश के अन्य हिस्सों में दोहराया जा सकता है। यदि एएनएम की गणना की जाती है, तो भारत में प्रति 10,000 आबादी पर 29 स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं, जो स्वास्थ्य के लिए मानव संसाधन के लिए 2006 डब्ल्यूएचओ के मानक से अधिक है, लेकिन अभी भी इसके बेंचमार्क से 14.5 कर्मचारी नीचे है।

पंजीकृत स्वास्थ्य कर्मियों की संख्या और एनएसएसओ द्वारा बताए गए आंकड़ों के बीच 12लाख का अंतर था। अध्ययन में कहा गया है कि रजिस्ट्री डेटा का उपयोग करते हुए डॉक्टरों, नर्सों और दाइयों का घनत्व 26.7 था, इस अंतर पर यह माना जा सकता है कि इन स्वास्थ्य पेशेवरों में से 20 फीसदी पंजीकृत हो सकते हैं, लेकिन वर्तमान में हेल्थकेयर कार्यबल में नियोजित नहीं हैं।

भारत की अदृश्य महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता

अध्ययन में कहा गया है कि इस कमी के लिए भारत की स्वास्थ्य सेवा कार्यबल में लापता महिलाओं की बात होनी चाहिए।

लगभग 19 फीसदी लोग जो ‘चिकित्सा में ग्रैजुएट’ हैं और 31 फीसदी लोग ‘चिकित्सा में डिप्लोमा या प्रमाणपत्र’ वाले हैं, वे कार्यबल में नहीं हैं। महिलाओं में, चिकित्सा में 26 फीसदी स्नातक और चिकित्सा में डिप्लोमा या प्रमाणपत्र रखने वालों में से 46 फीसदी कार्यबल से बाहर हैं।

पुरुषों और महिलाओं के बीच, ग्रैजुएट में रोजगार में सात प्रतिशत से अधिक अंक और चिकित्सा में प्रमाण पत्र या डिप्लोमा वाले लोगों में 30 प्रतिशत अंक का रोजगार अंतर है। स्वास्थ्य और पैरामेडिकल सेवाओं में व्यावसायिक प्रशिक्षण के संबंध में, कार्यबल के बाहर पुरुषों का अनुपात महिलाओं की तुलना में अधिक है।

करन कहते हैं, "यह देखा गया है कि ज्यादातर महिलाएं अपनी सबसे अधिक उत्पादक उम्र में शादी और बच्चे की देखभाल के कारण काम करने में चुनौतियों का सामना करती हैं और अक्सर उनके परिवार वाले उनके काम करने को लेकर फैसला लेते हैं।"

उन्होंने आगे कहा, "कार्यबल में प्रशिक्षित महिलाओं को शामिल करने से भारत को स्वास्थ्य कार्यकर्ता घनत्व में अंतर को कम करने में मदद मिलेगी और स्थिति में सुधार होगा।"

कार्यबल से बाहर 25-35 फीसदी महिलाओं में से, लिंग-संवेदनशील नीतियों के माध्यम से उनमें से कम से कम आधे को शामिल करना आसान हो सकता है।

सुलभ, लेकिन प्रशिक्षित नहीं

अध्ययन में कहा गया है कि भारत में वर्तमान में कार्यरत सभी स्वास्थ्य पेशेवरों को प्रशिक्षित नहीं किया जाता है: सभी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में से 54 फीसदी, जिनमें 25 फीसदी एलोपैथिक डॉक्टर शामिल हैं, के पास या तो अपर्याप्त प्रशिक्षण है या फिर कोई प्रशिक्षण नहीं है।

स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों के बीच अयोग्य कर्मचारियों का अनुपात बोर्ड भर में समान है:फार्मासिस्ट (62 फीसदी); आहार विशेषज्ञ, ऑप्टोमेट्रिस्ट और फिजियोथेरेपी सहायक (62 फीसदी) सहित स्वास्थ्य सहयोगी पेशेवर; नर्सें और दाइयां (58 फीसदी); और फिजियोथेरेपिस्ट, डायग्नोस्टिस्ट और अन्य (45 फीसदी)।

यदि स्वास्थ्य सेवा के लिए केवल योग्य मानव संसाधनों पर विचार किया जाए, तो प्रति 10,000 पर घनत्व 15.8 तक आ जाता है - जो 2006 के डब्ल्यूएचओ के मानकों से सात कार्यकर्ता कम है। पुराने मानक का उपयोग जारी है क्योंकि केवल विकसित देश ही 2016 मानकों को पूरा करते हैं।

अयोग्य मेडिकल पेशेवरों की समस्या से सिर्फ भारत ही नहीं जूझ रहा है, चीन, बांग्लादेश, युगांडा और ऑस्ट्रेलिया भी इस कमी का सामना कर रहे हैं।

हालांकि, इन अयोग्य चिकित्सकों को फरचार न करने देने का आदेश, भारत जैसे देश में मुश्किल होगा, जैसा कि एक सार्वजनिक नीति थिंक-टैंक, अकाउंटिब्लिटी इनिशेटिव की निदेशक अवनी कपूर कहती हैं। इसका परिणाम यह भी होगा कि कई समुदायों का किसी भी स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच नहीं होगा। उन्होंने आगे कहा," यह स्वीकार करते हुए कि हमारे पास एक बड़ा अनौपचारिक नेटवर्क है और भारत की प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली के एक बड़े हिस्से के लिए प्रशिक्षण निश्चित रूप से मदद करेगा, हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि आउट पेशेंट के बुनियादी देखभाल के लिए बहुत योग्य डिग्री की आवश्यकता नहीं है।" 

अनौपचारिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने से देखभाल की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है। 2016 में पश्चिम बंगाल में एक अध्ययन में ऐसा पाया गया था, जिससे अधिक रोगी उनसे परामर्श लें और उनकी आय भी बढ़े।

वर्तमान अध्ययन ने सुझाव दिया कि पारंपरिक जन्म परिचारक, सर्पदंश मरहम लगाने वाले और हड्डी ठीक करने वाले, अक्सर ग्रामीण आबादी में संपर्क के पहले स्रोत होते हैं, लेकिन वे स्वास्थ्य पेशेवरों के रूप में अयोग्य हैं, उन्हें पंजीकृत करके ‘मुख्यधारा’ में लाया जा सकता है। इसके अलावा, दाइयों को सरकार के साथ पंजीकृत किया जा सकता है और शिशुओं का जन्म कराने की अनुमति दी जा सकती है, जबकि कई अन्य स्वास्थ्य सेवा श्रमिकों को पैरामेडिकल कर्मियों के रूप में पंजीकृत किया जा सकता है।

हालांकि, भारत में इन श्रमिकों पर कोई स्पष्ट नीति नहीं है, जैसा कि पेपर में कहा गया है।

पूर्वी, मध्य भारत में बड़ा अंतर

अध्ययन के अनुसार, प्रति 10,000 आबादी पर सात स्वास्थ्य कर्मचारियों के साथ, झारखंड में भारत का सबसे खराब स्वास्थ्य-श्रमिक घनत्व है। कई केंद्रीय और पूर्वी राज्यों की स्थिति समान हैं: असम में 11 (प्रति 10,000), मध्य प्रदेश में 12, ओडिशा में 20, बिहार में 23 और पूर्वोत्तर राज्यों में 25 का आंकड़ा है। एक अपवाद पश्चिम बंगाल है, यहां प्रति 10,000 आबादी पर 36 स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं और यह राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है।

 

भारत में सबसे अधिक घनत्व दिल्ली में है, यहां 67 स्वास्थ्य कर्मचारियों का घनत्व है, इसके बाद केरल (66), केंद्र शासित प्रदेश (62), पंजाब (52) और हरियाणा (44) हैं।

करन कहते हैं, "भारत के पूर्वी राज्यों में अधिक चिकित्सा संस्थान खोलने की तत्काल आवश्यकता है। इन संस्थानों में से अधिकांश दक्षिण और पश्चिम में हैं, यही वजह है कि पूर्वी राज्यों के डॉक्टर वहां जाते हैं और अक्सर वापस नहीं लौटते हैं। अगर देश के अन्य हिस्सों में अधिक संस्थान खोले गए, तो संभावना है कि डॉक्टर अपने राज्यों में रहेंगे।”

Source: BMJ Open

अध्ययन के अनुसार, अधिकांश दक्षिणी भारतीय राज्यों में 29 के राष्ट्रीय औसत से अधिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता घनत्व हैं, केवल आंध्र प्रदेश अपवाद है, जहां प्रति 10,000 आबादी पर 25 का आंकड़ा है।

ग्रामीण-शहरी विषमताएं भी हैं। भारत की 71 फीसदी आबादी का घर होने के बावजूद, ग्रामीण भारत में 36 फीसदी स्वास्थ्य कर्मचारी हैं, जिसमें दंत चिकित्सकों (3.2 फीसदी) और फिजियोथेरेपिस्ट, डायग्नोस्टिस्ट और अन्य (14.7 फीसदी) के लिए घनत्व कम है। ग्रामीण भारत में 34 फीसदी डॉक्टर और 33 फीसदी नर्सें सेवा में हैं।

मुख्य रूप से निजी क्षेत्र में 

एक अध्ययन के अनुसार देश का 72.4 फीसदी स्वास्थ्य कार्यबल निजी क्षेत्र में कार्यरत है।

लगभग सभी (93.6 फीसदी) आयुष चिकित्सक (आयुर्वेदिक, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी चिकित्सक), 91.7 फीसदी दंत चिकित्सक, 80.4 फीसदी एलोपैथिक चिकित्सक और 55.3 फीसदी नर्स और दाइयां, निजी क्षेत्र में सेवा देते हैं। 

भारत में निजी स्वास्थ्य सेवा में लाभकारी और गैर-लाभकारी अस्पताल और निजी चिकित्सक शामिल हैं। सभी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में से 53 फीसदी स्व-नियोजित हैं, और केवल 6 फीसदी बड़े कॉर्पोरेट स्वास्थ्य सेवा कंपनियों में कार्यरत हैं।

यह आलेख हेल्थचेक पर पहली बार यहां प्रकाशित हुई है।

(यदवार विशेष संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

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नई दिल्ली: जहां भारत सरकार ने बेहतर और सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा का वादा किया है, वहीं एक नए अध्ययन में बताया गया है कि देश की स्वास्थ्य प्रणाली के साथ काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या इतनी कम है कि घनत्व के लिए वैश्विक मानकों को पूरा नहीं करती है और ग्रामीण स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी हद तक अक्षम है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने 3 जून, 2019 को राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा कार्यक्रम, प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएमजेएवाई) का जिक्र करते हुए मीडिया को बताया, "हम आयुष्मान भारत-पीएमजेएवाई और स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों को जन आंदोलन का रूप देंगे।"

सितंबर 2018 में शुरू की गई राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना- पीएमजेएवाई स्वास्थ्य पर होने वाले ‘भयावह खर्च’ को कम करने के लिए दस करोड़ गरीब परिवारों को 5 लाख रुपये तक का बीमा प्रदान करती है और भारत को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की ओर ले जाने का लक्ष्य रखती है।

हालांकि, 27 मई, 2019 को, एक ओपन-एक्सेस मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन,बीएमजे ओपन में बताई गई कमियों को देखते हुए लगता है कि इन लक्ष्यों को हासिल करना मुश्किल हो सकता है। 2016 में प्रति 10,000 आबादी पर डॉक्टरों, नर्सों और दाइयों का घनत्व 20.6 था। यह आंकड़ा 2011-12 के 19 के आंकड़े से ज्यादा था। ये आंकड़े राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) डेटा पर आधारित थे। अध्ययन में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, इंडियन एसोसिएशन ऑफ फिजियोथेरेपिस्ट, इंडियन नर्सिंग काउंसिल और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय जैसे संगठनों से मिले डेटा का भी उपयोग किया गया।

नए मेडिकल, नर्सिंग और पैरामेडिकल तकनीकी शिक्षा संस्थानों की संख्या 2016 तक के दशक में बढ़े हैं, और इसी वजह से इन संख्या में बढ़ोतरी हुई है। दिल्ली स्थित संस्था, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआई) द्वारा संचालित ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ’ में अडिशनल प्रोफेसर, अनूप करण कहते हैं, "हालांकि, यह वृद्धि अभी भी डब्ल्यूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) द्वारा निर्धारित न्यूनतम मानकों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है, जहां प्रति 10,000 जनसंख्या पर 22.8 स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं। इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए लगभग 250,000 स्वास्थ्य कर्मचारियों की आवश्यकता है।"

यह साबित करने के लिए कि भारत के कई स्वास्थ्य संकटों के लिए स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में कर्मचारियों की पर्याप्त संख्या होना जरूरी है,कुछ देश से जुड़े तथ्यों पर ध्यान देना भी आवश्यक है-विश्व भर में 17 फीसदी मातृ मृत्यु, गैर-संचारी रोगों के बढ़ते मामले, जो 2016 में 61 फीसदी मौतों के लिए जिम्मेदार थे; और कुष्ठ और मलेरिया जैसे संचारी रोगों को नियंत्रित करने के लिए एक सतत संघर्ष। चूंकि अधिकांश भारतीय स्वास्थ्य खर्चों के लिए अपनी जेब से भुगतान करते हैं इसलिए स्वास्थ्य खर्चों को वहन न कर पाने के कारण हर साल लाखों लोग गरीबी में चले जाते हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जुलाई 2018 की रिपोर्ट में बताया है। 

हेल्थकेयर कार्यबल: सबसे गंभीर संकट

जैसा कि हमने पहले भी कहा है, 2006 के डब्ल्यूएचओ मानदंडों के अनुसार, 10 डॉक्टरों सहित - प्रति 10,000 जनसंख्या पर न्यूनतम 22.8 स्वास्थ्य कार्यकर्ता होने चाहिए। भारत में प्रति 10,000 आबादी पर 20.6 डॉक्टर, नर्स और दाइयां हैं, और 5.9 से अधिक ऐलोपैथिक डॉक्टर नहीं हैं, जैसा कि एनएसएसओ के आंकड़ों से पता चलता है।

स्वास्थ्य कार्यबल की कमी के संकट को दूर करने के लिए ग्लोबल हेल्थ वर्कफोर्स एलायंस बनाया गया है, और डब्ल्यूएचओ ने 2006 में 57 देशों के बीच, भारत को स्वास्थ्य सेवा में मानव संसाधनों को लेकर ‘सबसे गंभीर संकट’ का सामना करने वाले देश के रुप में वर्गीकृत किया है।

दस साल बाद, 2016 में, डब्लूएचओ ने सतत विकास लक्ष्यों और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज को प्राप्त करने के लिए प्रति 10,000 आबादी पर 44.5 स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए अपने मानदंडों को संशोधित किया। यह भारत के मौजूदा स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों की संख्या से लगभग दोगुना है।

2016 में, भारत में नर्सों, मिड वाइव्स, डॉक्टरों, पैरामेडिकल पेशेवरों, स्वास्थ्य सहायकों और गैर-चिकित्सा कर्मियों जैसे प्रशासनिक और हाउसकीपिंग स्टाफ सहित 3.8 मिलियन का स्वास्थ्य सेवा कार्यबल था। ग्रामीण भारत और पूर्वी राज्यों में घनत्व भी कम(औसतन17)था।

हालांकि, इन अनुमानों में 790,000 सहायक नर्स मिडवाइव्स (एएनएम), ग्राम-स्तरीय महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता शामिल नहीं हैं, जो भारत की प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण हैं। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ के करण कहते हैं, "ऐसा इसलिए है, क्योंकि एएनएम को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार नर्स के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है।"

फरवरी 2019 में इंडियास्पेंड ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि एएनएम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रशिक्षण और लाइसेंस देने के लिए प्रारंभिक कदम तेलंगाना में चल रहे हैं, और इसे देश के अन्य हिस्सों में दोहराया जा सकता है। यदि एएनएम की गणना की जाती है, तो भारत में प्रति 10,000 आबादी पर 29 स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं, जो स्वास्थ्य के लिए मानव संसाधन के लिए 2006 डब्ल्यूएचओ के मानक से अधिक है, लेकिन अभी भी इसके बेंचमार्क से 14.5 कर्मचारी नीचे है।

पंजीकृत स्वास्थ्य कर्मियों की संख्या और एनएसएसओ द्वारा बताए गए आंकड़ों के बीच 12लाख का अंतर था। अध्ययन में कहा गया है कि रजिस्ट्री डेटा का उपयोग करते हुए डॉक्टरों, नर्सों और दाइयों का घनत्व 26.7 था, इस अंतर पर यह माना जा सकता है कि इन स्वास्थ्य पेशेवरों में से 20 फीसदी पंजीकृत हो सकते हैं, लेकिन वर्तमान में हेल्थकेयर कार्यबल में नियोजित नहीं हैं।

भारत की अदृश्य महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता

अध्ययन में कहा गया है कि इस कमी के लिए भारत की स्वास्थ्य सेवा कार्यबल में लापता महिलाओं की बात होनी चाहिए।

लगभग 19 फीसदी लोग जो ‘चिकित्सा में ग्रैजुएट’ हैं और 31 फीसदी लोग ‘चिकित्सा में डिप्लोमा या प्रमाणपत्र’ वाले हैं, वे कार्यबल में नहीं हैं। महिलाओं में, चिकित्सा में 26 फीसदी स्नातक और चिकित्सा में डिप्लोमा या प्रमाणपत्र रखने वालों में से 46 फीसदी कार्यबल से बाहर हैं।

पुरुषों और महिलाओं के बीच, ग्रैजुएट में रोजगार में सात प्रतिशत से अधिक अंक और चिकित्सा में प्रमाण पत्र या डिप्लोमा वाले लोगों में 30 प्रतिशत अंक का रोजगार अंतर है। स्वास्थ्य और पैरामेडिकल सेवाओं में व्यावसायिक प्रशिक्षण के संबंध में, कार्यबल के बाहर पुरुषों का अनुपात महिलाओं की तुलना में अधिक है।

करन कहते हैं, "यह देखा गया है कि ज्यादातर महिलाएं अपनी सबसे अधिक उत्पादक उम्र में शादी और बच्चे की देखभाल के कारण काम करने में चुनौतियों का सामना करती हैं और अक्सर उनके परिवार वाले उनके काम करने को लेकर फैसला लेते हैं।"

उन्होंने आगे कहा, "कार्यबल में प्रशिक्षित महिलाओं को शामिल करने से भारत को स्वास्थ्य कार्यकर्ता घनत्व में अंतर को कम करने में मदद मिलेगी और स्थिति में सुधार होगा।"

कार्यबल से बाहर 25-35 फीसदी महिलाओं में से, लिंग-संवेदनशील नीतियों के माध्यम से उनमें से कम से कम आधे को शामिल करना आसान हो सकता है।

सुलभ, लेकिन प्रशिक्षित नहीं

अध्ययन में कहा गया है कि भारत में वर्तमान में कार्यरत सभी स्वास्थ्य पेशेवरों को प्रशिक्षित नहीं किया जाता है: सभी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में से 54 फीसदी, जिनमें 25 फीसदी एलोपैथिक डॉक्टर शामिल हैं, के पास या तो अपर्याप्त प्रशिक्षण है या फिर कोई प्रशिक्षण नहीं है।

स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों के बीच अयोग्य कर्मचारियों का अनुपात बोर्ड भर में समान है:फार्मासिस्ट (62 फीसदी); आहार विशेषज्ञ, ऑप्टोमेट्रिस्ट और फिजियोथेरेपी सहायक (62 फीसदी) सहित स्वास्थ्य सहयोगी पेशेवर; नर्सें और दाइयां (58 फीसदी); और फिजियोथेरेपिस्ट, डायग्नोस्टिस्ट और अन्य (45 फीसदी)।

यदि स्वास्थ्य सेवा के लिए केवल योग्य मानव संसाधनों पर विचार किया जाए, तो प्रति 10,000 पर घनत्व 15.8 तक आ जाता है - जो 2006 के डब्ल्यूएचओ के मानकों से सात कार्यकर्ता कम है। पुराने मानक का उपयोग जारी है क्योंकि केवल विकसित देश ही 2016 मानकों को पूरा करते हैं।

अयोग्य मेडिकल पेशेवरों की समस्या से सिर्फ भारत ही नहीं जूझ रहा है, चीन, बांग्लादेश, युगांडा और ऑस्ट्रेलिया भी इस कमी का सामना कर रहे हैं।

हालांकि, इन अयोग्य चिकित्सकों को फरचार न करने देने का आदेश, भारत जैसे देश में मुश्किल होगा, जैसा कि एक सार्वजनिक नीति थिंक-टैंक, अकाउंटिब्लिटी इनिशेटिव की निदेशक अवनी कपूर कहती हैं। इसका परिणाम यह भी होगा कि कई समुदायों का किसी भी स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच नहीं होगा। उन्होंने आगे कहा," यह स्वीकार करते हुए कि हमारे पास एक बड़ा अनौपचारिक नेटवर्क है और भारत की प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली के एक बड़े हिस्से के लिए प्रशिक्षण निश्चित रूप से मदद करेगा, हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि आउट पेशेंट के बुनियादी देखभाल के लिए बहुत योग्य डिग्री की आवश्यकता नहीं है।" 

अनौपचारिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने से देखभाल की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है। 2016 में पश्चिम बंगाल में एक अध्ययन में ऐसा पाया गया था, जिससे अधिक रोगी उनसे परामर्श लें और उनकी आय भी बढ़े।

वर्तमान अध्ययन ने सुझाव दिया कि पारंपरिक जन्म परिचारक, सर्पदंश मरहम लगाने वाले और हड्डी ठीक करने वाले, अक्सर ग्रामीण आबादी में संपर्क के पहले स्रोत होते हैं, लेकिन वे स्वास्थ्य पेशेवरों के रूप में अयोग्य हैं, उन्हें पंजीकृत करके ‘मुख्यधारा’ में लाया जा सकता है। इसके अलावा, दाइयों को सरकार के साथ पंजीकृत किया जा सकता है और शिशुओं का जन्म कराने की अनुमति दी जा सकती है, जबकि कई अन्य स्वास्थ्य सेवा श्रमिकों को पैरामेडिकल कर्मियों के रूप में पंजीकृत किया जा सकता है।

हालांकि, भारत में इन श्रमिकों पर कोई स्पष्ट नीति नहीं है, जैसा कि पेपर में कहा गया है।

पूर्वी, मध्य भारत में बड़ा अंतर

अध्ययन के अनुसार, प्रति 10,000 आबादी पर सात स्वास्थ्य कर्मचारियों के साथ, झारखंड में भारत का सबसे खराब स्वास्थ्य-श्रमिक घनत्व है। कई केंद्रीय और पूर्वी राज्यों की स्थिति समान हैं: असम में 11 (प्रति 10,000), मध्य प्रदेश में 12, ओडिशा में 20, बिहार में 23 और पूर्वोत्तर राज्यों में 25 का आंकड़ा है। एक अपवाद पश्चिम बंगाल है, यहां प्रति 10,000 आबादी पर 36 स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं और यह राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है।

 

भारत में सबसे अधिक घनत्व दिल्ली में है, यहां 67 स्वास्थ्य कर्मचारियों का घनत्व है, इसके बाद केरल (66), केंद्र शासित प्रदेश (62), पंजाब (52) और हरियाणा (44) हैं।

करन कहते हैं, "भारत के पूर्वी राज्यों में अधिक चिकित्सा संस्थान खोलने की तत्काल आवश्यकता है। इन संस्थानों में से अधिकांश दक्षिण और पश्चिम में हैं, यही वजह है कि पूर्वी राज्यों के डॉक्टर वहां जाते हैं और अक्सर वापस नहीं लौटते हैं। अगर देश के अन्य हिस्सों में अधिक संस्थान खोले गए, तो संभावना है कि डॉक्टर अपने राज्यों में रहेंगे।”

Source: BMJ Open

अध्ययन के अनुसार, अधिकांश दक्षिणी भारतीय राज्यों में 29 के राष्ट्रीय औसत से अधिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता घनत्व हैं, केवल आंध्र प्रदेश अपवाद है, जहां प्रति 10,000 आबादी पर 25 का आंकड़ा है।

ग्रामीण-शहरी विषमताएं भी हैं। भारत की 71 फीसदी आबादी का घर होने के बावजूद, ग्रामीण भारत में 36 फीसदी स्वास्थ्य कर्मचारी हैं, जिसमें दंत चिकित्सकों (3.2 फीसदी) और फिजियोथेरेपिस्ट, डायग्नोस्टिस्ट और अन्य (14.7 फीसदी) के लिए घनत्व कम है। ग्रामीण भारत में 34 फीसदी डॉक्टर और 33 फीसदी नर्सें सेवा में हैं।

मुख्य रूप से निजी क्षेत्र में 

एक अध्ययन के अनुसार देश का 72.4 फीसदी स्वास्थ्य कार्यबल निजी क्षेत्र में कार्यरत है।

लगभग सभी (93.6 फीसदी) आयुष चिकित्सक (आयुर्वेदिक, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी चिकित्सक), 91.7 फीसदी दंत चिकित्सक, 80.4 फीसदी एलोपैथिक चिकित्सक और 55.3 फीसदी नर्स और दाइयां, निजी क्षेत्र में सेवा देते हैं। 

भारत में निजी स्वास्थ्य सेवा में लाभकारी और गैर-लाभकारी अस्पताल और निजी चिकित्सक शामिल हैं। सभी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में से 53 फीसदी स्व-नियोजित हैं, और केवल 6 फीसदी बड़े कॉर्पोरेट स्वास्थ्य सेवा कंपनियों में कार्यरत हैं।

यह आलेख हेल्थचेक पर पहली बार यहां प्रकाशित हुई है।

(यदवार विशेष संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

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