महिला समूहों की भागीदारी सुधार रही है ओडिशा की सेहत

एक सामुदायिक कर्मी मोनोमिता नाग (35) ‘तिरंगा’ पुस्तिका के से भोजन की विविधता पर गर्भवती महिलाओं को जानकारी दे रही हैं। धाना अंजारिया (दाएं से दूसरी) का वज़न मोनोमिता की सलाह के बाद 41 किलो से बढ़कर 54 किलो हो गया है।

कोरापुट और अंगुल, ओडिशाः ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से 500 किलोमीटर पश्चिम में कोरापुट ज़िले के दुमरिपुट गांव में धाना अंजारिया दो अन्य गर्भवती महिलों के साथ बैठी हैं। वह गर्भवती महिलाओं के लिए पोषण पर बताए जा रहे सुझावों को ध्यान से सुन रही हैं।

सामुदायिक कर्मी (सीआरपी) मोनोमिता नाग (35), इन सभी को नारंगी, हरे और सफ़ेद रंग वाली एक पुस्तिका से भोजन में विविधता के महत्व पर निर्देश दे रही हैं। यह तिरंगे (भारतीय झंडे) के रंग हैं, लेकिन पुस्तिका के बारे में पूरी जानकारी रखने वाली अंजारिया ने इससे अन्य अर्थ भी समझे हैं। “दूध, अंडे, मीट और दालों के लिए नारंगी, जड़ों, कंद और अनाज के लिए सफ़ेद और सब्ज़ियों के लिए हरा है,” सात महीने की गर्भवती धाना (21) ने बताया।

धाना अपनी शादी के पहले ही साल में गर्भवती हो गई थीं। वह ना तो एनीमिक हैं, और ना ही कमज़ोर और उन्हें यह भी विश्वास है कि उनके बच्चे स्वस्थ पैदा होंगे।

मोनोमिता से उन्हें पोषण के बारे में सलाह उनकी गर्भावस्था से पहले ही मिलनी शुरू हो गई थी। यह तब शुरू हुई थी जब वह एक नव विवाहिता के रूप में अपने पति के साथ मोनोमिता से मिली थी। धाना का मिड-अपर आर्म सर्कमफ़्रेंस (एमयूएसी) -- पोषण की स्थिति के जल्द आंकलन के लिए उपयोग होने वाला-- 22 सेंटीमीटर था। (23 सेंटीमीटर से कम एमयूएसी से महिलाओं में कुपोषण का संकेत मिलता है)।

धाना ने मोनोमिता की सलाह मानी, वह एक दिन में दो बार की बजाय चार बार खाने लगीं, इसमें मांसाहारी भोजन भी शामिल था, और उन्होंने अधिक आराम करना भी शुरू किया। वह अपनी कैल्शियम या आयरन फ़ोलिक एसिड गोलियां भी नियमित रूप से खाने लगीं। कुछ ही महीनों में उनका वज़न 41 किलो से बढ़कर 54 किलो हो गया।

मोनोमिता 2006 में शुरू हुए ओडिशा लाइवलीहुड मिशन के हिस्से के तौर पर माइक्रोफ़ाइनेंस गतिविधियों पर गांव में स्वयं-सहायता समूहों के साथ मीटिंग करती हैं। यह ग्रामीण क्षेत्रों में ग़रीबी कम करने के लिए बनी एक स्वायत्त संस्था है जो पंचायती राज विभाग के तहत आती है।

पोषण संबंधी परिणामों को बेहतर बनाने में महिलाओं के समूह पहले भी असरदार साबित हुए हैं -- इंडोनेशिया, बांग्लादेश और नेपाल में सामुदायिक सशर्त कैश ट्रांसफर कार्यक्रमों के ज़रिए आर्थिक सशक्तिकरण के साथ यह आइडिया लागू किया जा चुका है।

भारत में यह रणनीति केरल के कुडुंबश्री कार्यक्रम, आंध्र प्रदेश के सोसाइटी फ़ॉर एलिमिनेशन ऑफ़ रूरल पावर्टी प्रोजेक्ट, तेलंगाना के कुछ हिस्सों और जामखेड़ (महाराष्ट्र) में भी अपनाई गई है। “स्वास्थ्य के बिना, आजीविका [कार्यक्रम] नहीं चल सकते,” ओएलएम अंगुल के ब्लॉक प्रोजेक्ट मैनेजर, सरोज कुमार ने कहा। “ज़्यादातर ग़रीब लोग दवाएं ख़रीदने में काफ़ी पैसा ख़र्च कर देते हैं। अगर वह इस पैसे को बचाते हैं, तो वह इसका इस्तेमाल अपनी आमदनी बढ़ाने में कर सकते हैं या फिर वह उस पैसे को बचाकर रख सकते हैं।”

इंडियास्पेंड ने ओएलएम के तहत स्वाभिमान को लागू किए जाने के तरीक़े को समझने और इसके प्रभाव के अध्ययन के लिए कोरापुट और अंगुल ज़िलों का दौरा किया। हमने पाया कि परियोजना के दायरे में आने वाले गांवों में बदलाव के साथ ही किशोरों और महिलाओं में स्वास्थ्य और पोषण के बारे में जागरुकता फैल रही है।

स्वयं-सहायता क्यों कारगर है

ओडिशा में अंगुल ज़िले के हंडापा ग्राम पंचायत कार्यालय में सामुदायिक कर्मियों की एक क्लस्टर-लेवल मीटिंग। राज्य में बदलाव लाने में स्वयं-सहायता समूह महत्वपूर्ण साधन बन गए हैं।

ओडिशा में बदलाव लाने में स्वयं-सहायता समूह महत्वपूर्ण साधन बन गए हैं: नेशनल रूरल लाइवलीहुड मिशन के ज़रिए ग़रीबी कम करने के लिए इनका इस्तेमाल करने वाला ओ़डिशा पहला राज्य है -- राज्य में ऐसे 385,382 समूह हैं जिनके 41 लाख सदस्य हैं और यह 28 लाख परिवारों तक पहुंच रखते हैं। आमतौर पर, प्रत्येक परिवार में कम से कम एक महिला एक स्वयं-सहायता समूह की सदस्य है और प्रत्येक गांव में ऐसे 10 से 12 समूह हैं।

मोनोमिता 2016 से एक पोषण सखी के तौर पर कार्य कर रही हैं। उन्हें किशोरियों और महिलाओं की पोषण की स्थिति में सुधार के लिए मीटिंग और जागरूकता गतिविधियां आयोजित करने का प्रशिक्षण मिला है। मोनोमिता बिहार, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में बदलाव लाने वाले स्वाभिमान कार्यक्रम का एक हिस्सा हैं।

इन राज्यों के चार ज़िलों – पूर्णिया (बिहार), बस्तर (छत्तीसगढ़), कोरापुट और अंगुल (ओडिशा) -- में चलाया जाने वाला यह कार्यक्रम 356 से अधिक गांवों और 125,097 परिवारों तक पहुंच रखता है। अभी तक ओडिशा की 39 ग्राम पंचायतों में इस कार्यक्रम से 5,824 लड़कियों और महिलाओं को लाभ मिला है।

स्वाभिमान का ज़ोर किशोरियों, नव विवाहित दंपत्तियों, गर्भवती महिलाओं और दो साल से कम उम्र के बच्चों की मांओं पर है, इनमें कुपोषण का ख़तरा अधिक होता है। इसका लक्ष्य पौष्टिक भोजन में सुधार करना, एनीमिया के मामलों में कमी लाना, स्वास्थ्य सेवाओं की मांग बढ़ाना, स्वच्छता को बढ़ाना और अनचाहे गर्भ को रोकना है।

पोषण सखियां इन स्वास्थ्य और पोषण लक्ष्यों को पूरा करने के लिए नव विवाहित दंपत्तियों और किशोरियों के साथ हर महीने बैठक करती हैं। वह स्थानीय महिलाओं को किचन गार्डन बनाने में भी सहायता करती हैं जिससे परिवार के भोजन की विविधता में सुधार हो सकता है।

2018 में अंगुल और कोरापुट ज़िलों में 1,191 किशोरियों, 614 गर्भवती महिलाओं और दो साल से कम उम्र के 1,183 बच्चों के बीच किए गए एक मध्यावधि सर्वे में कई क्षेत्रों में सुधार दिखा थाः किशोरियों में सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल बढ़ा था, स्कूलों में उन्होंने दोबारा दाख़िला लिया था, गर्भवती महिलाओं के भोजन में सुधार हुआ था -- और आयरन और फ़ोलिक एसिड गोलियों का सेवन बढ़ा था -- और सामुदायिक स्वास्थ्य और स्वच्छता गतिविधियों में हिस्सेदारी बढ़ी थी।

इस कार्यक्रम का पूरा प्रभाव 2020 में अंतिम सर्वे के बाद ही सामने आएगा।

“ग़रीबी हटाने की अधिकतर कोशिशों का महिलाओं को सशक्त बनाने और उनके पोषण पर असर का आंकलन नहीं हुआ है,” ओडिशा लाइवलीहुड मिशन की स्टेट मिशन मैनेजमेंट यूनिट की एडिशनल सीईओ (ऑपरेशंस), बबीता महापात्र ने बताया। यही वजह है कि स्वाभिमान, महिलाओं के पोषण के लिए की जा रही कोशिशों का एक सही मंच है, उन्होंने कहा।

पोषण सखियां, महिलाओं को विलेज हेल्थ एंड न्यूट्रीशन डेज़ (वीएचएनडी) में हिस्सा लेने के लिए भी प्रोत्साहित करती हैं -- इन्हें ममता दिवस या मदर्स डे के तौर पर भी जाना जाता है -- इसमें महिलाओं की एनीमिया और ब्लड प्रेशर के लिए जांच की जाती है, उनका वज़न लिया जाता है और कैल्शियम और आयरन फ़ोलिक एसिड की गोलियां दी जाती हैं। यह आयोजन स्वास्थ्य विभाग के आशा कार्यकर्ता, एएनएम और महिला एवं बाल विकास विभाग की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता संयुक्त तौर पर करते हैं।

“कार्यक्रम को लागू करने में पोषण सखियों को शामिल करने का एक फ़ायदा है -- वह इसमें हिस्सा लेने वालों के गांवों में ही रहती हैं, जबकि आशा वर्कर और एएनएम अक्सर किसी दूसरी जगह पर रहती हैं। इससे उन्हें महिलाओँ को पीएचसी ले जाने जैसी आवश्यक्ताओं को पूरा करने में सहायता मिलती है,” ग्राम पंचायत में ओएलएम रिकॉर्ड संभालने वाली मीना खोड़ा  ने बताया।

तीनों राज्यों में, स्टेट लाइवलीहुड मिशन, इस मामले में ओएलएम, कार्यक्रम को स्वास्थ्य, नागरिक आपूर्ति (जन वितरण प्रणाली के लिए), समाज कल्याण, कृषि और पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग विभागों के साथ मिलकर चलाया जाता है। कार्यक्रम को तकनीकी और वित्तीय सहायता यूनिसेफ़ से मिलती है, जो क्षमता निर्माण में भी शामिल है।

मैं पीएचडी करने के बाद शादी करूंगी

हमारे शरीर अभी भी विकसित हो रहे है; ऐसे में शादी करना और बच्चों को जन्म देना ठीक नहीं है,स्वाभिमान कार्यक्रम के हिस्से के तौर पर बनाए गए ‘किशोरी समूह’ की सचिव, हरप्रिया बेहरा, 18, (बीच में) कहती हैं।

रीमा रानी बेहरा जब 16 साल की थीं तो उनके माता-पिता ने उनकी शादी 26 साल के व्यक्ति से तय कर दी थी। शादी से तीन दिन पहले बेहरा ने अपने चचेरे भाई को फ़ोन किया जो पुलिस को साथ लेकर आया और शादी रुक गई। बेहरा अब अपने अंकल के साथ डुमरिपुट में हैं और उनका सपना एक पुलिस अधिकारी बनना है। “मैने उन्हें बताया था कि मैं शादी नहीं करना चाहती, मैं पढ़ना चाहती हूं लेकिन उन्होंने इसे अनसुना कर दिया था,” उन्होंने कहा। वह पढ़ाई जारी नहीं रख सकी क्योंकि उनके माता-पिता ने 10वी के बाद उन्हें स्कूल लीविंग सर्टिफ़िकेट लेने नहीं दिया और उनके 18 की होते ही शादी करने की धमकी दी थी। 

कोरापुट में 20 से 24 साल की उम्र की हर तीन में से एक महिला (34%) की शादी 18 साल से पहले हो गई थी (यह ओडिशा के औसत से 13% अधिक है), नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस-4) के आंकड़ों के अनुसार।

“हमारे शरीर अभी भी विकसित हो रहे हैं; हमारे शरीर के पूरी तरह विकसित होने से पहले शादी करना और बच्चों को जन्म देना ठीक नहीं है,” हरप्रिया बेहरा ने कहा। स्वाभिमान परियोजना के हिस्से के तौर पर स्वच्छता,  स्वास्थ्य और पोषण के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए बनाए गए किशोरी समूह की वह सचिव हैं।

युवा महिलाओं के जीवन में अन्य तरीक़ों से बड़े बदलाव आए हैं। “हम पहले कपड़े के पैड का इस्तेमाल करते थे, वह दुर्भाग्यपूर्ण था लेकिन हमें उससे बेहतर कुछ नहीं पता था,” सुमित्रा खिल्लो (22) ने बताया। अब महिलाओं को आशा कार्यकर्ताओं और एएनएम कर्मियों से पैड मिलते हैं, लेकिन उनकी शिकायत है कि पूरे माहवारी चक्र के लिए यह पैड पर्याप्त नहीं होते। हमने पाया कि माहवारी चक्र के दौरान महिलाओं को घर से बाहर रखने के चलन में भी धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है।

कुछ पुरानी रूढ़ियों में अभी भी बदलाव नहीं आया है। अधिकतर घरों में शौचालय हैं, लेकिन इसके बावजूद ग्रामीण अक्सर खुले में शौच करते हैं। “यह बहुत छोटा है, मुझे इसका इस्तेमाल करना अच्छा नहीं लगता,” एक किशोरी ने अपने घर में शौचालय के बारे में कहा। उसने बताया कि उसके तीन रिश्तेदार भी शौचालय का इस्तेमाल नहीं करते।

गांव में अधिकतर लड़कियां स्कूल और कॉलेज जाने के लिए बस से यात्रा करती हैं लेकिन उन्हें अपने हक़ के लिए अपने माता-पिता से बहस करनी पड़ती है। “हमें पता है कि हमें क्यों 18 साल की उम्र के बाद शादी करनी चाहिए। [लेकिन] मैं 30 साल की उम्र में शादी करूंगी, पीएचडी करने के बाद,” समिति की सचिव हरप्रिया बेहरा ने कहा। 

हमने जिन पोषण सखियों से बातचीत की उनका कहना था कि लड़कियों की शादी को 18 साल की उम्र तक टालने के लिए ज़ोर देने से परिवार नाराज़ हो जाते हैं लेकिन अधिकतर मामलों में माता-पिता मान जाते हैं। “लड़कियों के लिए यहां 16 और 17 साल की उम्र में शादी सामान्य थी। लेकिन पिछले कुछ साल से यह बदल रहा है। लड़कियों के 18 साल में शादी करने पर भी वह बच्चों को जन्म देने के लिए 20 से 21 साल की उम्र तक इंतज़ार करना चाहती हैं,” मोनोमिता ने कहा।

यूनिसेफ़ की ओर से साझा किए गए मध्यावधि के सर्वे के अनुसार, स्वाभिमान के शुरू होने के बाद पल्लाहारा और कोरापुट सदर के दो ब्लॉक में 39 किशोरियों ने दोबारा स्कूल जाना शुरू किया है। इसके साथ ही किशोरियों के ऐसे घरों की संख्या भी कम हुई है जहां खुले में शौच किया जाता था। आयरन फ़ोलिक एसिड गोलियां लेने और शिक्षा और ख़र्च पर ख़ुद निर्णय करने वाली किशोरियों की संख्या बढ़ी है।

हालांकि, ऐसी किशोरियों की संख्या में कमी आई है जो सोचती थीं कि वह यह फैसला कर सकती हैं उन्हें किससे शादी करनी है और जिन्होंने भोजन में विविधता की जानकारी दी है।

Source: Swabhimaan Programme, midline survey results.

अपनी बात कहने पर ज़ोर

मोनोमिता नाग यह दिखा रही हैं कि लघु योजना बैठकें कैसे आयोजित की जाती हैं। इसमें महिलाओं से संबंधित बड़े मुद्दों पर तीन महीने में लगभग 12 दिन सालाना चर्चा करना शामिल होता है।

अंगुल ज़िले में हंडापा ग्राम पंचायत में 1,439 निवासियों वाले कालियाकोटा गांव के एक उदाहरण से पता चलता है कि समुदायों के लिए स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता से जुड़ना क्यों महत्वपूर्ण है। कालियाकोटा में एक साल तक गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को आयरन फ़ोलिक एसिड गोलियां नहीं मिली थी, जिससे उनके स्वास्थ्य के लिए ख़तरा बढ़ गया। वीएचएनडी और जन्म देने से पूर्व के चेक-अप भी नहीं हुए थे क्योंकि उनके इलाक़े की एएनएम की मृत्यु हो गई थी और उनके स्थान पर कोई नहीं आया था।

इसके बाद लोगों ने लघु योजना के तहत बैठक की और स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता की चुनौतियों पर चर्चा की। इस योजना में महिलाओं से संबंधित बड़े मुद्दों पर तीन महीने में लगभग 12 दिन चर्चा करना शामिल होता है। इसमें शौचालय उपलब्ध होने, जन वितरण प्रणाली तक पहुंच या पीने का पानी या आयरन फ़ोलिक एसिड की गोलियां शामिल हो सकते हैं।

जब कालियाकोटा की महिलाओं ने अपनी समस्याओं की जानकारी दी, तो उनके सीआरपी ने इसे ब्लॉक डवेलेपमेंट अधिकारियों तक पहुंचाया जिन्होंने गांव के लिए एक एएनएम को तैनात किया। इन बैठकों में जन वितरण प्रणाली, महिला एवं बाल विकास और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी समस्याओं के समाधान के लिए एक मंच पर आते हैं।

एक अन्य मामले में, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में उपलब्ध सेनिटरी नैपकिन, फ़ंड की कमी के कारण अंगुल में पल्लाहारा ब्लॉक के स्कूल में नहीं पहुंचाए जा रहे थे। एक मीटिंग में इसका समाधान निकाला गया -- जन वितरण आपूर्तियों के साथ नैपकिन भेजे गए।

मध्यावधि सर्वे से पता चला है कि लघु योजना बैठकों से सार्वजनिक सेवाओं की मांग और उपयोग भी बढ़ा है। उदाहरण के लिए, परियोजना के तहत आने वाले जन वितरण प्रणाली तक पहुंच वाले परिवारों में रहने वाली मांओं की संख्या 2016 में 68% से बढ़कर 2018 में 99% पर पहुंच गई; और इसी अवधि में सप्लिमेंटरी फ़ूड प्राप्त करने वालों की संख्या 66.7% से बढ़कर 96.7% हो गई।

किचन गार्डन: बिना किसी लागत के पोषण

पोषण सखी, साइबालिनी अमानता टिकिना प्रधान के गार्डन से कई सब्ज़ियां और फल एकत्र करती हैं और प्लेट में रखकर उन्हें यह समझाती हैं कि सात महीने की गर्भवती होने के कारण उन्हें घर में उगाई गई सब्ज़ियों की क्यों जरूरत है। इन सब्ज़ियों में मोरिंगा पत्तियां, हरा पपीता, नींबू और गोभी हैं।

अंगुल ज़िले के किशोरनगर में 22 वर्षीय टिकिना प्रधान के घर के पीछे दो एकड़ के खेत में गोभी की फ़सल कटाई के लिए तैयार है। एक पोषण सखी, साइबालिनी अमानता प्रधान के गार्डन से कई सब्ज़ियां और फल इकट्ठा कर प्लेट में रखकर यह समझाती हैं कि सात महीने की गर्भवती होने के कारण उन्हें घर में उगाई गई सब्ज़ियों की ज़रूरत क्यों है। इन सब्ज़ियों में मोरिंगा पत्तियां, हरा पपीता, नींबू और गोभी हैं।

“हमारे पास हर चीज़ थी, लेकिन हमें संतुलित भोजन के बारे में नहीं पता था,” टिकिना प्रधान ने कहा। अमानता के निर्देश के अनुसार, अब वह भोजन में अंडे, मीट और हरी सब्ज़ियों के साथ कैल्शियम और आयरन सप्लिमेंट भी लेती हैं।

अमानता के पास पहले से एक सब्ज़ियों का खेत है, स्वयं-सहायता समूहों में अधिकतर महिलाओं को अपने घर के पीछे सब्ज़ियां उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है जिससे खाद्य सुरक्षा और भोजन में विविधता को सुनिश्चित किया जा सके। उपजाऊ ज़मीन और पानी उपलब्ध होने के कारण अंगुल में अधिकतर घरों में पहले कम मात्रा में सब्ज़ियां उगाई जाती थी, लेकिन अब यह सामान्य प्रक्रिया बन गई है।

“पहले महिलाएं केवल बैंगन या गोभी उगाती थीं, अब वह सभी प्रकार की सब्ज़ियां और फल उगा रही हैं,” अमानता ने बताया।  इसके साथ ही, अधिकतर पोषण बाग़ ऑर्गेनिक हैं। उनमें किसी केमिकल फ़र्टिलाइज़र का इस्तेमाल नहीं किया जाता।

सर्वे के अनुसार, अपर्याप्त भोजन को लेकर चिंता करने वाली महिलाओं की संख्या 2016 से 2018 में 5.9% घटी है। इसके साथ ही विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्रियों की खपत करने और दिन में कम से कम तीन बार भोजन करने वाली महिलाओं की संख्या भी 2016 की तुलना में 2018 में बढ़ी थी।

Source: Swabhimaan Programme, midline survey results.

(यदवार, इंडियास्पेंड/हेल्थचेक के साथ स्पेशल कॉरेसपॉन्डेंट हैं)

इस रिपोर्ट के लिए रोशनी- सेंटर ऑफ़ वूमेन कलैक्टिव्स लेड सोशल एक्शन से सहायता मिली है।<यह रिपोर्ट 14 जनवरी 2020 को IndiaSpend पर प्रकाशित हुई थी।

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कोरापुट और अंगुल, ओडिशाः ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से 500 किलोमीटर पश्चिम में कोरापुट ज़िले के दुमरिपुट गांव में धाना अंजारिया दो अन्य गर्भवती महिलों के साथ बैठी हैं। वह गर्भवती महिलाओं के लिए पोषण पर बताए जा रहे सुझावों को ध्यान से सुन रही हैं।

सामुदायिक कर्मी (सीआरपी) मोनोमिता नाग (35), इन सभी को नारंगी, हरे और सफ़ेद रंग वाली एक पुस्तिका से भोजन में विविधता के महत्व पर निर्देश दे रही हैं। यह तिरंगे (भारतीय झंडे) के रंग हैं, लेकिन पुस्तिका के बारे में पूरी जानकारी रखने वाली अंजारिया ने इससे अन्य अर्थ भी समझे हैं। “दूध, अंडे, मीट और दालों के लिए नारंगी, जड़ों, कंद और अनाज के लिए सफ़ेद और सब्ज़ियों के लिए हरा है,” सात महीने की गर्भवती धाना (21) ने बताया।

धाना अपनी शादी के पहले ही साल में गर्भवती हो गई थीं। वह ना तो एनीमिक हैं, और ना ही कमज़ोर और उन्हें यह भी विश्वास है कि उनके बच्चे स्वस्थ पैदा होंगे।

मोनोमिता से उन्हें पोषण के बारे में सलाह उनकी गर्भावस्था से पहले ही मिलनी शुरू हो गई थी। यह तब शुरू हुई थी जब वह एक नव विवाहिता के रूप में अपने पति के साथ मोनोमिता से मिली थी। धाना का मिड-अपर आर्म सर्कमफ़्रेंस (एमयूएसी) -- पोषण की स्थिति के जल्द आंकलन के लिए उपयोग होने वाला-- 22 सेंटीमीटर था। (23 सेंटीमीटर से कम एमयूएसी से महिलाओं में कुपोषण का संकेत मिलता है)।

धाना ने मोनोमिता की सलाह मानी, वह एक दिन में दो बार की बजाय चार बार खाने लगीं, इसमें मांसाहारी भोजन भी शामिल था, और उन्होंने अधिक आराम करना भी शुरू किया। वह अपनी कैल्शियम या आयरन फ़ोलिक एसिड गोलियां भी नियमित रूप से खाने लगीं। कुछ ही महीनों में उनका वज़न 41 किलो से बढ़कर 54 किलो हो गया।

मोनोमिता 2006 में शुरू हुए ओडिशा लाइवलीहुड मिशन के हिस्से के तौर पर माइक्रोफ़ाइनेंस गतिविधियों पर गांव में स्वयं-सहायता समूहों के साथ मीटिंग करती हैं। यह ग्रामीण क्षेत्रों में ग़रीबी कम करने के लिए बनी एक स्वायत्त संस्था है जो पंचायती राज विभाग के तहत आती है।

पोषण संबंधी परिणामों को बेहतर बनाने में महिलाओं के समूह पहले भी असरदार साबित हुए हैं -- इंडोनेशिया, बांग्लादेश और नेपाल में सामुदायिक सशर्त कैश ट्रांसफर कार्यक्रमों के ज़रिए आर्थिक सशक्तिकरण के साथ यह आइडिया लागू किया जा चुका है।

भारत में यह रणनीति केरल के कुडुंबश्री कार्यक्रम, आंध्र प्रदेश के सोसाइटी फ़ॉर एलिमिनेशन ऑफ़ रूरल पावर्टी प्रोजेक्ट, तेलंगाना के कुछ हिस्सों और जामखेड़ (महाराष्ट्र) में भी अपनाई गई है। “स्वास्थ्य के बिना, आजीविका [कार्यक्रम] नहीं चल सकते,” ओएलएम अंगुल के ब्लॉक प्रोजेक्ट मैनेजर, सरोज कुमार ने कहा। “ज़्यादातर ग़रीब लोग दवाएं ख़रीदने में काफ़ी पैसा ख़र्च कर देते हैं। अगर वह इस पैसे को बचाते हैं, तो वह इसका इस्तेमाल अपनी आमदनी बढ़ाने में कर सकते हैं या फिर वह उस पैसे को बचाकर रख सकते हैं।”

इंडियास्पेंड ने ओएलएम के तहत स्वाभिमान को लागू किए जाने के तरीक़े को समझने और इसके प्रभाव के अध्ययन के लिए कोरापुट और अंगुल ज़िलों का दौरा किया। हमने पाया कि परियोजना के दायरे में आने वाले गांवों में बदलाव के साथ ही किशोरों और महिलाओं में स्वास्थ्य और पोषण के बारे में जागरुकता फैल रही है।

स्वयं-सहायता क्यों कारगर है

ओडिशा में अंगुल ज़िले के हंडापा ग्राम पंचायत कार्यालय में सामुदायिक कर्मियों की एक क्लस्टर-लेवल मीटिंग। राज्य में बदलाव लाने में स्वयं-सहायता समूह महत्वपूर्ण साधन बन गए हैं।

ओडिशा में बदलाव लाने में स्वयं-सहायता समूह महत्वपूर्ण साधन बन गए हैं: नेशनल रूरल लाइवलीहुड मिशन के ज़रिए ग़रीबी कम करने के लिए इनका इस्तेमाल करने वाला ओ़डिशा पहला राज्य है -- राज्य में ऐसे 385,382 समूह हैं जिनके 41 लाख सदस्य हैं और यह 28 लाख परिवारों तक पहुंच रखते हैं। आमतौर पर, प्रत्येक परिवार में कम से कम एक महिला एक स्वयं-सहायता समूह की सदस्य है और प्रत्येक गांव में ऐसे 10 से 12 समूह हैं।

मोनोमिता 2016 से एक पोषण सखी के तौर पर कार्य कर रही हैं। उन्हें किशोरियों और महिलाओं की पोषण की स्थिति में सुधार के लिए मीटिंग और जागरूकता गतिविधियां आयोजित करने का प्रशिक्षण मिला है। मोनोमिता बिहार, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में बदलाव लाने वाले स्वाभिमान कार्यक्रम का एक हिस्सा हैं।

इन राज्यों के चार ज़िलों – पूर्णिया (बिहार), बस्तर (छत्तीसगढ़), कोरापुट और अंगुल (ओडिशा) -- में चलाया जाने वाला यह कार्यक्रम 356 से अधिक गांवों और 125,097 परिवारों तक पहुंच रखता है। अभी तक ओडिशा की 39 ग्राम पंचायतों में इस कार्यक्रम से 5,824 लड़कियों और महिलाओं को लाभ मिला है।

स्वाभिमान का ज़ोर किशोरियों, नव विवाहित दंपत्तियों, गर्भवती महिलाओं और दो साल से कम उम्र के बच्चों की मांओं पर है, इनमें कुपोषण का ख़तरा अधिक होता है। इसका लक्ष्य पौष्टिक भोजन में सुधार करना, एनीमिया के मामलों में कमी लाना, स्वास्थ्य सेवाओं की मांग बढ़ाना, स्वच्छता को बढ़ाना और अनचाहे गर्भ को रोकना है।

पोषण सखियां इन स्वास्थ्य और पोषण लक्ष्यों को पूरा करने के लिए नव विवाहित दंपत्तियों और किशोरियों के साथ हर महीने बैठक करती हैं। वह स्थानीय महिलाओं को किचन गार्डन बनाने में भी सहायता करती हैं जिससे परिवार के भोजन की विविधता में सुधार हो सकता है।

2018 में अंगुल और कोरापुट ज़िलों में 1,191 किशोरियों, 614 गर्भवती महिलाओं और दो साल से कम उम्र के 1,183 बच्चों के बीच किए गए एक मध्यावधि सर्वे में कई क्षेत्रों में सुधार दिखा थाः किशोरियों में सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल बढ़ा था, स्कूलों में उन्होंने दोबारा दाख़िला लिया था, गर्भवती महिलाओं के भोजन में सुधार हुआ था -- और आयरन और फ़ोलिक एसिड गोलियों का सेवन बढ़ा था -- और सामुदायिक स्वास्थ्य और स्वच्छता गतिविधियों में हिस्सेदारी बढ़ी थी।

इस कार्यक्रम का पूरा प्रभाव 2020 में अंतिम सर्वे के बाद ही सामने आएगा।

“ग़रीबी हटाने की अधिकतर कोशिशों का महिलाओं को सशक्त बनाने और उनके पोषण पर असर का आंकलन नहीं हुआ है,” ओडिशा लाइवलीहुड मिशन की स्टेट मिशन मैनेजमेंट यूनिट की एडिशनल सीईओ (ऑपरेशंस), बबीता महापात्र ने बताया। यही वजह है कि स्वाभिमान, महिलाओं के पोषण के लिए की जा रही कोशिशों का एक सही मंच है, उन्होंने कहा।

पोषण सखियां, महिलाओं को विलेज हेल्थ एंड न्यूट्रीशन डेज़ (वीएचएनडी) में हिस्सा लेने के लिए भी प्रोत्साहित करती हैं -- इन्हें ममता दिवस या मदर्स डे के तौर पर भी जाना जाता है -- इसमें महिलाओं की एनीमिया और ब्लड प्रेशर के लिए जांच की जाती है, उनका वज़न लिया जाता है और कैल्शियम और आयरन फ़ोलिक एसिड की गोलियां दी जाती हैं। यह आयोजन स्वास्थ्य विभाग के आशा कार्यकर्ता, एएनएम और महिला एवं बाल विकास विभाग की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता संयुक्त तौर पर करते हैं।

“कार्यक्रम को लागू करने में पोषण सखियों को शामिल करने का एक फ़ायदा है -- वह इसमें हिस्सा लेने वालों के गांवों में ही रहती हैं, जबकि आशा वर्कर और एएनएम अक्सर किसी दूसरी जगह पर रहती हैं। इससे उन्हें महिलाओँ को पीएचसी ले जाने जैसी आवश्यक्ताओं को पूरा करने में सहायता मिलती है,” ग्राम पंचायत में ओएलएम रिकॉर्ड संभालने वाली मीना खोड़ा  ने बताया।

तीनों राज्यों में, स्टेट लाइवलीहुड मिशन, इस मामले में ओएलएम, कार्यक्रम को स्वास्थ्य, नागरिक आपूर्ति (जन वितरण प्रणाली के लिए), समाज कल्याण, कृषि और पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग विभागों के साथ मिलकर चलाया जाता है। कार्यक्रम को तकनीकी और वित्तीय सहायता यूनिसेफ़ से मिलती है, जो क्षमता निर्माण में भी शामिल है।

मैं पीएचडी करने के बाद शादी करूंगी

हमारे शरीर अभी भी विकसित हो रहे है; ऐसे में शादी करना और बच्चों को जन्म देना ठीक नहीं है,स्वाभिमान कार्यक्रम के हिस्से के तौर पर बनाए गए ‘किशोरी समूह’ की सचिव, हरप्रिया बेहरा, 18, (बीच में) कहती हैं।

रीमा रानी बेहरा जब 16 साल की थीं तो उनके माता-पिता ने उनकी शादी 26 साल के व्यक्ति से तय कर दी थी। शादी से तीन दिन पहले बेहरा ने अपने चचेरे भाई को फ़ोन किया जो पुलिस को साथ लेकर आया और शादी रुक गई। बेहरा अब अपने अंकल के साथ डुमरिपुट में हैं और उनका सपना एक पुलिस अधिकारी बनना है। “मैने उन्हें बताया था कि मैं शादी नहीं करना चाहती, मैं पढ़ना चाहती हूं लेकिन उन्होंने इसे अनसुना कर दिया था,” उन्होंने कहा। वह पढ़ाई जारी नहीं रख सकी क्योंकि उनके माता-पिता ने 10वी के बाद उन्हें स्कूल लीविंग सर्टिफ़िकेट लेने नहीं दिया और उनके 18 की होते ही शादी करने की धमकी दी थी। 

कोरापुट में 20 से 24 साल की उम्र की हर तीन में से एक महिला (34%) की शादी 18 साल से पहले हो गई थी (यह ओडिशा के औसत से 13% अधिक है), नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस-4) के आंकड़ों के अनुसार।

“हमारे शरीर अभी भी विकसित हो रहे हैं; हमारे शरीर के पूरी तरह विकसित होने से पहले शादी करना और बच्चों को जन्म देना ठीक नहीं है,” हरप्रिया बेहरा ने कहा। स्वाभिमान परियोजना के हिस्से के तौर पर स्वच्छता,  स्वास्थ्य और पोषण के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए बनाए गए किशोरी समूह की वह सचिव हैं।

युवा महिलाओं के जीवन में अन्य तरीक़ों से बड़े बदलाव आए हैं। “हम पहले कपड़े के पैड का इस्तेमाल करते थे, वह दुर्भाग्यपूर्ण था लेकिन हमें उससे बेहतर कुछ नहीं पता था,” सुमित्रा खिल्लो (22) ने बताया। अब महिलाओं को आशा कार्यकर्ताओं और एएनएम कर्मियों से पैड मिलते हैं, लेकिन उनकी शिकायत है कि पूरे माहवारी चक्र के लिए यह पैड पर्याप्त नहीं होते। हमने पाया कि माहवारी चक्र के दौरान महिलाओं को घर से बाहर रखने के चलन में भी धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है।

कुछ पुरानी रूढ़ियों में अभी भी बदलाव नहीं आया है। अधिकतर घरों में शौचालय हैं, लेकिन इसके बावजूद ग्रामीण अक्सर खुले में शौच करते हैं। “यह बहुत छोटा है, मुझे इसका इस्तेमाल करना अच्छा नहीं लगता,” एक किशोरी ने अपने घर में शौचालय के बारे में कहा। उसने बताया कि उसके तीन रिश्तेदार भी शौचालय का इस्तेमाल नहीं करते।

गांव में अधिकतर लड़कियां स्कूल और कॉलेज जाने के लिए बस से यात्रा करती हैं लेकिन उन्हें अपने हक़ के लिए अपने माता-पिता से बहस करनी पड़ती है। “हमें पता है कि हमें क्यों 18 साल की उम्र के बाद शादी करनी चाहिए। [लेकिन] मैं 30 साल की उम्र में शादी करूंगी, पीएचडी करने के बाद,” समिति की सचिव हरप्रिया बेहरा ने कहा। 

हमने जिन पोषण सखियों से बातचीत की उनका कहना था कि लड़कियों की शादी को 18 साल की उम्र तक टालने के लिए ज़ोर देने से परिवार नाराज़ हो जाते हैं लेकिन अधिकतर मामलों में माता-पिता मान जाते हैं। “लड़कियों के लिए यहां 16 और 17 साल की उम्र में शादी सामान्य थी। लेकिन पिछले कुछ साल से यह बदल रहा है। लड़कियों के 18 साल में शादी करने पर भी वह बच्चों को जन्म देने के लिए 20 से 21 साल की उम्र तक इंतज़ार करना चाहती हैं,” मोनोमिता ने कहा।

यूनिसेफ़ की ओर से साझा किए गए मध्यावधि के सर्वे के अनुसार, स्वाभिमान के शुरू होने के बाद पल्लाहारा और कोरापुट सदर के दो ब्लॉक में 39 किशोरियों ने दोबारा स्कूल जाना शुरू किया है। इसके साथ ही किशोरियों के ऐसे घरों की संख्या भी कम हुई है जहां खुले में शौच किया जाता था। आयरन फ़ोलिक एसिड गोलियां लेने और शिक्षा और ख़र्च पर ख़ुद निर्णय करने वाली किशोरियों की संख्या बढ़ी है।

हालांकि, ऐसी किशोरियों की संख्या में कमी आई है जो सोचती थीं कि वह यह फैसला कर सकती हैं उन्हें किससे शादी करनी है और जिन्होंने भोजन में विविधता की जानकारी दी है।

Source: Swabhimaan Programme, midline survey results.

अपनी बात कहने पर ज़ोर

मोनोमिता नाग यह दिखा रही हैं कि लघु योजना बैठकें कैसे आयोजित की जाती हैं। इसमें महिलाओं से संबंधित बड़े मुद्दों पर तीन महीने में लगभग 12 दिन सालाना चर्चा करना शामिल होता है।

अंगुल ज़िले में हंडापा ग्राम पंचायत में 1,439 निवासियों वाले कालियाकोटा गांव के एक उदाहरण से पता चलता है कि समुदायों के लिए स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता से जुड़ना क्यों महत्वपूर्ण है। कालियाकोटा में एक साल तक गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को आयरन फ़ोलिक एसिड गोलियां नहीं मिली थी, जिससे उनके स्वास्थ्य के लिए ख़तरा बढ़ गया। वीएचएनडी और जन्म देने से पूर्व के चेक-अप भी नहीं हुए थे क्योंकि उनके इलाक़े की एएनएम की मृत्यु हो गई थी और उनके स्थान पर कोई नहीं आया था।

इसके बाद लोगों ने लघु योजना के तहत बैठक की और स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता की चुनौतियों पर चर्चा की। इस योजना में महिलाओं से संबंधित बड़े मुद्दों पर तीन महीने में लगभग 12 दिन चर्चा करना शामिल होता है। इसमें शौचालय उपलब्ध होने, जन वितरण प्रणाली तक पहुंच या पीने का पानी या आयरन फ़ोलिक एसिड की गोलियां शामिल हो सकते हैं।

जब कालियाकोटा की महिलाओं ने अपनी समस्याओं की जानकारी दी, तो उनके सीआरपी ने इसे ब्लॉक डवेलेपमेंट अधिकारियों तक पहुंचाया जिन्होंने गांव के लिए एक एएनएम को तैनात किया। इन बैठकों में जन वितरण प्रणाली, महिला एवं बाल विकास और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी समस्याओं के समाधान के लिए एक मंच पर आते हैं।

एक अन्य मामले में, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में उपलब्ध सेनिटरी नैपकिन, फ़ंड की कमी के कारण अंगुल में पल्लाहारा ब्लॉक के स्कूल में नहीं पहुंचाए जा रहे थे। एक मीटिंग में इसका समाधान निकाला गया -- जन वितरण आपूर्तियों के साथ नैपकिन भेजे गए।

मध्यावधि सर्वे से पता चला है कि लघु योजना बैठकों से सार्वजनिक सेवाओं की मांग और उपयोग भी बढ़ा है। उदाहरण के लिए, परियोजना के तहत आने वाले जन वितरण प्रणाली तक पहुंच वाले परिवारों में रहने वाली मांओं की संख्या 2016 में 68% से बढ़कर 2018 में 99% पर पहुंच गई; और इसी अवधि में सप्लिमेंटरी फ़ूड प्राप्त करने वालों की संख्या 66.7% से बढ़कर 96.7% हो गई।

किचन गार्डन: बिना किसी लागत के पोषण

पोषण सखी, साइबालिनी अमानता टिकिना प्रधान के गार्डन से कई सब्ज़ियां और फल एकत्र करती हैं और प्लेट में रखकर उन्हें यह समझाती हैं कि सात महीने की गर्भवती होने के कारण उन्हें घर में उगाई गई सब्ज़ियों की क्यों जरूरत है। इन सब्ज़ियों में मोरिंगा पत्तियां, हरा पपीता, नींबू और गोभी हैं।

अंगुल ज़िले के किशोरनगर में 22 वर्षीय टिकिना प्रधान के घर के पीछे दो एकड़ के खेत में गोभी की फ़सल कटाई के लिए तैयार है। एक पोषण सखी, साइबालिनी अमानता प्रधान के गार्डन से कई सब्ज़ियां और फल इकट्ठा कर प्लेट में रखकर यह समझाती हैं कि सात महीने की गर्भवती होने के कारण उन्हें घर में उगाई गई सब्ज़ियों की ज़रूरत क्यों है। इन सब्ज़ियों में मोरिंगा पत्तियां, हरा पपीता, नींबू और गोभी हैं।

“हमारे पास हर चीज़ थी, लेकिन हमें संतुलित भोजन के बारे में नहीं पता था,” टिकिना प्रधान ने कहा। अमानता के निर्देश के अनुसार, अब वह भोजन में अंडे, मीट और हरी सब्ज़ियों के साथ कैल्शियम और आयरन सप्लिमेंट भी लेती हैं।

अमानता के पास पहले से एक सब्ज़ियों का खेत है, स्वयं-सहायता समूहों में अधिकतर महिलाओं को अपने घर के पीछे सब्ज़ियां उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है जिससे खाद्य सुरक्षा और भोजन में विविधता को सुनिश्चित किया जा सके। उपजाऊ ज़मीन और पानी उपलब्ध होने के कारण अंगुल में अधिकतर घरों में पहले कम मात्रा में सब्ज़ियां उगाई जाती थी, लेकिन अब यह सामान्य प्रक्रिया बन गई है।

“पहले महिलाएं केवल बैंगन या गोभी उगाती थीं, अब वह सभी प्रकार की सब्ज़ियां और फल उगा रही हैं,” अमानता ने बताया।  इसके साथ ही, अधिकतर पोषण बाग़ ऑर्गेनिक हैं। उनमें किसी केमिकल फ़र्टिलाइज़र का इस्तेमाल नहीं किया जाता।

सर्वे के अनुसार, अपर्याप्त भोजन को लेकर चिंता करने वाली महिलाओं की संख्या 2016 से 2018 में 5.9% घटी है। इसके साथ ही विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्रियों की खपत करने और दिन में कम से कम तीन बार भोजन करने वाली महिलाओं की संख्या भी 2016 की तुलना में 2018 में बढ़ी थी।

Source: Swabhimaan Programme, midline survey results.

(यदवार, इंडियास्पेंड/हेल्थचेक के साथ स्पेशल कॉरेसपॉन्डेंट हैं)

इस रिपोर्ट के लिए रोशनी- सेंटर ऑफ़ वूमेन कलैक्टिव्स लेड सोशल एक्शन से सहायता मिली है।<यह रिपोर्ट 14 जनवरी 2020 को IndiaSpend पर प्रकाशित हुई थी।

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