माइक्रो-एंटरप्राइज को बढ़ावा देने से सुधर सकती है रोज़गार की हालत

बेंगलुरु: भारत  रोज़गार के संकट से गुज़र रहा है। अक्टूबर 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे समय में माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ रोज़गार पैदा करने के महत्वपूर्ण स्रोत बन सकते हैं। माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ उन इकाइयों को कहा जाता है जहां 20 से कम लोग काम करते हैं।

  • भारत माइक्रो-एंटरप्राइज क्षेत्र को बढ़ावा देने में काफी हद तक विफल रहा है;

  • भारत के ज्यादातर माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ छोटे हैं और तीन से कम लोगों के साथ काम चलाते हैं;

  • इस क्षेत्र में श्रम उत्पादकता में अच्छी वृद्धि तो है, लेकिन वेतन स्तर कम है।

यह कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष हैं जो अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट और ग्लोबल एलायंस फॉर मास एंटरप्रेन्योरशिप के अध्ययन में सामने आए हैं। इस अध्ययन में निर्माण क्षेत्र (नेशनल सैंपल सर्वे ने मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टर को कवर किया है) को छोड़कर सभी गैर-कृषि एंटरप्राइज़ेज़ को शामिल किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 11% रोज़गार माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ से आते हैं। यह रिपोर्ट छठे इकोनोमिक सेंसस और नेश्नल सैंपल सर्वे डेटा (67वें और 73वें दौर) पर आधारित है।

यह अन्य विकसित और विकासशील देशों के मुक़ाबले 30% से 40% तक कम है। अध्ययन में कहा गया है कि, अगर राज्य और केंद्र सरकारें माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ के काम को बढ़ाने में मदद करें और वहां लिंग के आधार पर भेदभाव ना हो, तो इसे बदला जा  सकता है।

भारत के माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ में महिलाओं की भागीदारी में भी समस्या है: सामाजिक और बाज़ार, दो बड़े मुद्दे हैं जो उनकी उत्पादकता को प्रभावित करते हैं। इस संबंध में हम बाद में चर्चा करेंगे।

अध्ययन में बताए गए 2015 के आंकड़ों के अनुसार, कुल माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ में से 20% को महिलाएं चलाती हैं, इनके कार्य बल में महिलाओं की हिस्सेदारी 16% है और इस पूरे क्षेत्र में कुल 9% का योगदान करती हैं। लेकिन पिछले छह साल से 2015 तक, माइक्रो इकाइयों के मालिकाना हक़ में उनके हिस्से और वैल्यू एड में वृद्धि नहीं हुई है बल्कि उनके हिस्से में दो प्रतिशत की गिरावट आई है।

2010 और 2015 के बीच, ग्रामीण भारत में कपड़े और शिक्षा क्षेत्र में माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ ने सबसे ज्यादा वृद्धि (5% या अधिक सीएजीआर) दर्ज की है। शहरी क्षेत्रों में, शिक्षा, स्वास्थ्य और कारों और मोटरसाइकिलों की बिक्री में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की गई है। इस अध्ययन में कहा गया है इस दर पर, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ भारत में हर साल क़रीब 260,000 नौकरियाँ पैदा करते हैं। 

अध्ययन में भौगोलिक वितरण, जनसांख्यिकी, लिंग (रोज़गार और उद्यम स्वामित्व), औद्योगिक वितरण, श्रम उत्पादकता और मज़दूरी का विश्लेषण किया गया है।

ज़्यादातर माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ में श्रमिकों की संख्या तीन या उससे कम

छह साल से 2015 तक, गैर-कृषि माइक्रो एंटरप्राइज़ेज़ में रोज़गार, 0.6% की वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) के साथ 10.8 करोड़ से बढ़ कर 11.13 करोड़ हुआ है। उनकी ग्रॉस वेल्यू 9% सीएजीआर की दर से 7.4 लाख करोड़ रुपये ($104 बिलियन) से बढ़कर 11.5 लाख करोड़ रुपये (162 बिलियन डॉलर) हो गई है।

लेकिन अध्ययन में कहा गया है कि, भारत में माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ में  "रोज़गार के मामले में लचीलापन कम है जो संगठित क्षेत्र में देखा जाता है।" इसका मतलब यह है कि क्षेत्र में वृद्धि के बावजूद, नौकरी के अवसर बहुत कम बढ़े हैं।

State-Wise Share Of Microenterprises Based On Number Of Workers

Source: Microenterprises in India: A Multidimensional Analysis (October 2019)

रिपोर्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर हुए सर्वे में शामिल 55% उद्यमों में, मालिक बिना किसी कर्मचारी के ख़ुद ही काम कर रहे थे, जबकि 32% में दो से तीन कर्मचारी (भुगतान और अवैतनिक) काम कर रहे थे।

अलग-अलग राज्य में माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ के संचालन के पैमाने अलग-अलग है: पश्चिम बंगाल और असम में, लगभग 90% माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ सबसे छोटे वर्ग के हैं जहां 2 या तीन लोग काम करते हैं। दिल्ली और गुजरात में, ज्यादातर 4 से 5 कर्मचारी काम करते हैं। अध्ययन के सह लेखक और अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में फैकल्टी, अमित बसोल कहते हैं, "एक या दो कामगारों के साथ यह संभावना है कि बहुत छोटे माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ के मालिक ऐसे हैं जो  बहुत उत्साही नहीं हैं। इसलिए वे ज्यादा तरक्की नहीं कर पाते। लेकिन जो 4 से 5 कर्मचारियों या 20 श्रमिकों तक के साथ काम करते हैं वे माइक्रोएंटरप्राइज़ेज़ क्षेत्र उम्मीद की किरण हैं। अगर उन्हें सही प्रोत्साहन दिया जाए तो उनके बढ़ने की संभावना है और उससे लाखों नौकरियां पैदा हो सकती हैं। "

2010 और 2015 के बीच, माइक्रोएंटरप्राइज़ेज़ सेक्टर में खुदरा इकाइयों की ग्रामीण और शहरी भारत में फर्मों और श्रमिकों (30%) की सबसे बड़ी हिस्सेदारी थी। ग्रामीण भारत में रोज़गार देने वाले दूसरे क्षेत्रों में छोटे स्तर पर परिवहन, कपड़े, तम्बाकू और खाद्य उत्पादों में लगी हुई इकाइयां हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरी क्षेत्रों में, रेस्तरां, कपड़े, शिक्षा और थोक व्यापार में सबसे अधिक श्रमिक काम करते हैं।

शिक्षा क्षेत्र में सबसे अच्छा वेतन दिया गया, तंबाकू में सबसे ख़राब

2015 में, माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ में, सबसे कम पगार और उत्पादकता ग्रामीण तंबाकू उद्योग में देखने को मिली। अध्ययन के अनुसार, यहां प्रति कर्मचारी, हर महीने औसत मासिक वेतन 5,000 रुपये से कम है। ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ज़्यादा पगार शिक्षा क्षेत्र में थी (प्रति कर्मचारी लगभग 13,000 रुपये जो कि उच्चतम मज़दूरी स्तर (10,000 रुपये) पर थी।

लेकिन शहरी क्षेत्रों का प्रदर्शन अच्छा नहीं था। शहरों और कस्बों में किसी भी मालिक ने 10,000 रुपये या उससे अधिक की औसत मासिक मजदूरी नहीं दिखाई है। अध्ययन में कहा गया है कि ज्यादातर ने 6,000 से 8,000 रुपये का भुगतान किया है।

Wage Rates In Various Industries in 2015

Source: Microenterprises in India: A Multidimensional Analysis (October 2019)

बसोल कहते हैं, "आंशिक रूप से, इसका कारण यह है कि वृद्धि के बावजूद उत्पादकता का स्तर अभी भी कम है - मज़दूरी आमतौर पर उत्पादकता से अधिक नहीं हो सकती है। दूसरा कारण ये है कि भले ही उत्पादकता बढ़ रही हो, लेकिन ये वेतन वृद्धि में तब्दील नहीं होता है क्योंकि अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में श्रमिक ज़रूरत से कहीं ज़्यादा होते हैं जो यह मज़़दूरी के बढ़ने में सबसे बड़ी रुकावट है।"

सबसे छोटी इकाइयों ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया

माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ ही हैं जिन्होंने देश की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान बढ़ाया है, चाहे वो देश के ग्रॉस वेल्यू-एडड (जीवीए) में उनकी भागीदारी हो या फिर रोज़गार देेने का मामला। जिसमें देश के बड़े उद्योग विफ़ल रहे हैं। 

2010 में, असंगठित क्षेत्र के 60% उद्यम एक ही कर्मचारी वाले थे और 2015 में ये 2% बढ़कर 62% हो गए। 2010 में एक कर्मचारी या तीन कर्मचारियों वाले उद्यम 93% थे। जो 2015 में बढ़कर 94% हो गए।

जब ऑपरेशन बढ़ाने की बात आती है तो इन क्षेत्रों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। बेसोल के अनुसार, इन चुनौतियों में, उत्पादकता और मज़दूरी के निम्न स्तर, उधार, बुनियादी ढांचे और बाजारों तक पहुंच की कमी और कड़े नियम शामिल हैं।

अध्ययन में कहा गया है कि 4 से 5 श्रमिकों वाली फर्म अपने से छोटे उद्यमों की तुलना में प्रति श्रमिक 50% अधिक उत्पादक हैं, जबकि मज़दूरी की दर में बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं है।

अध्ययन के अनुसार, वृद्धि ज्यादातर तब देखी जाती है जब इकाइयों में श्रमिकों की संख्या 2 से 3 से बढ़कर 4 से 5 तक हो जाती हैं; इससे ऊपर जाने पर, "सरप्लस और धीरे-धीरे बढ़ता है और यहां तक ​​कि सबसे बड़े वर्ग के लिए भी गिरावट आती है।" अध्ययन में आगे कहा गया है कि असंगठित क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर से संबंधित बाधाओं के कारण बड़ी फर्में आनुपातिक रूप से अधिक उत्पादक नहीं हैं। 

बसोल ने कहा कि इस क्षेत्र के विकास के लिए बनी सरकार की नीतियां तभी काम करेंगी जब उन्हें बनाए रखा जाएगा और अन्य नीतियों के साथ तालमेल के साथ लागू किया जाएगा। मुद्रा जैसी योजनाएं, जो गैर-कॉरपोरेट, गैर-कृषि लघु /माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़  को 10 लाख रुपये तक का कर्ज़ देती हैं और इसमें "बहुत छोटे कर्ज़ों पर बहुत अधिक ध्यान दिया जाता है, जो यूनिट के विकास में कोई बड़ी भूमिका अदा नहीं कर पाते हैं।" उन्होंने कहा कि, माइक्रोएंटरप्राइज़ को उस स्तर तक बढ़ाने के लिए मदद दी जानी चाहिए कि वो 2 से 3 नहीं 4 से 5 श्रमिकों को रोज़गार दे सके।

महिलाएं नुकसान में क्यों हैं

जैसा कि हमने पहले बताया है कि माइक्रो-एंटरप्राइज क्षेत्र में महिलाओं से जुड़े आंकड़े संतोषजनक नहीं रहे है। अध्ययन में पाया गया कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए ऑपरेशन का पैमाना छोटा रहा है। महिलाओं के स्वामित्व वाले 216,000 में से 80 लाख (2.7%) में तीन या अधिक कर्मचारी काम करते हैं, 45,000 में 6 से 9 श्रमिकों को काम पर रखा और 25,000 ने 10 से अधिक लोगों को रोज़गार दिया। पुरुषों के लिए, तुलनात्मक संख्या अधिक थी: 30 लाख ने तीन या अधिक श्रमिकों को काम पर रखा, 5 लाख ने 6 से 9 और 233,000 ने 10 से अधिक लोगों को काम पर रखा।

इसके अलावा, 2013-14 में, महिलाओं के स्वामित्व वाली इकाइयों में काम कर रहे कुल श्रमिकों (1.34 करोड़) में से तीन-चौथाई से अधिक महिलाएं थीं। इससे महिलाओं की "अन्य महिलाओं के साथ काम करने की प्रवृत्ति" दिखाई दी। महिलाओं को रोज़गार देने के मामले में मणिपुर (91%) और केरल (90%) में महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यम सबसे ज्यादा थे।

Male- And Female-Owned Firms In Rural And Urban India
(all in Rs) Male Female Ratio
Rural GVA per Firm 10,274 3628 0.35
Labour Productivity 6504 2,873 0.44
Assets per firm 137,376 59,133 0.43
Urban GVA per Firm 23,277 10,665 0.46
Labour Productivity 116,45 7195 0.62
Assets per firm 737,435 292,794 0.4

Source: Microenterprises in India: A Multidimensional Analysis (October 2019)

शहरी भारत में, महिला उद्यमियों के लिए प्रति ग्रॉस वैल्यू एडड पुरुष-स्वामित्व वाली कंपनियों की तुलना में 46% था, श्रम उत्पादकता में 62% और संपत्ति-स्वामित्व के मामले में 40% था। ग्रामीण क्षेत्रों में ये आंकड़े क्रमशः 35%, 44% और 43% थे। शहरी और ग्रामीण भारत दोनों में, 10 क्षेत्रों में 90% से अधिक महिला-स्वामित्व वाली कंपनियों की हिस्सेदारी है।

बसोल कहते हैं, "महिलाएं छोटे उद्यमों का संचालन करती हैं, घर में ही रहती हैं (जिसका मतलब है कि वे आसानी से विस्तार नहीं कर सकती हैं) और अन्य महिलाओं के साथ काम करती हैं। उनके पास अक्सर संपत्ति नहीं होती है (जैसे कि ज़मीन या घर) जो कर्ज़ के लिए सिक्यूरिटी के तौर पर काम आ सकती है।"

महिलाओं को काम भी घरेलू जिम्मेदारियों के साथ करना पड़ता है, जिससे उनके लिए उद्यम में पर्याप्त समय लगाना मुश्किल हो जाता है। बेसोल आगे कहते हैं, उन्हें बाजार में भेदभाव का भी सामना करना पड़ता है - एक ही उत्पाद के लिए पुरुष उद्यमियों की तुलना में उन्हें कम कीमत मिलती है।

( श्रीहरि विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं। )

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 4 नवंबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

बेंगलुरु: भारत  रोज़गार के संकट से गुज़र रहा है। अक्टूबर 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे समय में माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ रोज़गार पैदा करने के महत्वपूर्ण स्रोत बन सकते हैं। माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ उन इकाइयों को कहा जाता है जहां 20 से कम लोग काम करते हैं।

  • भारत माइक्रो-एंटरप्राइज क्षेत्र को बढ़ावा देने में काफी हद तक विफल रहा है;

  • भारत के ज्यादातर माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ छोटे हैं और तीन से कम लोगों के साथ काम चलाते हैं;

  • इस क्षेत्र में श्रम उत्पादकता में अच्छी वृद्धि तो है, लेकिन वेतन स्तर कम है।

यह कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष हैं जो अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट और ग्लोबल एलायंस फॉर मास एंटरप्रेन्योरशिप के अध्ययन में सामने आए हैं। इस अध्ययन में निर्माण क्षेत्र (नेशनल सैंपल सर्वे ने मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टर को कवर किया है) को छोड़कर सभी गैर-कृषि एंटरप्राइज़ेज़ को शामिल किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 11% रोज़गार माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ से आते हैं। यह रिपोर्ट छठे इकोनोमिक सेंसस और नेश्नल सैंपल सर्वे डेटा (67वें और 73वें दौर) पर आधारित है।

यह अन्य विकसित और विकासशील देशों के मुक़ाबले 30% से 40% तक कम है। अध्ययन में कहा गया है कि, अगर राज्य और केंद्र सरकारें माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ के काम को बढ़ाने में मदद करें और वहां लिंग के आधार पर भेदभाव ना हो, तो इसे बदला जा  सकता है।

भारत के माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ में महिलाओं की भागीदारी में भी समस्या है: सामाजिक और बाज़ार, दो बड़े मुद्दे हैं जो उनकी उत्पादकता को प्रभावित करते हैं। इस संबंध में हम बाद में चर्चा करेंगे।

अध्ययन में बताए गए 2015 के आंकड़ों के अनुसार, कुल माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ में से 20% को महिलाएं चलाती हैं, इनके कार्य बल में महिलाओं की हिस्सेदारी 16% है और इस पूरे क्षेत्र में कुल 9% का योगदान करती हैं। लेकिन पिछले छह साल से 2015 तक, माइक्रो इकाइयों के मालिकाना हक़ में उनके हिस्से और वैल्यू एड में वृद्धि नहीं हुई है बल्कि उनके हिस्से में दो प्रतिशत की गिरावट आई है।

2010 और 2015 के बीच, ग्रामीण भारत में कपड़े और शिक्षा क्षेत्र में माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ ने सबसे ज्यादा वृद्धि (5% या अधिक सीएजीआर) दर्ज की है। शहरी क्षेत्रों में, शिक्षा, स्वास्थ्य और कारों और मोटरसाइकिलों की बिक्री में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की गई है। इस अध्ययन में कहा गया है इस दर पर, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ भारत में हर साल क़रीब 260,000 नौकरियाँ पैदा करते हैं। 

अध्ययन में भौगोलिक वितरण, जनसांख्यिकी, लिंग (रोज़गार और उद्यम स्वामित्व), औद्योगिक वितरण, श्रम उत्पादकता और मज़दूरी का विश्लेषण किया गया है।

ज़्यादातर माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ में श्रमिकों की संख्या तीन या उससे कम

छह साल से 2015 तक, गैर-कृषि माइक्रो एंटरप्राइज़ेज़ में रोज़गार, 0.6% की वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) के साथ 10.8 करोड़ से बढ़ कर 11.13 करोड़ हुआ है। उनकी ग्रॉस वेल्यू 9% सीएजीआर की दर से 7.4 लाख करोड़ रुपये ($104 बिलियन) से बढ़कर 11.5 लाख करोड़ रुपये (162 बिलियन डॉलर) हो गई है।

लेकिन अध्ययन में कहा गया है कि, भारत में माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ में  "रोज़गार के मामले में लचीलापन कम है जो संगठित क्षेत्र में देखा जाता है।" इसका मतलब यह है कि क्षेत्र में वृद्धि के बावजूद, नौकरी के अवसर बहुत कम बढ़े हैं।

State-Wise Share Of Microenterprises Based On Number Of Workers

Source: Microenterprises in India: A Multidimensional Analysis (October 2019)

रिपोर्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर हुए सर्वे में शामिल 55% उद्यमों में, मालिक बिना किसी कर्मचारी के ख़ुद ही काम कर रहे थे, जबकि 32% में दो से तीन कर्मचारी (भुगतान और अवैतनिक) काम कर रहे थे।

अलग-अलग राज्य में माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ के संचालन के पैमाने अलग-अलग है: पश्चिम बंगाल और असम में, लगभग 90% माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ सबसे छोटे वर्ग के हैं जहां 2 या तीन लोग काम करते हैं। दिल्ली और गुजरात में, ज्यादातर 4 से 5 कर्मचारी काम करते हैं। अध्ययन के सह लेखक और अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में फैकल्टी, अमित बसोल कहते हैं, "एक या दो कामगारों के साथ यह संभावना है कि बहुत छोटे माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ के मालिक ऐसे हैं जो  बहुत उत्साही नहीं हैं। इसलिए वे ज्यादा तरक्की नहीं कर पाते। लेकिन जो 4 से 5 कर्मचारियों या 20 श्रमिकों तक के साथ काम करते हैं वे माइक्रोएंटरप्राइज़ेज़ क्षेत्र उम्मीद की किरण हैं। अगर उन्हें सही प्रोत्साहन दिया जाए तो उनके बढ़ने की संभावना है और उससे लाखों नौकरियां पैदा हो सकती हैं। "

2010 और 2015 के बीच, माइक्रोएंटरप्राइज़ेज़ सेक्टर में खुदरा इकाइयों की ग्रामीण और शहरी भारत में फर्मों और श्रमिकों (30%) की सबसे बड़ी हिस्सेदारी थी। ग्रामीण भारत में रोज़गार देने वाले दूसरे क्षेत्रों में छोटे स्तर पर परिवहन, कपड़े, तम्बाकू और खाद्य उत्पादों में लगी हुई इकाइयां हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरी क्षेत्रों में, रेस्तरां, कपड़े, शिक्षा और थोक व्यापार में सबसे अधिक श्रमिक काम करते हैं।

शिक्षा क्षेत्र में सबसे अच्छा वेतन दिया गया, तंबाकू में सबसे ख़राब

2015 में, माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ में, सबसे कम पगार और उत्पादकता ग्रामीण तंबाकू उद्योग में देखने को मिली। अध्ययन के अनुसार, यहां प्रति कर्मचारी, हर महीने औसत मासिक वेतन 5,000 रुपये से कम है। ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ज़्यादा पगार शिक्षा क्षेत्र में थी (प्रति कर्मचारी लगभग 13,000 रुपये जो कि उच्चतम मज़दूरी स्तर (10,000 रुपये) पर थी।

लेकिन शहरी क्षेत्रों का प्रदर्शन अच्छा नहीं था। शहरों और कस्बों में किसी भी मालिक ने 10,000 रुपये या उससे अधिक की औसत मासिक मजदूरी नहीं दिखाई है। अध्ययन में कहा गया है कि ज्यादातर ने 6,000 से 8,000 रुपये का भुगतान किया है।

Wage Rates In Various Industries in 2015

Source: Microenterprises in India: A Multidimensional Analysis (October 2019)

बसोल कहते हैं, "आंशिक रूप से, इसका कारण यह है कि वृद्धि के बावजूद उत्पादकता का स्तर अभी भी कम है - मज़दूरी आमतौर पर उत्पादकता से अधिक नहीं हो सकती है। दूसरा कारण ये है कि भले ही उत्पादकता बढ़ रही हो, लेकिन ये वेतन वृद्धि में तब्दील नहीं होता है क्योंकि अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में श्रमिक ज़रूरत से कहीं ज़्यादा होते हैं जो यह मज़़दूरी के बढ़ने में सबसे बड़ी रुकावट है।"

सबसे छोटी इकाइयों ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया

माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़ ही हैं जिन्होंने देश की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान बढ़ाया है, चाहे वो देश के ग्रॉस वेल्यू-एडड (जीवीए) में उनकी भागीदारी हो या फिर रोज़गार देेने का मामला। जिसमें देश के बड़े उद्योग विफ़ल रहे हैं। 

2010 में, असंगठित क्षेत्र के 60% उद्यम एक ही कर्मचारी वाले थे और 2015 में ये 2% बढ़कर 62% हो गए। 2010 में एक कर्मचारी या तीन कर्मचारियों वाले उद्यम 93% थे। जो 2015 में बढ़कर 94% हो गए।

जब ऑपरेशन बढ़ाने की बात आती है तो इन क्षेत्रों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। बेसोल के अनुसार, इन चुनौतियों में, उत्पादकता और मज़दूरी के निम्न स्तर, उधार, बुनियादी ढांचे और बाजारों तक पहुंच की कमी और कड़े नियम शामिल हैं।

अध्ययन में कहा गया है कि 4 से 5 श्रमिकों वाली फर्म अपने से छोटे उद्यमों की तुलना में प्रति श्रमिक 50% अधिक उत्पादक हैं, जबकि मज़दूरी की दर में बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं है।

अध्ययन के अनुसार, वृद्धि ज्यादातर तब देखी जाती है जब इकाइयों में श्रमिकों की संख्या 2 से 3 से बढ़कर 4 से 5 तक हो जाती हैं; इससे ऊपर जाने पर, "सरप्लस और धीरे-धीरे बढ़ता है और यहां तक ​​कि सबसे बड़े वर्ग के लिए भी गिरावट आती है।" अध्ययन में आगे कहा गया है कि असंगठित क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर से संबंधित बाधाओं के कारण बड़ी फर्में आनुपातिक रूप से अधिक उत्पादक नहीं हैं। 

बसोल ने कहा कि इस क्षेत्र के विकास के लिए बनी सरकार की नीतियां तभी काम करेंगी जब उन्हें बनाए रखा जाएगा और अन्य नीतियों के साथ तालमेल के साथ लागू किया जाएगा। मुद्रा जैसी योजनाएं, जो गैर-कॉरपोरेट, गैर-कृषि लघु /माइक्रो-एंटरप्राइज़ेज़  को 10 लाख रुपये तक का कर्ज़ देती हैं और इसमें "बहुत छोटे कर्ज़ों पर बहुत अधिक ध्यान दिया जाता है, जो यूनिट के विकास में कोई बड़ी भूमिका अदा नहीं कर पाते हैं।" उन्होंने कहा कि, माइक्रोएंटरप्राइज़ को उस स्तर तक बढ़ाने के लिए मदद दी जानी चाहिए कि वो 2 से 3 नहीं 4 से 5 श्रमिकों को रोज़गार दे सके।

महिलाएं नुकसान में क्यों हैं

जैसा कि हमने पहले बताया है कि माइक्रो-एंटरप्राइज क्षेत्र में महिलाओं से जुड़े आंकड़े संतोषजनक नहीं रहे है। अध्ययन में पाया गया कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए ऑपरेशन का पैमाना छोटा रहा है। महिलाओं के स्वामित्व वाले 216,000 में से 80 लाख (2.7%) में तीन या अधिक कर्मचारी काम करते हैं, 45,000 में 6 से 9 श्रमिकों को काम पर रखा और 25,000 ने 10 से अधिक लोगों को रोज़गार दिया। पुरुषों के लिए, तुलनात्मक संख्या अधिक थी: 30 लाख ने तीन या अधिक श्रमिकों को काम पर रखा, 5 लाख ने 6 से 9 और 233,000 ने 10 से अधिक लोगों को काम पर रखा।

इसके अलावा, 2013-14 में, महिलाओं के स्वामित्व वाली इकाइयों में काम कर रहे कुल श्रमिकों (1.34 करोड़) में से तीन-चौथाई से अधिक महिलाएं थीं। इससे महिलाओं की "अन्य महिलाओं के साथ काम करने की प्रवृत्ति" दिखाई दी। महिलाओं को रोज़गार देने के मामले में मणिपुर (91%) और केरल (90%) में महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यम सबसे ज्यादा थे।

Male- And Female-Owned Firms In Rural And Urban India
(all in Rs) Male Female Ratio
Rural GVA per Firm 10,274 3628 0.35
Labour Productivity 6504 2,873 0.44
Assets per firm 137,376 59,133 0.43
Urban GVA per Firm 23,277 10,665 0.46
Labour Productivity 116,45 7195 0.62
Assets per firm 737,435 292,794 0.4

Source: Microenterprises in India: A Multidimensional Analysis (October 2019)

शहरी भारत में, महिला उद्यमियों के लिए प्रति ग्रॉस वैल्यू एडड पुरुष-स्वामित्व वाली कंपनियों की तुलना में 46% था, श्रम उत्पादकता में 62% और संपत्ति-स्वामित्व के मामले में 40% था। ग्रामीण क्षेत्रों में ये आंकड़े क्रमशः 35%, 44% और 43% थे। शहरी और ग्रामीण भारत दोनों में, 10 क्षेत्रों में 90% से अधिक महिला-स्वामित्व वाली कंपनियों की हिस्सेदारी है।

बसोल कहते हैं, "महिलाएं छोटे उद्यमों का संचालन करती हैं, घर में ही रहती हैं (जिसका मतलब है कि वे आसानी से विस्तार नहीं कर सकती हैं) और अन्य महिलाओं के साथ काम करती हैं। उनके पास अक्सर संपत्ति नहीं होती है (जैसे कि ज़मीन या घर) जो कर्ज़ के लिए सिक्यूरिटी के तौर पर काम आ सकती है।"

महिलाओं को काम भी घरेलू जिम्मेदारियों के साथ करना पड़ता है, जिससे उनके लिए उद्यम में पर्याप्त समय लगाना मुश्किल हो जाता है। बेसोल आगे कहते हैं, उन्हें बाजार में भेदभाव का भी सामना करना पड़ता है - एक ही उत्पाद के लिए पुरुष उद्यमियों की तुलना में उन्हें कम कीमत मिलती है।

( श्रीहरि विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं। )

यह आलेख मूलत: अंग्रेजी में 4 नवंबर 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।


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