मुजफ्फरपुर के बच्चों में, 5 में से 2 का वजन कम, 2 में से 1 का आयु के अनुसार कद कम

बिहार के मुजफ्फरपुर के अस्पताल में ‘टएक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम’ (एईएस) के लक्षण वाले बच्चे

मुंबई: बिहार के मुजफ्फरपुर ने, हाल ही में ‘इन्सेफेलाइटिस’ के जबरदस्त प्रकोप का अनुभव किया है। राज्य स्तर के पोषण संबंधी आंकड़ों पर नीति आयोग के डैशबोर्ड से पता चलता है कि राज्य बाल पोषण के तीन संकेतक-स्टंट(आयु के लिए कम कद ), वेस्टेड (कद के लिए कम वजन)और कम वजन वाले बच्चों के अनुपात में उच्च स्थान पर है। 

बिहार में पांच साल के कम उम्र के 48 फीसदी बच्चे स्टंट हैं, 21 फीसदी वेस्टेड हैं और 44 फीसदी कम वजन के हैं। और इन तीन संकेतकों के आंकड़ों के साथ, भारत के 29 राज्यों में बिहार को पहले, दसवें और दूसरे स्थान पर रखा गया है। ये आंकड़े भी क्रमशः 38 फीसदी, 21 फीसदी और 36 फीसदी के अखिल भारतीय औसत के बराबर या ऊपर है।

बिहार के बाद, उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक स्टंट बच्चों बच्चों का अनुपात है, करीब 46 फीसदी। उसके बाद झारखंड (45 फीसदी), मेघालय (44 फीसदी) और मध्य प्रदेश (42 फीसदी) का स्थान है।

वेस्टेड बच्चों के मामले में टॉप पांच राज्य झारखंड (29 फीसदी), गुजरात (26 फीसदी), कर्नाटक (26 फीसदी), मध्य प्रदेश (26 फीसदी) और महाराष्ट्र (26 फीसदी) हैं।

जहां तक कम वजन के बच्चों का सवाल है, केवल झारखंड की स्थिति (48 फीसदी) बिहार से भी बदतर है और मध्य प्रदेश (43 फीसदी), उत्तर प्रदेश (40 फीसदी) और गुजरात (40 फीसदी) से थोड़ा आगे है।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और विश्व बैंक के सहयोग से, सरकारी थिंकटैंक नीति आयोग द्वारा 25 जून, 2019 को जारी किए गए राज्यों के वार्षिक स्वास्थ्य प्रदर्शन को मापने वाले स्वास्थ्य सूचकांक पर बिहार को दूसरा सबसे खराब स्थान दिया गया है।

बिहार का स्कोर 32.1 (2017-18 में) सभी राज्यों में से केवल उत्तर प्रदेश (28.6) से बेहतर था, और 2015-16 में इसके 38.5 के स्कोर से गिरावट दर्ज की गई, जो उत्तर प्रदेश (33.7), राजस्थान (36.8) और नागालैंड (37.4) के बाद देश में चौथा सबसे खराब आंकड़ा था।

इसी अवधि के दौरान, बिहार में नवजात मृत्यु दर ( एक महीने से कम उम्र के शिशुओं की मृत्यु दर ) प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 27 के साथ स्थिर थी, जबकि जन्म के समय कम वजन (2.5 किलोग्राम से कम) वाले बच्चों का अनुपात 7.2 फीसदी से बढ़ कर 9.2 फीसदी तक हुआ है। पांच साल से छोटे बच्चों की मृत्यु दर में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 48 से 43 तक सुधार हुआ है, लेकिन प्रजनन दर (एक महिला से पैदा होने वाले बच्चों की औसत संख्या) 2015 में 3.3 से बढ़कर 2016 में 3.3 हो गई है।

मुजफ्फरपुर भारत के पोषण-अभाव वाले शीर्ष जिलों में से नहीं

26 जून, 2019 तक इंसेफेलाइटिस के कारण 132 बच्चों की मौत की रिपोर्ट वाला जिला मुजफ्फरपुर, भारत में पोषण की कमी के लिए शीर्ष जिलों में शामिल नहीं है। फिर भी 48 फीसदी स्टंट, 18 फीसदी वेस्टेड और 42 फीसदी कम वजन के बच्चें हैं ( बिहार के आंकड़ों की तुलना में 48 फीसदी, 21 फीसदी और 44 फीसदी)।

रिसर्च समूह, पोषण द्वारा मुजफ्फरपुर के 2015-16 के डिस्ट्रिक्ट न्यूट्रीशन प्रोफाइल में कहा गया है, "बाल कुपोषण भोजन, स्वास्थ्य और शिशुओं और छोटे बच्चों की देखभाल में अपर्याप्तता के कारण होता है, खासकर जीवन के पहले दो वर्षों में।"

रिसर्च समूह, पोषण का उदेश्य, संश्लेषण करके, उत्पन्न करके भारत में पोषण साक्ष्य अंतराल को कम करना और पोषण संबंधी साक्ष्य जुटाना है। डिस्ट्रिक्ट न्यूट्रीशन प्रोफाइल में आगे कहा गया है, “घरेलू और सामुदायिक स्तर पर, महिलाओं की स्थिति, घरेलू खाद्य सुरक्षा, स्वच्छता और सामाजिक-आर्थिक स्थितियां बच्चों के पोषण परिणामों में और योगदान करती हैं।”

प्रोफाइल ने उल्लेख किया कि केवल 29 फीसदी गर्भवती महिलाएं अपनी पहली तिमाही के दौरान प्रसवपूर्व देखभाल (एएनसी) के लिए सेवा केंद्र तक पहुंची, भले ही उनमें से 85 फीसदी के पास मदर एंड चाइल्ड प्रोट्क्शन कार्ड था। और सिर्फ 11 फीसदी ने कम से कम चार एएनसी का दौरा किया, जबकि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनिऐएशन के अध्ययन द्वारा आठ दौरे की सिफारिश की गई है। इसके अलावा, 2015-16 के दौरान, जिले के केवल 55 फीसदी बच्चों को पूर्ण टीकाकरण प्राप्त हुआ (90 फीसदी के राज्य औसत के खिलाफ), जो कि सरकार के यूनिवर्सल इम्यूनजैशन प्रोग्राम के तहत सभी शिशुओं और गर्भवती महिलाओं के लिए गारंटी है।

मुजफ्फरपुर में कुपोषण सामाजिक परिस्थितियों से जुड़ा हुआ

‘द वायर’ पर आई इस रिपोर्ट में कहा गया है, "मुजफ्फरपुर भारत में कुपोषण के लिए हॉटस्पॉट है। यहां बच्चे पैदा होते और कुपोषित दिखाई देते हैं।"

रिपोर्ट में कहा गया है कि, "हालांकि अधिकांश शिशुओं को स्तनपान कराया जाता है और विशेष स्तनपान उच्च (जिले में) होता है, शिशु आहार के अन्य पहलुओं में कमी है और बचपन की बीमारी अधिक है। कुपोषण के अन्य सामाजिक निर्धारक ( जल्द विवाह, गरीबी, खुले में शौच आदि) जोखिम के कारक हैं।"

बिहार के एक विकास कर्मी ने नाम नहीं छापने की इच्छा जताते हुए कहा, '' गरीबी वहां बहुत बड़ा मुद्दा है। सरकारी कार्यक्रम बहुत हैं, लेकिन कार्यान्वयन एक समस्या है। कोई भी घर का दौरा नहीं कर रहा है और एलबीडब्लू (लो बर्थ वेट) के रिकॉर्ड गलत तरीके से प्रस्तुत किए गए हैं। महिलाएं एनीमिया और कमजोरी से पीड़ित हैं। इसके अलावा, निवारक देखभाल की गुणवत्ता बहुत खराब है। इसके अलावा, कोई विशेष कारण नहीं है कि मुजफ्फरपुर के लोग इससे (एन्सेफलाइटिस) ग्रसित हुए। यह बेगूसराय [बिहार में एक और जिला] में बहुत नियमित है। जागरूकता की कमी एक और बड़ी चिंता है। ” 

सरकारी कार्यक्रमों की विफलता

आईसीडीएस वेबसाइट पर जिले के आंकड़ों के अनुसार, मुजफ्फरपुर जिला 3,801 आंगनवाड़ियों का घर है - इन्टग्रेटिड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विस ( आईसीडीएस) प्रोग्राम के तहत स्थापित बाल देखभाल केंद्र।

‘द वायर’ की रिपोर्ट में कहा गया है, "आंगनवाड़ियों ने सामाजिक और पोषण सुरक्षा जाल के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार में अनुपूरक पोषण कार्यक्रम को कई वर्षों से विभिन्न चुनौतियों से जोड़ा जा रहा है, और उस पर भी ध्यान देने की जरूरत है।"

विकास कर्मी ने कहा, '' आंगनवाडियां अपने कार्यों को पूरा करने में असमर्थ हैं। उन्हें और अधिक क्षमता, प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार की आवश्यकता है, और श्रमिकों ( ज्यादातर स्वैच्छिक ) को प्रेरित करने की आवश्यकता है। कागज पर, एडब्लूसी (आंगनवाड़ी केंद्र) कार्य कर रहे हैं; वास्तव में, उनका प्रदर्शन खराब है। ”

 

मानवीय संगठन डॉक्टर्स फॉर यू के संस्थापक रविकांत सिंह कहते हैं, "हर कोई सरकार पर आरोप लगा रहा है। एसीडीएस को भी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन बुनियादी ढांचे और सेवाओं के मामले में इसे और मजबूत करने की जरूरत है। ”

नाम न छापने की इच्छा बताने वाले एक और सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा, "हमें पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को देखना चाहिए, परिवार को भी... आईसीडीएस केवल हितधारकों में से एक है और केवल पूरक मदद प्रदान कर सकता है; यह परिवार ही है, जो भोजन और पोषण प्रदान करता है। बिहार एक बड़े पैमाने पर ग्रामीण राज्य है, जहां आजीविका कृषि क्षेत्र पर निर्भर है। ”

बिहार के खराब आईसीडीएस बुनियादी ढांचे को मार्च 2018 में इंडियास्पेंड की रिपोर्ट में दिखाया गया था, जिसमें पाया गया था कि, "आंगनवाड़ी केंद्रों में शौचालय, पेयजल, रसोई, बर्तन आदि जैसी बुनियादी सुविधाओं के रूप में लाभार्थियों को प्रदान की जाने वाली गुणवत्ता सेवाओं के साथ गंभीरता से समझौता किया गया था।" 2014 में, राज्य में एकल आंगनवाड़ी 193 बच्चों को पूरक पोषण प्रदान कर रही थी, यानी प्रति केंद्र 68 बच्चों का राष्ट्रीय औसत लगभग तीन गुना।

"उच्च प्रजनन क्षमता और उच्च जनसंख्या वाले राज्य ...में संभावना है कि उन्हें अधिक आईसीडीएस केंद्रों की आवश्यकता है, और सभी सेवाओं के पूर्ण पैमाने पर वितरण को सुनिश्चित करने के लिए अधिक वित्तपोषण की आवश्यकता है," जैसा कि मार्च 2019 इंडियास्पेंड की यह रिपोर्ट सुझाव देती है।

यह कहानी पहली बार यहां HealthCheck पर प्रकाशित हुई थी।

(साहा, पुणे के सिम्बायोसिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में एमएससी के छात्र हैं और इंडियास्पेंड में इंटर्न हैं।)

यह लेख 29 जून 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

मुंबई: बिहार के मुजफ्फरपुर ने, हाल ही में ‘इन्सेफेलाइटिस’ के जबरदस्त प्रकोप का अनुभव किया है। राज्य स्तर के पोषण संबंधी आंकड़ों पर नीति आयोग के डैशबोर्ड से पता चलता है कि राज्य बाल पोषण के तीन संकेतक-स्टंट(आयु के लिए कम कद ), वेस्टेड (कद के लिए कम वजन)और कम वजन वाले बच्चों के अनुपात में उच्च स्थान पर है। 

बिहार में पांच साल के कम उम्र के 48 फीसदी बच्चे स्टंट हैं, 21 फीसदी वेस्टेड हैं और 44 फीसदी कम वजन के हैं। और इन तीन संकेतकों के आंकड़ों के साथ, भारत के 29 राज्यों में बिहार को पहले, दसवें और दूसरे स्थान पर रखा गया है। ये आंकड़े भी क्रमशः 38 फीसदी, 21 फीसदी और 36 फीसदी के अखिल भारतीय औसत के बराबर या ऊपर है।

बिहार के बाद, उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक स्टंट बच्चों बच्चों का अनुपात है, करीब 46 फीसदी। उसके बाद झारखंड (45 फीसदी), मेघालय (44 फीसदी) और मध्य प्रदेश (42 फीसदी) का स्थान है।

वेस्टेड बच्चों के मामले में टॉप पांच राज्य झारखंड (29 फीसदी), गुजरात (26 फीसदी), कर्नाटक (26 फीसदी), मध्य प्रदेश (26 फीसदी) और महाराष्ट्र (26 फीसदी) हैं।

जहां तक कम वजन के बच्चों का सवाल है, केवल झारखंड की स्थिति (48 फीसदी) बिहार से भी बदतर है और मध्य प्रदेश (43 फीसदी), उत्तर प्रदेश (40 फीसदी) और गुजरात (40 फीसदी) से थोड़ा आगे है।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और विश्व बैंक के सहयोग से, सरकारी थिंकटैंक नीति आयोग द्वारा 25 जून, 2019 को जारी किए गए राज्यों के वार्षिक स्वास्थ्य प्रदर्शन को मापने वाले स्वास्थ्य सूचकांक पर बिहार को दूसरा सबसे खराब स्थान दिया गया है।

बिहार का स्कोर 32.1 (2017-18 में) सभी राज्यों में से केवल उत्तर प्रदेश (28.6) से बेहतर था, और 2015-16 में इसके 38.5 के स्कोर से गिरावट दर्ज की गई, जो उत्तर प्रदेश (33.7), राजस्थान (36.8) और नागालैंड (37.4) के बाद देश में चौथा सबसे खराब आंकड़ा था।

इसी अवधि के दौरान, बिहार में नवजात मृत्यु दर ( एक महीने से कम उम्र के शिशुओं की मृत्यु दर ) प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 27 के साथ स्थिर थी, जबकि जन्म के समय कम वजन (2.5 किलोग्राम से कम) वाले बच्चों का अनुपात 7.2 फीसदी से बढ़ कर 9.2 फीसदी तक हुआ है। पांच साल से छोटे बच्चों की मृत्यु दर में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 48 से 43 तक सुधार हुआ है, लेकिन प्रजनन दर (एक महिला से पैदा होने वाले बच्चों की औसत संख्या) 2015 में 3.3 से बढ़कर 2016 में 3.3 हो गई है।

मुजफ्फरपुर भारत के पोषण-अभाव वाले शीर्ष जिलों में से नहीं

26 जून, 2019 तक इंसेफेलाइटिस के कारण 132 बच्चों की मौत की रिपोर्ट वाला जिला मुजफ्फरपुर, भारत में पोषण की कमी के लिए शीर्ष जिलों में शामिल नहीं है। फिर भी 48 फीसदी स्टंट, 18 फीसदी वेस्टेड और 42 फीसदी कम वजन के बच्चें हैं ( बिहार के आंकड़ों की तुलना में 48 फीसदी, 21 फीसदी और 44 फीसदी)।

रिसर्च समूह, पोषण द्वारा मुजफ्फरपुर के 2015-16 के डिस्ट्रिक्ट न्यूट्रीशन प्रोफाइल में कहा गया है, "बाल कुपोषण भोजन, स्वास्थ्य और शिशुओं और छोटे बच्चों की देखभाल में अपर्याप्तता के कारण होता है, खासकर जीवन के पहले दो वर्षों में।"

रिसर्च समूह, पोषण का उदेश्य, संश्लेषण करके, उत्पन्न करके भारत में पोषण साक्ष्य अंतराल को कम करना और पोषण संबंधी साक्ष्य जुटाना है। डिस्ट्रिक्ट न्यूट्रीशन प्रोफाइल में आगे कहा गया है, “घरेलू और सामुदायिक स्तर पर, महिलाओं की स्थिति, घरेलू खाद्य सुरक्षा, स्वच्छता और सामाजिक-आर्थिक स्थितियां बच्चों के पोषण परिणामों में और योगदान करती हैं।”

प्रोफाइल ने उल्लेख किया कि केवल 29 फीसदी गर्भवती महिलाएं अपनी पहली तिमाही के दौरान प्रसवपूर्व देखभाल (एएनसी) के लिए सेवा केंद्र तक पहुंची, भले ही उनमें से 85 फीसदी के पास मदर एंड चाइल्ड प्रोट्क्शन कार्ड था। और सिर्फ 11 फीसदी ने कम से कम चार एएनसी का दौरा किया, जबकि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनिऐएशन के अध्ययन द्वारा आठ दौरे की सिफारिश की गई है। इसके अलावा, 2015-16 के दौरान, जिले के केवल 55 फीसदी बच्चों को पूर्ण टीकाकरण प्राप्त हुआ (90 फीसदी के राज्य औसत के खिलाफ), जो कि सरकार के यूनिवर्सल इम्यूनजैशन प्रोग्राम के तहत सभी शिशुओं और गर्भवती महिलाओं के लिए गारंटी है।

मुजफ्फरपुर में कुपोषण सामाजिक परिस्थितियों से जुड़ा हुआ

‘द वायर’ पर आई इस रिपोर्ट में कहा गया है, "मुजफ्फरपुर भारत में कुपोषण के लिए हॉटस्पॉट है। यहां बच्चे पैदा होते और कुपोषित दिखाई देते हैं।"

रिपोर्ट में कहा गया है कि, "हालांकि अधिकांश शिशुओं को स्तनपान कराया जाता है और विशेष स्तनपान उच्च (जिले में) होता है, शिशु आहार के अन्य पहलुओं में कमी है और बचपन की बीमारी अधिक है। कुपोषण के अन्य सामाजिक निर्धारक ( जल्द विवाह, गरीबी, खुले में शौच आदि) जोखिम के कारक हैं।"

बिहार के एक विकास कर्मी ने नाम नहीं छापने की इच्छा जताते हुए कहा, '' गरीबी वहां बहुत बड़ा मुद्दा है। सरकारी कार्यक्रम बहुत हैं, लेकिन कार्यान्वयन एक समस्या है। कोई भी घर का दौरा नहीं कर रहा है और एलबीडब्लू (लो बर्थ वेट) के रिकॉर्ड गलत तरीके से प्रस्तुत किए गए हैं। महिलाएं एनीमिया और कमजोरी से पीड़ित हैं। इसके अलावा, निवारक देखभाल की गुणवत्ता बहुत खराब है। इसके अलावा, कोई विशेष कारण नहीं है कि मुजफ्फरपुर के लोग इससे (एन्सेफलाइटिस) ग्रसित हुए। यह बेगूसराय [बिहार में एक और जिला] में बहुत नियमित है। जागरूकता की कमी एक और बड़ी चिंता है। ” 

सरकारी कार्यक्रमों की विफलता

आईसीडीएस वेबसाइट पर जिले के आंकड़ों के अनुसार, मुजफ्फरपुर जिला 3,801 आंगनवाड़ियों का घर है - इन्टग्रेटिड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विस ( आईसीडीएस) प्रोग्राम के तहत स्थापित बाल देखभाल केंद्र।

‘द वायर’ की रिपोर्ट में कहा गया है, "आंगनवाड़ियों ने सामाजिक और पोषण सुरक्षा जाल के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार में अनुपूरक पोषण कार्यक्रम को कई वर्षों से विभिन्न चुनौतियों से जोड़ा जा रहा है, और उस पर भी ध्यान देने की जरूरत है।"

विकास कर्मी ने कहा, '' आंगनवाडियां अपने कार्यों को पूरा करने में असमर्थ हैं। उन्हें और अधिक क्षमता, प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार की आवश्यकता है, और श्रमिकों ( ज्यादातर स्वैच्छिक ) को प्रेरित करने की आवश्यकता है। कागज पर, एडब्लूसी (आंगनवाड़ी केंद्र) कार्य कर रहे हैं; वास्तव में, उनका प्रदर्शन खराब है। ”

 

मानवीय संगठन डॉक्टर्स फॉर यू के संस्थापक रविकांत सिंह कहते हैं, "हर कोई सरकार पर आरोप लगा रहा है। एसीडीएस को भी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन बुनियादी ढांचे और सेवाओं के मामले में इसे और मजबूत करने की जरूरत है। ”

नाम न छापने की इच्छा बताने वाले एक और सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा, "हमें पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को देखना चाहिए, परिवार को भी... आईसीडीएस केवल हितधारकों में से एक है और केवल पूरक मदद प्रदान कर सकता है; यह परिवार ही है, जो भोजन और पोषण प्रदान करता है। बिहार एक बड़े पैमाने पर ग्रामीण राज्य है, जहां आजीविका कृषि क्षेत्र पर निर्भर है। ”

बिहार के खराब आईसीडीएस बुनियादी ढांचे को मार्च 2018 में इंडियास्पेंड की रिपोर्ट में दिखाया गया था, जिसमें पाया गया था कि, "आंगनवाड़ी केंद्रों में शौचालय, पेयजल, रसोई, बर्तन आदि जैसी बुनियादी सुविधाओं के रूप में लाभार्थियों को प्रदान की जाने वाली गुणवत्ता सेवाओं के साथ गंभीरता से समझौता किया गया था।" 2014 में, राज्य में एकल आंगनवाड़ी 193 बच्चों को पूरक पोषण प्रदान कर रही थी, यानी प्रति केंद्र 68 बच्चों का राष्ट्रीय औसत लगभग तीन गुना।

"उच्च प्रजनन क्षमता और उच्च जनसंख्या वाले राज्य ...में संभावना है कि उन्हें अधिक आईसीडीएस केंद्रों की आवश्यकता है, और सभी सेवाओं के पूर्ण पैमाने पर वितरण को सुनिश्चित करने के लिए अधिक वित्तपोषण की आवश्यकता है," जैसा कि मार्च 2019 इंडियास्पेंड की यह रिपोर्ट सुझाव देती है।

यह कहानी पहली बार यहां HealthCheck पर प्रकाशित हुई थी।

(साहा, पुणे के सिम्बायोसिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में एमएससी के छात्र हैं और इंडियास्पेंड में इंटर्न हैं।)

यह लेख 29 जून 2019 को IndiaSpend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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