मुफ्त उपचार, फिर भी 4 में से 1 भारतीय टीबी मरीज बेचता है संपत्ति या लेता है उधार

नई दिल्ली: चार में से एक तपेदिक (टीबी) के रोगियों को अपने इलाज के लिए संपत्ति बेचनी पड़ती है या पैसे उधार लेने पड़ते हैं, यानी ‘ कठिन आर्थिक भार’ सहना पड़ता है। "

सामाजिक कल्याण योजनाओं के तहत पोषण संबंधी सहायता प्रदान करते हुए टीबी रोगियों को इस विनाशकारी आर्थिक लागत से बचाना", नेशनल स्ट्रटीजिक प्लान (एनएसपी) 2017-2025 का एक स्पष्ट उद्देश्य है, जिससे 2025 तक भारत में टीबी को खत्म करने की केंद्र की योजना है। हालांकि, उन लोगों में भी, जिन्हें मुफ्त देखभाल प्राप्त हुई, उनमें से 21.3 फीसदी रोगियों पर कठिन आर्थिक भार पड़ा है, जैसा कि मार्च 2019 में इंडियन जर्नल ऑफ ट्यूबरकुलोसिस में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है।

अध्ययन में, कठिन आर्थिक भार को निजीकरण के एक संकेतक के रूप में उपयोग किया गया, जो एक परिवार को टीबी उपचार के लिए भुगतान करना पड़ता है। इसने 2014 में आयोजित नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) के 71 वें दौर से 899 टीबी मामलों की पहचान की, जो वित्तपोषण के विभिन्न स्रोतों के साथ स्वास्थ्य व्यय के बारे में जानकारी प्रदान करता है।वित्तपोषण के स्रोतों को इस तरह वर्गीकृत किया जाता है- स्वयं की आय और बचत, उधार (ब्याज के साथ या बिना), संपत्ति की बिक्री, मित्रों और रिश्तेदारों से योगदान या सहायता। अध्ययन के लेखकों ने उधार को मुख्य रूप से ब्याज के साथ और देनदारी की तरह माना है और यह ‘हेल्थ पॉलिसी एंड प्लानिंग’ जर्नल में प्रकाशित 2015 के एक अध्ययन के समान ही है।

कार्य प्रणाली

एक रोगी को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों,जैसे आयु, शिक्षा, लिंग, वैवाहिक स्थिति, धर्म और धन से शोधकर्ताओं ने सबसे पहले उन लोगों की पहचान की जो टीबी के लिए आउट पेशेंट उपचार और अस्पताल में भर्ती पर होने वाले खर्च के लिए महत्वपूर्ण हैं।

इसके बाद, लॉजिस्टिक रिग्रेशन का उपयोग डेटा का वर्णन और टीबी के कारण आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च और कठिन आर्थिक भार के साथ इन कारकों के संबंधों को वर्णन करने के लिए किया गया था।

आउट-ऑफ पॉकेट खर्च

सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की वकालत करते हुए, विश्व स्वास्थ्य संगठन सुझाव देते हैं कि देश, विकासशील देशों के संदर्भ में आउट-ऑफ पॉकेट खर्च और गरीबी की जांच करें। इससे पता चल सकता है कि स्वास्थ्य व्यय ने किस हद तक आबादी को गंभीर गरीबी में धकेल दिया है?

आउट-ऑफ-पॉकेट (ओओपी) स्वास्थ्य व्यय ने 5.5 करोड़ भारतीयों को ( दक्षिण कोरिया, स्पेन या केन्या की जनसंख्या से अधिक ) 2011-12 में गरीबी में धकेल दिया है और इनमें से 3.8 करोड़ (69 फीसदी) सिर्फ दवाओं पर हुए खर्च से कंगाल हुए थे, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 19 जुलाई, 2018 को बताया था।

भारत में पहले कई अध्ययन (जैसे कि यहां, यहां और यहां)में घरों पर स्वास्थ्य व्यय के वित्तीय बोझ को मापने के लिए हुए हैं। स्वास्थ्य सेवा पर कोई भी आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय तब भयावह माना जाता है, जब यह घर के कुल मासिक उपभोग व्यय का 10 फीसदी या इसके मासिक गैर-खाद्य उपभोग व्यय का 40 फीसदी से अधिक हो।

भयावह स्वास्थ्य व्यय की गणना करना मुश्किल है। माप में,विनाशकारी स्वास्थ्य व्यय के संपर्क में एक घर का प्रतिशत (सदस्यों की संख्या) का विश्लेषण करना शामिल है। फिर, एक कान्सन्ट्रेशन इंडेक्स (सीआई) की गणना यह निर्धारित करने के लिए की जाती है कि क्या गरीब घर अमीर घरों की तुलना में अधिक भयावह भुगतान करते हैं। सीआई का एक नकारात्मक मूल्य गरीब घरों में दहलीज से अधिक होने की प्रवृत्ति को दर्शाता है।

जैसे, हाल के अध्ययन द्वारा उपयोग किए जाने वाले कठिन वित्तपोषण मॉडल से आउट-ऑफ पॉकेट खर्च का अनुमान लगाने में मदद मिलेगी। टीबी नियंत्रण कार्यक्रमों के प्रबंधक और नीति नियंता टीबी आउट पेशेंट और इन पेशेंट का सर्वेक्षण करने के लिए कठिन वित्तपोषण की परिभाषा का उपयोग कर सकते हैं ताकि वे समझ सकें कि वे कैसे उपयोग करते हैं और टीबी पर वित्त व्यय करते हैं।

सबसे ज्यादा प्रभावित गरीब भारतीय

एनएसएसओ के राष्ट्रीय प्रतिनिधि नमूने का उपयोग करते हुए, अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि 26.7 फीसदी इनपेशंट टीबी के मामले और 3.5 फीसदी आउट पेशेंट मामलों में कठिनाई के वित्तपोषण का अनुभव होता है। कुल मिलाकर, 25.9 फीसदी रोगियों को टीबी के खर्चों के वित्तपोषण के लिए संपत्ति बेचना या उधार लेना पड़ा।

गरीब सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, और उन्होंने अस्पताल में भर्ती होने पर घरेलू आय का 23 फीसदी खर्च किया गया।

How Indians Financed Their Tuberculosis Treatment
Savings Borrowings Sale of physical assets Contributions from Friends Other sources
Household Outpatient Household Outpatient Household Outpatient Household Outpatient Household Outpatient
Poorest 50.6 97 35.1 2.6 3.9 - 10.1 0.1 0.2 0.3
Poorer 62.6 90.3 32.2 8.3 0.5 - 4.6 0.9 0.1 0.5
Middle 68.3 98.5 30.8 0.8 0 - 0.2 0.7 0.6 0
Richer 85.1 99 12 1 0 - 2.9 0 0 0
Richest 80.9 97.4 17.6 1.8 0 - 1.5 0.8 0 0.1

Source: Author’s calculations based on NSSO 71st Round data

सामाजिक समूहों में कोई भिन्नता नहीं थी: अनुसूचित जातियों और जनजातियों के रोगियों में ( जिनकी भारत के टीबी मामलों में 34.2 फीसदी की हिस्सेदारी हैं ) 35.2 फीसदी इनपेशेंट मामलों ने टीबी अस्पताल में भर्ती होने के लिए संपत्ति बेची या ब्याज पर पैसा उधार लिया।

भारत का टीबी नियंत्रण कार्यक्रम गंभीर धन संकट का सामना कर रहा है: 2012-2015 के दौरान केंद्र सरकार का 1,685 करोड़ रुपये (254 मिलियन डॉलर) का आवंटन भारत और इसके भागीदारों द्वारा 2,996 करोड़ रुपये ( 452 मिलियन डॉलर) की न्यूनतम प्रतिबद्धता से कम था - 631 करोड़ रुपये ( 95 मिलियन डॉलर) की कमी। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, भारत टीबी नियंत्रण कार्यक्रम के लिए आवश्यक कुल राशि का केवल 37 फीसदी योगदान देता है, जो कि टीबी के लिए अन्य अनुदान प्राप्त करने वाले देशों की तुलना में अपर्याप्त है।

वित्तीय और पोषण संबंधी कठिनाई को दूर करने के लिए प्रस्तावित योजनाओं में से एक प्रत्यक्ष लाभार्थी हस्तांतरण (डीबीटी) के माध्यम से प्रत्येक टीबी रोगी को नकद प्रोत्साहन प्रदान करना है। भले ही यह योजना अप्रैल 2018 में लुढ़क गई थी, फिर भी 20.9 लाख पंजीकृत टीबी रोगियों में से 12 लाख (58 फीसदी) को दो महीने के लिए 1,000 रुपये का नकद लाभ मिला है। कम लोगों तक राशि पहुंचने का मुख्य कारण ग्रामीण गरीबों में से कई का कोई बैंक खाता नहीं होना है।

(जॉन एक सार्वजनिक स्वास्थ्य पेशेवर हैं और नई दिल्ली में कैंपबेल कोलाब्रेशन के साथ एविडेंस सिंथेसिस विशेषज्ञ के रूप में काम करते हैं।)

यह लेख सबसे पहले HealthCheck पर प्रकाशित हुआ है।

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नई दिल्ली: चार में से एक तपेदिक (टीबी) के रोगियों को अपने इलाज के लिए संपत्ति बेचनी पड़ती है या पैसे उधार लेने पड़ते हैं, यानी ‘ कठिन आर्थिक भार’ सहना पड़ता है। "

सामाजिक कल्याण योजनाओं के तहत पोषण संबंधी सहायता प्रदान करते हुए टीबी रोगियों को इस विनाशकारी आर्थिक लागत से बचाना", नेशनल स्ट्रटीजिक प्लान (एनएसपी) 2017-2025 का एक स्पष्ट उद्देश्य है, जिससे 2025 तक भारत में टीबी को खत्म करने की केंद्र की योजना है। हालांकि, उन लोगों में भी, जिन्हें मुफ्त देखभाल प्राप्त हुई, उनमें से 21.3 फीसदी रोगियों पर कठिन आर्थिक भार पड़ा है, जैसा कि मार्च 2019 में इंडियन जर्नल ऑफ ट्यूबरकुलोसिस में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है।

अध्ययन में, कठिन आर्थिक भार को निजीकरण के एक संकेतक के रूप में उपयोग किया गया, जो एक परिवार को टीबी उपचार के लिए भुगतान करना पड़ता है। इसने 2014 में आयोजित नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) के 71 वें दौर से 899 टीबी मामलों की पहचान की, जो वित्तपोषण के विभिन्न स्रोतों के साथ स्वास्थ्य व्यय के बारे में जानकारी प्रदान करता है।वित्तपोषण के स्रोतों को इस तरह वर्गीकृत किया जाता है- स्वयं की आय और बचत, उधार (ब्याज के साथ या बिना), संपत्ति की बिक्री, मित्रों और रिश्तेदारों से योगदान या सहायता। अध्ययन के लेखकों ने उधार को मुख्य रूप से ब्याज के साथ और देनदारी की तरह माना है और यह ‘हेल्थ पॉलिसी एंड प्लानिंग’ जर्नल में प्रकाशित 2015 के एक अध्ययन के समान ही है।

कार्य प्रणाली

एक रोगी को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों,जैसे आयु, शिक्षा, लिंग, वैवाहिक स्थिति, धर्म और धन से शोधकर्ताओं ने सबसे पहले उन लोगों की पहचान की जो टीबी के लिए आउट पेशेंट उपचार और अस्पताल में भर्ती पर होने वाले खर्च के लिए महत्वपूर्ण हैं।

इसके बाद, लॉजिस्टिक रिग्रेशन का उपयोग डेटा का वर्णन और टीबी के कारण आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च और कठिन आर्थिक भार के साथ इन कारकों के संबंधों को वर्णन करने के लिए किया गया था।

आउट-ऑफ पॉकेट खर्च

सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की वकालत करते हुए, विश्व स्वास्थ्य संगठन सुझाव देते हैं कि देश, विकासशील देशों के संदर्भ में आउट-ऑफ पॉकेट खर्च और गरीबी की जांच करें। इससे पता चल सकता है कि स्वास्थ्य व्यय ने किस हद तक आबादी को गंभीर गरीबी में धकेल दिया है?

आउट-ऑफ-पॉकेट (ओओपी) स्वास्थ्य व्यय ने 5.5 करोड़ भारतीयों को ( दक्षिण कोरिया, स्पेन या केन्या की जनसंख्या से अधिक ) 2011-12 में गरीबी में धकेल दिया है और इनमें से 3.8 करोड़ (69 फीसदी) सिर्फ दवाओं पर हुए खर्च से कंगाल हुए थे, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 19 जुलाई, 2018 को बताया था।

भारत में पहले कई अध्ययन (जैसे कि यहां, यहां और यहां)में घरों पर स्वास्थ्य व्यय के वित्तीय बोझ को मापने के लिए हुए हैं। स्वास्थ्य सेवा पर कोई भी आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय तब भयावह माना जाता है, जब यह घर के कुल मासिक उपभोग व्यय का 10 फीसदी या इसके मासिक गैर-खाद्य उपभोग व्यय का 40 फीसदी से अधिक हो।

भयावह स्वास्थ्य व्यय की गणना करना मुश्किल है। माप में,विनाशकारी स्वास्थ्य व्यय के संपर्क में एक घर का प्रतिशत (सदस्यों की संख्या) का विश्लेषण करना शामिल है। फिर, एक कान्सन्ट्रेशन इंडेक्स (सीआई) की गणना यह निर्धारित करने के लिए की जाती है कि क्या गरीब घर अमीर घरों की तुलना में अधिक भयावह भुगतान करते हैं। सीआई का एक नकारात्मक मूल्य गरीब घरों में दहलीज से अधिक होने की प्रवृत्ति को दर्शाता है।

जैसे, हाल के अध्ययन द्वारा उपयोग किए जाने वाले कठिन वित्तपोषण मॉडल से आउट-ऑफ पॉकेट खर्च का अनुमान लगाने में मदद मिलेगी। टीबी नियंत्रण कार्यक्रमों के प्रबंधक और नीति नियंता टीबी आउट पेशेंट और इन पेशेंट का सर्वेक्षण करने के लिए कठिन वित्तपोषण की परिभाषा का उपयोग कर सकते हैं ताकि वे समझ सकें कि वे कैसे उपयोग करते हैं और टीबी पर वित्त व्यय करते हैं।

सबसे ज्यादा प्रभावित गरीब भारतीय

एनएसएसओ के राष्ट्रीय प्रतिनिधि नमूने का उपयोग करते हुए, अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि 26.7 फीसदी इनपेशंट टीबी के मामले और 3.5 फीसदी आउट पेशेंट मामलों में कठिनाई के वित्तपोषण का अनुभव होता है। कुल मिलाकर, 25.9 फीसदी रोगियों को टीबी के खर्चों के वित्तपोषण के लिए संपत्ति बेचना या उधार लेना पड़ा।

गरीब सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, और उन्होंने अस्पताल में भर्ती होने पर घरेलू आय का 23 फीसदी खर्च किया गया।

How Indians Financed Their Tuberculosis Treatment
Savings Borrowings Sale of physical assets Contributions from Friends Other sources
Household Outpatient Household Outpatient Household Outpatient Household Outpatient Household Outpatient
Poorest 50.6 97 35.1 2.6 3.9 - 10.1 0.1 0.2 0.3
Poorer 62.6 90.3 32.2 8.3 0.5 - 4.6 0.9 0.1 0.5
Middle 68.3 98.5 30.8 0.8 0 - 0.2 0.7 0.6 0
Richer 85.1 99 12 1 0 - 2.9 0 0 0
Richest 80.9 97.4 17.6 1.8 0 - 1.5 0.8 0 0.1

Source: Author’s calculations based on NSSO 71st Round data

सामाजिक समूहों में कोई भिन्नता नहीं थी: अनुसूचित जातियों और जनजातियों के रोगियों में ( जिनकी भारत के टीबी मामलों में 34.2 फीसदी की हिस्सेदारी हैं ) 35.2 फीसदी इनपेशेंट मामलों ने टीबी अस्पताल में भर्ती होने के लिए संपत्ति बेची या ब्याज पर पैसा उधार लिया।

भारत का टीबी नियंत्रण कार्यक्रम गंभीर धन संकट का सामना कर रहा है: 2012-2015 के दौरान केंद्र सरकार का 1,685 करोड़ रुपये (254 मिलियन डॉलर) का आवंटन भारत और इसके भागीदारों द्वारा 2,996 करोड़ रुपये ( 452 मिलियन डॉलर) की न्यूनतम प्रतिबद्धता से कम था - 631 करोड़ रुपये ( 95 मिलियन डॉलर) की कमी। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, भारत टीबी नियंत्रण कार्यक्रम के लिए आवश्यक कुल राशि का केवल 37 फीसदी योगदान देता है, जो कि टीबी के लिए अन्य अनुदान प्राप्त करने वाले देशों की तुलना में अपर्याप्त है।

वित्तीय और पोषण संबंधी कठिनाई को दूर करने के लिए प्रस्तावित योजनाओं में से एक प्रत्यक्ष लाभार्थी हस्तांतरण (डीबीटी) के माध्यम से प्रत्येक टीबी रोगी को नकद प्रोत्साहन प्रदान करना है। भले ही यह योजना अप्रैल 2018 में लुढ़क गई थी, फिर भी 20.9 लाख पंजीकृत टीबी रोगियों में से 12 लाख (58 फीसदी) को दो महीने के लिए 1,000 रुपये का नकद लाभ मिला है। कम लोगों तक राशि पहुंचने का मुख्य कारण ग्रामीण गरीबों में से कई का कोई बैंक खाता नहीं होना है।

(जॉन एक सार्वजनिक स्वास्थ्य पेशेवर हैं और नई दिल्ली में कैंपबेल कोलाब्रेशन के साथ एविडेंस सिंथेसिस विशेषज्ञ के रूप में काम करते हैं।)

यह लेख सबसे पहले HealthCheck पर प्रकाशित हुआ है।

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