यूपी में एक लाख से अधिक बेड लेकिन एक बेड मिलना भी मुश्किल

लखनऊ के केजीएमयू का कोरोनावायरस जांच केंद्र। फ़ोटो- सुम‍ित कुमार

लखनऊः उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के रहने वाले 26 साल के अजय 22 जुलाई को कोरोनावायरस की जांच में पॉज़िटिव पाए जाते हैं। शाम के 7 बजे इसकी सूचना नोडल अधिकारी को दी जाती है और एंबुलेंस आते-आते रात के 11 बज जाते हैं। अजय को लेकर एंबुलेंस लखनऊ के एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में घूमती रहती है लेकिन कहीं बेड नहीं मिलता। आख़िरकार 6 घंटे बाद सुबह 5 बजे अजय को टी.एस.एम. अस्पताल में बेड मिल पाता है। 

"अस्पताल में एडमिट होने के आधे घंटे बाद भैया ने मुझे फ़ोन किया और बताया कि अस्पताल में उन्हें कोई देखने वाला नहीं है। मेरे भाई से मेरी यही आख़िरी बातचीत थी," अजय के छोटे भाई तरुण ने बताया।

 

इस बातचीत के कुछ ही घंटों बाद अजय की मौत हो गई। अजय को टी.एस.एम अस्पताल से किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) रेफ़र किया गया था, लेकिन केजीएमयू पहुंचते-पहुंचते अजय की मौत हो गई।

  

उत्तर प्रदेश सरकार का दावा है कि राज्य में कोरोनावायरस के मरीज़ों के लिए एक लाख से अधिक बेड उपलब्ध हैं, लेकिन उसके बावजूद राजधानी लखनऊ समेत राज्य के कई ज़िलों में मरीज़ों को वक़्त पर बेड न मिलने की घटनाएं सामने आ रही हैं। जगह-जगह मरीज़ अस्पतालों में भटक रहे हैं, एंबुलेंस कई-कई घंटे की देरी से पहुंच रही हैं। सबसे ज़्यादा बुरी स्थिति राजधानी लखनऊ और यहां से महज़ 90 किलोमीटर दूर कानपुर में है।

राज्य में कोरोनावायरस के मरीज़ों की संख्या और बेड के सरकारी आंकड़ों को देखें तो बेड की संख्या पर्याप्त नज़र आती है। यूपी में कोरोनावायरस के मरीज़ों की लिए 101,236 बेड है। कोरोनावायरस के मरीज़ों की कुल संख्या 29 जुलाई को 77,626 थी, जिसमें से 29,997 मरीज़ों का इलाज चल रहा है। यानी राज्य में सक्रिय मरीज़ों की तुलना में तीन गुना से भी ज़्यादा बेड उपलब्ध हैं। इसके अलावा राज्य में 18% मरीज़ होम आइसोलेशन में रह रहे हैं।

 

इंडियास्पेंड ने जब बेड न मिलने की वजह जानने की कोशिश की तो दो बड़ी वजह सामने आईं। पहली तो यह कि हर ज़िले में इसके लिए बनी कोविड स्पेशल टीम के पास बेड की उपलब्धता की लाइव ट्रैकिंग की सुविधा नहीं है। दूसरी यह कि मरीज़ों को शाम 4 बजे के बाद डिस्चार्ज किया जाता है, जिससे बेड की उपलब्धता के आंकड़े संबंधित विभाग को अगले दिन मिल पाते हैं।   

लखनऊ और कानपुर में बिगड़े हालात

एक तरफ़ राज्य सरकार दावा कर रही है कि कोरोनावायरस के मरीज़ों के लिए राज्य में पर्याप्त बेड हैं, दूसरी तरफ़ राज्य के मीडिया में लगातार मरीज़ों को भर्ती ना किए जाने की ख़बरें सुर्ख़ियां बन रही हैं। दैनिक जागरण की 22 जुलाई की इस रिपोर्ट के मुताबिक़, लखनऊ के लोकबंधु अस्पताल के बाहर एक कोरोना मरीज़ करीब छह घंटे बैठा रहा तब जाकर उसे भर्ती किया गया। हालात को नियंत्रित करने के लिए राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने लखनऊ के मुख्यचिकित्साधिकारी का तबादला कर दिया। 

राज्य में कोरोनावायरस के सबसे ज़्यादा मामले लखनऊ में हैं लेकिन यहां अभी तक सामने आए मामलों की तुलना में पर्याप्त संख्या में बेड उपलब्ध हैं। लखनऊ में 29 जुलाई तक 7,129 मामले सामने आ चुके हैं, जिसमें से 3,941 मामले सक्रिय हैं। जबकि यहां कोरोनावायरस के मरीज़ों के लिए कुल 6,900 बेड हैं। इसमें एल-1 श्रेणी के 4,410, एल-2 श्रेणी के 1,335 और एल-3 श्रेणी के 1,155 बेड शामिल हैं।

कानपुर नगर ज़िले से भी मरीज़ों को बेड ना मिलने की शिकायतें मिल रही हैं। सीओडी मज़दूर पंचायत संगठन के एक पदाधिकारी ने 20 जुलाई को कोरोनावायरस की जांच कराई तो रिपोर्ट पॉज़िटिव आई। परिजनों ने उन्हें कानपुर के स्वरूप नगर के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया। 23 जुलाई की रात 11 बजे उनके बेटे के पास अस्पताल से फ़ोन आया कि उनके पिता की तबियत ज़्यादा ख़राब है, उन्हें दूसरे अस्पताल ले जाना होगा। 

उनके बेटे ने कई अस्पतालों के चक्कर लगाए, लेकिन कहीं बेड नहीं मिला। बड़ी मुश्किल से सुबह चार बजे कानपुर नगर के कांशीराम अस्पताल में दाख़िला मिल पाया। लेकिन उसके दो घंटे बाद अस्पताल से उसके पिता की मौत की ख़बर आई। "अगर मेरे पिता को वक़्त पर बेड मिल जाता तो उनकी जान बच सकती थी," मरीज़ के बेटे ने कहा।

कानपुर नगर ज़िले में 29 जुलाई तक 4,491 मामले सामने आ चुके हैं जिसमें से 2,364 मामले सक्रिय हैं। यहां राज्य में सबसे ज़्यादा, 187 मौतें हुई हैं। कोरोनावायरस के मरीज़ों के लिए यहां 4,500 बेड हैं। इसमें 3,130 एल-1 श्रेणी के, 580 एल-2 श्रेणी के और 790 एल-3 श्रेणी के हैं। कानपुर नगर राज्य का अकेला ज़िला है जहां लॉकडाउन चल रहा है। यहां के 10 थाना क्षेत्रों में 20 जुलाई से 26 जुलाई तक लॉकडाउन घोषित किया गया, जिसे फिर 31 जुलाई तक बढ़ा दिया गया। राज्य के कई और ज़िलों से भी मरीज़ों को बेड नहीं मिलने की शिकायतें मिली हैं। 

यूपी पुलिस में सिपाही आगरा के ईश्वर नगर की रहने वाली 26 साल की सुनीता यादव ने 2 मई को आगरा के लेडी लॉयल हॉस्पिटल में एक बच्ची को जन्म दिया। डिलीवरी के वक़्त ही सुनीता का कोरोनावायरस का सैंपल लिया गया था। डिलीवरी के बाद सुनीता और उनके पति रवि यादव बच्ची को लेकर घर चले गए। इस बीच 6 मई को सुनीता की तबियत बिगड़ने लगी। 

"मैं सुनीता को लेकर कई अस्पतालों में गया, कोई भी भर्ती करने को तैयार नहीं था। अंत में जब एस.एन मेडिकल कॉलेज पहुंचा, जहां पर्चा बनवा ही रहा था कि सुनीता की मौत हो गई। सुनीता की मौत के क़रीब 20 मिनट बाद सीएमओ ऑफ़िस से फ़ोन आया कि सुनीता की रिपोर्ट आ गई है और वह कोरोना पॉज़िटिव हैं," सुनीता के पति रवि यादव ने बताया।

 

उत्तर प्रदेश के कोविड अस्पतालों में बेड की संख्या 

राज्य सरकार के आंकड़े बताते हैं कि अभी की स्थिति में यूपी में कोरोनावायरस के मरीज़ों के लिए पर्याप्त संख्या में बेड उपलब्ध हैं। राज्य में 29 जुलाई तक कोरोनावायरस के कुल 77,626 मामले सामने आए हैं। इसमें से 29,997 मामले सक्रिय हैं। जबकि राज्य में कोरोनावायरस के मरीज़ों के लिए कुल बेड की संख्या 101,236 है। इसमें एल-1 श्रेणी के 403 अस्पतालों में 72,934 बेड, एल-2 श्रेणी के 75 अस्पतालों में 16,212 और एल-3 श्रेणी के 25 अस्पतालों में 12,090 बेड शामिल हैं। राज्य के 75 में से 56 ज़िलों में एल-3 श्रेणी के अस्पताल नहीं हैं जबकि 20 ज़िलों में एल-2 श्रेणी के अस्पताल नहीं हैं।

  

अगर किसी मरीज़ में हल्के लक्षण हैं तो उसे एल-1 श्रेणी के अस्पताल में रखा जाता है। इसी तरह मध्यम लक्षणों वाले मरीज़ों को एल-2 और गंभीर मरीज़ों को एल-3 श्रेणी के अस्पतालों में भेजा जाता है।

लखनऊ के बलरामपुर अस्‍पताल का आइसोलेशन वार्ड। फ़ोटो- रणव‍िजय सिंह 

मरीज़ों को भर्ती करने में दिक़्क़त क्‍यों? 

जब सक्रिय मरीज़ों की तुलना में तीन गुना बेड हैं तो फिर मरीज़ों को अस्पतालों में दाख़िला क्यों नहीं मिल रहा। हमने यह सवाल लखनऊ के एक एल-2 श्रेणी के अस्पताल के एक डॉक्टर से पूछा।

“मरीज़ों की परेशानी पहले कदम से ही शुरू हो जाती है। जैसे, किसी मरीज़ को बताया गया कि सुबह आठ बजे उसे एंबुलेंस लेने जाएगी, लेकिन एंबुलेंस दो-तीन घंटे लेट हो जाती है। इस बीच जो बेड उस मरीज़ के लिए था वह किसी और को दे दिया जाता है, यहीं से परेशानी की शुरूआत होती है,” अपना नाम न लिखे जाने की शर्त पर उन्होंने बताया।

“दिन की शुरुआत में अस्पतालों के पास डिस्चार्ज का डेटा नहीं रहता। डिस्चार्ज की प्रक्रिया 12 बजे से शुरू होती है और शाम के 4 बजे से डिस्चार्ज किया जाता है, ऐसे में हमें रिकॉर्ड अगले दिन मिलता है,” उन्होंने कहा। 

"ऐसा देखने में आ रहा है कि पर्याप्त बेड होने के बाद भी मरीज़ों को बेड मिलने में दिक़क़त हो रही है। इसके समाधान के लिए हम एक डैशबोर्ड बनवा रहे हैं जहां कोविड अस्पतालों में कितने बेड खाली हैं इसकी जानकारी उपलब्ध‍ होगी। इसी के आधार पर कंट्रोल रूम से मरीज़ को अस्पताल भेजा जाएगा। अगर किसी अस्पताल में बेड खाली होने के बाद भी मरीज़ों को भर्ती नहीं किया जाता तो हम कार्रवाई करेंगे," बेड न मिलने की समस्या पर राज्य के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के महानिदेशक, डॉ. देवेंद्र सिंह नेगी ने इंडियास्पेंड को बताया।

लखनऊ में पूल सैंपलिंग करती स्वास्थ्य विभाग की टीम। फ़ोटो- सुमित कुमार 

बढ़ते मामले और होम आइसोलेशन की सुविधा

हाल ही में उत्तर प्रदेश में कोरोनावायरस के लिए होने वाली टेस्टिंग की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। 26 जुलाई को राज्य में एक दिन में अब तक के सबसे अधिक 106,962 सैंपल की जांच की गई। जांच बढ़ने के साथ ही राज्य में कोरोनावायरस से संक्रमित मरीज़ों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी दर्ज की जाने लगी। 

मरीज़ों की बढ़ती संख्या को देखते हुए राज्य सरकार ने 20 जुलाई को लक्षणरहित मरीज़ों के लिए होम आइसोलेशन की इजाज़त दे दी। इन मरीज़ों में अगर 10 दिन तक कोई लक्षण नज़र नहीं आते हैं तो उन्हें डिस्चार्ज मान लिया जाएगा।

 

“होम आइसोलेशन की सुविधा उन्हें ही दी जा रही है जिनके पास होम आइसोलेट होने की व्‍यवस्‍था है। प्रदेश में जांच तेजी से हो रही है और मामले भी बढ़ रहे हैं, इसलिए यह सुविधा दी गई है,” उत्तर प्रदेश के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के महानिदेशक डॉ देवेंद्र सिंह नेगी कहते हैं। देवेंद्र सिंह नेगी साफ़-साफ़ तो नहीं कहते मगर इसके पीछे एक वजह अस्पतालों पर से मरीज़ों के बोझ को कम करना भी है। उत्तर प्रदेश में 20 जुलाई से पहले होम आइसोलेशन की इजाज़त नहीं थी। 28 जुलाई को राज्य में कुल सक्रिय मामले 27,934 थे जिसमें से 5,006 लोग होम आइसोलेशन में थे। यानी सक्रिय मामलों में से 22,928 मरीज़ ही अस्पतालों में भर्ती थे।  

हालांकि होम आइसोलेशन में रह रहे लोगों की अपनी शिकायतें भी हैं। गोरखपुर के रहने वाले आलोक पॉज़िटिव पाए जाने के बाद से होम आइसोलेशन में हैं। "22 जुलाई से मैं होम आइसोलेशन में हूं। मुझसे बस एक फ़ॉर्म पर साइन लेकर घर जाने दिया गया। होम आइसोलेट होने के बाद से कोई भी पूछने तक नहीं आया है। क्‍या दवा लेनी है, क्‍या नहीं लेनी, मुझे कोई जानकारी नहीं दी गई है," आलोक ने बताया। 

ऐसा ही मामला लखनऊ के राजाजीपुरम के व‍िजय का भी है। "आइसोलेशन में रहने के बाद से कोई पूछने तक नहीं आया है। मैं प्रयास कर रहा हूं कि किसी अस्पताल में बेड मिल जाए ताकि इलाज बेहतर हो सके," व‍िजय ने कहा।

हालांकि, होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों के लिए सरकार ने एक हेल्पलाइन नंबर 1800 180 5146 भी जारी किया है। इस नंबर पर फ़ोन करके डॉक्टर से सलाह ली जा सकती है।

Source: https://www.mohfw.gov.in/

यूपी की डिस्चार्ज पॉलिसी के मुताबिक़ होम आइसोलेशन में रह रहे व्यक्ति में अगर 10 दिन तक कोई लक्षण नहीं मिलते हैं तो उसे डिस्चार्ज मान लिया जाता है। डिस्चार्ज होने के बाद भी मरीज़ को 7 दिन तक क्‍वारंटीन रहना है। 

इसी तरह अगर कोई लक्षणरहित मरीज़ कोविड फ़ैसिलिटी में भर्ती है तो उसे भी जांच के 10वें दिन या भर्ती होने के 7वें दिन बिना जांच के ही डिस्चार्ज कर दिया जाएगा। यह केंद्र सरकार की डिस्चार्ज पॉलिसी के अनुरूप है। 

हालांकि हाल ही लखनऊ के लोक बंधु अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में भर्ती कुछ लोगों ने डिस्चार्ज होने से पहले अपने टेस्ट कराए जाने की मांग की थी। इस मांग के पीछे वजह थी कुछ दिन पहले डिस्चार्ज हुए दो लोगों का फिर से कोरोना पॉज़िटिव पाया जाना। यह दोनों लोग जिस आइसोलेशन वार्ड से डिस्चार्ज हुए थे फिर वापस उसी में लाए गए थे। 

इस रिपोर्ट में कोरोनावायरस से संक्रमित सभी व्यक्तियों के नाम बदल दिए गए हैं।

(रणविजय लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

लखनऊः उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के रहने वाले 26 साल के अजय 22 जुलाई को कोरोनावायरस की जांच में पॉज़िटिव पाए जाते हैं। शाम के 7 बजे इसकी सूचना नोडल अधिकारी को दी जाती है और एंबुलेंस आते-आते रात के 11 बज जाते हैं। अजय को लेकर एंबुलेंस लखनऊ के एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में घूमती रहती है लेकिन कहीं बेड नहीं मिलता। आख़िरकार 6 घंटे बाद सुबह 5 बजे अजय को टी.एस.एम. अस्पताल में बेड मिल पाता है। 

"अस्पताल में एडमिट होने के आधे घंटे बाद भैया ने मुझे फ़ोन किया और बताया कि अस्पताल में उन्हें कोई देखने वाला नहीं है। मेरे भाई से मेरी यही आख़िरी बातचीत थी," अजय के छोटे भाई तरुण ने बताया।

 

इस बातचीत के कुछ ही घंटों बाद अजय की मौत हो गई। अजय को टी.एस.एम अस्पताल से किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) रेफ़र किया गया था, लेकिन केजीएमयू पहुंचते-पहुंचते अजय की मौत हो गई।

  

उत्तर प्रदेश सरकार का दावा है कि राज्य में कोरोनावायरस के मरीज़ों के लिए एक लाख से अधिक बेड उपलब्ध हैं, लेकिन उसके बावजूद राजधानी लखनऊ समेत राज्य के कई ज़िलों में मरीज़ों को वक़्त पर बेड न मिलने की घटनाएं सामने आ रही हैं। जगह-जगह मरीज़ अस्पतालों में भटक रहे हैं, एंबुलेंस कई-कई घंटे की देरी से पहुंच रही हैं। सबसे ज़्यादा बुरी स्थिति राजधानी लखनऊ और यहां से महज़ 90 किलोमीटर दूर कानपुर में है।

राज्य में कोरोनावायरस के मरीज़ों की संख्या और बेड के सरकारी आंकड़ों को देखें तो बेड की संख्या पर्याप्त नज़र आती है। यूपी में कोरोनावायरस के मरीज़ों की लिए 101,236 बेड है। कोरोनावायरस के मरीज़ों की कुल संख्या 29 जुलाई को 77,626 थी, जिसमें से 29,997 मरीज़ों का इलाज चल रहा है। यानी राज्य में सक्रिय मरीज़ों की तुलना में तीन गुना से भी ज़्यादा बेड उपलब्ध हैं। इसके अलावा राज्य में 18% मरीज़ होम आइसोलेशन में रह रहे हैं।

 

इंडियास्पेंड ने जब बेड न मिलने की वजह जानने की कोशिश की तो दो बड़ी वजह सामने आईं। पहली तो यह कि हर ज़िले में इसके लिए बनी कोविड स्पेशल टीम के पास बेड की उपलब्धता की लाइव ट्रैकिंग की सुविधा नहीं है। दूसरी यह कि मरीज़ों को शाम 4 बजे के बाद डिस्चार्ज किया जाता है, जिससे बेड की उपलब्धता के आंकड़े संबंधित विभाग को अगले दिन मिल पाते हैं।   

लखनऊ और कानपुर में बिगड़े हालात

एक तरफ़ राज्य सरकार दावा कर रही है कि कोरोनावायरस के मरीज़ों के लिए राज्य में पर्याप्त बेड हैं, दूसरी तरफ़ राज्य के मीडिया में लगातार मरीज़ों को भर्ती ना किए जाने की ख़बरें सुर्ख़ियां बन रही हैं। दैनिक जागरण की 22 जुलाई की इस रिपोर्ट के मुताबिक़, लखनऊ के लोकबंधु अस्पताल के बाहर एक कोरोना मरीज़ करीब छह घंटे बैठा रहा तब जाकर उसे भर्ती किया गया। हालात को नियंत्रित करने के लिए राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने लखनऊ के मुख्यचिकित्साधिकारी का तबादला कर दिया। 

राज्य में कोरोनावायरस के सबसे ज़्यादा मामले लखनऊ में हैं लेकिन यहां अभी तक सामने आए मामलों की तुलना में पर्याप्त संख्या में बेड उपलब्ध हैं। लखनऊ में 29 जुलाई तक 7,129 मामले सामने आ चुके हैं, जिसमें से 3,941 मामले सक्रिय हैं। जबकि यहां कोरोनावायरस के मरीज़ों के लिए कुल 6,900 बेड हैं। इसमें एल-1 श्रेणी के 4,410, एल-2 श्रेणी के 1,335 और एल-3 श्रेणी के 1,155 बेड शामिल हैं।

कानपुर नगर ज़िले से भी मरीज़ों को बेड ना मिलने की शिकायतें मिल रही हैं। सीओडी मज़दूर पंचायत संगठन के एक पदाधिकारी ने 20 जुलाई को कोरोनावायरस की जांच कराई तो रिपोर्ट पॉज़िटिव आई। परिजनों ने उन्हें कानपुर के स्वरूप नगर के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया। 23 जुलाई की रात 11 बजे उनके बेटे के पास अस्पताल से फ़ोन आया कि उनके पिता की तबियत ज़्यादा ख़राब है, उन्हें दूसरे अस्पताल ले जाना होगा। 

उनके बेटे ने कई अस्पतालों के चक्कर लगाए, लेकिन कहीं बेड नहीं मिला। बड़ी मुश्किल से सुबह चार बजे कानपुर नगर के कांशीराम अस्पताल में दाख़िला मिल पाया। लेकिन उसके दो घंटे बाद अस्पताल से उसके पिता की मौत की ख़बर आई। "अगर मेरे पिता को वक़्त पर बेड मिल जाता तो उनकी जान बच सकती थी," मरीज़ के बेटे ने कहा।

कानपुर नगर ज़िले में 29 जुलाई तक 4,491 मामले सामने आ चुके हैं जिसमें से 2,364 मामले सक्रिय हैं। यहां राज्य में सबसे ज़्यादा, 187 मौतें हुई हैं। कोरोनावायरस के मरीज़ों के लिए यहां 4,500 बेड हैं। इसमें 3,130 एल-1 श्रेणी के, 580 एल-2 श्रेणी के और 790 एल-3 श्रेणी के हैं। कानपुर नगर राज्य का अकेला ज़िला है जहां लॉकडाउन चल रहा है। यहां के 10 थाना क्षेत्रों में 20 जुलाई से 26 जुलाई तक लॉकडाउन घोषित किया गया, जिसे फिर 31 जुलाई तक बढ़ा दिया गया। राज्य के कई और ज़िलों से भी मरीज़ों को बेड नहीं मिलने की शिकायतें मिली हैं। 

यूपी पुलिस में सिपाही आगरा के ईश्वर नगर की रहने वाली 26 साल की सुनीता यादव ने 2 मई को आगरा के लेडी लॉयल हॉस्पिटल में एक बच्ची को जन्म दिया। डिलीवरी के वक़्त ही सुनीता का कोरोनावायरस का सैंपल लिया गया था। डिलीवरी के बाद सुनीता और उनके पति रवि यादव बच्ची को लेकर घर चले गए। इस बीच 6 मई को सुनीता की तबियत बिगड़ने लगी। 

"मैं सुनीता को लेकर कई अस्पतालों में गया, कोई भी भर्ती करने को तैयार नहीं था। अंत में जब एस.एन मेडिकल कॉलेज पहुंचा, जहां पर्चा बनवा ही रहा था कि सुनीता की मौत हो गई। सुनीता की मौत के क़रीब 20 मिनट बाद सीएमओ ऑफ़िस से फ़ोन आया कि सुनीता की रिपोर्ट आ गई है और वह कोरोना पॉज़िटिव हैं," सुनीता के पति रवि यादव ने बताया।

 

उत्तर प्रदेश के कोविड अस्पतालों में बेड की संख्या 

राज्य सरकार के आंकड़े बताते हैं कि अभी की स्थिति में यूपी में कोरोनावायरस के मरीज़ों के लिए पर्याप्त संख्या में बेड उपलब्ध हैं। राज्य में 29 जुलाई तक कोरोनावायरस के कुल 77,626 मामले सामने आए हैं। इसमें से 29,997 मामले सक्रिय हैं। जबकि राज्य में कोरोनावायरस के मरीज़ों के लिए कुल बेड की संख्या 101,236 है। इसमें एल-1 श्रेणी के 403 अस्पतालों में 72,934 बेड, एल-2 श्रेणी के 75 अस्पतालों में 16,212 और एल-3 श्रेणी के 25 अस्पतालों में 12,090 बेड शामिल हैं। राज्य के 75 में से 56 ज़िलों में एल-3 श्रेणी के अस्पताल नहीं हैं जबकि 20 ज़िलों में एल-2 श्रेणी के अस्पताल नहीं हैं।

  

अगर किसी मरीज़ में हल्के लक्षण हैं तो उसे एल-1 श्रेणी के अस्पताल में रखा जाता है। इसी तरह मध्यम लक्षणों वाले मरीज़ों को एल-2 और गंभीर मरीज़ों को एल-3 श्रेणी के अस्पतालों में भेजा जाता है।

लखनऊ के बलरामपुर अस्‍पताल का आइसोलेशन वार्ड। फ़ोटो- रणव‍िजय सिंह 

मरीज़ों को भर्ती करने में दिक़्क़त क्‍यों? 

जब सक्रिय मरीज़ों की तुलना में तीन गुना बेड हैं तो फिर मरीज़ों को अस्पतालों में दाख़िला क्यों नहीं मिल रहा। हमने यह सवाल लखनऊ के एक एल-2 श्रेणी के अस्पताल के एक डॉक्टर से पूछा।

“मरीज़ों की परेशानी पहले कदम से ही शुरू हो जाती है। जैसे, किसी मरीज़ को बताया गया कि सुबह आठ बजे उसे एंबुलेंस लेने जाएगी, लेकिन एंबुलेंस दो-तीन घंटे लेट हो जाती है। इस बीच जो बेड उस मरीज़ के लिए था वह किसी और को दे दिया जाता है, यहीं से परेशानी की शुरूआत होती है,” अपना नाम न लिखे जाने की शर्त पर उन्होंने बताया।

“दिन की शुरुआत में अस्पतालों के पास डिस्चार्ज का डेटा नहीं रहता। डिस्चार्ज की प्रक्रिया 12 बजे से शुरू होती है और शाम के 4 बजे से डिस्चार्ज किया जाता है, ऐसे में हमें रिकॉर्ड अगले दिन मिलता है,” उन्होंने कहा। 

"ऐसा देखने में आ रहा है कि पर्याप्त बेड होने के बाद भी मरीज़ों को बेड मिलने में दिक़क़त हो रही है। इसके समाधान के लिए हम एक डैशबोर्ड बनवा रहे हैं जहां कोविड अस्पतालों में कितने बेड खाली हैं इसकी जानकारी उपलब्ध‍ होगी। इसी के आधार पर कंट्रोल रूम से मरीज़ को अस्पताल भेजा जाएगा। अगर किसी अस्पताल में बेड खाली होने के बाद भी मरीज़ों को भर्ती नहीं किया जाता तो हम कार्रवाई करेंगे," बेड न मिलने की समस्या पर राज्य के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के महानिदेशक, डॉ. देवेंद्र सिंह नेगी ने इंडियास्पेंड को बताया।

लखनऊ में पूल सैंपलिंग करती स्वास्थ्य विभाग की टीम। फ़ोटो- सुमित कुमार 

बढ़ते मामले और होम आइसोलेशन की सुविधा

हाल ही में उत्तर प्रदेश में कोरोनावायरस के लिए होने वाली टेस्टिंग की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। 26 जुलाई को राज्य में एक दिन में अब तक के सबसे अधिक 106,962 सैंपल की जांच की गई। जांच बढ़ने के साथ ही राज्य में कोरोनावायरस से संक्रमित मरीज़ों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी दर्ज की जाने लगी। 

मरीज़ों की बढ़ती संख्या को देखते हुए राज्य सरकार ने 20 जुलाई को लक्षणरहित मरीज़ों के लिए होम आइसोलेशन की इजाज़त दे दी। इन मरीज़ों में अगर 10 दिन तक कोई लक्षण नज़र नहीं आते हैं तो उन्हें डिस्चार्ज मान लिया जाएगा।

 

“होम आइसोलेशन की सुविधा उन्हें ही दी जा रही है जिनके पास होम आइसोलेट होने की व्‍यवस्‍था है। प्रदेश में जांच तेजी से हो रही है और मामले भी बढ़ रहे हैं, इसलिए यह सुविधा दी गई है,” उत्तर प्रदेश के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के महानिदेशक डॉ देवेंद्र सिंह नेगी कहते हैं। देवेंद्र सिंह नेगी साफ़-साफ़ तो नहीं कहते मगर इसके पीछे एक वजह अस्पतालों पर से मरीज़ों के बोझ को कम करना भी है। उत्तर प्रदेश में 20 जुलाई से पहले होम आइसोलेशन की इजाज़त नहीं थी। 28 जुलाई को राज्य में कुल सक्रिय मामले 27,934 थे जिसमें से 5,006 लोग होम आइसोलेशन में थे। यानी सक्रिय मामलों में से 22,928 मरीज़ ही अस्पतालों में भर्ती थे।  

हालांकि होम आइसोलेशन में रह रहे लोगों की अपनी शिकायतें भी हैं। गोरखपुर के रहने वाले आलोक पॉज़िटिव पाए जाने के बाद से होम आइसोलेशन में हैं। "22 जुलाई से मैं होम आइसोलेशन में हूं। मुझसे बस एक फ़ॉर्म पर साइन लेकर घर जाने दिया गया। होम आइसोलेट होने के बाद से कोई भी पूछने तक नहीं आया है। क्‍या दवा लेनी है, क्‍या नहीं लेनी, मुझे कोई जानकारी नहीं दी गई है," आलोक ने बताया। 

ऐसा ही मामला लखनऊ के राजाजीपुरम के व‍िजय का भी है। "आइसोलेशन में रहने के बाद से कोई पूछने तक नहीं आया है। मैं प्रयास कर रहा हूं कि किसी अस्पताल में बेड मिल जाए ताकि इलाज बेहतर हो सके," व‍िजय ने कहा।

हालांकि, होम आइसोलेशन में रह रहे मरीज़ों के लिए सरकार ने एक हेल्पलाइन नंबर 1800 180 5146 भी जारी किया है। इस नंबर पर फ़ोन करके डॉक्टर से सलाह ली जा सकती है।

Source: https://www.mohfw.gov.in/

यूपी की डिस्चार्ज पॉलिसी के मुताबिक़ होम आइसोलेशन में रह रहे व्यक्ति में अगर 10 दिन तक कोई लक्षण नहीं मिलते हैं तो उसे डिस्चार्ज मान लिया जाता है। डिस्चार्ज होने के बाद भी मरीज़ को 7 दिन तक क्‍वारंटीन रहना है। 

इसी तरह अगर कोई लक्षणरहित मरीज़ कोविड फ़ैसिलिटी में भर्ती है तो उसे भी जांच के 10वें दिन या भर्ती होने के 7वें दिन बिना जांच के ही डिस्चार्ज कर दिया जाएगा। यह केंद्र सरकार की डिस्चार्ज पॉलिसी के अनुरूप है। 

हालांकि हाल ही लखनऊ के लोक बंधु अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में भर्ती कुछ लोगों ने डिस्चार्ज होने से पहले अपने टेस्ट कराए जाने की मांग की थी। इस मांग के पीछे वजह थी कुछ दिन पहले डिस्चार्ज हुए दो लोगों का फिर से कोरोना पॉज़िटिव पाया जाना। यह दोनों लोग जिस आइसोलेशन वार्ड से डिस्चार्ज हुए थे फिर वापस उसी में लाए गए थे। 

इस रिपोर्ट में कोरोनावायरस से संक्रमित सभी व्यक्तियों के नाम बदल दिए गए हैं।

(रणविजय लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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