यूपी में किशोर स्वास्थ्य केंद्रों का बहुत सीमित इस्तेमाल, ज़्यादातर किशोरों को क्लीनिक का पता ही नहीं

बाराबंकी ज‍़िले के जाता बरौली सीएचसी का बंद पड़ा किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक। फ़ोटोः रणविजय सिंह

लखनऊ: 

पहला दृश्य:

स्थान- बाराबंकी के सतरिख के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक

तारीख़- 22 अगस्त 2020

समय- दिन के 11 बजे

इंडियास्पेंड की टीम जब यहां पहुंची तो यह किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक भी बंद मिला। यह क्लीनिक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के साथ है। पूछने पर पता चला कि इस सीएचसी को कोरोनावायरस के एल-1 श्रेणी के अस्पताल में बदल दिया गया है। यहां के किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, हरक में शिफ़्ट कर दिया गया। जब इंडियास्पेंड की टीम हरक के पीएचसी पर पहुंची तो यहां का किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक खुला था।

"कोरोना से पहले हम महीने में 400 किशोरों/किशोरियों को देखते थे। अब यह संख्या 100 से कम हो गई है। क्लीनिक तो बंद हो चुका है, फिलहाल मुझे हरक के पीएचसी में एक छोटी सी जगह मिली है, यहीं से काम चल रहा है,” बाराबंकी के सतरिख सीएचसी के किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक की काउंसलर प्रीति सिंह ने बताया।

 

दूसरा दृश्य:

स्थान- बाराबंकी के जाता बरौली के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक

तारीख़- 22 अगस्त 2020

समय- दिन के 12 बजे

इंडियास्पेंड की टीम जब यहां पहुंची तो इस किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक पर ताला लगा था और आसपास कोई भी मौजूद नहीं था। 

"कोरोनावायरस की शुरुआत से ही यह क्लीनिक बंद पड़ा है। मैंने बहुत दिनों से यहां किसी को नहीं देखा,” सीएसची की एक नर्स ने बताया। 

इस क्लीनिक की काउंसलर मोनिका को फ़ोन करने पर उन्होंने कहा, "कल मेरा कजरी तीज का व्रत था, इसलिए आज नहीं आई हूं,”  इतना कहकर उन्होंने फ़ोन काट दिया। कुछ देर बाद फिर से फ़ोन करने पर उन्होंने कहा, ''बीच में कुछ दिन अस्पताल बंद था, क्योंकि अस्पताल का एक स्टाफ़ मेंबर पॉज़िटिव मिला था।” मोनिका का कहना था कि कोरोनावायरस की वजह से उनके क्लीनिक का काम प्रभावित हुआ है।

बाराबंकी के सतरिख सीएचसी को कोविड अस्पताल बना दिया गया है। इस वजह से यहां का किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक बंद है। फ़ोटोः रणव‍िजय सिंह

तीसरा दृश्य:

स्थान- बाराबंकी के ज़िला अस्पताल और महिला अस्पताल के किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक

तारीख़- 22 अगस्त 2020

समय- दिन के 1:30 बजे

इंडियास्पेंड की टीम जब ज़िला अस्पताल पहुंची तो यहां का किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक भी बंद मिला। हमारी टीम बराबर में ही महिला अस्पताल गई, वहां किसी को पता नहीं था कि किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक नाम की भी कोई चीज़ है। कोई बच्चों के डॉक्टर के पास भेज रहा था तो कोई बता रहा था कि यहां ऐसा कोई क्लीनिक ही नहीं है, जबकि ज़िला मुख्यालय पर दो क्लीनिक बताए गए हैं, एक ज़िला अस्पताल में और दूसरा ज़िला महिला अस्पताल में।

 

इंडियास्पेंड की टीम ने 22 अगस्त को सुबह से लेकर दिन के 2 बजे तक, बाराबंकी के चार किशोर स्वास्थ्य क्लीनिकों का दौरा किया। जिसमें से दो बंद मिले, एक क्लीनिक ढूंढने से भी नहीं मिला और एक क्लीनिक को शिफ़्ट कर दिया गया था।

बाराबंकी के ज‍िला अस्‍पताल में बंद पड़ा क‍िशोर स्‍वास्‍थ्‍य क्‍लीन‍िक। फ़ोटोः रणव‍िजय सिंह 

ये बाराबंकी ज़िले के चार किशोर स्वास्थ्य केंद्रों का हाल है। बाराबंकी, उत्तर प्रदेश के कुल 75 में से उन 25 अतिपिछड़े और उच्च प्राथमिकता वाले ज़िलों में शामिल है। यहां ब्लॉक स्तर पर 'किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक' खोले गए हैं। ज़िले के सभी 15 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी), ज़िला अस्पताल और महिला ज़िला अस्पताल में एक-एक क्लीनिक है।

साल 2014 में देश भर में शुरु हुए राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत बने किशोर स्वास्थ्य क्लीनिकों पर 10 से 19 साल के किशोरों/किशोरियों को पोषण, यौन स्वास्थ्य और प्रजनन समेत छह मामलों में काउंसलिंग और क्लीनिकल सेवाएं दी जाती हैं। उत्तर प्रदेश में ऐसे 346 क्लीनिक हैं। इसके बावजूद भी राज्य में किशोर स्वास्थ्य और जानकारी का स्तर बेहद ख़राब है। 2017 में आई Understanding the lives of adolescents and young adults (उदया) की रिपोर्ट में इसके बारे में विस्तार से बताया गया है। 

पहले से ख़राब हालत में चल रहे उत्तर प्रदेश में किशोरों के स्वास्थ्य पर कोरोनावायरस और लॉकडाउन का भी काफ़ी असर पड़ा है। 

“लॉकडाउन की वजह से दो महीने क्लीनिक बंद थे, काउंसलर्स को कोरोना मरीज़ों और प्रवासी मज़दूरों की काउंसलिंग में लगा दिया गया था। जिससे क्लीनिक का काम प्रभावित हुआ है,” बाराबंकी में राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के कोर्डिनेटर का काम देख रहे डॉ. अवधेश कुमार सिंह ने बताया।

डॉ. अवधेश कुमार सिंह। फोटो: रणविजय सिंह  

किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक 

भारत सरकार ने साल 2014 में राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम की शुरुआत की। इसके तहत 10 से 19 साल की उम्र के लड़के-लड़कियों को मुख्य तौर पर छह मुद्दों- पोषण, यौन स्वास्थ्य और प्रजनन, ग़ैर संचारी रोग, मानसिक स्वास्थ्य, नशावृत्ति, चोट और हिंसा पर काउंसलिंग और क्लीनिकल सेवाएं दी जाती हैं। इसके लिए पूरे देश में किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक बनाए गए हैं, जहां काउंसलर इनकी समस्याओं को सुनते हैं और उनका न‍िदान करने का प्रयास करते हैं।

देश में कुल 7,969 किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक हैं और 1,617 किशोर स्वास्थ्य से संबंधित काउंसलर हैं। वित्त वर्ष 2019-20 में सितंबर 2019 तक, इन केंद्रों से 24.96 लाख किशोरों/किशोरियों ने काउंसलिंग और क्लीनिकल सेवाएं लीं, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की 2019-20 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार।

उत्तर प्रदेश में इन क्लीनिकों की संख्या 346 है और कुल 339 काउंसलर हैं, यह जानकारी स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने 20 मार्च 2020 को लोकसभा में दी। 2011 की जनगणना के मुताबिक, देश में 10 से 19 साल के किशोरों/किशोरियों की संख्या 23.65 करोड़ थी। यह भारत की कुल जनसंख्‍या का 19.6% था। ऐसे में देश में, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम का महत्व और बढ़ जाता है। 

 

उत्तर प्रदेश के किशोर स्वास्थ्य का हाल 

उत्तर प्रदेश के किशोरों/किशोरियों में यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में जानकारी निम्न स्तर की पाई गई, साल 2017 में आई Understanding the lives of adolescents and young adults (उदया) की इस रिपोर्ट के अनुसार। इस रिपोर्ट में बताया गया कि किशोरों में यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के ख़तरे, वैवाहिक स्थिति, उम्र और लिंग के अनुसार अलग पाई गई, ज़्यादा और कम उम्र की लड़कियों में अनीमिया का स्तर बहुत ज़्यादा पाया गया और शादीशुदा लड़कियों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी और पार्टनर की हिंसा के मामले भी पाए गए। 

उत्तर प्रदेश में किशोर/किशोरियां बहुत ही सीमित तौर पर किशोर स्वास्थ्य क्लीनिकों का इस्तेमाल करते हैं। साथ ही फ़्रंटलाइन हेल्थ वर्कर्स के साथ भी इनका जुड़ाव बहुत ही सीमित है, जिसे बढ़ाए जाने की ज़रूरत है, रिपोर्ट में आगे कहा गया।

बाराबंकी के जाता बरौली गांव के रहने वाले सुभाष और शाल‍िनी। फ़ोटोः रणव‍िजय सिंह

उदया की रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश में हर तीन में से दो किशोरियां और हर तीन में से एक किशोर अनीमिक हैं। 10 से 14 साल की उम्र वाली 30% किशोरियों को पीरियड्स के बारे में कोई भी जानकारी नहीं थी। 

वित्त वर्ष 2016-17 में किशोर स्वास्थ्य के लिए उत्तर प्रदेश को 13.14 करोड़ रुपए दिए गए, जो अगले वित्त वर्ष यानी 2017-18 में आधे से भी कम होकर 5.78 करोड़ रुपए रह गए। वित्त वर्ष 2018-19 में इसे बढ़ाकर 11.10 करोड़ रुपए कर दिया गया, 26 जुलाई 2019 को लोकसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक़।

चालू वित्त वर्ष में राज्य के किशोरों/किशोरियों ने इन क्लीनिकों की सेवाएं कम ली हैं। यूपी में वित्त वर्ष 2019-20 में 15 लाख किशोरों/किशोरियों ने इस सेवा का लाभ लिया था। इस वित्त वर्ष में जून तक सिर्फ 20,448 किशोरों/किशोरियों ने इस सेवा का लाभ लिया है। उच्च प्राथमिकता वाले बाराबंकी ज़िले में स़िर्फ़ 226 किशोरों/किशोरियों ने इस सेवा का लाभ लिया, जबकि पिछले साल अप्रैल में ही 3,822 क्लाइंट रजिस्ट्रेशन हुए थे, उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम की ओर से यह जानकारी दी गई।

उत्तर प्रदेश में चल रहे किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक का नाम बदलकर 'साथिया केंद्र' कर दिया गया है। राज्य के 57 ज‍़िलों में कुल 346 साथिया केंद्र चल रहे हैं। इसमें से 25 ज़िले उच्च प्राथमिकता वाले हैं जहां ब्लॉक स्तर पर ये केंद्र खुले हैं। जबकि 32 ज‍़िलों में ज‍़िला स्तर पर ये केंद्र बनाए गए हैं। इन सभी केंद्रों पर एक-एक काउंसलर की नियुक्ति की गई है, जिन्हें किशोर स्वास्थ्य से संबंधित ट्रेनिंग दी गई है।

''10 से 19 साल की उम्र में बहुत से शारीरिक बदलाव होते हैं। ऐसे में बच्चों में बहुत से भ्रम और सवाल होते हैं। इसी बात को ध्‍यान रखते हुए यह कार्यक्रम चलाया जा रहा है। हमारा मुख्य उद्देश्य उनके भ्रम को दूर करना और तथ्यपरक जानकारी देना है," उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के उप महाप्रबंधक डॉ. आनंद अग्रवाल ने इंडियास्पेंड को बताया।

राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के उप महाप्रबंधक डॉ. आनंद अग्रवाल। फ़ोटोः रणव‍िजय सिंह

किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक के बारे में कम लोगों को जानकारी

"मैंने इस क्लीनिक के बारे में ह्यूमैनिटीज़ की क्लास में सुना है। क्लीनिक से कुछ लोग आए थे और हमें क्लीनिक पर आने को कहा था, लेकिन मैं वहां कभी गई नहीं," 18 साल की दिव्या सिंह ने बताया। दिव्या का गांव बलिया ज़िले में है और वह वाराणसी शहर में रहकर पढ़ाई करती हैं। 

एक बात यह भी है कि किशोरों/किशोरियों के माता-पिता भी इस तरह के क्लीनिक से अंजान हैं। "आप आए हैं तो मुझे जानकारी हुई कि ऐसा कोई क्लीनिक भी है," दो किशोरों के पिता विजय ने बताया। 

"मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है," गोरखपुर ज़िले के पानापार गांव के 14 साल के प्रियांशु शुक्ला ने कहा। ऐसा ही जवाब बलिया ज़िले के नारायणपुर गांव के 17 साल के आशुतोष ने भी दिया। गोरखपुर, वाराणसी और बलिया में सिर्फ़ ज़िला स्तर पर ही किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक हैं।

इसी तरह इंडियास्पेंड की टीम जब बाराबंकी ज‍़िला अस्पताल और लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल पहुंची तो वहां भी लोगों को किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक के बारे में पता नहीं था। बाराबंकी और लखनऊ दोनों ही जगहों पर हमारी टीम को क्लीनिक को तलाश करने में काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी, जबकि ये अस्पताल परिसर में ही मौजूद हैं लेकिन अस्पताल के स्टाफ़ तक को इसके बारे में ठीक से जानकारी नहीं थी।

यूपी में किशोर स्वास्थ्य क्लीनिकों पर कोरोनावायरस का असर

''कोरोनावायरस और लॉकडाउन की वजह से अप्रैल और मई में क्लीनिक पूरी तरह बंद थे। इसकी वजह से काउंसलर को कोरोना की ड्यूटी में लगाया गया था। इसके बाद जून में हमने गाइडलाइंस जारी की और काउंसलर्स को क्लीनिकों पर रहने को कहा। जून से हमारी सेवाएं चल रही हैं, कुछ सीएचसी को कोविड सेंटर में बदल दिया गया है तो वहां क्लीनिक बंद हो सकते हैं,'' डॉ. आनंद अग्रवाल ने कहा। 

हालांकि इंडियास्पेंड की टीम को ज़मीन पर इस गाइडलाइंस का असर कम ही देखने को मिला। बाराबंकी के बाद 24 अगस्त को हमारी टीम लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में बने किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक पहुंची, दिन का एक बजा था और क्लीनिक का दरवाज़ा बंद था। क्लीनिक अस्पताल की ओपीडी के हिसाब से सुबह आठ बजे से दिन के 2 बजे तक खुलना चाहिए।

लखनऊ का किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक जो 24 अगस्त को दिन में एक बजे बंद मिला। फ़ोटोः रणविजय सिंह

काफी देर तक क्लीनिक का दरवाज़ा खटखटाने के बाद अंदर बैठे एक सफ़ाई कर्मचारी ने दरवाज़ा खोला। वहां काउंसलर मौजूद नहीं थीं। इस संवाददाता ने जब उनके बारे में पूछा तो गोलमोल जवाब मिले। पहले कहा गया कि “मैडम बहुत देर से नहीं हैं”, फिर कहा गया “पांच मिनट पहले गई हैं”, फिर कहा गया “वार्ड में गई हैं”, अंत में बताया गया कि “किसी काम से गई हैं और वहीं से घर चली जाएंगी”। 

हर काउंसलर को महीने में आठ दिन किशोरों/किशोरियों के साथ क्लीनिक से बाहर जाकर मीटिंग करनी होती है। यह मीटिंग किसी स्कूल में, किसी ग्राम सभा में या किसी भी ऐसी जगह हो सकती है जहां 10 से 19 साल के किशोर/किशोरियां मौजूद हों। 

"कोरोना की वजह से स्कूल बंद हो गए, उसके बाद से काउंसलर दिखाई नहीं दी हैं," कक्षा 9 में पढ़ने वाली शालिनी ने बताया। शालिनी का घर बाराबंकी के जाता बरौली सीएचसी से क़रीब 200 मीटर की दूरी पर है। यह वही सीएचसी है जहां इंडियास्पेंड की टीम 22 अगस्त को पहुंची और क्लीनिक पर ताला लगा पाया था।

बाराबंकी के बड़ागांव के किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक की काउंसलर रीना श्रीवास्‍तव। फ़ोटोः  रणविजय सिंह

"कोरोनावायरस की वजह से बच्चे थोड़े कम आ रहे हैं, लेकिन हम उनसे जाकर मिल रहे हैं। हमने पीअर एजुकेटर बनाए हैं, उनके माध्यम से भी मीटिंग होती है। आम दिनों की तुलना में यह थोड़ा कठिन है," बाराबंकी के बड़ागांव सीएचसी के किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक की काउंसलर रीना श्रीवास्तव ने बताया। 

यूपी में साथिया कार्यक्रम के तहत उच्च प्राथमिकता वाले 25 ज‍़िलों में पीअर एजुकेटर बनाए गए हैं। 26 जुलाई 2019 को लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार राज्य में 33,989 पीअर एजुकेटर हैं। यह किशोरों/किशोरियों का एक ग्रुप होता है जो गांव के स्तर पर बनाया जाता है। यह ग्रुप गांव में अपने साथियों को किशोर स्वास्थ्य से संबंधित जानकारी देते हैं। अगर किसी को काउंसलिंग की ज़रूरत होती है तो उन्हें आशा या एएनएम के ज़रिए क्लीनिक तक पहुंचाते हैं। इस काम के लिए इन्हें प्रशासन की ओर से समय-समय पर प्रोत्साहन के रूप में उपहार दिए जाते हैं। 

"हम महीने में दो-तीन बार मीटिंग करते हैं। लड़कियों की मीटिंग लड़कियां करती हैं और लड़कों की मीटिंग लड़के करते हैं। इसमें शराब न पीने और गुप्त रोग जैसी समस्याओं पर बात होती है। अगर कोई किसी अंधविश्वास का शिकार है तो हम उस पर भी बात करते हैं," बाराबंकी के बरगदहा गांव के पीअर एजुकेटर दिलीप कुमार (18 साल) ने बताया। 

सभी मुद्दों पर एक समान ध्‍यान नहीं

किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम से जुड़े लोगों से बात करते हुए यह महसूस होता है कि इस कार्यक्रम के सभी मुद्दों पर एक समान ध्‍यान नहीं दिया जा रहा। इस बात की गवाही आंकड़ें भी देते हैं। यूपी के 25 उच्च प्राथमिकता वाले ज‍़िलों में अप्रैल से जून तक पोषण पर 4,734 किशोरों/किशोरियों की काउंसलिंग की गई। इसमें यौन स्वास्थ्य और प्रजनन पर 2,492, मानसिक स्वास्थ्य पर 1,617 किशोरों/किशोरियों की काउंसलिंग की गई, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम, उत्तर प्रदेश की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार।

उत्तर प्रदेश में किशोर स्वास्थ्य पर काम कर रहे एनजीओ, ब्रेकथ्रू की राज्य प्रमुख कृत‍ि प्रकाश। फ़ोटोः  रणव‍िजय सिंह

किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के सभी मुद्दों पर एक समान ध्‍यान न देने की बात को गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ब्रेकथ्रू की राज्य प्रमुख कृत‍ि प्रकाश भी मानती हैं। "यह योजना बहुत अच्छी है। इससे बच्चों को बहुत लाभ मिल सकता है। फिलहाल इस योजना में पोषण और यौन स्वास्थ्य और प्रजनन पर ज़्यादा ध्‍यान दिया जा रहा है। बाकी के मुद्दे जैसे- नशावृत्ति, मानसिक स्वास्थ्य और हिंसा पर और ध्‍यान देने की ज़रूरत है," उत्तर प्रदेश में किशोर स्वास्थ्य पर काम कर रहे एनजीओ ब्रेकथ्रू की राज्य प्रमुख, कृति प्रकाश ने इंडियास्पेंड को बताया।

"किशोर स्वास्थ्य के मामले में हमारा ज़्यादा ध्‍यान इस बात पर है कि कैसे लड़कियां शादी और बच्चों के लिए तैयार हो सकें। लड़कों की समस्याओं को आज भी हम 'दोष' कहते हैं, जैसे - नाइट फ़ॉल को स्वप्न दोष कहा जाता है। हम यह मान लेते हैं कि लड़का मर्द बन रहा है तो उसे उतनी देखभाल की ज़रूरत नहीं है, जोकि ग़लत है," कृति ने कहा। 

कृत‍ि जो बात कह रही हैं वो हमारी टीम को ज़मीन पर भी देखने को मिली। बाराबंकी के जाता बरौली सीएसची से करीब 200 मीटर की दूरी पर विजय कुमार यादव (41) का घर है। इनके तीन बच्चे हैं, एक लड़की और दो लड़के। लड़की शालिनी (14 साल) को किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक के बारे में पता था, लेकिन उसके भाई सुभाष (16 साल) ने ऐसे क्लीनिक का नाम तक नहीं सुना।

 

"मुझे नहीं पता ऐसा कोई क्लीनिक भी चलता है," सुभाष ने कहा। लेकिन शालिनी कहती है, "मेरी काउंसलर से दो-तीन बार मुलाक़ात हुई है। उन्होंने मुझे पीरियड, शरीर में हो रहे बदलाव, खान-पान और आयरन की गोलियों के बारे में जानकारी दी है।" 

(रणविजय, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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लखनऊ: 

पहला दृश्य:

स्थान- बाराबंकी के सतरिख के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक

तारीख़- 22 अगस्त 2020

समय- दिन के 11 बजे

इंडियास्पेंड की टीम जब यहां पहुंची तो यह किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक भी बंद मिला। यह क्लीनिक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के साथ है। पूछने पर पता चला कि इस सीएचसी को कोरोनावायरस के एल-1 श्रेणी के अस्पताल में बदल दिया गया है। यहां के किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, हरक में शिफ़्ट कर दिया गया। जब इंडियास्पेंड की टीम हरक के पीएचसी पर पहुंची तो यहां का किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक खुला था।

"कोरोना से पहले हम महीने में 400 किशोरों/किशोरियों को देखते थे। अब यह संख्या 100 से कम हो गई है। क्लीनिक तो बंद हो चुका है, फिलहाल मुझे हरक के पीएचसी में एक छोटी सी जगह मिली है, यहीं से काम चल रहा है,” बाराबंकी के सतरिख सीएचसी के किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक की काउंसलर प्रीति सिंह ने बताया।

 

दूसरा दृश्य:

स्थान- बाराबंकी के जाता बरौली के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक

तारीख़- 22 अगस्त 2020

समय- दिन के 12 बजे

इंडियास्पेंड की टीम जब यहां पहुंची तो इस किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक पर ताला लगा था और आसपास कोई भी मौजूद नहीं था। 

"कोरोनावायरस की शुरुआत से ही यह क्लीनिक बंद पड़ा है। मैंने बहुत दिनों से यहां किसी को नहीं देखा,” सीएसची की एक नर्स ने बताया। 

इस क्लीनिक की काउंसलर मोनिका को फ़ोन करने पर उन्होंने कहा, "कल मेरा कजरी तीज का व्रत था, इसलिए आज नहीं आई हूं,”  इतना कहकर उन्होंने फ़ोन काट दिया। कुछ देर बाद फिर से फ़ोन करने पर उन्होंने कहा, ''बीच में कुछ दिन अस्पताल बंद था, क्योंकि अस्पताल का एक स्टाफ़ मेंबर पॉज़िटिव मिला था।” मोनिका का कहना था कि कोरोनावायरस की वजह से उनके क्लीनिक का काम प्रभावित हुआ है।

बाराबंकी के सतरिख सीएचसी को कोविड अस्पताल बना दिया गया है। इस वजह से यहां का किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक बंद है। फ़ोटोः रणव‍िजय सिंह

तीसरा दृश्य:

स्थान- बाराबंकी के ज़िला अस्पताल और महिला अस्पताल के किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक

तारीख़- 22 अगस्त 2020

समय- दिन के 1:30 बजे

इंडियास्पेंड की टीम जब ज़िला अस्पताल पहुंची तो यहां का किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक भी बंद मिला। हमारी टीम बराबर में ही महिला अस्पताल गई, वहां किसी को पता नहीं था कि किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक नाम की भी कोई चीज़ है। कोई बच्चों के डॉक्टर के पास भेज रहा था तो कोई बता रहा था कि यहां ऐसा कोई क्लीनिक ही नहीं है, जबकि ज़िला मुख्यालय पर दो क्लीनिक बताए गए हैं, एक ज़िला अस्पताल में और दूसरा ज़िला महिला अस्पताल में।

 

इंडियास्पेंड की टीम ने 22 अगस्त को सुबह से लेकर दिन के 2 बजे तक, बाराबंकी के चार किशोर स्वास्थ्य क्लीनिकों का दौरा किया। जिसमें से दो बंद मिले, एक क्लीनिक ढूंढने से भी नहीं मिला और एक क्लीनिक को शिफ़्ट कर दिया गया था।

बाराबंकी के ज‍िला अस्‍पताल में बंद पड़ा क‍िशोर स्‍वास्‍थ्‍य क्‍लीन‍िक। फ़ोटोः रणव‍िजय सिंह 

ये बाराबंकी ज़िले के चार किशोर स्वास्थ्य केंद्रों का हाल है। बाराबंकी, उत्तर प्रदेश के कुल 75 में से उन 25 अतिपिछड़े और उच्च प्राथमिकता वाले ज़िलों में शामिल है। यहां ब्लॉक स्तर पर 'किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक' खोले गए हैं। ज़िले के सभी 15 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी), ज़िला अस्पताल और महिला ज़िला अस्पताल में एक-एक क्लीनिक है।

साल 2014 में देश भर में शुरु हुए राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत बने किशोर स्वास्थ्य क्लीनिकों पर 10 से 19 साल के किशोरों/किशोरियों को पोषण, यौन स्वास्थ्य और प्रजनन समेत छह मामलों में काउंसलिंग और क्लीनिकल सेवाएं दी जाती हैं। उत्तर प्रदेश में ऐसे 346 क्लीनिक हैं। इसके बावजूद भी राज्य में किशोर स्वास्थ्य और जानकारी का स्तर बेहद ख़राब है। 2017 में आई Understanding the lives of adolescents and young adults (उदया) की रिपोर्ट में इसके बारे में विस्तार से बताया गया है। 

पहले से ख़राब हालत में चल रहे उत्तर प्रदेश में किशोरों के स्वास्थ्य पर कोरोनावायरस और लॉकडाउन का भी काफ़ी असर पड़ा है। 

“लॉकडाउन की वजह से दो महीने क्लीनिक बंद थे, काउंसलर्स को कोरोना मरीज़ों और प्रवासी मज़दूरों की काउंसलिंग में लगा दिया गया था। जिससे क्लीनिक का काम प्रभावित हुआ है,” बाराबंकी में राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के कोर्डिनेटर का काम देख रहे डॉ. अवधेश कुमार सिंह ने बताया।

डॉ. अवधेश कुमार सिंह। फोटो: रणविजय सिंह  

किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक 

भारत सरकार ने साल 2014 में राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम की शुरुआत की। इसके तहत 10 से 19 साल की उम्र के लड़के-लड़कियों को मुख्य तौर पर छह मुद्दों- पोषण, यौन स्वास्थ्य और प्रजनन, ग़ैर संचारी रोग, मानसिक स्वास्थ्य, नशावृत्ति, चोट और हिंसा पर काउंसलिंग और क्लीनिकल सेवाएं दी जाती हैं। इसके लिए पूरे देश में किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक बनाए गए हैं, जहां काउंसलर इनकी समस्याओं को सुनते हैं और उनका न‍िदान करने का प्रयास करते हैं।

देश में कुल 7,969 किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक हैं और 1,617 किशोर स्वास्थ्य से संबंधित काउंसलर हैं। वित्त वर्ष 2019-20 में सितंबर 2019 तक, इन केंद्रों से 24.96 लाख किशोरों/किशोरियों ने काउंसलिंग और क्लीनिकल सेवाएं लीं, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की 2019-20 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार।

उत्तर प्रदेश में इन क्लीनिकों की संख्या 346 है और कुल 339 काउंसलर हैं, यह जानकारी स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने 20 मार्च 2020 को लोकसभा में दी। 2011 की जनगणना के मुताबिक, देश में 10 से 19 साल के किशोरों/किशोरियों की संख्या 23.65 करोड़ थी। यह भारत की कुल जनसंख्‍या का 19.6% था। ऐसे में देश में, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम का महत्व और बढ़ जाता है। 

 

उत्तर प्रदेश के किशोर स्वास्थ्य का हाल 

उत्तर प्रदेश के किशोरों/किशोरियों में यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में जानकारी निम्न स्तर की पाई गई, साल 2017 में आई Understanding the lives of adolescents and young adults (उदया) की इस रिपोर्ट के अनुसार। इस रिपोर्ट में बताया गया कि किशोरों में यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के ख़तरे, वैवाहिक स्थिति, उम्र और लिंग के अनुसार अलग पाई गई, ज़्यादा और कम उम्र की लड़कियों में अनीमिया का स्तर बहुत ज़्यादा पाया गया और शादीशुदा लड़कियों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी और पार्टनर की हिंसा के मामले भी पाए गए। 

उत्तर प्रदेश में किशोर/किशोरियां बहुत ही सीमित तौर पर किशोर स्वास्थ्य क्लीनिकों का इस्तेमाल करते हैं। साथ ही फ़्रंटलाइन हेल्थ वर्कर्स के साथ भी इनका जुड़ाव बहुत ही सीमित है, जिसे बढ़ाए जाने की ज़रूरत है, रिपोर्ट में आगे कहा गया।

बाराबंकी के जाता बरौली गांव के रहने वाले सुभाष और शाल‍िनी। फ़ोटोः रणव‍िजय सिंह

उदया की रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश में हर तीन में से दो किशोरियां और हर तीन में से एक किशोर अनीमिक हैं। 10 से 14 साल की उम्र वाली 30% किशोरियों को पीरियड्स के बारे में कोई भी जानकारी नहीं थी। 

वित्त वर्ष 2016-17 में किशोर स्वास्थ्य के लिए उत्तर प्रदेश को 13.14 करोड़ रुपए दिए गए, जो अगले वित्त वर्ष यानी 2017-18 में आधे से भी कम होकर 5.78 करोड़ रुपए रह गए। वित्त वर्ष 2018-19 में इसे बढ़ाकर 11.10 करोड़ रुपए कर दिया गया, 26 जुलाई 2019 को लोकसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक़।

चालू वित्त वर्ष में राज्य के किशोरों/किशोरियों ने इन क्लीनिकों की सेवाएं कम ली हैं। यूपी में वित्त वर्ष 2019-20 में 15 लाख किशोरों/किशोरियों ने इस सेवा का लाभ लिया था। इस वित्त वर्ष में जून तक सिर्फ 20,448 किशोरों/किशोरियों ने इस सेवा का लाभ लिया है। उच्च प्राथमिकता वाले बाराबंकी ज़िले में स़िर्फ़ 226 किशोरों/किशोरियों ने इस सेवा का लाभ लिया, जबकि पिछले साल अप्रैल में ही 3,822 क्लाइंट रजिस्ट्रेशन हुए थे, उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम की ओर से यह जानकारी दी गई।

उत्तर प्रदेश में चल रहे किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक का नाम बदलकर 'साथिया केंद्र' कर दिया गया है। राज्य के 57 ज‍़िलों में कुल 346 साथिया केंद्र चल रहे हैं। इसमें से 25 ज़िले उच्च प्राथमिकता वाले हैं जहां ब्लॉक स्तर पर ये केंद्र खुले हैं। जबकि 32 ज‍़िलों में ज‍़िला स्तर पर ये केंद्र बनाए गए हैं। इन सभी केंद्रों पर एक-एक काउंसलर की नियुक्ति की गई है, जिन्हें किशोर स्वास्थ्य से संबंधित ट्रेनिंग दी गई है।

''10 से 19 साल की उम्र में बहुत से शारीरिक बदलाव होते हैं। ऐसे में बच्चों में बहुत से भ्रम और सवाल होते हैं। इसी बात को ध्‍यान रखते हुए यह कार्यक्रम चलाया जा रहा है। हमारा मुख्य उद्देश्य उनके भ्रम को दूर करना और तथ्यपरक जानकारी देना है," उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के उप महाप्रबंधक डॉ. आनंद अग्रवाल ने इंडियास्पेंड को बताया।

राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के उप महाप्रबंधक डॉ. आनंद अग्रवाल। फ़ोटोः रणव‍िजय सिंह

किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक के बारे में कम लोगों को जानकारी

"मैंने इस क्लीनिक के बारे में ह्यूमैनिटीज़ की क्लास में सुना है। क्लीनिक से कुछ लोग आए थे और हमें क्लीनिक पर आने को कहा था, लेकिन मैं वहां कभी गई नहीं," 18 साल की दिव्या सिंह ने बताया। दिव्या का गांव बलिया ज़िले में है और वह वाराणसी शहर में रहकर पढ़ाई करती हैं। 

एक बात यह भी है कि किशोरों/किशोरियों के माता-पिता भी इस तरह के क्लीनिक से अंजान हैं। "आप आए हैं तो मुझे जानकारी हुई कि ऐसा कोई क्लीनिक भी है," दो किशोरों के पिता विजय ने बताया। 

"मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है," गोरखपुर ज़िले के पानापार गांव के 14 साल के प्रियांशु शुक्ला ने कहा। ऐसा ही जवाब बलिया ज़िले के नारायणपुर गांव के 17 साल के आशुतोष ने भी दिया। गोरखपुर, वाराणसी और बलिया में सिर्फ़ ज़िला स्तर पर ही किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक हैं।

इसी तरह इंडियास्पेंड की टीम जब बाराबंकी ज‍़िला अस्पताल और लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल पहुंची तो वहां भी लोगों को किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक के बारे में पता नहीं था। बाराबंकी और लखनऊ दोनों ही जगहों पर हमारी टीम को क्लीनिक को तलाश करने में काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी, जबकि ये अस्पताल परिसर में ही मौजूद हैं लेकिन अस्पताल के स्टाफ़ तक को इसके बारे में ठीक से जानकारी नहीं थी।

यूपी में किशोर स्वास्थ्य क्लीनिकों पर कोरोनावायरस का असर

''कोरोनावायरस और लॉकडाउन की वजह से अप्रैल और मई में क्लीनिक पूरी तरह बंद थे। इसकी वजह से काउंसलर को कोरोना की ड्यूटी में लगाया गया था। इसके बाद जून में हमने गाइडलाइंस जारी की और काउंसलर्स को क्लीनिकों पर रहने को कहा। जून से हमारी सेवाएं चल रही हैं, कुछ सीएचसी को कोविड सेंटर में बदल दिया गया है तो वहां क्लीनिक बंद हो सकते हैं,'' डॉ. आनंद अग्रवाल ने कहा। 

हालांकि इंडियास्पेंड की टीम को ज़मीन पर इस गाइडलाइंस का असर कम ही देखने को मिला। बाराबंकी के बाद 24 अगस्त को हमारी टीम लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में बने किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक पहुंची, दिन का एक बजा था और क्लीनिक का दरवाज़ा बंद था। क्लीनिक अस्पताल की ओपीडी के हिसाब से सुबह आठ बजे से दिन के 2 बजे तक खुलना चाहिए।

लखनऊ का किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक जो 24 अगस्त को दिन में एक बजे बंद मिला। फ़ोटोः रणविजय सिंह

काफी देर तक क्लीनिक का दरवाज़ा खटखटाने के बाद अंदर बैठे एक सफ़ाई कर्मचारी ने दरवाज़ा खोला। वहां काउंसलर मौजूद नहीं थीं। इस संवाददाता ने जब उनके बारे में पूछा तो गोलमोल जवाब मिले। पहले कहा गया कि “मैडम बहुत देर से नहीं हैं”, फिर कहा गया “पांच मिनट पहले गई हैं”, फिर कहा गया “वार्ड में गई हैं”, अंत में बताया गया कि “किसी काम से गई हैं और वहीं से घर चली जाएंगी”। 

हर काउंसलर को महीने में आठ दिन किशोरों/किशोरियों के साथ क्लीनिक से बाहर जाकर मीटिंग करनी होती है। यह मीटिंग किसी स्कूल में, किसी ग्राम सभा में या किसी भी ऐसी जगह हो सकती है जहां 10 से 19 साल के किशोर/किशोरियां मौजूद हों। 

"कोरोना की वजह से स्कूल बंद हो गए, उसके बाद से काउंसलर दिखाई नहीं दी हैं," कक्षा 9 में पढ़ने वाली शालिनी ने बताया। शालिनी का घर बाराबंकी के जाता बरौली सीएचसी से क़रीब 200 मीटर की दूरी पर है। यह वही सीएचसी है जहां इंडियास्पेंड की टीम 22 अगस्त को पहुंची और क्लीनिक पर ताला लगा पाया था।

बाराबंकी के बड़ागांव के किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक की काउंसलर रीना श्रीवास्‍तव। फ़ोटोः  रणविजय सिंह

"कोरोनावायरस की वजह से बच्चे थोड़े कम आ रहे हैं, लेकिन हम उनसे जाकर मिल रहे हैं। हमने पीअर एजुकेटर बनाए हैं, उनके माध्यम से भी मीटिंग होती है। आम दिनों की तुलना में यह थोड़ा कठिन है," बाराबंकी के बड़ागांव सीएचसी के किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक की काउंसलर रीना श्रीवास्तव ने बताया। 

यूपी में साथिया कार्यक्रम के तहत उच्च प्राथमिकता वाले 25 ज‍़िलों में पीअर एजुकेटर बनाए गए हैं। 26 जुलाई 2019 को लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार राज्य में 33,989 पीअर एजुकेटर हैं। यह किशोरों/किशोरियों का एक ग्रुप होता है जो गांव के स्तर पर बनाया जाता है। यह ग्रुप गांव में अपने साथियों को किशोर स्वास्थ्य से संबंधित जानकारी देते हैं। अगर किसी को काउंसलिंग की ज़रूरत होती है तो उन्हें आशा या एएनएम के ज़रिए क्लीनिक तक पहुंचाते हैं। इस काम के लिए इन्हें प्रशासन की ओर से समय-समय पर प्रोत्साहन के रूप में उपहार दिए जाते हैं। 

"हम महीने में दो-तीन बार मीटिंग करते हैं। लड़कियों की मीटिंग लड़कियां करती हैं और लड़कों की मीटिंग लड़के करते हैं। इसमें शराब न पीने और गुप्त रोग जैसी समस्याओं पर बात होती है। अगर कोई किसी अंधविश्वास का शिकार है तो हम उस पर भी बात करते हैं," बाराबंकी के बरगदहा गांव के पीअर एजुकेटर दिलीप कुमार (18 साल) ने बताया। 

सभी मुद्दों पर एक समान ध्‍यान नहीं

किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम से जुड़े लोगों से बात करते हुए यह महसूस होता है कि इस कार्यक्रम के सभी मुद्दों पर एक समान ध्‍यान नहीं दिया जा रहा। इस बात की गवाही आंकड़ें भी देते हैं। यूपी के 25 उच्च प्राथमिकता वाले ज‍़िलों में अप्रैल से जून तक पोषण पर 4,734 किशोरों/किशोरियों की काउंसलिंग की गई। इसमें यौन स्वास्थ्य और प्रजनन पर 2,492, मानसिक स्वास्थ्य पर 1,617 किशोरों/किशोरियों की काउंसलिंग की गई, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम, उत्तर प्रदेश की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार।

उत्तर प्रदेश में किशोर स्वास्थ्य पर काम कर रहे एनजीओ, ब्रेकथ्रू की राज्य प्रमुख कृत‍ि प्रकाश। फ़ोटोः  रणव‍िजय सिंह

किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के सभी मुद्दों पर एक समान ध्‍यान न देने की बात को गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ब्रेकथ्रू की राज्य प्रमुख कृत‍ि प्रकाश भी मानती हैं। "यह योजना बहुत अच्छी है। इससे बच्चों को बहुत लाभ मिल सकता है। फिलहाल इस योजना में पोषण और यौन स्वास्थ्य और प्रजनन पर ज़्यादा ध्‍यान दिया जा रहा है। बाकी के मुद्दे जैसे- नशावृत्ति, मानसिक स्वास्थ्य और हिंसा पर और ध्‍यान देने की ज़रूरत है," उत्तर प्रदेश में किशोर स्वास्थ्य पर काम कर रहे एनजीओ ब्रेकथ्रू की राज्य प्रमुख, कृति प्रकाश ने इंडियास्पेंड को बताया।

"किशोर स्वास्थ्य के मामले में हमारा ज़्यादा ध्‍यान इस बात पर है कि कैसे लड़कियां शादी और बच्चों के लिए तैयार हो सकें। लड़कों की समस्याओं को आज भी हम 'दोष' कहते हैं, जैसे - नाइट फ़ॉल को स्वप्न दोष कहा जाता है। हम यह मान लेते हैं कि लड़का मर्द बन रहा है तो उसे उतनी देखभाल की ज़रूरत नहीं है, जोकि ग़लत है," कृति ने कहा। 

कृत‍ि जो बात कह रही हैं वो हमारी टीम को ज़मीन पर भी देखने को मिली। बाराबंकी के जाता बरौली सीएसची से करीब 200 मीटर की दूरी पर विजय कुमार यादव (41) का घर है। इनके तीन बच्चे हैं, एक लड़की और दो लड़के। लड़की शालिनी (14 साल) को किशोर स्वास्थ्य क्लीनिक के बारे में पता था, लेकिन उसके भाई सुभाष (16 साल) ने ऐसे क्लीनिक का नाम तक नहीं सुना।

 

"मुझे नहीं पता ऐसा कोई क्लीनिक भी चलता है," सुभाष ने कहा। लेकिन शालिनी कहती है, "मेरी काउंसलर से दो-तीन बार मुलाक़ात हुई है। उन्होंने मुझे पीरियड, शरीर में हो रहे बदलाव, खान-पान और आयरन की गोलियों के बारे में जानकारी दी है।" 

(रणविजय, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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