यूपी: लॉकडाउन में ख़ून की कमी से जूझ रहे ब्लड बैंक, मरीज परेशान

प्रयागराज के मोतीलाल नेहरू ज‍़िला अस्पताल का ब्लड बैंक। फ़ोटो: रणविजय

लखनऊ: लॉकडाउन-4 के ऐलान के साथ ही उत्तर प्रदेश के बहराइच की रहने वाली शिविका (30) की चिंताएं भी बढ़ गई हैं। शिविका थैलीसिमिया की मरीज़ हैं और उन्हें हर 15 दिन पर दो यूनिट ख़ून की ज़रूरत होती है। लॉकडाउन से पहले उन्हें यह ख़ून ब्लड बैंक से सीधे मिल जाता था, लेकिन लॉकडाउन के बाद से उन्हें हर यूनिट के लिए एक डोनर को साथ लेकर जाना होता है।

उत्तर प्रदेश में थैलीसिमिया के 1,832 मरीज़ हैं जिन्हें नियमित तौर पर ख़ून चढ़ाए जाने की ज़रूरत होती है। इसके अलावा गर्भवती महिलाओं, अप्लास्टिक एनीमिया और ब्लड कैंसर जैसी तमाम बीमारियों से जूझ रहे मरीज़ों को भी नियमित तौर पर ख़ून की ज़रूरत पड़ती है।

उत्तर प्रदेश में ज़्यादातर मरीज़ इन दिनों ख़ून के लिए जद्दोजहद करते नज़र आ रहे हैं। कोरोनावायरस और लॉकडाउन के कारण उत्तर प्रदेश के ब्लड बैंक ख़ाली होने के कगार पर हैं। कई ब्लड बैंक में तो स्टॉक 80 से 90 प्रतिशत तक कम हो चुका है। स्टॉक इसलिए भी कम हुआ क्योंकि लॉकडाउन की वजह से सुचारु रूप से ब्लड डोनेशन कैंप नहीं लग सके और कोरोनावायरस के डर से लोगों ने ब्लड डोनेट करना लगभग बंद कर दिया है। 

“मैं हर दिन अपनी ज़िंदगी की जंग लड़ रही हूं। मेरे घर में सभी लोग ब्लड डोनेट कर चुके हैं, अब कोई नहीं बचा। मैं हर रोज़ कम से कम 10 लोगों से फोन पर बात करती हूं कि वह ब्लड डोनेशन के लिए तैयार हो जाएं, लेकिन मुश्किल से ही कोई राज़ी होता है। लोगों को कोरोनावायरस का डर है, ऐसे में वह अस्पताल नहीं जाना चाहते,” शिविका ने इंडिया‍स्पेंड से कहा।

उत्तर प्रदेश में मार्च और अप्रैल में एक भी कैंप नहीं लगा 

नेशनल हेल्‍थ मिशन की वेबसाइट e-RaktKosh पर दिए गए आंकड़ों से पता चलता है कि लॉकडाउन में ब्लड डोनेशन का काम कैसे प्रभावित हुआ है। देशभर में मार्च के महीने में 369 ब्लड डोनेशन कैंप लगे थे, जो अप्रैल में घटकर 148 रह गए। वहीं, मई के महीने में इसमें थोड़ा सुधार हुआ और 19 मई तक देशभर में 163 ब्लड डोनेशन कैंप लगाए गए, ई-रक्तकोष के आंकड़ों के मुताबिक़।

Source: e-RaktKosh

लेकिन उत्तर प्रदेश में लॉकडाउन ने ब्लड डोनेशन को और भी बुरी तरह प्रभावित किया है। वेबसाइट पर दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में मार्च और अप्रैल के महीनों में एक भी ब्लड डोनेशन कैंप नहीं लगा हालांकि मई के महीने में 19 तारीख़ तक 5 कैंप लग चुके थे।

Source: e-RaktKosh

कम कैंप लगने का असर ब्लड डोनेशन पर भी पड़ा है। देशभर में फ़रवरी में 38,386 यूनिट ब्लड डोनेट हुआ जो उसके बाद से हर महीने घटता गया। मार्च में 27,905, अप्रैल में 22,284 और मई के महीने में 19 तारीख़ तक 12,865 यूनिट ब्लड डोनेट हुआ। ग़ौर करने वाली बात है कि ब्लड डोनेशन के यह आंकड़े देशभर के हैं। उत्तर प्रदेश में मार्च और अप्रैल के महीने में कोई ब्लड डोनेशन कैंप नहीं लगा। 

स्टॉक की कमी

लखनऊ के सिविल अस्पताल के ब्लड बैंक का स्टॉक क़रीब 90% तक कम हो चुका है। “लॉकडाउन से पहले हमारे पास हर महीने क़रीब 300 यून‍िट ब्लड रहता था, अब यह 30 से 35 यूनिट रह गया है। मैंने इस महीने एक ब्लड डोनेशन कैंप भी लगवाया था, लेकिन कोरोनावायरस के डर से कोई भी ब्लड देने नहीं आया। अब हम जैसे-तैसे अपने संपर्कों के ज़रिए ख़ून की ज़रूरतों को पूरा कर रहे हैं,” ब्लड बैंक के प्रभारी डॉ. अजय शंकर त्रिपाठी ने इंडियास्पेंड को बताया।

 

प्रयागराज ज़िले के ब्लड बैंक का भी यही हाल है। यहां के मोतीलाल नेहरू ज़िला अस्पताल के ब्लड बैंक में लॉकडाउन से पहले क़रीब 150 से 200 यूनिट ब्लड रहता था, अब यहां 32 यूनिट का स्टॉक बचा है, यानी इसमें क़रीब 80 से 85% तक की कमी आई है। “लॉकडाउन की वजह से परिस्थिति विषम हो गई है। ख़ून की ज़रूरत को पूरा करने के लिए मैं हर शाम हमारी डोनर लि‍स्‍ट में से 15 से 20 लोगों से बात करता हूं, तब जाकर कहीं दो या तीन लोग डोनेट करने आते हैं,” ब्लड बैंक में सलाहकार सुशील तिवारी ने कहा।

लॉकडाउन से पहले प्रयागराज के इस ब्लड बैंक की ओर से हर महीने दो ब्लड डोनेशन कैंप लगाए जाते थे, जिनसे क़रीब 100 से 150 यूनिट ब्लड मिल जाता था। लॉकडाउन के दोरान यहां एक भी कैंप नहीं लग सका। “जब कैंप ही नहीं लग रहा तो स्‍टॉक कम होगा ही। मेरे ब्लड बैंक से बिल्कुल लगा हुआ महिला अस्पताल है, ऐसे में मेरी प्राथमिकता है कि गर्भवती महिलाओं को ख़ून मिलता रहे। बाकी कोई भी आ रहा है तो मैं उसे रिप्लेसमेंट पर ही ख़ून दे पा रहा हूं”, सुशील तिवारी ने कहा। 

ख़ून की कमी से जूझता भारत

देशभर में इस वक़्त 3321 ब्लड बैंक हैं। इन ब्लड बैंकों में 2018-19 में 1.24 करोड़ यूनिट ब्लड जमा हुआ था। उत्तर प्रदेश के 348 ब्लड बैंकों में 2018-19 में 1,279,480 यूनिट ब्लड इकट्ठा किया गया। 20 मार्च 2020 को लोकसभा में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने यह जानकारी उपलब्ध कराई थी।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार किसी भी देश में आबादी के अनुपात में 1% ब्लड होना चाहिए। यह उस देश में ख़ून की बुनियादी ज़रूरत का न्यूनतम मानक है। इस हिसाब से भारत में ख़ून की बुनियादी ज़रूरत क़रीब 1.3 करोड़ यून‍िट (130 करोड़ का 1%) है, लेकिन यह आंकड़ा भारत हासिल नहीं कर पाया।

Source: NACO

इसी तरह उत्तर प्रदेश की आबादी क़रीब 20 करोड़ (2011 की जनगणना के अनुसार) है। ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुसार साल भर में क़रीब 20 लाख यूनिट ख़ून होना चाहिए, लेकिन 2018-19 में उत्तर प्रदेश में केवल 1,279,480 यूनिट ब्लड ही डोनेट किया गया, यानी तय मानक से लगभग 40% कम। यह आंकड़ा बताता है कि कोरोनावायरस संक्रमण से पहले सामान्य परिस्थितियों में भी प्रदेश में ब्लड बैंकों के हालात ज़्यादा अच्छे नहीं थे। ऐसे में कोरोनावायरस संक्रमण और लॉकडाउन ने हालात को और गंभीर किया है।

Source: e-RaktKosh

यूपी के ब्लड बैंकों में 5 दिन तक का ख़ून 

हालांकि, उत्तर प्रदेश के राज्‍य रक्‍त संचरण परिषद की सदस्य सचिव डॉ. गीता अग्रवाल राज्य में ख़ून की उपलब्धता को लेकर आश्वस्त नज़र आती हैं। “लॉकडाउन में ख़ून की डिमांड में भी क़रीब 30 से 40 प्रतिशत की कमी आई है। ऐसे में हमारी कोशिश हैं कि जिस ब्लड बैंक को जितनी ज़रूरत है उतना उनके स्टॉक में रहे। आज की तारीख़ (19 मई) में डिमांड की कमी के हिसाब से देखें तो राज्य के ब्लड बैंकों में इतना ख़ून है कि 5 दिन तक चल सके,” गीता अग्रवाल ने इंडियास्पेंड को बताया। गीता अग्रवाल ने लोगों से ब्लड डोनेट करने अपील भी की, जिससे ज़रूरतमंद लोगों की मदद हो सके।

ऐसी ही अपील 4 मई को केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने भी की थी। उन्होंने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पत्र लिखकर कहा यह सुनिश्चित करने को कहा था कि उनके यहां रक्त की कमी न हो।

ब्लड डोनेशन से कतरा रहे लोग

इन अपीलों के बावजूद सच यह है कि लोग कोरोनावायरस की वजह से ब्लड डोनेशन करने से डर रहे हैं। कानपुर की रहने वाली छवि अग्रवाल (37) के घर में थेलीसिमया के दो मरीज़ हैं। उनकी मां और उनकी बहन के सात साल के बेटे को यह बीमारी है।

“हमें हर महीने 4 से 5 यूनिट ब्लड चाहिए होता है। इससे पहले मैंने एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया था जिससे डोनर आसानी से मिल जाते थे, लेकिन लॉकडाउन की वजह से अब लोग अस्पताल जाने से कतरा रहे हैं। अप्रैल के महीने में जब कहीं से ख़ून नहीं मिला तो मैंने 'पुलिस मित्र' से संपर्क किया तब जाकर मुझे ख़ून मिल सका।”

'पुलिस मित्र' पुलिस कॉंस्टेबल आशीष मिश्रा (31) द्वारा चलाया जाने वाला एक ऐसा व्हाट्सएप ग्रुप है जो पूरी तरह से ब्लड डोनेशन पर काम करता है। इससे ज़्यादातर पुलिस डिपार्टमेंट के लोग जुड़े हैं जो प्रदेश में किसी को भी ख़ून की ज़रूरत होने पर उनकी मदद करते हैं। “इन दिनों मेरे पास ख़ून के लिए आम दिनों के मुक़ाबले ज़्यादा कॉल आ रहे हैं। लोग जल्दी ख़ून देने को तैयार नहीं हो रहे हैं क्योंकि उन्हें कोरोनावायरस के संक्रमण का डर है। मैं हर महीने एक ब्लड डोनेशन कैंप लगाने की कोशिश करता था, जिससे मेरे पास भी कुछ स्टॉक रहे, लेकिन फ़रवरी के बाद से मैं कोई कैंप नहीं लगा पाया हूं,” आशीष मिश्रा ने बताया।

पुलिस मित्र की ओर से लगाया गया एक ब्लड डोनेशन कैंप। फ़ोटो: पुलिस मित्र

एनबीटीसी की गाइड-लाइन

“सरकार की ओर से ब्लड डोनेशन कैंप को लेकर गाइड-लाइन भी जारी की गई हैं, लेकिन मेडिकल कॉलेज और अस्पताल कोरोनावायरस से निपटने में व्यस्त हैं, इस वजह से डोनेशन कैंप नहीं लग पा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में थैलीसिमिया 1,832 मरीज़ हैं, इसके अलावा अप्लास्टिक एनीमिया, ब्लड कैंसर इन जैसे तमाम मरीज़ों के लिए यह चुनौती भरा समय है,” उत्तर प्रदेश में ख़ून की कमी पर थैलीसिमिया सोसाइटी के अध्यक्ष प्रवीर आर्या ने कहा। 

प्रवीर आर्या जिस गाइड-लाइन की बात कर रहे हैं वो 25 मार्च को राष्ट्रीय रक्त संचरण परिषद (एनबीटीसी) की ओर से जारी की गई थी। इसमें यह बताया गया है कि कैसे कोरोनावायरस के वक़्त में सुरक्षित तरीके से ब्लड डोनेशन कराया जाए। इसमें लोगों को ब्लड डोनेशन के लिए प्रोत्साहित करने से लेकर कोरोनावायरस से न डरने तक की जानकारी देने को कहा गया है।

एनबीटीसी की इसी गाइड-लाइन के तहत हाल ही में इटावा के ज़िला अस्पताल में एक ब्लड डोनेशन कैंप लगाया गया, जहां 40 यूनिट ब्लड इकट्ठा हुआ। ज़िले के मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. नरेंद्र सिंह तोमर ने इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी से मिलकर इस कैंप का आयोजन किया। “सही वक्‍त पर कैंप लगा दिया गया तो कोई परेशानी नहीं हुई, अगर देर करते तो परेशानी उठानी पड़ सकती थी,” डॉ. नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा।

(रणविजय, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

हम फीडबैक का स्वागत करते हैं। कृपया respond@indiaspend.org पर लिखें। हम भाषा और व्याकरण की शुद्धता के लिए प्रतिक्रियाओं को संपादित करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

लखनऊ: लॉकडाउन-4 के ऐलान के साथ ही उत्तर प्रदेश के बहराइच की रहने वाली शिविका (30) की चिंताएं भी बढ़ गई हैं। शिविका थैलीसिमिया की मरीज़ हैं और उन्हें हर 15 दिन पर दो यूनिट ख़ून की ज़रूरत होती है। लॉकडाउन से पहले उन्हें यह ख़ून ब्लड बैंक से सीधे मिल जाता था, लेकिन लॉकडाउन के बाद से उन्हें हर यूनिट के लिए एक डोनर को साथ लेकर जाना होता है।

उत्तर प्रदेश में थैलीसिमिया के 1,832 मरीज़ हैं जिन्हें नियमित तौर पर ख़ून चढ़ाए जाने की ज़रूरत होती है। इसके अलावा गर्भवती महिलाओं, अप्लास्टिक एनीमिया और ब्लड कैंसर जैसी तमाम बीमारियों से जूझ रहे मरीज़ों को भी नियमित तौर पर ख़ून की ज़रूरत पड़ती है।

उत्तर प्रदेश में ज़्यादातर मरीज़ इन दिनों ख़ून के लिए जद्दोजहद करते नज़र आ रहे हैं। कोरोनावायरस और लॉकडाउन के कारण उत्तर प्रदेश के ब्लड बैंक ख़ाली होने के कगार पर हैं। कई ब्लड बैंक में तो स्टॉक 80 से 90 प्रतिशत तक कम हो चुका है। स्टॉक इसलिए भी कम हुआ क्योंकि लॉकडाउन की वजह से सुचारु रूप से ब्लड डोनेशन कैंप नहीं लग सके और कोरोनावायरस के डर से लोगों ने ब्लड डोनेट करना लगभग बंद कर दिया है। 

“मैं हर दिन अपनी ज़िंदगी की जंग लड़ रही हूं। मेरे घर में सभी लोग ब्लड डोनेट कर चुके हैं, अब कोई नहीं बचा। मैं हर रोज़ कम से कम 10 लोगों से फोन पर बात करती हूं कि वह ब्लड डोनेशन के लिए तैयार हो जाएं, लेकिन मुश्किल से ही कोई राज़ी होता है। लोगों को कोरोनावायरस का डर है, ऐसे में वह अस्पताल नहीं जाना चाहते,” शिविका ने इंडिया‍स्पेंड से कहा।

उत्तर प्रदेश में मार्च और अप्रैल में एक भी कैंप नहीं लगा 

नेशनल हेल्‍थ मिशन की वेबसाइट e-RaktKosh पर दिए गए आंकड़ों से पता चलता है कि लॉकडाउन में ब्लड डोनेशन का काम कैसे प्रभावित हुआ है। देशभर में मार्च के महीने में 369 ब्लड डोनेशन कैंप लगे थे, जो अप्रैल में घटकर 148 रह गए। वहीं, मई के महीने में इसमें थोड़ा सुधार हुआ और 19 मई तक देशभर में 163 ब्लड डोनेशन कैंप लगाए गए, ई-रक्तकोष के आंकड़ों के मुताबिक़।

Source: e-RaktKosh

लेकिन उत्तर प्रदेश में लॉकडाउन ने ब्लड डोनेशन को और भी बुरी तरह प्रभावित किया है। वेबसाइट पर दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में मार्च और अप्रैल के महीनों में एक भी ब्लड डोनेशन कैंप नहीं लगा हालांकि मई के महीने में 19 तारीख़ तक 5 कैंप लग चुके थे।

Source: e-RaktKosh

कम कैंप लगने का असर ब्लड डोनेशन पर भी पड़ा है। देशभर में फ़रवरी में 38,386 यूनिट ब्लड डोनेट हुआ जो उसके बाद से हर महीने घटता गया। मार्च में 27,905, अप्रैल में 22,284 और मई के महीने में 19 तारीख़ तक 12,865 यूनिट ब्लड डोनेट हुआ। ग़ौर करने वाली बात है कि ब्लड डोनेशन के यह आंकड़े देशभर के हैं। उत्तर प्रदेश में मार्च और अप्रैल के महीने में कोई ब्लड डोनेशन कैंप नहीं लगा। 

स्टॉक की कमी

लखनऊ के सिविल अस्पताल के ब्लड बैंक का स्टॉक क़रीब 90% तक कम हो चुका है। “लॉकडाउन से पहले हमारे पास हर महीने क़रीब 300 यून‍िट ब्लड रहता था, अब यह 30 से 35 यूनिट रह गया है। मैंने इस महीने एक ब्लड डोनेशन कैंप भी लगवाया था, लेकिन कोरोनावायरस के डर से कोई भी ब्लड देने नहीं आया। अब हम जैसे-तैसे अपने संपर्कों के ज़रिए ख़ून की ज़रूरतों को पूरा कर रहे हैं,” ब्लड बैंक के प्रभारी डॉ. अजय शंकर त्रिपाठी ने इंडियास्पेंड को बताया।

 

प्रयागराज ज़िले के ब्लड बैंक का भी यही हाल है। यहां के मोतीलाल नेहरू ज़िला अस्पताल के ब्लड बैंक में लॉकडाउन से पहले क़रीब 150 से 200 यूनिट ब्लड रहता था, अब यहां 32 यूनिट का स्टॉक बचा है, यानी इसमें क़रीब 80 से 85% तक की कमी आई है। “लॉकडाउन की वजह से परिस्थिति विषम हो गई है। ख़ून की ज़रूरत को पूरा करने के लिए मैं हर शाम हमारी डोनर लि‍स्‍ट में से 15 से 20 लोगों से बात करता हूं, तब जाकर कहीं दो या तीन लोग डोनेट करने आते हैं,” ब्लड बैंक में सलाहकार सुशील तिवारी ने कहा।

लॉकडाउन से पहले प्रयागराज के इस ब्लड बैंक की ओर से हर महीने दो ब्लड डोनेशन कैंप लगाए जाते थे, जिनसे क़रीब 100 से 150 यूनिट ब्लड मिल जाता था। लॉकडाउन के दोरान यहां एक भी कैंप नहीं लग सका। “जब कैंप ही नहीं लग रहा तो स्‍टॉक कम होगा ही। मेरे ब्लड बैंक से बिल्कुल लगा हुआ महिला अस्पताल है, ऐसे में मेरी प्राथमिकता है कि गर्भवती महिलाओं को ख़ून मिलता रहे। बाकी कोई भी आ रहा है तो मैं उसे रिप्लेसमेंट पर ही ख़ून दे पा रहा हूं”, सुशील तिवारी ने कहा। 

ख़ून की कमी से जूझता भारत

देशभर में इस वक़्त 3321 ब्लड बैंक हैं। इन ब्लड बैंकों में 2018-19 में 1.24 करोड़ यूनिट ब्लड जमा हुआ था। उत्तर प्रदेश के 348 ब्लड बैंकों में 2018-19 में 1,279,480 यूनिट ब्लड इकट्ठा किया गया। 20 मार्च 2020 को लोकसभा में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने यह जानकारी उपलब्ध कराई थी।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार किसी भी देश में आबादी के अनुपात में 1% ब्लड होना चाहिए। यह उस देश में ख़ून की बुनियादी ज़रूरत का न्यूनतम मानक है। इस हिसाब से भारत में ख़ून की बुनियादी ज़रूरत क़रीब 1.3 करोड़ यून‍िट (130 करोड़ का 1%) है, लेकिन यह आंकड़ा भारत हासिल नहीं कर पाया।

Source: NACO

इसी तरह उत्तर प्रदेश की आबादी क़रीब 20 करोड़ (2011 की जनगणना के अनुसार) है। ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुसार साल भर में क़रीब 20 लाख यूनिट ख़ून होना चाहिए, लेकिन 2018-19 में उत्तर प्रदेश में केवल 1,279,480 यूनिट ब्लड ही डोनेट किया गया, यानी तय मानक से लगभग 40% कम। यह आंकड़ा बताता है कि कोरोनावायरस संक्रमण से पहले सामान्य परिस्थितियों में भी प्रदेश में ब्लड बैंकों के हालात ज़्यादा अच्छे नहीं थे। ऐसे में कोरोनावायरस संक्रमण और लॉकडाउन ने हालात को और गंभीर किया है।

Source: e-RaktKosh

यूपी के ब्लड बैंकों में 5 दिन तक का ख़ून 

हालांकि, उत्तर प्रदेश के राज्‍य रक्‍त संचरण परिषद की सदस्य सचिव डॉ. गीता अग्रवाल राज्य में ख़ून की उपलब्धता को लेकर आश्वस्त नज़र आती हैं। “लॉकडाउन में ख़ून की डिमांड में भी क़रीब 30 से 40 प्रतिशत की कमी आई है। ऐसे में हमारी कोशिश हैं कि जिस ब्लड बैंक को जितनी ज़रूरत है उतना उनके स्टॉक में रहे। आज की तारीख़ (19 मई) में डिमांड की कमी के हिसाब से देखें तो राज्य के ब्लड बैंकों में इतना ख़ून है कि 5 दिन तक चल सके,” गीता अग्रवाल ने इंडियास्पेंड को बताया। गीता अग्रवाल ने लोगों से ब्लड डोनेट करने अपील भी की, जिससे ज़रूरतमंद लोगों की मदद हो सके।

ऐसी ही अपील 4 मई को केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने भी की थी। उन्होंने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पत्र लिखकर कहा यह सुनिश्चित करने को कहा था कि उनके यहां रक्त की कमी न हो।

ब्लड डोनेशन से कतरा रहे लोग

इन अपीलों के बावजूद सच यह है कि लोग कोरोनावायरस की वजह से ब्लड डोनेशन करने से डर रहे हैं। कानपुर की रहने वाली छवि अग्रवाल (37) के घर में थेलीसिमया के दो मरीज़ हैं। उनकी मां और उनकी बहन के सात साल के बेटे को यह बीमारी है।

“हमें हर महीने 4 से 5 यूनिट ब्लड चाहिए होता है। इससे पहले मैंने एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया था जिससे डोनर आसानी से मिल जाते थे, लेकिन लॉकडाउन की वजह से अब लोग अस्पताल जाने से कतरा रहे हैं। अप्रैल के महीने में जब कहीं से ख़ून नहीं मिला तो मैंने 'पुलिस मित्र' से संपर्क किया तब जाकर मुझे ख़ून मिल सका।”

'पुलिस मित्र' पुलिस कॉंस्टेबल आशीष मिश्रा (31) द्वारा चलाया जाने वाला एक ऐसा व्हाट्सएप ग्रुप है जो पूरी तरह से ब्लड डोनेशन पर काम करता है। इससे ज़्यादातर पुलिस डिपार्टमेंट के लोग जुड़े हैं जो प्रदेश में किसी को भी ख़ून की ज़रूरत होने पर उनकी मदद करते हैं। “इन दिनों मेरे पास ख़ून के लिए आम दिनों के मुक़ाबले ज़्यादा कॉल आ रहे हैं। लोग जल्दी ख़ून देने को तैयार नहीं हो रहे हैं क्योंकि उन्हें कोरोनावायरस के संक्रमण का डर है। मैं हर महीने एक ब्लड डोनेशन कैंप लगाने की कोशिश करता था, जिससे मेरे पास भी कुछ स्टॉक रहे, लेकिन फ़रवरी के बाद से मैं कोई कैंप नहीं लगा पाया हूं,” आशीष मिश्रा ने बताया।

पुलिस मित्र की ओर से लगाया गया एक ब्लड डोनेशन कैंप। फ़ोटो: पुलिस मित्र

एनबीटीसी की गाइड-लाइन

“सरकार की ओर से ब्लड डोनेशन कैंप को लेकर गाइड-लाइन भी जारी की गई हैं, लेकिन मेडिकल कॉलेज और अस्पताल कोरोनावायरस से निपटने में व्यस्त हैं, इस वजह से डोनेशन कैंप नहीं लग पा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में थैलीसिमिया 1,832 मरीज़ हैं, इसके अलावा अप्लास्टिक एनीमिया, ब्लड कैंसर इन जैसे तमाम मरीज़ों के लिए यह चुनौती भरा समय है,” उत्तर प्रदेश में ख़ून की कमी पर थैलीसिमिया सोसाइटी के अध्यक्ष प्रवीर आर्या ने कहा। 

प्रवीर आर्या जिस गाइड-लाइन की बात कर रहे हैं वो 25 मार्च को राष्ट्रीय रक्त संचरण परिषद (एनबीटीसी) की ओर से जारी की गई थी। इसमें यह बताया गया है कि कैसे कोरोनावायरस के वक़्त में सुरक्षित तरीके से ब्लड डोनेशन कराया जाए। इसमें लोगों को ब्लड डोनेशन के लिए प्रोत्साहित करने से लेकर कोरोनावायरस से न डरने तक की जानकारी देने को कहा गया है।

एनबीटीसी की इसी गाइड-लाइन के तहत हाल ही में इटावा के ज़िला अस्पताल में एक ब्लड डोनेशन कैंप लगाया गया, जहां 40 यूनिट ब्लड इकट्ठा हुआ। ज़िले के मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. नरेंद्र सिंह तोमर ने इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी से मिलकर इस कैंप का आयोजन किया। “सही वक्‍त पर कैंप लगा दिया गया तो कोई परेशानी नहीं हुई, अगर देर करते तो परेशानी उठानी पड़ सकती थी,” डॉ. नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा।

(रणविजय, लखनऊ में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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